अरविंद कुमार सिंह का रोहित सरदाना से सवाल- सुधीर चौधरी को चिट्ठी लिख कभी पूछा कि जिंदल से सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी?

Arvind K Singh : रवीश कुमार की चिट्ठी पर चिट्ठी…. रवीश कुमार की चिट्ठी पर एक पत्रकार साथी रोहित सरदाना ( जीन्यूज) ने कुछ सवाल खड़ा किया है। हालांकि ये दोनों पत्रकार साथी ऐसे नहीं है जिनके साथ मैने काम किया हो या कोई गहरा संबंध हो। लेकिन बात मुद्दे की उठी है तो बिना हस्तक्षेप किए रहा नहीं जा रहा है। रवीश कुमार का जहां तक मैने आकलन किया है, उनसे मेरा दूर का संबध है। फिर भी कभी कभार उनको एकाध सलाह दी तो उसे माना और जवाब भी दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते हैं जिस पर आम तौर पर मुख्यधारा का टीवी शांत रहता है।

यह सही है कि रवीश कुमार ने बरखा दत्त को चिट्ठी नहीं लिखी है। लेकिन मैं साथी रोहितजी से यह जानना चाहता हूं कि क्या उन्होने सुधीर चौधरी जी को चिट्ठी लिख कर कभी पूछा है कि आखिर उन्होने नवीन जिंदल के साथ ऐसी सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी औऱ यह भी कि क्या उमा बंसल नामकी शिक्षिका का जीवन बरबाद करते समय उनको पत्रकारिता की नैतिकता का खयाल नहीं रहा था।

मेरे हिसाब से उन्होंने जो सवाल उठाया है वह बेमानी है। रवीश या कोई भी पत्रकार पूरी दुनिया का ठेका लेकर नहीं चल सकता है। जो सवाल झकझोरता है उस पर अगर कोई पत्रकार खुल कर बोलता है तो वह उन पत्रकारों से ज्यादा ईमानदार है जो मन ही मन घुटते हैं। मेरे हिसाब से एक पत्रकार के तौर पर रवीश कुमार अगर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं तो यह एकदम बुरा नहीं है। वे किसान या मजदूर की बात करते हैं तो किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध नहीं करते।

कायदे से कोई किसी को संबोधित चिट्ठी लिखता है और अपनी भावनाओं का इजहार करता है तो उसमें किसी और को कूदना नही चाहिए। न ही किसी का प्रवक्ता बनना चाहिए। यह सामान्य शिष्टाचार है। एक पत्रकार होने के साथ चिट्ठी के महत्व को मैं बाकी साथियो से अधिक जानता हूं क्योकि बीते तीन दशकों से मेरे अध्ययन का यह प्रमुख विषय रहा है।

खुली चिट्ठियां लिखने का रिवाज पुराना है। रवीश कुमार की चिट्ठियां बेशक सवाल खड़े करती हैं। सवाल एमजे अकबर पर या अरुण शौरी जैसे एक दौर के दिग्गज पत्रकारों पर उठाना क्यों बुरा है और अखिलेश यादव पर उठाना क्यों अच्छा है। मेरे हिसाब से रवीश कुमार ने सही सवाल उठाया है और ऐसे सवालों को उठाना जारी रखना चाहिेए।

सवाल पूछना और सवाल उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। रोहित जी भी सवाल उठाने के लिए आजाद हैं। वे बरखा दत्त से सवाल कर सकते हैं, खुली चिट्ठी लिख सकते हैं। लेकिन किसी और पर सवाल उठाने से कैसे रोक सकते हैं। और यह एजेंडा कैसे तय कर सकते हैं कि रवीश को या किसी को कैसा सवाल पूछना चाहिए और किससे सवाल पूछना चाहिए। बस इतना ही।

राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर….

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Comments on “अरविंद कुमार सिंह का रोहित सरदाना से सवाल- सुधीर चौधरी को चिट्ठी लिख कभी पूछा कि जिंदल से सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी?

  • bhavishya menaria says:

    journalism ki kya halat ho gae. patrakar group me bant gae. koi kisi party ka to koi kisi ka ban gaya. kabhi lagta he ravish g sahi likh rahe to kabhi rohit bhai. hum chhote gaon o shahar ke patrakar inse kya aasha lagae. hamne yashwant g ki jagae alakh ke sahare majithiya ko lekar hamare newspaper par case kiya or 1 saal se ghar baithe he lekin kabhi electronic media ke saathiyon ne hamare liye pm ya kisi minister se is baare me sawal nahi kiya. ha ek baar jaroor ravish bhaisahab ne prime time me sawal uthaya to rajyasabha tv ne bahas karakar etishree kar li. yashwant ji ne hamare liye desh ka doura kia lekin dusro ne saath nahi diya. kher hame fir bhi supreme court par believe he. sathiyon aapke chehre pura desh dekhta he, janta he. aapse ek gujarish he ki ek dusre ko chhithi likhne ki bajae pm or apne shetra ke saansado ko print media ke saathiyon ke haq ke liye chhithiyan likhen. aap logon se hame yahi aasha he. or ravish ji me 1 saal se ghar par baitha hoo. pahle desk par tha to aapke channel par prime time nahi dekh pata tha lekin weekly off ya dopahar me jaroor aapko dekh leta tha or ab to kher aapko roj dekh leta hoo. aapko follow bhi karta hoo. aap aise hi rahe. hamare jaise log to kahte rahenge aap parvah nahi karen pura desh aapko bahut chahta he. bhavnao me bahkar kuchh galat likha ho to sabhi senior saathi chhota jankar maaf karen. thanks

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  • Mahendra pratap singh says:

    इस बीच चिठ्ठियों की बढ़ सी आ गई है। तमाम गद्दीनशीन पूरी पत्रकारिता जगत के स्वयंभू लम्बरदार बनने को आतुर दिख रहे हैं। पेट भरा है और अन्य लम्बोदारों के बहाने नैतिकता का ज्ञान बघार रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे अघाये हुए पछ और विपछ नूराकुश्ती करते हैं। समाज और नैतिकता के इतने ही बड़े पैरोकार हो तो पहले पत्रकार समाज की दुर्दशा और गरीबी का मुद्दा सरकारो और धनपशुओं तक पहुचाने में ऊर्जा का व्यय करो। चिठ्ठी लिखकर लोगों का चितचोर बनने की कोशिश बेकार है। पत्र लिखकर जिनसे तुम उत्तर की अपेछा पाल बैठे हो वो ‘ सास भी तुम्हारी तरह कभी बहू’ थी। पार न पाओगे। पाखण्ड का ये तरीका तुम लोगो का चटपटा भले है लेकिन है तो नेतागीरी से भी गिरा हुआ। एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हो, पीछे मुड़कर देखो पैबंद सबका खुला है। सारा पत्र प्रपंच पढ़कर पता चल रहा है कि सबकी निगाहें बीरबल की गद्दी पाने, बरखा का मौसम महसूस करने और नहाने, चौधराहट बघारने, राजयोग का दीप जलाने, ख़ास आदमी होकर भी आम के लिए घड़ियाली आशु बनने की थान बैठे हो। बौद्धिक विलास बंद करो यार, अपने वास्तविक स्वरुप में आओ। बाज बनने के चक्कर में राजहंस की हस्ती चुल्लू भर पानी में मत डुबाओ। बड़े वरिष्ठ हो नाक रगड़ते शोभा नहीं देता। जो हो वही रहो, हो सके तो अपने किरदार में धार लाओ। ,,,,राज्यसभा जाना है तो लगे रहो । तुमको भी कोई पगला चिठ्ठी में खीस निपोरेगा। हंस के बेवकूफ समझ लेना। ,,,,यू आइडिया हमार है, बाकी तुम्हार मर्जी।
    प्रेषक: तड़ियाल का मातहत

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