जियो का जलवा खत्म, कछुवा स्पीड प्रदाता मुकेश अंबानी पर नकेल कौन कसे?

Ashwini Kumar Srivastava : तकरीबन साल भर पहले मुकेश अम्बानी के झांसे में मैं भी आ गया था और न सिर्फ अपने मोबाइल में बल्कि घर में भी जियो फाई इस्तेमाल करने लगा था। लेकिन वह दिन है और आज का दिन, तबसे मैं लगातार इंटरनेट की कछुवा स्पीड और डाटा बेहद तेज रफ्तार से हवा होने यानी खत्म होने की पहेली नहीं सुलझा पाया हूँ।
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मोदी सरकार अब ऑनलाइन मीडिया पर लगाम लगाएगी, कमेटी गठित

फेक न्यूज पर पत्रकारों की मान्यता रद्द करने संबंधी नियम बनाने के ऐलान के बाद मचे हो हंगामे से बैकफुट पर आई मोदी सरकार ने अब आनलाइन मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने की घोषणा कर दी है. इसके लिए बाकायदे कमेटी तक गठित कर दी गई है. इस कमेटी में टीवी, प्रिंट, प्रेस काउंसिल के प्रतिनिधियों के अलावा बाकी सब केंद्र सरकार के मंत्रालयों के सचिव हैं. Continue reading

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इन्टरनेट के इस दौर में कलमकार भूखा नहीं मरेगा

Naved Shikoh : अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं… RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में बड़े अखबारों को छोड़कर किसी अन्य को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा! यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं।

जुमलेबाजी की जादूगरी से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने का हुनर रखने वाले कलमकारों की मांग बढ़ गयी है। प्रत्याशियों को प्रचारित करते हुए कलमकारों का हुनर मुफ्त के प्लेटफार्म सोशल मीडिया पर मुखरित होगा। पत्रकार खबर इन्टरव्यू/फर्जी सर्वै/फीचर का हुनर दिखायेगा। कवि-शायर तुकबंदी के जादू से पैसा कमा सकेगा। लेकिन पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन मृत्यु शय्या पर पड़े इनके रोजगार की संजीवनी साबित होगा।

देशभर के ज्यादातर अखबारों के बंद हो जाने के पूरे आसार है। बेरोजगारी के खतरों के बीच पत्रकार सोशल मीडिया पर पेड न्यूज में अपनी रोजी-रोटी तलाशने लगा है। इन्टरनेट का जदीद दौर पुराने दौर में भी लिए जा रहा है जहां कलमकार का दर्जा किसी अखबार के मालिक से ऊंचा होता था। लेकिन आज लाइजनिंग, सियासत और मीडिया संचालकों के मोहताज होते जा रहे थे कलमकार। वक्त ने करवट ले ली है। इन्टरनेट (सोशल मीडिया /वेबसाइट) के जरिए कलमकार अब किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा। जिसमें लिखने की कला है वो बेरोजगारी की इस आंधी में भी भूखा नहीं रहेगा। एक हाथ से लिखेगा और दूसरे हाथ से पैसा लेगा।

-नवेद शिकोह
पत्रकार, लखनऊ
9918223245

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देशबन्धु अखबार ले आया अपना इंटरनेट टीवी- DB LIVE

देशबन्धु समाचार पत्र समूह अपने ऑनलाइन नेटवर्क में विस्तार कर रहा है। इसके तहत इंटरनेट टेलीविजन को लांच किया गया है। DB LIVE के नाम से शुरू किए गए इस ऑनलाइन टीवी को इन्टरनेट के हर प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराया जा रहा है। YouTube, Facebook, Twitter, व्हाट्सएप्प  तथा अन्य सोशल मीडिया नेटवर्क के अलावा DB LIVE वेबसाइट और ऐप्प के जरिए भी उपलब्ध है।

इस विषय में देशबन्धु के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने बताया कि आज जब लगभग हर हाथ में मोबाइल है और उसमें इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है तो पूरी दुनिया आपकी मुट्ठी में है। आप जब चाहें देश दुनिया अथवा अपने प्रदेश यहाँ तक कि अपने गाँव और मोहल्ले की ख़बरों को मोबाइल फ़ोन के जरिये पा सकते हैं और पढ़ सकते हैं। स्मार्ट फ़ोन ने वीडियो मैसेज को भी आसान कर दिया है। व्हाट्सप्प, फेसबुक और ट्वीटर के द्वारा आप वीडियो मैसेज पा रहे हैं। कुछ टीवी चैनलों ने भी अपने कार्यक्रमों को इंटरनेट के द्वारा प्रसारित करना शुरू कर दिया है। घरों के सामान्य टीवी सेट्स अब स्मार्ट टीवी में परिवर्तित हो रहे हैं। युवा अपनी पढाई का काम लैपटॉप के जरिये कर रहे हैं, जिसमे इंटरनेट की सुविधा है।

मतलब साफ़ है कि आने वाला वक़्त इंटरनेट का है। आज ज्यादा से ज्यादा लोग इंटरनेट की तीव्र गति अर्थात 4G का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके द्वारा आप बिना रुकावट अत्यधिक वीडियो सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं। अगर आज फ़ास्ट नेटवर्क उपलब्ध है तो क्यों न हम न्यूज़ चैनल को इंटरनेट के द्वारा ही देखें, जहाँ स्थान और समय की कोई सीमा नहीं होगी। आप दुनिया के किसी भी कोने में है और अगर इंटरनेट से जुड़े हैं तो इंटरनेट टीवी का मज़ा ले सकते हैं- इसी कल्पना को साकार करता है- DB LIVE यानी देशबन्धु लाइव.

अपनी तैयारियों के बारे में श्री श्रीवास्तव ने आगे  बताया कि लाइव स्ट्रीमिंग के द्वारा ज्यादा से ज्यादा ख़बरों और वैचारिक पहलुओं को लोगों तक पहुँचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। देशभर में पहले से कार्यरत देशबन्धु समूह के संवाददाताओं को इस नए माध्यम के लिए तकनीकी तौर पर तैयार किया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकारों का एक समूह DB LIVE के पैनल के रूप में काम कर रहा है। ज्ञात हो कि देशबन्धु अखबार विगत 58 वर्षों से मध्य और उत्तर भारत का अग्रणी अखबार है। ग्रामीण तथा विकासपरक पत्रकारिता के लिए देशबन्धु समूह को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

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मोदी सरकार ने वेबसाइट को विज्ञापन देने के लिए नीति तैयार की

नई दिल्‍ली: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने वेबसाइटों पर विज्ञापन के लिए एजेंसियों को सूचीबद्ध करने एवं दर तय करने की खातिर दिशानिर्देश और मानदंड तैयार किए हैं ताकि सरकार की ऑनलाइन पहुंच को कारगर बनाया जा सके। एक बयान में यहां कहा गया कि दिशानिर्देशों का उद्देश्य सरकारी विज्ञापनों को रणनीतिक रूप से हर महीने सर्वाधिक विशिष्ट उपयोगकर्ताओं वाले वेबसाइटों पर डालकर उनकी दृश्यता बढ़ाना है। नियमों के अनुसार, विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) सूचीबद्ध करने के लिए भारत में निगमित कंपनियों के स्वामित्व एवं संचालन वाले वेबसाइटों के नाम पर विचार करेगा।

हालांकि विदेशी कंपनियों के स्वामित्व वाली वेबसाइट को इस स्थिति में सूचीबद्ध किया जाएगा कि उन कंपनियों का शाखा कार्यालय भारत में कम से कम एक साल से पंजीकृत हो एवं संचालन कर रहा हो। नीति के तहत डीएवीपी के पास सूचीबद्ध होने के लिए वेबसाइटों के लिए तय नियमों में हर महीने उनके विशिष्ट उपयोगकर्ताओं की जानकारी देना शामिल है, जिसकी गहराई से जांच की जाएगी और भारत में वेबसाइट ट्रैफिक की निगरानी करने वाले किसी अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त तीसरे पक्ष से सत्यापित कराया जाएगा।

नीति के तहत वेबसाइट डीएवीपी द्वारा ऑनलाइन बिलिंग से संबंधित महत्वपूर्ण रिपोर्ट उपलब्ध कराने के लिए काम पर रखे गए किसी तीसरे पक्ष एड सर्वर (3-पीएएस) के जरिए सरकारी विज्ञापन दिखाएगा। इस तरह के हर वेबसाइट के विशिष्ट उपयोगकर्ताओं के आंकड़े की हर साल अप्रैल के पहले महीने में समीक्षा की जाएगी।

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सर्वे : अखबारों के लिए खतरे की घंटी, युवा सबसे ज्यादा वेबसाइट्स से हासिल करते हैं देश दुनिया के समाचार

आज के समय में यंगर्स्ट्स के लिए न्यूज जानने का सबसे बड़ा स्रोत न्यूज वेबसाइट्स है। एक सर्वे से ये पता चला है कि न्यूज के जरिए देश-विदेश की जानकारी रखने के लिए लोग सबसे अधिक न्यूज वेबसाइट्स का रुख करते हैं। इस मामले में न्यूज पेपर दूसरे और न्यूज एप तीसरे नंबर पर आते है। जबकि फेसबुक इंस्टेंट आर्टिकलस चौथे व टीवी न्यूज चैनल पांचवे नंबर पर आते है।

सर्वे में ये बात सामने आई है कि यंग रीडर्स में न्यूजपेपर फिर भी अच्छे रैंक पर हैं, परंतु टीवी इस उम्र के लोगों पर अपनी पकड़ खो रहा है। वहीं, फेसबुक इंस्टेंट आर्टिकल इसलिए यूथ में अपनी जगह बनाए हुए हैं, क्योंकि इसके पीछे काफी हद तक गूगल न्यूज का हाथ है। हालांकि, हम ट्विटर को कोई न्यूज सोर्स नहीं मानते, लेकिन सर्वे में ये बात सामेन आई है कि 20 प्रतिशत लोग ऐसे भी हैं, जो ट्विटर के जरिए न्यूज पढ़ते हैं।

आपकी न्यूज का स्रोत क्या है
न्यूज वेबसाइट्स 22 प्रतिशत
गूगल न्यूज 6.7 प्रतिशत
न्यूज एप्स 17.8 प्रतिशत
फेसबुक इंस्टेंट आर्टिकल 14.8 प्रतिशत
टीवी न्यूज चैनलस 11.2 प्रतिशत
न्यूज पेपर्स 18.9 प्रतिशत
अन्य 8.6 प्रतिशत

सर्वे के मुताबिक, सबसे ज्यादा लगभग 44.8 प्रतिशत लोग खबरों के लिए मोबाइल फोन का यूज करते हैं। लेपटॉप पर 32 प्रतिशत, टीवी पर 16.7 प्रतिशत। जबकि टेबलेट और अन्य पर ये संख्या बेहद कम है। सर्वे के मुताबिक, 75.6 प्रतिशत लोग दिन के समय खबरें पढऩा पसंद करते हैं, जबकि 24.4 प्रतिशत लोगों का कहना है कि उन्हें सुबह के समय खबरें पढऩा पसंद है। 73.5 प्रतिशत लोग न्यूज पेपर पढऩा पसंद करते है, जबकि 26.5 प्रतिशत लोगों को न्यूज पेपर पढऩे में बिल्कुल भी रूचि नहीं है। इनमें से 51.1 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे हैडलाइन के बाद पूरी खबर पढऩे में रूचि रखते हैं, जबकि 47.1 प्रतिशत लोग सिर्फ हैडलाइन पढऩे तक ही सीमित हैं। सर्वे के मुताबिक, ज्यादातर यूथ नेशनल लेवल की खबरें पढऩा पसंद करती है। इसके बाद उन्हें इंटरनेशनल और राजनीति से संबंधित खबरें पसंद आती है। इनमें ज्यादातर की सबसे कम रूचि बिजनस में है। हालांकि, लोकल न्यूज मनोरंजन, खेल व टेक्लॉलजी का आंकड़ा फिर भी बेहतर है।

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पनामा पेपर्स की तरह कहीं आपके कारोबार का भी आनलाइन कच्चा चिट्ठा लीक न हो जाए, जानें सुरक्षा के उपाय

पनामा पेपर्स के लीक को लेकर बवाल मचा हुआ है. छोटे बड़े देशों के वीआईपी लपेटे में आ चुके हैं. दरअसल ये मोजाक फोंसेका कंपनी के कारोबार से जुड़े दस्तावेजों का लीक है. इन दस्तावेजों में कंपनी के पिछले 30+ सालों के कारोबार का कच्चा चिठ्ठा मौजूद है. कंपनी के मैनेजमेंट का कहना है कि उसके डाटा को बाहर के व्यक्तियों द्वारा चुराया गया है. उनका मानना है कि संभवतः किसी ने उनके सर्वर्स पर मौजूद जानकारी को चुराया है. तो हम कह सकते हैं कि ये मामला हैकिंग से जुड़ा हो सकता है. सालों पहले विकीलीक्स में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. उन्होंने किस किस देश से कितना डाटा चुराया या प्राप्त किया, ये आज तक पता लगाया जा रहा है.

कुल मिलाकर यदि आप कोई ऐसा व्यवसाय करते हैं जिसमें गोपनीय जानकारी को संजोया जाता है, तो आपको चिंतित होने की जरूरत है. आपको अपने कंप्यूटर की सुरक्षा की चिंता अवश्य करनी चाहिए, पर अपने व्यावसायिक डाटा जो कि सर्वर्स पर सेव होता है, उसके लिए अधिक चिंतित होने की आवश्यकता है. आइये जानते हैं कुछ ऐसे उपायों के बारे में जिससे आपको अपने व्यावसायिक डाटा को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी.

भरोसेमंद आईटी सेटअप
जो भी व्यक्ति या कंपनी आपके सर्वर्स और आईटी सेटअप को मैनेज करता है, उसको अच्छे से जांचें. उन्होंने आपके डाटा की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किये हैं? हैकिंग से बचने के लिए क्या किया है? कुछ गड़बड़ होने पर फटाफट उसको ठीक करने की काबिलियत उनके पास है या नहीं?

सुरक्षित सॉफ्टवेयर का प्रयोग
इन्टरनेट पर प्रतिदिन सैकड़ों वायरस अवतरित होते हैं, और लगभग सभी का उपचार भी ढूंढ लिया जाता है. ये उपचार आपके पास सॉफ्टवेर अपडेट के रूप में आता है. जब भी आप कोई सॉफ्टवेर अपडेट करते हैं, उसमें कई अपडेट सुरक्षा को बढ़ाने के लिए भी होते हैं. तो अपने सर्वर का सॉफ्टवेर अपडेटेड रखिये, आपको हैकिंग या लीक से बचने में मदद मिलेगी.

डाटा रिकवरी प्रणाली का प्रयोग
आपके पोर्टल या कॉर्पोरेट इंट्रानेट पर जब कोई हैकर हमला करता है तो कई बार आपके डाटा के साथ छेड़छाड़ भी हो सकती है. इसलिए आपके कॉर्पोरेट सर्वर्स का डिजास्टर रिकवरी सेटअप अत्यंत आवश्यक है. यदि आपके पास रिकवरी सिस्टम है तो बहुत जल्दी किसी भी ऑनलाइन हमले से निपटने में मदद मिलेगी.

डाटा एन्क्रिप्शन का प्रयोग
कॉर्पोरेट सर्वर्स से डाटा का आदान-प्रदान करते समय अत्यंत आवश्यक है कि आपका डाटा सुरक्षित रूप से तारों में (over the network) प्रवाहित हो. नेटवर्क में प्लग इन करके डाटा की चोरी सरलता से संभव है. इससे बचने के लिए मुख्य रूप से VPN (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) और SSL सर्टिफिकेट को अवश्य अपनाएं.

कुल मिलाकर आपकी कंपनी का डाटा आपकी जिम्मेदारी है. आपके ग्राहकों ने आप पर भरोसा करके आपको जानकारी दी है, अब ये आपका कर्त्तव्य है सारी आवश्यक सावधानियां अपनाएं और अपना कॉर्पोरेट डाटा सुरक्षित रखें.

लेखक दिवाकर सिंह नोएडा की कंपनी Qtriangle Infotech Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. वेबसाइट डेवलपमेंट, मोबाइल एप्लीकेशन डेवलपमेंट और ई-कॉमर्स पोर्टल डेवलपमेंट का काम करते कराते हैं. साथ ही साथ भड़ास4मीडिया डाट काम के तकनीकी सलाहकार भी हैं. अगर आपको इनसे कुछ जानना-समझना, पूछना-जांचना या सलाह लेना-देना हो तो इनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.

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स्मार्टफोन यूजर्स बिना इंटरनेट ही डीडी के दर्जन भर से ज्यादा चैनल देख सकेंगे

अब आप अपने मोबाइल फोन पर बिना इंटरनेट खर्च किए फ्री में टीवी देख सकेंगे। यह सुविधा दूरदर्शन ने स्मार्टफोन के बढ़ते क्रेज और यूजर्स की बढ़ती संख्या को देखते हुए देने का फैसला किया है। दूरदर्शन की ये सर्विस निशुल्क होगी। स्मार्ट फ़ोन यूज़र्स के लिए शुरू की गई यह सर्विस दिल्ली, मुबंई, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, पटना, रांची, गुवाहाटी, जालंधर, रायपुर, इंदौर, भोपाल, औरंगाबाद, बेंगलुरु, अहमदाबाद आदि शहरों के लिए है।

दूरदर्शन द्वारा दी जा रही इस सर्विस के चलते डीडी के लगभग सारे प्रसिद्ध चैनल जैसे डीडी नैशनल, डीडी न्यूज, डीडी भारती, डीडी स्पोर्टस, डीडी क्षेत्रीय और डीडी किसान आदि चैनल देखे जा सकेंगे। उम्मीद लगाई जा रही है कि जल्द ही दूरदर्शन इसमें और भी चैनल्स की संख्या बढ़ा सकता है। इस सर्विस का लाभ उठाने के लिए एक डीवीबी-टी2 डोंगल की ज़रुरत पड़ेगी। डीवीबी-टी2 डोंगल द्वारा आप ओटीजी केबल वाले मोबाइल फोन या टैबलट पर टीवी देख सकते हैं। इस सर्विस को यूज करने के लिए डोंगल में एक एंड्रॉयड एप डाउनलोड करनी होगा। उसके बाद गूगल प्ले स्टोर से टीवी-ऑन-गो (ओटीजी) दूरदर्शन एप डाउनलोड करना होगा। बता दें प्रसार भारती ने बिना इंटरनेट टीवी दिखाने के लिए ऑन-द-गो सर्विस के साथ ही डिजिटल विडियो ब्रॉडकास्टिंग डिवाइस (डीवीबी टी2) को भी लॉन्च किया है। इस डिवाइस की क्षमता 40 एमबीपीएस तक है।

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एनबीटी आनलाइन को ट्रेनी, कापी एडिटर और सीनियर कापी एडिटर की जरूरत

टाइम्स समूह के अखबार नवभारत टाइम्स के डिजिटल विंग एनबीटी आनलाइन को ट्रेनीज, कापी एडिटर और सीनियर कापी एडिटर चाहिए. हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद और सोशल मीडिया पर पकड़ होनी चाहिए. सीनियर कापी एडिटर के लिए 4 से छह साल का अनुभव चाहिए. कापी एडिटर के लिए 2 से चार साल. ट्रेनी के लिए किसी अनुभव की जरूरत नहीं. ग्रेजुएशन और जर्नलिज्म या मास कम्युनिकेशन में डिग्री या डिप्लोमा वालों को हर पद पर वरीयता दी जाएगी. सभी नियुक्तियां फिल्म सिटी, नोएडा आफिस के लिए हैं.

रेज्युमे nbtonline@timesinternet.in पर भेजें. सब्जेक्ट लाइन में NBT- Trainee या NBT- Copy Editor या NBT- Senior Copy Editor लिखकर भेजें. रेज्युमे के साथ पांच सौ से सात सौ शब्दों में अपनी पसंद के किसी एक विषय पर टिप्पणी भी लिख भेजें. टिप्पणी मंगल फांट में हों और इनस्क्रिप्ट की बोर्ड का इस्तेमाल करके लिखी गई हो. इस टिप्पणी के आधार पर शार्टलिस्ट किए गए प्रत्याशियों को लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा. रेज्युमे और टिप्पणी 11 अप्रैल रात 12 बजे तक एनबीटी डिजीटल को आनलाइन मिल जाना चाहिए.

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वेबसाइट और एप्प की तकनीकी दुनिया : बहुत कठिन है डगर पनघट की…

आजकल इन्टरनेट का ज़माना है. जिसे देखो वो वेबसाइट खोल रहा है. एप्प लांच कर रहा है. बड़ी और कारपोरेट कंपनियों की बात अलग रखिए जिनके पास खूब पैसा है और वो मार्केट के ब्रेस्ट ब्रेन और बेस्ट टेक कंपनी को अपने पोर्टल व एप्प के लिए हायर करते हैं. मैं बात कर रहा हूं उन साथियों की जो कम पूंजी में वेबसाइट, एप्प आदि लांच तो कर देते हैं लेकिन उनके टेक्निकल सपोर्टर ऐसे नहीं होते जो एक लेवल के बाद वेंचर को नई उंचाई पर ले जा सकें. वेबसाइट बना देना, चला देना बिलकुल अलग बात है. इसे मेनटेन रखना, इसे हैक से बचाना, इसे ज्यादा ट्रैफिक के दौरान संयत रखना, इसे लगातार सर्च इंजन फ्रेंडली बनाए रखना, इसे मजबूत सर्वर से जोड़े रखना दूसरी बात होती है.

इन्टरनेट की सबसे बड़ी खूबी ये है कि कोई भी फेसबुकिया अपने आप को इन्टरनेट का एक्सपर्ट मानता है. ठीक वैसे ही जैसे कि इंडिया का मैच होने पर वे खुद सबसे बड़े क्रिकेट एक्सपर्ट बन जाते हैं. आज मैं इस मुद्दे पर प्रकाश डालना चाहता हूँ कि कैसे आजकल लोग ऑनलाइन और इन्टरनेट के नाम पर ठग लिए जाते हैं. हरेक सर्विस की तरह इन्टरनेट की सर्विस के भी दो पहलू हैं. एक है सर्विस देने वाला और दूसरा सर्विस लेने वाला. दोनों मिलकर कैसी खीचम-खांच मचाते हैं और अपने आप को सर्वज्ञानी मानते हुए खुद बेवकूफ बन जाते हैं वो बता रहा हूँ.  अपन इसी धंधे में हैं तो थोडा बहुत जानते हैं. इसलिए पढ़ते चले जाइये, मज़ा आएगा.

सेवा प्रदाता द्वारा बेवकूफ बनाना

कोई भी बिज़नस अच्छे से करने के लिए आपको कुशलता और बुद्धि की आवश्यकता होती है. आजकल इन्टरनेट और ऑनलाइन सर्विस देने वाले एक-दो लडकों को भर्ती करके धंधा शुरू कर देते हैं. ठीक भी है, इस धंधे में कोई दुकान नहीं चाहिए, कोई कच्चा माल नहीं चाहिए. बस अपना कंप्यूटर लेकर बैठ जाइये. दुकान चालू. पर ये इतना आसान नहीं. इन्टरनेट के व्यवसाय में तमाम तरह की समस्याओं को रोजाना सुलझाना होता है. आप लम्बी रेस के घोड़े तभी बनेंगे जब आपके पास थोडा ज्ञान भी हो.

ग्राहकों को लूटना

ज्ञान न होने पर भी आप ग्राहक को भारी भरकम बिल तो थमा ही सकते है. एक उदाहरण से समझाता हूँ कि कैसे. चाय बेचने वाला दो तरह का होता है. एक स्टेशन पर चाय बेचने वाला और दूसरा आपके पड़ोस में चाय बेचने वाला. स्टेशन वाला आपको रेगुलर कस्टमर नहीं मानता. आपने उससे आज चाय ली है तो ज़रूरी नहीं कल भी लें. पर पड़ोस वाला आपको एक ग्राहक के रूप में अधिक सम्मान देता है. वो इसलिए कि कल को आप फिर से उसके पास आयेंगे. वो आपको बेवकूफ नहीं बनाएगा. यही सब हमारी इंडस्ट्री में भी है. अधिकतर वेबसाइट डेवलपर स्टेशन के चाय वाले हैं. पैसा लूटा और फिर राम राम. उनको आपसे दोबारा पैसा लेने की जरूरत नहीं क्योंकि उनका काम है रोज नए शिकार फंसाना. विडम्बना ये की आप ऐसे सेवा प्रदाता को तभी पहचानते हैं जब वो आपको चूना लगा चुका होता है.

अनुभवी स्टाफ की कमी

इन्टरनेट के व्यवसाय में तमाम तरह के अनुभव की आवश्यकता होती है. ग्राहक की ज़रूरत को टेक्नोलॉजी में ढालना आसान नहीं है. हाथी बनाते-बनाते भैंस बन जाती है, अगर अनुभव न हो. सर्वर को संभालना आसान नहीं. हज़ारों अलग-अलग किस्म की समस्याएं आती हैं, जिनका समाधान अनुभव से ही आता है. अधिकतर वेबसाइट सर्विस प्रदाता अनुभवी स्टाफ के बिना ही धकापेल ग्राहकों की सेवा में जुटे हुए हैं. राम बचाएं इनसे.

ग्राहकों द्वारा खुद का बेवकूफ बनाना

सेवा देने वाले ही गलत काम करते हैं, ऐसा भी नहीं. सेवा लेने वाले भी खुद का बेवकूफ बनाते रहते हैं. कैसे ये देखिये: अपने आप को सर्वज्ञानी मानना… जब सेवा देने वाला सर्वज्ञानी नहीं तो आप एक ग्राहक होते हुए सर्वज्ञानी नहीं हो सकते, अगर आप खुद इस टेक्नोलॉजी पर काम न कर चुके हों. पर मित्रों यही तो समस्या है. हमारे यहाँ हम अलिफ़ बे पे ते सीखकर अपने आपको अरबी घोडा समझने लगते हैं. मेरे अनुभव से लगभग 30 प्रतिशत ग्राहक इस बीमारी से ग्रसित हैं. वो ये नहीं जानते कि अगर आप सेवा प्रदाता पर भरोसा करके उसका काम उसको शांति से करने दें, और अपनी विद्वता की बत्ती बनाकर अपने पास रखे रहें, तो आप कहीं बेहतर सेवा पा सकते हैं बशर्ते सेवा देने वाला इस फील्ड का हो व थोड़ा बहुत ज्ञान रखता हो.

ज़रूरत से ज्यादा मोलभाव करना

आजकल एक नया चलन चल गया है. एक ग्राहक वेबसाइट या मोबाइल एप्प बनाने के लिए २० कम्पनीज से कोटेशन मांगेगा. रद्दी कंपनी ५ रुपये, ठीक ठाक कंपनी २० रुपये और धांसू लगने वाली कंपनी ५० रुपये का कोटेशन देगी. अब भाई साहब ५० वाली कंपनी के पास जायेंगे और बोलेंगे कि हमारे पास सारे कोटेशन २ रुपये से ४ रुपये के बीच में है. आप इत्ता पैसे काहे मांग रहे हो? अब बेचारा ५० रुपये वाला रो पीटकर ३०-३५ तक आता है, पर अंत में ग्राहक ५ वाले से १ रुपये में काम करवाता है और बेवकूफश्री बनता है, क्योंकि १ रुपये में वो काम हो ही नहीं सकता था.

कम पैसे में और ज्यादा, और ज्यादा की चाहत

जब वेबसाइट या एप्प का प्रोजेक्ट शुरू होता है तो सेवा लेने वाला और देना वाला दोनो मिलकर जो भी काम होता है उसकी डिटेलिंग करते हैं. पर कुछ अति उत्साही और अत्यंत स्मार्ट ग्राहक तय किये हुए काम से १० गुना काम चाहते हैं. आपको कुछ न कुछ नया बताते रहेंगे, बिना ये सोचे कि पैसा उस काम का लिया गया है जो पहले फाइनल हुआ था. सो काम करते करते बेचारा डेवलपर फ्रस्टिया जाता है और ग्राहक श्री फिर भी संतुष्ट नहीं हो पाते.

सम्मान नहीं देना

मेरे कुछ ग्राहक हैं जो बहुत ऊंची पढाई करके आये हैं, बड़े बिजनेसमैन भी हैं. लन्दन में होते हैं तो सड़क पर थूकते भी नहीं, पर यहाँ केले का छिलका फेंकने के लिए उनको सड़क ही सबसे मुफीद जगह नज़र आती है. उसी तरह से, वहां एक बढई को ४ घंटे के १०० यूरो दे देंगे, पर भारतीय इंजीनियर को ८ घंटे के हजार रुपये भी देने को तैयार नहीं. ऊपर से उनको जी साहब जी साहब करके न चाटो तो बहुत दुखी होंगे. ऐसे लोगों को ये नहीं पता कि भारतीय टैलेंट का थोड़ा सम्मान करेंगे तो बंदा उन्हें क्या क्या काम करके नहीं दे सकता.

…जारी…

लेखक दिवाकर सिंह नोएडा की कंपनी Qtriangle Infotech Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. वेबसाइट डेवलपमेंट, मोबाइल एप्लीकेशन डेवलपमेंट और ई-कॉमर्स पोर्टल डेवलपमेंट का काम करते कराते हैं. साथ ही साथ भड़ास4मीडिया डाट काम के तकनीकी सलाहकार भी हैं. अगर आपको इनसे कुछ जानना-समझना, पूछना-जांचना या सलाह लेना-देना हो तो इनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.

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हिंदी न्यूज वेबसाइटों पर अब ऐसी खबरें भी छपने लगीं : ”शिवपाल के बेटे की शादी में दि पंजाब बैंड बजाएगा गाना”

Yashwant Singh : एक वेबसाइट है. ‘तहलका न्यूज’ नाम से. इस पर एक खबर की हेडिंग है : ”शिवपाल के बेटे की शादी में दि पंजाब बैंड बजाएगा गाना”. इस साइट पर यूपी के अखिलेश सरकार का एक विज्ञापन भी लगा है. सुना है इसे लखनऊ के एक ‘महान’ पत्रकार चलाते/चलवाते हैं. ये भी संभव है कि इस साइट के संपादक जी यानि संचालक जी इस वक्त इटावा की तरफ हों और इसी बैंड के किसी गाने में ‘शामिल बाजा’ माफिक डोल डाल कर रहे हों. 🙂

अरे भई संपादक जी, कम से कम ‘तहलका’ शब्द का तो मान रख लिया होता. चलिए अब ये भी बता दीजिए एक नई खबर डाल कर कि आपकी शादी में कौन सा बैंड बजा था और आपने किस कंपनी का सफारी सूट पहना हुआ था. 🙂

टीवी अखबारों के खिलाफ हम लोग तो खूब लिखते बोलते हैं, लेकिन अपने बीच के साथियों के कामकाज की भी खबर लेते रहने की जरूरत है. वैसे जो ट्रेंड चल पड़ा है उससे लग रहा है कि हिंदी न्यूज चैनलों और हिंदी अखबारों की तरह हिंदी न्यूज वेबसाइटें भी दलाली, विज्ञापन व तेलहाई के चक्कर में गंधा जाएंगी.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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हम जीत गए, फेसबुक हार गया

Rahul Pandey : हम जीत गए, फेसबुक हार गया। आज सोमवार को ट्राई ने फेसबुक और रि‍लायंस को उसकी औकात बताते हुए हम लोगों की नेट न्‍यूट्रैलि‍टी की पैरोकारी को वि‍जयी बनाया है। अब फेसबुक अपने यहां फ्री बेसि‍क्‍स का फर्जीवाड़ा नहीं कर पाएगा। ट्राई ने साफ कहा है कि सर्विस प्रोवाइडर अलग-अलग कंटेंट के लिए डिफरेंट टैरिफ नहीं ले पाएंगे। आज ही इसका नोटिफि‍केशन जारी कि‍या गया है जो अभी से ही सारी टेलीकॉम कंपनि‍यों पर लागू है। न माना तो हर दि‍न पचास हजार रुपये जुर्माना भी देना पड़ेगा और ट्राई उस कंपनी का टैरि‍फ वापस भी ले लेगा।

इतना ही नहीं, कुछ कंपनि‍यां ऐसी हैं जो कहती फि‍रती हैं कि उनका कनेक्‍शन लि‍या तो फेसबुक या ट्वि‍टर फ्री में चलाने को मि‍लेगा, उनपर भी तुरंत रोक लगा दी गई है। अगर कोई कंपनी ऐसा कहती मि‍ले या दि‍खे तो तुरंत ट्राई को उसकी वेबसाइट पर जाकर मैसेज करें, उस कंपनी की वाट लगा दी जाएगी। सबसे ज्‍यादा नज़र रखने की जरूरत है रि‍लायंस पर क्‍योंकि ये कंपनी इतनी बेहया है कि बगैर कि‍सी की इजाजत के ये सारा भ्रष्‍टाचार ये पि‍छले साल अक्‍टूबर से ही कर रही है।

हम नेट न्‍यूट्रैलि‍टी चाहने वाले तकरीबन 6 लाख लोग थे जि‍नने ट्राई को फेसबुक और रि‍लायंस के गठजोड़ से होने वाले महाभ्रष्‍टाचार पर रोक लगाने के लि‍ए अपने अपने तर्क रखे थे। अब ये दीगर बात है कि फर्जीवाड़े से फेसबुक ने अपने 32 लाख लोगों को बरगलाया और फ्री बेसि‍क्‍स के समर्थन में ट्राई को मेल कराया। फि‍र भी हमने हि‍म्‍मत नहीं हारी और लगातार इस फर्जीवाड़े के बारे में बताते रहे, लड़ते रहे। आने वाले कुछ दि‍नों के लि‍ए ही सही, लेकि‍न हम जीत गए। अब देश में सबको समान दर पर इंटरनेट यूज करने को मि‍लेगा। सभी वेबसाइट्स समान दर पर ही खुलेंगी। बधाई।

पत्रकार राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से. राहुल पांडेय ने इस प्रकरण पर फेसबुक पर पूरी सीरिज चलाई थी, ‘फेसबुक के फ्रॉड’ शीर्षक से जिसे आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

फेसबुक के फ्रॉड

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पाकिस्तानी हैकरों ने भारत की कई हिंदी वेबसाइटों को बनाया निशाना

पाकिस्तानी हैकरों ने भारत की कई हिंदी वेबसाइटों को निशाना बनाया है. वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा द्वारा संचालित इंडिया संवाद और आज समाज अखबार की वेबसाइट आज किया आज समाज डाट कॉम को हैक कर इस पर पाकिस्तानी झंडा फहरा दिया. दीपक शर्मा ने फेसबुक पर खुद की चर्चित वेबसाइट हैक किए जाने की सूचना दी थी. उधर आज समाज की तरफ से भी इस बाबत एक खबर का प्रकाशन किया गया है. फिलहाल दोनों वेबसाइटों को पाकिस्तानी हैकरों के चंगुल से मुक्त करा लिया गया है. आज समाज की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर इस प्रकार है…

पाकिस्तानी हैकर्स ने किया आज समाज.कॉम पर हमला

अंबाला. पाकिस्तानी हैकर्स ने मंगलवार की शाम आज समाज की वेबसाइट को हैक कर लिया है. हैक करने के साथ यहां भारतीयों के लिए कई मैसेज छोड़े गए हैं. पाकिस्तान के समर्थन में मैसेज डालने के साथ-साथ हैकर्स ने आमिर खान को अपना हीरो करार देते हुए उन्हें सैल्यूट किया है. पाकिस्तानी हैकर्स काफी पहले से भारत की कई बड़ी और लोकप्रिय वेबसाइट पर लगातार हमला करते रहे हैं. यह पहला मौका है जब इन हैकर्स ने किसी मीडिया हाउस की वेबसाइट को हैक किया है. कुछ दिन पहले ही आज समाज की वेबसाइट को नए कलेवर और तेवर के साथ लांच किया गया था. यहां देश-विदेश की अपडेट खबरों के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली एनसीआर सहित चंडीगढ़ की अपडेट खबरें दी जाती है. चंद दिनों में ही आज समाज डॉटकॉम के व्यूवर्स की संख्या लाखों में पहुंच गई है. इसी बीच मंगलवार की शाम करीब साढ़े छह बजे सबसे पहले आज समाज डॉट कॉम पर हैकर्स ने हमला किया, पर सिक्योरिटी रिजन के कारण उन्हें यहां कामयाबी नहीं मिली. आज समाज वेबसाइट के ई-पेपर के सिक्योरिटी पासवर्ड को क्रैक करते हुए को पाकिस्तानी हैकर्स ने 6.45 में इसे हैक कर लिया.
 
पाकिस्तानी हैकर्स ने आज समाज वेबसाइट के ई-पेपर लिंक को हैक करते हुए यहां भारत और हिंदु विरोधी बातों को लिखा है. पाकिस्तान साइबर अटैकर्स के नाम से यह हैकर्स ग्रुप है जिन्होंने हैक्सलुक नाम से आज समाज की वेबसाइट को हैक किया है. खालिस्तान और कश्मीर की स्वतंत्रता की मांग करते हुए हैकर्स ने आमिर खान को अपना हीरो माना है.  अंत में लव पाकिस्तान, लव मुस्लिम, लव पाक आर्मी के नाम से मैसेज दिया गया है. हैकर्स ने पाकिस्तानी झंडे के साथ वेबसाइट को हैक किया है. आज समाज प्रबंधन ने चंडीगढ़ साइबर सेल सहित दिल्ली की साइबर क्राइम सेल को देर शाम इसकी सूचना दे दी है. पहली बार मीडिया पर हुए इस हमले ने मीडिया जगह को चौंका दिया है.

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‘समाचार फर्स्ट’ पोर्टल को जरूरत है 18 पत्रकारों की, करें आवेदन

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा से ‘समाचार फर्स्ट’ नाम का यह पोर्टल शुरू होने जा रहा है। अभी यह निर्माणाधीन है। ऐंड्रॉयड और iOS ऐप के साथ लोगों तक पहुंच बनाने के इरादे से इसे फरवरी के पहले हफ्ते में विधिवत लॉन्च किया जाएगा। इस पोर्टल का इरादा हिमाचल प्रदेश पर केंद्रित रहते हुए भारत और दुनिया की सभी जरूरी खबरों को लोगों तक पहुंचाना है।

खबरों के अलावा करियर, शिक्षा, रोजगार, नारी सशक्तीकरण और विकास जैसे कई अहम मुद्दों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए टेक्स्ट के अलावा विडियो कॉन्टेंट का भी सहारा लिया जाएगा। कई राष्ट्रीय अखबारों के ऑनलाइन पोर्टल में काम कर चुके वरिष्ठ वेब जर्नलिस्ट समाचार फर्स्ट के साथ जुड़े हैं। चूंकि यह पोर्टल हिमाचल प्रदेश से चलना है, इसलिए हिमाचल प्रदेश के युवा पत्रकारों को इसमें प्राथमिकता दी जाएगी। विभिन्न पदों के लिए आवेदन करने की विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:

पद.

1. कॉपी एडिटर- 8
2. सीनियर कॉपी एडिटर -4
3. चीफ कॉपी एडिटर- 2
4. न्यूज ऐंकर – 2
5. VT एडिटर -2

योग्यता:

1. मास कम्यूनिकेशन और जर्नलिजम की डिग्री/ डिप्लोमा धारकों के अलावा किसी भी विषय में ग्रैजुएट लोग भी आवेदन कर सकते हैं, बशर्ते उनकी हिंदी पर अच्छी पकड़ हो। इंग्लिश से हिंदी में अनुवाद करने की योग्यता भी होनी चाहिए।

2. फ्रेशर भी आवेदन कर सकते हैं। ऑनलाइन में काम कर चुके लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी।

3. हिंदी में टाइपिंग (Inscript/ mangal) करनी आनी चाहिए।

कैसे करें आवेदन:

1. ईमेल की सब्जेक्ट लाइन में लिखें: Samachar First
2. अपना अपडेटेड रेज्युमे अटैच करें।
3. अपनी पसंद के किसी भी विषय पर 1000 शब्दों में कोई लेख लिखकर भेजें। यह लेख सिर्फ इसलिए मंगवाया जा रहा है, ताकि लेख की भाषा देखकर स्क्रीनिंग की जाए।
4. ये सब चीज़ें inewsfirst@gmail.com पर मेल कर दें।
5. 15 जनवरी, 2016 तक मिले आवेदन ही स्वीकार किए जाएंगे।
6. लेख की स्क्रीनिंग के बाद चुने गए पत्रकारों की लिखित परीक्षा और इंटरव्यू लिए जाएंगे।
7. चुने गए पत्रकारों को ऑफर लेटर देकर नियुक्त किया जाएगा।
8. प्रोबेशन पीरियर 6 महीने का होगा, जिसे परफॉर्मेंस के बाद रिव्यू किया जाएगा।

ध्यान दें:

– पद और वेतन क्षमता और अनुभव के आधार पर ऑफर किए जाएंगे।
– पोर्टल का ऑफिस कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में होगा।
– सिर्फ डेस्क के लिए हायरिंग की जा रही है, रिपोर्टिंग के लिए बाद में आवेदन मंगवाए जाएंगे।

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फेसबुक के फ्रॉड 5 : जो वाकई में फ्री बेसि‍क्‍स है, वो फेसबुक के फ्री बेसि‍क्‍स में शामि‍ल नहीं है

Rahul Pandey : मैं सोच रहा हूं उस वक्‍त और उस वक्‍त के रि‍जल्‍ट्स के बारे में, जब भारत के आम चुनाव कब होने चाहि‍ए, कैसे होने चाहि‍ए और क्‍यों होने चाहि‍ए और उसका रि‍जल्‍ट क्‍या होना चाहि‍ए, फेसबुक इस बारे में हमारे यहां के हर मॉल, नुक्‍कड़ और सड़कों पर बड़ी बड़ी होर्डिंग्‍स लगाएगा। यकीन मानि‍ए, तब भी उसका यही कहना होगा कि वो जो कुछ कह रहा है, सही कह रहा है क्‍योंकि उसके पास भारत में पौने एक अरब यूजर्स हैं। मेरी मांग है कि मुझे कान के नीचे खींचकर एक जोरदार रहपटा लगाया जाए ताकि मैं इस तरह की वीभत्‍स और डरा देने वाली सोच से बाहर आ सकूं। मेरे देश के लोगों के अंग वि‍शेष पर उगे बाल बराबर भी नहीं है ये कंपनी और कि‍सी देश के बारे में ऐसा सोच रही है…एक्‍चुअली हम ही ढक्‍कन हैं और सिर्फ घंटा बजाने लायक हैं, अक्‍सर थामने लायक भी।

ये पौने एक से एक अरब लोग भी उसी धोखेबाजी का शि‍कार होंगे, जि‍स धोखेबाजी को यूज करके फेसबुक ने ट्राइ को 32 लाख लोगों से मैसेज भेजवा दि‍ए और जि‍नने ये मैसेज भेजे, उन्‍हें ये पता ही नहीं कि ये मैसेब भेजवाकर फेसबुक आखि‍र करना क्‍या चाहता है। इतना ही नहीं, लोगों से धोखे से ट्राइ को मैसेज भेजवाकर बाकायदा प्रचार भी कि‍या जा रहा है कि इतने लोगों ने मैसेज भेजे। ये तो वही बात हुई कि आपके फेसबुक पर कहीं कि‍सी कोने से नि‍कलकर एक बक्‍सा (पॉपअप) सामने आए जि‍समें ये लि‍खा हो कि आप वि‍कास चाहते हैं या वि‍नाश।

ठीक उसी तरह से जैसे अभी की धोखाधड़ी फेसबुक ने 32 लाख लोगों से की कि आप फ्री में नेट चाहते हैं या पैसे देकर? जाहि‍र है कि आप वि‍कास को ही वोट देंगे और जहां आपने वि‍कास को वोट दि‍या, वो वोट सीधे मोदी से कनेक्‍ट हो जाएगा कि भैया, वि‍कास तो पप्‍पा ही पैदा कर सकते हैं। या फि‍र उस पार्टी से, जो कम्‍युनि‍केशन के इस गड़बड़घोटाले का समर्थन करता हो। इंडि‍यल आइडि‍यल की तरह इंडि‍यन प्राइम मिनि‍स्‍टर के लि‍ए कुछ तय समय के लि‍ए लाइन खुलेंगी और इसी से हमारे इस महान लोकतंत्र की *** मारने के बाद नया प्रधानमंत्री पैदा होगा। (शब्‍दों के लि‍ए माफी, पर कभी तो गुस्‍सा नि‍कालने दीजि‍ए)

मि‍स्र की घटना के बाद फेसबुक की इस हवाई आकांक्षा को और बल मि‍ला है कि वो परि‍वर्तन ला सकता है लेकि‍न ईमानदारी से दि‍ल पर हाथ रखकर कोई मुझसे कनफेस करे कि मि‍स्र में क्‍या सच में फेसबुक की वजह से बदलाव आया? और इतना ही बदलाव पर यकीन था तो जि‍तना पि‍छड़ा अफ्रीका और भारत है, मि‍स्र उससे भी कहीं ज्‍यादा पि‍छड़ा और बदलाव का इंतजार कर रहा है, वहां क्‍यों नहीं पहले इस योजना को लॉन्‍च कि‍या गया। जाहि‍र है, पूंजी अपनी अंर्तव्‍यवस्‍थात्‍मक समाज में कहीं भी कोई बदलाव अगर देखना चाहती है तो वो चेतना तो कतई नहीं हो सकती है, अर्धचेतनात्‍मक नशा जरूर हो सकता है… फेसबुक और क्‍या है भाई लोग?

खुद को दलि‍तों का नया मसीहा, पि‍छड़ों का तार्किक भगवान और वंचि‍तों का वि‍ष्‍णु समझने वाले कह रहे हैं कि फेसबुकि‍या फ्रॉड फ्री बेसि‍क्‍स पर उन्‍हें फि‍र फि‍र सोचना पड़ेगा क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि ये एक बड़ी आबादी की आवाज बुलंद करने का माध्‍यम हो सकता है। अबे अंबेडकर के आठवें झूठे अवतार, एक बेसि‍क बात तुम्‍हरी समझ में आती है या नहीं कि फेसबुक की फ्री सौ साइट बनाम दूसरी फ्री करोड़ों साइट्स का मामला है। या फि‍र जो नासमझी तुमने जबरदस्‍ती जाति के नाम पर ओढ़ रखी है, कोई कहेगा भी तो हटाओगे नहीं कि तुमको जाति वि‍शेष का कुछ वि‍शेष फायदा मि‍लता है।

अबे इतनी भी बेसि‍क बात समझ में तुम्‍हारी नहीं आ रही है कि फ्री बेसि‍क्‍स के नाम पर कुछ भी फ्री नहीं है, अगर कुछ फ्री है तो वो तुम्‍हारा वक्‍त है जि‍से तुम समाज में कहीं कि‍तने कार्यक्रमों में लगा सकते थे, कि‍तनी बातें कर सकते थे, लेकि‍न वो सबकुछ करने का तुम्‍हारा सपना फेसबुक एक फ्री के अनफ्री मायाजाल में लपेटकर खत्‍म कर रहा है। अबे फैशनेबल दलि‍त बुद्धजीवी के बाल, कब समझोगे कि पूंजीवाद कतई नहीं चाहता कि तुम एकदूसरे के आमने सामने आकर बात करो।

इंटरनेट पर वायरल होने के लि‍ए गूगल के कीवर्ड से भ्रष्‍टाचार का सपना संजोने वाले, अबे शर्म तो तुमको पहले भी नहीं आती थी कि दलि‍त होने के नाते जो चाहो उल्‍टा सीधा बोल लो जो अत्‍याचार के बहाने बेशर्मी से जायज ठहराओ, लेकि‍न तकनीकी समझ तुममें तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है। खासकर जब तुम ये बोलते हो कि तुम देखेगो। अबे घंटापरसाद, मोटा मोटा भी तुम्‍हारी समझ में नहीं आता कि एक का समर्थन करने पर तुम्‍हरे हाथ से दूसरे करोड़ों प्‍लेटफॉर्म छीने जा रहे हैं? उनको यूज करने का अभी का समान रेट डि‍सबैलेंस कि‍या जाने की तैयारी है? ससुर तुम्‍हरी बुद्धी का भगवान बुद्ध भी ठीक ना कर पाएंगे।

अपने यहां ब्‍लाक स्‍तर तक इंटरनेट की कनेक्‍टि‍वि‍टी, उससे मि‍लने वाली लगभग सारी जरूरी सुवि‍धाएं जैसे लेखपाल का हाल, कंपटीशन रि‍जल्‍ट्स, वोटर सर्विस, बीएलओ, ईआरओ, वि‍धायक नि‍धि का हाल चाल, मनरेगा, ग्रामीण आवास योजनाएं, उद्योग बंधु, नि‍वेश मि‍त्र, ब्‍लड डोनर लि‍स्‍ट, टेंडर वगैरह का हाल चाल एनआइसी पहले ही मुहैया करा रही है। क्‍या वजह है कि इसमें से एक भी प्‍वाइंट फेसबुक की फ्री बेसि‍क योजना में नहीं है। एम्‍स और देश के वि‍भि‍न्‍न मेडि‍कल कॉलेज पि‍छले पांच साल से आपस में कनेक्‍ट होने की सफल टेस्‍टिंग कर रहे हैं, इसमें भी फेसबुक अपने फ्री बेसि‍क्‍स से कोई डेवलपमेंट नहीं करना चाहता। बुजुर्गों की पेंशन और छात्रों को जो स्‍कॉलरशि‍प मि‍लनी होती है, एनआइसी पहले से ही सारी जानकारी दे रहा है, लेकि‍न ये भी इस फ्रॉडि‍ए फेसबुक के फ्री बेसि‍क्‍स में नहीं है।

फेसबुक को समझना होगा कि ये साउथ एशि‍या है। चीन जापान से लेकर थाईलैंड, म्‍यामांर और भारत तक में गति में सुगति कछुए की मानी गई है जो गंत्‍व्‍य तक पहुंचाने की गारंटी है। और हमारी जि‍तनी औकात है, हम उतना कर रहे हैं। कम से कम पि‍छले पांच सालों में गावों से आने वाली सैकड़ों हजारों खबरों में लगातार आती एक खबर है कि सरकार गांव गांव में इंटरनेट की बेसि‍क सुवि‍धा मुहैया कराने के लि‍ए ट्रि‍पल पी योजना चला रही है और ये कैफे खुल भी रहे हैं। न सिर्फ खुले हैं बल्‍कि लोगों को इंटरनेट की बेसि‍क सुवि‍धा, जो हमारी खेती कि‍सानी, बैंकिंग से जुड़ी है, मुहैया करा रहे हैं। देश बड़ा है, काम करने वाले तनि‍क स्‍लो हैं, लेकि‍न ऐसा तो बि‍लकुल नहीं है कि काम नहीं हुआ है। कि‍सी भी जि‍ले के डीएम से बात कर लीजि‍ए, वो चुटकि‍यों में बता देगा कि अपने जि‍ले में उसने कि‍तने गावों में कंप्‍यूटर वि‍द इंटरनेट वि‍द ट्रेंड परसन फि‍ट कर दि‍ए हैं। फि‍टनेस के इस जमीनी काम का फेसबुक कहीं जि‍क्र भी जरूरी नहीं समझता।

सवाल उठता है कि क्‍यों? फ्री बेसिक्‍स में फेसबुक का कहना है कि वो सारी कमाई वि‍ज्ञापन के जरि‍ए करेगा। वि‍ज्ञापन बाजार का सीधा सा ट्रेंड है कि उनने वहीं पहुंचना है जहां उनका ग्राहक है। इसके अलावा उन्‍हें उनसे बाल बराबर भी मतलब नहीं, जो उनका ग्राहक नहीं है। ये ऊपर इंटरनेट से जुड़ी जि‍तनी चीजें बताई हैं, इन्‍हें प्रयोग करने वाले आज के बाजार के ग्राहक नहीं है। इन सारी योजनाओं से जि‍नका काम पड़ता है, उनका काम टोयेटा से लेकर नौकरी डॉट कॉम या फ्लि‍पकार्ट, डव शैंपू, जि‍लेट रेजर जैसी चीजों से आलमोस्‍ट नहीं ही पड़ता है। वो ईंट पर बैठकर दाढ़ी बनवाने वाले लोग हैं और बनाने वाले भी। यहां वि‍ज्ञापन का मार्केट नहीं है इसलि‍ए जो वाकई में फ्री बेसि‍क्‍स है, वो फ्रॉड फेसबुक के फ्री बेसि‍क्‍स में शामि‍ल नहीं है।

(जारी…)

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लेखक राहुल पांडेय प्रखर युवा पत्रकार और वेब एक्सपर्ट हैं. वे नेट न्यूट्रलिटी मुद्दे पर अपने फेसबुक वॉल पर सिरीज लिख रहे हैं. उनसे एफबी पर संपर्क https://www.facebook.com/bhoya के जरिए किया जा सकता है.

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फेसबुक के फ्रॉड 4 : तीन सबसे बड़ी लुटेरी कंपनियों एयरटेल, रि‍लायंस और वोडाफोन की फेसबुक से यारी के मायने

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फेसबुक के फ्रॉड 4 : तीन सबसे बड़ी लुटेरी कंपनियों एयरटेल, रि‍लायंस और वोडाफोन की फेसबुक से यारी के मायने

Rahul Pandey : अब इसका क्‍या करेंगे? देशभर में जि‍न तीन कंपनि‍यों के खि‍लाफ हम लोगों सहि‍त प्राइवेट कंपनि‍यों और सरकारी वि‍भागों ने सबसे ज्‍यादा शि‍कायत की है, वो एयरटेल, रि‍लायंस और वोडाफोन है। इनकी कहानी तो याद होगी। रि‍लायंस भारत में इस फ्री के फ्रॉड के साथ साझेदारी कर रहा है तो अफ्रीका में एयरटेल पहि‍लेन फेसबुक के साथ फ्रॉड इंटरनेट डॉट ओआरजी लॉन्‍च कर चुका है और यहां भी कि‍सी न कि‍सी तरह से (चाहे सरकार में पैसे खि‍लाकर लांबिंग हो) अपना हि‍स्‍सा बनाएगा। अगर फेसबुक फ्री बेसि‍क्‍स का फ्रॉड काम कर गया तो पड़े करते रहि‍ए इनके खि‍लाफ शि‍कायत, ये घंटा कुछ नहीं करने वाले। अभी भी कौन सा कुछ कर ही दे रहे हैं। कॉल ड्रॉप पर कोर्ट की कइयो फटकार के बावजूद क्‍या कॉल ड्रॉप होनी बंद हो गई?

अब जरा फ्री के माल की भी बात हो जाए। कि‍तने लोगों को याद होगा कि वोडाफोन ने दि‍वाली में एक एसएमएस करने पर 400 एमबी की स्‍कीम चलाई थी। एयरसेल का कनेक्‍शन लेने पे 65केबीपीएस की स्‍पीड पर तीन महीने के लि‍ए फ्री इंटरनेट एक्‍सेस मि‍लती है। फ्री की या बहुत कम पैसे में इंटरनेट की सुवि‍धा अभी भी मि‍ल रही है। वैसे फ्री का एक फंडा और है जो पिंटू पंडि‍त की कहानी से ज्‍यादा अच्‍छे से समझ में आएगा। गांव में रहने वाले पिंटू पंडि‍त ( Ajay Tiwari) को रीचार्ज महंगा पड़ता है और नए सिम पर मि‍लने वाली स्‍कीम का रीचार्ज सस्‍ता। तो वो हर रीचार्ज पर सिम बदल देते हैं। इंटरनेट वाली बात अभी उन्‍हें शायद पता नहीं है नहीं तो वो हर तीसरे महीने सि‍म बदलेंगे और साल में चार सिम बदलकर फ्री नेट यूज करेंगे।

इंटरनेट के इस यूज पर कंपनी कुछ नहीं कर सकती है क्‍योंकि उसे तो अपनी स्‍कीम चलानी है। सि‍म का रेट कि‍तना सस्‍ता होता है ये हम सभी जानते हैं। ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही नहीं है बल्‍कि बांग्‍लादेश, अफ्रीका सहि‍त बहुतेरे देशों में मोबाइल कंपनि‍यां इस तरह की स्‍कीम देती हैं। हमारे देश में इतना सबकुछ है तो फेसबुक स्‍पेशली अपनी टांग काहे अड़ा रहा है और फ्री के नाम का गोरखधंधा काहे कर रहा है। मार्क की नाक पर मक्‍खी की तरह जड़े नि‍खि‍ल भाई पूछते हैं कि चच्‍चा एक बात बताओ, फ्री बेसि‍क्‍स में सिर्फ सौ साइट ही काहे? बाकी सब का गुनाह कि‍ए रहे कि उनको नहीं देखा रहे हैं? सीधी बात है कि इंटरनेट फ्री होना है या नहीं होना है, ये मोबाइल कंपनि‍यों का काम है न कि फेसबुक का!

(जारी…)

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फेसबुक के फ्रॉड 5 : जो वाकई में फ्री बेसि‍क्‍स है, वो फेसबुक के फ्री बेसि‍क्‍स में शामि‍ल नहीं है

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फेसबुक के फ्रॉड 3 : भारतीयों को उल्‍लू बनाने के लिए एड कैंपेन पर सौ करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुका है फेसबुक

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फेसबुक के फ्रॉड 3 : भारतीयों को उल्‍लू बनाने के लिए एड कैंपेन पर सौ करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुका है फेसबुक

Rahul Pandey :  फेसबुक कह रहा है कि भारत में उसके बहुत ज्‍यादा यूजर्स हैं, इसलि‍ए फ्री बेसि‍क्‍स का अधि‍कार उसे मि‍लना चाहि‍ए। अंबानी अंकल का हाथ है तो पैसे की कोई कमी नहीं। फ्री बेसि‍क्‍स के लि‍ए फेसबुक ने भारत में जो एड कैंपेन चलाई, उस पर सौ करोड़ रुपये (सोर्स-द वायर) से भी ज्‍यादा खर्च कि‍या जा चुका है और अभी और भी खर्च होंगे। ये सारा का सारा पैसा भारतीयों को सिर्फ उल्‍लू बनाने के लि‍ए खर्च हो रहा है।

क्‍या इतनी सी बात कि‍सी को सोचने पर मजबूर नहीं करती कि आखि‍र वो कौन सा फ्री प्‍लेटफॉर्म होगा, जि‍सके वि‍ज्ञापन पर एक अरब रुपए से ज्‍यादा खर्च कर दि‍या गया है और जि‍सकी लाइन बनाने बि‍छाने में अरबों रुपए खर्च होंगे? और इतने खर्च के बाद वो कौन सा धर्म होगा, जि‍सके खाते में सारा पुण्‍य बटोरने की कोशि‍श की जा रही है? रही बात यूजर्स की तो कुछ कम ज्‍यादा के साथ देश में फेसबुक के तकरीबन 125 मि‍लि‍यन यूजर्स हैं जबकि गूगल के 354 मि‍लि‍यन। गूगल तो फ्री की मांग नहीं कर रहा।

जाहि‍र है कि ये हार्डकोर बि‍जनेस है। बड़ा बि‍जनेस प्‍लान है तो बड़ी पूंजी भी लगाई जा रही है। बड़े बि‍जनेस मैन भी इसमें अपनी टांग अड़ा रहे हैं। जानकारी के लि‍ए, दुनि‍याभर में इंटरनेट पर जि‍तनी भी कंपनि‍यां जि‍तने तरह का धंधा कर रही हैं, डाटा यूजेस के आधार पर उनका सारा धंधा पेड होते हुए भी फ्री है। सरल शब्‍दों में समझें कि जब हम गूगल खोलें या वि‍कीपीडि‍या, हम समान डाटा प्रयोग करते हैं और अपने प्रयोग के आधार पर उसके पैसे देते हैं। फेसबुक चाहता है कि ये डाटा का प्रयोग उसके लि‍ए फ्री हो और बाकी के लि‍ए पेड।

इस फ्री प्‍लेटफॉर्म पर फेसबुक दुनि‍या भर के वि‍ज्ञापन दि‍खाने जा रहा है। इन वि‍ज्ञापनों को देखना पूरी तरह से फ्री होगा क्‍योंकि डाटा डाउनलोडिंग का कोई चार्ज नहीं लगेगा। अगर कि‍सी ने भूले से भी इन वि‍ज्ञापनों पर क्‍लि‍क करके कुछ ज्‍यादा जानने की कोशि‍श की तो अंबानी अंकल का प्‍लान इस स्‍टेप के आगे काम करने वाला है। अंबानी चच्‍चा ने ट्राइ को जो प्‍लान दि‍या है, उसमें गूगल के अलग तो फ्लि‍पकार्ट के लि‍ए अलग डाटा यूजेस तो फलां के लि‍ए अलग तो ढि‍मके के लि‍ए अलग चार्ज करने वाले हैं। सुख की सांस लीजि‍ए कि ट्राइ ने इसे मना कर दि‍या है।

कुछ समझे? मने फ्री बेसि‍क्‍स के नाम पर बाकी सारी चीजों के डाटा यूजेस के रेट डि‍स्‍बैलेंस कि‍ए जाने वाले हैं।

(जारी…)

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लेखक राहुल पांडेय प्रखर युवा पत्रकार और वेब एक्सपर्ट हैं. वे नेट न्यूट्रलिटी मुद्दे पर अपने फेसबुक वॉल पर सिरीज लिख रहे हैं. उनसे एफबी पर संपर्क https://www.facebook.com/bhoya के जरिए किया जा सकता है.

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फेसबुक के फ्रॉड 4 : तीन सबसे बड़ी लुटेरी कंपनियों एयरटेल, रि‍लायंस और वोडाफोन की फेसबुक से यारी के मायने

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फेसबुक के फ्रॉड 2 : दलाली में हिस्सा पाने की लाइन में लगे बीबीसी, इंडि‍या टुडे, नेटवर्क 18, एक्‍यूवेदर, बिंग सहि‍त सौ से अधि‍क मीडि‍या हाउस

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फेसबुक के फ्रॉड 2 : दलाली में हिस्सा पाने की लाइन में लगे बीबीसी, इंडि‍या टुडे, नेटवर्क 18, एक्‍यूवेदर, बिंग सहि‍त सौ से अधि‍क मीडि‍या हाउस

Rahul Pandey : आखि‍र क्‍या बात है जो मेनस्‍ट्रीम मीडि‍या फेसबुक के इस कदम का खुलकर वि‍रोध नहीं कर पा रहा है। जो मेरी समझ में आ रहा है, उसमें दो बातें हैं। एक तो मेनस्‍ट्रीम मीडि‍या की समझदानी इंटरनेट को लेकर अभी बहुत ही कमजोर है। कई डि‍जि‍टल कॉन्‍फ्रेंसों में मैने मेनस्‍ट्रीम के लोगों को सुपर बेवकूफी के सवाल पूछते पाया, मसलन फेसबुक के लाइक कैसे बढ़ते हैं या खबर लोग कैसे शेयर करते हैं। दसूरी ये कि मीडि‍या मालि‍क पहले भी चुपचाप दलाली कि‍या करते थे और इस बार भी इस बड़ी दलाली में हि‍स्‍सा पाने का ख्‍़वाब देख रहे हैं। वैसे चिंता की कोई बात नहीं है, फेसबुक ज्‍यादा बड़ा वाला है, वो खुद से जुड़ रहे मीडि‍यावालों को कोई इनकम नहीं देने वाला।

पहले ये जान लें कि देश से कौन कौन फेसबुक के इस धोखे के साथ जुड़ चुका है। फेसबुक के मुताबि‍क बीबीसी, इंडि‍या टुडे, नेटवर्क 18, एक्‍यूवेदर, बिंग सहि‍त सौ से अधि‍क मीडि‍या हाउस इससे उस लालच में जुड़े हैं जो उन्‍हें पक्‍का लंबलेट करने वाला है। फ्री बेसि‍क्‍स के नाम पर जो पाइपलाइन बनेगी, उसमें इन सब मीडि‍या हाउसों को अपना कंटेंट डालने की सुवि‍धा दी जाएगी। अभी जि‍स तरह से फेसबुक कि‍सी भी चीज को प्रमोट करने के लि‍ए पैसे ले रहा है, वो वहां भी बदस्‍तूर जारी रहेगा।

कंटेंट के साथ हर मीडि‍या हाउस अपनी साइट का लिंक डालेगा क्‍योंकि यूजर को साइट पर आमंत्रि‍त करना ही सोशल मीडि‍या का मूल व्‍यवसायि‍क उद्देश्‍य है, लेकि‍न यूजर फ्री के चक्‍कर में उसपर क्‍लि‍क ही नहीं करने वाला। (अभी भी नहीं करता है) यूजर अगर उस लि‍ंक्‍स पर क्‍लि‍क करेगा तो उसे उस साइट पर जाने के लि‍ए डाटा डाउनलोडिंग के पैसे देने होंगे। उसपर जो वि‍ज्ञापन चलेंगे, उसका होलसोल राइट फेसबुक और रि‍लायंस के पास ही है, एफबी ये पहले ही स्‍पष्‍ट कर चुका है।

अब जरा देखते हैं कि फ्री के नाम पर क्‍या फ्री नहीं हुआ। गूगल, यूट्यूब( अमेजॉन, फ्लि‍पकार्ट, याहू, लिंक्‍डइन, ट्वि‍टर, एचडीएफसी, आइसीआइसीआइ, पेटीएम, ईबे, आइआरसीटीसी, रेडिफ, स्‍नैपडील, एनएसई, बीएसई जैसी सैकड़ों चीजें हैं जि‍न्‍हें इंटरनेट यूज करने वालाा आम यूज रोजाना यूज करता है, ये फ्री नहीं होने वाली। इतना ही नहीं, सरकार की कोई भी साइट फि‍र चाहे वो चकबंदी की हो या जनसंख्‍या की या वाहन चोरी कराने की ऑनलाइन रि‍पोर्ट कराने की, इस जैसी सैकड़ों सुवि‍धाएं भी फ्री नहीं होने वाली हैं।

(जारी…)

Recently Facebook attempted to rebrand the evil its internet.org under the cover of support for the Digital India campaign and now it is doing the same in name of Free Basics. To know why free basics is an old wine in a new bottle have a look at AIB’s latest video. Save the internet and respond to TRAI now.

लेखक राहुल पांडेय प्रखर युवा पत्रकार और वेब एक्सपर्ट हैं. वे नेट न्यूट्रलिटी मुद्दे पर अपने फेसबुक वॉल पर सिरीज लिख रहे हैं. उनसे एफबी पर संपर्क https://www.facebook.com/bhoya के जरिए किया जा सकता है.

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फेसबुक के फ्रॉड 3 : भारतीयों को उल्‍लू बनाने के लिए एड कैंपेन पर सौ करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुका है फेसबुक

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फेसबुक के फ्रॉड 1 : मार्क जुकरबर्ग अब तक भारत के 32 लाख लोगों को धोखा दे चुके हैं!

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फेसबुक के फ्रॉड 1 : मार्क जुकरबर्ग अब तक भारत के 32 लाख लोगों को धोखा दे चुके हैं!

Rahul Pandey : बराबरी का एक ही मतलब होता है दस नहीं। कान के नीचे खींच के रहपट धरे जाने का काम कर रहे फेसबुक के मालि‍क मार्क ज़करबर्ग से पूछेंगे तो वो सत्‍तर और मतलब बता देंगे कि बराबरी ये भी होती है, वो भी होती है और जो कुछ भी वाया फेसबुक हो, वही होती है। बराबरी के सत्‍तर गैर-बराबर कुतर्क जि‍से वो फ्री बेसि‍क्‍स का नाम देकर हम पर थोपना चाह रहे हैं, उसके लि‍ए वो हर कि‍सी के बराबर से इतना गि‍र गए हैं कि उन्‍हें नीच कहना नीचता को मुंह चि‍ढ़ाना होगा।

मार्क अब तक भारत के 32 लाख लोगों को धोखा दे चुके हैं। धोखा ऐसे कि उन्‍होंने 32 लाख फेसबुक यूजर्स के सामने फ्री बेसि‍क्‍स का पॉपअप जबरदस्‍ती दि‍खाया। हर चीज फ्री में चाहने के अंधे हम लोग उसपर क्‍लि‍क करते गए। ये हमने जानने की कोशि‍श ही नहीं की कि फ्री में हमें ये चीजें कैसे मि‍लेंगी और जो चीजें फ्री में मि‍लेंगी, वो कैसी होंगी। वैसे भी बछि‍या भले बांझ हो, लेकि‍न दान में मि‍लती है तो घंटा कोई उसका दांत गि‍नेगा।

ट्राइ ने फ्री बेसि‍क्‍स के पॉपअप पर रोक लगाई, बोला कि बंद करो ये लंतरानी, ये यहां काम नहीं आनी। उसके बावजूद ये अभी तक कायम है, जि‍सपर कानूनी कार्रवाई बनती है, करेगा कौन ये सामने आना बाकी है। रोक के बाद मार्क ने इसे सड़क की लड़ाई बना हजारों बोर्डिंग्‍स लगा दि‍ए, करोड़ों रुपए वि‍ज्ञापन में बहा दि‍ए। 32 लाख लोगों को उल्‍लू बनाने के बाद जब लोगों ने वि‍रोध करना शुरू कि‍या तो मार्क कहते हैं कि ये बात उनकी समझदानी से बाहर है कि लोग वि‍रोध क्‍यों कर रहे हैं।

अगर भारत में कुछ फ्री होना ही है तो वो जो पहले से ही इंटरनेट पर मौजूद है, जैसे सरकार से जुड़े सभी वि‍भागों की साइट न कि फेसबुक। स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा से जुड़े सारे सरकारी एप्‍स फ्री होने हैं न कि फेसबुक का एप। माना कि हम भारतीय बहुत बड़े वाले बकचोद हैं लेकि‍न इतने भी नहीं कि हमेशा यही कि‍या करें और सिर्फ फेसबुक पर ही कि‍या करें।

(जारी…)

Recently Facebook attempted to rebrand the evil its internet.org under the cover of support for the Digital India campaign and now it is doing the same in name of Free Basics. To know why free basics is an old wine in a new bottle have a look at AIB’s latest video. Save the internet and respond to TRAI now.

लेखक राहुल पांडेय प्रखर युवा पत्रकार और वेब एक्सपर्ट हैं. वे नेट न्यूट्रलिटी मुद्दे पर अपने फेसबुक वॉल पर सिरीज लिख रहे हैं. उनसे एफबी पर संपर्क https://www.facebook.com/bhoya के जरिए किया जा सकता है.

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फेसबुक के फ्रॉड 2 : दलाली में हिस्सा पाने की लाइन में लगे बीबीसी, इंडि‍या टुडे, नेटवर्क 18, एक्‍यूवेदर, बिंग सहि‍त सौ से अधि‍क मीडि‍या हाउस

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नेट न्यूट्रलिटी जरूरी… ताकि इंटरनेट का विस्तार न बाधित हो और इस पर बड़ी कंपनियों का एकाधिकार न स्थापित हो

नेट न्यूट्रलिटी यानी बिना किसी अवरोध के अपनी इच्छा से इंटरनेट का उपभोग करने की स्वतंत्रता का मुद्दा एक बार फिर बहस में है. भारतीय टेलीकॉम नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) ने इस साल दूसरी दफे लोगों से इस मसले पर राय मांगी है. नेट न्यूट्रलिटी के विवाद के एक सिरे पर सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक और कुछ इंटरनेट सेवा प्रदाता हैं तथा दूसरे सिरे पर इंटरनेट के इस्तेमाल की मौजूदा स्थिति को बरकरार रखने की मांग करते उपभोक्ता और कार्यकर्ता. फेसबुक और उसके साथ खड़े सेवा प्रदाताओं का कहना है कि वे बेसिक इंटरनेट सेवा के माध्यम से जरूरी साइटें और सेवाएं उन लोगों तक मुफ्त या कम शुल्क में पहुंचाना चाहते हैं, जो अभी तक इसका उपभोग नहीं कर पा रहे हैं या फिर सीमित रूप में करते हैं.

लेकिन नेट न्यूट्रलिटी के पक्षधर इन दावों को खारिज करते हुए कहते हैं कि इससे एक तो नेट महंगा हो जायेगा और इससे जुड़ी सेवाओं पर कुछ कंपनियों और साइटों का वर्चस्व स्थापित हो जायेगा. मौजूदा स्थिति में उपभोक्ता को सेवा प्रदाता को एक निर्धारित शुल्क देने के बाद किसी भी उपलब्ध साइट पर जाने का विकल्प होता है. लेकिन फेसबुक और सेवा प्रदाताओं की बात मान लेने के बाद ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि मुफ्त सेवा के घाटे को पूरा करने के लिए वे अन्य सेवाओं को महंगा कर दें तथा लोगों को खास सेवा प्रदाता और साइटों के पास जाने के लिए मजबूर कर दें. इसके लागू हो जाने के बाद धनी साइटें और सेवा प्रदाता आर्थिक रूप से कमजोर साइटों या सेवा प्रदाताओं के लिए कठिन परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं.

इसका नकारात्मक असर स्टार्ट अप, नये उद्यमियों और छोटी साइटों को भुगतना पड़ेगा. उपभोक्ताओं को वही साइटें सस्ती दरों पर उपलब्ध होंगी, जिन्हें फेसबुक और उसके साथी सेवा प्रदाता तय करेंगे. अन्य साइटों के लिए उन्हें अलग से और अधिक शुल्क देना होगा. इस वर्ष के पूर्वार्द्ध में अमेरिका में भारी विरोध के कारण इस तरह के प्रयासों की अनुमति नहीं दी गयी थी. भारत में भी कुछ महीने पहले कुछ सेवा प्रदाताओं और साइटों की अलग-अलग इंटरनेट आपूर्ति मार्ग बनाने की कोशिश विफल रही थी. केंद्र सरकार का कहना है कि वह ट्राइ की राय के बाद ही कोई फैसला लेगी, पर कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ढुलमुल रवैया अपना रही है. उम्मीद है कि सरकार और ट्राइ नेट सेवाओं से जुड़ी मुश्किलों के समाधान को प्राथमिकता देते हुए उपभोक्ताओं के व्यापक हित में निर्णय करेगी, ताकि न तो देश में इंटरनेट का विस्तार बाधित हो और न ही इस पर बड़ी कंपनियों का एकाधिकार स्थापित हो.

(‘प्रभात खबर’ अखबार में प्रकाशित संपादकीय)

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क्या गूगल, क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या फेसबुक… आप सबके लिए मोहरे हैं…

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क्या गूगल, क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या फेसबुक… आप सबके लिए मोहरे हैं…

Sanjay Tiwari : इंटरनेट पर आजादी की दुहाई के दिन फिर से लौट आये हैं। फेसबुक अगर नयी तैयारी से मुफ्त सेवा देने के लिए कमर कसकर दोबारा लौटा है तो उसी फेसबुक पर उसकी इस मुफ्त सेवा का मुखर विरोध भी शुरू हो गया है। अच्छा है। जनता के हक हित और आजादी की मांग तो होनी ही चाहिए लेकिन आजादी की यह दुहाई थोड़ी बचकानी है। जिन दिनों फेसबुक मैदान में उतरा ही था उन दिनों भी कहा गया था कि यह प्राइवेसी में बहुत बड़ी सेंध लग रही है। लेकिन सेंध क्या? फेसबुक ने तो पूरा पनारा ही खोल दिया। क्या हुआ प्राइवेसी का? यह जानते हुए कि आपकी प्राइवेसी को सचमुच खतरा है फिर भी क्या बिना फेसबुक एकाउण्ट बनाये रह सकते हैं आप?

और फेसबुक तो बहुत बाद में आता है। उसके पहले आता है वह प्लेटफार्म जहां खड़े होकर आप फेसबुक ट्विटर का तामझाम फैलाते हैं। एन्डरॉयड। जो कि दुनिया के अस्सी फीसदी से ज्यादा स्मार्टफोन एन्डरॉयड पर चल रहे हैं। आपको मुफ्त सेवा देनेवाली गूगल बदले में आपसे कहां कहां से क्या क्या ले रही है, कभी ख्याल आया क्या? कभी आपने सोचा कि गूगल ने सर्च इंजन के बाद सबसे ज्यादा पैसा एण्डरॉयड के विकास पर ही क्यों खर्च किया?

यह मार्केट इकोनॉमी है साहब और यहां कुछ भी मुफ्त नहीं होता। न तो वालस्ट्रीट में बैठे पूंजीपति मूर्ख हैं और न ही सिलिकॉन वैली में मंहगी पगार लेनेवाले कोई जनक्रांति कर रहे हैं। क्या गूगल, क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या फेसबुक। आप सबके लिए मोहरे हैं। वे जैसा चाहेंगे चाल चलेंगे और आपको उन्हीं की मर्जी के मुताबिक अपनी आजादी की सीमारेखा भी तय करनी पड़ेगी। पिंजरे में बंद तोता पिंजरे में कितनी उछलकूद करके टांय टांय कर ले, उछलकूद करने से वह आजाद नहीं हो जाता। उसे खाने के लिए एक लाल मिर्ची मिल जाती है। बस।

वरिष्ठ वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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आनलाइन एड एजेंसी झुकी, भड़ास के खाते में हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए 70 डालर आए… चीयर्स

एक विदेशी आनलाइन एड एजेंसी ने 70 डालर मेरे एकाउंट में भेज दिए. काफी दिनों से बारगेनिंग चल रही थी. मैंने बहुत पहले तय कर लिया था कि बिना एडवांस लिए आनलाइन या आफलाइन, किसी एड एजेंसी वालों या किसी शख्स का विज्ञापन नहीं चलाउंगा क्योंकि विज्ञापन चलवाने के बाद पेमेंट न देने के कई मामले मैं भुगत चुका था. बकाया भुगताने के लिए बार बार फोन करने, रिरियाने की अपनी आदत नहीं रही. हां, इतना जरूर कुछ मामलों में किया हूं कि किसी रोज दारू पीकर बकाया पैसे के बराबर संबंधित व्यक्ति को फोन कर माकानाकासाका करके हिसाब चुकता मान लेता हूं. पर यह कोई ठीक तरीका थोड़े न है. इसलिए एक नियम बना लिया. बिना एडवांस कोई विज्ञापन सिज्ञापन नहीं. दर्जनों एड प्रपोजल इसलिए खारिज करता रहा क्योंकि आनलाइन एजेंसी को एडवांस पेमेंट वाला शर्त मंजूर न था. लेकिन आखिरकार एक एड एजेंसी झुकी और 70 डालर हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए दे दिए.

बात सत्तर डालर जैसी छोटी रकम की नहीं. बात सिद्धांत की है. कंटेंट और तेवर मेनटेन रखें तो विज्ञापन पैसा प्रतिष्ठा सब खुद ब खुद अपने कदमों पर चल कर आते हैं. अन्यथा डग्गामारी पत्रकारिता का हश्र देख ही रहे हैं. कंटेंट छोड़ कर बाकी सभी मोर्चे पर संपादक से लेकर मार्केटिंग तक के लोग बांय बांय करते हुए मरे जा रहे हैं पर जनता है कि उन्हें भाव न देकर बिकाउ बिकाउ पेड पेड बाजारू बाजारू समेत जाने क्या क्या कह कह कर लिहो लिहो कर रही  है. और, ये सच है कि अगर मीडिया बिकाउ व पेड न हुआ होता तो मीडिया के खिलाफ भड़ास निकालने की खातिर किसी आनलाइन प्लेटफार्म की जरूरत न पड़ती.

मीडिया के बदलते व नए ट्रेंड्स को लेकर मेरे पास जो थोड़ी बहुत समझ है, वह खुद के अनुभव के आधार पर है. साफ साफ दिख रहा है कि मीडिया का बहुत तेजी से विकेंद्रीकरण हो रहा है. जिस कदर आनलाइन न्यूज पोर्टल और वेब टीवी चैनल शुरू हो रहे हैं, उससे मीडिया व पत्रकारिता नामक महत्वपूर्ण चीज कुछ घरानों, कुछ व्यक्तियों, कुछ शख्सियतों की बपौती नहीं रहा करेगी. सोशल मीडिया और आनलाइन मीडिया के कारण जो जबरदस्त चेंज आए हैं उससे बड़ा फायदा आम पत्रकारों समेत उन तमाम लिखने पढ़ने वालों को हो रहा है जो अपने सोच में क्रिएटिव हैं, सरोकारी हैं, हार्डवर्किंग है, इन्नोवेटिव हैं, तकनीकी ज्ञान से लैस हैं. दुनिया भर में एड रेवेन्यू का बहुत बड़ा हिस्सा डिजिटल यानि इंटरनेट की तरफ मुड़ चुका है. कोई यूट्यूब पर अपना चैनल चलाकर लाखों रुपये महीने कमा रहा है तो कोई अच्छा सा ब्लाग लिखकर लाखों रुपये महीने विदेश से मंगा रहा है.

दिल्ली से लेकर आगरा तक के उन कई लोगों को जानता हूं जो सामान्य गृहिणी हैं या युवा टेक एक्सपर्ट हैं, और, गूगल के ही प्लेटफार्म्स पर अपनी क्रिएटिविटी व ज्ञान के जरिए लाखों रुपये महीने कमा रहे हैं. डिजिटल की तरफ शिफ्ट हो रहे एड रेवेन्यू का छोटा छोटा हिस्सा हम भड़ास जैसे पोर्टलों /  न्यू मीडिया माध्यमों के जरिए अलग किस्म का कंटेंट क्रिएट करने वालों को भी मिल रहा है. यह एड रेवेन्यू लाखों करोड़ों उन न्यूज पोर्टलों / न्यू मीडिया माध्यमों तक पहुंच रहा है जो जमीनी-रीयल किस्म की पत्रकारिता या किसी खास फील्ड का एक्सपर्ट होकर संबंधित कंटेंट क्रिेएट कर रहे हैं व इसके जरिए खुद का व अपने माध्यम का अलग स्थान पहचान बनाए हुए हैं. ये लोग खुद का एक बड़ा पाठक वर्ग / दर्शक वर्ग क्रिएट कर चुके हैं.

यूट्यूब से लेकर ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया आदि के जरिए एक होनहार समझदार नौजवान अब अच्छा खासा पैसा कमा सकता है, इसका उल्लेख आनलाइन कंटेंट मानेटाइजेशन वर्कशाप में कर चुका हूं जिसमें शरीक होने के लिए देश भर से लोग ग्यारह ग्यारह सौ रुपये देकर आए थे. पहले सारा ज्ञान व पैसा अंग्रेजी में था. लेकिन अब हिंदी के आगे बड़े बड़े घुटने टेक रहे हैं. गूगल के एडसेंस से महीने में सैकड़ों डालर मिलने के साथ साथ अब दूसरी आनलाइन एड कंपनीज भी भड़ास को एडवांस में पेमेंट देकर अपने विज्ञापन लगवा रही हैं. यह हिंदी के लिए और आनलाइन हिंदी मीडिया के लिए सुखद मोड़ है. बड़े, कारपोरेट व बिकाऊ मीडिया घराने देश का पैसा ब्लैक में इकट्ठा कर विदेश में चुरा रहे हैं तो हम छोटे व नए मीडिया वाले विदेश से हजारों डालर देश में मंगवाकर सच्ची देश सेवा भी कर रहे हैं. सो दोस्तों, आगे बढ़िए और बिकाउ मीडिया की नौकरियों में सपने तलाशने की जगह खुद की छोटी शुरुआत कर डालिए. मैं तो चला 70 डालर के नाम आज शाम पार्टी मनाने.. चीयर्स गुरु!!!

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. इनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

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वो चार कारण जिसके चलते हिंदी वेब मीडिया अपनी चमक खो रहा है…

हिंदी न्यूज वेब मीडिया का बिजनेस जिस एनर्जी के साथ आगे बढ़ रहा था, वह फिलहाल मुझे कम होता दिख रहा है। इस इंडस्ट्री में मेरी शुरुआत 2012 के जनवरी में हुई थी और 2015 के मार्च में मैंने इंडस्ट्री छोड़ दी। इन तीन सालों में कभी ऐसा नहीं लगा कि हिंदी न्यूज वेब का बिजनेस मंदा होगा। ऐसा लग रहा था कि इसमें ही पत्रकारिता और पत्रकारों का भविष्य है। लेकिन 2015 के आखिरी महीनों में मामला उल्टा नजर आ रहा है। मैंने यह जानने की कोशिश की आखिर क्यों मुझे लग रहा है कि हिंदी वेब मीडिया अपनी चमक खो रहा है। कुछ वजह नजर आए –

1. इंटरनेट डेटा महंगा होने की वजह से लोग हिंदी न्यूज वेबसाइट पर जा ही नहीं रहे हैं। फेसबुक पर ही लोग समाचार, विचार, इंटरेक्शन और एंगेजमेंट पा ले रहे हैं। हिंदी न्यूज साइट्स पर टेक्स्ट और वीडियो ऐड की वजह से उनका काफी डेटा खर्च होता है। इससे कम पैसे में वो न्यूज चैनल या अखबार से समाचार पा सकते हैं। और फिर सोशल मीडिया तो है ही।

2. पिछले चार सालों से हिंदी न्यूज वाले एक लकीर के फकीर बने हुए हैं। घटिया कंटेंट का बढ़िया हेडलाइन लगाकर यूजर्स का बेवकूफ बनाने का धंधा आखिर कब तक चलेगा। पिछले चार पांच सालों में वे विश्वसनीयता बना नहीं पाए। वे यूजर्स को कुछ नया नहीं दे पा रहे हैं, उनको बोर करते हैं। मुझसे कोई कह रहा था कि सेक्स आधारित कंटेंट में भी लोगों की दिलचस्पी कम हुई है।

3. हिंदी न्यूज के कई सारे वेबसाइट्स आ चुके हैं जिनपर एक ही तरह के कंटेंट देखे जा सकते हैं। आखिर यूजर्स क्या क्या और किसको किसको कंज्यूम करेंगे। इससे बेहतर है कि सबकी हेडलाइन सोशल मीडिया पर देखते रहो।

3. मोबाइल पर लोगों के पास अब पचास तरह के काम हैं। बिल पेमेंट से लेकर जिंदगी के कई काम अब मोबाइल से होने लगे हैं। मतलब यूजर्स के पास अब समय का भी अभाव है।

4. हिंदी न्यूज वेबसाइट्स चलाने वालों को यह गलतफहमी है कि वह चार लोगों को बिठाकर, चोरी चकारी से न्यूज अपेडट करवाकर बैठे ठाले लाखों कमाने लगेंगे। उनको इंवेस्ट करना पड़ेगा नहीं तो जो बचा खुचा है वह भी डूब जाएगा।

इंटरनेट का मिजाज ही पल में तोला पल में माशा वाला है। यहां आज जो बादशाह है, कब उसका नामोनिशान मिट जाएगा, यह कोई नहीं बता सकता। जो यूजर्स को खुश करने के नए नए तरीके निकालेगा, वही टिका रहेगा। वरना कितने आए और कितने चले गए। ऑरकुट, रेडिफ याहू चैट अब बीते जमाने की चीज है। गूगल जी प्लस को इस्टेबलिश नहीं कर पाया। फेसबुक के जुकरबर्ग को भी डर लगा रहता है कि न जाने कब उनका भट्ठा बैठ जाएगा। ऐसे वोलेटाइल मीडियम में हिंदी वेब मीडिया आगे क्या कर पाएगी, इसमें मेरी खासी दिलचस्पी है।

मुझे अहसास हो रहा है कि मंदी की वजह से हिंदी वेब मीडिया इंडस्ट्री में फिलहाल टेंशन भरा माहौल है। अगर यह बिजनेस और मंदा हुआ तो इसका सीधा असर वेब पत्रकारों पर पड़ेगा। नए जॉब क्रिएट नहीं होंगे। नए पत्रकारों की एंट्री मुश्किल हो जाएगी। पुराने पत्रकारों की सैलरी नहीं बढ़ेगी, प्रमोशन नहीं होगा। वह जॉब चेंज नहीं कर पाएंगे। खुदा करे ऐसा कुछ न हो और ये सब महज मेरी कल्पना हो, वहम हो।

यह मेरा अपना आकलन है, हो सकता है आपकी राय कुछ और हो।

लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. इनसे संपर्क newrajeevsingh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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विस्फोट डाट काम के बाद अब मीडिया खबर डाट काम भी निष्क्रिय मोड में

मीडियाखबर डाट काम वेबसाइट से मीडिया के काफी लोग परिचित हैं. पुष्कर पुष्प इसे संचालित करते हैं. मीडिया इंडस्ट्री से जुड़ी खबर देने वाली यह वेबसाइट भड़ास से भी पुरानी है और पुष्कर पुष्प के निजी प्रयासों से संचालित है. लेकिन 18 अगस्त के बाद से इस पर एक भी नई खबर अपलोड नहीं हुई है. 18 अगस्त को भी सिर्फ एक खबर प्रकाशित दिख रही है. उसके पहले 27 जुलाई को एक खबर और उससे भी पहले 20 जुलाई को कुछ खबरें छपी हैं. साइट के निष्क्रिय मोड में चले जाने से मीडिया के ढेर सारे लोगों में निराशा है.

आज के कारपोरेट दौर में जब हर कहीं मैनेज किए जाने का खेल चल रहा है और मीडिया में बड़ी पूंजी ने असली खबरों को बाहर आने से रोक रखा है, निजी प्रयासों और मिशनरी भाव से चलाई जा रही ऐसी साइटों के दम पर ही अंदरखाने की गंदगी सार्वजनिक हो पाती है. पर कंजूस और स्वार्थी मानसिकता वाला हिंदी पट्टी एकल प्रयासों से चल रही वेबसाइटों को आर्थिक सपोर्ट देने से कतराता है. इस कारण निजी प्रयासों से चलाई जा रही वेबसाइटों के आगे सरवाइवल का संकट खड़ा हो जाता है. फिर एक ऐसा समय आता है जब साइट चलाने वाला शख्स अपनी जरूरतों की खातिर किसी दूसरे काम में जुट जाता है ताकि उतने पैसे कमा सके जिससे अपना व परिवार का पेट पाल सके. संजय तिवारी ने विस्फोट डाट काम के जरिए हिंदी ब्लागिंग के बाद हिंदी वेबसाइट के क्षेत्र में कदम रखा, साथ ही बहुतों को ऐसा करने का रास्ता दिखाया. संजय ने अपने दम और सीमित संसाधनों के बल पर कई वर्षों तक विस्फोट डाट काम को एक अच्छा वैचारिक पोर्टल बनाए रखा.

बाद में एक ऐसा वक्त उनके सामने आया जब आर्थिक तंगी और खराब सेहत ने उन्हें इस कदर तोड़ा कि उन्होंने वेबसाइट अपडेशन से मुंह मोड़ लिया. विस्फोट डाट काम आज भी दिखेगा लेकिन उस पर कोई नया लेख नई खबरें नहीं मिलेंगी. हिंदी पट्टी के हमारे पाठकों को कारपोरेट से मुठभेड़ लेती एकल दम पर संचालित ऐसी साइटों के जिंदा रखने के बारे में शिद्दत से सोचना चाहिए. फिलहाल पुष्कर पुष्प की कोई खोज खबर नहीं है. वे किसी विपदा में तो नहीं हैं? आखिर किन कारणों से उन्होंने मीडिया खबर डाट काम को अपडेट करना बंद कर दिया? वे आजकल कहां और क्या कर रहे हैं? ये जानकारियां अभी सामने आना बाकी है. अगर आपको कुछ पता हो तो जरूर बतावें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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कृपाशंकर के SarajhanLive.com की लांचिंग अनिल चमड़िया के हाथों हुई

झमाझम बारिश के बावजूद हिंदी न्यूज़ पोर्टल www.sarajhanlive.com की लॉन्चिंग इंडिया गेट पर सोमवार की शाम सम्पन्न हुई। पोर्टल की लॉन्चिंग करते हुए हिंदी के वरिष्ठ जुझारू पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि वेबसाइट की दुनिया बहुत बड़ी है और इसका सरोकार काफी लम्बा-चौड़ा है। आने वाले वक़्त में इसकी जरुरत ज्यादा महसूस की जाएगी। वेबसाइट दृष्टि और मेहनत का खेल है, जिसने इस सूत्र को जाना, वह मीर।

इस अवसर पर पोर्टल के प्रधान संपादक कृपाशंकर ने फरमाया कि अँधेरे के खिलाफ, रौशनी की जंग के साथ यह पोर्टल सातो दिन, 24 घंटे खड़ा रहेगा। इतना ही नहीं, नवंबर में युवाओं के लिए एक अन्य वेबसाइट लांच करने की घोषणा की गई। लॉन्चिंग के समय वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल, विनोद विप्लव, कृष्ण मोहन झा, पंकज पाण्डेय, डॉ वाज़दा खान, मीनू जोशी, अभिनव रंजन, राघवेन्द्र शुक्ल, मोहन कुमार आदि बारिश और लॉन्चिंग का मजा लेते रहे।

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सोशल मीडिया पर साइबर गुंडागर्दी से बचने का एक ही तरीका है…

Dilip C Mandal : सोशल मीडिया पर साइबर गुंडागर्दी से बचने का एक ही तरीका है कि आप बचने की कोशिश न करें। आप बच जाएँगे।

1. दी जा रही गालियों से न डरें। दी जा रही गालियाँ आपका नहीं, गाली लिखने वालों का परिचय है। मैं तो अक्सर गालियों को डिलीट भी नहीं करता।

2. अगर गालियाँ न दी जा रही हों, तो आपके लिए यह चिंतित होने का समय है। क्या आप ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं कि न्याय और लोकतंत्र के विरोधी आपको गालियां दें? यह तो बुरी बात है। कुछ तो ऐसा कीजिए कि बुरे लोग आपसे नाराज हों।

3. अगर आपके जीवन में ऐसा बहुत कुछ है, जिसे आप छिपाना चाहते हैं और जिनके खुल जाने से आपको दिक्कत हो सकती है, तो सोशल मीडिया आपके लिए नहीं है। आप लिमिटेड फ़्रेंड लिस्ट से काम चलाएँ और कमेंट ऑप्शन सिर्फ फ़्रेंड के लिए रखें। या फिर आप अखबार में लेख लिखें या टीवी पर विश्लेषक गेस्ट बनकर पेश हों।

4. इसमें किसी की तो जीत होनी है। आपका पीछे हटना उनकी जीत है।

5. गालियों से डरकर पीछे हटने का मतलब है कि आप जो लिख रहे थे वह आपके लिए फ़ैशन था। आपको खुद से पूछना चाहिए कि आपकी इज़्ज़त बडी है या आपके विचार।

आप बताएँ कि आपकी क्या राय है।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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क्या भारतीय प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश के नागरिको को ‘ऑनलाइन गुंडा’ कहकर संबोधित करेंगे!

NDTV के पत्रकार रवीश कुमार ने ट्विटर पर लिखना छोड़ ही दिया था अब फेसबुक पर लिखना भी बंद कर दिया। कारण दिया सोशल मीडिया पर गुंडागर्दी। रवीश कुमार आप या आपके समर्थक पत्रकार कुछ भी कहे लेकिन, सोशल मीडिया’ सहमति,असहमति और विरोध का माध्यम है और रहेगा। पिछले 2 दशकों से जिस प्रकार आप लोगों ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से देश की जनता पर अपने एक विचारो को थोपते चले आ रहे हैं, ‘सोशल मीडिया’ आ जाने से लोगो को एक ताक़त मिली है कि आप लोगो से भी प्रश्न कर सके। आप लोग अभी तक एकतरफा पत्रकारिता करते हुए जनता को गुमराह कर रहे थें, ‘सोशल मीडिया’ द्वारा जनता आपसे प्रश्न करती है तो आप उन्हें ‘राष्ट्रवादी गुंडा’ कहकर बुलाते हैं।

आप मीडिया को देश का चतुर्थ स्तम्भ होने की बात करते हैं तो आपको बता दूं सारे स्तंभों से बड़ा भारत की जनता है, उसे हक़ है आप चारो स्तंभों से प्रश्न पूछने का। जब आप अपनी पत्रकारिता पर दंभ भरते हैं तो मुझे आपका ‘प्राइम टाइम’ याद आता है कि किस प्रकार कितनी बहसों में तथ्यों के बिना भी किसी घटना को एक संगठन से जोड़ देते रहें हैं। मैं हाल के सिर्फ 2-3 घटनाओ का जिक्र कर देता हूँ।

एक घटना दिल्ली के चर्च में हुई, जिसमे कुछ असामाजिक तत्वों ने चर्च में तोड़फोड़ की थी। आपने इसके लिए हिंदूवादी संगठनो को सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराया था, बाद में क्या हुआ पकड़े गए लोग ईसाई धर्म के और इसी चर्च से सम्बंधित थे। एक और याद आ रहा है ‘नन रेप’ वाली घटना, इसमे तो आप अपनी तथाकथित पत्रकारिता करते हुए इतने उग्र हो गए की चिल्लाते हुए बिना किसी तथ्य के इस घटना का भी सम्बन्ध हिंदूवादी संगठनो से करने लगे।बाद में क्या हुआ ये तो आपको पता ही हैं।

कुछ वर्ष पहले की बात करें तो किस प्रकार से आपलोगो ने ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नाम दिया था और जनता के बीच एक अफवाह फ़ैलाने का दौर अपनी पत्रकारिता के माध्यम से चलाया था। आप लोगो ने पत्रकारिता से ऐसा माहौल तैयार कर दिया था कि हिन्दू शब्द सांप्रदायिक शब्द घोषित हो गया था।जब आपकी पत्रकारिता और प्राइम टाइम को लेकर कोई आपसे प्रश्न पूछ देता है तो वो आपके लिए ‘राष्ट्रवादी गुंडा’ हो जाता है।

एकतरफा विचार थोपना, जनता को गुमराह करना आपकी पत्रकारिता में स्पष्ट दिखती है। ये ‘सोशल मीडिया’ है यहाँ हर प्रकार के लोग हैं आपकी घाटियां पत्रकारिता से परेशान होकर कुछ लोग आपके पेजो पर गाली-गलौच कर देते होंगे लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि आप ‘सोशल मिडिया’ पर उपस्थित लोगो को राष्ट्रवादी या ऑनलाइन गुंडा कहे। भारत के प्रधानमंत्री से लगाकर अमेरीका के राष्ट्रपति तक को ‘सोशल मीडिया’ पर गाली गलौच का सामना करना पड़ता है तो क्या भारत के प्रधानमंत्री और अमेरीका के राष्ट्रपति अपने देश के नागरिको को ऑनलाइन गुंडा कहकर संबोधित करेंगे।

दिक्कत सिर्फ गाली-गलौच का नहीं है रवीश कुमार जी। यहाँ दिक्कत ये है कि ‘सोशल मीडिया’ के आ जाने से अब लोग पत्रकारो से भी प्रश्न पूछ ले रहे हैं। और आप जैसे पत्रकारो का गन्दा खेल जो अबतक चल रहा था ‘सोशल मीडिया’ आ जाने से लोगो को आपकी सच्चाई दिखने लगी। आज ‘सोशल मीडिया’ ‘मेन स्ट्रीम मीडिया’ से कही ज्यादे ताक़तवर हो रहा है। पहले मीडिया ट्रायल में आप खुद मुद्दे सेट करते थे, उसपर बहस करके खुद ही फैसला सुना देते थे। लेकिन अब ‘सोशल मीडिया’ आने से देश की जनता अपना मुद्दा खुद तय करती है, सार्वजनिक बहस होता है और फैसला सुनाने की कोई जरूरत नहीं होतो लोग खुद ही समझ जाते हैं क्या सही है, क्या गलत है।

गोरखपुर निवासी साफ्टवेयर डेवलपर पवन उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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Flipkart पर कुछ भी ऑर्डर करने से पहले मेरी कहानी सुनिए

31 अगस्त 2015 का दिन. मेरे दिल में एक स्मार्टफोन लेने का विचार आया. मैं इंटरनेट पत्रकार हूं तो ये मेरे लिए काफी ज़रूरी भी था. मेरा पुराना स्मार्टफोन मेरी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा था और काम काफी प्रभावित हो रहा था. जो स्मार्टफोन मेरे बजट में था वह Flipkart पर बिक्री के लिए उपलब्ध था. मैंने Flipkart को एक मोटो-ई सेकेंड जेनरेशन फोन ऑर्डर कर दिया. मेरी परेशानी की शुरुआत यहीं से हुई.

 

जब हम बाजार जाते हैं तो पहले माल लेते हैं और फिर पैसा देते हैं, Flipkart पर भी ये सुविधा मौजूद है, लेकिन मैंने जैसे ही अपना पता गाजियाबाद दिखाया Flipkart ने मुझे कैश ऑन डिलीवरी का कोई ऑप्शन नहीं दिया. मुझे फोन की बेहद ज़रूरत थी तो मैंने उन्हें पैसा एडवांस दे दिया. मेरे एक दोस्त जिसके Flipkart अकाऊंट से मैंने ऑर्डर किया उसने भी मुझे आश्वस्त किया कि कोई बात नहीं ये अच्छी कंपनी है और सामान टाइम से दे देगी. Flipkart ने वादा किया कि वह मुझे 7 सितंबर तक फोन दे देगी लेकिन जब मुझे 7 तारीख तक फोन नहीं मिला तो मैंने Flipkart के फेसबुक अकाऊंट पर अपनी परेशानी बताई.

फेसबुक अकाऊंट पर इसलिए क्योंकि जो नंबर उन्होंने अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराया है उसने आधे-आधे घंटे फोन होल्ड पर रखने के बाद काट दिया, बिना किसी से बात कराए. तो मुझे थक कर सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा. मैंने जब अपनी परेशानी उनके फेसबुक अकाऊंट पर लिखी तो मुझे Flipkart की ओर से मेरे स्टेटस पर रिप्लाई आया कि हमारा लॉजिस्टिक पार्टनर 5000 रुपये से अधिक के मोबाइल डिलीवर करने में सक्षम नहीं है.

मेरा सवाल ये कि जब Flipkart ऐसा करने में सक्षम नहीं थी तो ऑर्डर लिया ही क्यों? और यदि ले लिया था तो उन्हें ये कब पता चला कि वे मुझे मोबाइल पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं? क्या मेरे द्वारा सवाल पूछे जाने के बाद? और जब पता चल गया तो क्या उसी वक्त मेरा पैसा नहीं लौटाया जा सकता था?

मैंने Flipkart के रिप्लाई पर जवाब दिया कि आप लोग मेरा पैसा वापस कर दें. उनका रिप्लाई आया कि ‘हम मामले को देख रहे हैं, जल्द ही आपको अपडेट करेंगे.’ जब उन्होंने ऐसा कहा तो तारीख थी 8 सितंबर और वक्त था रात के 9 बजकर 29 मिनट. अगले दिन मुझे Flipkart की सोशल मीडिया टीम की ओर से फोन आया. उसने मुझे आश्वासन दिया कि जल्द ही मेरे पैसे लौटा दिए जाएंगे.

उसके आश्वासन पर मैंने और एक हफ्ता इंतजार किया लेकिन पैसा नहीं मिला. मतलब ये कि कंपनी ने ऑर्डर लिया, माल नहीं दिया और पैसा भी वापस करने में आनाकानी!! जो मैसेज Flipkart ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है वह ये है कि ‘जब हमें माल वापस मिल जाएगा तब रिफंड की प्रक्रिया शुरु की जाएगी’.

अब सवाल ये कि माल मुझे मिला नहीं, Flipkart के मुताबिक उसके पास भी नहीं है तो गया कहां? और इसमें मेरी गलती कहां है? अब Flipkart की किसी गलती या चूक की सजा मुझे क्यों? या तो मुझे स्मार्टफोन दे देते या फिर पैसा वापस लेकिन Flipkart ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और 16 दिन गुजर गए.  एक डिजिटल पत्रकार का जीवन बिना स्मार्टफोन के कैसा होगा आप समझ सकते हैं. मैं इतना अमीर तो नहीं हूं कि एक जगह पैसा फंसाकर दूसरी जगह फिर से फोन ऑर्डर करूं, इसीलिए इंतजार कर रहा हूं कि Flipkart मेरा पैसा वापस कर दे तो मैं नया फोन ले सकूं.

Varun Kumar
digitalindian85@gmail.com

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28 अगस्त के दिन इंटरनेट का इस्तेमाल बिलकुल न करें

आओ आज एक संकल्प लें। 28 अगस्त के दिन इन्टरनेट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करेंगे। हाल ही में टेलीफोन कम्पनियों के द्वारा मोबाइल डाटा के दाम बढा दिये गये हैं। जो इन्टरनेट पैक पहले 58 रुपये में 2GB मिलता था, वो अब 155 में 1GB रह गया था और अब पिछले हफ्ते कम्पनी ने दाम फिर बढा दिये हैं। अब 155 रुपये में 500MB डाटा।

उसमें एक और सोचने वाली बात वैलीडिटी है। 28 दिन (4 हफ्ते), 14 दिन (2 हफ्ते) और 7 दिन (1 हफ्ता) वैलीडिटी कर दी इन्होंने। ऐसा क्यों? क्योंकि हम आँखें बन्द करके इन्टरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और कम्पनियां इसी बात का फायदा उठा रही हैं कि भारत के लोग सोये हुए हैं, ये कभी आवाज नहीं उठायेंगे। इंग्लैण्ड में एक बार ब्रेड कम्पनी ने ब्रेड के दाम बढाये तो पूरे इंग्लैण्ड ने कुछ दिन ब्रेड ही नहीं ली तो मजबूरन कम्पनी को दाम वापस वो ही करने पड़े।

क्यों ना हम लोग भी आवाज उठायें और 28 अगस्त के दिन इन्टरनेट का इस्तेमाल ना करें ताकि कम्पनी (व्यापारी) को उपभोक्ताओं (ग्राहकों) की शक्ति का पता चले। एक व्यक्ति प्रतिदिन न्यूनतम 10 रुपये का इन्टरनेट इस्तेमाल करता है तो यदि 20 करोड़ लोग उपभोक्ता हैं तो कम्पनियों को प्रतिदिन 10×20 करोङ = 2 अरब रुपये की आमदनी होती है। यदि हम एक दिन भी इन्टरनेट नहीं चलाते हैं तो कम्पनियों को जो घाटा होगा, वो उनके लिये बड़ा महँगा होगा और हमारे लिये 10 रुपये की बचत + समय की बचत + एक दिन परिवार के नाम।

हम भारतीय हैं, मूर्ख नहीं हैं।
संगठन में ही शक्ति है।
बस एक दिन
28 august
को इन्टरनेट का
बहिष्कार करें।

इस मैसेज को 28 august से पहले इतना शेयर करो कि पूरा भारत इस दिन 28 august को इन्टरनेट का इस्तेमाल ना करे !!!
Don’t break the chain
Let’s show our india’s power of unity
आपके पास जितने ग्रुप हैं, मेल हैं, कांटैक्ट्स हैं, फ्रेंड्स हैं, सबको भेजो ये सूचना।

ये पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है.

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इस साल के अंत तक दुनिया की आधी आबादी जुड़ जाएगी इंटरनेट से

इस साल के आख़िर तक दुनिया की कुल जनसंख्या में से आधे लोग इंटरनेट से जुड़ चुके होंगे. संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन (आईटीयू) की एक रिपोर्ट में अनुमान है कि 3.2 अरब से ज़्यादा लोग ऑनलाइन हो चुके होंगे, फिलहाल दुनिया की जनसंख्या 7.2 अरब है. इनमें विकासशील देशों के तकरीबन दो अरब लोग शामिल हैं. लेकिन सबसे कम विकसित देशों की सूची में शामिल नेपाल और सोमालिया से सिर्फ 8 करोड़ 90 लाख लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाएंगे.

रिपोर्ट के मुताबिक साल के अंत तक विकसित देशो में 80 प्रतिशत घरों और विकासशील देशों में 34 प्रतिशत घरों में किसी न किसी रूप में इंटरनेट की सुविधा होगी. आईटीयू के डेवलपमेंट ब्यूरो के निदेशक ब्राहिमा सनोऊ ने बताया, “पिछले 15 वर्षों में इंटरनेट ने वैश्विक विकास में अहम भूमिका निभाई है. डिजिटल समुदाय बनने की तरफ बढ़ रही दुनिया के विकास के लिए इंटरनेट की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.” साल 2000 में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या आज के आंकड़े के आठवें हिस्से के बराबर यानी 40 करोड़ थी.

मोबाइल ब्रॉडबैंड इस्तेमाल करने वालों की संख्या 7 अरब तक पहुंच जाएगी. अमरीका और यूरोप में 100 में से 78 लोग मोबाइल ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल करते हैं. दुनिया में 69 फ़ीसदी लोगों के पास 3G कवरेज है लेकिन ग्रामीण इलाकों में ये सिर्फ़ 29 फ़ीसदी तक पहुंचा है. अफ्रीका में मोबाइल ब्रॉडबैंड सिर्फ 17.4 फीसदी आबादी तक पहुंचा है.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार

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