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भड़ास4मीडिया मीडिया वालों की खबर लेता है.

भड़ास4मीडिया एक ऐसा न्यू मीडिया प्लेटफार्म है जो मीडिया के अंदरखाने चलने वाले स्याह-सफेद का खुलासा करता है.

भड़ास4मीडिया आम मीडियाकर्मियों के दुख-सुख का प्रतिनिधित्व करता है.

भड़ास4मीडिया मुख्य धारा की मीडिया, कारपोरेट मीडिया और करप्ट मीडिया द्वारा दबाई-छिपाई गई खबरों को प्रमुखता के साथ प्रकाशित प्रसारित करता है.

भड़ास4मीडिया पूरे मीडिया जगत का माइंडसेट तय करता है.

भड़ास4मीडिया एक दशक से ज्यादा समय से निर्बाध चल रहा है.

भड़ास4मीडिया क्राउड फंडिंग के जरिए संचालित किया जाता है.

भड़ास4मीडिया को इसके पाठक चंदा, डोनेशन और आर्थिक मदद देते हैं.

भड़ाास4मीडिया खबर छापने के मामले में  कभी किसी के सामने न झुका, न डरा.

भड़ास4मीडिया आर्थिक संकट की स्थिति आने पर किसी कारपोरेट या करप्ट के यहां नहीं गिड़गिड़ाता.

भड़ास4मीडिया भ्रष्टाचारियों से समझौता करने की बजाय अपने पाठकों से मदद की अपील करना ज्यादा बेहतर समझता है.

भड़ास4मीडिया से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हजारों शुभचिंतक त्वरित मदद कर संकट टालने का काम करते रहे हैं.

भड़ास4मीडिया अगर आपको भी अच्छा लगता है तो इसकी सेहत दुरुस्त रखने के लिए आर्थिक सहयोग करें.

भड़ास4मीडिया जैसे पोर्टल को बचाए-बनाए रखने के लिए आगे बढ़ कर पहल करने की जरूरत है.

भड़ास4मीडिया को आपने आजतक कभी कोई आर्थिक सहयोग नहीं किया है तो खुद की समझ और संवेदना के बारे में सोचें कि जनपक्षधर मीडिया को जिंदा रखने में आपका क्या योगदान है?

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Mail : yashwant@bhadas4media.com

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भड़ास4मीडिया की खबरें अब यूट्यूब पर भी मिलेंगी, करें चैनल को सब्सक्राइब

अगले कुछ दिनों में भड़ास4मीडिया की खबरें वीडियो फार्मेट में यूट्यूब पर भी मिला करेंगी. इसके पीछे तीन कारण हैं. अगर कोई बड़ी खबर है और उसे तुरंत शेयर करना है तो यूट्यूब के जरिए लाइव उसे ब्राडकास्ट कर दिया जाए. बाद में इत्मीनान से उसे भड़ास4मीडिया पर लिखा-पढ़ा जाए. दूसरा कारण है यूट्यूब के जरिए लाइव ब्राडकास्ट के एक बेहतरीन विकल्प का इस्तेमाल बढ़ाना ताकि इस माध्यम से उन खबरों को सामने लाया जाए जिसे आम तौर पर टीवी / चैनल वाले इग्नोर करते हैं.

तीसरा कारण है यूट्यूब एक मानेटाइज्ड प्लेटफार्म है जिसकी तकनीकी से लेकर सर्वर तक का सारा खर्च खुद यूट्यूब यानि गूगल वाले वहन करते हैं, सो इसमें निवेश लगभग शून्य है और चैनल के वीडियोज हिट होने पर बतौर पार्टनर भड़ास4मीडिया यहां से रेवेन्यूज जनरेट कर सकता है.

अगर आप यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के चैनल को सब्सक्राइव कर लेंगे तो लाइव ब्राडकास्ट होते ही या नया वीडियो अपलोड होते ही आपके पास नोटिफिकेशन आ जाएगा जिसके बाद आप तुरंत लाइव या ताजा अपलोड वीडियोज को वॉच कर सकेंगे. नीचे भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल का स्क्रीनशाट है. इस पर क्लिक करते ही आप यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के पेज पर पहुंच जाएंगे जहां टॉप में दाएं तरफ लाल रंग से चौकोर घेरे में सफेद रंग से लिखा SUBSCRIBE दिखेगा.

इस पर क्लिक करते ही आप चैनल सब्सक्राइव कर लेंगे. इसका प्रमाण होगा अब तक लाल दिख रहे सब्सक्राइव बटन का ग्रे रंग में तब्दील हो जाना. साथ ही इसके ठीक बगल में एक घंटा जैसा आइकन दिखेगा. इस घंटा पर भी क्लिक करना है यानि घंटा बजा देना है. इस पर क्लिक करने से आपको भड़ास के चैनल की गतिविधि का नोटिफिकेशन मिलने लगेगा.

 

 

उपर क्रम से चारों अवस्थाओं के स्क्रीनशाट हैं. सबसे पहले भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल का नार्मल टॉप लोगो है जहां दाहिने तरफ लाल रंग के चौकोर घेरे में सफेद रंग से SUBSCRIBE लिखा है. अगले स्क्रीनशाट में SUBSCRIBE को काले घेरे में इसलिए दिखाया गया है ताकि आप जान सकें कि आपको कहां क्लिक करके सब्सक्राइब करना है. सब्सक्राइब करते ही SUBSCRIBE का रंग लाल से ग्रे हो जाएगा. साथ ही इसके बगल में एक घंटा दिखने लगेगा. देखें तीसरे नंबर का स्क्रीनशाट. उपर आखिरी यानि चौथे स्क्रीनशाट में गोल घेरे में घंटे को दिखाया गया है जिस पर आपको क्लिक करना है.

ध्यान रखें, ये एक जरूरी काम है, जिसके जरिए आप अपने स्मार्टफोन से भड़ास के यूट्यूब चैनल से कनेक्ट रहेंगे और यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया की हर एक गतिविधि से वाकिफ रहेंगे. संभव है, यूट्यूब पर भड़ास4मीडिया के चैनल से खबरों के प्रसारण का पहला प्रयोग आज या कल में शुरू कर दिया जाए.

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एफआईआर दर्ज न होने से परेशान यूपी के एक मान्यता प्राप्त पत्रकार ने भेजी भड़ास को चिट्ठी

अर्जुन द्विवेदी ने भड़ास4मीडिया को एक पत्र भेजकर एक एफआईआर दर्ज कराने के बाबत किए जा रहे अपने संघर्ष का उल्लेख किया है और अपनी जान-माल के नुकसान की आशंका जाहिर की है. अर्जुन द्विवेदी यूपी के राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं. अर्जुन से संपर्क editorsristimail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. पढ़िए भड़ास के नाम आई अर्जुन की चिट्ठी…

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है!

भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने वाले अभय को दिवाकर और अवनिन्द्र ने भी दिया जवाब, पढ़िए

भड़ास4मीडिया को शुरू से ही एक खुला, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मंच बनाकर रखने की कोशिश की गई. यही कारण है कि जब जब भड़ास या इसके फाउंडर यशवंत के खिलाफ कुछ भी किसी ने लिखकर भेजा तो उसे पूरे सम्मान के साथ छापा गया. इसी क्रम में कल भड़ास के एक पाठक अभय सिंह का पत्र भड़ास पर प्रकाशित किया गया, साथ ही संपादक यशवंत द्वारा दिया गया क्रमवार जवाब भी… इसके पब्लिश होते ही दो प्रतिक्रियाएं भड़ास के पास मेल से आई हैं. बनारस से युवा पत्रकार अवनिंद्र और नोएडा से आईटी कंपनी के संचालक दिवाकर ने जो कुछ भेजा है, उसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

नोएडा से आईटी कंपनी के हेड दिवाकर प्रताप की चिट्ठी…

कल भड़ास के एक पाठक द्वारा यशवंत जी को भेजा गया एक पत्र पढ़ा जो भड़ास पर प्रकाशित हुआ. पाठक ने सवाल किया था कि ऐसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर यशवंत क्या हासिल कर लेंगे.  मैं भी बहुत दिनों से यही सोच रहा था, बस यशवंत जी को बता नहीं पा रहा था. मुझे भी यही लगता है कि भड़ास एक स्तरहीन पोर्टल है. असल में यशवंत जी का काम ही सिरे से स्तरहीन है.

आज जब मीडिया में तमाम स्तर बन गए हैं, यशवंत उनसे कोसों दूर हैं. क्या हैं वो स्तर, बताता हूँ. पहली स्तरहीनता है चाटुकारिता की. अक्सर मीडिया संस्थान राजनीति के एक धड़े से सम्बद्ध होते हैं. जो नहीं होते वो चल नहीं पाते, या फिर अंततोगत्वा वो चाटुकारिता के स्तर पर आ ही जाते हैं.

मुझे लगता है यशवंत का काम चाटुकारिता वाले इस स्तर पर बिलकुल खरा नहीं उतरता. वो अक्सर चाटुकारों को गरियाते पाए जाते हैं. सच को सच की तरह प्रस्तुत करके उन्होंने स्थापित स्तरों के परे जाने की ही कोशिश हमेशा की है. इसलिए उनका काम बिलकुल भी स्तरीय नहीं है.

दूसरी स्तरहीनता है धन कमाने की. हमारे यहाँ मीडिया संस्थानों को उनकी पैसे कमाने की कुव्वत के हिसाब से रैंक किया जाता है. अब ये पैसा कल्पवृक्ष से तो आता नहीं, जाहिर है मीडिया संस्थानों के निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए गलत तरीके से कमाए गए पैसे ही होते हैं. भले ही बाद में उनको विज्ञापन की आय बताया जाए.

तो वो जो पैसा कामने का स्तर है, यशवंत उससे भी कोसों दूर हैं. कह सकते हैं कि एक बहुत बड़ी स्तरहीनता है.

तीसरा स्तर है समझौता करने वाला स्तर. अधिकतर पत्रकार और उनके संस्थान समझौता करके ही चलते हैं. किसी का स्टिंग विडियो आया तो उससे पैसा लेकर उसको दबा दिया जाता है. किसी की अन्दर की खबर प्रकाशित होती है तो कुछ समय बाद हटा दी जाती है. ये जो स्तर कायम हो गया है, उसकी आवश्यकता को यशवंत नहीं समझ पा रहे हैं. तो यहाँ भी वो स्तर वाली पत्रकारिता से बहुत दूर हैं.

चौथा स्तर है भीरूपन का स्तर. आज तमाम अपराधी हर तरह से मीडिया को दबाने का काम कर रहे हैं. ऐसे में अपनी मीडिया की दूकान को चलाने के लिए ये संस्थान पूँछ दबाकर अक्सर दुबके हुए पाए जाते हैं. यशवंत यहाँ भी दुबकने को राजी नहीं. जेल जा चुके हैं, हमला भी झेल चुके हैं. पर भीरु बनने को राजी नहीं. ये भी निरी स्तरहीनता ही है. शायद इन भीरूओं की तरह रहे तो अवश्य स्तरीय कहलायेंगे.

ऐसे और भी तमाम स्तर हैं जहाँ यशवंत फिट नहीं बैठते. उनको चाहिए कि वो इन स्थापित स्तरों के अनुसार जल्द से जल्द स्तरीय पत्रकारिता की शुरुआत करें. तब हम जैसे तमाम पाठक उनके काम को सराहेंगे. उम्मीद है जल्द ही वो इन सारे स्तरों पर पहले से अधिक फिट होंगे और अपने पाठकों का अधिक से अधिक प्यार हासिल करेंगे.

दिवाकर प्रताप सिंह
dsingh@qtriangle.in


बनारस से अवनिन्द्र कुमार सिंह का जवाब…

डियर यशवंत जी (जेल जिसकी जानेमन है), अभी-अभी व्हाट्सअप पर आप द्वारा भड़ास की खबरों को प्राप्त किया। रोजाना की तरह पहले सभी खबरों की हेडलाइन देखा। पहले मेरी नजर ‘जी न्यूज से रोहित सरदाना गए’ खबर पर टिकी, जिसके बाद अंत में ‘भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’ नामक शीर्षक पर गई तो गाड़ी चलाते समय भी खुद को रोक नहीं पाया और लिंक पर क्लिक करके खबर खोला। पहले तो प्रिय अभय जी के पत्र को पढ़ा तो अचंभित रह गया फिर सोचा शायद अभय जी को यह मालूम न होगा कि किन परिस्थियों में भड़ास की शुरुआत हुई थी। मित्र आपके प्रश्नों के कुछ उत्तर आपको देने का प्रयास करता हूँ बाकी के खुद भड़ासी (यशवंत जी) ने दे दी है।

यशवंत जी जो अमर-उजाला और जागरण जैसे संस्थानों में नौकरी करने वाले वह पत्रकार थे जिसकी कलम जब सच्चाई न लिख पाती थी तो वह अपने अंदर का आक्रोश शांत नहीं कर पाते होंगे, शायद इसलिए भड़ास की शुरुआत हुई, जहा तक मैं जानता हूँ जीवन में प्रयोग करना यशवंत जी का रूटीन है। जहा तक बात मीडियाकर्मियों द्वारा यशवंत जी पर लात-घूसों से मारने का है आप उतने में ही घबरा गए मित्र। भड़ास के शुरु होने के बाद कई बड़े संस्थानों को पशीने छुटे थे अलबत्ता यशवंत जी को षड्यंत्र रचकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जेल तक भेजा था, वहा भी यशवंत जी अल्हड़पन और मस्तमौला जीवन यापन करके जेल को ही ‘जानेमन’ बना लिए। जेल से छूटने के बाद जेलयात्रा का जो वृतांत ‘जानेमन जेल’ पुस्तक में लिखी उसे पढ़कर जेल नाम से भय समाप्त हो जाता है। भ्रष्ट और कारपोरेट मीडियाघराना कभी नहीं चाहता कि भड़ास सुचारु रुप से चले क्योंकि मिडियाघरानों के तहखाने की खबर, भ्रष्टाचार, यौनशोषण की बातें जनता तक पहुंचाने का कोई माध्यम न बचे।

मित्र अभय जी जिस भड़ास को आप स्तरहीन कह रहे है वह वास्तव में बाप है मीडिया का।कार्पोरेट और करप्ट मीडिया घरानों का। बात यादि अर्जित करने की है तो यशवंत जी को आर्थिक लाभ हुआ हो या नहीं मगर आत्मसंतुष्टि और लाखों पीड़ित मीडियाकर्मियों की दुआ अवश्य अर्जित हुई है।

रही बात ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश करने की तोदिल्ली में बैठकर अकेले यशवंत जी यह काम नहीं कर सकते कारण स्पष्ट है मित्र जिस साथियों को वह जोड़ेंगे उन ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों को अगले ही पल संस्थान बाहर का रास्ता दिखा देगा शायद आपको मालूम न हो कि कई मीडिया संस्थानों ने दफ्तर में भड़ास वेबसाइट को खोलने पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मित्र आपने जो यशवंत जी से आशा कि है कि मीडिया में उनके जैसे साहसी, निडर पत्रकार की जरुरत है इसलिए भड़ास की जरुरत है। कारपोरेट मीडिया को आईना दिखाने चौथे स्तम्भ को उसकी अहमियत लगातार भड़ास बताता आया है और जो आपने भड़ास के शीघ्र त्याग की बात कही है वह होने से रहा क्योंकि जब-जब भड़ास से मदद की अपील की है तो चोरी-छिपे हजारों मीडियाकर्मियों ने देशभर से सहायता राशि भेजते होंगे क्योंकि उनका दर्द, अखबार मैनेजमेंट की तानाशाही और संपादक का तुगलकी फरमान का विरोध केवल भड़ास ही कर सकता है।

आप सबका बनारस का साथी

अवनिन्द्र कुमार सिंह
avanindrreporter@gmail.com


जिन सज्जन अभय सिंह ने भड़ास पर कल भड़ास निकाली थी, उनका एक और मेल आया है, वो इस प्रकार है…

यशवंत भैया
सादर प्रणाम

बेहद खुशी हुई कि आपने मेरी भड़ास का बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया।पर हर प्रतिक्रिया पर तिलमिलाने की आदत से आज हर नेता,एंकर, पत्रकार पीड़ित है शायद सब्र का बांध अब टूट चुका है । मीडिया भी बिगबॉस का नकारात्मक शो बनकर रह गया है जहाँ प्रतिभागियों को लड़ा भिड़ाकर trp बटोरी जाती है। शायद स्वयं में बदलाव का ये सबसे सही समय है। मेरी आपसे बड़ी उम्मीद है और मेरा विश्वास है कि आप मेरा भरोसा नही तोड़ेंगे भड़ास से भी दूरगामी पहल करेंगे।

मैं आपके पोर्टल का अदना सा पाठक हूं ।न्यूज़,डिबेट देखने सुनने में मेरी गहरी रुचि है ।पत्रकारिता से मेरा दूर तक कोई वास्ता नहीं है ।बस दिल किया और आपको अपनी बात बता दी। पत्र में वर्तनी, वाक्यांश का दोष जरूर होगा क्योंकि अगर अंग्रेजी में टाइप करता तो शायद संवाद में कमी होती इसलिए मोबाइल पर जल्दी में हिंदी टाइप करना उचित समझा लेकिन मोबाइल पर हिंदी टाइप करना कितना कठिन है कि मेरी उंगलिया जवाब दे गई बेहतर होता कि मैं आपको हस्तलिखित पत्र स्कैन करके मेल कर देता।

मेरा आपसे यही सवाल था कि मीडिया के गुण दोषों में अपना समय बर्बाद करने की बजाय खुद एक बेहतर विकल्प बनने का प्रयास किया जाय। हम दूसरों को बदलने की कोशिश करने की बजाय खुद को ऐसा बनाये की लोग हमें देखकर अपनी गलतियों का आभास करें और उन्हें दूर करें।अगर आप किसी की भयंकर आलोचना करते है तो दो संभावनाये बनती हैं या तो आप सच्चे आलोचक हैं या ब्लैकमेलर।आज मीडिया ब्लैकमेलर की भूमिका में है जब उसके हित पूरे हो जाते है तो वे आलोचना बंद कर देते है।उदाहरण के तौर पर यूपी चुनाव में अखिलेश यादव ने लंबे समय तक ऐसा मीडिया मैनेज किया की जमीनी सच्चाई से दूर सारे पत्रकार लगातार गलत विश्लेषण कर रहे थे । चुनाव परिणाम के बाद अधिकांश पत्रकारों की राजनीतिक समझ पर खूब छीछालेदर हुई।आखिर क्या पत्रकारिता पर पेट भारी है।

मीडिया को ब्लैकमेलिंग का धंधा बनाकर अपना उल्लू सीधा करना आज आम है इसे बदलने की जरूरत है । ऐसा देखा जाता है कि जहाँ मीडिया के आर्थिक हित होते है वहाँ सही गलत का फर्क खत्म हो जाता है।

जब आप पर हमला हुआ तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आपके भड़ास4मीडिया के अलावा कहीं भी इस बात की चर्चा तक नहीं हुई आप खुद ही अकेले लड़ते रहे।आखिर क्यों आप अकेले पड़ गए इसका आत्ममंथन आपको करना जरूरी है।

मुझे लगता है कि भविष्य में मीडिया में बड़ा बदलाव अत्यावश्यक है जिसकी आप एक बड़ी उम्मीद बन सकते है ।मैं एक पाठक हूँ अपनी राय रख सकता हूँ बाकी फैसला आपका है। भाषण में मेरा यकीन नही है हां पत्रकारिता के उभरते हनुमान को उनके बल, सामर्थ्य की की याद जरूर दिला सकता हूं।

शुरू से ही मीडिया के बदलते रंग रूप को देखकर गहरा संदेह होता है इसी को जानने के लिए भड़ास4मीडिया की मदद लेता रहा हूं।एक उम्मीद दिखती है लेकिन क्या ये सब पर्याप्त है। मेरी एक उम्मीद है कि भविष्य में ऐसा मीडिया हो जिसमे निष्पक्ष, ईमानदार लोग हो जो trp की होड़ से कोसो दूर हो। दिल्ली और हनीप्रीत के ड्रामे केअलावा देश के और भी हिस्सों की समस्याओं को सामने रखें।डिबेट में शांत संतुलित बहस हो। सत्ता के आगे रेंगने की बजाय उनसे सवाल पूछने का माद्दा हो।चैनल की विश्वसनीयता इतनी हो कि देश उस पर भरोसा करे लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है।इसमे बदलाव के वाहक आप बने यही ईश्वर से मेरी कामना है। बस एक उम्मीद से आपसे अपनी हाँफती उंगलियों को विराम देना चाहूंगा।

धन्यवाद

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


मूल मसला इसमें है…

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भड़ास पर भी लग गया ‘आनलाइन कटोरा’, आप भी कुछ डालें इसमें

Yashwant Singh : द वायर और न्यूज लांड्री जैसी कारपोरेट फंडित वेबसाइटों ने भी जनता से पैसा मांगने के लिए हर खबर के नीचेे एक कटोरा (बल्कि आनलाइन कटोरा कहना चाहिए) लगा रखा है, ”दे दो रे, सौ दो सौ तीन सौ चार सौ… जो सूझे वही दे दो क्योंकि हम लोग बड़ी किरांती कर रहे हैं.. आप जनता की खातिर…” टाइप वाला कटोरा…

कटोरा समझ रहे हैं न… चार-पांच चिल्लर उछालने से निकलती टन टन टन की आवाज के बीच दे दो रे बाबा.. भगवान भला करेगा… गाने वालों के हाथ में होता है ये..

तो द वायर और न्यूजलांड्री के आनलाइन कटोरों को देखने के बाद हमको भी लगा कि यार ये कटोरा तो भड़ास पर भी हर खबर के नीचे सटकर डटकर लगा होना चाहिए… सो फौरन अपने टेक गुरु Divakar Singh से संपर्क साधा. उनसे पूछा कि क्या यह कटोरा लगाने वाला काम आसानी से हो जाएगा? दिवाकर ने सदा की तरह कहा- आप टेंशन न लें सर, आपने कह दिया, समझो काम हो गया.

और, फाइनली कटोरा लग गया.

मजेदार ये कि कटोरा लगते ही दनादन पैसे भी गिरने लगे… अब तक साढ़े बारह हजार रुपये आ चुके हैं.. इसमें सबसे आनंद वाली चीज है कि सबसे पहले सौ रुपये उस एक लड़के ने भेजा जो पिछले काफी समय से नौकरी खोज रहा है… मैंने उसे फोन कर कहा, तूने क्यों भेजा बे… तो बोला- भइया चेक कर रहा था कि जा रहा है या नहीं… मैं बोला- तो रिफंड कर देता हूं… वो लगा हंसने.. आप भी गजबे करते हैं… चेक करने और रिफंड करने में कटोरा वाली कंपनी पांच दस रुपया काट कर कमा लगी… रहने दीजिए अपने पास…

एक बड़े आदमी नुमा मित्र ने पांच हजार रुपये इकट्ठा भेजा.. वो भी काफी समय से ठीकठाक रोजगार में नहीं हैं… मैंने कहा कि हे बड़े आदमी… माना कि आपको सौ दो सौ पांच सौ रुपये देने में शर्म लगती है सो आपने कटोरे में इंगित की गई अधिकतम राशि पर क्लिक मार कर भेज दिया लेकिन मुझे तो पता है न कि आप काफी समय से अपना बचा गड़ा माल ही निकाल कर खा रहे हैं तो फिर ये नेकी क्यों?

वो तर्क देते रहे लेकिन मैं सुना नहीं… उनका पैसा रिफंड करा दिया.. यानि उनके एकाउंट में वापस करा दिया…

मुझे तो आनंद केवल देने वालों के नाम पढ़ने में आ रहा है.. सारे नाम परिचित सुने से हैं… अच्छा लगता है जब सौ या दो सौ या पांच सौ या हजार रुपये रिसीव होने का मैसेज मेल से आता है उसमें किसी परिचित का नाम होता है, सेंडर के रूप में.. तब सच में लगता है कि लोग भड़ास को प्यार करते हैं…

और हां, अपने टेक गुरु दिवाकर जी ने भी हजार रुपये भेज दिए हैं… मतलब जिनको भड़ास से लेना चाहिए, इसका तकनीकी कामकाज देखने के वास्ते, वो भड़ास को दे रहे हैं… इनका भी रिफंड करूंगा… 🙂

लव यू आल… 🙂

सो, अब आप भी भड़ास4मीडिया डाट काम पर हर खबर के ठीक नीचे सौ, दो सौ, पांच सौ, हजार, दो हजार और पांच हजार रुपये डोनेशन देने के विकल्प को पाएंगे और उम्मीद करते हैं कि अपने सामर्थ्य भर जरूर मदद कर भड़ास4मीडिया जैसे पोर्टल को जिंदा रखने में मदद करेंगे.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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भड़ास के खिलाफ एक पाठक ने यूं निकाली अपनी भड़ास, ‘यशवंत जी, भड़ास का अंत आवश्यक हो गया है!’

यशवंत जी

भड़ास पर मेरी भी एक भड़ास है। ये भड़ास आपके पोर्टल से उत्पन्न हुई है। जब आप मीडिया के कुकृत्यों पर भड़ास निकालते हैं तो मीडिया के ही लोग आप पर लात घूसों की मुक्केबाजी करके भड़ास निकालने लगते हैं। आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा। जब NBA, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने में अक्षम हैं तो आप भड़ास जैसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर क्या अर्जित कर रहे हैं?

बेहतर ये होता कि आप खुद गंभीर पहल करके मीडिया के अच्छे पत्रकारों का एक अलग समूह बनाते जिसमें ईमानदार-निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश की जाती जो देश के बिकाऊ मीडिया के लिए आईना होती। गंभीर आर्थिक संकटों से गुजरते मीडिया की मजबूरियों को भी समझना जरूरी होगा। साथ ही मीडिया के टीआरपी होड़ पर भी गौर करना जरूरी होगा।

भड़ास की बेशर्मी वाली भाषा न तो पाठकों को सुकून देती है ना ही आप को। हाल ही में आप पर लात घूसों से हमला हुआ पर इक्का दुक्का छोड़ कोई मीडिया आपके समर्थन में नही आया। मुझे लगता है कि मीडिया को आप जैसे साहसी निडर पत्रकार की जरूरत है जो निष्पक्ष, ईमानदार बेबाक पत्रकारिता से कारपोरेट मीडिया को आईना दिखा सके और उसे चौथे स्तम्भ की अहमियत बताये। यशवंत जी, आप भड़ास जैसे पोर्टल का शीघ्र त्याग करेंगे, यही मेरा आपसे निवेदन है।

एक पाठक

अभय सिंह

abhays170@gmail.com


अभय के उपरोक्त पत्र का भड़ास एडिटर यशवंत ने यूं दिया क्रमवार जवाब…

शुक्रिया अभय भाई, पत्र लिखने के लिए, और अपने दिल-मन में अटकी हुई भड़ास निकालने के लिए… आपने जो कुछ कहा है, उसे उद्धृत करते हुए सिलसिलेवार मैं अपना जवाब लिख रहा हूं…

-मीडिया के ही लोग आप पर लात घूसों की मुक्केबाजी करके भड़ास निकालते है। आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा?

(अरे भाई, पहली बार हमला हुआ है, वो भी पोलखोल खबर के कारण. यह तो भड़ास पोर्टल की सफलता है. क्या पत्रकार हमले, जेल और पुलिस के डर से पत्रकारिता करना बंद कर दें? और हां, आगे भी हमले होंगे, यह जानता हूं. आगे भी जेल जा सकता हूं, यह जानता हूं. तो, भय के कारण हम अपने कर्तव्य, अपने काम से विमुख हो जाएं, ये तो कोई तरीका न हुआ ब्रदर. सिलसिला चलते रहना चाहिए… मैं अपना काम करूंगा… वो अपना काम करें… वो कहानी पढ़ी है न आपने… साधु और बिच्छू वाली… साधु बार बार बिच्छू को बहते नदी से निकाल कर उसकी जान बचाने की कोशिश करे और बिच्छू बार-बार उसे डंक मार दे… दोनों अपना अपना काम कर रहे थे… साधु अपनी साधुता नहीं छोड़ रहा था और बिच्छु अपने डंक मारने के स्वभाव से मजबूर था… )

-जब NBA, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने में अक्षम है तो आप भड़ास जैसा स्तरहीन पोर्टल चलाकर क्या अर्जित कर रहे हैं?

(एनबीए, एडिटर्स गिल्ड जैसी अनेक मीडिया संस्थाएं मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने के लिए नहीं बनी हैं बल्कि ये मीडिया के कारपोरेट मालिकों और मीडिया के करप्ट संपादकों की रक्षा के लिए कवच हैं… इन संस्थाओं के जरिए कारपोरेट मीडिया मालिक और उसके करप्ट संपादक देश की सरकारों से बारगेन करते हैं, चौथे स्तंभ का मुलम्मा ओढ़कर और ढेर सारी सुविधाएं हासिल करते हैं, ढेर सारे लाभ लेते हैं. ये संस्थाएं सच्चे पत्रकारों और सच्ची पत्रकारिता का साथ नहीं देतीं… जनहित की पत्रकारिता पर ये चुप्पी साधे रहते हैं… ये केवल कारपोरेट मीडिया हाउसेज की रक्षक संस्थाएं हैं इसलिए इनसे मीडिया के कुकृत्यों पर लगाम लगाने की उम्मीद करना ही बेमानी है. रही बात भड़ास के स्तरहीन होने की तो ये बात उन हजारों पत्रकारों से पूछिए जिनकी मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में भड़ास न सिर्फ एक मंच और अगुवा बना बल्कि सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने में बड़ा माध्यम बना. देश भर के हजारों पत्रकारों को एकजुट कर पाने के लिए भड़ास ही निमित्त बना हुआ है. शोषित पत्रकारों की आवाज को उठाने का एकमात्र मंच भड़ास बना हुआ है… सैकड़ों उदाहरण हैं पिछले दस साल के जब भड़ास ने साहस के साथ सच को उजागर कर आम मीडियाकर्मयिों की आवाज को बुलंद किया और कारपोरेट मीडिया के मुंह पर कालिख पोतकर नंगा किया. राडिया टेप कांड हो या नवीन जिंदल सुधीर चौधरी स्टिंग, ऐसे दर्जनों मामलों को भड़ास ही पब्लिश कर सका क्योंकि मीडिया से जुड़े ये घपले घोटाले उठाने के लिए कारपोरेट मीडिया वाले तैयार न थे.. चोर-चोर मौसेरे भाई के अंदाज में चुप्पी साधे थे… हो सकता है आपको भड़ास स्तरहीन लगता हो… मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना… जाके रही भावना जैसी, प्रभु मूर देखी तिन तैसी… दिन भर पोर्न और घटिया खबरें छपने वाले बड़े बड़े मीडिया हाउसों के पोर्टल आपको अच्छे लगते हैं और भड़ास स्तरहीन तो भई मुझे इस पर कुछ नहीं कहना…)

-बेहतर ये होता कि आप खुद गंभीर पहल करके मीडिया के अच्छे पत्रकारों का एक अलग समूह बनाते जिसमें ईमानदार निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल पेश की जाती जो देश की बिकाऊ मीडिया के लिए आईना होती।

(-सब काम हमहीं कर लेंगे तो आप क्या करेंगे…. खाली भाषण देंगे भाई? …ज्यादा अच्छा होता कि मुझे चिट्ठी लिखने से पहले इस काम के लिए आप पहल शुरू कर देते… ये बीड़ा आप उठाते… वैसे भारत में ‘पर उपदेश कुशल बहुतुरे’ बहुत हैं… राय बहादुर बहुत सारे लोग हैं… गला फाड़ ढेर सारे लोग हैं.. भाषणबाज और बतोलेबाजों की कमी कहां अपन के देश में… उम्मीद करता हूं आप बतोलेबाज नहीं होंगे.. तो बताइएगा कि आपने क्या पहल की है और अब तक क्या किया है पत्रकारिता में…)

-भड़ास की बेशर्मी वाली भाषा न तो पाठक को सुकून देती है ना ही आप को।

(भाषा बहता हुआ जल है. इसे आम जन से जुड़ा हुआ यानि बोलचाल वाली सहज सरल होनी चाहिए… बाकी, आप अगर साहित्य थोड़ा-बहुत भी पढ़े होते (अपढ़ नहीं कहूंगा आपको क्योंकि आप लिख तो लेते हैं, हालांकि ढेर सारी वर्तनी और वाक्य विन्यास की त्रुटियां हैं, सो आपकी पढ़ाई-लिखाई के लेवल को स्तरहीन कह सकता हूं) तो आप भड़ास की भाषा पर आपत्ति न करते. काशीनाथ सिंह का एक उपन्यास है, बनारस पर, अस्सी घाट पर, इसे आप लेकर पढिएगा फिर जानिएगा भाषा चीज क्या होती है… वैसे, मैं जानना चाहूंगा कि आपको भड़ास की किस खबर का कौन सा शब्द बेशर्मी भर लगा जिसके आपका सुकून चैन छिन गया.. आप अगर उदाहरण यानि फैक्ट्स के साथ बात करते तो मैं शायद ठीक से जवाब दे पाता..)

-आप पर लात-घूसों से हमला हुआ पर इक्का-दुक्का छोड़ कोई मीडिया आपके समर्थन में नहीं आया।

(हम इस उम्मीद में काम नहीं करते मुश्किल वक्त आने पर आप या वो मेरे समर्थन में आएं.. मीडिया तो वैसे ही मेरे यानि भड़ास के खिलाफ रहता है क्योंकि उनकी पोल तो भड़ास ही खोलता है… दूसरे हम जिन आम मीडियाकर्मियों के मंच हैं, आवाज हैं, वो बेचारे अपनी जरूरतों-संघर्षों और मीडिया संस्थानों में अपनी नौकरियों को लेकर इतना बिजी हैं, परेशान हैं कि उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह मेरे लिए सड़क पर आकर मार्च करें. खबर लिखने के कारण, पोलखोल के कारण हमले होना कोई नई बात नहीं है… बहुत सारे पत्रकारों ने इसके लिए जान तक गंवाए हैं… पर पत्रकारिता बंद तो नहीं हुई… लोगों ने पत्रकार बनना बंद तो नहीं किया… आज भी बहुत सारे जोरदार पत्रकार हैं जो जान की बाजी लगाकर काम कर रहे हैं…. मैं जेल भी गया… इसी भड़ास के कारण… तब भी कौन पूरा देश उठ खड़ा हुआ था मेरे समर्थन में…. पर जेल से लौटकर भड़ास तो नहीं बंद किया… मैंने हमलावरों को माफ कर दिया.. उनके खिलाफ एफआईआर तक नहीं कराया… एक वकील मित्र के दबाव देने पर केवल लिखित कंप्लेन थाने में दे आया था ताकि सनद रहे. गीता में कहा गया है, काम किए जाइए, नतीजे की परवाह न कीजिए… भड़ास अब कुछ वैसा ही हो गया है मेरे लिए… बहुत सारे लोगों के साथ भीड़ नहीं दिखती लेकिन उनके पास अदृश्य ताकतें खड़ी होती हैं, कोस्मिक एनर्जी की लेयर्स उन्हें प्रोटेक्ट करती हैं… आंतरिक यात्रा की इन बातों को आप न समझ पाएंगे क्योंकि इतना कुछ समझ पाते तो आपकी चिट्ठी की लाइनें वाक्य शब्द कुछ और होते. वैसे, आपको लगता है कि मेरे पर हमले के बाद केवल इक्का-दुक्का लोग ही खड़े हुए… मैंने तो देखा, हजारों मैसेजेज, फोन काल्स, आर्टकिल्स आए मेरे पास… कुछ ऐसे लोग भी मिले जो हमलावरों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए तत्पर थे… पर मुझे सड़क चलते मिले कुछ पागलों से उलझना न था, आगे बढ़ जाना था इसलिए जो कुछ हुआ उसे इगनोर किया, उन पागलों को माफ किया और अपने काम पर लग गया.)

-मेरी आपसे आशा है कि मीडिया को आप जैसे साहसी निडर पत्रकार की जरूरत जो निष्पक्ष, ईमानदार बेबाक पत्रकारिता से कारपोरेट मीडिया को आईना दिखा उस 4th स्तम्भ की अहमियत बताये। यशवंत जी आप भड़ास जैसे पोर्टल का शीघ्र त्याग करेंगे यही मेरा आपसे निवेदन है।

(एक तरफ मुझे आप साहसी निडर जाने क्या क्या बता रहे हैं और फिर भड़ास के त्याग के लिए भी कह रहे हैं.. ये कांट्राडिक्टरी स्टेटमेंट समझ नहीं पाया… खैर, चलिए, आपका कहना मान लेते हैं. लो अभी से त्याग दिया भड़ास… अब आगे बताइए. क्या किया जाए? क्या कोई आपके पास एक्शन प्लान है? या यूं ही भड़ास के खिलाफ भड़ास निकालने के लिए भड़ास निकाले हैं.. वैसे, भड़ास को बंद करने के लिए मैं भी अक्सर सोचता रहता हूं लेकिन उसकी वजह दूसरी है… अगले दस साल कुछ दूसरा काम यानि घुमक्कड़ी, आंतरिक यात्रा, अध्यात्म आदि को देना चाहता हूं… पर आप जिन कारणों से भड़ास मुझसे बंद कराना चाहते हैं, वो मेरी समझ से परे है)

आभार

यशवंत

yashwant@bhadas4media.com


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‘भडास4मीडिया’ के बाद ‘कैफे भड़ास’ शुरू, देखें यहां कैसे निकालते हैं ‘भड़ास’! (वीडियो)

Kunal Verma : सुना है आपने ‘कैफे भड़ास’ के बारे में? मुझे पता है आप लोगों में अधिकतर ने भड़ास का नाम सुना होगा। हां वही भड़ास जो फ्रस्ट्रेशन के नाम से हमारे मन के भीतर होता है। मीडिया के लिए चर्चित तब हुआ जब वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह ने मीडिया के लोगों को अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए एक मंच प्रदान किया। इसे नाम दिया ‘भड़ास फॉर मीडिया’। तमाम झंझावतों को झेलते हुए भड़ास फॉर मीडिया आज भी हिंदी का सबसे लोकप्रिय साइट बना हुआ है। लोकप्रिय क्यों है, यह एक रिसर्च का विषय है। पर साधारण शब्दों में कहा जाए तो सभी के अंदर कुछ न कुछ भड़ास है जिसे वह पढ़कर, लिखकर, सुनकर, बोलकर निकाल लेना चाहता है। भड़ास ने वह प्लेटफॉर्म सभी को दिया।

अब जिस भड़ास की मैं बात आपको बताने जा रहा हूं उसके बारे में शायद आपने कभी नहीं सुना होगा। यह है ‘कैफे भड़ास’। इंदौर में इस कैफे का संचालन होता है। मैंने इस कैफे भड़ास के बारे में आज ही सुना है। बड़ा रोमांचक लगा इसीलिए आपसे इसकी बातें साझा कर रहा हूं। कल टीम इंडिया से बुरी तरह हारने के बाद आस्ट्रेलिया टीम के कुछ प्लेयर्स यहां पहुंचे थे। इन खिलाड़ियों ने बेसबॉल की बैट से टीवी, कंप्यूटर और अन्य सामनों को तोड़कर अपनी भड़ास निकाली।

यह भड़ास निकालने का अनोखा प्लेटफॉर्म हैं। यहां आप अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए खूब तोड़-फोड़ कर सकते हैं। आस्ट्रेलिया के डीन जोन्स और ब्रैड हॉग ने कहा है कि हार से हम फ्रस्टेड हो गए हैं। अब फ्रस्टेशन निकल गया है। अगले मैच में जीत के लिए हम तरोताजा हो चुके हैं। एक वीडियो भी है जिसे शेयर कर रहा हूं। आप भी इस कैफे भड़ास का मजा लें। देखें वीडियो…

‘आज समाज’ अखबार के संपादक कुनाल वर्मा की एफबी वॉल से.

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क्या ‘भड़ास टास्क फोर्स’ बनाने का वक्त आ गया है?

भड़ास संपादक यशवंत पर पत्रकार कहे जाने वाले दो हमलावरों भूपेंद्र नारायण भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर हमला किया था. उस हमले से उबरने के बाद यशवंत ने अपने भविष्य की योजनाओं को लेकर काफी कुछ खुलासा किया है. इसमें एक भड़ास टास्क फोर्स बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है.

इस बाबत यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वो इस प्रकार है…

यशवंत ने अपनी पूरी बात इस वीडियो में कही है…

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भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

अपने एक पत्रकार साथी मृदुल त्यागी, दैनिक जागरण मेरठ के जमाने में ज्योतिषीय ज्ञान-गणना के आधार पर राहु-केतु टाइप के दो खूंखार जीवों / ग्रहों-नक्षत्रों का मुझ पर भयंकर प्रकोप बताया-समझाया करते थे. तब मुझे मन ही मन लगता रहा कि जरूर ये मूलांक 9 वाला अंक राहु है और जन्मांक 8 वाला केतु. अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 वाला अंक थोड़ा क्रिएटिव पर्सनाल्टी डेवलप करता है और 9 वाला दुस्साहसी / खाड़कू / दबंग टाइप का. जब दोनों साथ हों तो आदमी ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’ मार्का द्वंद्व समेटे हुआ जीवन के हर क्षण को हाहाकारी टाइप से जीता है. अपन का भी कुछ कुछ ऐसा रहा है. 🙂

ऐसा लग रहा है कि राहु-केतु मेरा पिंड छोड़ रहे हैं. ज्योतिष के विद्वान लोग बताएं कि क्या मेरे इस बर्थडे पर राहु और केतु की अनंत प्यास बुझ जाएगी और वो मेरा पिंड छोड़कर मेरे किसी ‘चाहने’ वाले के कपार पर सवार हो उसे सदा के लिए बेचैन आत्मा बनाकर छोड़ेंगे 🙂

मौज लेते रहना चाहिए.

इस जन्मदिन पर मैं क्या सोच-गुन रहा हूं?

बस दो चीजें.

एक तो सोचने-दिमाग लड़ाने का काम लगभग बंद कर रहा हूं. ‘जाहे विधि राखे प्रभु, ताहे विधि रहिए’ वाला मेरा हाल हो गया है. इस रास्ते पर चलते हुए लग रहा है कि चलते रहो, जब जीवन का अंतत: कोई मकसद ही नहीं होता तो फिर काहें को टेंशन लेने का, हर साल का चार्ट काहें को तैयार करने का. तत्काल में यानि तुरंत में जीते रहो, न अतीत को लेकर परेशान होओ और न भविष्य को लेकर चिंतित. तत्क्षण को उदात्त तरीके से जीते रहो. जीवन यापन के लिए जो करो, इतने कलात्मक ढंग से, इतने मन से और इतने डूब कर करो कि वही तपस्या और ध्यान बन जाए.

बीते दो दशकों के दौरान समझ, संघर्ष, समय, चेतना और नियति आदि के मेलजोल के चलते अब एक जाग्रत भाव-सा निर्मित हुआ है. यह भाव महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता, क्योंकि जो इससे वंचित है, वह सारा का सारा शब्दजाल मानेगा. एक नया जीवन चर्या डेवलप होने लगा है. पुराने संस्कारों की ज़िद खत्म होती जा रही है. नई लाइफस्टाइल ने खुद ब खुद जगह बनाना शुरू किया है. एक ट्रांजीशन फेज चल रहा था पिछले चार पांच साल से, वह पूरा होने की ओर है. सहजता और शांति, ये ऐसी चीजें हैं जो बीते एक साल के दौरान शिद्दद से खुद के भीतर महसूस किया, कर रहा हूं. इन्हें खदेड़ने के वास्ते बाहरी तौर पर बेहद अशांत और असहज माहौल क्रिएट करता रहा, जान बूझ कर, पर जीतता रहा अंदर वाला ही. अपने आप.

किसी भी चीज की परवाह न करना, तत्क्षण में जीना, किसी भी तर्क-वितर्क या घटनाक्रम की निर्रथकता महसूस करना, ‘ये हो जाएगा तो क्या हो जाएगा और वो नहीं हो रहा तो क्या बिगड़ रहा’ टाइप फीलिंग का घर करते जाना… ये सब मिलाकर एक अ-सामाजिक सा व्यक्तित्व निर्मित होता रहा. एक शब्द आता है हाइबरनेशन. शायद मेरे मामले में उसी की बारी है. अतिशय उर्जा खर्च कर अब तक का भड़ भड़ टाइप जिया हुआ करियरवादी / क्रांतिकारी / अराजकतावादी (जिसे जो मानना हो माने, अपन तो जीवन को समग्रता में देखते हैं) जीवन फिलहाल इनके इतर या इन्हीं चीजों के दूसरे कांट्रास्ट / छोर की तरफ शिफ्ट हो गया है. सबका भला हो, सबको प्रेम मिले, सब सहज हों, सब भयमुक्त हों. ऐसा फील आने लगा है. ऐसा करने-कराने का मन करने लगा है. पहले भी थी, लेकिन तब दूसरे रास्ते तलाशे जाते थे. दूसरे हथियार अख्तियार किए जाते थे. अब तो अलग बात है. अब तो सहज बात है.

इस आंतरिक मन:स्थिति के इस लेवल की ज्यादा व्याख्या यहां संभव नहीं है. शब्द शायद सटीक न मिलें और इसके अभाव में व्याख्या कहीं सतही न हो जाए. वैसे भी, आंतरिक यात्राएं अधिकांशत: निजी हुआ करती हैं. बाहरी यात्राएं अक्सर सामूहिकता और परंपरा का स्वभाव लिए होती हैं. अध्यात्म आंतरिक यात्रा से जुड़ा मामला है. इसमें बाहरी मदद ज्यादा नहीं मिल सकती. इसमें सामूहिकता का कोई ज्यादा मतलब नहीं है. अप्प दीपो भव: वाली स्थिति होती है यहां. विज्ञान और व्यवस्था आदि चीजें परंपरा दर परंपरा निर्मित होती रहती है. इसमें हर पीढ़ी कुछ न कुछ जोड़ती रहती है. और, हर आदमी के जाग्रत होने के खुद के रास्ते तरीके होते हैं. फिलहाल इस विषय को यहीं छोड़ते हैं. यह इतना बड़ा टापिक है, इतने डायमेंशन हैं कि इसे लिखा नहीं जा सकता. दूसरे, अगर सब लिख दिया तो उसे सब महसूस नहीं कर सकते.

अब दूसरी बात. भड़ास को 26 अगस्त को बंद करने को लेकर जो मेरा ऐलान था, उसके बाद से लगातार मंथन, चर्चा और विमर्श अलग-अलग लोगों से होता रहा. तय फिलहाल ये हुआ कि भड़ास को बंद न किया जाए. और, इसमें बहुत ज्यादा उर्जा भी न खर्च की जाए. इसके संचालन के लिए आय के स्रोत क्रिएट करने को लेकर कई किस्म की चर्चाएं हुईं. मेरा निजी मन भड़ास से इतर कुछ नये आंतरिक प्रयोगों को लेकर है, सो भड़ास मेरी प्रियारिटी में न रहेगा. हां, बड़ा प्रकरण / मामला आएगा तो छोड़ेंगे नहीं, छोटे-मोटे मामलों का लोड लेंगे नहीं.

आखिरी बात. जो कुछ विजिबल है, उतना ही गहरा, उतना ही मजबूत इनविजिबल चीजें हैं. उर्जानांतरण इधर से उधर होता रहता है. इसे आप विजिबल मोड में फील कर सकते हैं, उस पाले, यानि इनविजिबल हिस्से को महसूस कर सकते हैं. इसके लिए दिन के उजाले से बचिए, रातों की दिनचर्या शुरू करिए. रात में बगल के पेड़ से आ रही चिट चिट वाली गिलहरी की आवाज के जरिए गिलहरी की रातचर्या को महसूस करिए. अगल-बगल दिखने वाले कुछ चुनिंदा अंधेरों से बतियाइए, उनसे दोस्ती करिए. ये सब एक डोर हैं जिनके जरिए आगे बढ़ा जा सकता है.

फिलहाल जैजै वरना कमरेडवा सब कहेंगे कि गड़बड़ा गया है 🙂

पर ये भी सच है कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग.’ इसलिए मस्त होकर अपनी लाइफ खुद चुनिए, जीइए.

फिर से जैजै मित्रों.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया की मौत का ऐलान हम सबके लिए एक बुरी खबर है

चर्चित मीडिया केन्द्रित वेबसाइट भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने ऐलान किया है कि 26 अगस्त से वेबसाइट का संचालन बंद कर दिया जाएगा। पिछले एक दशक से मीडिया संस्थानों के न्यूज़ रूम के अंदर और बाहर पत्रकारों और उनके मालिकों के अच्छे-बुरे कर्मों को बेबाकी के साथ प्रकाशित करने वाले यशवंत सिंह आर्थिक संकट की वजह से भड़ास को बंद करने की बात पहले भी करते रहे हैं, लेकिन जैसे-तैसे यह वेबसाइट अब तक चलती आ रही है।

अब एक बार फिर यशवंत सिंह ने बकायदा 26 अगस्त का दिन मुर्करर करते हुए भड़ास को बंद करने का ऐलान किया है। यशवंत ने इसकी वजह आर्थिक संकट के साथ ही हिन्दी समाज और समझ को बताया है। भड़ास की भूमिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह वेबसाइट देश के ज्यादातर हिन्दी अखबारों व न्यूज़ चैनल के कार्यालयों में बैन कर दी गई है। संपादक की कुर्सी पर बैठकर सामंतों की तरह व्यवहार करने वाले मालिक-संपादकों को हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उनके काले कारनामे लीक होकर भड़ास तक न पहुंच जाएं। संपादकों की अयाशी से लेकर दलाली तक की खबरों को भड़ास पर जगह मिलती रही है।

मीडिया के भीतर की सड़ाध को बाहर लाने में भड़ास का एक अहम रोल रहा है। यही वजह रही है कि भड़ास, भ्रष्ट व सत्ता की दलाली करने वाले पत्रकार व मीडिया मालिकों की आंख की किरकिरी बना रहता है। हालांकि भड़ास पर भी आरोप लगता रहा है कि वह एकतरफा रिपोर्टिंग के जरिये सनसनी की तरह खबरें प्रकाशित करता है और गाहे-बगाहे चिरकुट किस्म के धंधेबाजों को जरूरत से ज्यादा स्पेस देता है।

ऐसे वक्त में जब भारत में मीडिया का कारपोरेटीकरण तेजी से हो रहा हैे, और मीडिया संस्थाओं के न्यूज़ रूम में साजिशों, षडयंत्रों का सिलसिला पहले से और भयावह होता जा रहा है, तब भड़ास जैसी संस्थाओं का होना और भी बेहद जरूरी है। ऐसे में भड़ास की बंदी का ऐलान हम सब जो भी उसके चाहने वाले हैं, के लिए एक बुरी खबर है। इस पर हम मातम ही मना सकते हैं! यशवंत की हिम्मत अब अगर जवाब दे रही है और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि  भड़ास के लिए अब मौत ही बेहतर विकल्प है तो यही सही! नई यात्रा के लिए शुभकामनाएं!

लेखक दीपक आज़ाद उत्तराखंड के तेजतर्रार पत्रकार और ‘वाचडाग‘ के एडिटर हैं.

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यशवंत ने फेसबुक पर लिखा- ”26 अगस्त से भड़ास बंद!”

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने फेसबुक पर एक छोटी-सी पोस्ट डालकर ऐलान किया कि भड़ास4मीडिया का संचालन 26 अगस्त से बंद कर दिया जाएगा. इसके पीछे उन्होंने वजह आर्थिक संकट के साथ-साथ हिंदी समाज व इसकी समझ को भी बताया है. इस ऐलान के बाद आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यहां दिए जा रहे हैं…

Kamal Kumar Singh स्टेटस रात 12 बजे के बाद आया है। पब्लिक टेंशन न ले। 🙂

Yashwant Singh मैंने अपनी ज़िंदगी के सारे बड़े फैसले नशे में लिया, लेकिन लंबी आंतरिक उत्तेजना और शांति के साथ।

Ashutosh Dixit नहीं बंद होगा, क्योंकि फिर कोई जगा देगा आपके अंदर की भड़ास..शुभकामनाएं, नए युद्ध की जो जल्द शुरू होगी भईया…

Yashwant Singh शायद अब नहीं। मेरी आंतरिक यात्रा का आवेग प्रबलता शायद बाहरी से प्रभावित न हो। ये एक लंबे समय से स्थगित फैसले का एक सही वक्त पर एलान ही है।

Kamlesh Kumar बेहद दुखद… आप हार मानने वालो में से नही हो भाई

Yashwant Singh सच है। लेकिन आंतरिक आदेश के लगातार आह्वान का अनुपालन हार नहीं बल्कि एक नया आगाज़ है।

Arpan Jain हर समस्या का समाधान बना है… इसका भी निकलेगा… आप सुधि साथियों से सहयोग ले सकते है… मैं भी तैयार हुँ… परन्तु यह अनंत की यात्रा की रुकावट असहनीय है….

Yashwant Singh अनंत की यात्राएं हमेशा आंतरिक होती हैं। बाहरी अनंत यात्राएं अम्बानी टाइप लोग करते हैं।

Nikhil Dave सबसे कठिन दौर सफलता के पहले का पड़ाव है। हिम्मत रखिए, भड़ास बनी भी रहे और निकलती भी रहे ।

Yashwant Singh मेरी कोई रुचि नहीं बची, न मुझे चंदा चाहिए।

Vishnu Rajgadia आप एक जरूरी काम कर रहे हैं और आप इसे अब छोड़ नहीं सकते।

Yashwant Singh कभी कामरेड था काफी समय से बिल्कुल नहीं हूं। जन सरोकार की मेरी प्रतिबद्धता निजी रही है। अब नितांत निजी प्रयोगों जीवन से दो- चार होने की आकांक्षा है।

Santosh Singh भड़ास के बंद होने की सूचना भड़ास पर डालिए बाकि खबर कॉमेंट बॉक्स में। काहे पका रहे हैं लोगों को।

Yashwant Singh कल लग जाएगा। और, तय तारीख पर बन्द भी हो जाएगा। ज्यादा लोड न लें।

Santosh Singh aisa nahi hoga. chalta rahe ye apecha

Fareed Shamsi hahahah kya baat hai yashvant bhai phirki le rhen sabhi ki, ek waqt ko sans lena to bhul sakten hain, lekin bhadas band ho jaye ye kabhi ho hi nahi sakta hai

Yashwant Singh ये एक नंगा सच है। कुबूल करिए।

Vijay Vardhan अपने समर्थकों को प्रेरित कर रहे हैं ठीक हैं, अन्यथा गलत

Yashwant Singh दोनों काम नहीं कर रहा।

Ghanshyam Dubey क्या किसी ने मुहूर्त बताया है ? फिर कुछ और होगा ! भड़ासी चुप बैठ ही नही सकता न !! देखते हैं…..!!

Yashwant Singh हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

Reetesh Tewari यशवंत भाई, उत्तम फैसला, क्योंकि धाराएं कभी ठहरी नहीं, उनका काम है बहना। पानी गर रुक गया तो सड़ान्ध मारने लगता है। अपने प्रयोगधर्मी दिमाग में कुछ नया सोचे, भड़ास से भी बेहतर।

Yashwant Singh सबसे बेहतर कमेंट। लव यू। आगे की यात्रा नितांत निजी है भैया।

Nadim S. Akhter सही सोच रहे हैं। एकदम बंद कीजिए। अब मानिएगा नहीं। घर परिवार के लिए कुछ कीजिए।

Yashwant Singh भाई, इस देश में हर कोई चाहता है कि क्रांति हो लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके घर का चिराग इसमें जले। वो सिर्फ दूसरों के घर का चिराग जलते देखना चाहते हैं।

Amit Pathe :  भड़ास मीडिया का अपने तरह का अग्रणी और सबसे चर्चित नाम है Yashwant सर. मीडिया की ख़बरों का पर्याय है भड़ास. इसका ख़ौफ़ मैंने स्वयं बड़े मीडिया संस्थानों में देखा है जहाँ आज भी भड़ास ब्लॉक किया हुआ है. लेकिन किस मीडिया की ख़बरों/विचारों का मंच जमाते-सजाते रहेंगे आप? वो जो अपने वर्क कल्चर, सैलरी और नैतिकता के मामले में बुरी की खाया हुआ है. जिसमें एक जुटता है न लोग एक-दूसरे से ईमानदार हैं. बड़े शहर के और कुछ बड़े संस्थानों को छोड़ हर न्यूज़ रूम ख़ुशहाल नहीं है. और ये हालात और बदतर भी होते जा रहे हैं. मीडिया के भले के लिए आया मजीठिया हाल ख़स्ता कर गया. नोट बैन ने आग में और घी डाला. HT ने सबको शॉक किया और मीडिया की नींव से बड़ा पत्थर निकाल लिया. देश में jio क्रांति के बाद प्रिंट को outdated क़रार दिया जाने लगा है और प्रिंट मीडिया में ‘स्टॉक क्लीरन्स’ चल रही है. कुकुरमुत्ते की तरह websites आ रही हैं. उनका अपना अजेंडा और स्वार्थ. कुछ अच्छा काम कर रही हैं लेकिन बड़े corporate मीडिया संस्थान ही हर तरफ़ आगे हैं. ऐसी मीडिया के लिए आप क्यूँ आहुति दे रहे हैं. क्या पाएँगे ऐसी मीडिया के लिए अपने आर्थिक मसलों को ताक पे रख के? बे-मिशन मीडिया के लिए आप कौन सा मिशन चला लेंगे? अगर कोई सम्पादकीय दख़ल के बिना बड़ी पूँजी और संसाधन उपलब्ध करवा कर इन्वेस्टमेंट करना चाहे तो किसी रेवेन्यू मॉडल के बारे में ज़रूर सोचें. जैसे वेब को लिमिटेड कर paid App बनाना या किसी IT/web स्टार्ट-अप से जुड़कर काम करना. बाक़ी स्वहित और निजी आर्थिक पहलुओं को प्राथमिकता दें. मंगलकामनाएँ

AK Yadav : जब से Yashwant भैया का मैसेज पढ़ा हूं कि 26 अगस्त से भड़ास बंद करने का विचार कर रहे हैं तब से मन बहुत व्यथित है ​क्योंकि जब मीडिया में नहीं आया था उस समय एक दिन ऐसे ही गुगल पर पत्रकारों के बारे में सर्च कर रहा था कि मेरी आखों के सामने भड़ास4मीडिया का लिंक आया मुझे लगा कि नाम अलग है तो काम भी अलग ही होगा। उस समय मैं भी ब्लागर पर लिखता था लेकिन भड़ास को देखने के बाद लगा कि कोई तो है जो इन सबकी बजाता है पत्रकारों की आवाज को उठाता है। भड़ास पेज पर पहुचकर मैं कितना खुश हुआ था यह न लिखा नहीं जा सकता न ही बताया जा सकता है। उसके बाद पत्रकारिता में वहीं से लगाव होने लगा और फिर फरवरी 2010 में जनपद से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहित समाचार पत्र में नौकरी करने चला गया। उसके बाद राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश में काम करने के बाद मुम्बई का अखबार बनारस में लाया दिनरात मेहनत किया उसमें सफलता नहीं मिली उसके बाद जागरण समेत कई अन्य अखबारों वेब पोर्टल में काम करने का मौका मिला लेकिन दिल में एक ही बात थी कि Yashwant भैया से एक बार मुलाकात करूं। पहली मुलकात उनसे गाजीपुर में हुई जहां मेरे एक अनुरोध पर वे ग्रापए के सम्मेलन में आये और जमकर भडास निकाले। उसके बाद फिर दूसरी ​मुलाकात दिल्ली में आयोजित मीडिया मोनाटाईजिंग वर्कशाॅप में हुई। मेरे जीवन में पत्रकारिता के दौरान कई उतार चढ़ाव आये कई सहयोगियों ने टांग खीचने का भी कई दफा प्रयास किया जब जब मेरा विरोेध साथी पत्रकारों द्वारा होता तो उनको Yashwant भैया की किताब जानेमन जेल की कुछ लाईने सुनाकर भैया के ही शब्दों में जमकर गरिया देता। फिर खुश हो जाता। पत्रकारिता में मेरा मन जब जब दुखी हुआ तो दो पैग लगाकर #जानेमन_जेल की यह लाईन आज भी गुनगुना लेता हूॅ कभी—कभी मेरे दिल में यह खयाल आता है कि जिन्दगी लौ… लग गयी फिर खुश हो जाता। वास्तव में Bhadas4media के बंद होने से बहुतों को खुशी मिलेगी, बहुतों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन जो भड़ास के पाठक हैं जो भड़ास के समर्थक हैं जो भड़ास को बहुत मानते हैं उनको लगेगा जैसे उनकी दुनियां उजड़ गयी। अब कहां और कैसे निकालेंगे भड़ास? Yashwant भैया प्लीज Bhadas4media को बंद करने से पहले एक बार जरूर विचार कीजिए। -आपका छोटा सा समर्थक

मुकुन्द हरि शुक्ल : www.bhadas4media.com का अगले महीने से बंद होना निराशाजनक है लेकिन अकेले दम पर भाई Yashwant Singh ने इतने साल तक जैसे इसे चलाया, उस समर्पण, पत्रकारों और पत्रकारिता के हित के लिए किसी भी हद तक लड़ने के जज्बे के लिए यशवंत जी की जितनी भी तारीफ़ की जाय, कम ही होगी। फिर भी उम्मीद है कि बेहतर आर्थिक सम्बल के साथ शायद फिर कभी भड़ास वापसी करेगा।

Nadim S. Akhter : भाई Yashwant Singh भड़ास बंद करना चाहते हैं। मैं उनके फैसले के साथ हूँ। एकदम बंद कीजिए। अब मानिएगा नहीं। घर परिवार के लिए कुछ कीजिए। इस देश में हर कोई चाहता है कि क्रांति हो लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके घर का चिराग इसमें जले। वो सिर्फ दूसरों के घर का चिराग जलते देखना चाहते हैं। भारतीय समाज में हर कोई चाहता है कि पत्रकार ईमानदार रहे लेकिन इस ईमानदारी की कीमत चुकाकर जब वो सड़क पे आ जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई संस्था नहीं। अब कौन गांधी बचा है इस देश में जो अपने घर परिवार को ताक पे रखकर सामाजिक क्रांति की अलख जगाएगा? यशवंत भाई पे भी आरोप लगे हैं। मुझे नहीं पता उनमें कितनी सच्चाई है पर भड़ास को इतने लंबे समय तक अपने बलबूते खींचना किसी आश्चर्य से कम भी नहीं। एक और बात दीगर है कि उनकी वेबसाइट ने पीड़ित-शोषित पत्रकारों की आवाज़ को एक बड़ा प्लेटफार्म दिया है। ये छोटी बात नहीं। हां, कई दफा एकतरफा खबरें भी दिखीं, जिसे इग्नोर किया जा सकता है क्योंकि ये किसी अकेले शख्स के बूते की बात नहीं कि वो हर खबर की तहकीकात कर सके। यशवंत भाई, अब कुछ घर परिवार और अपने बारे में सोचिए। बहुत हुआ। अब इस काम को नई पीढ़ी के कंधे पे डालिए। वो उठाये तो ठीक, वरना दुनिया तो चल ही रही है।

Sanjaya Kumar Singh एक सुधार चाहता हूं, क्योंकि जानता हूं। अगर एकतऱफा आरोप छपे तो उसका एकतरफा जवाब भी छपा। शिकायत करने वालों से यशवंत यही कहते रहे हैं (और छापा – लिखा भी है) कि आप अपना पक्ष लिखकर भेज दीजिए, उसे भी छाप देंगे और वह छपता रहा है।

Nadim S. Akhter हाँ। उन्होंने छापा है। आपसे सहमत।

Vivek Singh बिलकुल, और जवाब वैसा का वैसा ही छापा। चाहे उसमें उन्हें जो लिखा गया हो।

Shyam Singh Rawat ‘घर फूँक तमाशा’ कितने दिन चल सकता है भला, वह भी जन-सरोकारी तो बिल्कुल भी नहीं। इस तरह की पत्रकारिता में आर्थिक संकट सदैव घेरे रहता है और जान का जोखिम अलग। आप जैसा जीवटधारी व्यक्ति ऐसा निर्णय विवशता में ही ले सकता है।

Gautam Tiwari Whatttt…Try to save such a nees portal..which connects all journos through multi face news items…Its a VOICE…
Anil Janvijay हिन्दी की यही नियति है।

अंकित द्विवेदी सर योद्धा इतनी जल्दी हथियार नहीं डालते। एक बार फिर से विचार करिये।

प्रवीण श्रीवास्तव दुःखद…. ह त ढ़ेर अदिमी त खुस हो जइहें… मीडिया ग्रुप के मनमानी और बढ़ जाई.. अइसन ना होखे त बेहतर बा

Vijayshankar Chaturvedi भड़ास बहुत दिनों तक वैसे भी नहीं निकलती रह सकती। यह नव विकसित मनुष्य के स्वभाव के विपरीत है जैसे कोई 24*7 प्यार नहीं कर सकता।

Murar Kandari समय की धारा जहाँ ले जाए , यशवन्त भाई

Syed Mazhar Husain आप ने अगर भड़ास बन्द करने की सोची है तो ज़रूर आपके ज़ेहन में कुछ और वेहतर होगा। मैं जानता हूं आप हार मानने वालो में से नही । हमारे लायक कुछ हो तो बताईयेगा हमेशा खड़ा पाइयेगा।

Ram Dayal Rajpurohit भड़ास को बंद करना अपने आप पर घोर अत्यचार हैं ।। जब मोदी अपनी भड़ास को मन की बात कहे कर करता है । तो आप भी ,,, भड़ास से बहुत कुछ ज्ञान मिलता पब्लिक को सो ये ज्ञान गंगा बहती रहनीं चाइये

Jaleshwar Upadhyay यह प्रयास भी अच्छा था और आगे जो भी करेंगे, अच्छा ही होगा। भविष्य की शुभकामनाएं। आप सफल होंगे अपने मकसद में यही उम्मीद करता हूं।

Care Naman कोशिश कर हल निकलेगा आज नहीं तो कल निकलेगा जो थमा थमा सा है वो भी चल निकलेगा

Kamal Sharma यह बंद मत कीजिए स्‍वामी भडासानंद जी। भडास आश्रम, भडास साइट का चलना जरुरी है। 26 अगस्‍त का मुहूर्त निकलवाया है क्‍या यशवंत भाई।

Somit Srivastav Destruction is first stage of construction !!

Jitendra Narayan दुखद है बंद होना…प्रयास करें हमसब साथ हैं आपके…!

Pushpendra Albe आप आदर्श हैं सर, आनलाईन मीडिया बिरादरी के लिए

Maruf Khan Kyaa hua bhai,..to fir hm.logo.ko ab khabre kise ptaa chlengii bhadas ki

Dinker Srivastava बाप रे बाप….सुधी पाठकों को झटका..

Ashok Anurag मेरी चिंता न करो मैं तो संभल जाऊँगा, गीली मिट्टी हूँ हर रूप में ढल जाऊँगा…

संजीव सिन्हा ओह! भड़ास के शुभचिंतकों को आगे आना चाहिए।

Prameel Kumar Manohra अब तो हम भी भड़ासी हो गए। और आप बंद करने की सोच रहे हो।।

Anil Kumar Upadhyaya व्यापार बंद पर फ़ेसबुक तो भड़ास निकालने का ज़रिया बना रहेगा बना रहेगा।

Arun Khare निसंदेह कुछ और बेहतर होने वाला है । शुभकामनाएं।

Vinay Pandey जिस तरह विद्यार्थी के लिए यूनिफार्म अनिवार्य होती है वैसे ही पत्रकारों के लिए भड़ास ऐसा कोई पत्रकार नहीं जो दिन में एक दो बार भड़ास को खोल के देखे नसर बंद मत करिए बोलिये तो हम लोग मिल के आर्थिक संकट को दूर करें

Vijay Tiwari शायद एक दो साल पहले आपने कही थी कि भड़ास को डॉलर में पैसे मिलते है । और अब बंद करने की सोच ली।

Vinod Kumar Bhardwaj अलविदा दोस्त। मजे से रहना।

Dinesh Mansera मंगल वक्रीय होगया है

Vishal Ojha समझा जा सकता है

Anupam Pandey इसको बंद न करें….हम और हमारी टीम इसको चलाने या सहयोग करने के लिए तैयार है।

Sanjay Kumar Agarwal i am agree

Umesh Srivastava Socialist किसी विषय से लिप्सा ना होना यही तो ज्ञान है इस मोहभंग होने की क्या बात ज्ञानी हमेशा नई खोजों में लगा रहता है किसी एक विषय से उसकी लिप्सा नहीं होती उसकी प्रत्येक विषय में लिप्सा है और किसी में नहीं है यही ज्ञान की पराकाष्ठा है जय हिंद जय भारत

Rajiv Tiwari भड़ास चैनेल की शरुआत करने वाले है क्या?

Sushil Shukla भाई अगर किसी पत्रकार की करतूत जाननी हो तो वो भड़ास से ही पता चलती है । अब कौन बताएगा कि फला पत्रकार क्या क्या गुल खिला रहा है? हे मेरे भड़ास प्रमुख इसे बन्द न करें अगर सच्चाई को जिन्दा रखना है तो भड़ास को चलना होगा।

Sujeet Singh Prince आपकी भड़ास न कभी बन्द थी, और न पूरे जीवन बन्द होगी……

Rajshekhar Vyas दुःखद समाचार सुबह सुबह – युद्धस्व!

Dilip Clerk दादा ऐसा मत कीजिये हम लोगो को मार्गदर्शन में भड़ास अहम् भूमिका में है

Sheetal P Singh बन्द मत करो, बेच दो या दान कर दो! कोई दूसरा इससे जीवन यापन करे तो क्यों गुरेज़?

Upendra Prasad हाँ, बंद करने से बेहतर है इसे बेच देना. कोई और इसे चला लेगा.

Rajendra Joshi ऐसा न करियेगा… हम समझ सकते हैं कितना मुश्किल होता है पोर्टल चलना

Vinod Bhardwaj न जाने कितनों की आवाज़ बन चुके भड़ासी बाबा ने ज़रूर कुछ नया सोचा होगा| शांत बैठने वालों में से तो नहीं है ये| जिसे औरों के लिए कुछ कर गुजरने की आदत पड़ जाये, वह कुछ न कुछ ज़रूर करेगा| और यहाँ तो बात यशवंत की है…इस प्रयोगधर्मी दिमाग की नयी उपज देखने का इंतज़ार है अब| शुभकामनायें……

Vinay Shrikar अभी न करो बाबू ऐसा ! पांच-छह साल रुक जाओ, ताकि यह दिन देखने के लिए मैं न रहूँ।

Abhinandan Mishra यशवंत ji, please let us know if we can contribute in any way to keep your efforts alive… BHADASH cannot shut down.

Rajaram Tripathi आर्थिक संकट अगर मूल कारण है, तो , जैसे भी हो दूर कर लिया जाएगा, मैं इसकी जिम्मेदारी लेता हूं, आप चलाइये इसे, ये जरुरी है। मोहभंग, लोगों की समझ वाली बातें वक्ती जुनून है, दिमागी खलल है,,हर साधक को यह पुल पार करना ही पड़ता है,, मेरे भाई,, भड़ासानंद,,इसका भी शत प्रतिशत इलाज संभव है , हमारे विशुद्ध हर्बल से।

Sanjay Shukla This is the one platform for expressing grievances of exploited journalists. I request you to not close it. Will try to help in whatever way we can

Madhu Sudan Yaswant kitna paisa / month se chal jayega aapko milta rahega chahaiye bahut hi jaruri hi

Sachin Chaudhuri 60k to abhi bhi per month portal ko Google ad se mil rhe hai. Koi arthik presani ho portal ko mai nai manta Baki band Mat Karo Sir isko.

Devendra Surjan Yashwant भाई इतने सारे मित्रों और शुभचिंतकों की सुनिये और अपना निर्णय बदलिए , यथासंभव सहयोग करने सब तैयार हैं . मीडिया की पोल पट्टी खोलने का यह अद्भुत प्रयोग है , इसे अनवरत जारी रखना चाहिए .

Sachin Chaudhuri Yashwant Singh apko arthik problem hai ki portal ko …..portal ko to koi arthik tangi mujhe nai lagta ho jo data portal pai hai usse jayda wo earn kar rha hai

Ashok Aggarwal अब कौन से समाज में रहने का प्लान है… जो भी करोगे उसके लिये अग्रिम शुभकामनाएं…

Kamta Prasad कुछ बेहतर होगा इसे लेकर खुश होऊँ, या हम जैसे निरीह नागरिकों का मंच चला जाएगा इसे लेकर अफसोस करूँ। खैर, आने वाला समय बताएगा।

Deepak Pandey अरे ऐसे कैसे बंद हो जाएगा सर… हम लोग हैं न.. हैंडओवर कर दीजिए अपने अपने विश्वस्त लोगों को। वो खुद चला लेंगे। भड़ास का होना मीडिया के लिए बहुत जरूरी है।

Sanjay Shekhar यशवंत जी आप नए प्रयोग जरूर करें। आपको शुभकामनाएं, लेकिन यह जरूर सुनिश्चित करना होगा कि भड़ास चलता रहे। इसे बंद करना पत्रकारों की आवाज़ को बंद करना होगा जिसे आप कभी नही करना चाहेंगे। बाकी परेशानियों का हल निकालने में हम आपके साथ है। मेरी जिस स्तर पर मदद की जरूरत हो मैं तैयार हूं।

Singhasan Chauhan इतना क्यों नाराज हैं यसवंत भाई हमारे जैसे लोगों को आपसे बहुत आश है …

Ved Prakash Singh हिम्मत न हारो हजारों को मारो। संस्था चलाना आसान नहीं होता। आप दूसरा प्रयोग करना चाहते हैं करिए इसके लिए एक उप संपादक रख कर व्यापारियों की तरह चलाइये। विज्ञापन प्रतिनिधि भी रखना न भूलिएगा।

Purushottam Asnora बहुत दुखद, घाटे में आखिर कहां तक निकल सकेगा? क्या कोई समाधान हो सकता है सर।

डॉ. अजित मैं आपके नए आत्मिक वेंचर को लेकर उत्साहित हूं निसन्देह यह व्यष्टि और समष्टि के लिए होगा। आपको चैतन्य शुभकामनाएं !

Syed Faizur Rahman Sufi भड़ास के बन्द होने से हजारों पत्रकार की आवाज भी बन्द हो जाएगी

Ramji Mishra अरे ऐसा न कहिये। बस एक बार आपसे बात हो जाये तो कुछ निवेदित करना चाहूँगा……

Manoj Dublish सरजी ; एक बार राजनीति में भी भाग्य आजमा लीजिये क्योंकि लोकतंत्र कौशल विकास का सबसे बडा सबूत है जहाँ आठवीं पास उप मुख्य मंत्री और अनपढ शिक्षा मंत्री बन जाता है तथा रेलवे संपत्ति बेचकर अरबपति तो बनता ही है साथ में देश का मालिक भी बन जाता है और दूसरी तरफ एक पोस्ट ग्रेजुएट;इंजीनियर या डाक्टर नौकरी के लिए दर बदर की ठोकर खाता है

Gaurav K Singhal Go for crowd funding. I am ready to give ten thousand for BHADAS as crowd funding. My advice is make app and once 10000 users download this app this will be hundred crore venture.

Dhirendra Asthana लाखों लोगों द्वारा रोज देखी जाने वाली वेबसाइट पर भी संकट?

Anup Kr Awasthi पोर्टल बंद करना समस्या का समाधान नहीं…कोई हल या सिस्टम ढूंढा जाए तो बहुत कुछ संभव है.

Sanjaya Kumar Singh अरे !! मैं समझ रहा था कि गूगल ऐड से खर्चा निकल जा रहा होगा। अभी तक अगर आर्थिक स्थिति खर्चा चलाने लायक नहीं हुई है तो बिल्कुल बंद कर देना चाहिए।

Ram Gurjar इतनी बाते करने से बेहतर है कि हम सब मिलकर उनका हाथ थाम ले…

Vinod Bhardwaj पत्रकारों के लिए बहुत दुःखद और पीड़ादायक निर्णय है ये । पीड़ित पत्रकार भड़ास को अपना मंच मानते हैं । निर्णय पर पुनर्विचार करो यशवंत भाई !

Ashok Das मैं आपके इस फैसले में आपके साथ हूं भइया। हर चीज का एक अंत होता है। उससे ज्यादा मोह ठीक भी नहीं। जिंदगी में उससे इतर भी करने को बहुत कुछ है। संभव है कि आपको वही बातें परेशान करती होगी। नई यात्रा पर निकलिए। हां, बंद करने की घोषणा के साथ एक ऑप्शन यह रखा ज…See more

Pradumn Kaushik अब कौन पत्रकारो को आइना दिखायेगा सर

Ashutosh Chaturvedi अरे सर मीडिया पर लगाम कौन कसेगा फिर

Pawan Lalchand हो सके तो चलने दें. भले कुछ नया भी लेकर आ रहे हों तब.

Negi Laxman जो सिरफिरे समाज हित मे कूछ करना भी चाहे तो उनको आगे लाने मे सबके पसीने उतर जाते हैं चाहे कोई भडास वाला हो या कोई अन्य

Arti Awasthi Dixit बंद करना जरुरी है क्या

Ramji Mishra भड़ास अब आपकी सम्पत्ति नही है जो आप बंद कर देंगे। कुछ तो हक हम पाठकों का भी है। कृपा करके प्रार्थना को स्वीकार करें और इसे समाज हित के लिए चलने दें। प्लीज प्लीज प्लीज.. जनहित की जंग वाले सब बन्द होते जा रहे हैं और तमाशे वाले लोग और मजबूत होते जा रहे हैं। सरकार भी सो रही है भड़ास जैसे मीडिया को सहायता देकर समाज के लिए सरकार एक और अच्छा काम कर सकती है। भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

Mahesh Singh मित्र आपका लगभग हर पोस्ट और न्यूज़ पढता रहा हू इधर बहुत दिनों से आप से बात नहीं कर पाया कुछ ऐसी व्यस्तता थी। मित्र इसा मसीह चले गए, बुद्ध चले गए, मुहम्मद चले गए, गांधी चले गए जो बुराइया समाज में तब थी वही आज भी हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सज्जन अपनी सज्जनता छोड़ दे। हां एक बात है कि मोदी जी हैं औऱ योगी जी ने अपनी एक जीवन शैली चुन ली थी जो सबके लिए संभव नहीं है। किसी भी संस्था को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। आपने जिस उंचाई पे भड़ास को पहुंचाया है वह काबिले तारीफ है और आज जो आपकी पहचान है उसमें भड़ास का भी योगदान है। मित्र इतनी जल्दी में आवेश में निर्णय लेना ठीक नहीं प्रतीत हो रहा है। किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। निसंदेह परिवार के कीमत पर कोई भी कार्य उचित नहीं होता है। यदि मैं आपकी किसी भी प्रकार से काम आ सकता हु तो मुझे खुशी होगी। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा कि एक पत्रकार पत्रकारिता की बुलंदी पे तो जा सकता है पर साथ ही राजनीतिज्ञ, उद्योगपति नहीं हो सकता… उसके लिए तो कुछ और ही करना होगा। मैं आपके हर निर्णय में साथ हूं…

Yajat Dwivedi फिर पत्रकारों के हक़ के लिए आवाज़ कौन उठाएगा ।

Shashikant Singh सर प्लीज़ ऐसा न करें। मजीठिया क्रांतिकारियों का क्या होगा

Narendra M Chaturvedi भाई भड़ास किसी भी कीमत पर बन्द नही होना चाहिये….कुछ मिल बैठकर रास्ता निकालते है।

Vinay Singh लोकतंत्र में भड़ास कहाँ बंद हो पाएगी भाई….. भड़ासिए और खुब भड़ासिए यही कहते थे न..

Dharmendra Pratap Singh भैया, मुझे नहीं लगता कि किसी तरह का आर्थिक संकट “भड़ास” को बंद कर सकता है ! जिस “भड़ास” को बड़े-बड़े समाचार-पत्र समूह नहीं बंद करवा पाए, वह इस तरह से बंद हो जाएगा… असंभव !! पहली बात तो यह है कि हमारा समय जब अच्छा होने के करीब है, तब “भड़ास” बंद करने का इरादा ठीक नहीं… अगर वही वजह है, जो आप बता रहे हैं तो हम सब मिलकर इसे भविष्य में भी चलाते रहेंगे। वैसे भी जो “भड़ास” अब हम सभी मीडियाकर्मियों की आवाज़ बन चुका है, उसे बंद करने का फैसला आप अकेले कैसे ले सकते हैं?

DrMandhata Singh आप हमेशा उचित फैसला लेते रहे हैं। और सोच-समझकर ही बंद करना तय किया है तो आपके और परिवार के हित में शायद यही ठीक हो। मुझे तो उम्मीद है कि आप जहां भी होंगे एक जुझारू की भूमिका में ही रहेंगे।

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सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा मत करिए. ये पेड लोग हैं. ये दोनों अपने-अपने मालिकों के धंधों को बचाने-बढ़ाने के लिए वैचारिक उछल कूद करते हुए आपको बरगलाएंगे, भरमाएंगे, डराएंगे, अपने पक्ष में खड़े होने के लिए उकसाएंगे और इसके लिए देर तक व दूर तक ब्रेन वाश करते चलते जाएंगे…

रवीश कुमार को हर पत्रकार डरपोक दिखने लगा है. उन्हें दिल्ली में डर लगने लगा है. हर किसी का फोन टेप होता दिखने लगा है…लोकतंत्र में सारा सत्यानाश हुआ दिख रहा है…ये दौर भाजपा राज का है सो एनडीटीवी को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और रवीश कुमार सुर ताल भिड़ाकर गाने में जुटे हैं- ”अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर हम पर भी तुम डालो…. अरे ओ रोशनी वालों…”

कुछ ऐसा ही हाल तब जी ग्रुप का था, जब कांग्रेस राज में उगाही के मामले में सुधीर चौधरी उठाकर जेल भेज दिए गए थे और सुभाष चंद्रा प्राण बचाए भागते फिर रहे थे. तब जी न्यूज को सब कुछ खराब होता हुआ, हर ओर अराजकता की स्थिति, अभिव्यक्ति की आजादी का गला घुटा हुआ, आपातकाल सरीखा माहौल दिख रहा था… तबके जी न्यूज के एंकर सुर ताल भिड़ाकर कुछ वैसा ही गीत गाए बकबकाए जा रहे थे.

दोस्तों, भारत अदभुत देश है. यहां कोई मोदी आए या कोई मनमोहन, जनता को बहुत फरक नहीं पड़ता. भारत वाले बहुत संतोषी और मस्त जीव हैं. जब हम सब अंग्रेज को सौ साल तक झेल गए जो कि बाहरी और विदेशी थे, फिर ये मनमोहन, मोदी तो अपने ही देश के हैं. मनमोहन ने क्या बना-बिगाड़ दिया था और मोदी ने क्या रच-उखाड़ लिया है…तब भी अंबानी बिरला लूट रहे थे, सत्ता के प्रिय बने हुए थे… आज भी अंबानी अडानी बिरला सब लूट रहे हैं, सत्ता के प्रिय बने हुए हैं… तब भी जो ‘अप्रिय’ थे उन्हें ठीक करने के लिए ढेर सारे सरकारी कुकर्म किए जाते थे, आज भी जो ‘अप्रिय’ हैं, उनकी हंटिंग होती रहेगी…

कांग्रेस के जमाने में जो आर्थिक नीति थी, वही भाजपा के जमाने में है बल्कि भाजपा वाले कांग्रेस से कुछ ज्यादा स्पीड से उनकी सारी पालिसिज लागू कर रहे हैं.. जीएसटी से लेकर फारेन इनवेस्टमेंट और प्राइवेटाइजेशन को देख लीजिए… इसलिए उनके नाम पर डराकर इनके पाले में करने का खेल वही नहीं समझेगा जो वाकई दिमाग से पैदल होगा…

धर्म जाति की पालिटिक्स हर वक्त थी. 1857 की क्रांति से लेकर किसान विद्रोहों तक में धर्म जाति के आधार पर गोलबंदियां की गई थीं. आजादी के इतने सालों बाद भी गोलबंदियां इसी आधार पर होती रही हैं. कांग्रेस वाले धर्म-जाति-क्रांति आदि के समस्त पैकेज का इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर समय व माहौल देखकर करते रहते हैं, बिलकुल ‘निर्दोष’ अंदाज में.. पर भाजपाई और अन्य पार्टियां वही काम खुलकर ‘भदेस’ तरीके से कर रही हैं..

जनता चेतनासंपन्न होती जाएगी तो उनके सोचने विचारने और वोट देने का पैर्टन बदलता जाएगा. इसमें कोई घबड़ाने वाली बात नहीं है. हम मनुष्य आज जहां तक पहुंचे हैं, वहां तक किसी पैराशूट से हमें नहीं लाया गया है बल्कि हम क्रमिक विकास और इवोल्यूशन की हजारों लाखों करोड़ों साल की यात्रा करके आए हैं… ये यात्रा जारी है और सब कुछ बेहतर होगा, ये उम्मीद करते रहना चाहिए…

जो लोग भाजपा से डराकर हमको आपको कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना चाहते हैें उनको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट नौजवान अपने राजकाज के दौरान मरवाए हैं. वो चाहे पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का काम रहा हो या पूरे देश में कांग्रेसियों द्वारा चलाए गए नक्सल-कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर छात्रों, किसानों-मजदूरों का सफाया करवाना रहा हो.

इसी कांग्रेस ने लाखों सिखों का कत्लेआम पूरे देश में अपने नेताओं के नेतृत्व में कराए. सारे पाप इन कांग्रेसियों ने कराए और सिखाए हैं. इसलिए भाजपा का डर दिखाकर आपको जिनके पक्ष के सपने दिखाए जा रहे हैं, जिनके पक्ष में हमें गोलबंद करने को उत्तेजित-उत्प्रेरित किया जा रहा है, वे ज्यादा बड़े पापी हैं. भाजपा वाले तो बड़े पापियों से थोड़ा बहुत सबक सीखकर आए हैं और इसका समय समय पर नौसिखियों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और इस प्रक्रिया में पकड़े भी जा रहे हैं. कांग्रेस के जमाने में भी सीबीआई का रोजाना गलत व मनमाफिक इस्तेमाल होता था, आज भाजपा के राज में भी हो रहा है. सत्ता में आपने पर सबका चरित्र एक-सा हो जाता है, इसे समझ लीजिए क्योंकि सत्ता खुद में एक संस्था होती है जो सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा संगठित होती है. सत्ता में भाजपाई आएं या कांग्रेसी या कम्युनिस्ट या सपाई या बसपाई या कोई और… सबकी कार्यशैली अंतत: सत्ता परस्ती वाली यानि बड़े लोगों के पक्षधर वाली हो जाती है… जनता तो बेचारी जनता ही बनी रहती है, थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा… वो अपने मित्र जेपी त्रिपाठी एक जगह लिखते हैं न- ”बाबू हुए तुम, राजा हुए तुम, आदमी बेचारे के बेचारे हुए हम…”

भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि इत्यादि ढेरों पार्टियां जो हैं.. .ये सब पावर की लालची हैं, सत्ता की लालची हैं, पैसे की लालची हैं, पूंजीपरस्त हैं, झूठे और मक्कार हैं. जनविरोधी हैं… ब्लैकमनी के केंद्र हैं… हरामीपने और उपद्रव की कुंजी हैं… इनके चक्कर में न फंसिए. इन पार्टियों ने अब अपने अपने टीवी चैनल गढ़ लिए हैं. जो सत्ता मेंं होता है, उसकी तरफ मीडिया परस्ती ज्यादा होती है, उसकी तरफ न्यूज चैनल ज्यादा झुके रहते हैं. जैसे सूरज की तरफ सारे फूल पौधे और वनस्पतियां झुकी होती हैं. रीयल जर्नलिज्म अगर कोई कर रहा है तो वह सोशल मीडिया मे थोडा बहुत हो रहा है, वेबसाइटों और ब्लागों के जरिए थोड़ा बहुत हो रहा है. ये बाजारू मीडिया वाले, ये एनडीटीवी और जी न्यूज वाले तो बस टर्नओवर जोड़ रहे हैं, फायदे देख रहे हैं…

चिदंबरम की गोद में बैठकर जब प्रणय राय टूजी स्कैम के पैसे के ब्लैक से ह्वाइट कर रहे थे तो रवीश कुमार को दिल्ली में घना अंधेरा नहीं दिख रहा था… जब एनडीटीवी और चिदंबरम के स्कैम को उजागर करने वाले ईमानदार आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पागलखाने भिजवा गया था तो रवीश कुमार की संवेदना नहीं थरथराई और उनको मनुष्यता व लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर नहीं दिखा. अब जब उनके मालिक की चमड़ी उनके काले कारनामों के चलते उधेड़ी जा रही है तो उन्हें सारी नैतिकता और दुनिया भर के सारे आदर्श याद आने लगे हैं… उनका बस चैनल की स्क्रीन पर फूट फूट कर रोना ही बाकी रह गया है..

अरे भइये रवीश कुमार, तू अपनी सेलरी भर पूरा पैसा वसूल एक्टिंग कर ले रहा है… उसके बाद आराम से रह.. चिल्ल कर… एक्टर वैसे भी दिल पर नहीं लेते… रोल खत्म, पैसा हजम… उसके बाद घर परिवार और मस्ती…इस अदभुत देश को और यहां की फक्कड़ जनता को कुछ नहीं होने जा रहा… बहुत आए गए शक हूण कुषाण मुगल अंग्रेज और ढेरों आक्रांता… देश नहीं मरा न मरेगा… आप कृपा करके एनडीटीवी के शेयरों का भाव डबल दिखाकर बैंक को चूतिया बनाकर कर्ज लेने के फर्जीवाड़े की सच्चाई पर एक प्राइम टाइम डिबेट करिए जिसमें बैंक के प्रतिनिधि समेत सभी पक्षों को लाकर स्टूडियो में बैठाइए बुलाइए और दूध का दूध पानी पानी कर दीजिए… आप जरा एनडीटीवी-चिदंबरम के सौजन्य से पागलखाने भिजवाए गए आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को भी बुला लीजिएगा पैनल में जो सुना देंगे आपके एनडीटीवी चैनल और इसके मालिक प्रणय राय की चोरी की 100 कहानियां…

रवीश जी, युवाओं को भरमाना छोड़िए… सच्ची पत्रकारिता का नाटक बंद करिए… हां, पेट पालने के लिए आपको सेलरी की जरूरत पड़ती है और प्रणय राय को एक ऐसे एंकर की जरूरत पड़ती है जो उनको डिफेंड कर सके तो आप दोनों की जोड़ी ‘जेनुइन’ है, उसी तरह जैसे सुधीर चौधरी और सुभाष चंद्रा की है. कांग्रेस राज में जिस तरह संघिये सब डराते थे कि जल्द ही भारत में कांग्रेस के सहयोग से मुस्लिम राज आने वाला है, उसी तरह भाजपा के राज में एनडीटीवी वाले डरा रहे हैं कि बस सब कुछ खत्म होने वाला है क्योंकि मोदिया अब सबका गला ही घोंटने वाला है…

अरे यार बस करो… इतना भी हांका चांपा न करो… प्रणय राय की थोड़ी पोल क्या खुल गई, थोड़ी चड्ढी क्या सरका दी गई, आप तो अपने करियर का ‘द बेस्ट’ देने पर उतारू हो गए… पोलैंड से लेकर न्यूयार्क टाइम्स और ट्रंप से लेकर प्रेस कार्प की नैतिकता के पत्र के जरिए प्रणय राय को दूध से नहलाकर पवित्र कहने को मजबूर करने लगे….

हम लोगों को यकीन है कि जितनी चिरकुटई कांग्रेस शासन के राज मेंं हुई, उससे काम ही भाजपा के राज में होगी क्योकि भाजपाइयों को अभी संपूर्ण कांग्रेसी चिरकुटई सीखने में वक्त लगेगा… हां, ये पता है कि दोनों ही पूंजीपतियों को संरक्षण देकर और उनसे आश्वस्ति पाकर राज करते हैं इसलिए इनके शासनकालों में जनता का बहुत भला न होने वाला है.. और, जनता बहुत बुरे में भी या तो मस्त रहती है या फिर मारपीट करती है या फिर सुसाइड कर लेती है. उसे अपने रास्ते पता हैं… उसके लिए नए रास्ते न तो आपके प्राइम टाइम लेक्चर से खुल सकते हैं और न ही मोदी जी के ‘देश बदल रहा है’ के जुमलों से…

रवीश भाई और सुधीर चौधरी जी, लगे रहिए… आप दोनों को देखकर यकीन होने लगा है कि एक कांग्रेस और दूसरा भाजपा का प्रवक्ता कितना दम लगाकर और कितना क्रिएटिव होकर काम कर रहे हैं… बस इतना कहना चाहूंगा कि ये देश इस छोर या उस छोर पर नहीं जीता है और न जीता रहा है… इस देश का अदभुत मिजाज है… वह कोई नृप होए हमें का हानि की तर्ज पर अपने अंदाज में अपनी शैली में जीवित रहा है और जीवित रहेगा.. पहाड़ से लेकर मैदान तक और रेगिस्तान से लेकर समुद्र तटीय इलाकों तक में फैले इस देश में अंधेरा लाने की औकात न किसी मोदी में है और न किसी मनमोहन में हो सकी…

फेसबुक के साथियों से कहना चाहूंगा कि इस छोर या उस छोर की राजनीति-मीडियाबाजी से बचें.. दोनों छोर बुरे हैं… दोनों निहित स्वार्थी और जनविरोधी हैं.. सारा खेल बाजारू है और इसके उपभोक्ता हमकों आपको बनाया जा रहा है, जबरन… आप रिएक्ट न करें.. आप मस्त रहें… जीवन में राजनीति-मीडिया के अलावा ढेर सारा कुछ है लिखने करने पढ़ने देखने को… इस भयानक गर्मी में जाइए घूम आइए पहाड़… चढ़ जाइए हिमालय की उंचाई और अपनी आत्मा तक को पवित्र और मस्त कर आइए… देह के पार देख आइए और रुह संग बतिया आइए… ये रवीश कुमार और सुधीर चौधरी तो लाखों रुपये लेता है, जैसा मालिक कहता है, वैसा स्क्रिप्ट पढ़ता है… एक का मालिक कांग्रेस के गोद में बैठा रहता है, दूसरे का भाजपा की गोद में… इनके चक्कर में अपनी नींद, उर्जा और धैर्य बर्बाद न करिए… जाइए, हिमाचल उत्तराखंड आपको बुला रहा है… किसी जाती हुई सामान्य सी सरकारी बस पर बैठ जाइए और चार पांच सौ रुपये में पहाड़ की बर्फ से ढकी चादर को हिला आइए…

जाइए अपनी जिंदगी जी आइए और भटक मरने से बच जाइए…. ध्यान रखिएगा, सारा प्रपंच यह तंत्र आपको भटकाने और मुर्दा बनाने के लिए रचता है… ताकि आपका खून पीकर वह अपने को अमर रख सके…

वो कहते हैं न कबीर… साधो ये मुर्दों का गांंव… और ये भी कि… भटक मरे न कोई….

तो दोस्तों, मुर्दों से दिल लगाना बंद कर दीजिए और भटक मरने से बचने की तरकीब ढूंढने में लग जाइए… शायद जीवन का मतलब मकसद समझ में आ जाए…

जैजै
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


ये भी है…

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माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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यशवंत का भड़ासी चिंतन- पार्ट एक और दो : मनुष्यता से इस्तीफा देने का वक्त आ गया है…

Yashwant Singh : भड़ासी चिंतन पार्ट वन… उम्र और अनुभव के इस नाजुक व कमसिन पड़ाव पर पहुंच कर, फेसबुक को साक्षी मानते हुए, आप सभी के कपार पर अपना हाथ रखकर कसम खाते हुए… होश में रहकर पूरे जोश के साथ ऐलान करना चाहूंगा कि…..

…मनुष्य से बड़ा कमीना, धूर्त, चालबाज, मक्कार, विध्वंसक, स्वार्थी और पाखंडी दूसरी कोई मुंह-हाथ-पैर-पेट वाली प्रजाति नहीं….

…इसलिए मैं खुद को मनुष्य की जगह जानवर, चिड़िया, पंछी, कीड़ा, मकोड़ा आदि प्रजाति में से किसी एक में शामिल करने पर विचार कर रहा हूं…

…तदनुसार अपना धर्म ‘मनुष्यता’ को त्यागकर ‘जानवता’ या ‘चिड़ियाता’ या ‘किड़किड़ाता’ या ‘चहचहाता’ या ‘रेकियाता’ या ‘रेंगियाता’ में से कोई एक अपनाने पर विचार कर रहा हूं….

…और, आप लोगों से अपील करूंगा कि दुनिया के विध्वंस, मनुष्यों के शोषण, जानवरों के खात्मे, जंगल के विनाश, हाथियों के वन विहीन वास, शेरों के जंगल विहीन जीवन, मुर्गों-बकरों के लिए लगातार व सामूहिक उत्सवी कत्लेआम, पर्यावरण के जीवन विरोधी होने के लिए जिम्मेदार मनुष्यों की प्रजाति से इस्तीफा देकर खुद को कोई जानवर या पंछी या चिड़िया या पौधा मान लें, और उसी प्रजाति के हिसाब से जीवन गुजारें….

…मनुष्य के चक्कर और चंगुल में किसी भी रूप (वैचारिक, मानसिक, शारीरिक, सांस्कृतिक) में फंसेंगे तो समझिए कि आपके जीवन का अपव्यय तय है….

…मनुष्य व मनुष्यता के चंगुल में फंसने वाले लोग सदा हींग खाई मुर्गी की तरह बेहद कनफ्यूज भाव से यत्र-तत्र डोलते बकते जीते रहते हैं… और उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वे जी डोल बक क्यों रहे हैं…

…मनुष्यों का बनाया वैचारिक जाल जंजाल इतना तगड़ा है कि इससे शायद ही कोई मनुष्य निकल कर मनुष्य व मनुष्यता के निहित स्वार्थी चिंतन से परे उठकर ब्रह्मांड के बुनियादी भावना का एहसास कर पाता है…. क्योंकि मनुष्य ने मनुष्यों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि दो तिहाई से ज्यादा तो पापी पेट के ऐंठन से उबर नहीं पाते, इसी से उर्जा पाते और इसी में होम हो जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को न्याय दिलाने और बचाने के चक्कर में बाकी गैर-मनुष्यों का नाश कर जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को जानवर मानकर उनका भरपूर शोषण व सत्यानाश करते हैं… बाकी बचे लोग मनुष्य मनुष्य कहकर अपनी दुकान चलाते हैं और इस दुकान से होने वाली यश अर्थ पद नुमा लाभ से अपना जीवन सफलता पूर्वक संचालित करते रहते हैं…

…कुछ एक बकचोद, फकीर, नागा, पियक्कड़, गपोड़ी, ऐबी, बनुच्चर, पागल, आलसी, एकांतवासी, असामाजिक, अमानवीय टाइप लोग जीवन के असली दर्शन को बूझ भी जाते हैं तो वे किसी को बता नहीं पाते, या बताना ही नहीं चाहते क्योंकि उनके लिए कोई उनके जैसा श्रोता दर्शक पाठक ही नहीं मिल पाता…. या फिर संभवतः ये भी कि जो चरम सच को, असली मर्म को बूझ जाता है वो खुद में मगन रहता है, उसे किसी और को बताने समझाने का काम उचित नहीं लगता क्योंकि मनुष्य तो निहित स्वार्थी मनुष्यता में पागल है और बेचारे ढेर सारे गैर-मनुष्य तो इन्हीं हरामी मनुष्यों के मारे-सताए हैं…. या फिर ये भी कि जो मनुष्यों के दल दलदल से इस्तीफा देकर जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ पाया हो तो फिर वह भला निहित स्वार्थी मनुष्य को क्यों बताए, समझाए.. क्योंकि चालाक व धूर्त मनुष्य को बताने का मतलब है वह मनुष्य आपकी भी फोटो लगाकर मंदिर बनाकर पूजा शुरू कर देगा और इस तरह ढेर सारे मनुष्यों को फांसने बांधने लूटने का एक और उपक्रम शुरू कर देगा…

और ये भी कि जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ लेने वाला प्राणी आखिरी सच को किसी गैर-मनुष्य को अच्छे से कनवे कर पाएगा, बिना शब्द के ही, क्योंकि जहां सहजता और उदात्तता है, वहां सब कुछ संप्रेषणीय है.. पर मनुष्य के यहां कहां है सहजता.. वह सहजता भी मनुष्यता के इर्दगिर्द है जो बाकियों के लिए गैर-मनुष्यों के लिए, प्रकृति के लिए असहजता और असंवेदनशीलता का कारण बनता है…

जय हो…

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भड़ासी चिंतन पार्ट दो…

अपने गांव में खेत, हरियाली, धूप, नदी, शांति, अलसाए पशु-पक्षियों की मुदित चपलता, प्राकृतिक कलरवी संगीत के बीच रहते हुए हर वक्त महसूस करता हूं कि ज़िंदगी से मुझे कोई शिकायत नहीं. मैं भाग्यशाली और धनी हूं जो इन अदभुत क्षणों- अकथनीय सुखों का उपभोग कर रहा हूं. प्रकृति मुझे सचमुच अपनी खूबसूरत प्रेमिका सी लगती है जिसे महसूस करते हुए ज्यादा उदात्त और शांत हो जाता हूं… गाने लगता हूं- तुम मिले, दिल खिले, और जीने को क्या चाहिए…

मुझे लगता है कि समाज, सिस्टम, ढेर सारे चिरकुट किस्म के कथित बड़े लोगों, चालाक शासकों, चतुर चारण विद्वानों, मूर्ख चिंतकों, अज्ञानी अध्येताओं आदि इत्यादि ने मिलजुल कर हर किसी के जीवन में इतना शोर, कलह, तनाव, उत्तेजना पैदा कर दिया है कि मनुष्य नार्मल रह ही नहीं सकता. वह प्रकृति को महसूस करने लायक रह ही नहीं जाता क्योंकि वह अप्राकृतिक हो चुका होता है. वह दुखी हो चुका होता है. वह अंतहीन संघर्षों में फंस चुका होता है.

प्रकृति के संगीत को महसूस करने के लिए और इस पर खिलखिलाने के लिए अब जरूरी हो गया है कि खुद को हर लेवल पर सिर के बल खड़ा कर दें… मैं आपको समझा नहीं सकता कि मैं क्या क्या महसूस कर रहा हूं इन दिनों… और कितना अच्छा अच्छा महसूस कर रहा हूं इन दिनों… थोड़ा दुखी हो रहा हूं कि फिर शहर लौटने का वक्त आ गया है… 

भड़ास के एडिटर यशवंत के एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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‘हिन्दुस्तान’ और ‘प्रभात खबर’ अखबारों में भड़ास पर लगा प्रतिबन्ध

बिहार और झारखण्ड में हिन्दुस्तान और प्रभात खबर जैसे अखबारों में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम को देखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. जो कोई अपने मोबाईल पर भी इसे देखते पाया जायगा उसके  खिलाफ कारवाई की चेतावनी मौखिक रूप से दे दी गयी है. इन अखबारों के आफिसों में रखे कंप्यूटरों पर भड़ास को पहले से ही बैन किया हुआ है. मजीठिया वेज बोर्ड संबंधी खबरों और इन अखबारों की मदर कंपनियों के खिलाफ खबरों के लगातार प्रकाशन और मैनेजमेंट की काली करतूतों का भंडाफोड़ करने से भड़ास पर प्रतिबंध लगाया गया है.

प्रबंधन को शायद यह नहीं पता कि जिन चीजों पर जितना ज्यादा प्रतिबंध लगाया जाता है, उनको देखने पाने की अकुलाहट उतनी ही बढ़ जाती है. लोग आफिस में भड़ास नहीं देखेंगे पढ़ेंगे तो घर आकर देखेंगे पढ़ेंगे. इस कदम से इन अखबारों का अलोकतांत्रिक चरित्र सामने आता है. जो खुद अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देकर अपना बचाव करते रहते हैं वही अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने पर आमादा हैं.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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भड़ास का अपडेटेड एप्प गूगल प्ले स्टोर पर, करें डाउनलोड

भड़ास4मीडिया का एप्प जिसने न डाउनलोड किया है, अब कर ले क्योंकि इस एप्प को कुछ दिन पहले ही अपग्रेड कर इसमें media job की कैटगरी को जोड़ा गया है। आपको डाउनलोड करने के लिए अपने फोन के गूगल प्ले स्टोर में जाकर सर्च में सिर्फ bhadas टाइप करना होगा।

एप्प के जरिए नई ख़बरें अपलोड होते ही अलर्ट / notification पा सकेंगे और इस पर क्लिक कर पूरी खबर एप्प पर ही पढ़ सकेंगे। आप चाहें तो अपने मोबाइल से नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके भी भड़ास एप्प पा सकते हैं :

https://play.google.com/store/search?q=bhadas4media

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‘साधना न्यूज’ ने ‘चांपना न्यूज’ वाले व्यंग्य को दिल पर लिया, भड़ास पर मुकदमा ठोंका, जानिए कोर्ट में क्या हुआ

भड़ास पर ‘चांपना न्यूज’ नामक एक चैनल के बारे में पांच किश्तों में व्यंग्यात्मक खबर छपी. ‘चांपना न्यूज’ एक काल्पनिक नाम है, जिसे वर्तमान न्यूज चैनलों की दुनिया के अंदर का हाल बताने के लिए सृजित किया गया और उसके सहारे उसके बहाने पूरी अंतरकथा बताई गई. पर इस व्यंग्य को साधना न्यूज नामक चैनल नहीं पचा पाया और उसके कर्ताधर्ता चले गए दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट. वहां इन लोगों ने कहा कि योर आनर, दरअसल चांपना न्यूज नामक जिस चैनल की कहानी भड़ास में बताई गई है, वह उसी के साधना न्यूज नामक चैनल के बारे में है, इसलिए इस मानहानि कारक कंटेंट को रिमूव कराया जाए और अंतिम फैसला आने से पहले इस वेब पोर्टल को आदेशित किया जाए कि वह साधना न्यूज के बारे में कुछ न छापे.

कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से साधना न्यूज को मना कर दिया और ताजी सूचना ये है कि 28 मार्च को न्यायालय में सुनवाई के दौरान विद्वान न्यायाधीश महोदय ने साधना न्यूज और भड़ास4मीडिया को मीडिएशन में जाने को कहा है. यानि दोनों लोग मीडिएटर के साथ बैठकर मामले को बातचीत के जरिए सुलझा सकते हों तो सुलझा लें. इस पूरे मामले को कोर्ट में भड़ास की तरफ से वकील हिमाल अख्तर लड़ रहे हैं. एडवोकेट हिमाल अख्तर यह केस फ्री में इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे मुकदमों के जरिए न्यू मीडिया की स्वतंत्र आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है, जिसका हर आम ओ खास को विरोध करना चाहिए. एडवोकेट हिमाल अख्तर ने भड़ास के एडिटर यशवंत से बातचीत के दौरान कोर्ट में चल रहे इस केस के बारे में क्या क्या बताया, जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=YV-K85AjJIQ

‘चांपना न्यूज’ की पूरी सीरिज पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर एक एक कर क्लिक करते जाएं…

एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट एक)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट दो)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट तीन)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट चार)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट पांच)

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‘चांपना न्यूज’ में बिना सेलरी के कार्यरत रहे थे ‘महीन कुमार’!

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जब सोनिया गांधी सत्ता की सर्वेसर्वा थीं तो उनके कालेधन के बारे में उसी दौर में भड़ास पर स्टोरी छापी गई थी

Yashwant Singh : मूर्ख भाजपाइयों और भक्तों को बता दें कि जब वो चुप्पी मारे बिल में थे तब भी हम लोग सत्ता के खिलाफ लिखते थे और सीना ठोक कर लिखते थे. ये स्टोरी भड़ास के तब कंटेंट एडिटर रहे Anil Singh ने तैयार की थी और जून 2011 में तब प्रकाशित किया था भड़ास पर जब कांग्रेस की सरकार केंद्र में थी और आदरणीया सोनिया जी सर्वेसर्वा हुआ करती थीं. मीडिया का काम ही सत्ता में बैठे लोगों की कुनीतियों और कदाचारों का खुलासा होता है.

अब ये और बात है कि आजकल चलन बदलने लगा है और मीडिया का मतलब सत्ता की दलाली हो गया है. सच्चा पत्रकार वही जो सत्ता के खिलाफ ताल ठोक के, बिना डरे सब कुछ लिख डाले, सच सच, बिना अंजाम की परवाह किए. मरना तो सबको एक बार है. बार बार मर मर कर जीना क्या. पुरानी स्टोरी का लिंक इसलिए शेयर कराया ताकि भक्तों, चापूलसों, मूर्खों को यह बता सकूं कि तुम जब दुम दबाए बैठे थे, तब भी हम लोग सत्ता प्रतिष्ठानों और दलाल मीडिया घरानों से टकराते थे और उसके नतीजे में थाना पुलिस जेल तक गए, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया.

अगर सोनिया गांधी के विदेशी बैंक में काला धन के बारे में उनके सत्ता में रहते लिखने का हौसला है तो सत्ता में रहते नरेंद्र मोदी और केजरीवाल के खिलाफ भी लिखने का उतना ही दम है और लगातार लिख भी रहे हैं. कम अक्ल वाले अपढ़ और गालीबाज भक्तों को स्मृति दोष व दूरदृष्टि की बामारी हो तो हम क्या करें.

भड़ास पर छपी स्टोरी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

http://news.bhadas4media.com/yeduniya/49-swiss-magzine-swiss-bank-report

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भड़ास4मीडिया के 8 साल पूरे होने वाले हैं… जानिए कब और कैसे प्रकट हुआ भड़ास

देखते ही देखते आठ साल पूरे होने वाले हैं. इतने लंबे वक्त तक भड़ास निकालता रहूंगा, मुझे खुद पर कतई भरोसा न था. अब जब आठ साल सामने है तो कई चीजें याद आ रही हैं. भड़ास4मीडिया के चार साल पूरे होने पर जो आर्टकिल लिखा था, उसे हूबहू नीचे दे रहा हूं क्योंकि इस आर्टकिल में तफसील से सब कुछ है, वो सब कुछ जिसे फ्लैशबैक में जाकर याद कर रहा हूं. जो कुछ छूटा है, नया है, वह आगे लिखूंगा. फिलहाल चार साल पहले लिखे आर्टकिल को दुबारा पढ़िए. इसे इसलिए भी पढ़िए क्योंकि इस पुराने आर्टकिल के बारे में ‘मीडिया वीडिया’ नामक एक अंग्रेजी ब्लाग चलाने वाले भाई परमीत लिखते हैं: ”This is most frank personal story of any Indian blogger I have read so far.” कोई अंग्रेजी वाला बंदा हम जैसे हिंदी वाले शुद्ध देसी आदमी की अंग्रेजी में तारीफ करता है तो अच्छा तो लगेगा ही गुरु. पहले पढ़िए, परमीत ने पूरा क्या लिखा है. उसके बाद पढ़िए वो आर्टकिल जो भड़ास के चार साल पूरे होने पर पूरे रौ में एक सीटिंग में लिख डाला था.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

पहले परमीत का उनके ब्लाग ‘मीडिया वीडिया‘ पर प्रकाशित आर्टकिल पढ़ें…

Yashwant Singh: India’s best blogger

Wednesday, May 09, 2012

Yashwant Singh, who runs Bhadas4media, a blog which recently celebrated 4 years of existence, is in my opinion the best Indian blogger, in the true blogger sense – blogging on an issue he is passionate about, the right/plight of Indian journalists, highlighting any example of media-industrial complex on a regular basis, which all the Twitteratis and pseudo-bloggers (English language) have mostly failed to do so far.

From a wide sampling of Yashwant’s writing, which is in Hindi, first you have to read this, which is the most frank personal story of any Indian blogger I have read so far.

It is a passionate blogger’s philosophy, a manifesto for carrying on no matter what. This blogger thought he would be dead by 38. No chance, so far.

Yashwant receives threats for his blogging all the time, and he often responds by giving the caller the address of his home.

Read Yashwant’s post about high salaries of media organization CEOs, and this one about huge salaries of new channel/newspaper editors while stringers go unpaid.

Pramit Singh

pramit.webtechies@gmail.com

http://twitter.com/pramit


और, ये है भड़ास के चार साल पूरे होने पर लिखा गया दुखसुखनामा…

भड़ास4मीडिया के चार साल : कुछ सुख-दुख आपसे कर लूं साझा

May 2012

Written by यशवंत

चार साल पहले जब भड़ास4मीडिया डोमेन नेम बुक कराया था तब मैं अपने एक मित्र की नई शुरू हुई मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट के पद पर था. तीस पैंतीस हजार के आसपास तनख्वाह थी. उसके पहले अमर उजाला, दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट अखबारों में करीब बारह-तेरह साल तक नौकरी कर चुका था, ट्रेनी पद से लेकर एडिटर पद तक की. उसके भी पहले सीपीआईएमल और इसके छात्र संगठन आइसा व कल्चरल फ्रंट जन संस्कृति मंच में करीब पांच साल तक सक्रिय रहा, कभी सपोर्टर के रूप में तो कभी होलटाइमर के रूप में. पत्रकारिता में आने के बाद समाज-देश बदलने के आदर्श और शराबखोरी की शुरुआत से उपज रही सनक का जो काकटेल बना तो इसने रुकने का नाम नहीं लिया. इमानदारी, आदर्श, कठिन मेहनत, दुस्साहस, अराजकता, लफंगई-लंठई… आदि के छोरों-दायरों में घूमता-तैरता एक ऐसा वक्त आया जब मेरे लिए मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं थी.

रेवेन्यू के फेर में दिन प्रतिदिन पैसेवालों के तलवे चाटती मीडिया में न मैं एडजस्ट करने को तैयार था और न यह मीडिया मेरे जैसे आंदोलन से निकले युवक के सरोकार-आग्रह-दुराग्रह को मानने-अपनाने को राजी. नतीजतन एक दिन ऐसा आया कि मैं दिल्ली में आने के छह सात महीने बाद बिलकुल सड़क पर था. पेट पालने के वास्ते मीडिया से मजबूर मोबाइल कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी में शिफ्ट करना पड़ा. कंटेंट के लिए तलवार उठाकर लड़ने वाला बंदा अचानक एक दिन मार्केटिंग करने निकल पड़ा, इस शहर से उस शहर. छह महीने में मार्केटिंग की शुरुआती एबीसीडी समझ में आ गई तो साथ साथ यह भी समझ में आ गया कि अपन नौकरी चाकरी करने लायक बने ही नहीं हैं. मक्खन मैं भी लगाता था / हूं, लेकिन बहुत देर तक नहीं, कोई मक्खन को मजबूरी समझ बैठे तो सारा मक्खन वापस खींचकर उसे दक्खिन भेजने में देर नहीं लगाया. इस अंतर्विरोधी स्वभाव और अबूझ उद्दंडता के कारण मैं खुद के लिए पहेली बनता गया. पिता, घर, परिवार, परिजन… सब पहले ही मुझे कम्युनिस्ट पार्टी होलटाइमर हो जाने के कारण अपने चित्त से उतार चुके थे, और मैं उनको. सो, किसी तरह का माया मोह भी नहीं पलता. पत्नी-बच्चों की जरूरतें उतनी ही हमेशा रहीं जितनी किसी दरिद्रनारायण के परिवार की होती थीं. उनकी तरफ से कोई अतिरिक्त डिमांड व जिद कभी नहीं हुई, सो ख्वाहिश विहीन परिवार के मुखिया के बतौर मेरे पास दुनियावी लिहाज से जिम्मेदार होने लायक कोई वजह नहीं थी. सो सच-झूठ, युद्ध-शांति, भला-बुरा, धर्म-अधर्म, जीवन-मृत्यु आदि के परंपरागत विवादों से दो-चार होते सीखते एक दिन ऐसा आया कि तय कर लिया, अब नौकरी नहीं, जो मन में है उसे करो, बको, निकालो, जो द्वंद्व है उसे प्रकट करो, सुनाओ, चिल्लाओ… और यह सब खुलकर करो, खुलेआम करो, नाम-पता-पहचान के साथ करो….

भड़ास की पैदाइश यहीं से हुई. भड़ास नाम से कम्युनिटी ब्लाग पहले ही बना चुका था. उस प्रयोग के जितने भी अच्छे बुरे अनुभव मिले, वे भड़ास4मीडिया के लिए मजबूत नींव साबित हुए. वर्ष 2008, मई-जुन-जुलाई में स्कूली गर्मियों की छुट्टियों में पत्नी-बच्चे गांव गए तो इधर मैं सब कुछ छोड़कर एक लैपटाप और एक वेबसाइट के जरिए दिन-रात लिखने-अपलोड करने में जुट गया. भड़ास4मीडिया में पेज दर पेज जुड़ने लगे. हिंदी मीडिया इंडस्ट्री के दबे-छुपे सच सामने आने लगे. और मेरे सामने आने लगी एक नई दुनिया, जो नौकर बनकर कभी नहीं दिखी, और न कभी समझ में आई. एक ऐसी दुनिया जिसमें दो तरह के लोग होते हैं. एक पैसे वाले, अर्थात संसाधनों पर काबिज व इसका उपभोग करते लोग. दूसरे संसाधनों के अभाव में ढेर सारे सिद्धांतों, बातों, वादों, दबावों के जरिए जीते-हंसते-गाते-लड़ते-रोते-बेचैन दिखते लोग.

भड़ास4मीडिया के साथ शुरुआती छह महीने बेहद तकलीफ में गुजरे. आर्थिक विपन्नता के उस दौर में आरोप-प्रत्यारोप और दुर्भाग्य के कुछ ऐसे दौर चले, जिसे जीवन में अब मैं कतई याद नहीं करना चाहता और जिसको लेकर कई तरह के प्रायश्चित मेरे मन में अब भी हैं. रोती हुई पत्नी, सहमे हुए बच्चे, अन्न विहीन किचन, दोस्त विहीन मैं… हर पल यातना और संघर्ष का चरम. पर झुकने-दबने का कतई भाव नहीं. यही करना है और सिर्फ यही करना है, न कर सका तो गांव जाकर बाप से लड़कर अपना हिस्सा लूंगा और बोउंगा-काटूंगा. मतलब, दिल्ली में मेरे लिए हालात कुछ इस तरह थे तब जैसे आपके सिर पर पिस्टल लगा दी गई हो व आपके पास सिवाय प्रतिरोध करके बच जाने या मर जाने के अलावा कोई विकल्प न हो. मैंने अकेले अपना काम जारी रखा. झूठ, छल और भ्रम के हर संभव ताने-बाने बुने, और इससे दो-तीन-पांच-दस हजार रुपये इधर उधर से आए तो पत्नी के हाथ में रखा, अन्न खरीदा, घर-गृहस्थी की गाड़ी सरकी. झूठे-सच्चे बहानों के जरिए कर्ज पर कर्ज लेता रहा. और, अपन के आसपास कोई ऐसा भी नहीं था जो बड़ी रकम उधार दे सके, ज्यादा से ज्यादा पांच हजार या दस हजार देने वाले मिले. देहात से शहर आए आदर्शवादी कम अबूझ उद्दंड-बकलंड नौजवान की और कैसी सर्किल बन सकती है.

खैर, छह महीने की अथाह पीड़ा के उस दौर में हजारों खबरें-तस्वीरें आदि भड़ास4मीडिया पर मैंने अकेले अपलोड कर डाले. भड़ास4मीडिया का असर वैसे ही लोगों के सिर चढ़ने लगा जैसे दारू के शुरुआती दो पैग. बेजुबान पत्रकारों को जैसे आवाज मिल गई. बेइमान मालिक-संपादकों को जैसे सांप सूंघ गया हो. पर मैं, इधर-उधर भागता रहा, जीवन जीने के वास्ते, भड़ास4मीडिया चलाने के वास्ते, कुछ पैसे जुटाने के वास्ते. कुछ एक चमत्कारिक किस्म की मदद मिली. चालीस हजार रुपये प्रति माह के हिसाब से एक सरकारी विज्ञापन छह महीने के लिए मिल गया. लगा, जैसे सारा संकट ही दूर हो गया. उस छह महीने की आर्थिक सुरक्षा ने फिर से जिला दिया. उस पैसे ने मुझे, मेरे परिवार को गांव जाने से रोक लिया. भड़ास4मीडिया को बंद होने से बचा लिया. जिस साथी ने वो मदद दिलाई थी, उनका मैं आज भी दिल से आभारी हूं.

उन दिनों ज़िंदगी-मौत से भी जंग लड़ता रहा. रोज किसी न किसी से दिल्ली में लड़ाई होती. धमकियां आती रहती. दिन भर जिन बातों पर गुस्सा होता, रात में शराब पीकर उन कारण बने लोगों से फोन युद्ध में भिड़ जाता. घर का एड्रेस एसएमएस कर देता कि आ, या तो मैं निपटूं या तू निपट, वैसे ही मरा हुआ हूं, मेरा क्या जाएगा, तू सोच. एक आत्मघाती वेदना, चेतना, मानसिकता के साथ, सुसाइडल एप्रोच के साथ भड़ास, दारू और दंगा, तीन कामों में जुटा रहा.  आलोक तोमर जैसे बड़े भाई किस्म के साथी मिले जिन्होंने हौसला बंधाया, कंधा दिया, ढांढस बंधाया. कई और वरिष्ठ-कनिष्ठ-समकालीन लोग संपर्क में आने लगे. एक नया कारवां तैयार होने लगा. आर्थिक दिक्कतें आज भी हैं. मुश्किलें उतनी ही आज भी हैं. बस, दिक्कतें-मुश्किलें व्यवस्थित हो गई हैं सो ये रूटीन बन गई हैं, और यही सब सहज लगने लगा है.

इस 17 मई को जब चार साल पूरे हो रहे हैं तो महसूस कर रहा हूं कि इन चार वर्षों में भड़ास ने मुझको अंदर से बिलकुल बदल कर रखा दिया है. कभी कभी लगता है कि मैं अपना जीवन जी चुका हूं. मोक्ष मिल चुका है. कोई सवाल मन में नहीं बचा है. पूरा ब्रह्मांड और इसके ग्रह-उपग्रह-सागर-अंतरिक्ष आदि जिस तरह से एक्जिस्ट कर रहा है, वह बनने-नष्ट होने की एक सतत प्रक्रिया के कारण अस्तित्व में है, और बनना-नष्ट होना इसकी नियति है. बनना सुख देता है, नष्ट होना कष्ट देता है. सुख और कष्ट की सतत प्रक्रिया में मनुष्यों का होना-खत्म होना और इसके बीच का शुभ-अशुभ संघर्ष निहित है. तभी तो जब भी मैं चिकन, मटन, फिश खाता हूं तो लगता है कि हम मनुष्य कितने स्वार्थी हैं जो मनुष्यों के दुख के लिए तो दिन रात रोते कलपते आंदोलित होते रहते हैं लेकिन इन बेजुबान जीवों ने हमारा क्या बिगाड़ा था… इन्हें क्यों पूरी दुनिया के मनुष्य हर रोज उत्सवी अंदाज में पकड़ते, काटते, बनाते, पकाते, खाते हैं. भावुक, मिडिल क्लास वाली बेवकूफी भरी इस थिंकिंग का जवाब अगले ही पल आ जाता है मेरे पास- अरे मूर्ख, यही बनना-कटना, जन्मना-नष्ट होना, हिंसा-अहिंसा तो इस पृथ्वी, इस ब्रह्मांड का आनंद है.

जहां जीवन नहीं है, वहां जीवन की संभावना के लिए हम पगलाए हैं. वहां जीवन की संभावना की चल रही प्रक्रिया पर सतत नजर गड़ाए हैं कि अगर धरती का सिस्टम बनने-नष्ट होने की चल रही और चलने वाली प्रक्रिया में किसी एक दिन पलड़ा नष्ट होने की तरफ ज्यादा झुक जाए तो कुछ लोग नई जीवन भरी किसी दूसरी धरती को तलाश कर ब्रह्मांड के उस नए ग्रह-उपग्रह वाली धरती पर पहुंच जाएं और फिर से वहां नई शुरुआत करें. स्टीफन हाकिंग से लेकर ढेर सारे विज्ञानियों, खगोलविदों, शोधार्थियों को पढ़ने-जानने के बाद समझ में आता है कि दरअसल हममें से ज्यादातर की सोच-समझ-भावना बस वहीं तक है जहां तक उसे हमें अपने संस्कार, माहौल, परिवेश, चेतना के स्तर व पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता के आधार पर निर्मित कर पाते हैं. और, इससे उपजे बौद्धिक नतीजे को हम अंतिम सच मानकर दूसरों से सतत संघर्ष करते रहते हैं. यही संघर्ष विनाश और सृजन दोनों का कारण बनता है.

बेहतर समाज और देश बनाने का जो संघर्ष चल रहा है, वह क्रांति अशांति शांति सब कुछ अपने में समाए है. और, जो सिस्टम फिलहाल झटके हिचकोले के साथ चल रहा है, वह अपने आप में क्रूरता और उदाहरता, हिंसा-अहिंसा, विनाश-सृजन दोनों समेटे है… और इस सिस्टम में उदारता, अहिंसा, सृजन की मात्रा दिन ब दिन कम होती जा रही है, इसलिए क्रूरता, हिंसा, विनाश के शिकार लोग हर दिन ज्यादा चीत्कार अलग अलग फार्मेट्स में कर रहे हैं. बढ़ती हुई क्रूरता, हिंसा, विनाश से कुछ लोगों का फायदा हो रहा है, उनका संसाधनों पर कब्जा बढ़ता जा रहा है, या यूं कहें कि क्रूरता, हिंसा, विनाश इसलिए भी बढ़ाव पर है क्योंकि कुछ लोग सब कुछ कब्जाना पाना हथियाना चाहते हैं… बची हुई उदारता के कारण बहुत से लोगों का सिस्टम में भरोसा बचा हुआ है जिसके कारण आगे भी किसी खास समय तक सिस्टम के एक्जिस्ट करने की संभावना बची हुई है. फिर यह सिस्टम कभी नष्ट होगा, नया सिस्टम बनेगा, समय के साथ उसमें भी तनाव, क्रूरता, हिंसा पैदा होने लगेगी… एक लयबद्ध क्रम है, जिसे हम इतिहासबोध की कमी के कारण ठीकठीक समझ नहीं पाते, अपने समय के सच को ही अंतिम सच मानकर उसके इर्द गिर्द डोलते उतराते चिल्लाते रहते हैं…

अभी परसों ही तो था मार्क्स का जन्मदिन. फेसबुक पर मैंने लिखा- ”महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा.”

और इसी स्टेटस पर एक साथी की आई टिप्पणी के जवाब में मैंने लिखा- ”मार्क्स का जो द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है, उसे अगर ध्यान से समझ लीजिए तो आपको जीवन व ब्रह्मांड का सूत्र पकड़ में आ जाएगा. पूरा ब्रह्मांड, प्रकृति, देश, सिस्टम, समाज, मनुष्य, जीव-जंतु… एक सतत संघर्ष के जरिए पैदा हुए, हो रहे, होंगे, नष्ट हुए, हो रहे, होंगे… सुख दुख की तरह, जीवन मौत की तरह, आग पानी की तरह, हिंसा अहिंसा की तरह ही क्रांति शांति भी है, अच्छी शांति के लिए क्रांति जरूरी है, वह होगी, हमारे आपके इसमें शामिल होने न होने से रुकेगी नहीं क्योंकि जब अशांति ज्यादा होगी तो क्रांति के जरिए लंबी शांति आएगी, उसी तरह जैसे हिंसा और अहिंसा के समुच्चय, संतुलन से ब्रह्मांड का अस्तित्व है… तो, मार्क्स को पढ़कर आप दरअसल जीवन विज्ञान को समझ लेते हैं..”

मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि किसी भी व्यक्ति और उसके विचार को कट्टरपंथी तरीके से लेने का मैं कतई पक्षधर नहीं हूं. समय, काल-परिवेश और प्रोजेक्ट के हिसाब से चीजें मोडीफाई की जाती हैं. उसी तरह जैसे जिसने जहाज का अविष्कार किया उसने यह फार्मूला नहीं दिया था कि किस तरह पंद्रह हजार किलोमीटर तक मार करने वाली सटीक मिसाइल बनाई जा सकती है. उसने एक रास्ता दिखाया, उसने एक फार्मला दिया. अब उस रास्ते, विचार, फार्मूले की मूल भावना, सूत्र को समझना पकड़ना व उसका विकास करना हमारा काम है.

बहुत सी चीजें समझाई नहीं जा सकतीं. उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते. शब्द हमारी-आपकी भावनाओं को एक हद तक ही अभिव्यक कर पाते हैं और उसमें एक खतरा भी यह होता है कि उसका अर्थ हर कोई अपने अपने हिसाब से निकाल सकने के लिए स्वतंत्र होता है, तो शायद जो कहने वाला कहना चाहता था, वह ठीक से दूसरों तक कनवे नहीं हो पाता. कुछ कुछ मेरे साथ अब वैसा ही हो रहा है. गद्य-पद्य लिखने का मन नहीं होता. लगता है कि क्या ये बच्चों वाला काम करना. केवल गुनगुनाते घूमते रहने को जी होता है. जैसे, खुद को खुद ही समझा रहा होता हूं कि जब सब कुछ समझ बूझ लिया तो अब काहे को भेड़चाल में चलते हुए मिमियाना हिहियाना गाना-गरियाना चाहते हो बंधु.

मीडिया, पालिटिक्स, ब्यूरोक्रेसी, सिस्टम, जनता…. सब एक बड़े फ्राड का निर्माण लगता है. पहले साफ साफ शोषण था. एक शोषक और दूसरा शोषित. अब यही काम घुमा फिराकर और ढेर सारी किताबों कानूनों के नाम पर सभ्य तरीके से किया जा रहा है. कुछ भी तो नहीं बदला. प्रागैतिहासिक काल से लेकर अब तक हमने कुछ भी नहीं बदला. तकनीक, विज्ञान, विकास आदि के नाम पर जो सामूहिक उन्नति हुई है, उसके बाद भी आज सीन मालिक-नौकर वाली ही बना हुआ है. नौकर कभी दास था, मालिक कभी सामंत था. आज नौकर बुद्धिमान है, मालिक संविधान है. बहुत फर्क नहीं है बॉस. गहरे उतरकर देखिए तो जो लड़ाइयां चलती हुई दिख रही हैं, उन सभी में दांव-घात बस यही है कि जो सिस्टम पर कब्जा जमाए हुए हैं, उनकी जमात में घुसना है, उनमें से कुछ को निकाल फेंकना है. यह काम पहले भी होता था, तलवारों-युद्धों के जरिए. आज थोड़ा साफिस्टिकेटेड तरीके से हो रहा है. हर देश में आंतरिक संघर्ष है. कहीं कम, कहीं गरम. कहीं ज्यादा, कहीं नरम. और, हर देश दूसरे देश को बर्बाद करने के लिए औकता से ज्यादा हथियार, सेना, फौज-फाटा तैयार रखे हुए है, उस स्थिति में भी जब उनके यहां की ढेर सारी जनता भूखों, व कई अन्य कारणों से तड़प तड़प कर मर रही है.

पहले भी यही था. राजा महाराजा ऐश करते थे, युद्ध के साजो सामान बटोरते थे, और, ढेर सारी जनता प्रजा बीमारियों, रोगों, उत्पीड़नों, भूख आदि से मर जाया करती थी. हर समय एक संकट रहा है. और अगर आप इस संकट को संकट के रूप में देखते हैं तो फिर आप संकट में हैं. यह संकट ही इस ब्रह्मांड का उत्सव है. इसी कारण समझदार लोग सबसे बड़े निजी संकट, यानि मृत्यु को उत्सव के रूप में देखते रहे हैं. इससे न डरने की सलाह देते रहे हैं. वे खुद को मानसिक रूप से मृत्यु, जीवन, सुख, दुख, भय, हर्ष से मुक्त कर चुके थे. और यह अवस्था एक लंबे भोग, संघर्ष, हाहाकारी किस्म के सामूहिक जीवन यापन के जरिए आती है. हाहाकारी किस्म का सामूहिक जीवन जरूरी नहीं कि हाहाकार बाहर मचाए, यह हाहाकार अंदर मचता है. कोई बहुत अंतर्मुखी व्यक्ति अपने अंदर हाहाकर समेटे हुए हो सकता है और बाहर उसका प्रकटीकरण बिलकुल भी न हो रहा हो सकता है, या जो प्रकट हो रहा हो सकता है वह हमको आपको सामान्य सहज उदगार लग दिख सकता है. गौतम बुद्ध को क्या हुआ था? ओशो को क्या हुआ था? नानक को क्या हुआ था? कबीर को क्या हुआ था? ढेरों उदाहरण हैं सूफियों संतों बड़े मनुष्यों के जिन्होंने जीवन के एक किसी क्षण में ब्रह्मांड के रहस्य को पहचान लिया था. यह रहस्य और फार्मूला कोई बहुत रहस्यमय नहीं था. उसे एक्सप्लेन करके समझा पाना कठिन है इसलिए नासमझ लोग उसे रहस्य व मोक्ष मान बैठे.

एक खास स्तर की बाहरी आंतरिक परिस्थितियां, जीवनचर्या मनुष्य को मोक्ष की अवस्था में ले जाता है जहां वह समभाव की स्थिति में आ जाता है. अपन कुछ कुछ उसी मोक्ष की ओर अग्रसर हैं. निर्मल बाबाओं और पाल दिनाकरण जैसों की कृपाओं के इस दौर में कोई अगर मोक्ष की बात करे तो उसे सिवाय एक नए फ्राड से ज्यादा कुछ नहीं समझा जा सकता, और ऐसा समझना भी चाहिए क्योंकि मनुष्य की चेतना का कोई सगुण प्रकटीकरण संभव नहीं है और जो प्रकट चेहरा मोहरा शरीर दिखता है उसके जरिए किसी के बारे में बहुत कुछ ज्यादा बताया कहा नहीं जा सकता. इस निर्गुण किस्म के बीतरागी अवस्था में भड़ास4मीडिया का चार साल मनाते हुए यह महसूस कर रहा हूं कि मेरे लिए भड़ास वर्ष 2008 में जितना प्रासंगित था, अब उसी अनुपात में बिलकुल अप्रासंगिक लग रहा है. एक धोखे की तरह है यह जिसको जबरन जी रहा हूं. जाने कब यह चोला भी छूट जाए. फिलहाल तो आइए, इसी बहाने कुछ बतियाते कहते सुनाते हैं. मेरे लिए हो सकता है मुक्ति का रास्ता दिख गया है, लेकिन जानता हूं कि हमारे ढेर सारे जन मुक्त होने के लिए तड़प रहे हैं, लड़ रहे हैं, दिन-रात एक किए हुए हैं.

यह मुक्ति दरअसल और कुछ नहीं, अपने भयों से मुक्ति है, अपने समय और अपने समाज के दबावों-आरोपों से मुक्त होने की मुक्ति है. जब आप मुक्त होकर आगे देखने लगते हैं और थोड़ा ठहरकर धैर्य के साथ देखने लगते हैं तब वाकई दुनिया बच्चों के खेल की तरह नजर आती है… वो ग़ालिब साहब कह भी गए हैं, इसी मुक्ति की अवस्था के दौरान कि… ”बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे”. तो ये जो मेरे जन हैं, जो लड़ रहे हैं, तड़प रहे हैं, उनके साथ हूं, और उनके साथ भी हूं जो रोज कट रहे हैं, पक रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं… और उनके साथ भी हूं जो लुट रहे हैं, रो रहे हैं, उदास हो रहे हैं. कभी भी किसी भी दौर में कोई एक अवस्था नहीं लाई जा सकती, कि सभी खुश रहें, कि कोई उदास न हो. और, कोई भी लड़ाई इसलिए लड़ी भी नहीं जाती कि सभी खुश रह सकें और कोई उदास न रहे. खुशी और उदासी, स्थायी भाव हैं, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व है ही नहीं. इसलिए मार्क्सवादी साथी भी यही कहते हैं कि वे एक बड़े तबके के लिए लड़ रहे हैं, जो फिलहाल उदास है, उसे सुख दिलाना चाहते हैं. संघी साथी भी कहते हैं कि बहुसंख्यक के लिए वे लड़ रहे हैं, जो उनके हिसाब से उदास है, दुखी है. सबके अपने अपने खांचे, सांचे हैं और उसी के हिसाब से दुनिया का ढालना बदलना चाहते हैं.

पर मुश्किल ये है कि दुनिया किसी के बदलने से नहीं बदलती, इसके मूल में ही ऐसा अंतर्विरोध है जो हम सबको खुशी-उदासी, बनने-नष्ट होने की प्रक्रिया में डालकर बदलाव पर चलने को प्रेरित-मजबूर करती रहती है. इसका मतलब कि हम आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, ऐसा भी नहीं. आप चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि ये जो मनुष्य का शरीर, चोला धारण किया है ना, वह घुमाता रहेगा, चक्कर कटवाता रहेगा. कभी इस छोर तो कभी उस छोर. तो हम लड़ेंगे उदास मौसम के खिलाफ, पर यह समझ कर कि मौसम से उदासी कभी न जाएगी क्योंकि उदासी है तो सुख-खुशी का एहसास है और उसके लिए संघर्ष है. भड़ास4मीडिया के चार साल होने पर आप सभी से अनुरोध है कि अपनी बात जरूर शेयर करें, चाहें वह जितना भी अस्पष्ट, अमूर्त और अव्यक्त किस्म का हो. मुझे अपनी तारीफ और गालियां, दोनों सुनने का लंबा अनुभव रहा है और इन दो विरोधों को सुनते साधते भी शायद आज शंकर टाइप का हो रहा होऊं. जो कुछ लिखा, उसमें जो गलत लगे, उसे मजाक के रूप में लें, भले स्माइली न लगा रखा हो उन जगहों पर, और जो ठीक लगे उसे प्रसाद के रूप में लें 🙂 , यहां स्माइली लगा दिया, एहतियातन :). क्योंकि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी….

आखिर में. इस 17 मई को दिल्ली में भड़ास की तरफ से एक आयोजन है. उसका पूरा फार्मेट अभी डिसाइट नहीं है लेकिन इतना जरूर डिसाइड है कि उस आयोजन में इस समय के देश के जाने माने जर्नलिस्ट, जो दिल्ली से दूर अपना ठीहा जमाकर पूरे देश की पत्रकारिता के लिए एक बड़े संबल बने हुए हैं, आदरणीय हरिवंश जी, अपना एकल व्याख्यान देंगे. विषय डिसाइड नहीं है, लेकिन जो कुछ मेरे जेहन में है, वो ये कि ”यह समय, मीडिया, सत्ता और मनुष्य की मुक्ति” जैसा विषय हरिवंश जी को दिया जाए, जिन पर उन्हें सुनना मुझे निजी तौर पर अच्छा लगेगा. और, यह दावे के साथ कह सकता हूं कि दिल्ली के बेदिल चकाचौंध में फंसे-अटके पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के लिए हरिवंश जी को सुनना जरूर किसी अदभुत अनुभव सरीखा होगा. हरिवंश जी को अभी तक जितना मैंने पढ़ा है, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उनको पढ़कर लगता है कि आज कुछ ठीकठाक बौद्धिक खुराक मिला. उससे ज्यादा उनसे मिलकर उन्हें सुनकर लगता है कि आज किसी ठीकठाक आदमी से मिला और सुना. इस आयोजन में एक सूफी म्यूजिकल कनसर्ट भी होगा. कबीर को सुनेंगे हम लोग. एक ऐसा आयोजन होगा, जो निजी तौर पर मुझे सुख देगा, और, कह सकता हूं कि भड़ास को चाहने वालों को भी अच्छा लगेगा. तो आप सभी निमंत्रित आमंत्रित हैं. 17 मई का दिन अपने लिए अलग से रिजर्व कर लीजिए, छुट्टियों के लिए अप्लीकेशन दे दीजिए, दिल्ली के लिए टिकट कटा लीजिए. प्रोग्राम कहां और कब होगा, यह अगले एक दो दिन में डिसाइड हो जाएगा और इसकी आधिकारिक सूचना भड़ास4मीडिया पर अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर दी जाएगी.

इतने लंबे भड़ास को आप लोगों ने झेला, इसके लिए दुखी-आभारी दोनों हूं. दुखी इसलिए कि आप शायद दुखी हो गए हों, इसलिए दुख शेयर कर ले रहा हूं, आभारी इसलिए कि आप दुखी नहीं है. भड़ास को लेकर, भड़ास4मीडिया के चार साल होने को लेकर अगर आप कुछ लिखेंगे तो उसे प्रकाशित करने में मुझे खुशी होगी. अपनी बात, बधाई, शुभकामनाएं, गालियां, टिप्पणी… जो भी लिख सकें,  yashwant@bhadas4media.com पर मेल कर दें. आपके सुझावों-आलोचनाओं का आकांक्षी हूं.

जय हो
यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया
yashwant@bhadas4media.com


भड़ास4मीडिया के आठ साल पूरे होने पर दिल्ली में मई महीने में एक कार्यक्रम का आयोजन प्रस्तावित है जिसमें मीडिया के विभिन्न पहलुओं पर मंथन करने के साथ साथ कई मीडियाकर्मी साथियों को सम्मानित किया जाएगा. भड़ास का नाम आने पर आपके मन में क्या अच्छाई खराबी तारीफ बुराई प्रकट हो जाती है, उसे अगर लिख कर भेज सकें तो इसी बहाने भड़ास को आत्ममंथन का मौका मिलेगा. -यशवंत


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यशवंत का एक पुराना इंटरव्यू

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शराब पीकर बहक जाना न छूटा

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IIMC के दीक्षांत समारोह से मीडिया को दूर रख मीडिया के खिलाफ खूब भड़ास निकाली मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने

नयी दिल्ली : ‘स्व नियमन’ की हिमायत करते हुए सरकार ने मीडिया से कहा कि वह कोई नियमन नहीं लाएगी, बल्कि प्रेस को अपने पास मौजूद व्यापक जिम्मेदारी को पहचानना चाहिए। सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने यह सुझाव भी दिया कि मीडिया कवरेज में अक्सर आंकवादियों की छोटी हरकतों को प्रचारित कर आतंकवादियों का समर्थन किया जाता है, जिससे डर फैलता है।

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के दीक्षांत समारोह को यहां संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देश में प्रेस की स्वतंत्रता कभी ‘नहीं सिकुड़ेगी’। संस्थान के कुछ एससी एसटी छात्रों के खिलाफ उनके कुछ सहपाठियों द्वारा की गई ‘जातिवादी’ टिप्पणी के आरोपों से पैदा हुए हालिया विवाद के मद्देनजर कार्यक्रम से मीडिया को दूर रखा गया। मंत्री ने छात्रों को पत्रकारों की जिम्मेदारी याद दिलाने की कोशिश की।

उन्होंने कहा, ‘‘21 वीं सदी का अभिशाप आतंकवाद है। एक आतंकवादी एक छोटी सी घटना का व्यापक प्रभाव छोड़ना चाहता है। एक व्यक्ति की जान लो और एक लाख आबादी को आतंकित करो। आतंकवादी इस तथ्य से अवगत होता है कि उसकी इस छोटी सी हरकत को प्रचारित कौन करेगा।’’ राठौर ने कहा कि दहशत का सीधा कारण डर है और हममें से एक हिस्सा आतंकवादियों को इस डर को उन लोगों में फैलाने में सहायता करता है जो आतंकवाद का समर्थन नहीं करते हैं।

पेरिस हमलों के फ्रांसीसी मीडिया की कवरेज का जिक्र करते हुए राठौर ने कहा, ‘‘क्या आपने अपने टीवी पर खून का एक कतरा तक देखा? गोली का एक भी निशान या इससे भी महत्वपूर्ण चीज.. एक शोकाकुल मां, एक शोकाकुल पत्नी, एक शोकाकुल बेटी को देखा? आपने नहीं देखा होगा।’’

उन्होंने कहा कि भारत में चैनलों के बीच ऐसी प्रतिस्पर्धा है कि कोई हद नही रहती है और यदि एक चैनल मां से बात करता है तो दूसरा चैनल पत्नी या बेटी से बात करता है। उन्होंने कहा कि सरकार कोई नियमन लाकर हालात को ठीक नहीं कर सकती। यह सिर्फ स्व नियमन के जरिए संभव होगा। उन्होंने कहा, ‘‘एक चीज निश्चित है कि प्रेस की आजादी इस देश में कभी नहीं सिकुड़ेगी.. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के जरिए आप जितनी शक्ति रखते हैं, वो सीमाओं से आगे जाता है..इस तरह आपके पास काफी जिम्मेदारी होनी चाहिए।’’

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आनलाइन एड एजेंसी झुकी, भड़ास के खाते में हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए 70 डालर आए… चीयर्स

एक विदेशी आनलाइन एड एजेंसी ने 70 डालर मेरे एकाउंट में भेज दिए. काफी दिनों से बारगेनिंग चल रही थी. मैंने बहुत पहले तय कर लिया था कि बिना एडवांस लिए आनलाइन या आफलाइन, किसी एड एजेंसी वालों या किसी शख्स का विज्ञापन नहीं चलाउंगा क्योंकि विज्ञापन चलवाने के बाद पेमेंट न देने के कई मामले मैं भुगत चुका था. बकाया भुगताने के लिए बार बार फोन करने, रिरियाने की अपनी आदत नहीं रही. हां, इतना जरूर कुछ मामलों में किया हूं कि किसी रोज दारू पीकर बकाया पैसे के बराबर संबंधित व्यक्ति को फोन कर माकानाकासाका करके हिसाब चुकता मान लेता हूं. पर यह कोई ठीक तरीका थोड़े न है. इसलिए एक नियम बना लिया. बिना एडवांस कोई विज्ञापन सिज्ञापन नहीं. दर्जनों एड प्रपोजल इसलिए खारिज करता रहा क्योंकि आनलाइन एजेंसी को एडवांस पेमेंट वाला शर्त मंजूर न था. लेकिन आखिरकार एक एड एजेंसी झुकी और 70 डालर हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए दे दिए.

बात सत्तर डालर जैसी छोटी रकम की नहीं. बात सिद्धांत की है. कंटेंट और तेवर मेनटेन रखें तो विज्ञापन पैसा प्रतिष्ठा सब खुद ब खुद अपने कदमों पर चल कर आते हैं. अन्यथा डग्गामारी पत्रकारिता का हश्र देख ही रहे हैं. कंटेंट छोड़ कर बाकी सभी मोर्चे पर संपादक से लेकर मार्केटिंग तक के लोग बांय बांय करते हुए मरे जा रहे हैं पर जनता है कि उन्हें भाव न देकर बिकाउ बिकाउ पेड पेड बाजारू बाजारू समेत जाने क्या क्या कह कह कर लिहो लिहो कर रही  है. और, ये सच है कि अगर मीडिया बिकाउ व पेड न हुआ होता तो मीडिया के खिलाफ भड़ास निकालने की खातिर किसी आनलाइन प्लेटफार्म की जरूरत न पड़ती.

मीडिया के बदलते व नए ट्रेंड्स को लेकर मेरे पास जो थोड़ी बहुत समझ है, वह खुद के अनुभव के आधार पर है. साफ साफ दिख रहा है कि मीडिया का बहुत तेजी से विकेंद्रीकरण हो रहा है. जिस कदर आनलाइन न्यूज पोर्टल और वेब टीवी चैनल शुरू हो रहे हैं, उससे मीडिया व पत्रकारिता नामक महत्वपूर्ण चीज कुछ घरानों, कुछ व्यक्तियों, कुछ शख्सियतों की बपौती नहीं रहा करेगी. सोशल मीडिया और आनलाइन मीडिया के कारण जो जबरदस्त चेंज आए हैं उससे बड़ा फायदा आम पत्रकारों समेत उन तमाम लिखने पढ़ने वालों को हो रहा है जो अपने सोच में क्रिएटिव हैं, सरोकारी हैं, हार्डवर्किंग है, इन्नोवेटिव हैं, तकनीकी ज्ञान से लैस हैं. दुनिया भर में एड रेवेन्यू का बहुत बड़ा हिस्सा डिजिटल यानि इंटरनेट की तरफ मुड़ चुका है. कोई यूट्यूब पर अपना चैनल चलाकर लाखों रुपये महीने कमा रहा है तो कोई अच्छा सा ब्लाग लिखकर लाखों रुपये महीने विदेश से मंगा रहा है.

दिल्ली से लेकर आगरा तक के उन कई लोगों को जानता हूं जो सामान्य गृहिणी हैं या युवा टेक एक्सपर्ट हैं, और, गूगल के ही प्लेटफार्म्स पर अपनी क्रिएटिविटी व ज्ञान के जरिए लाखों रुपये महीने कमा रहे हैं. डिजिटल की तरफ शिफ्ट हो रहे एड रेवेन्यू का छोटा छोटा हिस्सा हम भड़ास जैसे पोर्टलों /  न्यू मीडिया माध्यमों के जरिए अलग किस्म का कंटेंट क्रिएट करने वालों को भी मिल रहा है. यह एड रेवेन्यू लाखों करोड़ों उन न्यूज पोर्टलों / न्यू मीडिया माध्यमों तक पहुंच रहा है जो जमीनी-रीयल किस्म की पत्रकारिता या किसी खास फील्ड का एक्सपर्ट होकर संबंधित कंटेंट क्रिेएट कर रहे हैं व इसके जरिए खुद का व अपने माध्यम का अलग स्थान पहचान बनाए हुए हैं. ये लोग खुद का एक बड़ा पाठक वर्ग / दर्शक वर्ग क्रिएट कर चुके हैं.

यूट्यूब से लेकर ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया आदि के जरिए एक होनहार समझदार नौजवान अब अच्छा खासा पैसा कमा सकता है, इसका उल्लेख आनलाइन कंटेंट मानेटाइजेशन वर्कशाप में कर चुका हूं जिसमें शरीक होने के लिए देश भर से लोग ग्यारह ग्यारह सौ रुपये देकर आए थे. पहले सारा ज्ञान व पैसा अंग्रेजी में था. लेकिन अब हिंदी के आगे बड़े बड़े घुटने टेक रहे हैं. गूगल के एडसेंस से महीने में सैकड़ों डालर मिलने के साथ साथ अब दूसरी आनलाइन एड कंपनीज भी भड़ास को एडवांस में पेमेंट देकर अपने विज्ञापन लगवा रही हैं. यह हिंदी के लिए और आनलाइन हिंदी मीडिया के लिए सुखद मोड़ है. बड़े, कारपोरेट व बिकाऊ मीडिया घराने देश का पैसा ब्लैक में इकट्ठा कर विदेश में चुरा रहे हैं तो हम छोटे व नए मीडिया वाले विदेश से हजारों डालर देश में मंगवाकर सच्ची देश सेवा भी कर रहे हैं. सो दोस्तों, आगे बढ़िए और बिकाउ मीडिया की नौकरियों में सपने तलाशने की जगह खुद की छोटी शुरुआत कर डालिए. मैं तो चला 70 डालर के नाम आज शाम पार्टी मनाने.. चीयर्स गुरु!!!

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. इनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

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जिसने भड़ास पढ़ने के कारण पत्रकार को नौकरी नहीं दी वह खुद ही छिप-छिप कर भड़ास पढ़ता है!

यशवंत भाई

सादर प्रणाम,

एक खबर bhadas4media.com पर पढ़ने को मिला कि एक पत्रकार साथी को सिर्फ इसलिए नौकरी नहीं दी गई क्योंकि वह भड़ास का रीडर है. सबसे बड़ी बात यह है कि वह जिसने पत्रकार साथी को नौकरी नहीं दी, वह अभी तक अपने पद पर कैसे बना है? उसे भी तो संस्थान को निकाल देना चाहिए था. क्योंकि हकीकत तो यह है वह भी भड़ास पढ़ता है, भले ही छुप छुप कर पढ़ता हो. यह सच्चाई है कि मीडिया से जुड़ा हर आदमी.. चाहे कैमरामैन हो, पत्रकार हो यहां तक सफाई कर्मचारी भी भड़ास के रीडर हैं.

अरे भाई वही हाल है जैसे ‘द डर्टी पिक्चर में’ फिल्म में विद्या बालन जी कहती हैं कि वैसी फिल्म (ब्लैक मूवी) सब देखते हैं. बूढ़े, जवान सभी लेकिन सब छिप-छिप कर अवार्ड भी दिया जाता है लेकिन कोई खुलकर यह नहीं बोलता कि मैं ऐसी फिल्में खुलेआम देखता हूं. अरे भाई यदि वह बोलेगा तो लोग उसे गलत नजर से देखेंगे… पता नहीं क्या-क्या कहेंगे… वही हाल यहां पर है. bhadas4media को सभी चैनलो के संपादक भी पढ़ते हैं. आदरणीय एसएन विनोद (जिया न्यूज के पूर्व चैनल हेड) खुद भड़ास पर खबर चलने पर सफाई देते हैं.. लेकिन जब कोई पत्रकार भड़ास को पढ़ता है तो उसे नौकरी से ही निकाल दिया जाता है. किसी का नाम भड़ास पर जाता है तो भी उसे नौकरी नहीं मिलती… लेकिन जब संस्थान पत्रकारों की सैलरी रोकता है तो उन्हें भड़ास याद आता है.

भड़ास… मतलब दुख में ही भड़ास का सुमिरन लोग करते हैं. बाकी यशवंत भइया, भड़ास को सफाई कर्मतारी से लेकर एडिटर इन चीफ तक पढ़ता है. अब सबको नौकरी से निकाल दो… भड़ास को सभी संस्थानों में ब्लाक करके रखा जाता है. स्पेशल आईटी डिपार्टमेंट में सीधा आर्डर रहता है कि www.bhadas4media.com को ब्लॉक कर दो ताकि कोई भड़ास को पढ़ न सके लेकिन शायद संस्थान भूल जाता है कि हमारे पास टेबलेट और दूसरे आधुनिक यंत्र हैं जो भड़ास से हमें जोड़कर रखते हैं….. अब एयरटेल की सर्विस न लें क्योंकि जो एयरटेल, वोडाफोन और दूसरी सर्विस लेता है उसपर भड़ास खुलता है… सालों सुधर जाओ.. जिसने उस पत्रकार को नौकरी नहीं दी वह खुद ही भड़ास छिप-छिपकर पढ़ता है… उसका मालिक भी पढ़ता है लेकिन छिप-छिपकर….  

भड़ास के बिना पत्रकार अधूरा है.. अब आपके पास दो रास्ते हैं… या तो पत्रकार रखना बंद कर दो.. या फिर यह बर्दाश्त करो कि पत्रकार चाहे छोटा हो या बड़ा…. बिना भड़ास के नहीं रह सकता… अपना सुख दूख भड़ास से ही कहता है… संस्थान को सैलरी भी नहीं देते टाइम पर…. तो भड़ास से पत्रकार हैं…. पत्रकार से भड़ास नहीं….

शैलेंद्र कुमार

shailendra1990shukla@gmail.com


मूल खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

भड़ास का रीडर होने के कारण राजस्थान पत्रिका ने नौकरी देने से मना कर दिया!

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यशवंत पर हमले की कहानी, उन्हीं की जुबानी ( देखें सुनें संबंधित आडियो, वीडियो और तस्वीरें )

बिना वाइपर की बस… यह तस्वीर तबकी है जब बारिश थोड़ी कम हो गई थी.

दिल्ली को अलविदा कहने के बाद आजकल भ्रमण पर ज्यादा रहता हूं. इसी कड़ी में बनारस गया. वहां से रोडवेज बस के जरिए गाजीपुर जा रहा था. मेरे चाचाजी को हार्ट अटैक हुआ था, जिसके बाद उनकी ओपन हार्ट सर्जरी होनी है. उन्हीं को देखने के लिए गाजीपुर जा रहा था. शिवगंगा ट्रेन से बनारस उतरा और रोडवेज की बस पकड़ कर गाजीपुर जाने लगा. मौसम भीगा भीगा था. बारिश लगातार हो रही थी. बस चलने लगी. बिना वाइपर की बस धीमी गति से रेंगते हुए बढ़ रही थी. ड्राइवर कुछ ज्यादा ही सजग था क्योंकि लगातार बारिश से बस का शीशा पानीमय हुआ जा रहा था और उसे शीशे के पार सड़क पर देखने के लिए कुछ ज्यादा ही मशक्कत करनी पड़ रही थी.

मेरी सीट ड्राइवर के ठीक पीछे यानि पहली वाली सीट थी. मैं आसानी से बारिश और ड्राइवर का संकट देख समझ पा रहा था. बस जब घंटे डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद बनारस शहर के बाहर निकल गई और गाजीपुर की तरफ चलने लगी तो भी बस की स्पीड तीस चालीस से ज्यादा नहीं हो पा रही थी. एक जगह चाय पानी के लिए जब बस रुकी तो ड्राइवर साहब अपने सामने वाले बस के शीशे पर कुछ सफेद सफेद पोतने लगे. मैंने पूछा कि ये क्या रगड़ रहे हैं. ड्राइवर ने बताया कि ये चूना है, ये कैटलिस्ट होता है, पानी को रुकने नहीं देता, यानि पानी बूंद के रूप में शीशे पर इकट्ठा नहीं हो सकेगा और चूने के प्रभाव में आकर सरपट नीचे भागेगा जिससे थोड़ी बहुत विजिबिलिटी बनी रहेगी. ड्राइवर के इस देसी नुस्खे को देखकर हैरत में पड़ गया है. क्या गजब जुगाड़ है भारत में. हर चीज जो नहीं है, उसका स्थानापन्न तलाश लिया जाता है. शायद दुख और संकट का भी स्थानापन्न हम तलाश लेते हैं, मन ही मन, कि ये सब पूर्व जन्मों का फल है इसलिए भोग लो.

ड्राइवर ने जब दुबारा बस स्टार्ट की तो चूने का असर साफ दिख रहा था. ड्राइवर के सामने वाले जिस शीशे पर चूना लगा था वहां पानी रुक नहीं रहा था, सरपट भाग रहा था नीचे, इसलिए साफ दिख रहा था. ड्राइवर के बाएं वाले शीशे जहां चूना नहीं लगा था, वहां बूंद बूंद पानी चिपका हुआ था. ड्राइवर से बातचीत शुरू हुई. आखिर बिना वाइपर ये बस चलाने का मकसद, मतलब क्या है. इतने सारे यात्रियों की जान खतरे में डाले हुए हैं. जहां हमें दो घंटे में पहुंच जाना चाहिए, वहां वाइपर न होने के कारण चार घंटे में पहुंचेंगे, स्पीड धीमी होने के कारण. ड्राइवर बस चलाते हुए लगभग फट पड़ा. अपने अधिकारियों के उपर. अफसरों की लापरवाही और हीलाहवाली से दुखी ड्राइवर बोला कि मैं साल भर से कंप्लेन कर रहा हूं, कोई नहीं सुन रहा. आज भी जब ये बस ले कर चला हूं तो रजिस्टर पर लिखवा कर आया हूं कि इसमें वाइपर नहीं लगा है.

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यशवंत जी, आपका ब्लाग कुछ समय से अरविन्द केजरीवाल, ABP न्यूज़ और ND टीवी का मुखपत्र बन गया है!

प्रिय यशवंत जी।

मैं लंबे समय से आपका भड़ास4मीडिया ब्लॉग पढ़ रहा हूँ। पहले मुझे ये अच्छा लगता था क्यों की आप मीडिया में फैली बुराइयों को सामने लाते थे। लेकिन कुछ समय से देख रहा हूँ की आपका ये ब्लॉग अरविन्द केजरीवाल, ABP न्यूज़ और ND टीवी का मुखपत्र बन गया है।

सिवाए सरकार की आलोचना, RSS का विरोध, सरकारी चैंनल की आलोचना, अरविन्द केजरीवाल के समर्थन की न्यूज़ और ND टीवी व् ABP न्यूज़ की बढ़ाई के और कुछ पढ़ने को नहीं मिलता।

जो बाते सोशल साईट पर शर्मीला, शोभा डे, कविता कृष्णन के बारे में बताई गई क्या वो गलत है।

क्या आपने अरविन्द के उस जोक पर कोई कटाक्ष किया? जो उन्होंने एक रिक्शे वाले के सन्दर्भ में कहा। केजरीवाल भी तो मीडिया के दम से ही फेमस हुआ है।

अच्छा लगेगा अगर आप जवाब देंगे।

प्रार्थी

आदित्य गुप्ता

aditya0786@gmail.com

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भड़ास वाले यशवंत ने दिल्ली को अलविदा कहा

Yashwant Singh : अलविदा दिल्ली। 9 साल का साथ आज ख़त्म। पैकिंग कम्प्लीट। रात में रवानगी। अब पूरा देश मेरा। केरल से लेकर कासगंज तक रहेगा डेरा, बारी बारी। दिल्ली में आज आखिरी दिन विदा देने राहुल पूनम राजीव आदि साथी पहुंचे। सबका आभार। लेकिन हे दिल्ली वालों, ये मत बुझना कि यहाँ से गया तो चला ही गया। आऊंगा, भले ही मेहमान की तरह। दिल्ली में हर राज्य के बने भवन सदन गेस्ट हाउस निवास जो हजारों की संख्या में हैं, सब मेरे हैं। इतने सारे दोस्त साथी मित्र भाई दिल्ली में हैं कि रहने के दिन कम पड़ जाएंगे, जगह नहीं। इसलिए जाने का मतलब ये नहीं कि मूंग दलना बंद होगा या कम होगा। पर अब फिक्स हो कर नहीं बैठेंगे। पूरा भारत दबा के घूमना है। काम जब अपना ऑनलाइन है तो शरीर के मोबाइल रहने में कोई प्रॉब्लम नहीं। और, कई दफे शरीर की सचेत या निष्प्रयोज्य मोबिलिटी आत्मा चेतना को झकझोरने जगाने का काम करता है। कुल मिला कर अज्ञात नए के लिए के लिए तन मन से प्रस्तुत हूँ।

xxx

Yashwant Singh : आज रात दिल्ली पहुँच जाऊँगा। हफ्ते भर तक का दिल्ली प्रवास रहेगा। भड़ास का दरियागंज ऑफिस बंद करना पड़ रहा है। 10 अक्टूबर आखिरी दिन होगा। पहली वजह आर्थिक संकट। दूसरी वजह दिल्ली से ऊब। तीसरी वजह किसी खूंटे से न बंध कर रहने की इच्छा। चौथी और आखिरी वजह भारत भ्रमण की परियोजना। सो हे मित्रों बाबा भड़ासानंद के दिल्ली में दर्शन मिलन का पुण्य लाभ 10 अक्टूबर तक ले लो। और हाँ, 7 अक्टूबर को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन करवा रहा हूँ। एक योद्धा किस्म की महिला एक मीडिया हाउस की पोल खोलेगी। उस प्रेस कांफ्रेंस में आप सभी सोशल मीडिया के साथी आमंत्रित है, बतौर न्यू मीडिया एक्टिविस्ट। आपके खाने पीने का उचित प्रबंध रहेगा। 10 अक्टूबर के बाद भारत भ्रमण के लिए कोई आवारा बंजारा तैयार हो तो बताए।

xxx

सन्डे को दरियागंज के फुटपाथ से एक बुक (स्वामी ब्रह्मदेव : क्वेश्चन एंड एनस्वर्स) खरीद कर टुकड़े टुकड़े में कई दिनों से पढ़ रहा हूँ। किताब पर 30 रुपये खर्चा हुआ। आनंद लाखों का मिल रहा है। कई पन्ने अदभुत हैं। जैसे एक ये अंश: There is a force of patience. Do you know where patience lives? Have you ever tried to see patience? Patience live in silence, and it is a secret, one of the biggest secrets of Nature. When we say life, do we know what the process of life is? Where does life come from? Life comes from silence; Life comes from patience. Silence and patience. There is no place on earth where there is no life. Sometimes try to see Nature, all of her, all the trees, all the forests, everything is full of life. Go close to a tree and look, try to see the life, to feel how life is growing in silence, with a lot of patience and with a lot of silence. All Nature is growing and what happens? That you forget about it, you lose contact with your patience and with your silence and you stop growing. They are connected, that is why you must try to establish your connection with patience and with silence. If there is not a total sincerity, your foundations will be very weak. Grow your willpower and your patience. The foundations of our life must be based on patience. We must see how much of it we have. To receive the Divine we need mountains of patience and, sometimes, at the last moment, when things are going to come, we lose patience. The power of patience is the one that has the highest speed of progress, it increases your speed of evolution. To have patience is to put time on your side.

xxx

सुप्रभात मित्रों. आज भड़ास पर नेता से लेकर पत्रकारों तक के रिश्वत मांगते हुए कई टेप अपलोड किए गए हैं. यूपी में जी मीडिया तो राजस्थान में समाचार प्लस के संवाददाताओं के टेप हैं. वहीं भाजपा जिलाध्यक्ष टिकट देने के लिए दो लाख रुपये मांग रहा है, उसका भी टेप है. प्रिंट मीडिया के पत्रकार किस तरह घपलों-घोटालों में शामिल हैं और इसे ढंकने के लिए तत्पर रहते हैं, इससे संबंधित तीन टेप हैं. कुल मिलाकर आज भड़ास पर टेप डे है. सारे टेप एक एक कर सुनें और आज के दिन व आने वाले दिनों के मंगलमय होने की कामना करें. लिंक ये हैं: (1) http://goo.gl/Yhofn1 (2) http://goo.gl/Lva4WH (3) http://goo.gl/PKIOPa

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भड़ास में वैकेंसी, अप्लाई करें

भारत की चर्चित वेबसाइट भड़ास यानि www.Bhadas4Media.com को दो पत्रकारों की जरूरत है. हिंदी टाइपिंग स्पीड अच्छी होनी चाहिए. अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद ठीकठाक हो. खुद का लैपटाप हो. दो-चार साल कार्य का अनुभव हो. पत्रकारिता में डिग्री-डिप्लोमा न हो तो भी चलेगा लेकिन मीडिया की दुनिया की बारीक समझ हो. जरूरी नहीं कि दिल्ली में हों, देश के किसी भी कोने में हों, चलेगा. घर से भी काम कर सकते हैं. सेलरी कार्य और योग्यता के अनुसार.

ऐसे वरिष्ठ लोग भी अप्लाई कर सकते हैं जो इन दिनों बेरोजगार हो और अपना नाम पहचान गोपनीय रखकर भड़ास के साथ कुछ वक्त तक काम करने के इच्छुक हों. इनके साथ भी शर्त वही है जो उपर उल्लखित है. हिंदी टाइपिंग और हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद ठीकठाक होना चाहिए. 7 सितंबर तक अप्लाई कर सकते हैं. पता yashwant@bhadas4media.com है.

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फिर सक्रिय होगा भड़ास Blog, पुराने निष्क्रिय हटेंगे, नयों को मिलेगा स्थान

Yashwant Singh : जागरण ग्रुप के बच्चा अखबार आई-नेक्स्ट के कानपुर संस्करण की लांचिंग कराने के बाद इसके संपादक पद से इस्तीफा देकर कई महीने तक अपने गांव में रहा. जी भर खुली हवा में सांस लेकर छाती मजबूत बनाने और घूम घूमकर ताड़ी पीकर गला तर करने के बाद नई नोकरी खोजने नोएडा पहुंचा. शराब न पीने और झगड़ा न करने टाइप कई किस्म की शर्तों को मुझसे मनवाए जाने के बाद अंतत: कामकाज के मेरे पुराने अच्छे रिकार्ड को देखते हुए दैनिक जागरण नोएडा में नौकरी दे दी गई. इसी दौरान सुना कि हिंदी में ब्लागिंग का दौर शुरू हुआ है और किसिम किसिम के हिंदी ब्लाग बन चल लिखे जा रहे हैं. अपन लोगों ने भी मिलकर एक ब्लाग बनाया. भड़ास नाम से. इसका आनलाइन पता WWW.Bhadas.Blogspot.COM रखा गया.

इस ब्लाग में करीब एक हजार संपादक बनाए गए. यानि जो भी इसका मेंबर बना उसको डायरेक्ट पोस्टिंग का राइट दे दिया गया. इस कारण कभी कभार ये भी होता कि मैं सो कर उठता तो देखता कि भाई लोग मुझे ही गालिया लिख लिखकर भड़ास पर छापे हुए हैं. खैर. कई किस्म की लंबी उठा पटक बहस झगड़ा होड़ कंपटीशन कंप्लेन मुंहफुलव्वल आदि के बाद ब्लागिंग की आग धीरे धीरे शांत होने लगी. शौकिया ब्लागर निष्क्रिय होने लगे. कुछ ही प्रतिबद्ध ब्लागर फील्ड में जमे रहे. कई लोग ब्लागिंग के आगे की राह देखने समझने लगे. कुछ लोग इधर उधर हुए तो कुछ ने फेसबुक ट्विटर आदि की राह पकड़ी. कइयों ने डाट काम को अपनाया. समय हर चमकीली चीज पर धूल की परत चढ़ाकर उसे पुराना कर देता है और कुछ नया चमकता पेश कर देता है.

अब जबकि ब्लागिंग लगभग न के बराबर है और हर कोई अपनी बात टेक्स्ट आडियो वीडियो के रूप में फेसबुक व ट्विटर जैसे मंचों पर पोस्ट पब्लिश करता है तो हम लोग एक बार फिर भड़ास ब्लाग को सक्रिय करने की तैयारी कर रहे हैं. पुराने निष्क्रिय (ज्यादातर निष्क्रिय ही हैं) को हटाकर नयों को शामिल करने की तैयारी चल रही है. मुझे यह स्वीकारने में गर्व है कि भड़ास ब्लाग के संचालन के दिनों में मिले ज्ञान समझ रगड़े झगड़े आदि के कारण विकसित हुई परिपक्वता से भड़ास4मीडिया का कांसेप्ट दिमाग में आया जो शुरुआती कठिन संघर्षों के बाद चल निकला. अन्यथा हम जैसे हिंदी पट्टी के देहातियों अराजकतावादियों मुंहफटों के लिए उन दिनों दिल्ली नोएडा में नौकरियों के सारे दरवाजे बंद किए जा चुके थे और सरवाइवल मुश्किल था. पर नौकरी के परे खुद के पैशन को प्रोफेशन बनाने की जो धुन सवार हुई तो भड़ास4मीडिया के जरिए परवान चढ़ता चला गया. लेकिन इस भड़ास4मीडिया को पैदा किया असल में भड़ास ब्लाग ने ही. एक बार आप भी भड़ास के सबसे शुरुआती, अनगढ़, ओरीजनल और देसज मंच को देखें. लिंक ये है: Bhadas.BlogSpot.com

भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

फेसबुक पर उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Journalist Atul Tiwari Ab ye btao ki apni bhdas hum kha nikale

गुप्ता सेल्स राहुल गुप्ता सर कुछ लिखने के मौका दे Bhadas.Blogpost.com पर सबूत और पक्के साक्ष्य के साथ, पहले आप उनको जस्टिफाई और वेरिफाई कर ले उसके बाद उसको आगे प्रकाशित करे। उम्मीद है आप मौका देंगे।
राहुल गुप्ता
बदायूं।

Vishesh Shukla mai bhi gawah hu sir un dino ka

Harshvardhan Tripathi अब जबकि ब्लागिंग लगभग न के बराबर है Yashwant Singh आपकी इस बात से पूर्ण रूप से असहमत। नए बच्चे दे दनादन ब्लॉग ठेल रहे हैं। गोता लगाइए। अजब-गजब मोती मिल जाएंगे। हां, ये जरूर है कि उस समय के हमारे आपके जैसे लोग कुछ ठंडा गए हैं। और आपने तो उसे आगे ही बढ़ाया है। बाकी सुखद समाचार।

Shailesh Bharatwasi आप चंद टिके रहनेवाले लोगों मे रहे, ये बड़ी और प्रेरणास्पद बात है।

Riyaz Hashmi वह गालियों का मंच था और संभवतः इसीलिए उसका नाम भड़ास रखा गया था, जिसका मैं भी शुरूआती हिस्सा था। खूब बहस होती थी उस मंच पर।

Roy Tapan Bharati आपका ब्लाॅग पहले से और ज्यादा लोकप्रिय होगा

Yashwant Singh हर्षवर्द्धन सर, संभव है नए लोग जो ब्लाग चला रहे हों, उसके बारे में मुझे पता न हो. या डाट काम में अति व्यस्तता के कारण मैंने खुद ही ब्लाग की दुनिया के बारे में ज्यादा खैर खबर नहीं ली, न रखी. आपसे संपर्क कर नए सक्रिय ब्लागरों को जोड़ता हूं. ये एक अच्छा संकेत है. आपने ठीक जानकारी दी. शुक्रिया.

Anil Sakargaye प्रेम है रे,,,,तुमसे,,
बोले तो,,,,लाड,,,,
कईयो को पढा,,,कईयो को ललकारा
पर तुम्से न जाने क्यों,,,प्यार हो गया,,,
तुम्हारी,,,आग को सलाम,,,
उस आग को,,,उस ज्वाला को,,जो
तुम्हने,,,,जलायी/ लगाई तो,,,??
पर वो,,,रौशनी बिखेर रही है,,
सलाम प्रणाम,,,सब कुछ,,

Neelabh Ashk यशवन्त, न बिकना कोई बड़ी बात नहीं, न बिकते रहना बड़ी बात है. क्योंकि जो कहता है कि मैं पैसे पर नहीं बिकता, वो साला पद पर बिक जाता है, प्रतिष्ठा पर बिक जाता है, प्यार पर बिक जाता है, मजबूरियों के नाम पर बिक जाता है, नेता की लटकन बनने पर बिक जाता है. सम्मान पर बिक जाता है. हमारे यहां गृहस्थ जीवन को क्षुरस्य धार यानी छुरे की धार पर चलने की मानिन्द ठहराया गया है, पत्रकार बड़ा गृहस्थ होता है, उसका परिवार सारा समाज होता है, उसका जोखिम खांडे की धार पर चलने के बराबर है. जो इसे पूरा कर सके वो असली वरना गां–ऊ तो बहुत-से हैं.

Mayank Saxena सब याद है…. 🙂

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भड़ास की खबर सच साबित हुई, ‘समाचार प्लस’ चैनल के हेड ऑफिस में एमएमएस बनाया

{jcomments off}नोएडा : नोएडा के फेज-3 (सेक्टर 63) स्थित ‘समाचार प्लस’ न्यूज चैनल के हेड ऑफिस के वॉशरूम में एक महिला कर्मी का एमएमएस बनाया गया। पीड़िता के चीखने पर हरकत करने वाले चैनल के कैब चालक को दबोच लिया गया। 

एमएमएस बनाने की खबर विस्तार से इस प्रकार प्रकाशित हुई है- 

 

आखिरकार भड़ास की खबर सच साबित हुई। ‘समाचार प्लस’ चैनल के मालिकों में से एक उमेश कुमार को देखिए, किस तरह यूपी के सीएम अखिलेश यादव के साथ सेल्फ़ी खींच कर खुद को धन्य मान रहा है। ऐसे लोग कैसे सत्ता विरोधी पत्रकारिता कर पाएंगे। ऐसे दलालों ने मीडिया को बेच खाया है। 

 

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प्रभात के बारे में भड़ास पर प्रकाशित खबर गलत, कृपया तथ्यों को दुरुस्त करें

संपादक, भड़ास4मीडिया, आपके न्यूज पोर्टल पर “प्रभात और मनोज पहुंचे दैनिक जागरण” नाम से एक खबर प्रकाशित हुई है । गलत तथ्यों पर आधारित यह खबर भ्रामक स्थिति पैदा करने वाली है। इस खबर में ज़िक्र है कि संपादक के बेहूदापूर्ण व्यवहार से नाराज होकर प्रभात ने जागरण ज्वाइन कर लिया है। यह सत्य है कि मैंने जागरण ज्वाइन कर लिया है। पर किसी के व्यवहार से नाराज होकर नहीं किया है।

मैंने अपनी बेहतरी और भविष्य को देखते हुए दैनिक जागरण को चुना है। मैं आईआईएमसी का छात्र रहा हूं और अपने करियर की शुरुआत ‘हिन्दुस्तान’ से की थी। इस संस्थान में मैंने पत्रकारिता की एबीसीडी सीखी है। दो सालों के दौरान सभी से मेरा मित्रवत व्यवहार रहा है।  सहयोगियों से बहुत कुछ सीखने को मिला और हमेशा आगे बढ़ने का मौका मिला अपेक्षा है कि इस खबर के तथ्यों को आप दुरुस्त करेंगे।

-प्रभात की तरफ से भेजे गए मेल पर आधारित.

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