उस पहले ही दिन अश्क जी घंटो मेरी कविताएं सुनते रहे। मुझे याद है करीब पैंतीस चालीस कविताएं मैंने उनको सुनाई होंगी। सुनने के बाद कुछ देर चुप रहे अपने उगालदान में पान थूका और बोले कविता पर काम करो। कुछ कौंध है तुम्हारी कविता में। काम करना होगा…

बोधिसत्व-
इलाहाबाद में क्षुद्रता और सृजनात्मकता का अजब संगम है। दोनों पक्ष आपको बराबर मिलेंगे। आप जहां मन रमा लें वहीं आपका थान हो जाएगा। यह नगर जितना कल्पना में है उससे अधिक यथार्थ है। जितना कालिख पोतने में यकीन रखता है उससे अधिक उज्जवलता में भरोसा रखता है। आप को विवाह और फौजदारी के लिए नकली गवाह भी मिल जाएंगे और उन नकली गवाहों में असली इलाहाबाद भी मिल जाएगा! इस शहर में पवित्रता की खोज एक व्याधि है। उसके लिए संगम तक जाना होगा लेकिन शहर की फितरत यह कि वहां पर जो हनुमान जी हैं वे भी लेटे हुए हैं!
बात 1988 की है। जब मेरा नाम बदला गया। अभी तक मेरे मूल नाम अखिलेश मिश्र के साथ मेरी चार या पांच कविताएं प्रकाशित हो चुकी थीं। दो कविताएं आलोक डाइजेस्ट में ज्ञानपुर के समय में ही छप गईं थीं। आलोक डाइजेस्ट के संपादक अमिय उपाध्याय अमर फेसबुक पर हैं भी। यहां यह बात स्वीकार करना अच्छा लगेगा कि अमिय देव शंकर मेरे पहले संपादक हैं। वे मेरे घरेलू नातेदार भी हैं। और ज्ञानपुर में मुझसे एक साल सीनियर थे। यह पहला प्रकाशन 1985 में हुआ होगा। अमिय जी इसपर बेहतर प्रकाश डाल पाएंगे।
फिर 1986 के अंत में मेरा दाखिला इलाहाबाद विश्व विद्यालय में हो गया। मैं ज्ञानपुर से इलाहाबाद आ गया। ज्ञानपुर में मेरे हिंदी के अध्यापकों में दो प्रमुख थे। एक विभाग के अध्यक्ष प्रो. संत बख्श सिंह जी और दूसरे प्रो. विभु राम मिश्र जी। इन दोनों का सतत स्नेह मिलता रहा था। और संत बख्श सिंह जी ने मुझे सर्वेश्वर जी और केदार नाथ सिंह के साथ धूमिल और कुमार विकल को पढ़ने का सुझाव दिया।
रोचक बात यह थी कि ज्ञानपुर में महाविद्यालय के पुस्तकालय में “जमीन पक रही है” और “खूंटियो पर टंगे लोग” मिल भी गई थी। इस किताब के साथ ही भवानी प्रसाद मिश्र की नीली रेखा तक भी ज्ञानपुर में उपलब्ध थी। निराला प्रसाद पंत दिनकर आदि की किताबें पहले से ध्यान में थीं लेकिन संत बख्श जी के कहने पर सर्वेश्वर और केदार जी को पढ़ने से एक अलग तरह का काव्य आकाश दिखा मुझे। विभु राम जी कविता के अद्भुत व्याख्याकार थे। उन्होंने कविता को समाज से जोड़ कर देखना सिखाया। एक तरह से कविता की दीक्षा इलाहाबाद के पहले ही आरंभ हो गई थी। ज्ञानपुर के दिनों की बातें विस्तार से करनी हैं जिसमें कृष्णावतार त्रिपाठी राही भैया के साथ की बैठकें भी शामिल होनी हैं।
इलाहाबाद में मैं किसी साहित्यिक को जानता न था। हिंदी विभाग में भी जो अध्यापक थे उनसे पहले ही साल कोई साहित्यिक वार्ता सीधे बनती दिख नहीं रही थी। तभी एक दिन मैंने अश्क जी का एक इंटरव्यू देखा। यह इंटरव्यू शहर के एक प्रतिष्ठित अखबार अमृत प्रभात में छपा था और लिया था राम बाबू रेणुज जी ने। आगे रेणुज जो पीसीएस हो कर हिंदी की विराट दुनिया के सरकारी विस्तार में चले गए। रामबाबू भाई अभी भी संपर्क में हैं। उस इंटरव्यू में एक बात अश्क जी ने अलग से कही थी कि वे युवाओं को बढ़ावा देने में बहुत जोर देते हैं। अख़बार में उनका पता भी छपा था। पांच खुसरो बाग। अगले दिन मैं अश्क जी से मिलने खुसरो बाग पहुंच गया।
अप्रैल 1987 की कोई तारीख थी। खूब गर्मी में अश्क जी मिले और सुराही से ढार कर पानी पिलाया। आगे बात चीत में मैंने बताया कि उनका इंटरव्यू पढ़ कर आया हूं। अल्लापुर में रहता हूं। भदोही का रहने वाला हूं। भदोही का नाम सुनकर अश्क जी ने कौशल्या जी को बुलाया और बोले कि ये भदोही के हैं। और इनका नाम अखिलेश है। उन्होंने मुझे बताया कि अखिलेश नाम के एक कहानीकार हैं। वे भी इलाहाबाद में ही रहते हैं। यहां इतना ही बता दूं कि तद्भव संपादक और महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश जी के कारण मेरा नाम अखिलेश से बोधिसत्व हुआ!
नाम बदलाव का वृत्तांत बताऊंगा। पहले अश्क जी से मुलाकात और उसके परिणाम पर बात कर लूं। उन्हीं दिनों कौशल्या जी ने भदोही के बुनकरों पर कोई कहानी लिखी थी। जो शायद सारिका में प्रकाशित हुई थी। उस पहले ही दिन अश्क जी घंटो मेरी कविताएं सुनते रहे। मुझे याद है करीब पैंतीस चालीस कविताएं मैंने उनको सुनाई होंगी। सुनने के बाद कुछ देर चुप रहे अपने उगालदान में पान थूका और बोले कविता पर काम करो। कुछ कौंध है तुम्हारी कविता में। काम करना होगा।
फिर अश्क जी ने कहा कि उदय प्रकाश को पढ़ो और त्रिलोचन को पढ़ो। उन्होंने “सुनो कारीगर” की प्रति मुझे दी भी। लेकिन इस बात पर कोई भी यकीन नहीं करता कि अश्क जी ने मुझे पहली ही मुलाकात में किताब दी होगी। उसके बाद अश्क जी ने कहा कि तुम सिविल लाइंस जाओ। वहां नीलाभ प्रकाशन से मेरी किताब सड़कों पर ढले साए खरीद लो और मेरी कविताएं पढ़ो। अश्क जी ने सुझाव दिया कि मैं बंबई की मसाला फिल्में देखना कम कर दूं और उनसे बचे पैसों से राजकमल और संभावना प्रकाशन की पेपर बैक किताबें खरीदा करूं। मेरे पास अपनी पसंद की किताबें होनी चाहिए।
वहां मैं पहले दिन ही सेतु भाई और नीलाभ जी से मिला। उस दिन करीब पांच घंटे रहा मैं। जब निकलने को हुआ तो नीलाभ जी आए। अश्क जी ने उनसे मुझे मिलाया की ये गुड्डा हैं। नीलाभ कविताएं लिखते हैं। नीलाभ जी ने कहा कि मैं कभी भी आकर उनसे नीलाभ प्रकाशन में मिल सकता हूं। अश्क जी के सभी सुझाव मुझे अच्छे लगे। मैंने सप्ताह में दो तीन फिल्में देखने का चक्कर कम कर दिया। पेपर बैक किताबें खरीदने लगा। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि कविता पर “काम” कैसे करूं?
एक या दो दिन में अंतराल पर फिर चला गया उनके पास। और पूछा की कविता पर काम कैसे किया जाता है? अश्क जी ने बड़े स्नेह से मुझे मेरी कोई छोटी कविता लिखने के लिए एक कागज मेरे आगे रख दिया। मैंने अपनी एक कविता “आवाज” जो कि मेरे पहले संग्रह में प्रकाशित भी है, लिखी। अश्क जी ने कहा कि इसमें देखो की कौन से शब्द बदल सकते हो। क्या कुछ जोड़ सकते हो। जो बात तुमको कहनी है उसे किस तरह और प्रभावी, चुस्त और सुंदर कर सकते हो। उन्होंने निकानोर पर्रा कि एक कविता भी लिखने की प्रक्रिया पर सुनाई।
मैं कविता का वह पन्ना लेकर बहुत देर तक सोचता रहा और कविता में आए शब्द “खुद ब खुद” को “अपने आप” कर दिया। यही बदलाव मैं कर पाया। इसके अलावा और कोई बदलाव नहीं कर सका। अश्क जी ने वह पन्ना मुझसे लिया और कुछ देर उस पर लिखी मेरी कविता को पढ़ा। और फिर अपने सुलेख में वहां वह कविता एक एक पंक्ति करके लिखने लगे और उस नए लेखन पर बात भी करते गए। यह शब्द छोड़ दो यह लिख कर देखो। कोई प्रतीक आ सकता है क्या। कोई रूपक कोई तुलना जोड़ सकते हो क्या?
मैंने वह सारी प्रक्रिया देखी बदलाव के बाद कविता मेरी रह नहीं गई थी। वह एक नई कविता हो गई थी। मैंने अश्क जी से कहा भी कि यह तो बदल गई। फिर उन्होंने कहा कि तुम रचना प्रक्रिया को समझो। आवश्यक नहीं कि कविता एक बार में बन जाए। रचना प्रक्रिया समझने के लिए उन्होंने कहा कि साहित्य सम्मेलन जाओ और वहां से “आधुनिक कवि श्रृंखला” की उनकी और केदार नाथ अग्रवाल की और महादेवी जी की किताबें लेकर उनकी भूमिका पढ़ो। मैं सम्मेलन गया। वहां से आधुनिक कवि माला की कई किताबें ख़रीदीं। अश्क जी महादेवी जी और केदार नाथ अग्रवाल वाली किताबें भी ख़रीदीं।
अजीब परेशानी से घिर गया मैं। कोई कविता लिखूं और फिर अश्क जी की तरह उसमें फेर बदल करने लग जाऊं। पूरी कविता नई कर दूं और और यह क्रम दस दस ड्राफ्ट तक जाकर भी रुके नहीं!
अश्क जी ने मुझे रचना प्रक्रिया के ऐसे भंवर में फंसा दिया था कि क्या कहूं। खूब आनन्द लेकिन अथाह मुश्किल से दो चार हो रहा था मैं! मेरी एक मुश्किल यह भी थी कि मैं रोजनामचे की तरह हर दिन कविता लिखता था। और कई बार तो ऐसा हो जाता था कि एक दिन में तीन कविता। एक दिन अश्क जी ने मुझे डांटा की कुछ न भी लिखा करो…असल में मैं हर दूसरे दिन उनके पास बिना समय लिए ही पहुंच जाता था….और अपनी सब नई कविताएं उनको सुना देता था और फिर उस पर किए गए काम भी। अश्क जी के गले में मैं पड़ गया था शायद….
क्रमशः
तस्वीर (सबसे ऊपर) – अश्क जी के घर के अहाते के मुख्य द्वार पर लगी उनकी नाम पट्टिका। कभी इसकी रौनकें अजब थीं। फोटो : श्वेताभ अश्क
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