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बे-मन की बात : आकाशवाणी के कैजुअल एनाउंसरों पर लटक रही छंटनी की तलवार

न्यायालय और संसदीय कमेटी के आदेश को भी दरकिनार करते हुए आकाशवाणी में कार्यरत कैज़ुअल एनाउंसरों को असंवैधानिक तरीके से बाहर निकालने की साजिश चल रही है। ख़ासकर वे कैज़ुअल एनाउंसर, जो पिछले पंद्रह वर्षों से अधिक समय से कार्यरत हैं, उन्हें एक अंडरटेकिंग के माध्यम से निकाले जाने का अंदेशा गहराता जा रहा है। 

न्यायालय और संसदीय कमेटी के आदेश को भी दरकिनार करते हुए आकाशवाणी में कार्यरत कैज़ुअल एनाउंसरों को असंवैधानिक तरीके से बाहर निकालने की साजिश चल रही है। ख़ासकर वे कैज़ुअल एनाउंसर, जो पिछले पंद्रह वर्षों से अधिक समय से कार्यरत हैं, उन्हें एक अंडरटेकिंग के माध्यम से निकाले जाने का अंदेशा गहराता जा रहा है। 

दूरदर्शन और आकाशवाणी दोनो का मंत्रालय एक है लेकिन कहा जाने लगा है कि अब प्रसार भारती ही सब कुछ है। प्रसार भारती का कहना है कि महानिदेशक का निर्णय बदला नहीं जा सकता। कैज़ुअल एनाउंसर को एक साल में 72 से कम ड्यूटी देने का अंडरटेकिंग साबित करता है कि उनको असंवैधानिक तरीके से बाहर कर देने का खेल शुरू हो चुका है। 

दूरदर्शन में पंद्रह वर्षों से अधिक समय से काम करने वाले कैज़ुअल कर्मचारी अब स्थाई कर दिए गए हैं। वहां के कैज़ुअल स्टाफ को 90 दिनों से बढ़ाकर 120 दिन ड्यूटी दी जाने लगी है। उधर, 1992 के नोटिफिकेशन के बाद स्थाई एनाउंसर की बहाली नहीं की गई, क्योंकि इसी दरम्यान 1996 में आकाशवाणी और दूरदर्शन को प्रसार भारती के हवाले कर दिया गया, स्थाई एनाउंसर रिटायर्ड होते गए और कैज़ुअल एनाउंसर का काम लगातार बढ़ने लगा। आज आकाशवाणी कर्मियों को हालात ने ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया है कि संघर्ष के अलावा उनके सामने और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। 

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