आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं?

Sanjaya Kumar Singh : एक मशहूर टेलीविजन एंकर के बारे में Dilip Mandal की यह पोस्ट पढ़ने लायक है।

“जिस संपादक ने रोहित सरदाना को टीवी में पहली नौकरी दी थी, उन”के दर्द को कौन समझ सकता है. उन्हें क्या मालूम था कि रोहित में इतना जहर भरा है. रोहित तब बेहद मासूम बनकर उनके पास आया होगा. चूंकि मैं उस संपादक को जानता हूं, इसलिए उस दर्द को महसूस कर सकता हूं. अगर उन्हें पता होता कि रोहित की हरकतों से आगे चलकर समाज टूटेगा, तो रोहित को वह नौकरी कतई न मिलती. रोहित की हरकतों से लोगों के मन में नफरत भर रही है. इस दुष्कर्म का बोझ लेकर रोहित पता नहीं क्या बनना चाहता है. वह एक सम्मानित पत्रकार तो कभी नहीं बन पाएगा. हद से हद उसकी हैसियत उस बंदर की होगी, जिसके बनाए पुल पर चढ़कर सेना ने लंका की ओर प्रस्थान किया था. इतिहास तो राजा का होता है, बंदरों का इतिहास नहीं होता. रोहितों का इतिहास में कोई जिक्र नहीं होता. रोहित पत्रकारिता का तोगड़िया बनेगा और आखिर में रोएगा. लेकिन यह होने तक समाज को इसकी कीमत चुकानी होगी. इतनी कड़वाहट क्यों बो रहे हो रोहित? हो सकता है कि निजी जीवन में तुम या तुम्हारे परिवार का कोई दर्द हो. कोई शिकायत हो. लेकिन मासूमों के घर जलाकर उसकी कीमत वसूलोगे क्या? आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं? उन्हें ही क्या हासिल हो जाएगा? गाड़ी की लंबाई चार इंच बढ़ भी गई तो क्या? कौन देखता है, कौन जानता है, कौन पूछता है? टीआरपी की वासना में लोगों की जान चली जाएगी. अब तो रुक जाओ. पत्रकारिता नहीं तो इंसानियत की खातिर ही सही.”

दिलीप मंडल की इस पोस्ट के बाद हिन्दी टेलीविजन पत्रकारिता में नियुक्तियों पर यह लेख पढ़िए। इसे मैंने अपनी पुस्तक, ”पत्रकारिता : जो मैंने देखा, जाना, समझा”  www.goo.gl/xBHcEx में भी साभार उद्धृत किया है। इस आलेख की सिफारिश इसलिए कर रहा हूं कि इसके बारे में एक पाठक ने लिखा है, “जितेंद्र जी, आपने जो बयां किया उसे पोस्टर बनाकर दीवारों पर चिपकाना चाहिए”। लिंक यह रहा…

http://old1.bhadas4media.com/article-comment/12842-2013-07-07-08-49-31.html

आलेख जिसकी सिफारिश कर रहा हूं

http://old1.bhadas4media.com/print/12808-2013-07-05-13-58-10.html

हिन्दी पत्रकारिता के पतन को समझना हो तो काम आएगा। खासकर उदारीकरण के बाद के भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में आए लोगों के लिए।

पुनःश्च

आपकी मान्यता (जो भी है, जैसी भी है) का विस्तार होगा अगर आप उस टिप्पणी को पढ़ेंगे। मैंने दिलीप की पोस्ट को बतौर संदर्भ लिया है। लिखा भी है कि इसके बाद इस टिप्पणी को पढ़िए। – किसी ने पढ़कर कमेंट लिखा हो ऐसा नहीं लगता है। सबकी दिलीप (और रोहित के बारे में) एक तय राय है जिसपर बात करने, सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। चूंकि जो राय बनी है वह ऐसे ही, सुनी-सुनाई बातों पर, ऊपरी जानकारी के आधार पर है इसलिए कोई और जानना नहीं चाहता – शायद पढ़ने लिखने का रिवाज ही नहीं रह गया है। या हर कोई समझता है कि ज्यादा जानने की जरूरत नहीं है। जितेन्द्र जी को पढ़िए तो सही। यह पोस्ट दिलीप की पोस्ट पढ़वाने के लिए नहीं है। हिन्दी (टेलीविजन) पत्रकारिता पर आपकी जानकारी बढ़ाने के लिए है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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रोहित सरदाना और अंजना ओम कश्यप के इस ‘युद्ध’ से आपने कुछ सोचा-सीखा?

Dilip Khan : आजतक न्यूज़रूम का एक वीडियो देख रहा था। रोहित सरदाना और अंजना ओम कश्यप आपस में पद्मावती को लेकर भिड़े हुए थे। एक पक्ष, एक प्रतिपक्ष। दोनों एक-दूसरे को चित्त करने के अंदाज़ में मोहल्ले के गमछाधारी गैंग की तरह लड़ रहे थे। फिर याद आया कि टाइम्स ग्रुप ने एक नया चैनल शुरू किया है- मिरर नाऊ। आप एक ही मुद्दे पर टाइम्स नाऊ को देखिए और मिरर नाऊ को, तो काउंटर नैरेटिव बनता नज़र आएगा। मतलब एक खित्ते के लोग जो एक चैनल के कंटेंट से उखड़े हुए हैं, उन्हें उसी समूह का दूसरा चैनल हाजमोला की गोली खिलाकर पचाने में जुटा है।

इनमें वो तमाम मुद्दे आपको दिखेंगे, जो दरअसल टीवी के पर्दे पर ही तैयार हुए और हमारे बीच परोसे गए। फिर उन मुद्दों को पूरा देश असली मुद्दा मान बैठा। फिर दो गुट बने और उस पर शब्दभेदी वाण चलने लगे। मिशेल चोस्डुवस्की इसे मैनुफैक्चरिंग डिसेंट कहते हैं। इसमें वास्तविक बग़ावत और विरोध को तेज़ होने से रोकने के लिए विरोध प्रायोजित किए जाते हैं। इस प्रायोजित विरोध को वही निकाय मदद भी करता है जिसके ख़िलाफ़ विरोध हो रहा हो। लोगों को लगता है कि वाह क्या शानदार विरोध था, लेकिन असल में वो विरोध से ज़्यादा समर्थन होता है। असली विरोध इस प्रायोजित विरोध के शोर में दब जाता है। लोग निश्चिंत हो जाते हैं। निकाय मज़बूत हो जाता है।

राज्यसभा टीवी में कार्यरत प्रतिभाशाली पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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रोहित सरदाना के समर्थन में उतरा बीईए, धमकी दिए जाने की निंदा की

ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन यानि बीईए यानि टीवी चैनल्स के संपादकों की संस्था ने आजतक चैनल के एंकर रोहित सरदाना के समर्थन में एक बयान जारी कर उन्हें धमकाए जाने की निंदा की. बीईए प्रेसीडेंट सुप्रिय प्रसाद ने इस बारे में जो बयान जारी किया है, वह इस प्रकार है-

”BEA condemned vicious threats issued to Aajtak anchor Rohit Sardana for his tweets questioning bias over freedom of expression. He was slammed with life-threatening calls and msgs.The BEA urges the law-enforcement agencies to ensure safety and protection of Rohit n his family. such acts of intolerance in the world’s largest democracy that is constitutionally bound to protect free speech”.

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राजस्थान हाईकोर्ट के वकील डॉ. विभूति भूषण शर्मा ने भी दिया रोहित सरदाना के पत्र का जवाब

श्री रोहित सरदाना जी,

जिस तरह से आपने रवीश की चिठ्ठी के जवाब में चिठ्ठी लिखी उससे ये प्रतीत होता है कि रवीश कुमार की चिठ्ठी ने आपके मनो मस्तिष्क में बहुत गहरे से प्रहार किया, आपकी चिठ्ठी पढ़कर ऐसा लगा कि रवीश कुमार की कलम ने आपको नंगा कर दिया और आप तिलमिला उठे। रवीश ने चिठ्ठी लिखी अकबर को और चोट लगी आपको, मामला संदिग्ध है, बहुत कुछ स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है क्योंकि अकबर को लिखी चिठ्ठी केवल अकबर के लिए नहीं बल्कि अकबर जैसों के लिए थी, यद्दपि अकबर जैसों में आप बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून बाजपेई और आशुतोष को रखते हैं लेकिन आपका दर्द बयान करता है कि आपको ऐसा लगा कि जैसे रवीश कुमार ने ये चिठ्ठी आपको लिखी हो।। रवीश जी ने तो पहले विजय माल्या सहित बहुत लोगों को इसी अंदाज में चिट्ठियाँ लिखी है लेकिन तब आपको टीस नहीं हुई। इस चिठ्ठी को पढ़कर आपका दर्द बड़ा बेदर्द निकला।

“कुछ तो पर्दादारी है”

खैर, कुल मिलाकर रवीश कुमार का उद्देश्य पूरा हो गया। आपने रवीश को चिठ्ठी लिखकर अपने आपको रवीश के मुकाबले का पत्रकार साबित करने का प्रयास किया लेकिन आप जो थे उससे और अधिक बौने साबित हुए। आपकी चिठ्ठी में रवीश द्वारा उठाए गए सवालों का एक भी जवाब नहीं है बल्कि केवल तिलमिलाहट दिखी जैसे किसी व्यक्ति ने किसी की दुम पर पैर रख दिया हो। रवीश कुमार द्वारा उठाए गए सवालों के ऐवज में सवाल पूछना आपकी बचकाना पत्रकारिता को प्रदर्शित करता है।

रवीश कुमार किसे चिठ्ठी लिखें किसे नहीं ये उनका विवेक और उनका विशेषाधिकार है। आपने नरेन्द्र मोदी जी से क्यों नहीं पूछा कि उन्होनें शत्रुघ्न सिन्हा जी जैसे बड़े फिल्म कलाकार को तथा भाजपा के अन्य वरिष्ठ राजनीतिज्ञों को मंत्री क्यों नहीं बनाया जबकि श्रीमती स्मृति ईरानी जी जो नौटंकी की अच्छी कलाकार हैं, कम पढ़ी लिखी हैं, चुनाव हारने के बाद भी अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग मानव संसाधन जो कि संपूर्ण भारत की शिक्षा व्यवस्था को तैय करता है का मंत्री क्यों बनाया ? आप श्री मोदी से यह भी पूछ सकते थे कि दुनिया के कथित सबसे बौद्धिक व्यक्ति श्री सुभाष चन्द्रा और स्वघोषित दुनिया के सबसे बड़े हिन्दु सम्राट श्री सुब्रमण्यम स्वामी जिनकी पत्नी रैक्सोना पारसी तथा इकलौती पत्रकार पुत्री श्रीमती सुहाषिनी हैदर जिसने एक मुस्लिम से विवाह किया है, को मंत्री क्यों नहीं बनाया ? आपने श्री मोहन भागवत जी से क्यों नहीं पूछा कि उन्होनें एक ऐसे व्यक्ति को जिसे कोर्ट ने तड़ीपार घोषित किया था को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों बनाया ? आपने श्री अमित शाह साहब से ये क्यों नहीं पूछा कि आपने उत्तर प्रदेश में अपराधिक पृष्टभूमि के नेता श्री मौर्य को  भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष क्यों बनाया। आप वर्तमान सरकार से ये भी पूछ सकते हैं कि “थूक कर चाटने” के मुहावरे का व्यवहार में प्रयोग कैसे होता है।।

खैर, ये आपका विवेक और विशेषाधिकार है कि आप किस से कैसे सवाल पूछें या ना पूछें, इस पर हमें प्रश्न नहीं उठाना चाहिए।

आपको विधि का एक सामान्य सिद्धांत का ज्ञान होना चाहिए कि अपराधिक और नैतिक दायित्व व्यक्तिगत होता है। बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, पुण्य प्रसून बाजपेई या अन्य के किसी कृत्य में आपको नैतिक अपराध दिखाई देते हैं तो उसके लिए रवीश कुमार कैसे जिम्मेदार हैं ? और कौनसा सिद्धांत प्रतिपादित है कि रवीश कुमार अगर एम जे अकबर को चिठ्ठी लिखें तो इन्हें भी लिखें। चलिए रवीश कुमार ने इन्हें नहीं लिखा तो आप लिख देते। आप कुछ सवाल अपने सहयोगी मित्र सुधीर “तिहाड़ी” से भी पूछ लेते। अगर बरखा दत्त जी के किसी कृत्य के लिए रवीश कुमार जिम्मेदार हैं सुधीर “तिहाड़ी” के कृत्य से आप कैसे मुक्त हो सकते हैं?

खैर, इस विषय को भी जाने दो।

रवीश कुमार ने एम जे अकबर को चिठ्ठी इसलिए लिखी की अकबर इतने मौकापरस्त हैं कि वो सत्ता के साथ कभी महाराणा प्रताप बन जाते हैं और कभी अकबर हो जाते हैं दोनों महान शख्सियत थी इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन कोई भी सियार शेर और बाघ की खाल पहन कर शेर या बाघ नहीं हो जाता है बल्कि वो रंगा सियार कहलाता है। मुझे आश्चर्य है कि आप अपने आपको बौद्धिक पत्रकार के रूप मे स्थापित करने का भरसक परन्तु नाकाम प्रयास करते हैं लेकिन आप कभी भी बौद्धिकता के उस स्तर को नहीं छू पाए जहाँ रवीश पंहुच चुके हैं।

आप को राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ तक नहीं पता, राष्ट्रवाद क्या है इसके लिए नागपुर से ग्रसित ब्रेन को किसी बढ़िया डिटर्जेंट से धोकर रविन्द्र नाथ टैगोर और महात्मा गाँधी को निश्छल भाव से पढ़ना। आप सही मायने में आज तक हिन्दु होने के धर्म से भी अनभिज्ञ हैं हिन्दु कैसा होता है हिन्दु को कैसा होना चाहिए के लिए विवेकानन्द और महात्मा गाँधी को पढ़िए। आपको पता होना चाहिए कि कट्टर राष्ट्रवाद कहीं ना कहीं मानवता पर प्रहार करता है। आपकी पत्रकारिता शुद्ध रूप से नागपुर को प्रभावित करने के इर्द-गिर्द घूमती है।

आपकी यह चिठ्ठी आपकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है क्योंकि किसी व्यक्ति के सवाल उसकी बौद्धिकता का परिचायक होते हैं। रवीश की चिठ्ठी में एम जे अकबर एक प्रतीकात्मक चरित्र है,  रवीश का प्रहार उन सभी अवसरवादी पत्रकारों पर था जो सुविधा और सत्ता के राष्ट्रभक्त होते हैं जो सुविधा और सत्ता के लिए हिन्दुत्व का चोला पहनते हैं और अचानक अकबर से राणा प्रताप हो जाते हैं। याद रखिए व्यक्ति की महानता उसके चरित्र से देखी जाती हैं ना कि उसके नाम और पद से।

मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री के मंत्री एम जे अकबर को रवीश कुमार का इस अंदाज चिठ्ठी लिखना ही रवीश कुमार की बौद्धिकता, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यनिष्ठा का परिचायक है। आप पत्रकारिता के पेशे में तो लेखनी की कला को भी समझने का  बोध रखिए, रवीश कुमार की अकबर को ये चिठ्ठी हर उस पत्रकार के नाम है जो कमोबेश एम जे अकबर की शैली में पत्रकारिता करते हैं तथा सत्ता के साथ रंग बदलते रहते हैं। आप एम जे अकबर की श्रेणी में आते हैं या नहीं ये आप स्वयं आईने के सामने खड़े होकर, हिन्दु हो तो ईश्वर को साक्षी मानकर अपने सच्चे हृदय से पूछ कर तैय करना। आपने तो अपनी माँ को उन गालियों से बचा लिया है जो रवीश कुमार रोजाना विवेकशून्य अतार्किक कुंठित विक्षिप्त अंधभक्तों से सुनते अथवा पढ़ते हैं क्योंकि आप रेप्टिलिया प्रजाति (रीढ़विहीन) में अपनी सुविधा के अनुसार ढ़ल जाते हैं। जब जिंदगी रीढ़ विहीन सिद्धांतों पर विचरण करती है तो बहुत सी सुविधाएँ और सत्ता सुख प्राप्त होते हैं लेकिन जमीर खो जाता है।

खैर, आपको जमीर की जरूरत भी क्या है ? हो सके तो अगली चिठ्ठी सुधीर ‘तिहाड़ी’ और एम जे अकबर को आप भी लिखना और पत्रकारिता के कुछ मूलभूत सिद्धांत सीख लेना।

धारे के मुआफिक बहना तो,
तौहीन ऐ दस्तो बाजू है।।

डा विभूति भूषण शर्मा

एडवोकेट

हाईकोर्ट

राजस्थान

Facebook.com/vibhutibhushansharma

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अरविंद कुमार सिंह का रोहित सरदाना से सवाल- सुधीर चौधरी को चिट्ठी लिख कभी पूछा कि जिंदल से सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी?

Arvind K Singh : रवीश कुमार की चिट्ठी पर चिट्ठी…. रवीश कुमार की चिट्ठी पर एक पत्रकार साथी रोहित सरदाना ( जीन्यूज) ने कुछ सवाल खड़ा किया है। हालांकि ये दोनों पत्रकार साथी ऐसे नहीं है जिनके साथ मैने काम किया हो या कोई गहरा संबंध हो। लेकिन बात मुद्दे की उठी है तो बिना हस्तक्षेप किए रहा नहीं जा रहा है। रवीश कुमार का जहां तक मैने आकलन किया है, उनसे मेरा दूर का संबध है। फिर भी कभी कभार उनको एकाध सलाह दी तो उसे माना और जवाब भी दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते हैं जिस पर आम तौर पर मुख्यधारा का टीवी शांत रहता है।

यह सही है कि रवीश कुमार ने बरखा दत्त को चिट्ठी नहीं लिखी है। लेकिन मैं साथी रोहितजी से यह जानना चाहता हूं कि क्या उन्होने सुधीर चौधरी जी को चिट्ठी लिख कर कभी पूछा है कि आखिर उन्होने नवीन जिंदल के साथ ऐसी सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी औऱ यह भी कि क्या उमा बंसल नामकी शिक्षिका का जीवन बरबाद करते समय उनको पत्रकारिता की नैतिकता का खयाल नहीं रहा था।

मेरे हिसाब से उन्होंने जो सवाल उठाया है वह बेमानी है। रवीश या कोई भी पत्रकार पूरी दुनिया का ठेका लेकर नहीं चल सकता है। जो सवाल झकझोरता है उस पर अगर कोई पत्रकार खुल कर बोलता है तो वह उन पत्रकारों से ज्यादा ईमानदार है जो मन ही मन घुटते हैं। मेरे हिसाब से एक पत्रकार के तौर पर रवीश कुमार अगर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं तो यह एकदम बुरा नहीं है। वे किसान या मजदूर की बात करते हैं तो किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध नहीं करते।

कायदे से कोई किसी को संबोधित चिट्ठी लिखता है और अपनी भावनाओं का इजहार करता है तो उसमें किसी और को कूदना नही चाहिए। न ही किसी का प्रवक्ता बनना चाहिए। यह सामान्य शिष्टाचार है। एक पत्रकार होने के साथ चिट्ठी के महत्व को मैं बाकी साथियो से अधिक जानता हूं क्योकि बीते तीन दशकों से मेरे अध्ययन का यह प्रमुख विषय रहा है।

खुली चिट्ठियां लिखने का रिवाज पुराना है। रवीश कुमार की चिट्ठियां बेशक सवाल खड़े करती हैं। सवाल एमजे अकबर पर या अरुण शौरी जैसे एक दौर के दिग्गज पत्रकारों पर उठाना क्यों बुरा है और अखिलेश यादव पर उठाना क्यों अच्छा है। मेरे हिसाब से रवीश कुमार ने सही सवाल उठाया है और ऐसे सवालों को उठाना जारी रखना चाहिेए।

सवाल पूछना और सवाल उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। रोहित जी भी सवाल उठाने के लिए आजाद हैं। वे बरखा दत्त से सवाल कर सकते हैं, खुली चिट्ठी लिख सकते हैं। लेकिन किसी और पर सवाल उठाने से कैसे रोक सकते हैं। और यह एजेंडा कैसे तय कर सकते हैं कि रवीश को या किसी को कैसा सवाल पूछना चाहिए और किससे सवाल पूछना चाहिए। बस इतना ही।

राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर….

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वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे ने जी न्यूज और इसके एंकर रोहित सरदाना को लाइव ही धो डाला

जी न्यूज, इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज जैसे न्यूज चैनलों की भाजपा परस्ती और मोदी स्तुति किसी से छिपी नहीं है. इसी कारण इन तीनों न्यूज चैनलों का आम आदमी पार्टी के प्रति भयंकर घृणा भी जग जाहिर है. ये तीनों न्यूज चैनल समय-समय पर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए फर्जी स्टिंग से लेकर फर्जी न्यूज एंगल और फर्जी प्रोग्राम तक बनाने पेश करने से नहीं चूकते. इसी क्रम में जी न्यूज ने अभी बीते कुछ दिनों पहले केजरीवाल को निशाने पर लिया. चूंकि अब दिल्ली में विधानसभा चुनाव नजदीक है इसलिए सारे भाजपा पोषित न्यूज चैनल केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने में जुट गए हैं.

मजेदार यह रहा कि जी न्यूज पर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए जिस प्रोग्राम / डिबेट को आयोजित किया गया, उसमें वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे ने जी न्यूज और एंकर रोहित सरदाना को ऐसा धोया कि सब सकते में रह गए. अभय दुबे खरी खरी और जनता की बात कहने के लिए जाने जाते हैं. इस पूरे प्रकरण पर फेसबुक पर Sarvapriya Sangwan ने जो लिखा है, उसे पढ़िए और उसके बाद दिए गए वीडियो लिंक को क्लिक करके वीडियो चलने के पांच मिनट बाद के टाइम से शुरू करिए.

Sarvapriya Sangwan : अभय दुबे, एंकर रोहित सरदाना से : “हर आदमी एक बौद्धिक प्लेट सजाता है अपनी। आपने जो प्लेट सजा रखी है, जिस तरह से आप इंट्रो देते हैं अपना, वो प्लेट एकतरफा है। इसलिए आपके कार्यक्रम में आम आदमी पार्टी का प्रतिनिधि नहीं आता। अपनी आलोचना किसी को पसंद नहीं आती है। आपकी आलोचना मैं कर रहा हूँ। मैं चौथी पांचवी बार आपके इस कार्यक्रम में आया हूँ। आप जिस तरह से इस कार्यक्रम को बनाते हैं, उसमे आप लोगों की कोशिश ये होती है कि भई आते ही हम सबसे पहले भाजपा को इस देश की सर्वश्रेष्ठ पार्टी घोषित कर दें और दिल्ली की राजनीति को जीता हुआ घोषित कर दें। नंबर २, आम आदमी पार्टी देश की सबसे घटिया पार्टी है उसे ज़मीन खोद कर दफ़न कर देना चाहिए। आपको पूरा अधिकार है की आप भाजपा को सबसे अच्छी पार्टी मानें। आपको पूरा अधिकार है की आप मानें कि आम आदमी पार्टी एक ख़राब पार्टी है। लेकिन इन दोनों मान्यताओं को प्रोसेस करने के कुछ journalistic ethics हैं। आप कुछ तो लाज शर्म रखिये, कुछ तो ऐसा कीजिये कि लगे कि आप निष्पक्ष हैं। आम आदमी पार्टी की साख बाद में गिरेगी, पहले आप की गिरी जा रही है। आपने इनका पूरा परिचय नहीं दिया। आप भाजपा के सदस्य को आम आदमी पार्टी का संस्थापक बता रहे हैं। आप ये नहीं बता रहे कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली है अब।”

संबंधित वीडियो लिंक…

https://www.youtube.com/watch?v=0sGAslVGCgI

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