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अब मीडिया की अदालत में अंशु : सुहाग लुटा फिर पूरी वसीयत, ‘मेरे मासूम की मदद करिए’ !

आगरा : ससुराल में पांव रखते ही किसी नवविवाहिता को पता चले कि उसके पति को तो कैंसर है….कुछ दिन बाद पति उसे हमेशा के लिए इस दुनिया में अकेला छोड़ जाए ! और उस पर लगातार वक्त कुछ ऐसी मार पड़ती जाए कि सुहाग लुट जाने से कुछ माह पूर्व वह संतान को जन्म दे, और फिर, उसे नवजात के साथ ससुराल से मायके खदेड़ दिया जाए !..उसके बच्चे के नाम बैंक में जमा सारे रुपये निकालने के साथ ही जालसाजी कर उसकी पूरी वसीयत उसके ही ननद-देवर एक कॉलेज के नाम पर हड़प लें तो ? और वह लाचार नवविवाहिता दस साल से न्याय की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच जाए….!! 

आगरा : ससुराल में पांव रखते ही किसी नवविवाहिता को पता चले कि उसके पति को तो कैंसर है….कुछ दिन बाद पति उसे हमेशा के लिए इस दुनिया में अकेला छोड़ जाए ! और उस पर लगातार वक्त कुछ ऐसी मार पड़ती जाए कि सुहाग लुट जाने से कुछ माह पूर्व वह संतान को जन्म दे, और फिर, उसे नवजात के साथ ससुराल से मायके खदेड़ दिया जाए !..उसके बच्चे के नाम बैंक में जमा सारे रुपये निकालने के साथ ही जालसाजी कर उसकी पूरी वसीयत उसके ही ननद-देवर एक कॉलेज के नाम पर हड़प लें तो ? और वह लाचार नवविवाहिता दस साल से न्याय की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच जाए….!! 

यह झकझोर कर रख देने वाली दास्तान है आगरा (उ.प्र.) की अंशु वर्मा की, जिन्हें न समाज से न्याय मिल सका है, न मीडिया और कानून से। वह कैसे रो-रोकर असहनीय आपबीती सुनाती हैं, आइए, उन्हीं के शब्दों में जानते-पढ़ते हैं। भड़ास4मीडिया को प्रेषित दुखद आत्मकथ्य में अंशु वर्मा लिखती हैं –  

”..मेरे साथ जो हुआ, मैं आप (भड़ास4मीडिया) के माध्यम से वह सबको बताना चाहती हूं, और इसलिए बताना है ताकि हर इंसान का भारत के संविधान और सामाजिक न्याय-व्यवस्था में आस्था, विश्वास बना रहे। 

”मायके और ससुराली जनों की पूर्ण सहमति से मेरी शादी 4 फरवरी 2005 को आगरा निवासी प्रदीप वर्मा से हुई थी। शादी के एक महीने बाद पता लगा कि प्रदीप को कैंसर है और मैं प्रिगनेंट। अब अपनी दुनिया में आने वाले नये मेहमान की खुशी मनाती या पति की असाध्य बीमारी का गम! फिर भी उन दिनो में अपने ईश्वर के हाथों सब सौंपकर 8 नवंबर 2005 को अपनी संतानोत्पत्ति के बाद मैं खुश रहने लगी थी, लेकिन मेरे देवर प्रवीन वर्मा उर्फ रिंकू और ननद नीना वर्मा ने सुनियोजित तरीके से एक ऐसा षड्यंत्र किया, जिसका मुझे 12 फरवरी 2006 को पति की मृत्यु के बाद पता चला। अब तो मेरा सर्वस्व लुट चुका था।

” वह षड्यंत्र क्या था? ननद और देवर ने, जिनकी साझा साजिश में अन्य ननदें गीता, बीना, भारती आदि भी शामिल थीं, मरने से पूर्व मेरे पति से ऐसे कागजात पर हस्ताक्षर करा लिया गया था, जिसे अदालत में सुबूत के तौर पर पेश किया गया। उसमें उल्लेख था कि मृत्यु के बाद मेरे पति सारी संपत्ति ‘मायारानी गर्ल्स इंटर कॉलेज’ आगरा को दे दी जाए। उन्हीं कागजातों में यह भी दर्शाया गया था कि पति द्वारा मेरे पुत्र के नाम से बैंक में जमा लगभग दस लाख रुपये पर भी प्रवीन वर्मा आदि का हक होगा। सारी संपत्ति कालेज के नाम दान कर देने संबंधी उस कागजाती कूट रचना की तिथि 26 जून 2005 दर्शायी गयी थी। 

” मैंने बहुत खूबसूरत से बच्चे को जन्म दिया लेकिन मेरे ससुराली जनों ने ही उसकी किस्मत पर कालिख पोत दी। जब मेरा मासूम मात्र 36 दिन का था, मुझको घर से बाहर कर दिया गया। मैं अनाथ हो चली थी। इसके बाद भाई ने मुझे सहारा दिया और मेरे बेटे को प्यार। इसके बाद मैंने अपने बेटे की खातिर आगरा के कोर्ट नंबर 13 में एडीजे के.के. अस्थाना की चौखट पर न्याय की गुहार लगाई। यह मामला दस वर्ष चला। वर्ष 2012 में आगरा की कोर्ट नंबर-14 में मेरे पति की वसीयत ‘मायारानी गर्ल्स इंटर कॉलेज’ के नाम घोषित कर दी गई। साथ ही, न्यायालय ने बेटे को अपने साथ रखने का सुखद फैसला मेरे पक्ष में दिया। 

” ….लेकिन, अब तो मेरे और बच्चे के भविष्य में दूर तक अंधेरा छा चुका था। फिर भी मैं हिम्मत नहीं हारी। मायके में ही रहते हुए मैंने आगरा की अदालत के फैसले के विरुद्ध वर्ष 2013 में हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर कर दी, जो अभी विचाराधीन है। उन्हीं दिनों मैंने ठान ली कि अब मुझे एलएलबी कर खुद अपनी जंग लड़नी पड़ेगी। मैंने आगरा के डीआईजी से गुहार लगाई कि मेरे बेटे के नाम जमा जो रुपये मेरे देवर आदि ने कूटरचित कागजातों के आधार पर निकाल लिए हैं, वे मुझे दिलाए जाएं अथवा, जब तक हाईकोर्ट का पूरे मामले पर फैसला नहीं आ जाता, तब तक वह पूरी राशि उसके बेटे के नाम फिक्स करा दी जाए। 

” मेरे देवर ने पुलिस अधिकारियों के सामने स्वीकार किया वह ऐसा ही करेगा लेकिन आज तक स्थिति जस-की-तस है। जिस उम्र में मेरे बेटे को पढ़ाई-लिखाई में अपना भविष्य खोजना था, वह मेरे साथ थाना-कचहरियों के चक्कर काट रहा है। वह इस समय तीसरी क्लास में है। मैं पांच हजार की आय से कैसे उसका भविष्य संवारूं, कैसे उसे उसका हक दिलवाऊं, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। आखिर मेरे मासूम ने किसी का क्या बिगाड़ा है? समाज और कानून मेरी ईमानदारी और पतिव्रतित्व की आखिर कितनी बड़ी सजा देना चाहता है? मैंने जो लिखा है, सब सच है। मैं इसे प्रूफ कर सकती हूं। मेरे मासूम की मदद करिए।”

(पीड़िता अंशु वर्मा द्वारा प्रेषित पत्र पर आधारित)

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