सरवाइकल के भयंकर दर्द की चपेट में यशवंत, देखें लोग क्या-क्या दे रहे सलाह!

Yashwant Singh : सरवाइकल का दर्द क्या होता है, कोई मुझसे पूछे। दाहिने हिस्से के सिर से लेकर गर्दन पीठ कंधा हाथ तक में दर्द की लहरें उठ रहीं हैं। लैपटॉप, मोबाइल पर झुक कर देर तक काम और ढेर सारे तकिए लगाकर सोने की बुरी आदत ने फाइनली सीवियर सर्वाइकल पेन को निमंत्रित कर ही दिया। Continue reading

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‘पीहू’ आज हो रही रिलीज, यशवंत बता रहे दो साल की हिरोइन वाली इस फिल्म को क्यों देखें!

Yashwant Singh : एक अदभुत और ऐतिहासिक फ़िल्म ‘पीहू’ आज देश भर में रिलीज हो रही है। फ़िल्म समीक्षकों ने जमकर स्टार बरसाए हैं। मैं इसलिए ये फ़िल्म फर्स्ट डे नहीं देखने जा रहा कि इस फ़िल्म को एक वरिष्ठ पत्रकार Vinod Kapri ने बनाया है, जो अब मेरे मित्र और बड़े भाई हैं। मैं आज इसलिए देखूंगा कि 2 साल की बच्ची ‘पीहू’ इस फ़िल्म की नायक / नायिका दोनों एक साथ है और पूरी फ़िल्म उसी पर केंद्रित है। आखिर 2 साल की बच्ची कैसे इतना सहज, रीयल और विविध भाव भरा अभिनय कर सकती है? यंग पैरेंट्स की आंख खोलने के लिए 2 साल की बच्ची को केंद्र में रखकर कोई कैसे फ़िल्म बनाने का दुस्साहस कर सकता है? Continue reading

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यशवंत का भड़ासी चिंतन : कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है…

Yashwant Singh

मुझे कभी कभी लगता है कि हम सब एक बेहतर सभ्यता लाए जाने से ठीक पहले के अराजक और असुंदर दौर के जीव-जंतु हैं जो जल्द खुद को अपनी करनी से विलुप्त कर लेंगे। उसके काफी समय बाद धरती पर फिर से जीवन प्रकट होगा और उस दौर के मनुष्य टाइप सबसे बुद्धिमान प्राणी के इवॉल्व होने की प्रक्रिया पूरी होने पर उन्हें हमारे अब के दौर की सभ्यता की हाहाकारी कहानियां मिलेंगी जिससे वो खुद के समय के ज्यादा वैज्ञानिक और संवेदनशील समाज संविधान कानून का निर्माण कर पाएंगे। Continue reading

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मीडिया पर कोबरापोस्ट की डाक्यूमेंट्री रिलीज, इसमें भड़ास वाले यशवंत भी! देखें वीडियो

Journalist Speak: Cobrapost documentary in solidarity with The UN #truthneverdies campaign!

जाने-माने खोजी पत्रकार अनिरुद्ध बहल के नेतृत्व में संचालित मीडिया कंपनी ‘कोबरापोस्ट’ ने इन दिनों दुनिया भर में मीडिया और मीडिया वालों की खराब स्थिति सुधारने को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चलाई जा रही मुहिम ‘सच कभी मरता नहीं’ का हिस्सा बनते हुए भारत में अपने खास अंदाज में अभियान को आगे बढ़ाया है. Continue reading

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आज का दिन यशवंत के लिए क्यों रहा बेहद उदास करने वाला, पढ़ें

Yashwant Singh

भड़ास पर किसी किसी दिन खबरें लगाते, संपादित करते, रीराइट करते, हेडिंग सोचते, कंटेंट में डूबते हुए अक्सर कुछ क्षण के लिए लगता है जैसे मेरा अस्तित्व खत्म हो गया है. खुद को खुद के होने का एहसास ही नहीं रहता. आज का दिन ऐसा ही रहा. दिल दुखी कर देने वाली खबरों में गोता लगाए रहा. Continue reading

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आरक्षण मसला bjp का ‘शाहबानो केस’ है… खुद के किए धरे में जल जावेंगे! देखें वीडियो

Yashwant Singh 

आरक्षण मसला bjp का ‘शाहबानो केस’ है… खुद के किए धरे में जल जावेंगे। अरे जब आपका बेस वोटर सवर्ण था तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला काहें पलटा? कहीं ऐसा न हो, माया मिली न राम वाली स्थिति हो जाए। हालात तो फिलहाल ऐसे हैं कि— ”ऐ मोदी, सवर्ण तुझे जीने नहीं देंगे और दलित-पिछड़े अबकी वोट न देंगे। घण्टा बजाना मितरों।” Continue reading

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शेव कराने पार्लर पहुंचे यशवंत को एक माडर्न हजाम ने क्या से क्या बना दिया! देखें तस्वीरें

Yashwant Singh : कल शेव कराने गया तो पार्लर में एक मॉडर्न सोच वाला ज्ञानी वर्कर मिला। उसने मेरे मूंछ बाल दाढ़ी को समुचित दशा-दिशा देने का दृढ़ प्रतिज्ञ इरादा जाहिर किया। उसके फेंकूपने वाले तेवर के भ्रम जाल में ऐसा किंकर्तव्यविमूढ़ सा हुआ कि सहमति में सिर हिलाते गया। Continue reading

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यशवंत के माफीनामे पर विनोद कापड़ी ने यूं दिखाई दरियादिली…

Vinod Kapri : प्रिय यशवंत, ये एक जीवन जीने के लिए ही कम है। इसमें नफरत और कड़वाहट की गुंजाइश ही कहाँ होती है ? और वो मेरी तरफ से कभी थी ही नहीं… हाँ… हालात कुछ बने कि बात पुलिस और कोर्ट तक पहुँची… Continue reading

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यशवंत ने कापड़ी दम्पति से मांगी माफी, तल्खी खत्म

विनोद कापड़ी दंपति से रिश्तों की तल्खी अब और नहीं… विनोद कापड़ी जी वरिष्ठ पत्रकार हैं, अब तो फिल्मकार भी हैं। हम दोनों में एक समानता रही है कि हम दोनों ही कवि और वरिष्ठ पत्रकार वीरेन डंगवाल जी के प्रिय रहे हैं। उन्हीं परिचय से करीब 11 साल पहले मैंने विनोद कापड़ी जी से फोन पर बातचीत की थी। ये दुर्योग ही था कि हम लोगों की बातचीत बेपटरी होकर तल्ख हो गई। मैं तब दैनिक जागरण, नोएडा आफिस में सेंट्रल डेस्क पर डिप्टी न्यूज एडिटर था। नौकरी मांगने के लिए उनसे फोन किया था। लेकिन हम दोनों की बातचीत की तल्खी की आंच दैनिक जागरण की मेरी नौकरी पर पड़ी और नौकरी छूट भी गई।

वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापड़ी

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योगी राज का एक सच ये भी : निर्दोष युवक को इनामी बदमाश में तब्दील कर दिया बुलंदशहर पुलिस ने!

जब शासन सत्ता की तरफ से पुलिस को इनकाउंटर करने की खुली छूट दे दी जाती है तो उसका साइड इफेक्ट बड़ा भयावह होता है. कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारी पैसे लेकर निर्दोष युवकों को इनामी बदमाश में तब्दील करने के लिए दिन-रात ‘मेहनत’ करने लगते हैं. बुलंदशहर के सौरभ अपने मां-पिता की इकलौती संतान हैं. मां नवोदय विद्यालय में प्रिंसिपल हैं. पिता किसान हैं. Continue reading

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कल्पेश याग्निक अपनी एक रिपोर्टर से बातचीत वाले वायरल हुए आडियो के कारण बेहद तनाव में थे!


yashwant singh

कल रात ‘गॉडफादर पार्ट 2’ देख रहा था. सुबह करीब ढाई बजे के लगभग फिल्म खत्म हुई तो सोेने जाने से पहले यूं ही ह्वाट्सअप पर एक सरसरी नजर मारने लगा. देखा तो दो मैसेज कल्पेश याग्निक के हार्ट अटैक से मरने के आए पड़े थे. मुझे विश्वास नहीं हुआ. मैसेज भेजने वाले मित्र से चैट कर कनफर्म करते हुए अन्य डिटेल लेने लगा. फौरन भड़ास खोलकर खबर अपडेट किया और ह्वाट्सअप के करीब तीस भड़ास ब्राडकास्ट ग्रुपों में सेंड कर दिया. Continue reading

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जेल में मर्डर : उस कैदी को वियाग्रा खिलाकर निपटा दिया गया था!

Yashwant Singh : चूंकि मैं ‘जानेमन जेल’ नामक किताब का लेखक हूं और 68 दिन जेल का नमक खाने का मौका पा चुका हूं इसलिए जेल में मुन्ना बजरंगी के मर्डर के बारे में एक्सपर्ट कमेंट देना अपना कर्तव्य समझता हूं. Continue reading

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यशवंत सीख रहे वीडियो एडिटिंग, देखें उनकी पहली वीडियो स्टोरी

Yashwant Singh : प्रिंट मीडिया का आदमी रहा हूं. कंपोजिंग, एडिटिंग, रिपोर्टिंग, पेज मेकिंग आदि में एक दशक तक जीता-मरता रहा. फिर वेब मीडिया में आया तो यहां आनलाइन लिखने-पढ़ने, खबर-फोटो अपलोड करने के अलावा एचटीएमएल, कोडिंग से लेकर टेंपलेट्स, माड्यूल्स, प्लगइन, सर्वर आदि तक सीखने-जानने की कोशिश करते एक दशक बिता दिया. अब विजुवल मीडिया को सीखने की बारी है. वैसे भी स्मार्टफोन और फ्री डाटा के कारण विजुवल मीडिया में जबरदस्त क्रांति का दौर है. सो इसमें कदम रखते हुए अब वीडियो एडिटिंग सीख रहा हूं.

इसी क्रम में आज एक ऐसी वीडियो स्टोरी तैयार की जिसमें आपको कई सारे बुनियादी तकनीकी ज्ञान नजर आ जाएंगे… वीडियो काटना, वीडियोज मर्ज करना, बैकग्राउंड म्यूजिक, यूट्यूब चैनल का लोगो, फोटो स्लाइड्स, वायसओवर, वायस पिच एडिटिंग आदि देख पाएंगे, इसी एक वीडियो में… ये लर्निंग किसी इंस्टीट्यूट में नहीं बल्कि एक मेरे ही जैसे सीखने को आतुर मित्र के पिछले दो महीने में दिन-रात एक कर आनलाइन सर्च और खुद की समझ के जरिए हासिल ज्ञान के मुझ तक हस्तांतरण के माध्यम से हुई. वीडियो लिंक कमेंट बाक्स में है. देख कर बताइएगा, तकनीकी रूप से कैसा बन पाया है ये वीडियो… और हां, आप भी सीखते-सिखाते रहिए… कभी प्रकृति नेचर से सीखिए तो कभी तकनीकी को जानिए-बूझिए. जय जय… शुक्रिया… वीडियो ये रहा…

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें:  

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में यशवंत हारे, देखें नतीजे

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Yashwant Singh : टोटल 1750 वोट पड़े हैं जिनमें 500 वोटों की गिनती हो चुकी है। इस आधार पर कहें तो सत्ताधारी पैनल क्लीन स्वीप की तरफ है। मैनेजिंग कमेटी के लिए जो 16 लोग चुने जाने हैं उनमें 500 वोटों के आधार पर मेरी पोजीशन 23 नम्बर पर है। चमत्कार की कोई गुंजाइश आप पाल सकते हैं। मैंने तो हार कुबूल कर लिया है। प्रेस क्लब के इस चुनाव में शामिल होकर इस क्लब को गहरे से जानने का मौका मिला जो मेरे लिए एक बड़ा निजी अनुभव है। नामांकन करने से लेकर बक्सा सील होने, बैलट वाली मतगणना देखना सुखद रहा। अब साल भर तैयारी। अगले साल फिर लड़ने की बारी। सपोर्ट के लिए आप सभी को बहुत बहुत प्यार। इतना समर्थन देखकर दिल जुड़ा गया। ये अलग बात है कि जो क्लब के टोटल वोटर है, उनमें बड़ी संख्या में मुझसे और मैं उनसे अपरिचित हूं। साल भर में इन सबसे जुड़ने की कोशिश किया जाएगा और अगली साल ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से लड़ा जाएगा।

कल मतगणना शुरू होने के ठीक बाद उपरोक्त स्टेटस यशवंत ने फेसबुक पर डाला था.

Abhishek Srivastava : प्रधानजी को नापसंद लुटियन की दिल्ली से खास खबर- प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पत्रकारों ने एक स्वर में आरएसएस समर्थित चुनावी पैनल को किया खारिज, यथास्थिति कायम। गौतम-विनय-मनोरंजन का पैनल भारी मतों के अंतर से विजयी। सभी दोस्तों और बड़ों का दिल से शुक्रिया जिन्होंने मुझे और मेरे पैनल को वोट दिया।

मैनेजिंग कमेटी सदस्य के लिए विजयी हुए सत्ताधारी पैनल वाले अभिषेक श्रीवास्तव ने उपरोक्त स्टेटस चुनाव नतीजे आने के बाद पोस्ट किया.

Ashwini Kumar Srivastava : दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में Abhishek Srivastava और उसके पैनल ने विजयश्री हासिल कर ली है। हालांकि अभिषेक का जैसा विराट व्यक्तित्व, अद्भुत समझ, समाज से गहरा सरोकार, जबरदस्त संघर्षशीलता और अपार लोकप्रियता रही है, उस हिसाब से यह चुनाव या यह जीत उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। मगर मैं जानता हूँ कि प्रेस क्लब और बाकी पत्रकारों के लिए जरूर यह जीत खासी अहम है। जीत की इस खुशी में मुझे एक दुख भी है…और वह है Yashwant Singh के हारने का। यशवंत जी पर भी मैं अपनी किसी अगली पोस्ट में लिखूंगा लेकिन फिलहाल अभी अभिषेक की ही बात करते हैं।

मुझे ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद मैं 2001-02 के उस दौर में अभिषेक से पहली बार मिला था, जब वह आईआईएमसी में मेरे ठीक बाद वाले बैच में पढ़ रहा था। तब उसके बाकी बैचमेट सामान्य आईआईएमसीएन की ही तरह बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में नौकरी पाने के लिए इस कदर आतुर रहते थे कि किसी भी सीनियर आईआईएमसीएन को पाकर न सिर्फ निहाल हो जाते थे बल्कि तरह तरह के सवाल पूछकर जान भी खा जाते थे।

जबकि अभिषेक इन सबसे अलग था। वह तब भी जेनएयू और अन्य सार्वजनिक मंचों या राजनीतिक/सांस्कृतिक संगठनों में जोरदार तरीके से एक्टिव था। मैं नवभारत टाइम्स में नौकरी कर रहा था और मैं भी संयोग से जेनएयू में जन संस्कृति मंच से जुड़ा हुआ था और मित्रों के साथ राजनीतिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया करता था।

आईआईएमसी करने के बाद के बरसों में अभिषेक ने शायद ही देश का कोई ऐसा मीडिया संस्थान हो, जहां पर सिलेक्शन प्रोसेस में टॉप में अपनी जगह न बनाई हो और शायद ही कोई ऐसा संस्थान हो, जहां उसने नौकरी का एक साल भी पूरा किया हो। मीडिया की नौकरी उसके लिए और वह नौकरी के लिए बने ही नहीं हैं। टाइम्स ग्रुप में भी वह मेरे साथ कुछ समय रहा। लेकिन उसके अभूतपूर्व क्रांतिकारी स्वभाव ने टाइम्स ग्रुप में संपादकीय विभाग से लेकर मैनेजमेंट तक में जबरदस्त खलबली मचा दी थी। बतौर सीनियर भले ही अभिषेक मुझे हमेशा से सम्मान देता रहा हो लेकिन वहां रहने के दौरान उसने मुझे भी कभी नहीं बख्सा और लगातार मेरी भी गलतियां सार्वजनिक तौर पर अखबार रंग कर बाकी सभी जूनियर-सीनियर्स की तरह खिल्ली उड़ाने के अपने रोजमर्रा के कार्यक्रम में शामिल कर लिया था।

हालांकि उसी दौर में देर रात हम लोग महफिलों में भी साथ ही शरीक भी होते थे। क्योंकि मैंने कभी उसकी इस बात का बुरा ही नहीं माना। वह इसलिए क्योंकि मैं या जो भी शख्स अगर अभिषेक को जानता-पहचानता होगा, तो उसे यह अच्छी तरह से पता होगा ही कि अभिषेक अपने आदर्श, मूल्य और विचारधारा के तराजू पर सबको बराबर तौलता है।

अभिषेक की सबसे खास बात, जिसने मुझे हमेशा ही उसका फैन बनाया है, वह यह है कि अपने 10-12 साल के मीडिया कैरियर में मुझे अभिषेक के अलावा ऐसा एक भी पत्रकार नहीं मिला, जिसे हर मीडिया संस्थान या बड़े पत्रकार ने सर माथे पर बिठाया हो लेकिन उसके बावजूद उसने नौकरी या मीडिया से जुड़े किसी भी अन्य फायदे के लिए कभी अपनी विचारधारा, क्रांतिकारी स्वभाव और व्यक्तित्व में एक रत्ती का भी बदलाव न किया हो। मगर अभिषेक ऐसा ही है। मीडिया में सबसे अनूठा और एकमात्र….सिंगल पीस।

एक से बढ़कर एक नौकरियां उसे लगातार बुलाती भी रहीं, बुलाकर पछताती भी रहीं पर अभिषेक बाबू नहीं बदले। अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह इतनी बदलियों के बाद भी अगर अभिषेक नहीं बदले तो इस चुनाव की जीत से भी अभिषेक के बदलने की कोई गुंजाइश मुझे नहीं दिखती। जाहिर है, इसका फायदा अब पत्रकारों और प्रेस क्लब को ही होगा….क्योंकि वहां चुनाव जीत कर भी अभिषेक के न बदलने का सीधा मतलब यही है कि अब वहां के हालात और राजनीति जरूर कुछ न कुछ तो बदलने ही लगेगी।

बहरहाल, यही उम्मीद है कि सार्वजनिक/राजनीतिक जीवन में पहला औपचारिक कदम रखकर अभिषेक ने जब सही दिशा पकड़ ही ली है तो कम से कम अब भविष्य में हमें वह इसी क्षेत्र में और बड़ी भूमिकाएं निभाते हुए भी नजर आएंगे। ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं…

पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

यशवंत सिंह जी ने बिना संसाधनों और बिना किसी सपोर्ट के खुद के बूते पर भड़ास फोर मीडिया जैसा देश का पहला और एकमात्र प्लेटफार्म शुरु किया। जहां से पत्रकारों के हक़ की आवाज बुलंद होती है। जहां पत्रकारों का शोषण करने और उनका हक मारने वालों का कच्चा चिट्ठा खोला जाता है। यशवंत के भड़ास ने ना जाने कितने मीडिया समूहों की तानाशाही पर लगाम लगाई। शोषण की दास्तानों को देश-दुनिया तक फैलाकर दबाव बनाया। नतीजतन सैकड़ों मीडिया कर्मियों को यशवंत के भड़ास ने न्याय दिलवाया। मीडिया कर्मियों का वाजिब हक दिलवाया। देश में सैकड़ों बड़े-बड़े पत्रकार संगठन है। इनमें से ज्यादातर को आपने सत्ता और मीडिया समूहों के मालिकों की दलाली करते तो देखा होगा, लेकिन जरा बताइये, कितने संगठन पत्रकारों के शोषण के खिलाफ लड़ते हैं? दिल्ली सहित देशभर के छोटे-बड़े प्रेस क्लबों में क्या हो रहा है आपको बताने की जरुरत नहीं।

मैं 24 बरस से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरन्तर संघर्ष कर रहा हूँ। आधा दर्जन से अधिक छोटे-बड़े मीडिया ग्रुप्स में काम किया है। मैंने देखा है किस तरह सरकारों और अखबार- चैनलों के मालिकों के काले कारनामों की कालक एक ईमानदार पत्रकार को किस तरह अपने चेहरे पर पोतनी पड़ती है। नैतिकता-निष्पक्षता-निर्भीकता और पत्रकारिता के सिद्धांतों-संस्कारों की बात करने वाले ईमानदार पत्रकार के चूतड़ पर चार लातें मार के भगा दिया जाता है। आज के माहौल ने मिशन वाली पत्रकारिता को तेल लेने भेज दिया है। ये तेल शायद मिशन की पत्रकारिता करने की चाहत रखने वाले भूखे पत्रकारों की मज़ार पर चराग के काम आ जाये।

कार्पोरेट और हुकूमतों की मोहताज बन चुकी पत्रकारिता को तवायफ का कोठा बना देने की साजिशों चल रही हैं। पत्रकार का कलम गुलाम हो गया है। अपने विवेक से एक शब्द नहीं लिख सकता। वैश्या जैसा मजबूर हो गया पत्रकार। पैसे देने वाला सबकुछ तय करेगा। पत्रकारिता को कोठे पर बिठाने वालों ने कोठे के दलालों की तरह सत्ता की दलाली करने वालों के चेहरे पर पत्रकार का मुखौटा लगा दिया है। इस माहौल के खिलाफ लड़ रहे हैं यशवंत सिंह और उनका भड़ास। साथ ही यशवंत का व्यक्तित्व और कार्यशैली इस बात का संदेश भी देता है कि कार्पोरेट घराने या हुकूमतें के इशारे पर यदि आपसे पत्रकारिता का बलात्कार करवाया जा रहा है तो ऐसा मत करें। अपना और अपने पेशे का ज़मीर मत बेचो। इसके खिलाफ आवाज उठाओ। नौकरी छोड़ दो। बहुत ही कम खर्च वाले वेब मीडिया के सहारे सच्ची पत्रकारिता के पेशे को बरकरार रख सकते हैं।

कितना लिखूं , बहुत सारे अहसान हैं। जब हमअपने मालिकों/मैनेजमेंट की प्रताड़ना का शिकार होते हैं। अपने हक की तनख्वाह के लिए सटपटा रहे होते हैं। बिना कारण के निकाल दिये जाते हैं। तो हम लेबर कोर्ट नहीं जाते। पत्रकारों की यूनियन के पास भी फरियाद के लिए नहीं जाते। मालुम है लेबर कोर्ट जाने से कुछ हासिल नहीं होता। पत्रकार संगठनों के पत्रकार नेताओं से दुखड़ा रोने से कोई नतीजा नहीं निकलता। प्रेस क्लबों में दारू – बिरयानी और राजनीति के सिवा कुछ नहीं होता। पीड़ित का एक ही आसरा होता है- यशवंत का भड़ास। इस प्लेटफार्म से मालिक भी डरता है- मैनेजमेंट भी और सरकारें भी। पत्रकारिता के जीवन की छठी से लेकर तेहरवीं का सहारा बने भड़ास में नौकरी जाने की भड़ास ही नहीं निकलती, नौकरी ढूंढने की संभावना भी पत्रकारों के लिए मददगार साबित होती हैं।

वेबमीडिया की शैशव अवस्था में ही पत्रकारों का मददगार भड़ास पोर्टल शुरु करके नायाब कॉन्सेप्ट लाने वाला क्या दिल्ली प्रेस क्लब की सूरत नहीं बदल सकता है। आगामी 25 नवंबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव के लिए लखनऊ के एक पत्रकार की गुज़ारिश पर ग़ौर फरमाएं :- दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में मैंनेजिंग कमेटी के सदस्य के लिए क्रान्तिकारी पत्रकार यशवंत सिंह को अपना बहुमूल्य वोट ज़रूर दीजिएगा। यशवंत सिंह का बैलेट नंबर 33 है।

नवेद शिकोह
पत्रकार ‘लखनऊ
वरिष्ठ सदस्य
उ. प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
8090180256 9918223245
Navedshikoh@rediffmail.com

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव से संबंधित अन्य खबरें…

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के नाकारा प्रबंधन से नाराज भड़ास संपादक यशवंत ने चुनाव लड़ने का दिया संकेत

Yashwant Singh : गजब है प्रेस क्लब आफ इंडिया. दूर के ढोल सुहावने वाला मामला इस पर पूरी तरह फिट बैठता है. दिल्ली के रायसीना रोड पर स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया का नाम सुनने पर वैसे तो दिमाग में एक अच्छी-खासी छवि बनती-उभरती है लेकिन अगर आप इसके मेंबर बन गए और साल भर आना-जाना यहां कर दिया तो आपको यह किसी मछली बाजार से कम न लगेगा. हर साल चुनाव होते हैं. प्रेस क्लब को अच्छे से संचालित करने के वास्ते पदाधिकारी चुने जाते हैं लेकिन लगता ही नहीं कि यहां कोई संचालक मंडल भी है या कोई पदाधिकारी भी हैं. दो उदाहरण देते हैं. प्रेस क्लब आफ इंडिया का चुनाव डिक्लेयर हो गया है. इस बाबत कुछ रोज पहले प्रेस क्लब के सूचना पट पर नोटिस चिपका दिया गया. लेकिन यह सूचना मेल पर नहीं भेजी गई. मुझे तो नहीं मिली. अब तक नहीं मिली है.

हर रविवार खाने में नया क्या है, इसकी जानकारी तो भाई लोग भेज देते हैं लेकिन साल भर में एक बार होने वाले चुनाव और इसकी प्रक्रिया को लेकर कोई मेल नहीं जारी किया. क्यों भाई? क्या सारे मेंबर जान जाएंगे तो चुनाव लड़ने वाले ज्यादा हो जाएंगे?

दूसरा प्रकरण आप लोगों को पता ही होगा. प्रेस क्लब आफ इंडिया के मेन गेट पर  मुझ पर हमला हुआ. यह जगह गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे के दायरे में आता है. लेकिन फुटेज गायब है. क्या तो उस दिन सीसीटीवी कैमरा खराब था. क्यों खराब था भाई? और, खराब होने की जानकारी मुझे दसियों दिन बाद तब मौखिक रूप से दी जाती है जब मैं प्रेस क्लब के कार्यालय सचिव जितेंद्र से पूछता हूं. मैंने घटना के फौरन बाद लिखित शिकायत कार्यालय सचिव जितेंद्र को दिया था. उन्होंने तब कहा था कि फुटेज मिल जाएगा. कल देख लेंगे. पर बाद में पता चला कि फुटेज ही गायब है. मैंने जो लिखित कंप्लेन दी, उस पर क्या फैसला हुआ, इसकी कोई जानकारी अब तक नहीं दी गई. बताया गया कि पदाधिकारी लोग बहुत व्यस्त हैं. किसी के पास टाइम नहीं है इस अप्लीकेशन पर विचार करने के लिए. मुझे लगता है कि प्रेस क्लब के गेट पर दिल्ली पुलिस के दो जवान हमेशा तैनात रखे जाने चाहिए और सीसीटीवी कैमरे हर हाल में आन होने चाहिए. ऐसे ही कई और बड़े कदम उठाने की जरूरत है ताकि यह क्लब अराजकता का अड्डा न बनकर एक वाकई देश भर के प्रेस क्लबों का मॉडल प्रेस क्लब बन सके.  

प्रेस क्लब के टेबल्स पर काक्रोच चलते हैं. इससे संबंधित एक वीडियो भी मैंने एक बार पोस्ट किया था. उसका लिंक फिर से नीचे कमेंट बाक्स में डाल रहा हूं. खाने की क्वालिटी दिन ब दिन खराब होती जा रही है. वेटर आधे-आधे घंटे तक अटेंड नहीं करेंगे. वह शक्ल देखते हैं मेंबर की. नया हुआ और अपरिचित सा लगा तो उसे टेकेन एज ग्रांटेड लेते हैं.

मतलब सब कुछ भगवान भरोसे. फिर फायदा क्या है चुनाव कराने का और नए पदाधिकारी बनाए जाने का.

ऐसा लगता है कि यह संस्था भी देश के दूसरे भ्रष्ट संस्थाओं की तरह होने की राह पर है. जो जीत गया, वह गदगद होकर सो गया.. चाहें आग लगे या बिजली गिरे. उनकी तो बल्ले-बल्ले है. अब जो कुछ बात बहस होगी, वह अगले चुनाव के दौरान होगी. चुनाव आ गया है. फिर से लेफ्ट राइट वाली दुंदुभी बजेगी. ध्रुवीकरण होगा. पैनल बनेंगे. क्रांतिकारी और अति-क्रांतिकारी बातें होंगी. मुख्य मुद्दे हवा हो जाएंगे. फर्जी और पाखंडी वैचारिक लबादों को ओढ़े नक्काल फिर चुन लिए जाएंग. इस तरह एक और नाकारा प्रबंध तंत्र को झेलने के लिए प्रेस क्लब के सदस्य अभिशप्त होंगे.

प्रेस क्लब आफ इंडिया की हालत देख और इसके नाकारा प्रबंधन से खुद पीड़ित होने के कारण सोच रहा हूं इस बार मैं भी चुनाव लड़ जाऊं. जीत गया तो इतना हल्ला मचेगा कि चीजें ठीक होंगी या फिर मुझे ही ठीक कर दिया जाएगा, क्लब से निष्कासित कर के. और, अगर हार गया तो सबसे अच्छा. तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे जो मेरा है… टाइप सोचते हुए अपना रास्ता धर लूंगा और गुनगुनाउंगा- ”गुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना…”  वैसे, ये डायलाग भी बीच वाला मार सकता हूं, कि कौन कहता है साला मैं जीतने के लिए लड़ा था. मैं तो बहरों नक्कालों के बीच अपनी बात धमाके से कहने के वास्ता परचा दाखिल किया था, आंय….

वैसे आप लोगों की क्या राय है? अंधों की दुनिया में हरियाली के बारे में बतियाने का कोई लाभ है या नहीं? चुनाव लड़ जाएं या रहने दें…?

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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प्रेस क्लब आफ इंडिया सिर्फ धनी पत्रकारों के लिए है?

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भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी! (देखें वीडियो)

राजस्थान की भाजपा सरकार ने एक काला कानून बनाने की तैयारी कर ली है. इसक कानून के बन जाने के बाद भ्रष्टों के खिलाफ कोई खबर मीडिया वाले न लिख सकते हैं और न दिखा सकते हैं. महारानी वसुंधरा राजे फिलहाल लोकतंत्र को मध्ययुगीन राजशाही में तब्दील करने पर आमादा हैं. जितना विरोध कर सकते हैं कर लीजिए वरना कल को विरोध करने लायक हम सब बचेंगे ही नहीं क्योंकि देश बहुत तेजी से आपातकाल और तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है. ज्यादातर बड़े मीडिया हाउसेज बिक चुके हैं. जो बचे हैं उनको धमका कर और पाबंदी लगाकर चुप कराया जा रहा है. राजस्थान सरकार का काला कानून पाबंदी लगाकर मीडिया को चुप कराने की साजिश का एक हिस्सा है.

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत एक वीडियो संदेश के जरिए समाज के सभी वर्गों से अपील कर रहे हैं कि इस काले कानून का जमकर विरोध किया जाना चाहिए ताकि राजस्थान सरकार इस अध्यादेश को वापस लेने पर मजबूर हो सके. अगर राजस्थान में यह कानून पास हो गया तो जल्द ही इसे केंद्र सरकार भी बनाने की तैयारी कर सकती है. राजस्थान की भाजपा सरकार के जरिए एक राज्य में इस कानून को बनवा कर एक तरह से टेस्ट किया जा रहा है कि इसका कितना और किस लेवल तक विरोध होता है. देखें वीडियो:

यशवंत ने इस बारे में फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह यूं है :

Yashwant Singh : भाजपा वाले बहुते पतित हैं, कांग्रेसियों से भी ज्यादा. राजस्थान की भाजपा सरकार मुर्दाबाद. वसुंधरा राजे होश में आओ. मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला कानून तुरंत वापस कराओ. आज से भाजपा का असली अर्थ जान जाइए. भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी. आगे की कहानी मेरी जुबानी सुनिए। नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=Wl0cAPpLPNw

इन्हें भी पढ़ें :

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिए और नज़र रखिए, वजह बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : भाजपा ने सबको सेट कर रखा है। अब कांग्रेस वाले कुछेक पोर्टलों से काम चला रहे हैं तो इतनी बेचैनी क्यों। मुकदमा ठोंक के भाजपा ने रणनीतिक गलती की है। मुद्दे को देशव्यापी और जन-जन तक पहुंचा दिया। एक वेबसाइट को करोङों की ब्रांडिंग दे दी। तहलका वालों ने कांग्रेस परस्ती में बहुत-सी भाजपा विरोधी ‘महान’ पत्रकारिता की। मौका मिलते ही भाजपा शासित गोआ में तरुण तेजपाल ठांस दिए गए। उनके साथ हवालात में क्या क्या हुआ था, उन दिनों गोआ में तैनात रहे बड़े पुलिस अधिकारी ऑफ दी रिकार्ड बता सकते हैं।

तहलका अब लगभग नष्ट हो चुका है। केंद्र में सरकार भी बदल गयी तो सारे बनिया मानसिकता वाले मीडिया मालिक भाजपाई हो गए। ऐसे में मीडिया फील्ड में एक एन्टी बीजेपी मोर्चा, जो कांग्रेस परस्त भी हो, तैयार करना बड़ा मुश्किल टास्क था। पर धीरे धीरे सिद्धार्थ वरदराजन एंड कंपनी के माध्यम से कर दिया गया। एन गुजरात चुनाव के पहले जय शाह की स्टोरी का आना, कपिल सिब्बल का इसको लपक कर प्रेस कांफ्रेंस करना, हड़बड़ाई भाजपा का बैकफुट पर आकर अपने एक केंद्रीय मंत्री के जरिए प्रेस कांफ्रेंस करवा के सफाई दिलवाना, सौ करोड़ का मुकदमा जय शाह द्वारा ठोंका जाना… मैदान में राहुल गांधी का आ जाना और सीधा हमला मोदी पर कर देना… यह सब कुछ बहुत कुछ इशारा करता है।

बड़ा मुश्किल होता है निष्पक्ष पत्रकारिता करना। बहुत आसान होता है पार्टी परस्ती में ब्रांड को ‘हीरो’ बना देना। भड़ास4मीडिया डॉट कॉम चलाते मुझे दस साल हो गए, आज तक मुझे कोई निष्पक्ष फंडर नहीं मिला। जो आए, उनके अपने निहित स्वार्थ थे, सो मना कर दिया। न भाजपाई बना न कांग्रेसी न वामी। एक डेमोक्रेटिक और जनपक्षधर पत्रकार की तरह काम किया। जेल, मुकदमे, हमले सब झेले। पर आर्थिक मोर्चे पर सड़कछाप ही रहे। जैसे एक बड़े नेता का बेटा फटाफट तरक्की कर काफी ‘विकास’ कर जाता है, वैसे ही कई बड़े नामधारी पत्रकारों से सजा एक छोटा-मोटा पोर्टल एक बड़ी पार्टी के संरक्षण में न सिर्फ दौड़ने लगता है बल्कि ‘सही वक्त’ पर ‘सही पत्रकारिता’ कर खून का कर्ज चुका देता है।

इसे मेरी निजी भड़ास कह कर खारिज कर सकते हैं लेकिन मीडिया को दशक भर से बेहद करीब से देखने के बाद मैं सचमुच सन्यासी भाव से भर गया हूं। यानि वैसा ज्ञान प्राप्त कर लिया हूं जिसके बाद शायद कुछ जानना बाकी नही रह जाता। आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं। कारपोरेट और पॉलिटिशियन्स ही मीडिया के नायक गढ़ते हैं। दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिएगा, नज़र रखिएगा। ये जन सरोकार से नहीं फल फूल रहे, ये बड़े ‘हाथों’ के संरक्षण में आबाद हो रहे।

चार्टर्ड फ्लाइट से वकील कपिल सिब्बल / प्रशांत भूषण और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ये वाला ‘क्रांतिकारी’ मुकदमा लड़ने अहमदाबाद जाएंगे, बाइट देंगे, फोटो खिचाएँगे, केस गुजरात से बाहर दिल्ली में लाने पर जिरह कराएंगे। इस सबके बीच इनकी उनकी ऑनलाइन जनता हुँआ हुँआ करके सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग वाली तगड़ी खेमेबंदी करा देगी। इस दौरान हर दल के आईटी सेल वाले सच को अपनी-अपनी वाली वैचारिक कड़ाही में तल-रंग, दनादन अपलोड ट्रांसफर सेंड शेयर ब्रॉडकास्ट पब्लिश करने-कराने में भिड़े-लड़े रहेंगे, ताकि पब्लिक परसेप्शन उनके हिसाब से बने।

आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं। अगर आपको पार्टियों से अघोषित या घोषित रोजगार मिला हुआ है तो आप अपने एजेंडे को अपने तरीके का सच बताकर परोसेंगे, वैसा ही कंटेंट शेयर-पब्लिश करेंगे। जो सच को जान समझ लेता है वो बोलने बकबकाने हुहियाने में थोड़ा संकोची हो जाता है। ऐसे समय जब दी वायर हीरो है, कांग्रेसी आक्रामक हैं, भक्त डिफेंसिव हैं, भाजपाई रणनीतिक चूक कर गए हैं, शेष जनता जात धर्म के नाम पर जल कट मर रही है और इन्हीं आधार पर पोजिशन लिए ‘युद्ध’ मे इस या उस ओर बंटी-डटी है, मुझे फिलहाल समझ नहीं आ रहा कि अपने स्टैंड / अपनी पोजीशन में क्या कहूँ, क्या लिखूं। इस कांव कांव में जाने क्यूं मुझे सब बेगाना-वीराना लग रहा है।

भड़ास4मीडिया डाट काम के फाउंडर और एडिटर यशवंत सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shamshad Elahee Shams ज़बरदस्त. सभी नाप दिऐ आपने..कलम हो तो ऐसी हो.

Pranav Shekher Shahi Hats off… दादा… वाकई जानदार लेखनीः।

अभिषेक मिश्रा बस यही आपको सबसे अलग बनाती हैl

Muzaffar Zia Naqvi भैय्या दिल निकाल कर रख दिया आपने। उम्मीद रखिए दिन बदलेंगे।

Ashok Anurag जय जय जय जय हो सत्य वचन, गर्दा लिखे हैं

Ashok Aggarwal आपने तो बहुत जानदार बात लिख दी है आप कह रहे हैं क्या लिखूं ।

Vijay Srivastava ये विश्लेषण पत्रकारिता की नयी पौध को सलीके से सींच सकता है. मैं इसे अपने वाल पर शेयर कर रहा हूं.

Vijayshankar Chaturvedi मैं निष्पक्ष हूँ। भारतीय वामधारा का समर्थक होने के बावजूद आप जान लीजिए, कार्यकर्ता बनने को पत्रकारिता नहीं समझता। और, संन्यास आप ग़लत लिखते आए हैं। कृपया सुधार लीजिए।

Yashwant Singh प्रभो, तुम ज्ञानी, हम मूरख। जानि रहै ई बात 🙂

Sushil Dubey नहीं बाबा पहली बार लगा की आप थक रहे हो सिस्टम से… वीर तुम बढ़े चलो

Yashwant Singh बाबा, थकना बहुत ही प्यारी सी मानवीय और प्राकृतिक (अ)क्रिया/ अवस्था है। हमका कंपूटर जाने रहौ का? 🙂

Ajai Dubey have u same view about Robert Vadra case.

Yashwant Singh हम सबके घरों में दामाद / बेटे होते हैं जिन्हें बढ़ाने का दायित्व ससुरों / बापों का होता है। ये काम पार्टी वाले बाप / सास भी करती / करते हैं। संपूर्णता में चीजों को देखेंगे तब समझेंगे। किसी उस वाड्रा दामाद या इस शाह बेटा पर अटके रहेंगे तो कांव कांव वाली जमात में ही रह जाएंगे। 🙂

Ajai Dubey sahi baat, agree Yashwant ji.

Badal Kumar Yashwant sir your analysis is best on contemporary media.

Sandeep K. Agrawal Bahut achchhi aur sachchi bat kahi aapne… Nishpakash ko trishanku banakar uski durgat karne ka koi mouka nahi chhoda ja raha hai..

Shorit Saxena आलेख सटीक तो है ही, बहुत कुछ सिखाता है। बड़ी बात आइना दिखाता है कि आदरणीय विनोद दुआ जी की बातोंसे भावुक ना हुआ जाये। यहाँ सब प्री प्लांड ही है। गजब, जय जय।

योगेंद्र शर्मा दर्द छुपा है। इस दर्द में आप अकेले है। आपने पत्रकारिता का मूल धर्म कितना निभाया। वायर कितना दोषी है, हम नहीं जानते लेकिन कुछ सच्चाई इसके माध्य्म से आ तो रही है।

Bhagwan Prasad Ghildiyal यशवंत सिंह सही लिख रहे है। चाटुकार, दलाल, भ्रष्ट रातों रात फर्श से अर्श पर होते हैं और दो ..तीन दशक से यह चलन हर क्षेत्र में बढ़ा है । कर्तव्य, मर्यादा और चरित्र तो केवल कहने, सुनने भर को रह गया है।

Avinash Pandey दी वायर की रिपोर्टिंग ने राजनैतिक भूचाल ला दिया है। सबसे अच्छा यह हुआ कि जय शाह ने 100 करोड़ रुपयों का मानहानि का मुकदमा कर दिया है। यह भारत की जनता के लिए सुखद है। इसके पहले भी एक और राजनैतिक मानहानि का मुकदमा जनता देख रही है। श्री केजरीवाल द्वारा दिल्ली क्रिकेट एशेसियेशन में श्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार करने सम्बन्धी सार्वजनिक आरोप सोशल मीडिया पर लगाये गये थे।यह मुकदमा बहुत रोचक स्थिति में पहुंच गया है। आजतक श्री केजरीवाल भ्रष्टाचार सम्बन्धी एक भी साक्ष्य अदालत में जमा नहीं कर पायें हैं। श्री केजरीवाल के बडे वकील श्री राम जेठमलानी भी भ्रष्टाचार सिद्ध करने के स्थान पर कुछ और ही बहस कर रहे हैं। इसके पहले भी तहलका के तरुण तेजपाल द्वारा गोवा में किये गये यौन शोषण प्रकरण पर श्री कपिल सिब्बल तरुण की ओर से बयान-बाजी कर चुके हैं। गुजरात चुनाव के पूर्व दी वायर वेव पोर्टल की ओर से शानदार खलबली पैदा की गयी।इसी के साथ वेव पोर्टल के प्रमोटर और उनका भविष्य तय हो जायेगा।

Aflatoon Afloo वायर का पृष्ठपोषक कांग्रेस नही है। कुछ उद्योगपति हैं। स्तरीय पत्रकारिता अनुकरणीय है। सीखने की उम्र सीमा नहीं होती। भड़ास अन्याय के खिलाफ हो, बाकी सुलगाने से क्या होगा!

Harsh Vardhan Tripathi स्तरीय नहीं एजेंडा पत्रकारिता कहिए।

Surendra Grover सरोकारी एजेंडा भी कुछ होता है त्रिपाठी भाई.. यदि कोई मीडिया हाउस सरोकारी पत्रकारिता करता है तो उसे हर उस सक्षम से फंडिंग हो जाती है जो सही तथ्यों को गम्भीरता से लेता है.. विरोधी राजनैतिक दल भी इसमें शामिल होते हैं और अपने अपने हिसाब से उन तथ्यों का इस्तेमाल भी करते हैं..

Aflatoon Afloo रजत शर्मा और हर्षवर्धन में कुछ समान

Harsh Vardhan Tripathi बहुत कुछ समान हो सकता है Aflatoon Afloo । लेकिन, कब तक यह चलाइएगा कि पत्रकार, लेखक होने के लिए तय खाँचे में फ़िट होना जरूरी

Aflatoon Afloo बिना खांचे वाले आप होना चाहते हैं?

Harsh Vardhan Tripathi बिना खाँचे का तो कोई नहीं होता Aflatoon Afloo । लेकिन, मुझे यह लगता है कि हर खाँचे से पत्रकार निकल सकते हैं। वामपन्थी होना पत्रकार, लेखक, सरोकारी होने की असली योग्यता भला कैसे हो सकती है।

Surendra Grover सरोकारी होने पर लोग खुद वामपंथी का तमगा क्यों थमाने लगते हैं.?

Harsh Vardhan Tripathi भाई Surendra Grover जी, वामपन्थियों ने लम्बे समय तक कांग्रेस पोषित व्यवस्था में यह साबित किया कि सिर्फ वामपन्थी ही सरोकारी हो सकता है। यह कितना बड़ा भ्रमजाल है, वामपन्थियों की ताज़ा गति से आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन, यही वजह रहती होगी।

Surendra Grover निर्लिप्तता भी बड़ी चीज है, खुद Yashwant Singh गवाह है.. हमारे अज़ीज़ नचिकेता भाई मेरी इस बात पर मुझे दलाल का तमगा थमा बैठे थे और उसके परिणामस्वरूप जो हुआ उससे हमारे अभिन्न रिश्ते ही तोड़ बैठे सम्मानीय.. ब्लॉक किया सो अलग..

Akhilesh Pratap Singh संघी सरोकार वाले भाई साहब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने पर चेक गणराज्य में भी दाम ज्यादा होने की दलील दे चुके हैं…..इनकी बातों को दिल पर न लें…

Harsh Vardhan Tripathi दिल ठीक रहे, कहाँ की ईंट उठाए घूम रहे हो Akhilesh Pratap Singh भाई

Devpriya Awasthi आप कमोबेश सच लिख रहे हैं. लेकिन फंडिग के फंडे के बारे में आपके नजरिए से सहमत नहीं हूं. द वायर ने कुछ तथ्य ही तो उजागर किए हैं . भक्त बेवकूफी भरी प्रतिक्रिया नहीं करते तो द वायर द्वारा उजागर किए गए तथ्यों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता. और जहां तक फंडिंग का मामला है, उसकी जड़ें कहां कहां तलाशोगे? हरेक फंडिंग में कुछ न कुछ स्वार्थ छिपे ही होंगे. आप तो यह देखो कि शांत तालाब में एक छोटे से पत्थर ने कितनी बड़ी हलचल पैदा कर दी है.

Pankaj Chaturvedi आप सटीक बात कर रहे हैं. इसमें भाजपा के कुछ लोग शामिल हैं जिन्होंने इसे हवा दी, आनंदी बेन गुट

Surendra Grover भाई Yashwant Singh जी, Afloo दुरुस्त ही फरमा रहे हैं.. वैसे निर्लिप्त भाव से की गई पत्रकारिता ही असल होती है.. बाकी तो जो है,, वो है ही बल्कि सिरमौर बने बैठे हैं.. सबकुछ बिकता है.. धंधा जो बन गया..

Sandeep Verma जब आप मान ही रहे है कि भाजपा ने रणनीतिक गलती कर दी है तो बाकी पोस्ट की बाते फालतू हो जाती है . और जो हो रहा है वह सोशल मीडिया का दबाव है . भाजपा अगर गलतियाँ कर रही है तो उसकी वजह वह सोशल मिडिया से प्रभावित हो रही है

Manoj Dublish I don’t think that this issue will conclude any result because fast moving media channels will bring a solution of compromise very soon .

Sandip Naik सब सही पर जिस भड़ास पर किसी का साया पड़ा अपुन पढ़ना ही बंद नहीं करेगा एक एंटी भड़ास खोल देगा। यार भाई जनता से जुड़े हो काहे इन अंबानियों की बाट जोह रहे हो

Dev Nath जबर्दश्त। अनुभव इसे कहते हैं, लेखन इसे कहते हैं, समालोचना इसे कहते है, पत्रकारिता इसे कहते हैं, विश्लेषण इसे कहते हैं।शब्द शब्द जबरदस्त

Sanjay Bengani कोई आपके सम्मान से खिलवाड़ करे लेकिन चूँकि वे पत्रकार है चाहे बीके हुए ही क्यों न हो आपको अदालत जाने का अधिकार नहीं है.

Roy Tapan Bharati यशवंत जी, एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते ,आपकी चिंता जायज है। पर आपका उदासीन हो जाना खलता है। हम जैसे शुभचिंतक अपने बच्चों के बल पर भड़ास को कुछ आर्थिक सहयोग करना चाहें तो कैसे करें?

Kamta Prasad झाल बजाना शुरू कर दीजए, जहाँ से नर्क में आए थे। बदलाव की शुरुआत उसी से और वहीँ से होगी। आपने अपने वैचारिक आग्रहों को छोड़कर मानवतावाद का दामन पकड़ा, कहीं से भी ठीक नहीं था।

Manoj Kumar Mishra अमित शाह के पूरे भारत मे भाजपा के विस्तार के आक्रमक नीति से ऐसे फ़र्ज़ी सर्जी हमले होने ही थे तब जब कि सभी विपक्षियों पार्टियों विशेषकर लेफ्ट और कांग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगे। 2019 आते आते ऐसे ही आरोप और गढ़े जाएंगे ।करोड़ों रुपये की कीमत वाले प्रशांत किशोर के फेल होने के बाद कांग्रेस डोनॉल्ड ट्रम्प की चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी को करोड़ों डॉलर के अनुबंध के साथ हायर कर रही है । जो उच्च तकनीक से लैस है और जिसके पास हज़ारों आईटी एक्सपर्ट और हैकर्स की सेवा उपलब्ध है जो भारतीय मतदाताओं के गूगल सर्च, ईमेल, सोशल मीडिया और उनके संपर्कों का इतिहास भूगोल खंगाल डालेगी और उनकी रुचियों और उसी के अनुसार वो कांग्रेस की चुनावी रणनीति तय करेगी, राहुल बाबा के भाषणों के जुमले गढ़े जाएंगे ।अगर भारतीयों की प्राइवेसी और देश और देश की साइबर सुरक्षा इतनी गौण है तो कम से कम ये तो विचारणीय है कांग्रेस के पास इतना भारीभरकम फण्ड कहां से आ रहा है ?

Brijesh Singh कांग्रेस के पास व उसके नेताओं के पास अभी भी इतना पैसा है कि वह भाजपा तो क्या भारत की सभी पार्टियों को खरीद सकती हैं । अभी सत्ता ही तो नहीं है उनके पास। अभी तक कमाये धन को व्यवस्थित कर रहे हैं ।

Rehan Ashraf Warsi भाई हम जैसे नादान को लगता है कि अपने जो दुख झेलें हैं वह मीडिया के अंदर के सच , संघर्ष और गंदगी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल कर लिए हैं। वरना आज आप भी मज़े कर रहे होते। हाँ आपकी इज़्ज़त बहुत है मगर ज़्यादातर दिल मे ही करते हैं । बल

Jai Prakash Sharma निष्पक्ष, निडर और सच्चाई की बात करने वाले अधिकतम भाई Lisening ही करते नजर आते हैं, दलाली कहना थोड़ा ज्यादा हो जाता है

Vinay Oswal कुछ ऐसे ही कारणों से मैं भी बहुत मानसिक उलझन में हूँ। आप साझा करके हल्का हो लिए मैं नही हो पा रहा हूँ

Arvind Pathik यशवंत जी एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते… आप के निष्कर्ष उचित हैं… पर आपका उदासीन हो जाना खलता है.

Trivedi Vishal Confuse kyo hain ap? Hey arjun.. shastra uthao aur waar karo.

Kuldeep Singh Gyani अपने-अपने झंडे तले “सबकी” मौज बहार, मारी गई “पत्रकारिता” अब तू अपनी राह सवार… भाई साहब लिखा तो बहुत अच्छा है लेकिन बात बात पर सन्यास लेने की बात उचित नहीं…हम तालाब के किनारे बैठ कर भी क्या कर लेंगे उछलेगा तो कीचड़ ही तो क्यों न तालाब में ही खड़े रहा जाए जहां “मगर” भी हैं और “कमल” भी… हे ज्येष्ठ अडिग रहें और अपने हाथों को निरंतर मजबूत करने के लिए “फौज” तैयार करें…

Nirupma Pandey बात तो सही है अब आम जनता में न्यूज के प्रति उदासीन भाव आ गया है परदे के पीछे का सच आम जनता भी जानने लगी है

Harshit Harsh Shukla जी Yashwant singh भाई, पत्रकारिता के वेतन से घर नहीं चलता तो ईमान कहाँ से चलेगा… शायद यही वजह है की पत्रकार पार्टी के हो लेते हैं..

Manoj Upadhyay भाई साहब.. सच तो यही है कि आप जैसे लोग और आपकी जैसी पत्रकारिता ही सही और सार्वकालिक है. यह भी सच है कि यदि आप की पत्रकारिता और पत्रकार भावना संपन्न है तो आर्थिक मोर्चे पर तो सड़क छाप होना ही है. क्योंकि आपकी पत्रकारिता और आपकी पत्रकार भावना आज के तथाकथित लोकतांत्रिक दौर में पनपने वाले कारपोरेट नेताओं के लिए आप किसी काम के नहीं..

Yogesh Garg भड़ास का पिछले 5 साल से नियमित पाठक हूँ । पिछले कुछ समय से लगता है खबरों की आंच कम हो गई है । निष्पक्ष रहने के चक्कर में सत्ता पक्ष के लोकतंत्र विरोधी कुकर्मो का सख्त विरोध नही कर पा रहे आप । ऐसे बहुत से मुद्दे थे जिन पर लगा था कि भैया यशवंत की कलम चलेगी । पर वो मौन रह गए ।

Harsh Vardhan Tripathi असली बात बस यही है हमको १० साल में एक भी निष्पक्ष फ़ंडर न मिला। बाक़ी सब मिथ्या है।

Aflatoon Afloo और वायर को मिले।

Harsh Vardhan Tripathi भाई Aflatoon Afloo सही बात तो यही है ना कि वायर मोदी/संघ/बीजेपी के ख़िलाफ़ एजेंडे पर लगी वेबसाइट है। ऐसे ही कई होंगी, जो मोदी/संघ/बीजेपी के साथ लगी होंगी। जो जैसा है, उसको वही बताइए। मोदी के निरन्तर ख़िलाफ़ है, तो पत्रकार है। मोदी के साथ मुद्दों पर भी है, तो संघी है, इससे बाहर को आना ही पड़ेगा। और तो पब्लिक है, ये सब जानती है।

Aflatoon Afloo बिल्कुल, पब्लिक सब जानती है

Akhilesh Pratap Singh संघ के साथ पत्रकार नहीं, नारद होते हैं

Satyendra PS बात तो ठीक ही कह रहे हैं।

Vishnu Rajgadia अच्छा विश्लेषण है

Jayram Shukla वाजिब भडास।

सौरभ मिश्रा सूर्यांश कोई बचा क्या ? शायद कोई भी नहीं ! अच्छा समालोचनात्मक विश्लेषण

Garima Singh बेहतरीन ….कमाल ….खरा सच

Arvind Mishra बघेलखण्ड में कहा जाता है फुलई पनही से मारना वही किया है। आपने किसी को नहीं छोड़ा। दौड़ा दौड़ा कर

Sushil Rana सोलह आने सच – आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं।

आदित्य वशिष्ठ निजी भड़ास भी भड़ास के माध्यम से निकलने लगे तो भड़ास भी भड़ास न रहेगा भाई

SK Mukherjee आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं।

Jitesh Singh मीडिया सच नहीं दिखाता, सच छानना पड़ता है। बड़ा मुश्किल हो गया है मीडिया का सच जानना।

Someshwar Singh Good write-up and very correct-analysis.

Madhav Tripathi आपकी बात तो सही है लेकिन जिसके अमित शाहक़ के लड़के को फ़साने की फालतू कोशिश की गई है कुछ वास्तविक मुद्दा होना चाहिए था।

Sanjay Mertiya मुकदमे की जरुरत नहीं थी, वायर की स्टोरी में दम नहीं था, चौबीस घण्टे भी मुश्किल से चलती।

अतुल कुमार श्रीवास्तव अगर वो मुकदमा न करता तो जांच नहीं होती। और सिर्फ इल्जाम लगते। सच और झूठ सामने तो आये।

Kohinoor Chandravancee Right sir I beleif in your thoughts

Baladutt Dhyani तुम्हारी तो दुकान बंद चल रही है इसीलिए परेशान दिखते हो… दलाली की और कमीशन का काम बंद पड़ा है…

Yashwant Singh आपने सच में मेरे दिल के दर्द को समझ लिया ध्यानी भाई.. इसीलिए आप ध्यानी हैं.. वैसे, अपन की दुकान चली कब थी.. जीने खाने भर की कभी कमी नहीं हुई… कोई काम रुका नहीं.. आदमी को और क्या चाहिए… खैर, पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोग ये सब न समझेंगे.. वे तो वही बोलेंगे जो बोलना है… सो, बोलते रहियो 🙂

पंकज कुमार झा सुंदर. शब्दशः सहमत.

Rai Sanjay सहमत हूँ आप से

Vimal Verma बहुत बढ़िया।

राजीव राय बहुत सही

Anurag Dwary Sehmat

A P Bharati Ashant yashwant jindabad ! salam !

Arvind Kumar Singh बिल्कुल ठीक बात है

Aradhya Mishra Behatreen

Ashutosh Dwivedi यही सच है

Arun Srivastava सही कहा।

Lal Singh वीर तुम बढ़े चलो।

Nurul Islam सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद

Shadab Rizvi बात 100 फीसदी सही

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इन खबरों के कारण भड़ास संपादक यशवंत पर हमला किया भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने!

साढ़े छह साल पुरानी ये वो खबरें है जिसको छापे जाने की पुरानी खुन्नस में शराब के नशे में डूबे आपराधिक मानसिकता वाले भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने किया था भड़ास संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला… इसमें सबसे आखिरी खबर में दूसरे हमलावर अनुराग त्रिपाठी द्वारा स्ट्रिंगरों को भेजे गए पत्र का स्क्रीनशाट है जिसके आखिर में उसका खुद का हस्ताक्षर है… ये दोनों महुआ में साथ-साथ थे और इनकी कारस्तानियों की खबरें भड़ास में छपा करती थीं… बाद में दोनों को निकाल दिया गया था…

इन दोनों से भड़ास एडिटर यशवंत की कभी कोई मुलाकात नहीं हुई थी, सिवाय कभी किसी कार्यक्रम या किसी जगह देखा-देखी के अलावा. इनके मन में इस बात की खुन्नस थी कि वैसे तो ये खुद को तीसमारखां पत्रकार समझते थे लेकिन इनका असली चेहरा सबके सामने लाया गया तो इन्हें चक्कर आने लगे. इनकी सारी दलाली-लायजनिंग की पोलपट्टी भड़ास पर लगातार खुलती रही जिसके चलते इनका पत्रकार का आवरण धारण कर दलाली करने का असली करतब दुनिया के सामने उदघाटित हो गया. इससे इनके लिए मुंह दिखाना मुश्किल हो गया होगा…

सोचिए, मीडिया के लोग वैसे तो पूरे देश समाज सत्ता की पोल खोलने के लिए जाने जाते हैं लेकिन जब इनकी पोल खुलती है तो ये कैसे पागल होकर हिंसक हो उठते हैं… जिसका पेशा कलम के जरिए दूसरों की पोल खोलना और आलोचना करना हो, वह खुद की सही-सही आलोचना छापे जाने से तिलमिलाकर कलम छोड़ बाहुबल पर उतर जाता हो, उसे क्या कहेंगे? पत्रकार के वेश में अपराधी या पत्रकार के वेश में पशु या पत्रकार के वेश में लंपट?

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत का कहना है कि ऐसे हमलों, पुलिस-थानों, मुकदमों और जेल से वे लोग डरने वाले नहीं… मीडिया के अंदरखाने का असल सच सामने लाते रहेंगे, चाहें इसके लिए जो भी कुर्बानी देनी पड़े… भुप्पी और अनुराग से संबंधित कुछ प्रमुख खबरों का लिंक, जो भड़ास पर साढ़े छह साल पहले छपीं, नीचे दिया जा रहा है… इन  खबरों पर एक-एक कर क्लिक करें और पढ़ें…


आजतक के ब्यूरो चीफ का हुआ स्टिंग?
http://old.bhadas4media.com/tv/8998-2011-02-03-04-47-10.html

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आजतक प्रबंधन ने अपने ब्यूरो चीफ को बर्खास्त किया?
http://old.bhadas4media.com/buzz/9130-2011-02-08-16-14-47.html

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ब्लैकमेलिंग के आरोपों में आजतक न्यूज चैनल से निकाले गए भुप्पी
http://old.bhadas4media.com/tv/9172-2011-02-10-19-01-06.html

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महुआ न्यूज चैनल के हिस्से हो गए भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी!
http://old.bhadas4media.com/edhar-udhar/10121-2011-03-27-13-50-04.html

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आजतक से हटाए गए भुप्पी अब तिवारी जी की सेवा में जुटे
http://old.bhadas4media.com/tv/10769-2011-04-26-07-15-30.html

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महुआ न्यूज़ से भी विदाई हुई भूपेंद्र नारायण भुप्पी की
http://old1.bhadas4media.com/edhar-udhar/6062-bhuppi-out-from-mahua.html

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पैसे की जगह स्ट्रिंगरों को धमकी भरा पत्र भेज रहे हैं महुआ वाले
http://old1.bhadas4media.com/print/4507-2012-05-19-18-21-08.html


पूरे प्रकरण का अपनी तरफ से पटाक्षेप करते हुए यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वह इस प्रकार है-

”मेरे पर हमला करने वाले भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी को लेकर ये मेरी लास्ट पोस्ट है. इसमें उन खबरों का जिक्र और लिंक है जिसके कारण इन दोनों के मन में हिंसक भड़ास भरी पड़ी थी और उसका प्राकट्य प्रेस क्लब आफ इंडिया में इनने किया. मैंने अपनी तरफ से रिएक्ट नहीं किया या यूं कहें कि धोखे से इनके द्वारा किए गए वार से उपजे अप्रत्याशित हालात से मैं भौचक था क्योंकि मुझे कभी अंदेशा न था कि कलम धारण करने वाला कोई शख्स बाहुबल के माध्यम से रिएक्ट करेगा. मैं शायद अवाक था, अचंभित था, किंकर्त्व्यविमूढ़ था. इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था. अंदर प्रेस क्लब में तारीफ और बाहर गेट पर हमला, इस उलटबांसी, इस धोखेबाजी से सन्न हो गया था शायद. आज के दिन मैं मानता हूं कि जो हुआ अच्छा हुआ.  हर चीज में कई सबक होते हैं. मैंने इस घटनाक्रम से भी बहुत कुछ लर्न किया. मेरे मन में इनके प्रति कोई द्वेष या दुश्मनी नहीं है. मैं जिस तरह का काम एक दशक से कर रहा हूं, वह ऐसी स्थितियां ला खड़ा कर देता है जिसमें हम लोगों को जेल से लेकर पुलिस, थाना, कचहरी तक देखना पड़ता है. एक हमला होना बाकी था, ये भी हो गया. अब शायद आगे मर्डर वाला ही एक काम बाकी रह गया है, जिसे कौन कराता है, यह देखने के लिए शायद मैं न रहूं 🙂

मैंने अपने इन दोनों हमलावरों को माफ कर दिया है क्योंकि मैं खुद की उर्जा इनसे लड़ने में नहीं लगाना चाहता. दूसरा, अगर इनकी तरह मैं भी बाहुबल पर उतर गया तो फिर इनमें और मेरे में फर्क क्या रहा?  मैं इन्हें अपना दुश्मन नहीं मानता. मेरा काम मीडिया जगत के अंदर के स्याह-सफेद को बाहर लाना है, वो एक दशक से हम लोग कर रहे हैं और करते रहेंगे. ऐसे हमले और जेल-मुकदमें हम लोगों का हौसला तोड़ने के लिए आते-जाते रहते हैं, पर हम लोग पहले से ज्यादा मजबूत हो जाते हैं. लोग मुझसे भले ही दुश्मनी मानते-पालते हों पर मेरा कोई निजी दुश्मन नहीं है. मैं एक सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी, ज्यादा लोकतांत्रिक और ज्यादा सरोकारी बनाने के लिए लड़ रहा हूं और लड़ता रहूंगा. मैं पहले भी सहज था, आज भी हूं और कल भी रहूंगा. हां, इन घटनाओं से ये जरूर पता चल जाता है कि मुश्किल वक्त में कौन साथ देता है और कौन नहीं. पर इसका भी कोई मतलब नहीं क्योंकि चार पुराने परिचित साथ छोड़ देते हैं तो इसी दरम्यान दस नए लोग जुड़ जाते हैं और परिचित बन जाते हैं. बदलाव हर ओर है, हर पल है, इसे महसूस करने वाला कर लेता है.  मैं नेचर / सुपर पावर / अदृश्य नियंता पर भरोसा करता हूं, बहुत शिद्दत के साथ, इसलिए मुझे कतई एहसास है कि हर कोई अपनी सजाएं, अपनी मौज हासिल करता रहता है. इसलिए मैं अपने हमलावर साथियों को यही कहूंगा कि उनने जो किया उसका फल उन्हें ये नेचर देगा जिसके दरम्यान उनका अस्तित्व है. जैजै”


पूरे मामले को समझने के लिए इन खबरों / टिप्पणियों / आलेखों को भी पढ़ें…

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भड़ास4मीडिया पर पहला मुकदमा मृणाल पांडेय के सौजन्य से एचटी मीडिया ने किया था

बेकार बैठीं मृणाल पांडेय को मिल गया चर्चा में रहने का नुस्खा!

Yashwant Singh : मृणाल पांडेय ने जो लिखा कहा, उस पर बहुत लोग लिख कह रहे हैं. कोई पक्ष में कोई विपक्ष में. आजकल का जो राजनीतिक विमर्श है, उसमें अतिवादी टाइप लोग ही पूरा तवज्जो पा रहे हैं, महफिल लूट रहे हैं. सो इस बार मृणाल पांडेय ही सही. मेरा निजी अनुभव मृणाल को लेकर ठीक नहीं. तब भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई थी. पहला पोर्टल या मंच या ठिकाना था जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बड़े-बड़े मठाधीश संपादकों को चैलेंज कर रहा था, उनकी हरकतों को उजागर कर रहा था, उनकी करनी को रिपोर्ट कर रहा था.

मृणाल पांडेय ने हिंदुस्तान अखबार से मैनेजमेंट के निर्देश पर थोक के भाव पुराने मीडियाकर्मियों को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया. करीब तीन दर्जन लोग निकाले गए थे. शैलबाला से लेकर राजीव रंजन नाग तक. इस बारे में विस्तार से खबर भड़ास पर छपी. मृणाल पांडेय ने अपने सेनापति प्रमोद जोशी के जरिए भड़ास पर मुकदमा ठोंकवा दिया, लाखों रुपये की मानहानि का, जिसके लिए कई लाख रुपये दिल्ली हाईकोर्ट में एचटी मीडिया लिमिटेड की तरफ से कोर्ट फीस के रूप में जमा किया गया.

मुकदमा अब भी चल रहा है. प्रमोद जोशी एक बार भी हाजिर नहीं हुए. भड़ास पर यह पहला मुकदमा था. हम लोगों ने इसका स्वागत किया कि यह क्या बात है कि आप अपने यहां से बिना नोटिस तीन दर्जन लोगों को निकाल दो और हम खबर छाप दें तो मुकदमा ठोंक दो, सिर्फ इस अहंकार में कि हम तो इतने बड़े ग्रुप के इतने बड़े संपादक हैं, तुम्हारी औकात क्या? भड़ास4मीडिया न डरा न झुका, बल्कि कई निकाले गए लोगों की मदद करते हुए उन्हें लीगल सहायता भी उपलब्ध कराई. मृणाल पांडेय मुकदमें में खुद पार्टी नहीं बनीं. उन्होंने प्रमोद जोशी को आगे किया. एचटी मीडिया यानि शोभना भरतिया की कंपनी को आगे किया. आज भी एचटी मीडिया बनाम भड़ास4मीडिया का मुकदमा चल रहा है. हमारे बड़े भाई और वकील साब Umesh Sharma जी इस मुकदमें को देख रहे हैं, बिना कोई फीस लिए.

कहते हैं न कि कई बार चींटीं भी हाथी को धूल चटा देती है. इस मुकदमें में कुछ ऐसा ही होने वाला है. अब तो वहां न मृणाल पांडेय रहीं न प्रमोद जोशी रहे. एचटी मीडिया के ढेर सारे वकील भारी भरकम फीस कंपनी से वसूल रहे हैं और भड़ास4मीडिया से लड़ने हेतु कोर्ट से तारीख पर तारीख लेते जा रहे हैं. अपन लोग भी इंज्वाय करते हुए मुकदमा लड़ रहे हैं, कि इतनी भी जल्दी क्या है, मुकदमा चल रहा है तो क्या… मुकदमा खत्म भी हो जाए तो क्या…

लेकिन उस वाकये ने मृणाल पांडेय को मेरी नजरों से गिरा दिया. वह एक दंभी, स्वार्थी, चापलूस पसंद, अलोकतांत्रिक और आत्मकेंद्रित महिला मुझे लगी. उसे अब किसी भी प्रकार से चर्चा में रहना है… क्योंकि उसके पास अब न कोई पद है न कोई काम… ऐसे में सहारा बचा है सोशल मीडिया जिसके जरिए उसे चर्चा में रहने का एक जोरदार मौका मिला है. आजकल ब्रांडिंग इसी को कहते हैं. आप लगे रहिए मृणाल के विरोध या पक्ष में, लेकिन सच बात तो ये है कि मृणाल फिर से मशहूर हो गई… मृणाल फिर से मुख्यधारा में आ गई… ये है नए दौर की ब्रांडिंग की ताकत… कोई मारी गई महिला पत्रकार को कुतिया कह कर चर्चा में आ जाता है तो कोई पीएम को गधा बताकर ताली बटोर लेता है. साथ ही साथ उतना ही तगड़ा विरोध भी झेलता है. इस तरह चरम विरोध और समर्थन के बीच वह अपना कद काठी काफी बड़ा कर लेता है.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए इस पोस्ट पर क्लिक करें :

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यशवंत हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं, भगवान उन्हें दीर्घायु दें

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह पर हमले की खबर पढ़कर मन बहुत व्यथित हुआ। साथ ही इससे बहुत खिन्नता भी उपजी, आज के पत्रकारिता जगत के स्वरूप को लेकर। यशवंत सिंह पर हमला करने वाले निश्चित रूप से मानसिक रूप से दिवालिया हैं। यह बात भी तय है कि वे तर्क और सोचविहीन हैं।

निश्चित तौर पर वे पत्रकारिता जगत के लिए बदनुमा दाग हैं। उन्हें यह नहीं पता है कि यशवंत सिंह कितना बड़ा योगदान पत्रकारिता जगत के मूल्यों को समाज में बचाए रखने के लिए कर रहे हैं। यशवंत वो काम कर रहे हैं जिसे मीडिया जगत में बड़े नाम के रूप में स्थापित समूह भी नहीं कर सकते हैं। वे हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं। भगवान उन्हें दीर्घायु दें।

उमेश शुक्ल
सीनियर जर्नलिस्ट
झांसी
umeshsukul@gmail.com

ये हैं दोनों हमलावर…

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पत्रकार कहे जाने वालों का यशवंत जैसे एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है : अविकल थपलियाल

Avikal Thapliyal : कोहरा घना है… बेबाक और निडर पत्रकारों पर हमले का अंदेशा जिंदगी भर बना रहता है। भाई यशवंत को भी एक दिन ऐसे घृणित हमले का शिकार होना ही था। बीते वर्षों में हुई मुलाकात के दौरान मैंने यशवंत का ध्यान इस ओर खींचा भी था। लेकिन मुझे ऐसा लगता था कि कई बार फकीराना अंदाज में सभी को गरियाने वाले यशवंत किसी अपराधी या फिर विशेष विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले हिंसक लोगों के कोप का भाजन बनेंगे। लेकिन पत्रकार कहलाये जाने वाले ही अपने बिरादर भाई यशवंत की नाक पर दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर देंगे, यह नहीं सोचा था।

यशवंत ने अपने पोर्टल के जरिये हिंदुस्तान के मीडिया जगत की खबरों के अलावा कई रचनात्मक प्रयोग किये, जिसकी प्रशंसा सभी करते हैं। साथ ही बतौर पत्रकार अपने को भी गरियाने में यशवंत कोई कोर कसर नही छोड़ते। जेल जाने पर ‘जानेमन जेल’ किताब लिख मारी। वह किताब भी एक जेल याफ्ता पत्रकार की स्वीकारोक्ति स्वागत योग्य थी। बहरहाल, यशवंत पर हुए हमले की निंदा की जानी चाहिए और हमले के आरोपी को सजा मिलनी चाहिए। पत्रकार कहे जाने वालों का एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है। यशवंत की धाकड़ लेखनी सच उगलती रहे, और ये घना कोहरा छंटे…. आमीन!

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल की एफबी वॉल से.

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विकास सिंह डागर : कई दिनों पहले भड़ास वाले यशवंत जी पर दो मानसिक दिवालिया तथाकथित पत्रकारों ने दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर दिया था।  हमला तो अकेले यशवंत जी पर हुआ लेकिन उसकी चोट शायद उन तमाम पत्रकारों को लगी जो मेहनत और ईमानदारी से अपने पेट का गुजारा कर रहे हैं। लेकिन इस घटना पर दुःख जताने वाले कम हैं, दिवाली मनाने वाले ज्यादा। कारण है यशवंत सिंह की कलम, जो आये दिन मीडिया में बैठे दलालों पर वार करती रहती है। किसी बड़े चैनल का सम्पादक हो, कोई जिले का उगाहीबाज स्टिंगर हो या रात दिन मेहनत करने वाले पत्रकारों की तनख्वाह मारने वाले मालिक। यशवंत लगातार ऐसे लोगों की पोल भड़ास डॉट कॉम के जरिये खोलते रहे हैंं और यही कारण है कुछेक पत्रकारों को छोड़कर बाकी सभी इस शर्मनाक कांड पर चुप्पी साधे हुए हैं।

मौजूदा समय मे पत्रकारिता में कुछेक ही लोग हैं जो अपने ही पेशे में फैल रही कुरूतियों के खिलाफ लिखते बोलते हैं। अगर ऐसे में सबसे बड़े भड़ासी और भड़ासियों की आवाज़ यशवंत जी पर हमला होता है तो कहीं ना कहीं हम जैसे लोग जो अपने घर की कुरूतियो से लड़ रहे हैं, उन्हें झटका लगना लाजमी है। ऐसे समय में यशवंत सिंह का साथ देना और आरोपियों का बहिष्कार कर उन्हें सजा दिलवाना हमारा कर्तव्य है। साथ ही मैं उन लोगों को सलाह दूँगा जो इस कायराना काँड पर खुशी जता रहे हैं कि यशवंत सिंह की दुश्मनी आप लोगों से नहीं थी, उन्होंने आपकी कुरूतियों को उजागर किया, जिसकी खुन्नस तुम लोग दिमाग मे लिए बैठे हो।

लेखक विकास सिंह डागर एक टीवी चैनल के रिपोर्टर हैं.

ये हैं दोनों हमलावर…

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हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

Anoop Gupta : पत्रकार यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो लिख कर कीजिये, बोल कर कीजिए, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरूरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरूरत है।

यशवंत अपने सीमित संसाधनों में भड़ास4 मीडिया चलाते रहे हैं और मीडिया की दुनिया के कई गलत कारनामे निर्भीकता के साथ सामने लाते रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि पूरा मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के कब्ज़े में है, इस तरह के सूचना माध्यम काफी अहमियत रखते हैं। काबिलेतारीफ बात यह रही कि यशवंत ने हिम्मत के साथ इस हमले को बेनकाब किया और अभी भी अपनी उसी प्रतिबद्धता के साथ मीडिया मैदान में डटे हुए हैं।

ये हैं दोनों हमलावर…

हम सब आपके साथ हैं। हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है… देश के सभी बागी पत्रकारों से मेरी अपील है की यशवंत सिंह पर हुए हमले के विरोध में दिल्ली के प्रेस क्लब पर सब लोग एक साथ आये और हमलावरों के खिलाफ मोर्चा खोले जिससे कभी कोई और यशवंत सिंह पर हमला करने की जुर्रत ना कर सके. में अनूप गुप्ता संपादक दृष्टान्त लखनऊ हर तरह से यशवंत सिंह के साथ थे, है और रहेंगे.

लेखक अनूप गुप्ता लखनऊ से प्रकाशित चर्चित मैग्जीन दृष्टांत के प्रधान संपादक हैं.

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हे ईश्वर, हमलावर भुप्पी और अनुराग को क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं..

Shrikant Asthana : प्रेस क्लब आफ इंडिया परिसर में यशवंत पर हमला हुए कई दिन बीत चुके हैं। अपराधियों की पहचान भी सबके सामने है। फिर भी न पुलिस कार्रवाई का कुछ पता है, न ही इनके संस्थानों की ओर से। क्या हम बड़ी दुर्घटनाओं पर ही चेतेंगे? कौन लोग इन अपराधियों को बचा रहे हैं? वैसे भी, कथित मेनस्ट्रीम मीडिया के बहुत सारे कर्ता-धर्ता तो चाहते ही हैं कि वे यशवंत की चटनी बना कर चाट जाएं। इस श्रेणी से ऊपर के मित्रों-शुभचिंतकों से जरूर आग्रह किया जा सकता है कि वे उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाएं। अपनी फक्कड़ी में यशवंत किसी को अनावश्यक भाव देता नहीं। लगभग ‘कबीर’ हो जाना उसे यह भी नहीं समझने देता कि यह 15वीं-16वीं शती का भारत नहीं है। First hand account of attack on Yashwant Singh : https://www.youtube.com/watch?v=MgGks6Tv2W4 I’m very thankful to friends who have shown deep concern about the incident and are likely to help create due pressure.

Surendra Grover : पत्रकारों के साथ आये दिन होने वाली #मारपीट और उनकी हत्याओं से कई दिनों से सदमे की स्थिति में हूँ.. पिछले दिनों तो गज़ब हुआ जब पत्रकारिता का लबादा ओढ़े दो लोगों ने छोटे छोटे पत्रकारों की तकलीफ सबके सामने रखने वाले पत्रकार Yashwant Singh पर हमला कर दिया.. यानी कि अब पत्रकारिता लायजनिंग से होते हुए गुण्डागर्दी तक पहुंच गई है.. हे ईश्वर, उन्हें क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं…

ये हैं दोनों हमलावर…

Sanjay Yadav : कलम के धनी Yashwant Singh भाई साहब पर हमला हुए कई दिन हो गए. यशवंत भाई को पिछले दो साल से पढ रहा हूँ और देख ऱहा हूँ. उनका संघर्ष अपनी पत्रकार बिरादरी के लिए है. मैं कोई पत्रकार नहीं हूँ. दिल्ली में अकेला रहकर नौकरी करता हूँ और yashwant भाई साहब से कभी मिला नहीं. पर मुझे पता नही क्यों ये लगता है कि कभी जरूरत पड़ी तो ये बंदा आधी रात को भी मेरे साथ खडा होगा. जबसे भाई साहब पर हमला हुआ, मैं बहुत परेशान था. अच्छा लगा कि लोग इनके साथ खडे हैं. पर कुछ लोग लिखते हैं कि yashwant की विचारधारा अलग है. ज़हां तक मैँ यशवंत भाई को समझा हूँ, इनकी एक ही विचारधारा है, और वो है इंसानियत. यशवंत भाई यारों के यार हैं. जब ये किसी के साथ खडे होते हैं तो ना तो उसकी विचारधारा देखते हैं और ना ही उसका कद-पद.

चन्द्रहाश कुमार शर्मा : यशवंत सिंह किसी राजनीतिक पार्टी का चोला पहने होते, तो न आवाज़ बुलंद होती? साथियों, आज मैं बात कर रहा हूं एक ऐसे निडर, निर्भीक व धारदार कलम के धनी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से निकले देश के नामी पत्रकार जो देश के हरएक नागरिक, यहाँ तक की मीडियाकर्मियों पर भी जब-जब जुल्म होते हैं, वह बड़ी प्रमुखता से अपने लोकप्रिय न्यूज़ पोर्टल भड़ास फ़ॉर मीडिया में प्रकाशित करते हैं। हुआ कुछ यूं कि… एक सप्ताह पहले वह प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पहुंचे। वहां दो संकीर्ण विचारधारा के पत्रकार भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी उनकी तारीफ में पुल बांधें। जब यशवंत बाहर निकलने लगे, तब उसी भुप्पी और त्रिपाठी ने उन पर हमला बोल दिया। यशवंत सिंह काफी चोटिल हुए। जब सोशल मीडिया पर उन्होंने अपना दर्द बयां किया, तो सभी हिल गए। इस घटना के इतने दिन बीत जाने के बाद भी न सरकार सख्त है, न पत्रकार। यशवंत सर में एक खूबी रही है कि वह किसी राजनीतिक पार्टी को सपोर्ट नहीं करते और न ही उनके एहसान तले दबते हैं। यदि वह ऐसा किये होते तो लगातार टीवी पर खबरें चलती और यह मामला तूल पकड़ लिया होता। (चंद्रहाश कुमार शर्मा, यूपी व बिहार प्रभारी- भोजपुरिया बयार न्यूज़ पोर्टल)

वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत अस्थाना, सुरेंद्र ग्रोवर, संजय यादव और चंद्रहाश कुमार शर्मा की एफबी वॉल से.

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‘यशवंत बड़ा वाला लंकेश है, इसे जान से मारना चाहिए था!’

Naved Shikoh : दिल्ली प्रेस क्लब में यशवंत भाई पर होता हमला तो मैंने नहीं देखा लेकिन लखनऊ के प्रेस क्लब में कुछ भाई लोगों को इस घटना पर जश्न मनाते जरूर देखा। पुराने दक्षिण पंथी और नये भक्तों के साथ फ्री की दारु की बोतलें भी इकट्ठा हो गयीं थी। आरोह-अवरोह शुरू हुआ तो गौरी लंकेश की हत्या से बात शुरु हुई और यशवंत पर हमले से बात खत्म हुई। कॉकटेल जरूर हो गयी थी लेकिन वामपंथियों को गरियाने के रिदम का होश बरकरार था।

एक ने कहा- ‘बड़े-बड़ों की फटी पड़ी है लेकिन इस यशवंत के सुर-लय में कोई फर्क नहीं आया’। एक मीडिया समूह के मालिक का चमचा और मैनेजमेंट का आदमी लगा रहा था, बोला- ‘हम लोगों ने तो आफिस के हर सिस्टम से भड़ास ब्लॉक करवा दिया है’। एक बेवड़ा कहने लगा कि हिम्मत तो देखो यशवंत की, बेलगाम इतना है कि नीता अंबानी तक के बारे मे भी लिखने से नहीं डरता। एक मोटा आसामी बोला- ‘बड़ा वाला लंकेश है यशवंत, इसे तो जान से मारना चाहिए था।’

ये हैं दोनों हमलावर…

इनकी बातें सुनकर लगा कि सच लिखने वाले निर्भीक पत्रकारों की आवाज बंद करने के लिए न सिर्फ अंबानी-अडानी के चैनल इस्तेमाल हो रहे हैं बल्कि टुच्चे और दलाल किस्म के पत्रकारों को भी निडर पत्रकारों को डराने धमकाने के लिए मारने-पीटने की सुपारी दी जा रही है। सरकार के भोपू चैनल हों या भुप्पी जैसे टुच्चे और दलाल पत्रकार, इन्हें कहीं न कहीं से सच लिखने वाले यशवंत सिंह जैसे पत्रकारों को डरा कर खामोश करने की सुपारी दी जा रही है।

उधर, लखनऊ के कई पत्रकार संगठनो ने बैठक की। उत्तर प्रदेश जिला मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बैठक में आधा दर्जन पत्रकार संगठनों के सैकड़ों पत्रकारों ने शिरकत की। पत्रकारों ने यशवंत सिंह के हमलावरों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किये जाने की मांग की।

नवेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9918223245 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारिता में ‘सुपारी किलर’ और ‘शार्प शूटर’ घुस आए हैं, इनकी रोकथाम न हुई तो सबके चश्मे टूटेंगे!

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर में एक उद्दाम पत्रकार यशवंत सिंह को दो “पत्रकारों” द्वारा पीटा जाना कर्नाटक में पत्रकार मेध से कम चिंताजनक और भयावह नहीं है। दरअसल जब से पत्रकारिता में लिखने, पढ़ने और गुनने की अनिवार्यता समाप्त हुई है, तबसे तरह तरह के सुपारी किलर और शार्प शूटर इस पेशे में घुस आए हैं। वह न सिर्फ अपने कम्प्यूटर, मोबाइल और कैमरे से अपने शिकार को निशाना बनाते हैं, बल्कि हाथ, लात, चाकू और तमंचे का भी बेहिचक इस्तेमाल करते हैं।

इस पेशे में इनकी उपस्थिति वास्तविक श्रम जीवी पत्रकारों के लिए राजनैतिक और आर्थिक धन पशुओं से अधिक भयावह है। इनकी रोकथाम न हुई, तो बारी बारी सबके हाथ, पाँव चश्मे तथा नाक तोड़ेंगे, जैसे यशवंत की तोड़ी है। इनका मुक़ाबला लिख कर, बोल कर तथा जूतिया कर करना अपरिहार्य है।

उत्तराखंड के वरिष्ठ और चर्चित पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

भड़ास संपादक यशवंत पर हमले को लेकर धीरेंद्र गिरी, पंकज कुमार झा और शैलेंद्र शुक्ला की प्रतिक्रियाएं कुछ यूं हैं…

Dhirendra Giri : बेबाक शख्सियत है Yashwant Singh जी…. फ़र्ज़ी लोग इस वज़न को सह नही पाते… खैर उन्होंने कई दफा टुच्चो को सहा है। आगे भी वह हमेशा की तरह मज़बूत ही दिखाई देंगे । इस आक्रमण की घोर निंदा पढ़ने लिखने और चिंतन करने वाली पूरी बिरादरी को करनी चाहिए।

पंकज कुमार झा : मीडिया के एजेंडा आक्रमण के हमलोग भी ऐसे शिकार हो जाते हैं कि कोई घोषित अपराधी की हत्या पर पिल पड़ते हैं जबकि अपने निजी सम्पर्क के लोगों, मित्रों तक के साथ हुए किसी आक्रमण तक पर ध्यान नही जाता. गौरी लंकेश की हत्या पर होते वाम दुकानदारी के बीच ही मित्र Yashwant Singh पर प्रेस क्लब में आक्रमण की ख़बर आयी. कोई भुप्पी और किसी त्रिपाठी ने दारू के नशे में इस करतूत को अंजाम दिया. दोनों शायद किसी ख़बर के भड़ास पर छापे जाने से नाराज़ थे. आइए इस हरकत की भर्त्सना करें और अगर कर पायें तो दोषियों को दंडित कराने की कोशिश हो. सभ्य समाज में ऐसा कोई कृत्य बिल्कुल भी सहन करने लायक नही होनी चाहिए.

ये हैं दोनों हमलावर…

Shailendra Shukla : यशवंत भाई पर हमला यानी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के चौथे स्तम्भ पर हमला..  भारत वर्ष में ऐसा माना जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अगर ये सही है तो यशवंत भाई और भड़ास चौथे स्तम्भ के स्तम्भ है। भाई के ऊपर कुछ तथाकथित पत्रकारों ने हमला किया और वह भी भरोसे में लेकर। यशवंत भाई… यानी अगर मीडिया आपके साथ गलत कर रहा है तो उसके खिलाफ खड़ा होने वाला एकमात्र इंसान… कुछ छुटभैये किश्म के तथाकथित फर्जी पत्रकारों ने उनके साथ जो गुस्ताखी की है उसकी सजा उन्हें कानून पता नहीं कब देगा लेकिन अगर मुझे भविष्य में ऐसा अवसर मिलता है जिसमें उन सज्जनों से मुलाकात होती है तो उनकी खातिरदारी मैं जरूर करूँगा… उसके बदले इस देश का कानून जो भी सजा मेरे लिए तय करेगा मैं उसे सत्य नारायण भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लूंगा। अब बात यशवंत भाई और उन तथाकथित पापी किश्म के पत्रकारों की… अगर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई को धोखा दिया तो वे गलत हैं… उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई पर हमला किया तो भी वो गलत हैं … किसी दीवार पर मैंने लिखा हुआ एक वाक्य पढ़ा था ….

“अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाते हो तो ये आपकी जीत नहीं है… बल्कि ये सोचो सामने वाले को आप पर कितना भरोसा था जिसे आपने तोड़ दिया”

खैर यशवंत भाई से बात की मैन भावुक होकर बदले की भावना प्रकट की और मैं आज नहीं तो कल उस चूहे तक जरूर पहुँच जाऊंगा… लेकिन भैया हो सकता है आप राम हो पर मैं नहीं…. मैंने लक्ष्मण जी की एक बात बिलकुल गाँठ बांध रखी है….

“जो ज्यादा मीठा होता है.. वह अपना नाश कराता है।
देखो तो मीठे गन्ने को.. कोल्हू में पेरा जाता है।।”

मैं यशवंत भाई पर हुए हमले की निंदा नहीं करूंगा… भर्तसना नहीं करूँगा… लेकिन अगर मौका मिला तो “जैसे को तैसा” वाला मुहावरा हमलावरों के साथ जरूर चरित्रार्थ करूँगा। अगर मेरे फेसबुक वॉल या किसी अन्य माध्यम से ये मैसेज उन दुर्जनों तक पहुचता है तो वो खुलकर मेरे सामने आ सकते है। वह इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अगर वो धूर्त हैं… ठग हैं… मीठी मीठी बातों में मुझे फंसा लेंगे जैसे यशवंत भाई के साथ उन्होंने किया तो ऐसे मत सोचें… क्योंकि मैं वाकई में महाधूर्त… हूँ खासकर उन दुर्जनों से तो ज्यादा… पता नहीं मेरे इस पत्र को भड़ास अपने पास जगह देगा कि नहीं लेकिन अगर देता है तो अच्छा लगेगा… मेरा मैसेज दुर्जनों तक जल्दी पहुचेंगे.…. क्योंकि सफाई कर्मचारी से लेकर मुख्य संपादक तक सब भड़ास पढ़ते हैं… अगर हमलावर जरा सा भी मीडिया से जुड़े होंगे तो भड़ास जरूर पढ़ते होंगे…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें…

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शैतानी ताकतों के हमले में चश्मा टूटा… ये लो नया बनवा लिया… तुम तोड़ोगे, हम जोड़ेंगे.. : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : चश्मा नया बनवा लिया। दो लम्पट और आपराधिक मानसिकता वाले कथित पत्रकारों भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी द्वारा धोखे से किए गए हमले में चश्मा शहीद हो गया था, पर मैं ज़िंदा बच गया। सो, नया चश्मा लेना लाजिमी था। वो फिर तोड़ेंगे, हम फिर जोड़ेंगे। वे शैतानी ताकतों के कारकून हैं, हम दुवाओं के दूत। ये ज़ंग भड़ास के जरिए साढ़े नौ साल से चल रही है। वे रूप बदल बदल कर आए, नए नए छल धोखे दिखलाए, पर हौसले तोड़ न पाए।

न जाने क्या मंजूर है नियति को, न जाने क्या योजना है नेचर की। मैं सिर्फ निमित्त मात्र हूं। जेल, मुकदमे, हमले, धमकी, पुलिस, कोर्ट कचहरी, आर्थिक तंगी… पर इरादे हैं कि दिन ब दिन चट्टानी होते गए। हमने सबको क्षमा किया। मेरा निजी बैर किसी से नहीं। पर सच की मशाल तो जलती रहेगी, सरोकार की पत्रकारिता तो होकर रहेगी, कुकर्मों का भाँडा तो फूटेगा। आप सभी साथियों का प्यार और समर्थन मेरे साथ है। वैसे नया वाला चश्मा कैसा है, बताएं तो जरा आप लोग 🙂

भड़ास संपादक यशवंत के उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Arsh Vats Are Yashwant Singh sir g u r bravo aapke bhi 1 crore anuyayi h aang laga denge aang
Yashwant Singh आग नहीं, प्रेम लगाएंगे हर ओर 🙂

Jyoti Singh सर नया चश्मा मुबारक हो। और एक सलाह आगे से कोई चश्मे पे अटैक करे तो आप उसके दांत तोड़ देना।
Yashwant Singh तोड़ने का काम प्रकृति के हवाले। अपन तो कलम से लड़ेंगे और कलम से तोड़ेंगे 🙂

Vinay Maurya Sinner हम तोहरे साथ हई भईया। ई अउर बात हव की छोट भाईयन के भूल गईला …संजय शर्मा भईया के तरे
Yashwant Singh दिल मे हउआ भाय। कहा त करेजवा फाड़ के देखायीं 🙂

प्रवीण श्रीवास्तव उ दूनो भुप्पी और भुप्पा की तस्वीर हो तो देखाईये… देखल जाए शकल दुनहुँन क
Yashwant Singh आप लोग ही खोजिए। मैं इन इग्नोर किए जाने लायक लोगों पर टाइम नहीं खर्च करता। ये काम भड़ास समर्थकों पर छोड़ता हूं।

Vikash Rishi बढ़िया चेहरे पर गंभीरता दिख रही है कुछ ठोस करना होगा।
Yashwant Singh अरे नहीं। कुछ चीजें प्रकृति पर भी छोड़ देनी चाहिए। हम लोग कलम वाले हैं। उनके जैसे आपराधिक मानसिकता वाले नहीं। क्षमा किए जाने योग्य हैं वो ताकि खुद आत्म मंथन कर सकें वो। 🙂

Brijendra Singh दाढ़ी तो तभी बनेगी जब…
Yashwant Singh अरे नहीं। कुछ चीजें प्रकृति पर भी छोड़ देनी चाहिए। हम लोग कलम वाले हैं। उनके जैसे आपराधिक मानसिकता वाले नहीं। क्षमा किए जाने योग्य हैं वो ताकि खुद आत्म मंथन कर सकें वो। 🙂

Soban Singh चश्मा अच्छा है. आपकी फिक्र रही दो दिन. थोड़ा दाढ़ी साड़ी भी बन जाती तो भुप्पी और त्रिपाठी का कुछ और भला हो जाता।

Rajeev Tewari इस चश्मे में ज्यादा प्रबुद्ध दिखे हैं। सरोकार की पत्रकारिता तो होकर रहेगी। बहुत बधाई, shubhkamnayen

Vivek Dutt Mathuria भाई ज़म रहे हो और जमे रहो! आपके साथ पूरा कारवां है!

Rehan Ashraf Warsi विचारों का मतभेद यहाँ तक आ पहुँचा, दुःखद है। ये सब कहाँ ले जाएगा, और कब रुकेगा।

Nirupma Pandey वो फिर तोड़ेगें, हम फिर जोड़ेगें

Yuvneet Rai Chaudary Desh badh raha hai …..apke patrkar mitra Kuch jyda aage badh gye

Bhoopendra Singh आपने ऐतिहासिक काम किया है। पीढ़ियां ज़रूर याद करेंगी

Aditya Singh Bhardwaj चश्मा आप गांधीवादी रखिये 🙂

Ansh Sumit Sharma जबरदस्त चश्मा है भैया जी।

Nivedita Patnaik Never mind… change your glasses but never the visions…. thru which you made people to see what is what.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ चश्मा क्या खरीदे पिछले चार दिनों की खोयी आंख मिल गयी.. अब उसकी खाट खड़ी करने से इन्हें कौन रोक सकता। इतनी बड़ी हमदर्दों व समर्थकों की टीम जो ठहरी… उठाओ ठाकुर साहब कलम और रगड़कर मटियामेट कर दो उन्हें जो अंधा बनाकर देश को कई महत्वपूर्ण सूचनाओं से दूर रखना चाह रहे थे जिससे उनकी भविष्य की मंशा पुनः होश नहीं संभाल पाए।

Mohanraj Purohit नया वाला भी अच्छा हैं, लेक़िन पुराने वाले शहीद वाले को भी संभाल कर रखें, भुप्पी और अनुराग को याद रखने के लिए।

Anand Kumar तेरे वजह से चश्मा बदला, अफसोश नजरिया ना बदल सका, ऐ भुप्पी और अनुराग तू तो ताकत दे गया…

Arvind Tripathi दुष्टों के चिन्हांकन की दृष्टि साफ़ बनी रहनी चाहिए, बाक़ी सब ठीक है।

Deepak Srivastava गांधी जी का रूप तो आपके लेख में दिखा… किंतु भगत सिंह, आज़ाद जी , बोस , बिस्मिल जी की प्रतिक्रिया भी देखनी है

Maruf Khan Journalist Bhadas ne media ke ander ke haal btaye. jo sach me hota hai.

अनिल अबूझ सरोकारों के साथ-साथ खुद का भी खयाल भी रखिए सर! पत्रकारों की हालत देख रहे हैं? आपका जीना जरूरी है..बल्कि हर उस शख्स का जीना जरूरी है जो सच कहता है..सच लिखता है| हौसले को नमन करता हूँ|

Tahir Khan इस चश्मे से उन लोगों के कुकृत्य भी दिखेंगे जो अभी मीडिया का चोला ओढ़े किसी बिल में छिपे बैठे हैं…शानदार ..जय हिंद।

Rajnish Tara Bahute hi gazab hai bhaiya…. lage rahiye mission sachchai ke liye…

Majid Qureshi निडर और बिना डिगे पत्रकारिता के होंसले को सलाम। वैसे भी ये किस्म कम ही रह गई है। वरना तो ऐसा होने पर क़लम तोड़ देते है लोग।

Keshav Kumar अगर आप सही हो तो आपको कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती है। केवल आपको अपनी सच्चाई पर टिके रहना होता है, गवाही वक्त खुद देता है।

Sudhir Jagdale बिना लक्ष्य के जीने वाले इंसानों की जिंदगी कहाँ अमीर होती है, जब मिल जाती है सफलता तो नाम ही सबसे बड़ी जागीर होती है।

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ chashma bahut achchha hai . aap bhi bahut achchhe ho . sankalp bada hai to dikkat to rhengee

Shailesh Tiwari पुराना टूटता है तभी नया बनता है । उन दोनों को भगवान सद्बुद्धि दे यही प्रार्थना है। वैसे यह चस्मा चेहरे पर जम तो रहा है गुरु… इस हेतु उन दोनों शैतानी ताकतों के कारकुनों का आभार की एक नए चश्मे को लेने का बहाना बनने में उनका योगदान था..

Nitin Thakur चश्मा कातिल है Yashwant जी.

Amit Ahluwalia और चूंकि काले फ्रेम का है तो चश्मे कातिल से भी बचाएगा

Manvinder Bhimber ऐतिहासिक काम करते हो

Rajpal Parwa चश्मा सुंदर है। आप सेहतमंद रहें ईश्वर से ये दुआ है।

Sarvesh Singh आपके बेमिसाल व्यक्तित्व को प्रणाम

Rahul Amrit Raj शानदार, जानदार, जबरदस्त, भड़ास जिंदाबाद

Hitesh Tiwari चीता हो आप। और चश्मा मस्त है।

Sanjay Swadesh डरे, सहमे, बुजदिल ही ऐसी हिंसात्मक हरकत पत्रकारों के साथ करते हैं

Mafatlal Agrawal हर जोर जुल्म की टक्कर मे संघर्ष हमारा नारा है।

Madan Tiwary पहले यह बताये उन हरामियों की ठुकाई कीजियेगा या नहीं।

Ziaur Rahman आप हजारों-लाखों मीडिया कर्मियों की आवाज हो, उन सभी का प्यार, सहयोग और दुआ आपके साथ है।

Mukesh Singh बच्चे अक्सर कुछ ना कुछ तोड़ते ही रहते हैं। वैसे नया चश्मा व्यक्तित्व को और घना बना रहा है।

Narendra M Chaturvedi थोड़ा टेड़ा है…वैसे ऊपर से नीचे तक टेड़े की नगरी रहकर सब टेड़ा ही दिखता है…?

Satya Prakash Chashma mein DRISHTI ki dhaar tez ho gayee hai

Golesh Swami Very nice, god bless you. Keep it up.

अजित सिंह तोमर चश्मा और आप दोनों ही दमदार हैं सर

Ashok Anurag ये आपका बड़प्पन है यशवंत भाई, फिर भी जो हुआ वो माफ़ी योग्य नहीं था

Purushottam Asnora गुण्डे कहीं भी हो सकते हैं, पत्रकारिता में भी

Sunil Negi himate marda mardade khuda

Sushovit Sinha नए चश्मे से दुनिया बेहतर दिखेगी सर!

Rakesh Punj चश्मा सुंदर है। आप सेहतमंद रहें ईश्वर से ये दुआ है।

Santosh Singh उन लोगो को खोजा कैसे जाए

मुकुन्द हरि शुक्ल तनिक अपनी कुंडली की ग्रहदशा की विवेचना भी कर लीजिएगा।

Sadique Zaman हम सब साथ हैं दादा, लड़ेंगे

Virendra Rai लल्लनटाप बाटई

Madhvendra Kumar चश्मा आपका टूटा दिल उन दोनों का,शानदार है ये वाला चश्मा।

Narendera Kumar गजबे लुक है

Dinker Srivastava चेहरे पे एक सबक चढ़ा हुआ दिख रहा और क्या…

Ashok Aggarwal चश्में के साथ साथ हौसला भी बढिया है ।

Sudhendu Patel आपही की तरह पारदर्शी गुरू .

Dilip Clerk इंकलाब जिन्दाबाद …धन्य है आप

Rahul Chouksey चश्मा बहाना है। नज़र और नज़रिया वही रहेगा।

Syed Shakeel आप और आपका चश्मा दोनों बिंदास है दादा

Hemant Shukla … पर सच की मसाल तो जलती रहेगी … बहुत सुंदर विचार ।

Kuldeep Singh Gyani दुवाओं के दूत के साथ साथ आप युवाओं के दूत भी हैं…

Sambhrant Mishra ये चश्मा तो और जोरदार है।

Nitesh Tripathi नया चस्मा स्मार्ट बना रहा है और

Pawan Kumar Upreti शानदार चश्मा। ताकतवर व्यक्तित्व

Manoj Anuragi अच्छा है सावधान रहो

Arshad Ali Khan आप जैसे क्रांतिकारी पत्रकार के लिए यह आम बात है….

Govind Badone आपके होंसले को सलाम

Farhan Quraishi कलम में बहुत ताकत है

Nurul Islam गजब सर, ख़्याल रखिए अपना

Mahendra Singh दूसरे गांधी बनने के रास्ते पर है आप

Veernarayan Mudagl पत्रकार जगत में जलवा कायम है सर आपका

Pramod Singh सलाम है यशवंत भाई! आपके बड़प्पन को.

Vindhya Singh भइया ! तनी उन्हन लोगन के फोटू शेयर कइल जा, के हवे जानलअ जरूरी बा… बड़का भूपति बनता लोग
Yashwant Singh आप लोग ही खोजिए। मैं इन इग्नोर किए जाने लायक लोगों पर टाइम नहीं खर्च करता। ये काम भड़ास के साथियों पर छोड़ता हूं।

Sharvan Panchal अच्छा लग रहा ह ,,,,,,,आप ऐसे धूर्त लोगो के लिए पत्रकार जैसा शब्द क्यू इस्तेमाल करते ह सर
Yashwant Singh ‘कथित पत्रकार’ लिखा हूं भाई

Vipin Shrivastava ये चश्मा पहले से ज्यादा साफ दिख रहा है , यकीनन वो जितने चश्में तोड़ेंगे , नए चश्में और बेहतर क्वालिटी के क्लियर होते जाएंगे

Man Mohan Singh Achche ensan pe sab achcha lagta hai !

Avinash Singh आपके निर्भीकता और आपके व्यक्तित्व को सलाम, आपकी लेखनी , निडरता, और व्यक्तिव से बहुत कुछ सीखने को मिलता है ,

Syed Quasim चश्मा 40 + होने यानी लौंडियाहुज जो हमारे रुदौली में बचपन को कहते हैं खत्म होने की निशानी है.. इसी लिए तो मुस्कुरा कर मार देते हैं बड़े से बड़े दुश्मन को

Pawan Dubey हे क़लम के पुजारी आपकी बेबाक़ और निर्भीक अभिव्यक्ति को प्रणाम। क्षमा बड़े साहस का आभूषण है। आप को कमज़ोर लोग कमज़ोर नही कर पाएँगे।

Om Prakash Pathak आप स्वस्थ्य हो गए उसके लिए भगवान का शुक्रिया। ऐसे कमजोर लोग हमेशा टकराएंगे यह भी सही है। ऐसे चश्मा अच्छा लगा।

Shishubh Bhargava जय हो, क्रिज़ोल है या थोड़ा सामान्य कुछ भी हो आखिर आँखों पर चस्मा लगाए थोड़ी न बैठे लड़ते रहिये यशवंत जी सत्य आपके साथ है

कुंदन वत्स अब मारक बदला लीजिये

Humaira Zafar Allah aapko salamat rakhe.Aameen

Chandan Sharma चश्मा का तो ठीक है लेकिन एक नया संकल्प दिख रहा है। बनाये रखिये। 🙂

Rajendra Mishra सच साहस सरोकार! जय हो

यशवंत पर हमला करने वालों की ये है तस्वीर… याद रखें, ध्यान रखें…

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

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दो बददिमाग और विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा यशवंत पर हमले के बाद हमारी बिरादरी को सांप क्यों सूंघ गया?

Padampati Sharma : क्या किसी पत्रकार के समर्थन में मोमबत्ती दिखाने या विरोध ज्ञापित करने के लिए उसका वामपंथी या प्रगतिशील होना जरूरी है? यदि ऐसा नहीं है तो सिर्फ पत्रकार हित के लिए दिन रात एक करने वाले यशवंत सिंह पर दो बददिमाग मानसिक रूप से विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा किये गए हमले पर हमारी बिरादरी को क्यों सांप सूंघ गया? यशवंत के बहाने पत्रकारों की आवाज दबाने का कुत्सित प्रयास करने वाले की मैं घोर निंदा करता हूं.

सच तो यह है कि उन अपराधियों के अंत्राशय पर इतने प्रहार किए जाते कि वे महीनों न सो पाते और न बैठ पाते. मगर हम जिस बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं वहां कलम ही तलवार है और मेरी ओर से सजा यही कि अगर वे दोनो शख्स मेरी फ्रेंड लिस्ट में हुए तो न सिर्फ उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दूंगा वरन ब्लाक भी करूंगा. यशवंत! डटे रहना भाई. आ गया है सोशल मीडिया का दौर. मुख्य धारा के मीडिया का यही हाल जारी रहा तो उसकी दुकान बंद होने में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा. तब यशवंत जैसे जाबांज पत्रकारों का ही वर्चस्व होगा. जुझारू पत्रकार Yashwant Singh पर हमले की निंदा करता हूँ। शायद कुछ लोग शर्म से सर झुका सकें।

(कई अखबारों और न्यूज चैनलों में खेल संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा की एफबी वॉल से.)

फेसबुक पर आईं कुछ अन्य प्रमुख प्रतिक्रियाएं यूं हैं…

Surendra Pratap Singh : जिस दिन यशवंत पर हमले वाली घटना घटित हुई थी उसी दिन किसी ने इस पर पोस्ट लगाई थी लेकिन किसी पत्रकार ने कोई नोटिस नहीं लिया… और, तभी लंकेश वाली वारदात हुई और लंका में लगी आग मचा हाहाकार… सभी पत्रकार बंधु अपनी अपनी बाल्टी का पानी लेकर उधर ही दौड़ लगाने लगे… फिर क्या, यशवंत जी समाचारों से गायब। धन्य हो।

Sarvesh Singh : पिछले दिनों भड़ास 4मीडिया के संपादक Yashwant Singh सर पर हमला हुआ।हमला किसी और ने नहीं बल्कि पत्रकारिता को कलंकित करने वाले दो दिमागी दिवालियों ने किया। उस हमले से जुड़ा एक वीडियो यशवंत सर ने फेसबुक पर साझा किया। इसमें उन्होंने साफ तौर पर उन दोनों को माफ़ करने की बात कही। पीत पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और सरकार की गोद में झूलने वाले मीडिया समूह की काली करतूतों को देश के सामने निष्पक्षता और निडरता से रखने वाले यशवंत सर के प्रति मेरे मन में अनन्त सम्मान बढ़ गया है। उन्होंने उन पर हमला करने वालों को माफ किया। और कुछ ऐसी बातों का जिक्र किया जो मेरे मानस पटल पर सदैव सदैव के लिए अंकित हो गया।

ये हैं दोनों हमलावर…

यशवंत ने भूपेंद्र सिंह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी को माफ करते हुए कहा कि “मेरे पास कलम की ताकत है सच्चे पत्रकार के लिए कलम ही सब कुछ है।कलम ही तोप होती है, कलम ही बंदूक होती है, बशर्ते उसे कलम का इस्तेमाल करने आता हो”।”प्रकृति न्याय करती है। हम कौन होते हैं न्याय करने वाले”। आपके इस वाले वीडियो को देखकर आपकी बातों को सुनकर मैं बहुत भावुक हुआ। बड़ी आसानी से आपने उन दोनों सनकी और तथाकथित पत्रकारों को माफ कर दिया। शायद यह आप जैसा बड़े और महान व्यक्तित्व वाला ही कर सकता है। एक बात तो तय है कि उन दोनों पागलों का न्याय प्रकृति ही करेगी।आप के सच्चे व निडर व्यक्तित्व का मैं हमेशा से कायल रहा हूं। पर आप की सहजता, सहनशीलता, विशाल हृदयता वाले आपके इस महान व्यक्तित्व को मैं हजार बार सलाम करता हूं। और, हां सर! चश्मा तो निर्जीव वस्तु है वह टूटेगा भी और जुड़ेगा भी। पर आप के अदम्य साहस, बेबाक सच्चाई, साफगोई को भूपेंद्र सिंह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी जैसे हजारों आसूरी प्रवृत्ति के लोग कभी दबा नहीं पाएंगे।

Dhananjay Singh : ”थोड़ा मारने दो इसे,बहुत खबरें छापता है” कहते हुए दिल्ली के प्रेस क्लब में भड़ास वाले Yashwant भाई को दो पत्रकारों ने ही पीट दिया…. जाहिर है इस घटना के गवाह भी कई एक रहे ही होंगे… निर्भीक पत्रकारिता पर खुद पत्रकारों की तरफ से हुए इस हमले की मैं निंदा करता हूँ….खम्भों की यह लड़ाई निंदनीय है… आप भी छापिये न भाई… असहमति है तो किसी को पीट देंगे? ऐसे ही कमजोर पलों में निहायत ही कमजोर लोग पिस्टल भी निकाल लेते हैं और परिणाम अत्यंत भयानक होता है… आशा है देश की राजधानी के प्रेस क्लब में हुई इस घटना के विरोध में तमाम एक्टिविस्ट्स से लगायत प्रधानमंत्री भी संज्ञान लेंगे.. ऐसी हरकत निंदनीय है, अभी निंदा करिए, सिर्फ देखिए और इंतजार करिए की रणनीति पर न चलिए…

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ सकते हैं….

 

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यशवंत किसी विचारधारा-गिरोहबाजी के आधार पर किसी को रियायत नहीं देते, इसलिए गिरोहबाजों ने चुप्पी साध रखी है!

Vivek Satya Mitram : प्रेस क्लब में हाल ही में जमा हुए पत्रकारों! इस मामले पर कहां जुटान है? इसका भी खुलासा हो जाए। वैसे भी ये हमला तो प्रेस क्लब के बाहर ही हुआ। एक वरिष्ठ पत्रकार पर कुछ ‘गुंडा छाप’ पत्रकारों द्वारा। फिर भी ना तो प्रेस क्लब के पदाधिकारियों को फर्क पड़ा ना ही साथी पत्रकारों को। Yashwant Singh को करीब से जानने वाले जानते होंगे कि वो पिछले एक दशक से गौरी जैसी ही निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं। महज़ इसलिए कि वो इस हमले में ज़िंदा बच गए, पत्रकारों को उनके लिए न्याय नहीं चाहिए?

वाह रे क्रांतिकारी पत्रकारगण! अबे खुलके कहो ना कि तुम गौरी के लिए नहीं, किसी पत्रकार के लिए नहीं, किसी दमन के ख़िलाफ़ नहीं, राजनीति करने के लिए जमा हुए थे। और, यशवंत जैसा पत्रकार जो किसी को भी विचारधारा और गिरोहबाजी के आधार पर कोई रियायत नहीं देता उस पर हमला तुम्हारे लिए कोई महत्व नहीं रखता। सुनो, तुम्हारे सेलेक्टिव, दिखावे की क्रांति लोग समझते हैं, इसलिए सोशल मीडिया पर अपनी एक ख़ास किस्म की ब्रांडिंग करते हुए ये भी याद रखा करो कि लोग कभी तो हिसाब मांग सकते हैं तुम्हारे ढ़ोंग का। बाई द वे, मैं जानता हूं तुम पत्रकार नहीं हो!

(आजतक समेत कई न्यूज चैनलों में कार्यरत रहे और अब एक सफल उद्यमी के तौर पर स्थापित विवेक सत्य मित्रम की एफबी वॉल से.)

Praveen Jha : पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश कौन सा है? मैं टुकड़ों में ‘विश्व मीडीया विमर्श’ नामक किताब पढ़ता रहा हूँ, जिसमें पूरे विश्व के अलग-अलग देशों की मीडिया पर लिखा है। स्कैंडिनैविया के सभी देश सालों से ‘प्रेस फ्रीडम’ में टॉप 5 पर हैं। यहाँ कोई पत्रकार कभी मारा-पीटा अब तक नहीं गया। कई रिपोर्ट के अनुसार ईरीट्रिया और चीन में पत्रकारों की हालत खस्ता है। तुर्की और रूस पर भी इल्जाम लगते रहे हैं। पर वो अलोकतांत्रिक देश है।

एक लोकतंत्र में पत्रकार अमूमन सुरक्षित होता है। पर पिछले साल की CPJ की रिपोर्ट पढ़ रहा था, उसमें पत्रकारों के लिए विश्व के दस सबसे खतरनाक (डेडलिएस्ट) देशों में भारत का भी नाम है। यह पढ़ कर अजीब लगा। यह अकेला लोकतांत्रिक देश है जहाँ पत्रकारों पर हमला हो रहा है, और मृत्यु भी होती है। एक और अजीब बात है कि यह मामले अन्य हत्याओं की अपेक्षा ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। छिट-पुट मार-पीट तो दब ही जाते हैं। कई बार आपस में सुलझ जाते हैं, या ‘पार्ट ऑफ जॉब’ मान लिया जाता है।

यह कैसा ‘पार्ट ऑफ जॉब’ है? डॉक्टर पिट रहे हैं, पत्रकार पिट रहे हैं, और नेता वगैरा तो खैर पिटते ही रहे हैं। पार्ट ऑफ जॉब? मैं जब-जब इन रिपोर्ट को गलत मानता हूँ, किसी पत्रकार पर हिंसा की खबर आ जाती है। वजह जो भी हो, हिंसा को आप कैसे सही मान सकते हैं? कलम का जवाब कलम से ही दिया जा सकता है। हम रूस या चीन नहीं हैं, और कभी होंगें भी नहीं। मित्र Yashwant Singh जी पर हुए हमले के पोस्ट कुछ दिनों से देख रहा हूँ। हत्याओं पर तो काफी कुछ लिखा ही जा चुका। यह बात गले से उतर ही नहीं रही कि हमारा देश कभी पत्रकारों के लिए खतरनाक देशों में गिना जाएगा। बल्कि भारत प्रेस स्वतंत्रता के शिखर पर पहुँचे, यही कामना है।

(नार्वे में मेडिकल फील्ड में कार्यरत और सोशल मीडिया पर अपने लेखन के कारण चर्चित प्रवीण झा की एफबी वॉल से.)

प्रवीण श्रीवास्तव : कहीं किसी से सुना था कि … यशवंत सिंह जब वाराणसी संस्करण से प्रकाशित एक बड़े अखबार में थे.. उनका बाघा बॉर्डर जाना हुआ… लौटे तो “निगाहों- निगाहों में होती हैं बातें” नामक शीर्षक की ख़बर लिख डाली… कि दोनों देशों के सैनिक कैसे करते हैं बातें … उस यात्रा वृतांत में क्या था ये तो हमें नही पता… लेकिन जिसने ये बात छेड़ी थी उसके बातों से लग रहा था कि उस वृतांत के शब्दों ने कई पत्रकारों को हिला दिया था। लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि हम भी बाघा बॉर्डर घूम आये लेकिन ऐसा भी लिखा जा सकता है दिमाग में क्यों नही आया। फिर क्या था लोग जलते गए… कारवां शिखर की तरफ बढ़ता गया… गाजीपुर का वह युवा यशवंत सिंह भड़ासी बन गया…
फिर क्या था.. संघर्षों और जीवन के उतार चढ़ाव ने भड़ासी बाबा की कलम मजबूत कर दी।

ये तो होना ही था… एक रोल मॉडल तैयार हो गया पत्रकारिता के छात्रों के लिए .. हम भी उन्हीं छात्रों में से थे… 2010 की बात है… हम पत्रकार बनने की लालसा लिए भोपाल पहुंचे… माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया.. वहां पहुंचने के बाद भड़ासी बाबा यशवंत सिंह के बारे में पता चला… हमें पूर्वांचल के होने के नाते इतना पता था कि पत्रकार होना अपने आप में भौकाली होता है…. उसपर भौकालियों की भौकाल पर नकेल कसने वाला इंसान कितना भौकाली होगा… वहीं से यशवंत सिंह से मिलने की लालसा जगी… खुशी तो तब और बढ़ गयी जब पता चला यशवंत जी हमारे पड़ोसी जिले गाजीपुर के हैं…. तमन्ना पूरी हुई कुछ सालों बाद गाज़ीपुर में पत्रकारों के एक कार्यक्रम में यशवंत जी मुख्य अतिथि थे… उनके साथ पिछले दिनों हुए वाकये के बाद भी उनकी उदार सोच ने युवा पत्रकारों में फिर से ऊर्जा भरी…

इस एक छोटी सी कथा को उन्होंने चरितार्थ किया.. कथा यूं है… “एक ब्राह्मण हर रोज मंदिर की 50 सीढियां चढ़कर पूजन को जाते थे… जैसे ही वह 25वीं सीढ़ी पर पहुंचते एक बिच्छु उन्हें डंक मार देता और वह उसे उठाकर किनारे रख देते और मंदिर में चले जाते, हर रोज ऐसा ही होता, लोगों ने एक दिन उनसे कहा बाबा आपको वो बिच्छु हर रोज काटता है और आप उसे मारने के बाजाय किनारे क्यों रख देते हैं.. इसपर ब्राह्मण ने जवाब दिया ” वो अपना धर्म निभा रहा है और मैं अपना” बिच्छु का धर्म है काटना सो वो मुझे काटता है…

(पूर्वी उत्तर प्रदेश के युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार प्रवीण श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

भड़ास संपादक यशवंत पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला करने वाले ये दो हमलावर हैं.. इन्हें जान लीजिए, पहचान लीजिए…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें….

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