अखबार ने नौकरी से निकाला तो 34 साल बाद कोर्ट से जीत सके दुबे जी!

कुछ लोगों का कहना है कि यह जीत कोई जीत नहीं है. 34 साल बाद किसी कंपनी से निकाले गए आदमी का जीतना बताता है कि दरअसल कंपनी जीत गई, आदमी हार गया. बावजूद इसके, कई पत्रकार साथी खुश हैं कि चलो, जीते हुए साथी को समुचित पैसा, बकाया, वेज बोर्ड और मुआवजा तो मिल ही जाएगा जिससे उसके परिवार को आगे कोई आर्थिक दिक्कत नहीं आएगी. Continue reading

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द वायर के खिलाफ स्टे लेने में जय शाह कामयाब, अब कोई कुछ न लिखे-बोले!

Om Thanvi : वायर, दायर और कायर… जय अमित शाह ने अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के अनेक अतिरिक्त सिविल जजों में एक चौथे जज की अदालत में द वायर के ख़िलाफ़ दायर सिविल मुक़दमे में स्टे प्राप्त कर लिया है। कि वे रोहिणी सिंह वाली ख़बर के आधार पर आगे और कुछ किसी भी रूप में (प्रिंट, डिज़िटल, इलेक्ट्रोनिक, ब्रॉडकास्ट, टेलिकास्ट या किसी अन्य मीडिया में ख़बर, इंटरव्यू, बहस, टीवी परिचर्चा की शक्ल में, किसी भी भाषा में, न प्रत्यक्ष न अप्रत्यक्ष) मुक़दमे के अंतिम निपटारे तक कुछ भी नहीं लिखेंगे-बताएँगे।

बताइए, लोकतंत्र का कैसा दौर है। न्यायपालिका ही अन्याय कर रही है? बग़ैर मीडिया (लेखक, प्रकाशक/प्रसारक) को नोटिस पहुँचाए, बग़ैर मीडिया का पक्ष सुने स्टे का इकतरफ़ा (एक्स-पार्टी) फ़ैसला दे दिया। यह आदेश भी अदालत ने बचाव पक्ष को नहीं भेजा। जय शाह के वकीलों ने भेजा है। न्याय तब मुकम्मल होता है जब दूसरे पक्ष को सुने बग़ैर उसके ख़िलाफ़ कोई स्टे आदि न दिया जाय। यहाँ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार ताक पर था।

मेरे वक़ील मित्रों का कहना है कि उन्हें इसमें ज़रा शक़ नहीं कि उच्च अदालत में यह इकतरफ़ा स्टे ख़ारिज हो जाएगा। मुझे भी न्यायपालिका से उच्च स्तर पर बड़ी उम्मीदें हैं। हालाँकि निचले स्तर पर भी न्यायप्रिय जज हैं। मगर ऊपरी अदालतों में अपीलों की तादाद बढ़ती ही है, घटती नहीं।

मज़ा देखिए छोटे शाह ने वायर पर फ़ौजदारी मुक़दमा मेट्रो कोर्ट में दायर किया है और सिविल मुक़दमा डिस्ट्रिक्ट (रूरल) कोर्ट में। जबकि जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ दावा किया है, उन सबका पता दिल्ली का है। बहरहाल, द वायर को (सिर्फ़ वायर को!) आगे कुछ न लिखने-दिखाने से रोकने की इस दूरस्थ कोशिश को मीडिया का, दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का गला मसोसने के सिवा और क्या कहा जा सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित संपादक रहे ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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No one killed Arushi!

Prateek Chaudhary : पुलिस ने शुरू से ही आरुषि मर्डर को ऐसे ट्रीट किया जैसे कोई बच्ची नही कोई जानवर मरा हो। कोई भी सबूत किसी के खिलाफ नही मिला पुलिस को जांच में ओर अब कोर्ट से सब बरी! आखिर कैसे मर गयी आरुषि? कोई तो होगा उसका कातिल? इस केस के इन्वेस्टिगेटर ऑफीसर पर कायर्वाही होनी चाहिए जिन्होंने अपना जमीर बेचकर एक मासूम बच्ची की लाश का सौदा कर सबूत मिटा दिये। माफ करना आरुषि, तुम ऐसे देश मे पैदा हुई जिसमें इंसान की कोई कीमत नहीं, जहाँ हर कुर्सी बिकाऊ है।

Haresh Kumar : अब तो ईश्वर ही बता सकते हैं कि आखिर में आरुषि को मारा किसने था? सारे गवाह और सबूत आरुषि के हत्यारों को दुनिया के सामने न ला सके। शुरुआत में इस केस में घरेलू नौकर से लेकर उनके दोस्तों पर शक गया था, लेकिन अगले दिन घरेलू नौकर हेमराज भी मृत पाया गया था, तो बाद में माता-पिता पर आरुषि की हत्या की बात सामने आई। इसके पीछे जो लोग थे उन्होंने इसे- ओनर किलिंग कहा। सवाल ये है कि आरुषि को मारा किसने। क्या आरोपी को सजा मिल सकेगी या आरोपी भी आपस में एक-दूसरे के हाथों मारे गए। कई पेंच हैं। 16 मई 2008 से आज तक यह मामला उलझा हुआ है और अब तो इसका सुलझना भी ईश्वर के हाथों में है। एक्स्ट्रीम कंडीशन में ही कोई मां-बाप अपनी बच्ची की हत्या कर सकता है, लेकिन यहां तो कई मर्डर हुए हैं। और डॉक्टर इतना निर्दयी नहीं होता। उसे भी समाज की परवाह होती है। पूरा करियर खत्म हो गया। सामाजिक प्रतिष्ठा चली गई और बेटी गई अलग से। अब जीने का क्या मकसद हो सकता है भला। उस दंपती के बारे में भी सोचें, जिसने अपनी इकलौती बेटी को खोया है। सच्चाई सिर्फ ईश्वर जानता है या उस घटना से संबंधित लोग, जिनमें से कई अब हैं नहीं।

Samar Anarya : तलवार दंपत्ति आरुषी हत्याकांड में बरी. दोषी कोई नहीं। न असली हत्यारे, न पुलिस जिसने केस बिगाड़ा, न मीडिया जिसने टीआरपी के लिए मामले को सनसनीखेज ही नहीं बनाया- जिसने मीडिया ट्रायल में तलवार परिवार को हत्यारा और यौन रोगी जैसा तक बना के पेश किया, उस 13 साल की बच्ची तक को! न्याय की जय हो. No one killed Arushi. कन्या पूजने वाले, बेटियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने वाले, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएँ चलाने वाले देश में कोई सोच भी कैसे सकता है- किसी बेटी को मारने का?

Abhishek Srivastava : बधाई हो। इंसाफ़ हुआ है। तलवार दंपत्ति के वकील कह रहे हैं कि इंसाफ़ हुआ है। जब माई-बाउ को सज़ा हुई थी तब रेबेका जॉन ने कहा था कि यह ”मिसकैरेज ऑफ जस्टिस” है। लीजिए, जस्टिस हो गया। बस एक सवाल है। जस्टिस आरुषि को चाहिए था या उसके कथित हत्‍यारों को? अब तो हत्‍यारा कहना भी पाप है। छूट गए हैं। अदालत से। इलाहाबाद वाली। मने, आरुषि ऐसे ही मर गई थी। बेमतलब इतना टाइम वेस्‍ट किया सबका। ठीके है। जाएदा…

Krishan Bhanu : सीबीआई से यक्ष प्रश्न… माँ-बाप बरी! तो फिर आरुषि को किसने मारा? शिमला के वरिष्ठ वकील छब्बील दास के हत्यारे क्यों नहीं पकड़े गए? मामला 1995 का है। शिमला के बड़े कारोबारी हर्ष बालजीज की शाम ढलते ही आर्मी एरिया में किसने गोली मारकर हत्या कर दी? हर्ष को 2003 में गोली मार दी गई थी। क्या ऐसे में कोटखाई गुड़िया रेप और हत्या की गुत्थी सुलझने की सीबीआई से उम्मीद की जा सकती है?

अलीगढ़ के युवा वकील प्रतीक चौधरी, दिल्ली के पत्रकार हरेश कुमार, मानवाधिकारवादी समर अनार्या, मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव और शिमला के वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण भानु की एफबी वॉल से.

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ईमानदार जज जेल में, भ्रष्टाचारी बाहर!

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है, इसलिए उसका फ़ैसला सर्वोच्च और सर्वमान्य है। चूंकि भारत में अदालतों को अदालत की अवमानना यानी कॉन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की नोटिस जारी करने का विशेष अधिकार यानी प्रीवीलेज हासिल है, इसलिए कोई आदमी या अधिकारी तो दूर न्यायिक संस्था से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा व्यक्ति भी अदालत के फैसले पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद निचली अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी न्याय पंचायत तक, कई फ़ैसले ऐसे आ जाते हैं, जो आम आदमी को हज़म नहीं होते। वे फ़ैसले आम आदमी को बेचैन करते हैं। मसलन, किसी भ्रष्टाचारी का जोड़-तोड़ करके निर्दोष रिहा हो जाना या किसी ईमानदार का जेल चले जाना या कोई ऐसा फैसला जो अपेक्षित न हो।

चूंकि जज भी इंसान हैं और इंसान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे पांच विकारों या अवगुणों के चलते कभी-कभार रास्ते से भटक सकता है। ऐसे में इंसान होने के नाते जजों से कभी-कभार गलती होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस दलील पर एकाध स्वाभाविक गलतियां स्वीकार्य हैं, हालांकि उन गलतियों का दुरुस्तीकरण भी होना चाहिए, लेकिन कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें प्रभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार की बहुत तेज़ गंध आती है। कोई बोले भले न, पर उसकी नज़र में फ़ैसला देने वाले जज का आचरण संदिग्ध ज़रूर हो जाता है। किसी न्यायाधीश का आचरण जनता की नज़र में संदिग्ध हो जाना, भारतीय न्याय-व्यवस्था की घनघोर असफलता है।

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में झांक कर इस कमी को पूरा करना होगा, वरना धीरे-धीरे उसकी साख़ ही ख़त्म हो जाएगी, जैसे बलात्कार के आरोपी अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति की ज़मानत मंजूर करके जिला एवं सत्र न्यायधीश जस्टिस ओपी मिश्रा ने न्यायपालिका की साख़ घटाई। दो साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। ऐसे फ़ैसले न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।

हाल ही में दो बेहद चर्चित जज न्यायिक सेवा से रिटायर हुए। मई में गायत्री को बेल देने वाले जज ओपी मिश्रा ने अवकाश ग्रहण किया, जून में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन। कर्णन की चर्चा बाद में पहले जज ओपी मिश्रा का ज़िक्र। गायत्री पर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने का आरोप था, इसके बावजूद जज मिश्रा ने ज़मानत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट में पता चला है कि जज मिश्रा ने गायत्री से 10 करोड़ रुपए लेकर ज़मानत पर रिहा कर दिया था। करोड़ों रुपए डकारने के बावजूद जज मिश्रा और दूसरे रिटायर्ड जज आराम से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।

दूसरी ओर जस्टिस कर्णन पर कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, फिर भी वह जेल की हवा खा रहे हैं। यह भी गौर करने वाली बात है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय के हैं और दुर्भाग्य से भारतीय न्यायपालिका में दलित और महिला समाज का रिप्रजेंटेशन नहीं के बराबर है। दलित या महिला समुदाय के किसी जज को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जज बनाया गया यह विरला ही सुनने को मिलता है। फिर जस्टिस कर्णन ऐसे समय बिना गुनाह (इसे आगे बताया गया है) के जेल की हवा खा रहे हैं, जब किसी दलित व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाकर सर्वोच्च सम्मान देने की होड़ मची है और दलित समाज के दो शीर्ष नेता रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं।

जस्टिस कर्णन को सजा देने का फैसला भी किसी एक जज ने नहीं किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सात सीनियर मोस्ट जजों की संविधान पीठ ने किया है। संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को सर्वोच्च न्यायिक संस्था की अवमानना का दोषी पाया और एकमत से सज़ा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट के सात विद्वान जजों की पीठ के दिए इस फैसले की न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे किसी दूसरे फोरम में चुनौती दी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन प्रकरण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सेवारत जज को जेल की सजा हुई हो।

जबसे जस्टिस कर्णन गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए हैं। आम आदमी के मन में यह सवाल बुरी तरह गूंज रहा है कि आख़िर कर्णन का अपराध क्या है? क्या उन्होंने कोई संगीन अपराध किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ग़लत फ़ैसला दिया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने किसी से पैसे लिए या कोई भ्रष्टाचार किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ऐसा आचरण किया जो किसी तरह के अपरोक्ष भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है? उत्तर – नहीं। मतलब न कोई अपराध किया, न ग़लत फ़ैसला दिया और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, फिर भी हाईकोर्ट का जज जेल में है। लिहाजा, आम आदमी के मन में सवाल उठ रहा है कि फिर जस्टिस कर्णन जेल में क्यों हैं? उत्तर – उन्होंने कथित तौर पर कई भ्रष्ट जजों के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दिए थे।

दरअसल, जस्टिस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को पीएम मोदी को लिखे खत में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के दर्जनों जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। कर्णन ने अपनी चिट्ठी में 20 जजों के नाम लिखते हुए उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इस आचरण को कोर्ट की अवमानना क़रार दिया और उन्हें अवमानना नोटिस जारी कर सात जजों की बेंच के सामने पेश होने का आदेश दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसका गवाह पूरा देश है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी कार्यरत जस्टिस को जेल की सज़ा हुई हो।

यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति बनाम न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। इस प्रकरण का विस्तार हो गया है और यह देश के लोकतंत्र के 80 करोड़ से ज़्यादा स्टैकहोल्डर्स यानी मतदाओं तक पहुंच गया है। देश का मतदाता मोटा-मोटी यही बात समझता है कि जेल में उसे होना चाहिए जिसने अपराध किया हो। जिसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे जेल कोई भी नहीं भेज सकता। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इस देश के लोग भ्रष्टाचार को लेकर बहुत संजीदा हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार की बीमारी से हर आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के लोगों ने भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली एक नई नवेली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

बहरहाल, भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय, पक्षपात या अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने की आज़ादी देता है। अगर कर्णन को लगा कि उनके साथ अन्याय और पक्षपात हो रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उनका मौलिक अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने जजों के ख़िलाफ़ आरोप प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में लगाए थे। उस प्रधानमंत्री को जिसे देश के सवा सौ करोड़ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। लिहाज़ा, अवमानना नोटिस जारी करने से पहले जस्टिस कर्णन के आरोपों को सीरियली लिया जाना चाहिए था, उसमें दी गई जानकारी की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उसके बाद अगर जस्टिस कर्णन गलत पाए जाते तो उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। लिहाज़ा, उसका ध्यान उन मुद्दों पर सबसे पहले होना चाहिए, जिसका असर समाज या देश पर सबसे ज़्यादा होता है। मसलन, देश की विभिन्न अदालतों में दशकों से करोड़ों की संख्या में विचाराधीन केसों का निपटान कैसे किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत सबसे ज़्यादा शिथिल है। इसकी एक नहीं कई कई मिसालें हैं, जिनसे साबित किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील केसेज़ को लेकर भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए।

उदाहरण के रूप में दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप केस को ले सकते हैं। जिस गैंगरेप से पूरा देश हिल गया था। सरकार ने जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। उन्होंने दिन रात एक करके रिपोर्ट पेश की। आनन-फानन में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और अपराधिक क़ानून में बदलाव किए गए। उस केस की सुनवाई के लिए फॉस्टट्रैक कोर्ट गठित की गई जिसने महज 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केवल 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने लटका दिया और उसे फैसला सुनाने में तीन साल (1145 दिन) से ज़्यादा का समय लग गया।

देश का आम आदमी हैरान होता है कि करोड़ों की संपत्ति बनाने वाली जयललिता को निचली अदालत के जज माइकल चून्हा ने 27 सितंबर 2014 को चार साल की सज़ा सुनाई, जिससे उन्हें सीएम की कुर्सी  छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा। उनका राजनीतिक जीवन ही ख़त्म हो गया। लेकिन आठ महीने बाद 11 मई 2015 को कर्नाटक हाईकोर्ट के कुमारस्वामी ने जया को निर्दोष करार दे दिया। वह फिर मुख्यमंत्री बन गई और जब मरी तो अंतिम संस्कार राजा की तरह हुआ। जबकि क़रीब दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को ही कुमारस्वामी का फ़ैसला रद्द करना पड़ा। देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों की नज़र में कुमारस्वामी का आचरण क्यों नहीं आया। अगर उन्होंने ग़लत फ़ैसला न सुनाया होता तो एक भ्रष्टाचारी महिला दोबारा सीएम न बन पाती और उसकी समाधि के लिए सरकारी ज़मीन न देनी पड़ती। इससे पता चलता है कि कुमारस्वामी ने कितना बड़ा अपराध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनको कोई नोटिस जारी नहीं किया। सबसे अहम कि कुमारस्वामी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।

इसी तरह हिट ऐंड रन केस में अभिनेता सलमान ख़ान को 7 मई 2015 को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई। आम आदमी को ज़मानत लेने में महीनों और साल का समय लग जाता है, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सलमान ख़ान को कुछ घंटों के भीतर  बेल दे दी। इतना ही नहीं जब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि सलमान को शर्तिया सज़ा होगी, तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एआर जोशी ने 10 दिसंबर 2015 को रिटायर होने से कुछ पहले दिए गए अपने फ़ैसले में सलमान को बरी कर दिया। इस फ़ैसले से सरकार ही नहीं देश का आम आदमी भी हैरान हुआ। साफ़ लगा कि अभिनेता ने न्यायपालिका को मैनेज कर लिया। जब जज ओपी मिश्रा रिश्वत ले सकते हैं तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज भी रिश्वत ले सकता है, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सलमान को रिहा करने की राज्य सरकार की अपील अब दो साल से सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सलमान को सज़ा दे दी तो क्या जस्टिस एआर जोशी के ख़िलाफ कार्रवाई होगी, ज़ाहिर है नहीं, क्योंकि इस तरह की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं हैं।

बहरहाल, अगर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पर जस्टिस कर्णन ने पीएम को पत्र लिखा तो अवमानना नोटिस देने से पहले कर्णन के आरोपों की गंभीरता और तथ्यपरकता की जांच होनी चाहिए थी। जिन पर कर्णन ने आरोप लगाया, उनका बाल भी बांका नहीं हुआ और आरोप लगाने वाले कर्णन को उनके आरोप ग़लत साबित होने से पहले ही जेल भेज दिया गया। न्यायपालिका के भीतर रहते हुए कोई उसकी व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठा सकता और उसके बाहर होने पर भी आलोचना नहीं कर सकता। वह अवमानना का विषय बन जाएगा। यह तो निरंकुशता हुई, जिसका समाधान जल्द से जल्द खोजा जाना चाहिए।

लेखक Hari Govind Vishwakarma से संपर्क 09920589624 के जरिए किया जा सकता है.

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Letter to Chief Justices of Indian High Courts for simplification of procedural laws to cut delays in judgments

To

All the Hon’ble

Chief Justices of Indian High Courts

Sir,

SIMPLIFICATION OF PROCEDURAL LAWS TO CUT DELAYS IN JUDGMENTS

I wish to invite your kind attention to the fact that it is pretended that the procedural laws of the land pose greatest challenge to timely justice to litigants.  The Code of Civil Procedure and Code of Criminal Procedure are the laws of Central Legislature and State Governments are also empowered to amend the codes according to their needs. Both the Codes are originally creation of British India.

AND SECTION- 122. OF Code of Civil Procedure goes on to say—Power of certain High Courts to make rules— High Courts not being the Court of a Judicial Commissioner may, from time to time after previous publication, make rules regulating their own procedure and the procedure of the Civil Courts subjects to their superintendence, and may be such rules annul, alter or add to all or any of the rules in the First Schedule.

LIKEWISE- Section 477 –of Code of Criminal Procedure says- Power of High Court to make rules

(1) Every High Court may, with the previous approval of the State Government, make rules—

(a) as to the persons who may be permitted to act as petition-writers in the Criminal Courts subordinate to it;

(b) regulating the issue of licences to such persons, the conduct of business by them, and the scale of fees to be charged by them.

(c) providing a penalty for a contravention of any of the rules so made and determining the authority by which such contravention may be investigated and the penalties imposed;

(d) any other matter which is required to be, may be, prescribed.

(2) All rules made under this section shall be published in the Official Gazette.

Accordingly it well within Authority and Competence of your kind honour to amend, and tailor both the codes to suit the need of the hour rather than to see for any other organ of Democracy for justice delayed.

Therefore it is my humble request that the undemocratic and anti-people provisions of the codes be identified, and necessary steps be taken in right direction to ensure justice to each and every body, within a reasonable period of time.

With regards,

Sincerely yours

Mani Ram Sharma

Chairman, Indian National Bar Association, Churu- Chapter

Nakul Niwas, Behind Roadways Depot

Sardarshahar- 331 403-7 District Churu (Raj)

maniramsharma@gmail.com                             

Dated: 12th Jun, 2017

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स्टेट अथारिटीज को अखबारों का सरकुलेशन जांचने के आदेश पर कोर्ट ने जारी किया नोटिस

याचिका के जरिए डीएवीपी की मीडिया पॉलिसी को चुनौती दी गई है… सर्कुलेशन जांच का अधिकार प्रेस रजिस्ट्रार को दिया जाए, किसी दूसरी एजेन्सी को नहीं…

जोधपुर । ऑल इण्डिया स्माल एण्ड मीडियम न्यूज पेपर फेडरेशन द्वारा डीएवीपी की मीडिय पॉलिसी 2016 एवं सर्कुलेशन जांच के अधिकार प्रेस रजिस्ट्रार के अलावा किसी दूसरी एजेन्सी को दिये जाने के मामले में दायर की गई चुनौती याचिका पर सुनवाई के बाद राजस्थान उच्च न्यायालय ने गुरुवार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया हैं। याचिका में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव, डीएवपी, प्रेस पंजीयक, सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के प्रिन्सिपल सेक्रेटरी एवं डीआईपीआर को भी पार्टी बनाया गया हैं। याचिका फेडरेशन के जिलाध्यक्ष खरथाराम द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज भंडारी, एस.पी. शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने पैरवी की।

एडवोकेट दलपतसिंह राठौड़ ने बताया कि डीएवीपी की विज्ञापन पॉलिसी 2016 मे प्रेस पुस्तक पंजीकरण अधिनियम 1867 के प्रावधानों को दरकिनार कर महानिदेशक ने समाचार पत्रों के सर्कुलेशन की जांच का अधिकार न केवल स्वयं ले लिया बल्कि बाद में एक आदेश जारी कर राजस्थान के प्रिन्सिपल सेक्रेटरी को भी जिला स्तरीय जन सम्पर्क अधिकारियों से जांच करवाने के निर्देश जारी कर दिये। दिल्ली हाईकोर्ट इससे पूर्व सर्कुलेशन जांच के अधिकार प्रेस रजिस्ट्रार के अतिरिक्त किसी अन्य विभाग के अधिकारी या निजी एजेन्सी को देने संबंधित आदेश को अवैध ठहराते हुए रद्द कर चुका है। यहां तक प्रेस काउंसिंल ऑफ इण्डिया ने भी विभिन्न मामलों में माना है कि स्टेट अथारटिज को समाचार पत्र के सर्कुलेशन जांच का अधिकार नही है।

याचिका में कहा गया है कि डीएवीपी से अनुमोदित चल रहे मौजूदा अखबारों को 1 जनवरी 16 से 31 दिसंबर 18 तक की 3 साल की अवधि की विज्ञापन दर का अनुबंध दिया जा चुका है जो पूर्व में प्रभावी विज्ञापन नीति 2007 के तहत दिया गया था। उक्त पॉलिसी में प्रावधान था कि महानिदेशक द्वारा किया गया अनुबंध आखिरी अवधि तक वैध रहेगा, लेकिन डीएवीपी ने 5 मई 17 को एक एडवाइजरी जारी कर निर्देश दिये हैं कि 45000 से अधिक के सर्कुलेशन वाले अखबारों को आरएनआई अथवा एबीसी से सरकुलेशन वेरीफीकेशन प्रमाण पत्र लाकर प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा 1 जून 17 से विज्ञापन दर जारी नहीं की जायेगी।

इस याचिका में राजस्थान के सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के सेक्रेटरी एवं निदेशक के उस आदेश को भी चुनौती दी गई हैं जिसमें जिला स्तर के पीआरओ के माध्यम से अनुमोदित अखबारों के सर्कुलेशन की जांच के निर्देश दिये गये हैं। हाईकोर्ट की एकलपीठ के न्यायाधीश संगीत लोढा ने याचिका पर सुनवाई के बाद संबंधित पक्षकारों को कारण बताओ नोटिस जारी कर 25 मई तक जवाब तलब किया है।

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माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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PIL for making Yoga compulsory

After considerable hearing the PIL for making Yoga compulsory for students of Class I-VIII and for framing a National Yoga Policy, Hon’ble Chief Justice of India posted the matter for further hearing on 29.11.2016 with another petition [SLP(C) 3987 of 2011] pending before Justice Lokur.

PRAYER

For the reasons stated above, it is the most respectfully prayed that this Hon’ble Court may be pleased to:

a) issue a writ, order or direction including writ in the nature of mandamus or such other writ, order or direction as may be necessary; directing the Ministry of HRD, NCERT, NCTE and CBSE to provide standard textbooks of ‘Yoga and Health Education’ for students of Class I-VIII in spirit of the Article 21A read with Article 14, 15 and 21;

b) issue a writ, order or direction including writ in the nature of mandamus or such other writ, order or direction as may be necessary; directing the Ministry of AYUS and Ministry of Health and Family Welfare to frame a ‘National Yoga Policy’ to promote and propagate the Yoga in spirit of the Article 21 read with the Article 39(e), 39(f) and 47;

c) issue a writ, order or direction including writ in the nature of mandamus or such other writ, order or direction as may be necessary; directing the Ministry of Women and Child Development and Ministry of Social Justice and Empowerment to declare ‘First Sunday’ of every month as ‘Health Day’ on the lines of ‘Polio Day’ to make the people aware about health-hazards and health-hygiene;

d) issue such other writ, order or direction as this Hon’ble Court may deem fit to secure the ‘Right to Health’ and ‘Right to Education’ and allow cost to petitioner.

GROUNDS

That petitioner begs to file the present writ petition inter-alia on the following grounds.

A. BECAUSE ‘Right to Health’ is integral part of Right to Life under the Article 21. It includes protection, prevention and cure of the health and is a minimum requirement to enable a person to live with human dignity. State has a obligation to provide health facilities to all the citizens, especially to children and adolescents. In a Welfare State, it is obligation of the State to ensure the creation and sustaining of conditions congenial to good health. Article 21 read with Article 39(e), 39(f) and 47, casts the duty on the State to take appropriate steps to improve health of the citizens and provide necessary information instruction and training in this regard. Every branch of the Executive has the constitutional obligation to extend his services with due expertise for protecting the life. This Hon’ble Court has reiterated that in an organized society, right to live as a human being is not insured by meeting only the animal needs of man but it is secured only when he is assured of all facilities to develop himself and is free from restrictions, which inhibit the growth. All human beings are designed to achieve this object. Right to Health cannot be secured without providing “Yoga and Health Education” to all the Children and without framing a “National Yoga Policy” to promote and propagate the Yoga.

B. BECAUSE for strengthening, social fabric of democracy through provision of equal opportunity to all has been accepted since inception of our republic. Article 21A, was inserted to provide free and compulsory education to children aged 6-14 years as a fundamental right and the Right to Free and Compulsory Education Act 2009 was enacted. Statement of objects of the Act says that every child has to be provided fulltime elementary education of satisfactory and equitable quality in a formal school that satisfies certain norms and standard. The legislation is anchored in the belief that the values of equality, social justice and democracy and creation of a just and humane society can be achieved only through provision of inclusive elementary education to all. Provision of free-compulsory education of satisfactory quality to disadvantaged and weaker section children is, therefore, not merely the responsibility of schools run/supported by the appropriate governments, but also of schools, which are not dependent on government funds. Section 7(6) of the Act says that Central government shall (a) develop a framework of national curriculum with the help of academic authority specified under Section 29  (b) develop and enforce standards for training of teachers (c) provide technical support and resources to State governments for promoting innovations, researches, planning and capacity building.

C. BECAUSE Union Government vide its notification dated 31.05.2010 had notified that National Curriculum Framework 2005 shall be the national curriculum under Section 7(6) of the Right of Children to Free & Compulsory Education Act 2009. NCF 2005 specifically says that yoga is core and compulsory subject of the elementary education thus it needs to be given equal status with other subjects. There are about 20 crores children, throughout the country,  studying in primary and junior classes at the cost of public exchequer. Yoga should be taught to them as a compulsory subject as per National Curriculum Framework 2005, notified under Section 7(6) of the Right of Children to Free and Compulsory Education Act 2009. Petitioner filed this petition for proper implementation of ‘Yoga and Health Education’ at primary and junior level with the object to make our children healthy through Pranayams and Asanas. It is necessary to state that NCERT develops syllabi of all the subjects for primary and junior classes so it should develop standard textbooks of “Yoga and Health Education” for students of Class I-VIII. It is necessary to state that Three Judges Bench of Appellate Court of California (USA) has held that yoga is a secular. This Hon’ble Court has also expressed similar view in three cases hence it is bounden duty of the Executive to frame a ‘National Yoga Policy’ in spirit of the Article 21.

D. BECAUSE ‘Yoga and Health Education’ has become the fundamental right of 6-14 years children after enactment of the RTE Act. However, it is remained named-sake on papers and is the most neglected subject. Marks are not awarded for Yoga in annual exam and even the teachers of Kendriya Vidyalaya and Navoday Schools say that yoga is not a compulsory subject. It is very surprising that NCERT has not yet published standard textbooks of ‘Yoga and Health Education’ for students of Class I-VIII. It is necessary to state that without syllabus, without standard textbooks, without teachers and without evaluation of marks, there has been total failure in imparting the yoga education in spirit of NCF 2005. It is not out of context to state the total dichotomy between actual practice of yoga education and the ideal of yoga, as propounded by Hon’ble Prime Minister, in his speech before United Nations General Assembly on 27.09.2014 as thus: “Yoga is an invaluable gift of India’s ancient tradition. It embodies unity of mind and body; thought and action; restraint and fulfillment; harmony between man and nature; a holistic approach to health and well-being. It is not about exercise, but, to discover the sense of oneness with self, the world and the nature. By changing our lifestyle and creating consciousness, it can help in well being. Let us work towards adopting an International Yoga Day.”

E. BECAUSE Yoga is a scientific and universal method, a tradition and culture of self-discipline, self-realization and self-revelation. It is not a ritualistic procedure or a sectarian bunch of knowledge; rather a medical science and a life science. Besides being an excellent medical system, Yoga is a life style for an integrated development of life. It is an excellent and powerful means of self-control. Yoga is an emotional and practical process for diverting the flow of our thought arising in our mind in any state towards a positive direction and an excellent method of developing life skills. In every person, there are, on one hand, limitless divine qualities and potential of becoming a superman, a great scientist, a philosopher, a thinker, a manager or an efficient administrator; while on other hand, there are impure and cruel thoughts, which can make him an extremely ruthless beast, a devil, a criminal or a terrorist. Through Yoga, we can realize a fully developed personality, by developing own creative faculties, emotions, thoughts and capabilities. Yoga is well-tried and tested method of centuries to transform the feelings of indolence, despondency, lack of confidence, insensitivity and self-deprecation, which are deeply rooted in the mind, into self-control, self-conscientiousness, self- confidence, self-discipline, self-esteem, self-respect, self-restraint and selflessness.

F. BECAUSE right to education under the Article 21A has to be read in conformity with Article 14, 15 and 21 of the Constitution. There must be no discrimination in quality of education. The right of a child should not be restricted only to free and compulsory education, but should be extended to have value-based uniform education without any discrimination on the ground of a child’s social economic and cultural background thus a common syllabus and common curriculum is required. Value-based uniform education system would achieve the code of a common culture, removal of disparity and depletion of discriminatory values in human relations and it would enhance virtues and improve the quality of human life, elevate the thoughts, which advance the Constitutional philosophy of equal society. Children are not only the future citizens but also the future of the earth. Education connotes the whole course of scholastic instruction, which a person has received. It connotes the process of training and developing the knowledge, skill, mind and character of student by formal schooling. Value-based uniform education will help in diminishing opportunities to those who foment fanatic and fissiparous tendencies. The world shall be a better or worse place to live according to how we treat the children today thus it is duty of the State to provide Yoga and Health Education to all the children.

Ashwini Upadhyay

aku.aor@gmail.com

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भास्कर को झटके पर झटका, पत्रकार धर्मेंद्र के बाद अब रिसेप्शनिस्ट लतिका के भी ट्रांसफर पर कोर्ट ने लगाई रोक

भारत में ‘ज़िद करो दुनिया बदलो’ का नारा देने वाले डीबी कॉर्प को लगातार झटके लग रहे हैं, किंतु भास्कर प्रबंधन है कि सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगने पर अपने प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का मुम्बई से सीकर (राजस्थान) ट्रांसफर कर दिया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह अदालत की शरण में गए और इंडस्ट्रियल कोर्ट ने इस ट्रांसफर पर रोक लगा दी। इसके बाद अब भास्कर की सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) अक्षता करंगुटकर ने डी बी कॉर्प के मुम्बई के माहिम स्थित कार्यालय में कार्यरत महिला रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण का सोलापुर में ट्रांसफर कर दिया।

लतिका ने भी मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर तथा प्रमोशन की मांग को लेकर 17(1) के तहत कामगार आयुक्त कार्यालय में रिकवरी क्लेम लगाया हुआ है। इस बात का पता जैसे ही भास्कर प्रबंधन को चला कि लतिका ने रिकवरी क्लेम लगाया है, भास्कर प्रबंधन ने उन्हें कुछ ले-दे कर क्लेम वापस लेने को कहा। जब लतिका ने इनकार कर दिया तो अक्षता करंगुटकर ने उन्हें सीधे तौर पर धमकी दी कि ‘मैं तुम्हारा करियर बर्बाद कर दूंगी!’ यहां बताना आवश्यक है कि लतिका ने इसकी लिखित शिकायत कामगार विभाग में भी की है। यह बात और है कि लतिका के फैसले से गुस्साई अक्षता करंगुटकर ने उसी दिन उनका ट्रांसफर सोलापुर में कर दिया और घर पर ट्रांसफर लेटर भेज दिया।

यही नहीं, अगले दिन से लतिका चव्हाण के डीबी कॅार्प (माहिम) दफ्तर में प्रवेश पर रोक तक लगा दी गई! प्रबंधन के इस मनमाने रवैये से क्षुब्ध लतिका ने मजीठिया वेज बोर्ड हेतु पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा से बात की। तत्पश्चात उन्हीं की सलाह पर इंडस्ट्रियल कोर्ट में डीबी कॉर्प के एमडी सुधीर अग्रवाल और सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) अक्षता करंगुटकर के साथ-साथ डी बी कॉर्प को भी पार्टी बनाते हुए एक केस फ़ाइल कर दिया।

इस मामले में लतिका चव्हाण का इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ला ने। मामले की सुनवाई न्यायाधीश सूर्यवंशी जी ने किया। न्यायाधीश ने लतिका आत्माराम चव्हाण के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दी। इस आदेश की जानकारी मिलते ही भास्कर कर्मियों में जहां एक बार फिर ख़ुशी फैल गई, वहीं भास्कर प्रबंधन इस दोहरे झटके से सकते में है! वैसे आपको बता दूं कि भास्कर प्रबंधन ने एक साल पहले भी अपने पत्रकार इंद्र कुमार जैन का ट्रांसफर किया था, मगर तब भी उसे मुंहकी खानी पड़ी थी। फिर 10 अक्टूबर को धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर और उस पर लगी अदालती रोक के बाद तो भास्कर की पूरे भारत में थू-थू हो रही है!

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मोबाइल: 09322411335

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भास्कर के पत्रकार ने प्रबंधन को दिया जोरदार झटका, अदालत से ट्रांसफर रुकवाया

मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण भास्कर प्रबंधन ने अपने पत्रकार धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का कर दिया था ट्रांसफर…

मुम्बई के तेज-तर्रार पत्रकारों में से एक धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगे जाने पर राजस्थान के सीकर में ट्रांसफर कर दिया था। मुम्बई में दैनिक भास्कर में एंटरटेनमेंट बीट के लिए प्रिंसिपल करेस्पांडेंट पद पर कार्यरत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को भास्कर प्रबंधन ने पहले उन्हें लालच दिया कि कुछ ले-दे कर मामला ख़त्म करो। फिर उन्हें भास्कर की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर (कार्मिक) ने धमकी दी, जिसकी शिकायत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने श्रम आयुक्त से की।

जब धमकी से भी धर्मेन्द्र प्रताप सिंह नहीं डरे तो उनका राजस्थान के सीकर में एंटरटेनमेंट पेज के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर लेटर ठीक उस दिन उन्हें घर पर मिला, जब वे मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई के लिए दिल्ली गए थे। दिल्ली से वापस आये तो उन्हें दफ्तर में जाने नहीं दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों की तरफ से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा से सलाह ले कर इंडस्ट्रियल कोर्ट की शरण ली, जहां इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ल ने।

इस बहस के दौरान इंडस्ट्रियल कोर्ट के जज श्री एस. डी. सूर्यवंशी ने मौखिक टिप्पणी की कि मजीठिया वेज बोर्ड आज देश का सबसे गर्म मामला है। माननीय न्यायाधीश ने साफ़ कहा कि डी बी कॉर्प ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर गलत तरीके से किया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने डीबी कॉर्प के एम. डी. सुधीर अग्रवाल और कार्मिक विभाग की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर सहित कंपनी को भी अदालत में पार्टी बनाया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की मदद की रविन्द्र अग्रवाल सरीखे देश के दूसरे पत्रकारों ने, जिन्होंने ऐन वक्त पर उन्हें तमाम जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवाए। अदालत द्वारा धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर पर रोक लगाने से मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों में खुशी का माहौल है, जबकि भास्कर प्रबंधन के खेमे में निराशा है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता
मुंबई
संपर्क : 9322411335

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

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आईपीएस को फोन पर धमकाने के मामले में मुलायम की मुश्किलें बढ़ीं, पुलिस रिपोर्ट खारिज, आवाज़ मिलान के आदेश

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव द्वारा आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को मोबाइल फोन से दी गयी धमकी के सम्बन्ध में दर्ज एफआईआर में हजरतगंज पुलिस द्वारा लगाये गए अंतिम रिपोर्ट को अदालत ने ख़ारिज कर दिया है. सीजेएम लखनऊ संध्या श्रीवास्तव ने अपने आदेश में कहा कि केस डायरी से स्पष्ट है कि विवेचक ने कॉम्पैक्ट डिस्क में अंकित वार्तालाप की आवाज़ का नमूना परीक्षण नहीं कराया है और मात्र मौखिक बयान दर्ज कर के अंतिम रिपोर्ट प्रेषित कर दिया है.

सीजेएम लखनऊ संध्या श्रीवास्तव ने क्षेत्राधिकारी हजरतगंज को इस मामले में अग्रिम विवेचना करते हुए अमिताभ और मुलायम सिंह के आवाज़ का नमूना प्राप्त कर उसका कॉम्पैक्ट डिस्क की आवाज़ से विधि विज्ञानं प्रयोगशाला में परीक्षण करा कर 30 सितम्बर 2016 तक रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं. ज्ञात हो कि इस मामले में विवेचक द्वारा धमकी की बात गलत होने और अमिताभ द्वारा महज लोकप्रियता के लिए गलत तथ्यों के आधार पर झूठी सूचना दिए जाने की बात कहते हुए अंतिम रिपोर्ट कोर्ट को भेजी गयी थी. अमिताभ ठाकुर ने कोर्ट में इस अंतिम रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका दायर कर इसे चुनौती दी थी. कहा जा सकता है कि कोर्ट के ताजे आदेश के बाद मुलायम की मुश्किलें बढ़ गई हैं. नीचे कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश की कापी है…

Mulayam Phone case : Order for voice sample matching in FSL

In the protest petition presented by IPS officer Amitabh Thakur against the Final report presented by Hazratganj police in the FIR registered by him regarding alleged threat given to him by SP Supremeo Mulayam Singh Yadav on mobile phone, the CJM Lucknow Court today dismissed the Final report.

CJM Lucknow Sandhya Srivastava said in her order that it is apparent from the Case diaries that the voice samples have not been scientifically examined and Final report has been sent merely on hearsay evidences. Hence she directed Circle officer Hazratganj to undertake further investigation in the matter and get the voices in the Compact Disc scientifically examined in the State Forensic Science Laboratory, presenting his report by 30 September 2016.

Previously the Investigating Officer had presented Final Report concluding that the threat allegations were not found to be correct and was a false case based on wrong facts for cheap popularity. Amitabh had presented a protest application against the Final Report.

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कुमार विश्वास ने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया, ज़मानत पर रिहा

सुल्तानपुर : आम आदमी पार्टी नेता और कवि कुमार विश्वास आज ज़िला न्यायालय पहुंचे और आत्म समर्पण कर दिया। इसके पहले पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं आगे भी आम आदमी के लिये शांतिभंग करता रहूंगा। ज्ञात हो कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान आप नेता कुमार विश्वास ने अमेठी से दावेदारी ठोकी थी। इस बीच अमेठी के गौरीगंज थाने में श्री विश्वास के विरुद्ध भड़काऊ भाषण देने, सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने समेत कई धाराओं में अभियोग दर्ज हुआ था।

शनिवार को कुमार विश्वास के साथ गेस्ट हाऊस में कई उनके समर्थक मौजूद थे। पत्रकारों से कुमार विश्वास सवार्जनिक तौर पर रुबरु हुए। विश्वास ने बातचीत में कहा कि दो अलग-अलग मामले हैं और सामान्य राजनैतिक कार्यकर्ता के नाते कुछ किया जाये तो प्रशासन की शांति भंग हो जाती है। वैसे ही चुनाव के दौरान शांति भंग का केस दर्ज हुआ था और सामान्य न्यायिक प्रकिया है जिसके लिये प्रस्तुत हुए हैं। श्री विश्वास ने कहा कि आम आदमी की लड़ाई में ऐसी शांति भंग करते आये हैं और करते रहेंगे। क़रीब एक बजे श्री विश्वास ने अदालत में आत्म समर्पण किया जहां अदालत ने उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया।

सुलतानपुर से असगर नकी और अज़हर अब्बास की रिपोर्ट. संपर्क : naqui1983@gmail.com

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बस्तर के आईजी कल्लूरी ने जिस पत्रकार सोमारू नाग को नक्सली बताकर जेल में ठूंसा उसे कोर्ट ने बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया

Kamal Shukla : ब्रेकिंग न्यूज़ जगदलपुर… पत्रकार सोमारू नाग को न्यायालय ने किया बाइज्जत बरी। पत्रकार सोमारू नाग को फर्जी मामला बनाकर बस्तर आईजी शिव राम प्रसाद कल्लूरी ने था फँसाया। एक साल पहले किया था कल्लूरी ने फर्जी मामले में गिरफ्तार। केंद्रीय जेल जगदलपुर में थे एक साल से सोमारू नाग। कर रहे थे न्याय का इन्तजार।

सोमारू नाग के वकील अरविन्द चौधरी ने कोर्ट में विस्तार से प्रमाण व दस्तावेजों के साथ पूरी कहानी बताई जिससे अदालत ने सोमारू नाग को रिहा करने का आदेश दिया। बस्तर के दुर्दांत पुलिस अधिकारियों के बनाये गए झूठे प्रकरण से बेदाग़ बाहर आने वाले ग्रामीण पत्रकार सोमारू नाग की रिहाई तथा भारतीय न्यायपालिका का उसे नक्सल मामले से निर्दोष रिहा करने का फैसला लोकतन्त्र की जीत है। साथ ही पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर लड़ी जा रही हमारी लड़ाई के लिए भी राहत पहुंचाने वाली खबर है।

पत्रकार कमल शुक्ला की एफबी वॉल से.

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जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है!

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर ‘चौथी दुनिया’ में छपी प्रभात रंजन दीन की ये बेबाक रिपोर्ट पढ़ें

जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है. जज अपने बेटों और नाते रिश्तेदारों को जज बना रहे हैं। और सरकार को उपकृत करने के लिए सत्ता के चहेते सरकारी वकीलों को भी जज बनाने की संस्तुति कर रहे हैं. न्यायाधीश का पद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रभावशाली जजों का खानदानी आसन बनता जा रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अद्यतन सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बेटे से लेकर कई प्रमुख न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार शामिल हैं.

नेताओं को भी खूब उपकृत किया जा रहा है. वरिष्ठ कानूनविद्, उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई है.

जजों की नियुक्ति के लिए की गई संस्तुति की जो सूची सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उसमें 73 नाम जजों के रिश्तेदारों के हैं और 24 नाम नेताओं के रिश्तेदारों के हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का कार्यभार संभालने के पूर्व जो तकरीबन 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे उनमें भी अधिकांश लोग जजों के बेटे और रिश्तेदार हैं या सरकार के पैरवी-पुत्र सरकारी वकील हैं. अब जज बनने के लिए योग्यता ही हो गई है कि अभ्यर्थी जज या नेता का रिश्तेदार हो या सत्ता की नाक में घुसा हुआ सरकारी वकील. अन्य योग्य वकीलों ने तो जज बनने का सपना देखना भी बंद कर दिया है.

जब न्यायाधीश ही अपने नाते-रिश्तेदारों और सरकार के प्रतिनिधि-पुत्रों को जज नियुक्त करे तो संविधान का संरक्षण कैसे हो? यह कठोर तथ्य है जो सवाल बन कर संविधान पर चिपका हुआ है. यह पूरे देश में हो रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए विभिन्न हाईकोर्टों से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी जा रही हैं, उनमें अधिकांश लोग प्रभावशाली जजों के रिश्तेदार या सरकार के चहेते सरकारी अधिवक्ता हैं. वरिष्ठ वकीलों को जज बनाने के नाम पर न्यायपीठों में यह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी कृत्य निर्बाध गति से चल रहा है, इसके खिलाफ सार्वजनिक मंच पर बोलने वाला कोई नहीं.

सार्वजनिक मंच पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रो सकते हैं, लेकिन जजों की नियुक्तियों में जो धांधली मचा कर रखी गई है, उसके खिलाफ कोई नागरिक सार्वजनिक मंच पर रो भी नहीं सकता. इस रुदन और उस रुदन के मर्म अलग-अलग हैं. रिश्तेदारों और सरकारी वकीलों को जज बना कर आम आदमी के संवैधानिक अधिकार को कैसे संरक्षित-सुरक्षित रखा जा सकता है और ऐसे जज किसी आम आदमी को कैसा न्याय देते होंगे, लोग इसे समझ भी रहे हैं और भोग भी रहे हैं. देश की न्यायिक व्यवस्था की यही सड़ी हुई असलियत है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश कर फाइनल लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी, उनमें से अधिकांश नाम मौजूदा जजों या प्रभावशाली रिटायर्ड जजों के बेटे, भांजे, साले, भतीजे या नाते रिश्तेदारों के हैं. बाकी लोग सत्ता सामर्थ्यवान सरकारी वकील हैं. चंद्रचूड़ यह लिस्ट भेज कर खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज होकर चले गए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के समक्ष यह सवाल छोड़ गए कि क्या जजों की कुर्सियां न्याधीशों के नाते-रिश्तेदारों और सत्ता-संरक्षित सरकारी वकीलों के लिए आरक्षित हैं? क्या उन अधिवक्ताओं को जज बनने का पारंपरिक अधिकार नहीं रहा जो कर्मठता से वकालत करते हुए पूरा जीवन गुजार देते हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इलाहाबाद और लखनऊ पीठ के जिन वकीलों के नाम जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं उनमें मोहम्मद अल्ताफ मंसूर, संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, सोमेश खरे, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. ये कुछ नाम उदाहरण के तौर पर हैं. फेहरिस्त लंबी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से तकरीबन 50 वकीलों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे गए हैं, जिन्हें जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. इसमें 35 नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के और करीब 15 नाम हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हैं.

जो नाम भेजे गए हैं उनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का एक भी वकील शामिल नहीं है. ऐसे में, खबर के साथ-साथ यह भी जानते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्माण से अब तक के 65 साल में एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नहीं बना. इसी तरह वैश्य, यादव या मौर्य जाति का भी कोई वकील कम से कम लखनऊ पीठ में आज तक जज नियुक्त नहीं हुआ. बहरहाल, ताजा लिस्ट के मुताबिक जो लोग जज बनने जा रहे हैं, उनके विभिन्न जजों से रिश्ते और सरकारी पदों के सत्ताई-छत्र का तफसील भी देखते चलिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर को जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. अल्ताफ मंसूर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को भी जज बनने योग्य पाया गया है. अब्दुल मोईन उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार का नाम भी जज बनने वालों की सूची में शामिल है. रजनीश कुमार उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे टीएस मिश्रा और केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है. उपेंद्र मिश्रा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सरकारी वकील हैं. पहले भी वे चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रह चुके हैं. उपेंद्र मिश्र की एक योग्यता यह भी है कि वे बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के भाई हैं. इसी तरह हाईकोर्ट के जज रहे एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी और जस्टिस एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा को भी जज बनने लायक पाया गया है. इनके भी नाम लिस्ट में शामिल हैं. लखनऊ बेंच से जिन लोगों के नाम जज के लिए चुने गए, उनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (2) श्रीमती संगीता चंद्रा और राजकीय निर्माण निगम व सेतु निगम के सरकारी वकील शिशिर जैन के नाम भी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे का नाम भी जज के लिए भेजा गया है. इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वनामधन्य जज रहे जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट और न्यायाधीश रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र का नाम भी जजों के लिए अग्रसारित सूची में शामिल है. अंधेरगर्दी की स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जज रहे पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता दोनों में ही जज बनने लायक योग्यता देखी गई और दोनों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेज दिए गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सिटिंग जज एपी शाही के साले बीके सिंह का नाम भी अनुशंसित सूची में शामिल है. सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिग काउंसिल सीडी सिंह का नाम भी जजों के लिए चयनित सूची में शामिल है.

यह मामला अत्यंत गंभीर इसलिए भी है कि जजों की नियुक्ति की यह लिस्ट खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने तैयार की और अपनी संस्तुति के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजी. चंद्रचूड़ अब खुद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं. उन्हें न्याय के साथ न्याय करने के लिए ही तरक्की देकर सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया होगा. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई संस्तुति ने उनकी न्यायिकता और उन्हें तरक्की देने के मापदंड की न्यायिकता दोनों को संदेह में डाला है. डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं.

वकीलों का यह सवाल वाजिब है कि क्या जजों की नियुक्ति के लिए किसी ताकतवर जज का रिश्तेदार होना या एडिशनल एडवोकेट जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल या गवर्नमेंट एडवोकेट होना अनिवार्य योग्यता है? क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है? भेजी गई लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी किसी आम नागरिक का मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट पहना और पहुंच के बूते सरकारी वकील हो गए, सरकार की नुमाइंदगी करते रहे और जज के लिए अपना नाम रिकमेंड करा लिया.

वर्ष 2000 में भी 13 जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था, जिसमें आठ नाम विभिन्न जजों के रिश्तेदारों के थे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से करीब 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी.

जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला बाद में जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने सदन को आधिकारिक तौर पर बताया था कि औपचारिक जांच पड़ताल के बाद लिस्ट खारिज कर दी गई. उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को जज बनाने के लिए संस्तुति सूची में शामिल कर लिया गया है.

इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही केंद्रीय कानून मंत्रालय ने देशभर से आई ऐसी सिफारिशों की जांच कराई थी और जांच में धांधली की आधिकारिक पुष्टि होने पर जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं.

अशोक पांडेय ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की और फिर हाईकोर्ट ने उस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई. अदालत ने एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश देते हुए कहा कि इसके बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी. पांडेय चिंता जताते हैं कि संविधान और कानून से जुड़े इतने संवेदनशील मामले को 25 हजार रुपये के लिए अदालत ने लंबित रख दिया है. धांधली की यह सूची प्रधानमंत्री और कानून मंत्री को भेजने के बारे में अशोक पांडेय विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा भेजी गई सूची पर ही तत्कालीन कानून मंत्रालय ने वर्ष 2000 में कार्रवाई की थी.

न्याय व्यवस्था को सत्ता-प्रभाव में लाने का चल रहा षडयंत्र

सरकारी वकीलों को जज बना कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को शासनोन्मुखी करने का षडयंत्र चल रहा है. सीधे तौर पर नागरिकों से जुड़े वकीलों को जज बनाने की परंपरा बड़े ही शातिराना तरीके से नष्ट की जा रही है. कुछ ही अर्सा पहले अधिवक्ता कोटे से जो 10 वकील जज बनाए गए थे, उनमें से भी सात लोग राजीव शर्मा, एसएस चौहान, एसएन शुक्ला, शबीहुल हसनैन, अश्वनी कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार अरोड़ा और देवेंद्र कुमार उपाध्याय उत्तर प्रदेश सरकार के वकील (स्टेट लॉ अफसर) थे. इनके अलावा रितुराज अवस्थी और अनिल कुमार केंद्र सरकार के लॉ अफसर थे.

वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देने में भी भीषण अनियमितता हो रही है. नागरिकों के मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को लंबा अनुभव हो जाने के बावजूद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता नहीं दी जाती, जबकि सरकारी वकीलों को बड़ी आसानी से वरिष्ठ वकील की मान्यता मिल जाती है. कुछ ही अर्सा पहले लखनऊ बेंच के चार वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी गई, जिनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल आईपी सिंह, एडिशनल एडवोकेट जनरल बुलबुल घोल्डियाल, केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल असित कुमार चतुर्वेदी और सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के वकील शशि प्रताप सिंह शामिल हैं. लखनऊ में अनुभवी और विद्वान वकीलों की अच्छी खासी तादाद के बावजूद हाईकोर्ट को उनमें कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनने लायक नहीं दिखता. ऐसे रवैये के कारण वकीलों में आम लोगों के मुकदमे छोड़ कर सरकारी वकील बनने की होड़ लगी हुई है. सब इसके जुगाड़ में लगे हैं और इससे न्याय की मूलभूत अवधारणा बुरी तरह खंडित हो रही है.

जजी भी अपनी, धंधा भी अपना…

जजों के रिश्तेदार जज बन रहे हैं और जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा भी चमका रहे हैं. न्याय परिसर में दोनों तरफ से जजों के रिश्तेदारों का ही आधिपत्य कायम होता जा रहा है. जजों के बेटे और रिश्तेदारों की आलीशान वकालत का धंधा जजों की नियुक्ति वाली लिस्ट की तरह कोई चोरी-छिपी बात नहीं रही. यह बिल्कुल सार्वजनिक मामला है. आम लोग भी जजों के रिश्तेदार वकीलों के पास ही जाते हैं, जिन्हें फीस देने से न्याय मिलने की गारंटी हो जाती है.

जजों के रिश्तेदारों की उन्हीं के कोर्ट में वकालत करने की खबरें कई बार सुर्खियां बन चुकी हैं. हाईकोर्ट की दोनों पीठों के दर्जनों नामी-गिरामी जजों के बेटे और रिश्तेदार वहीं पर अपनी वकालत का धंधा चमकाते रहे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन के भाई अब्दुल मोईन, जस्टिस अभिनव उपाध्याय के बेटे रीतेश उपाध्याय, जस्टिस अनिल कुमार के पिता आरपी श्रीवास्तव, भाई अखिल श्रीवास्तव और बेटे अंकित श्रीवास्तव, जस्टिस बालकृष्ण नारायण के पिता ध्रुव नारायण और बेटा ए. नारायण, जस्टिस देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विशेष सिंह, जस्टिस देवी प्रसाद सिंह के बेटे रवि सिंह, जस्टिस दिलीप गुप्ता की साली सुनीता अग्रवाल, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा के भाई रिशाद मुर्तजा और नदीम, जस्टिस कृष्ण मुरारी के साले उदय करण सक्सेना और चाचा जीएन वर्मा, जस्टिस प्रकाश कृष्ण के बेटे आशीष अग्रवाल, जस्टिस प्रकाशचंद्र वर्मा के बेटे ज्योतिर्जय वर्मा, जस्टिस राजमणि चौहान के बेटे सौरभ चौहान, जस्टिस राकेश शर्मा के बेटे शिवम शर्मा, जस्टिस रवींद्र सिंह के भाई अखिलेश सिंह, जस्टिस संजय मिश्र के भाई अखिलेश मिश्र, जस्टिस सत्यपूत मेहरोत्रा के बेटे निषांत मेहरोत्रा और भाई अनिल मेहरोत्रा, जस्टिस शशिकांत गुप्ता के बेटे रोहन गुप्ता, जस्टिस शिवकुमार सिंह के बेटे महेश नारायण और भाई बीके सिंह, जस्टिस श्रीकांत त्रिपाठी के बेटे प्रवीण त्रिपाठी, जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान के बेटे राजीव चौहान, जस्टिस सुनील अम्बवानी की बिटिया मनीषा, जस्टिस सुरेंद्र सिंह के बेटे उमंग सिंह, जस्टिस वेद पाल के बेटे विवेक और अजय, जस्टिस विमलेश कुमार शुक्ला के भाई कमलेश शुक्ला, जस्टिस विनीत शरण के पिता एबी शरण और बेटे कार्तिक शरण, जस्टिस राकेश तिवारी के साले विनीत मिश्रा, जस्टिस वीरेंद्र कुमार दीक्षित के बेटे मनु दीक्षित, जस्टिस यतींद्र सिंह के पिता विकास चौधरी, भतीजा कुणाल और बहू मंजरी सिंह, जस्टिस सभाजीत यादव के बेटे पीपी यादव, जस्टिस अशोक कुमार रूपनवाल की बिटिया तनु, जस्टिस अमर शरण के भतीजे सिकंदर कोचर, जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही के ससुर आरएन सिंह और साले गोविंद शरण, जस्टिस अशोक भूषण के भाई अनिल और बेटे आदर्श व जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल के भाई भरत अग्रवाल अपनी वकालत का धंधा अपने रिश्तेदार जजों के बूते ही चमकते रहे हैं.

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं. उनका यह लिखा चौथी दुनिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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गुज़रे ज़माने के समाचार चैनल टीवीआई के 60 साथियों का केस : कोर्ट ने चैनल मालिक अशोक आडवाणी को सख़्त आदेश दिए

गुज़रे ज़माने के समाचार चैनल टीवीआई के संघर्षशील 60 साथियों ने अपने हक़ और सम्मान की ख़ातिर 17 साल से एक अलख़ जला रखी है। 25 मई को अदालत ने चैनल के मालिक अशोक आडवाणी के लिए सख़्त आदेश दिया है। नीचे एक मेल है जो सभी साठ लोगों को एक साथी की तरफ से जानकारी के लिए भेजा गया है और उसके बाद कोर्ट का आदेश है…

प्रिय साथियों,

टीवीआई के बकाया से जुड़े हमलोगों का जो केस साकेत कोर्ट में चल रहा है, उसमें कल अदालत ने बहुत अहम और विस्तृत आदेश जारी किया है। क़रीब दो घंटे चली बहस के बाद अदालत ने जो आदेश पारित किया है, उसे मैंने आप लोगों की जानकारी के लिए नीचे कॉपी-पेस्ट किया है।

बहस के दौरान आडवाणी के वकील ने मौखिक तौर पर कहा कि आडवाणी पैसे नहीं दे सकते, क्योंकि उनके पास पैसे हैं ही नहीं। लेकिन अदालत ने इस सिलसिले में उनकी ओर से दिये गये शपथपत्र को ख़ासा अपर्याप्त पाया और कहा कि अगले छह हफ़्ते में आडवाणी न सिर्फ़ अदालत को अपना विस्तृत ब्यौरा दें, बल्कि अगली तारीख़ यानी सोमवार, 25 जुलाई 2016 को कोर्ट में ख़ुद भी हाज़िर हों।

इस बीच, हम लोगों की जो कोशिश हाईकोर्ट जाने को लेकर की जा रही है, उस सिलसिले में भी अदालत ने अपने आदेश के पहले पेज़ पर अपना स्पष्ट आदेश दिया है। इसके आधार पर हमलोग जुलाई में दिल्ली हाईकोर्ट में अपनी फ़रियाद ले जाने की तैयारी करेंगे।

सादर और सस्नेह,

मुकेश कुमार सिंह

Ex. No. 46/16
Mukesh Kumar Singh Vs. Managment of M/s Business India Television International Ltd & Anr.
25.05.2016
Present: Sh. Ashiwani Vaish and Sh. Vinod Kumar Pandey , Ld. counsel for DH with DH in person.
Sh. Aseem Mehrotra, Ld. counsel for JD.
At this stage, Ld. counsel for JD draws the attention of this court towards the previous order wherein Ld. counsel for DH requested the court to get the advance service of notice of demand U/s 433 and 434 of Companies Act 1956 upon the JD and the copy of the same was supplied to proxy counsel appearing for JD on the previous date.
Today, Ld. counsel for JD draws my attention towards the contents of Section 434 of Companies Act which speaks “—-as served upon the company, by causing it to be delivered at its registered office, by registered post or otherwise, a demand under his hand requiring the company to pay the sum so due—” and further submits that as per law, demand notice is required to be served by registered post or otherwise on the registered office of the company and with these submissions, he returned the copy of demand notice to Ld. Counsel for DH stating that he is counsel only in the matters pending before this court and he cannot accept the notice for the other matters.
Heard.
Though the law requires demand notice to be served by registered post or otherwise, this court is of the view that the counsel for JD appearing before this court though may not be the counsel in the other matter but he is representing the company and may transmit the copy of the demand notice to the company and this mode of service is covered by word “or otherwise”. With these observations, objections of Ld. counsel are dealt with.
-2-
I have also heard the arguments on the application U/o 21 Rule 41 CPC from both the sides. It is contended on behalf of DH that in view of the directions given by the court, director of JD Company, Sh. Ashok H Advani filed his affidavit dated 26.09.2015 disclosing the assets and liability of the company but the bare perusal of contents of affidavit shows that he has not disclosed the full details with respect to companies. It is also further contended that the reason for not availability of book of account is mentioned in the affidavit even no FIR /NCR is placed on record regarding non-availability of the record. It is also further contended that auditor report placed on record is only in respect of one year i.e for the year 2012 and no further record is attached. It is also further submitted that in the balance sheet, it is stated that company is maintaining proper record showing full particulars including quantitative details and situation of Fixed Assets.
Per contra, Ld. counsel for JD submits that affidavit is true and correct version of liability and particulars given in the affidavit are true and correct and further states that there are no assets left in the company over the years. Whatever equipment, vehicle, computer etc., that are available have been sold as scrap and small liabilities of company is paid off.
I have gone through the contents of affidavit as well as document i.e balance sheet on record. This court is of the view that details as required in the affidavit are not disclosed by JD. Hon’ble High Court of Delhi in case “M/s Bhandari Engineers & Builders Pvt. Ltd Vs. M/s Maharia Raj Joint Venture &Ors”. has held that executing court may examine the judgment debtor orally and direct him to file an affidavit detailing how he wishes or proposes to satisfy the decree. Hon’ble Court further held that where the judgment debtor is a company, the Court can direct all the directors of the judgment debtor to file their personal affidavit containing the particulars set out in para 14 below.
-3-
As this court is of the view that details giving the affidavit are not sufficient to reach on the conclusion whether JD is having sufficient means to satisfy the decree or not. This court direct the directors of JD company to file their personal affidavit containing the particulars as under:-
(i) All the information and particulars with regard to their shareholding in judgment debtors, their involvement in the affairs of said judgment debtors and the nature of steps taken by them with regard to the management of the judgment debtors.
(ii) The Profit & Loss Account and the Balance Sheets of judgment debtors for the last three years;
(iii) The list of all the bank accounts of judgment debtors.
(iv) The names and residential addresses of the Directors of judgment debtors along with their PAN numbers and DIN numbers as well as complete particulars of all movable and immovable assets held in their personal names and the dates of their acquisition, and the nature of the right, title and interest therein;
(v) The address of the Registered Office and the Corporate or branch offices, if any, of judgment debtors.
(vi) The location of the statutory records and books of account of judgment debtors.
(vii) The list of immovable assets, land and building etc. of judgment debtors as on the date of the award;
(viii) The list of immovable assets, land and building of judgment debtors as on the date of filing the affidavit;
(ix) The list of the movable assets of judgment debtors, their location and value;
(x) The details of the debtors and creditors of judgment debtors with their complete addresses: and
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(xi) The details of workmen/employees and any amount outstanding to them.
(xii) Whether judgment debtors have assets/means to satisfy the decree.
The affidavits in terms of para 14 be filed within a period of six weeks from today with advance copy to the counsel for the decree holder. The concerned directors of the judgment debtors shall remain possibly present on the next date of hearing to enable this Court to examine them, if required. The judgment debtors shall not dispose of, alienate, encumber either directly or indirectly or otherwise part with the possession of any assets of judgment debtors except in the ordinary course of business and payment of salary and statutory dues.
List for purpose fixed on 25.07.2016.
 ( Pooran Chand )
 ADJ-06, S.E, Saket Court,
 New Delhi/25.05.2016

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SUPREME COURT DISMISSES SLP OF LOKMAT GROUP OF NEWSPAPERS

Inspiring story of non journalist employee who succeeds finally after a long battle of 17 years… Gets benefit of regularization and permanency as Teleprinter Operator, Planner with retrospective effect… Held entitled to all the benefits of Palekar, Bachawat Awards…

Mahesh Sakure, with M.Com. degree, has been working with Lokmat Group of Newspapers at Bhandara, near Nagpur, since 1.10.1996. Initially he joined as Teleprinter Operator but was later  doing the work of Planner. He was being paid monthly salary of Rs 1500/- which was raised to Rs 2000/-p.m. Mahesh filed Complaint before Industrial Court, Bhandara on claiming the benefit of regularization and permanencey as Teleprinter Operator and later as Planner and payment of wages and grant of all other allied benefits as per Palekar and Bachawat Awards from the date he had completed 240 days continuous service.   The management, inter alia, took the stand that he was not employee of the newspaper establishment but that of a charitable organization known as “Manav Sewa Trust”.

After recording evidence of both sides and hearing them, the Industrial Court, Bhandara, granted to Mahesh Sakure the benefit of regularization and permanency as Teleprinter Operator w.e.f. 315.1997 and regularization and permanency as Planner w.e.f. 1.4.1998 and also granted overtime wages at double the rate for the excess 12 hours a week he had put in as Planner, which post falls in the catregory of “Journalist” and as per Section 6 of the Working Journalists Act, requires him to work only for 36 hours a week as against which he was being asked to work for 48 hours a week.  The Court also rejected the contention of the management that he was the employees of “Manav Sewa Trust”and not of “Lokmat”.

The management challenged the said order of the Industrial in Bombay High Court, Bench at Nagpur, and sought stay of the said order.  The Learned Single Judge granted stay of the order on the condition that the management shall pay to the workman a sum of Rs 10 Lakhs and a monthly salary of Rs Ten Thousand as interim relief, pending final decision of the case.

This order of the Learned Single Judge was challenged by the management before the Division Bench of the High Court by filing a Letters Patent Appeal which was dismissed by the Division Bench.  The management preferred a Special Leave Petition in the Supreme Court which was disposed of by the Supreme Court with a slight modification of the order to the effect that out of the amount of Rs 10 Lakhs granted to the workman as interim relief only Rs Five Lakhs shall be paid to him and the remaining amount of Rs Five Lakhs shall be kept in deposit by the High Court  till the disposal of the Writ Petition by the Learned Single and the same will be disposed as per the orders of the Learned Single Judge to be passed on the merits of the case.   The other interim order that during the pendency of the Writ Petition the employer shall pay salary of Rs 10,000/- was however confirmed by the Supreme Court.

The Supreme Court also directed the Learned Single Judge to dispose of the Writ Petition filed by the management within a period of three months. Upon this direction of the Supreme Court, the Learned Single Judge heard the matter of merits and finally dismissed the Writ Petition of the management with a direction that the workman should be paid the remaining balance of Rs Five Lakhs with interest and also imposed the cost of Rs 10,000/- on the management.

This judgment and order of the Learned Single Judge was again challenged by the management in the Supreme Court which was dismissed by the Supreme Court in limini on 12.10.2015. Meanwhile, the employee Shri Sakure has been fixed on a monthly salary of about Rs 35,000/- p.m., which he has been receiving under protest as details thereof have not been provided by the management.

The aforesaid claim of the workman is now calculated to be in the region of about Rs Forty Nine Lakhs for payment of which he has already represented to the management failing which another round of litigation for the same is round the corner. That since the management has not acceded to his request a claim for the sum of Rs 49,37,720.13 has already been filed before the Labour Court at Bhandara.

UNION FREED FROM THE CLUCTCHES OF LOKMAT MANAGEMENT – BATTLES ROYAL GO ON !

The background :

As stated elsewhere in this newsletter, the Lokmat Shramik Sanghatana, Nagpur, which is functioning since 1996, which is an affiliate of AINEF and a composite union of journalists and non journalist employees, has been fighting for reclassification of Lokmat Newspapers on the basis of their gross revenue in respect of Palekar Award, Bachawat Award, Manisana Award and now Majithia Award.

That the Lokmat Shramik Sanghatana, Nagpur, has also been fighting a Reference before the Industrial Tribunal, Nagpur, in regard to regularization and permanency of 78 journalist and non journalist employees who are being engaged on contract basis for several years now. That besides these two major demands, the union has also succeeded in many other individual disputes details of which are being given separately.

The Victimisation :

Feeling aggrieved and angered with the aforesaid efforts of the union to cover a major ground remaining untouched by any union in the country and also the efforts of the union at its expansion throughout Maharashtra/India by opening a Branch of the Union at Akola and Goa, the management  dismissed on 12.11.2013   President of Goa Branch Shri Rajesh Inmulwar, who was working on contract basis,  for his refusal to resign from the union.

That from 13th November 2013 employees started “Non cooperation movement” as a result of which, it is alleged by the management, that newspapers’ printing was badly affected putting it to huge financial loss.

On 20.11.2013, 61 employees, including eight journalists,  from various centres in the State, bulk of them 25 in number from Nagpur, all principal office bearers, were dismissed without enquiry and as the References are pending management sought approval of its action in respect of the dismissal of these 61 employees before the Industrial Tribunal.  The management examined 120 witnesses and union examined 24 witnesses.  Management’s arguments are over and on 20.4.2016 Union has also concluded its arguments.  The decision of the Tribunal is expected in June 2016.     

Capturing of the union by Lokmat management :    

Immediately on 20.11.2013 itself, before actual dismissal of office bearers of the Union, the management and its lackeys, Lokmat in its office premises and during office hours itself “elected” new office bearers of the union and the first thing done by them was to send a registered ack due letter to Shri S.D. Thakur, Advocate, informing that he was no longer Legal Advisor of the Union and, therefore, he should not appear on behalf of the union in any case.

Letters of intimation were also sent to the Additional Commissioner of Labour, Registrar of Trade Unions and the management of Lokmat.

The Great betrayal :

Thereafter, the most important work these lackeys of the management (Editor of City Edition and one Executive in Printing Depatment posing as President and General Secretary) did was to sign an unconditional  “settlement” with the management (i) withdrawing References seeking claissification of newspaper establishment on the basis of its gross revenue in respect of Palekar, Bachawat, Manisana and now Majithia and (ii) withdrawing Reference seeking regularization and permanency of 78 journalists and non journalist employees who are working on contract basis without any condition or benefit to the employees concerned.

When the real office bearers of the Union initiated legal proceedings against these bogus office bearers, several objections were raised to prolong the matter and on initial points the matter was taken to the High Court also.  The High Court rejected the Writ Petition of these lackeys of the management.  That after hearing the parties, the Industrial Court by its order dated 29.3.2016 held that the earlier office bearers (the real office bearers) are the true office bearers of the Union and the management’s lackeys  posing as President and General and Working Committee members are not the office bearers and working committee members of the Union as alleged by them.

The employees are agog with joy and sense of pride for the glorious victory and celebrated the same on 1st May boisterously.

13 Pasters get the designation and Grade of Scanners in Lokmat

The 13 Pasters who have been performing the duties of Scanners for a long time were not being given the designation and grade of Scanner and hence they had filed complaints before the Industrial Court under the provisions of Maharashtra Recognition of trade Unions & Prevention of Unfair Labour Practices Act, 1971.  The Industrial Court, Nagpur allowed these complaints and granted them designation and grade of Scanners with retrospective effect viz., 13.12.2004.

The Industrial Court also held that the category of Scanner being a journalist category the employees were required to work for only 36 hours a week as per Section 6 of WJ Act whereas in fact they were being asked to work for 48 hours a week.  Therefore, all these employees should be given overtime wages at double the rate for all the years they have been working as Scanners for extra 12 hours a week they have worked.

The employees have filed recovery proceedings against the management of Lokmat for recovery of amounts ranging between Rupees 17 Lakhs and Rupees 38 Lakhs per employee.

With May Day Greetings,

SD Thakur, Adv
President, AINEF

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भास्कर कर्मियों की शिकायत पर हाइकोर्ट ने लेबर कोर्ट के जज अशोक जैन का तबादला किया

Sanjay Saini : भास्कर के कर्मचारियों की शिकायत पर हाइकोर्ट ने लेबर कोर्ट के जज अशोक जैन का तबादला किया। नए जज को लगाया। भास्कर प्रंबधन को नहीं मिली राहत। जज साहब ने आदेश से पहले ही बता दिया था। वो एम्पलाईज के केस करेंगे खारिज। भास्कर के एम्पलाईज में खुशी की लहर।

मजीठिया वेज बोर्ड की खुली लड़ाई लड़ रहे दैनिक भास्कर जयपुर में कार्यरत संजय सैनी के इस एफबी स्टेटस पर वरिष्ठ वकील परमानंद पांडेय की टिप्पणी यूं है….

Parmanand Pandey अगर लेबर कोर्ट के जज ने ऐसा कहा था तो निंदनीय है. हाईकोर्ट ने ठीक किया वरना लोगों का न्याय प्रक्रिया से विश्वास उठ जाएगा. भास्कर कर्मियों को बधाई.

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मोदी के दो साल : मीडिया को डरा फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया… अब ‘दिक्कत’ दे रहीं अदालतों को ठीक करेंगे साहब लोग

Sanjaya Kumar Singh : सत्ता मिली तो ये कर दूंगा, वो कर दूंगा। ऐसे, वैसे। अब विपक्ष (जो बचा ही नहीं था) सहयोग नहीं कर रहा है। मीडिया को डरा कर और फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया। अधिकारियों को पहले ही कसने का दावा किया गया। यह भी कि सब समय से आते-जाते हैं। प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं। अधिकारी परेशान हैं, काम करते करते। नालायकों को दो साल पहले ही हटा दिया गया था।

पहले जनधन खाते के नाम पर फिर सबसिडी छोड़ने की अपील करके जनता से लिया ही है, दिया कुछ नहीं। सफाई नगर निगमें कराती हैं पर स्वच्छता टैक्स केंद्र सरकार लेती है। सर्विस टैक्स बढ़ा दिया सो अलग। इन सबके बावजूद जनता को क्या मिला उसकी बात नहीं करेंगे। अब अदालतें दखल ना दें ताकि हम उत्तराखंड करें या डिग्री पर चुप रहें। आरटीआई कानून से तकलीफ हो ही रही है। देखते हैं पांच साल में और क्या क्या मांगते हैं। दिया क्या है ये मत पूछिए। राज करेंगे (मूंग दलेंगे) 2024 तक। मुंगरी लाल के हसीन सपने याद आ गए।

देखें ये खबर…


सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल न दें अदालतें : अरुण जेटली

नई दिल्ली: वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज फिर कहा कि अदालतों को सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए। इंडियन वीमेंस प्रेस कोर के एक कार्यक्रम में उन्होंने आरबीआई गवर्नर से सरकार के टकराव की खबर को भी गलत बताया।

“कोर्ट कार्यपालिका का विकल्प नहीं हो सकती। कोर्ट उसकी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती। सभी संस्थाओं को लक्ष्मण रेखा खींचना होगी।” वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को दिल्ली में पत्रकार वार्ता में यह बात कही। कानून के जानकार वित्त मंत्री ने बहुत सतर्क होकर ये साफ किया कि अदालत और सरकार के कामकाज के दायरे अलग हैं। अदालतों को अपनी लक्ष्मणरेखा खींचनी होगी।

वित्त मंत्री की इस सलाह के पीछे हाल के कई मसले हैं। उत्तराखंड पर राष्ट्रपति शासन के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया; आधार को वित्त विधेयक बनाने का मामला अदालत में है; दिल्ली में डीज़ल गाड़ियों पर बैन लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी सरकार निराश है और ताज़ा मामला मेडिकल एंट्रेंस को लेकर एनईईटी का है। जेटली ने कहा, “मेरी नज़र में मेडिकल संस्थाओं में दाखिले का मामला कार्यपालिका के अधीन आता है।”

लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने के इल्ज़ाम को लेकर जेटली किनाराकशी कर गए। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर बीजेपी के हमले को भी उन्होंने मीडिया के मत्थे मढ़ दिया और कहा कि आरबीआई से सरकार का कोई टकराव नहीं है। अरुण जेटली ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंधों को लेकर मीडिया में छपने वाली खबरों को आपको गंभीरता से लेना चाहिए।” वित्त मंत्री से कहा कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंध मजबूत हैं।

सूखा और NEET जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को लेकर अरुण जेटली ने अपनी चिंताएं जताईं, लेकिन जिस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में हस्तक्षेप किया …उससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकार और राजनीतिक दलों ने इन मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाहन सही तरीके से किया था। क्या उनकी कमजोरियों की वजह से ही कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था। (साभार एनडीटीवी डाट काम)


वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के इस एफबी स्टेटस जिसे दर्जनों लोगों ने शेयर किया है, पर आए कुछ प्रमुख पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Priyadarshan Shastri : पहले दीवानी मुकदमों में वादी के बयान जज के सामने मौखिक होते थे वादी का वकील सवाल करता था तथा वादी अपनी याददाश्त के आधार पर जवाब देता था कि उसने मुक़दमा क्यों पेश किया है उसे समस्या क्या है ? इसमें फायदा ये होता था कि कई बार दावे में कोई झूठी मनगढ़ंत बात लिखी होती थी वह पकड़ में आ जाती थी …. फिर नंबर आता था प्रतिवादी के वकील का कि वह वादी से ज़िरह में सवाल पूछे …. ऐसे में होता ये था कि वकील अपनी चतुराई से असत्यता को उगलवाने की पूरी कोशिश करता था …. ये सारी प्रक्रिया न्यायालय द्वारा रिकॉर्ड की जाती थी । पहली बार अटल जी के समय जब जेटली जी लॉ मिनिस्टर थे तब सीपीसी में संशोधन कर उक्त सिस्टम में बदलाव कर लिखित में शपथपत्र प्रस्तुत करने की व्यवस्था लागू कर दी । अब याददाश्त पर बयान वाली प्रक्रिया समाप्त हो गई । अब तो दावे को ही शपथपत्र के रूप में टाइप कर प्रस्तुत कर दिया जाता है … कई बार ज़िरह के नाम पर न्यायालय प्रश्नावली पहले ही मांग लेता है। कहने का मतलब ये है कि न्यायिक प्रक्रिया का मूल जिससे वकील सत्यता को उजागर करते थे वह समाप्त हो ही गयी है अब मुक़दमा केवल कागज़ी कार्यवाही रह गया है।

Mrinal Singh : बात इससे कहीं ज़्यादा गंभीर है! ये वक्तव्य इस बात का संकेत है की अब सरकार अदालत पर नकेल कसने के लिए कदम उठाने जा रही है! अघोषित एमर्जेन्सी अब अगले चरण की ओर जा रही है जहाँ संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण होगा! पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्वविद्यालयों का तो हाल देख ही लिया जहाँ से विरोध के स्वर उभर रहे थे! मेरा अनुमान है की अगला हमला संविधान पर होगा और समय आ गया है की जनता इसका पूरी ताक़त से विरोध करे जैसे एमेरजेंसी में किया था!

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एक न्यूज चैनल का बौद्धिक दिवालियापन (देखें वीडियो)

साधना न्यूज नामक एक न्यूज चैनल ने भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पर इसलिए मुकदमा किया है क्योंकि भड़ास पर छपी एक धारावाहिक व्यंग्य कथा ‘चांपना न्यूज’ को उसने खुद की कहानी मान लिया है. दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में यह मामला मजेदार मोड़ में है. कोर्ट की तरफ से मध्यस्थता कर रहे शख्स का कहना है कि चांपना न्यूज नामक संबंधित भड़ास की पोस्ट में तो कहीं साधना न्यूज या इसकी कंपनी शार्प आई प्राइवेट लिमिटेड का नाम ही नहीं है तो आपकी मानहानि कैसे हुई?

इस पर साधना न्यूज के वकील का जवाब है कि ये जो चांपना न्यूज नाम है, वह साधना न्यूज टाइप का ही लगता है, उच्चारण में, इसलिए हम लोगों की मानहानि हुई है. तब भड़ास के वकील की तरफ से कहा गया कि क्या चांपना न्यूज के अलावा किसी अन्य नाम से कोई कहानी लिखी जाए तो आपको दिक्कत तो नहीं होगी, यथा- ठोंकना न्यूज,  बेलना न्यूज, मापना न्यूज, खांसन न्यूज… इस पर साधना न्यूज का वकील चुप रह गया. इस पर कोर्ट में मामले की मध्यस्थता के लिए नियुक्ति किए गए सज्जन ने मुस्कराते हुए साधना न्यूज के वकील से पूछा- कहीं चोर की दाढ़ी में तिनका तो नहीं!

पूरे मामले को जानने के लिए इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=KSpA2G2jKEE


नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करके पूरे मामले को विस्तार से समझ सकते हैं…

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झूठी खबर दिखाने वाले जी न्यूज, टाइम्स नाऊ व न्यूज एक्स चैनलों को अरविंद केजरीवाल ने कोर्ट में घसीटा

दिल्ली सरकार ने डॉक्टर्ड फुटेज दिखाने के मामले में 3 चैनलों को कोर्ट में घसीटा. इस मामले में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और जेडीयू नेता केसी त्यागी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात कर ऐसे न्यूज चैनलों पर कार्रवाई की मांग की थी. जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में 9 फरवरी को हुई कथित देशविरोधी नारेबाजी के वीडियो को प्रसारित करने के मामले में दिल्ली सरकार ने तीन टीवी चैनलों को कोर्ट में घसीटा है. आम आदमी पार्टी की सरकार ने शुक्रवार को जी न्‍यूज, न्‍यूज एक्‍स और टाइम्स नाऊ के खिलाफ पटियाला हाउस कोर्ट में चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्‍ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराई. इन चैनलों पर 9 फरवरी को हुई कथित नारेबाजी का डॉक्‍टर्ड वीडियो फुटेज प्रसारित करने का आरोप लगाया गया है.

दिल्‍ली सरकार ने वीडियो की सत्‍यता जांचने के लिए नई दिल्‍ली के डिस्ट्रिक्‍ट मजिसट्रेट से जांच कराई थी। जांच में फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर वीडियो को डॉक्‍टर्ड बताया गया. गौरतलब है कि प्रसारित किए गए वीडियो में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को भी दिखाया गया था. सूत्रों ने बताया कि सरकार की कानूनी टीम को आदेश दिया गया है कि वह उन तीन चैनलों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करे, जिनके नाम का जिक्र नई दिल्ली जिले के जिलाधिकारी (डीएम) की रिपोर्ट में किया गया है. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया, ‘दिल्ली सरकार ने अपनी कानूनी टीम को उन तीन चैनलों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दायर करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार के बारे में ऐसे वीडियो प्रसारित किए जिनसे कथित तौर पर छेड़छाड़ की गई थी.’

इससे पहले सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और जेडीयू नेता केसी त्यागी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात कर ऐसे न्यूज चैनलों पर कार्रवाई की मांग की थी, जिन्होंने जेएनयू विवाद पर ऐसे वीडियो दिखाए जो कि डॉक्‍टर्ड पाए गए. दिल्ली सरकार की ओर से कराई गई मजिस्ट्रेट जांच में पाया गया था कि हैदराबाद की फॉरेंसिक लैब को भेजे गए सात वीडियो में से तीन से छेड़छाड़ की गई थी.

कुल मिलाकर कन्हैया कुमार के खिलाफ फर्जी खबरें चलाने से नाराज दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने देश के तीन बड़े निजी न्यूज चैनलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पटियाला हाउस कोर्ट में जो अर्जी दायर की है उससे वो लोग खुश है जो चाहते हैं कि इन बेलगाम न्यूज चैनलों पर थोड़ी सी लगाम लगाया जा सके ताकि ये टीआरपी और रेवेन्यू के लिए कुछ भी दिखाने की प्रवृत्ति से बाज आ सकें. आरोप लगाया गया है कि उक्त चैनलों ने कन्हैया को लेकर डॉक्टर्ड (छेड़छाड़ कर बनाया हुआ) वीडियो लोगों को दिखा कर देशद्रोह के आरोपी कन्हैया की गलत छवि लोगों के समक्ष पेश की. इस अर्जी पर कोर्ट में सोमवार को सुनवाई होगी. केजरीवाल सरकार का कहना है कि उक्त चैनलों ने टीआरपी के लिए कन्हैया कुमार के बयान वाले वीडियो से छेड़छाड़ कर उसे टीवी पर दिखाया और उसकी छवि देशद्रोही की बनाकर लोगों के सामने पेश की. यह गतिविधि अपराध की श्रेणी में आती है। इससे एक आम नागरिक के स्वतंत्रता से जीने का अधिकार प्रभावित हुआ. इन चैनलों के वीडियो के आधार पर दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज किया और कन्हैया को देशद्रोह के आरोप में जेल जाना पड़ा. इस गैर जिम्मेदाराना हरकत के लिए चैनलों पर अपराधिक मुकदमा चला कर उन्हें दण्डित किया जाना चाहिये.

वरिष्ठ पत्रकार Mukesh Kumar इस बारे में फेसबुक पर लिखते हैं : तीन टीवी चैनलों के खिलाफ़ मामला दायर करके दिल्ली सरकार ने सही क़दम उठाया है। उसे शाबाशी दी जानी चाहिए, क्योंकि कायदे से ये काम केंद्र सरकार को और उसके मातहत काम करने वाली पुलिस को करना चाहिए था, मगर उन्होंने नहीं किया। ज़ाहिर है उनके बीच मिलीभगत है इसलिए वे ऐसा क्यों करते। अब अदालत को इस मामले की सुनवाई प्राथमिकता में करनी चाहिए और दोषियों को दंड देकर एक मिसाल कायम करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की आपराधिक पत्रकारिता करने की हिम्मत कोई न कर सके।

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‘साधना न्यूज’ ने ‘चांपना न्यूज’ वाले व्यंग्य को दिल पर लिया, भड़ास पर मुकदमा ठोंका, जानिए कोर्ट में क्या हुआ

भड़ास पर ‘चांपना न्यूज’ नामक एक चैनल के बारे में पांच किश्तों में व्यंग्यात्मक खबर छपी. ‘चांपना न्यूज’ एक काल्पनिक नाम है, जिसे वर्तमान न्यूज चैनलों की दुनिया के अंदर का हाल बताने के लिए सृजित किया गया और उसके सहारे उसके बहाने पूरी अंतरकथा बताई गई. पर इस व्यंग्य को साधना न्यूज नामक चैनल नहीं पचा पाया और उसके कर्ताधर्ता चले गए दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट. वहां इन लोगों ने कहा कि योर आनर, दरअसल चांपना न्यूज नामक जिस चैनल की कहानी भड़ास में बताई गई है, वह उसी के साधना न्यूज नामक चैनल के बारे में है, इसलिए इस मानहानि कारक कंटेंट को रिमूव कराया जाए और अंतिम फैसला आने से पहले इस वेब पोर्टल को आदेशित किया जाए कि वह साधना न्यूज के बारे में कुछ न छापे.

कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से साधना न्यूज को मना कर दिया और ताजी सूचना ये है कि 28 मार्च को न्यायालय में सुनवाई के दौरान विद्वान न्यायाधीश महोदय ने साधना न्यूज और भड़ास4मीडिया को मीडिएशन में जाने को कहा है. यानि दोनों लोग मीडिएटर के साथ बैठकर मामले को बातचीत के जरिए सुलझा सकते हों तो सुलझा लें. इस पूरे मामले को कोर्ट में भड़ास की तरफ से वकील हिमाल अख्तर लड़ रहे हैं. एडवोकेट हिमाल अख्तर यह केस फ्री में इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे मुकदमों के जरिए न्यू मीडिया की स्वतंत्र आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है, जिसका हर आम ओ खास को विरोध करना चाहिए. एडवोकेट हिमाल अख्तर ने भड़ास के एडिटर यशवंत से बातचीत के दौरान कोर्ट में चल रहे इस केस के बारे में क्या क्या बताया, जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=YV-K85AjJIQ

‘चांपना न्यूज’ की पूरी सीरिज पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर एक एक कर क्लिक करते जाएं…

एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट एक)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट दो)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट तीन)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट चार)

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट पांच)

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‘चांपना न्यूज’ में बिना सेलरी के कार्यरत रहे थे ‘महीन कुमार’!

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चोरी से न्यूड वीडियो बना इसे वायरल करने वाले होटल मालिक को महिला पत्रकार ने कोर्ट में दी शिकस्त, मिलेगा 350 करोड़ रुपये जुर्माना (देखें तस्वीरें)

कोर्ट में अपनी पीड़ा व्यक्त करतीं खेल पत्रकार एरिन फूट फूट कर रो पड़ीं…

इस महिला खेल पत्रकार को पूरे सात साल बाद इंसाफ मिला. और, जब इंसाफ मिल गया तो वह खुद को रोक न सकी. फफक कर रो पड़ी. खेल पत्रकार एरिन का होटल की दीवार में सुराख कर न्यूड वीडियो बनाया गया था. वीडियो बनाने वाले पर होटल मालिक पर अदालत ने 350 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. मामला अमेरिका का है.

अमेरिका की एक अदालत ने स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट एरिन एंड्रयू का न्यूड वीडियो बनाने वाले होटल मालिक पर 350 करोड़ रुपए (55 मिलियन डॉलर) का जुर्माना लगाया है. पीड़िता एरिन एंड्रयू फॉक्स न्‍यूज में स्पोर्ट्स रिपोर्टर / एंकर है. उनका न्‍यूड वीडियो 2008 में वायरल हुआ था. उस वक्‍त वह ईएसपीएन के लिए काम किया करती थीं. ज्यूरी ने सोमवार को इस केस में फैसला सुनाया. अदालत में इस केस की सुनवाई के दौरान एरिन कई बार फूट-फूटकर रो पड़ीं और न्यूड वीडियो वायरल कराए जाने के बाद के अपने जीवन की पीड़ा के बारे में बताती रहीं.

अभियुक्त होटल मालिक माइकल बैरेट की तस्वीर ये है…

आगे की स्लाइड्स में संंबंधित खबर के अन्य डिटेल और बाकी तस्वीरें हैं…

आगे पढ़ें
एरिन के पापुलर होने के कारण वीडियो बनाया!
नीचे क्लिक करें :

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Delhi HC issues notice to top editorial staff of UNI

New Delhi : Taking strong cognizance of the torture and humiliation of a dalit employee of United News of India (UNI), a prestigious news agency of the country, the Delhi High court yesterday issued notice to two high profile scribes of UNI including Joint Editor Neeraj Bajpayee, Journalist Ashok Upadhyay and an another employee of the agency Mohan Lal Joshi.

While hearing the case Delhi high court hon’bleJustice Pratibha Rani issued the notices directing the trio to file a reply by July 15, 2016 informed the counsel Jitendra kumar Jha and Shahid Iqbal. The counsels further said that after taking cognizance of non filing of any appeal by the government lawyer against acquittal of the accused by a lower court, judge asked the government lawyer about it and he admitted that no writ was filed against the decision of the lower court and he accepted the notice .

Earlier UNI Joint Editor Mr Bajpayee,journalist Mr Upadhyay and an another employee of UNI Mr Joshi were sent to tihar jail by lower court in 2013 in connection with the SC/ST case lodged at Parliament Street police station with FIR No. 61/2013. The trio who have unleashed a reign of terror in the organisation were put behind the bars for one week from 12/12/2013 to 18/12/2013.

As per the case these three acused had humiliated and had threatened the victim, (petitioner )Virender Verma, a Dalit employee of UNI in the office premises on 14/03/2013. The incident took place within the premises of the UNI located on 9, Rafi Marg, New Delhi situated within 200 meters of the Indian Parliament. The case was lodged Under Sec 3 of SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 in which the accused persons were acquitted by the lower court.

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मेरे गरीब चौकीदार पिता को इस जज ने नौकरी से निकाल दिया, अब घर कैसे चलेगा

Dear Sir,

I m pallvi from ambala city. I just want to say that My father Ramesh kumar was working in Haryana Court Ambala city as a chownkidar from 20 years under session judge (Mr.Jaiveer singh Hudda). Before 5 years, My father suspended by Mr. Jaivir Singh hUdda with wrong ellications. At that time my father was working in hudda’s Kothi. But in which document Mr. Hudda Said that everything wrong in court then he suspended my father. At that time 15 Employees suspended by Mr.Hudda. One person can make mistake. But 15 Peoples can’t do at same time.

My father is a very poor man. Then we caused in Chnadigarh high Court then My father won the cause from High court. But after Some time Mr. Hudda Said that u are Fail in your enquiry. Then we Caused again delhi Supreme court. Then Advocate Mr. Anand Mishra got 25,000/- from us for this cause. But Problem is not solved. After a long time Mr. Mishra said that your cause has been dismissed.

But in which Hudda’s Kothi My father was very harrsed by Mr. Hudda, and Mrs. Hudda. Even my father slapped by Mrs. Hudda. Mr. Hudda said that in his documents that broken the fans and glasses But its common sense when this was happening in the court, then Mr. HUdda also will complained in other department. But there are no any complaint regarding that. Everything prove that every elications are false against my father.

In which my family, There are 5 Members. My mother is a house wife. Now we want to again join this job. If its not possible then we want to retirement from this job. We will thankfull to you. Becoz I also want to higher study. If in which anything wrong, I m so sorry for that.

We have a great hope from you.

Thanking you

Pallvi Kashyap
pallvik3@gmail.com

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उपमन्यु पर लगा रेप का आरोप झूठ का पुलिंदा साबित हुआ

मथुरा। ब्रज प्रेस क्लब के अध्यक्ष, उपजा प्रदेश उपाध्यक्ष एवं छावनी परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु एडवोकेट पर आरोप लगाने वाली एमबीए की छात्रा न्यायालय में हुए अपने बयानों एवं लगाए शपथ पत्रों में अपनी पूर्व की कहानी से पल्ला झाड़ते हुए उपमन्यु को निर्दोष करार दिया है। कोर्ट में उसने शपथ पत्र दाखिल कर कहा है कि उसके साथ बलात्कार एवं छेडख़ानी जैसी कोई वारदात नहीं हुई थी। अपने भाई को एक मामले में जेल जाने से बचाने के लिए तथा कुछ लोगों की सलाह पर उसने कमलकांत उपमन्यु पर आरोप लगाया था जो गलत था। वादिया का 5/01/2016 को न्यायालय में शपथ बयान हुआ है। इसमें उसने अंतिम आख्या पर अपनी सहमति जताते हुए कहा है कि वह इस संबंध में न्यायालय में पूर्व में बिना किसी प्रलोभन एवं बिना किसी दबाव के अपने शपथ पत्र भी दे चुकी है।

बलात्कार के आरोप को झेल रहे कमलकांत उपमन्यु एक बार फिर पाक साफ साबित हुए हैं। आरोप लगाने वाली लड़की ने कोर्ट में अपने बयानों में खुद स्वीकार किया कि विरोधियों के कहने पर श्री उपमन्यु को फंसाने के लिए रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। कोर्ट में वादी द्वारा मामले को आगे न बढ़ाने का हलफनामा दे खुद कहा कि उसके साथ कुछ नहीं हुआ था।  जो आरोप लगाए गए वह गलत थे और लोगों के कहने पर लगाए थे। उसने यहां तक कहा कि हाइवे थाने में जो रिपोर्ट दर्ज हुई उस तहरीर पर बिना पढ़े हस्ताक्षर किए थे। यहां तक कि न्यायालय में उसने दबाव में अपने बयान दिए थे। कुछ लोगों ने उनसे कहा था कि यदि उपमन्यु के खिलाफ बयान नहीं दिए तो उसे जेल जाना पड़ेगा, लेकिन अब वह सारी घटना का सच  फिरोजाबाद के आईओ को दिए शपथ पत्र एवं न्यायालय एसीजेएम (चतुर्थ) के सम्मुख दिए गए शपथ पत्रों एवं अपने बयान में भी बता चुकी है। वह इस मुकद्मे को आगे लडऩा नहीं चाहती है। पीडि़ता के अनुसार इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जो पीआईएल की गई है उसमें उसकी सहमति नहीं है तथा उसमें दर्शाए गए साक्ष्य निराधार एवं मनगढ़ंत हैं।

दो जून 2015 को न्यायालय में दिए शपथ पत्र में पीडि़ता ने कहा कि उसके पडौस में रहने वाले मुकेश शर्मा  पुत्र लक्ष्मीनारायण निवासी नटवर नगर मथुरा से वाद-विवाद हो गया था। उसके पिता ने इस मामले को निपटाने के लिए कमलकांत उपमन्यु से कहा तो कमलकातं उपमन्यु ने मुकेश शर्मा का सहयोग किया। इसके साथ ही उसके भाई अतुल के विरूद्ध एक तहरीर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को दो दिसम्बर 2014 को दे आये थे। इस पर एसएसपी ने जांच कर गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराने के आदेश भी कर दिये। एक अन्य शिवकुमार शर्मा के प्रार्थना पत्र जो हमारे परिवार के ही विरूद्ध था, को दे आये उस पर भी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदया ने संज्ञान ले लिया था।

उसके घरवालों को इस बारे में जानकारी मिली कि मेरे भाई अतुल के विरूद्ध मुकद्दमा कायम कराने का प्रयास चल रहा है और इस प्रयास में कमलकांत उपमन्यु की भूमिका है। कमलकांत उपमन्यु ने हमारे विरूद्ध रिपोर्ट करवाने व जेल भिजवाने को कहा, तो इस मामले पर मैने तथा मेरे परिवारीजनों ने समाज के लोगों से राय ली। इसी आधार पर समाज के लोगों द्वारा टाइप कागज को बिना पढ़ाये व सुनाये एक प्रार्थना पत्र एसएसपी कार्यालय में दिलाया। इसके आधार पर रिपोर्ट संख्या कमलकांत उपमन्यु के खिलाफ  बलात्कार का मामला थाना हाईवे में दर्ज हुआ।

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद कुछ लोगों ने उसे तहरीर को पढ़ाया और कहा कि यदि तहरीर के मुताबिक बयान नहीं दिए तो तुमको जेल जाना पड़ेगा। इसी दबाव में उसने कागज में लिखे अनुसार अपने बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए।  न्यायालय में दर्ज कराये गए बयान दबाव में दिये थे मेरे साथ ना ही बलात्कार हुआ, न ही मुख मैथुन, ना ही अप्राकृतिक मैथुन व ना ही कोई छेडखानी हुई थी और आज यही बात लिखकर बिना किसी दबाव के पढ़ व सुनकर शपथ पत्र दे रही हूं। यह सत्य है।

उसने कहा कि अपने परिवार व अपने इकलौते भाई को कुछ न हो और वह मुकद्दमे में जेल न जाये इस मानसिक दबाव में वह समाज के लोगों के दबाव में न्यायालय में बयान दिया था और शपथकर्ती को कानून के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसने बयान हलफी में अपनी स्वेच्छा से बिना किसी भय, दबाव अथवा प्रलोभन के इस कारण दे रही हूं कि सच्चाई श्रीमान जी के समक्ष आये और अन्याय होकर कोई गलत व्यक्ति न फंसे। मुझ शपथकर्ती द्वारा इसी संबंध में अपना बयान व शपथपत्र उपरोक्त मुकद्दमे के विवेचनाधिकारी को पूर्व में दिया जा चुका है। उसकी निजी जानकारी के अनुसार उपरोक्त मुकद्दमे में विवेचनाधिकारी द्वारा विवेचना के उपरांत मुकद्दमे में अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत कर दी गयी है। इस अंतिम रिपोर्ट में वह पूर्ण रूप से सहमत है। वह इस मुकद्दमे को आगे लडऩा नहीं चाहती है।

इसके बाद वादिया/पीडि़ता ने 19 अगस्त 2015 को एसीजेएम चतुर्थ के यहां पुन: शपथ पत्र/प्रार्थना पत्र देकर कहा-

”मैं अपनी स्वेच्छा से हलफिया बयान, बिना किसी भय, दबाव अथवा प्रलोभन के इस कारण दे रही हूं ताकि सच्चाई श्रीमान जी के समक्ष आय आये और अन्याय होकर कोई गलत व्यक्ति न फंसे। मुझ शपथकर्ती द्वारा इसी संबंध में अपना पूरा सच का बयान व शपथपत्र उपरोक्त न्यायालय में एवं विवेचनाधिकारी को पूर्व में दिया जा चुका है। मुझ शपथकर्ती द्वारा दिनांक ०२.०६.२०१५ को एक प्रार्थना पत्र मय शपथपत्र न्यायालय में स्वयं उपस्थित होकर प्रस्तुत कर दिया गया था जिसके बावजूद मेरे अधिवक्ता द्वारा मुझे सूचित किया गया है कि कुछ लोग मुझे तंग व परेशान करने की नीयत से प्रार्थनापत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे उपरोक्त मुकद्दमें के निस्तारण में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है उन प्रार्थनापत्रों में मुझ शपथकर्ती की कोई सहमति नहीं है तथा वह २१.०७.२०१५ को भी न्यायालय में स्वयं उपस्थित होकर एक प्रार्थना पत्र देकर मुकद्दमें के निस्तारण की प्रार्थना कर चुकी है। मुझ शपथकर्ती को मेरे अधिवक्ता द्वारा मुझे यह भी जानकारी दी गयी है कि उपरोक्त मुकद्दमे के संबंध में किसी व्यक्ति द्वारा एक पी.आई.एल. नम्बर ३८८३/२०१५ माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गयी है जिसमें मुझ शपथकर्ती की किसी प्रकार की कोई सहमति नहीं है तथा पी.आई.एल. से पूर्व पी.आई.एल.कर्ता को मेरे पिता स्वयं पत्र देकर यह सत्य बता चुके थे कि पहले दिया गया प्रार्थना पत्र गलत फहमी मे दिया गया है। फिर पीआईएल के बाद दिये गये लेटर को छिपाते हुए पूर्व में दिये पत्र को दर्शाया गया है। पीआईएल का अवलोकन करने के उपरांत यह भी जानकारी में आया है कि उसे प्रस्तुत करने में जो भी आधार लिये गये हैं वह नितांत असत्य व गलत हैं। इस प्रकरण सत्यता यह है न तो हमारा कोई समझौता हुआ है औ रन ही होर्सट्रेडिंग जैसी कोई बात। कुछ लोग इस प्रकरण को उलझाये रखने के लिए इस तरह की बेबुनियाद और असत्य बातें कर रहे हैं। उनमें कोई न कोई दम न सच्चाई है। शपथकर्ती स्वयं ने प्रार्थना पत्र डीजीपी महोदय लखनऊ कार्यालय में स्वयं उपस्थित होकर प्रस्तुत किया था जिसके आधार पर विवेचना को फिरोजाबाद ट्रांसफर  किया गया था। अब इसमें अंतिम रिपोर्ट लग चुकी है और वह उससे पूर्ण रूप से सहमत है। वादिया को विवेचनाधिकारी द्वारा उपरोक्त मुकद्दमें में दी गई अंतिम रिपोर्ट पर कोई भी आपत्ति नहीं है तथा वह पूर्ण रूप से सहमत है। वह इस मुकद्दमे को आगे लडऩा नहीं चाहती है। कानून की जानकारी न होने एवं भाई को बचाने प्रार्थिया सामाजिक, गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है। अत: इस मामले को लेकर प्रार्थिया के विवाह में भी अड़चनें आ रही हैं।”

ज्ञात हो कि इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल की गई है, जिस पर पीडि़ता ने एसीजेएम चतुर्थ न्यायालय में कहा कि उसकी पीआईएल में कोई सहमति नहीं है और उसमें जो तथ्य दर्शाये गये हैं वह निराधार  और मनगढंत हैं। इस मामले में मथुरा न्यायालय में विजयपाल तोमर द्वारा प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल किया गया, जिस पर अदालत द्वारा यह लिखा गया कि उनको प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने का अधिकार नहीं है। इधर न्यायालय में पीडि़ता ने कई बार उपस्थित होकर अपने प्रार्थना पत्र एवं शपथ पत्र दिये तथा न्यायालय में उपस्थित होकर सशपथ बयान दिया कि उक्त मुकद्दमें पुलिस द्वारा दाखिल एफआर पर मैं इसका विरोध नहीं करना चाहती और इसको स्वीकार कराने के लिए मैंने स्वेच्छा से एवं बिना किसी दबाव के ही शपथ पत्र दिये हैं।  और वह अंतिम आख्या स्वीकार कराना चाहती हूं। अब इस मामले में न्यायालय ने १६ फरवरी २०१६ नियत करते हुए आदेशित किया कि पीआईएल में दोनों पक्ष उपस्थित होकर उसका निस्तारण करायें।

मथुरा से Vivek Priya Arya की रिपोर्ट. संपर्क : Mobile : +91-9719910557

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अपराधियों की पेशी पर कचहरी सील करना आम जन के मौलिक अधिकार का हनन

गाजीपुर (उत्‍तर प्रदेश) : गुरूवार को कचहरी परिसर पुलिस ने सील कर रखा था। लगभग सवा दस बजे पूर्व जिला पंचायत सदस्‍य एवं समग्र विकास इण्डिया के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ब्रज भूषण दूबे पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने से जिलाधिकारी कार्यालय की ओर जाना चाहे तो उन्‍हें भी रोक दिया गया। कारण् पूछने पर तैनात कतिपय इंस्‍पेक्‍टर व दरोगाओं द्वारा बताया गया कि आज फास्‍ट ट्रैक कोर्ट में बृजेश व त्रिभुवन की पेशी है।

श्री दूबे ने मुख्‍यमार्ग से आगे जाने की बात किया तो पुलिस कर्मियों ने उन्‍हें किसी भी कीमत पर जाने से मना कर दिया तब तक कई वादकारी आये और अपने मुकदमें की पैरवाी करने के लिये जाने का आग्रह किये किन्‍तु उन्‍हें भी रोक दिया गया। श्री दूबे अपने मौलिक अधिकार के हनन की बात कहते हुये पुलिस अधीक्षक कार्यालय के ठीक सामने चार्ट पेपर लगाकर सत्‍याग्रह पर बैठ गये।

चार्ट पेपर पर लिखा था कि वीडियो कान्‍फ्रेसिंग के जरिये पेशी कराओ, या जज साहब जेल में जाओ। उनका कहना था कि प्रदेश के आधा दर्जन जेलों में वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग की सुविधा है तथा न्‍यायालय में भी, फिर इसका प्रयोग क्‍यों नहीं किया जाता। उन्‍होने यह भी कहा कि यदि पेशी कराना अपरिहार्य ही है तो कचहरी परिसर सील कर आम जन के मौलिक अधिकार का हनन न किया जाय। यह भी कहा कि यदि उचित समझें तो सम्‍बन्धित न्‍यायालय के न्‍यायाधीश अपराधी के निरूद्ध कारागार स्‍थल पर जाकर सुनवाई करें। एेसा करने से जहां पब्लिक मनी का अपव्‍यय रूकेगा वही दर्जनो थानो की पुलिस परेशान नहीं होगी।

श्री दूबे ने कहा कि उन्‍होने इसके लिये माननीय उच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश, प्रदेश के श्री राज्‍यपाल, मुख्‍यमंत्री सहित जिले के जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक को मेल किया है। श्री दूबे ने जोर देकर कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्‍त आम जन के मौलिक अधिकार के हनन का अधिकार किसी काे नहीं है। यह भी कहा कि वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग के जरिये पेशी कराये जाने के लिये उन्‍होने दशकों पूर्व से काफी प्रयास किया है। सत्‍याग्रह के समय अधिवक्‍ताओं, राहगीरों, वादकारियों व स्‍कूली छात्र/छात्राओं को रोकने वाली पुलिस मूक दर्शक बनी रही।

सत्‍याग्रह में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण तिवारी ने अफसोस जाहिर करते हुये कहा कि वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग के जरिये पेशी कराने से समय, धन, भागदौड की बचत के साथ मुकदमें की सुनवाई में विलम्‍ब नहीं होगा तथा शीघ्र न्‍याय पाने की अवधारणा फलीभूत होगी। उक्‍त अवसर पर प्रवीण तिवारी, हसन अब्‍दुल्‍लाह, मनोज जैसवाल, पीयूष कान्‍त पाण्‍डेय एव अवनि कुमार सिंह ने सत्‍याग्रह किया।

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पंजाब केसरी के मालिक विजय चोपड़ा को जज ने दिखाई औकात, कोर्ट रूम से बाहर निकाला

मीडिया के मालिकों की ऐंठन को ठीक करने का काम कई ईमानदार किस्म के न्यायाधीश कर डालते हैं. ऐसा ही एक मामला पंजाब के होशियारपुर का है. यहां गलत खबर छापने के एक मामले में निजी पेशी हेतु आए पंजाब केसरी के मालिक विजय चोपड़ा सीधे कोर्ट रूम में घुस गए. तब जज ने उन्हें फटकारते हुए कोर्ट रूम के बाहर जाने को कहा और आवाज लगने पर ही अंदर आने के आदेश दिए.

बेचारे विजय चोपड़ा. मीडिया मालिक की ऐंठ धरी की धरी रह गई. वे पहले कोर्ट रूप के अंदर गए, डांट खाकर बाहर आए. और, लास्ट में आवाज लगने पर फिर अंदर आए. इस पूरे मामले की खबर पंजाब के एक अखबार दैनिक सवेरा ने विस्तार से प्रकाशित की है. असल में पंजाब केसरी की ब्लैकमेलिंग पत्रकारिता के खिलाफ ही दैनिक सवेरा अखबार अस्तित्व में आया और यह अखबार पंजाब केसरी से संबंधित कोई भी खबर प्रमुखता से प्रकाशित करने से चूकता नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट में ‘लोकमत’ को साकुरे ने दी मात, एरियर 50 लाख और वेतन 40 हजार मिलेगा

नागपुर। दो साल पहले 61 कर्मचारियों को बिना किसी कारण के अवैध रूप से टर्मिनेट करने और कर्मचारियों के शोषण, अन्याय एवं अत्याचार के लिए कुख्यात महाराष्ट्र के कुख्यात लोकमत समाचार पत्र समूह को सुप्रीम कोर्ट से फिर एक बड़ा झटका लगा है. लोकमत के भंडारा कार्यालय में प्लानर के रूप में कार्यरत महेश मनोहरराव साकुरे को सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन देने और 1998 से लेकर अब तक पालेकर, बछावत, मणिसाना एवं मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार ब्याज के साथ एरियर्स देने का फैसला सुनाया है.

इस आदेश के अनुसार साकुरे का वेतन अब करीब रु. 40 हजार हो जाएगा और उन्हें एरियर्स के रूप में करीब 50 लाख रुपए मिलेंगे. कांग्रेस सांसद और कोयला घोटाला के आरोपी विजय दर्डा एवं महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री राजेंद्र दर्डा के लोकमत समूह को पिछले कुछ महीनों में विभिन्न अदालतों से ऐसे कई झटके लगे हैं, मगर कर्मचारियों के साथ उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है.

महेश साकुरे लोकमत अखबार के भंडारा कार्यालय में 1.10.96 से टेलीप्रिंटर आपरेटर के पद पर कार्यरत थे. श्री साकुरे प्रति माह 300 रु., 500 रु., 1000 रु. व 2000 रु. पर काम करते रहे हैं. 1.4.1998 को उन्हें टेलीप्रिंटर आपरेटर से प्लानर बना दिया गया, मगर वेतन वही प्रति माह रु. 2000/- ही रहा. उल्लेखनीय है कि समाचारपत्र में प्लानर के पद पर कार्यरत कर्मचारियों को मणिसाना सिंह और मजीठिया अवार्डस् के मुताबिक पत्रकारों की श्रेणी में रखा गया है और उसी के अनुसार उनका वेतन तय किया गया है.

वर्किंग जर्नालिस्ट एक्ट की धारा 6 के अनुसार पत्रकारों के लिए हर सप्ताह 36 घंटे काम निर्धारित है, मगर श्री साकुरे से साप्ताहिक 48 घंटे काम लिया जाता था, लेकित वेतन प्रति माह केवल रु. 2000/- ही दिया जाता था. बार-बार ज्ञापन देने, अनुरोध करने पर भी जब न्याय नहीं मिला तो श्री साकुरे ने वर्ष 2001 में औद्योगिक न्यायालय, भंडारा में अनफेयर लेबर प्रैक्टिस एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई. करीब 11 साल के संघर्ष के बाद 18.10.11 को न्यायाधीश श्री वी. पी. कारेकर ने साकुरे के पक्ष में फैसला सुनाया और कई आदेश दिए.

न्यायाधीश वीपी कारेकर ने क्या फैसला सुनाया, क्या-क्या आदेश दिए… उसके आगे क्या हुआ… जानने के लिए नीचे क्लिक करके अगले पेज पर जाएं>

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