कारगिल जीतने वाले रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने तो कभी अपना अभिनंदन नहीं कराया

Arvind K Singh :  पिछले तीन दशक में कारगिल से बड़ी जंग तो कोई और हुई नहीं..उसमें बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई। मैने भी उसे कवर किया था। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि उस दौर के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने इस मुद्दे पर अपना अभिनंदन समारोह कराया हो….अगर गलत हूं तो बताइएगा। फिर रक्षामंत्री जी आपने ऐसा क्या कर दिया। न फैसला आपका, न उसे लागू कराने गए आप…जो काम जिसने किया है उसको देश की जनता दिल से शुक्रिया कर रही है। आप तो इसे राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं वह भी उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हो रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक के मसलेपर कड़ा फैसला लेने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री मोदी को ही मिलेगा किसी और को नहीं।

Om Thanvi : उत्तर प्रदेश के चुनाव माहौल में सर्जिकल कार्रवाई को भुनाने की भाजपा की कोशिश अप्रत्याशित नहीं है, पर अफ़सोसनाक ज़रूर है। भाजपा नेताओं द्वारा लखनऊ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर आदि शहरों में टाँगे गए बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर सर्जिकल कार्रवाई के विशुद्ध राजनीति इस्तेमाल के जीते-जागते प्रमाण हैं। इन पोस्टरों के हीरो सैनिक नहीं हैं, प्रधानमंत्री मोदी केंद्र में हैं जो राम के रूप में चित्रित हैं, नवाज़ शरीफ़ रावण हैं और केजरीवाल विभीषण।

आज लखनऊ और आगरा में रक्षामंत्री पर्रिकर के अभिनंदन में जो समारोह हुए, वहाँ भी हर होर्डिंग पर रक्षामंत्री के साथ गृहमंत्री राजनाथ सिंह (लखनऊ सांसद) और अन्य छोटे-बड़े भाजपा नेताओं के चेहरे और नाम सुशोभित थे। आगरा की गलियों तक में मोदी और पर्रिकर के ‘शौर्य प्रदर्शन’ के लिए “वंदन-अभिनंदन और शत्-शत् नमन” वाले पोस्टर सजे।  इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुज़फ़्फ़रनगर में “हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे” वाले होर्डिंग लगे हैं जिनमें मोदी के साथ अमित शाह को भी शामिल किया गया है। स्थानीय भाजपा नेता तो मौजूद हैं ही। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में यह सिलसिला दो रोज़ पहले शुरू हुआ है, मुंबई की एक भाजपा नेता ने तो सर्जिकल कार्रवाई की ख़बर के रोज़ ही पंजाब के मतदाताओं से समर्थन की अपील कर दी थी।

बेचारे राहुल गांधी अपनी भाषा में फँस गए, वरना उड़ी में बड़ी संख्या में हमारे सैनिक मारे गए, जवाब में सर्जिकल कार्रवाई हमने की और अब हफ़्ते भर के भीतर उसका चुनावी फ़ायदा उठाने की कार्रवाई भाजपा ने कर डाली। दलाली अच्छा शब्द नहीं, पर बेहतर भाषा में भी इसे आख़िर क्या कहा जाना चाहिए? फ़ौज़ी कार्रवाई की चुनावी ब्रांडिंग और मार्केटिंग! नहीं क्या?  हर राजनीतिक दल को भाजपा की इस मार्केटिंग को मुद्दा बना कर बेनक़ाब करना चाहिए। फ़ौज़ी कार्रवाई का राजनीतिक लाभ इंदिरा गांधी को मिला होगा और अटल बिहारी वाजपेयी को भी – लेकिन चुनाव में सैनिकों के शौर्य को अपना शौर्य बताकर वोट खींचने का काम पहली बार हो रहा है। सरेआम।

Sheetal P Singh : सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सेना के जिन वीरों ने अपने कंधे पर मोर्टार लादकर तीन किलोमीटर तक पाकिसतान की सीमा में पैदल मार्च किया, शत्रुओं के कैम्पों पर गोले दागकर उनका सफ़ाया किया, देसभगत पारटी ने देस के कोने कोने में उनके पोस्टर चपकाने का काम किया है। पहले चरण में यू पी उततराखंड पंजाब और गोवा में ये पोस्टर लगाये जा रहे हैं! आप भी आइये और वीरों के चित्र पर पुष्पगुच्छ चढ़ाइये।

Nadim S. Akhter : “खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा वाली कहावत भूल जाइए. अब बोलिए खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी. मतलब जान दे हमारे सैनिक और चुनावी फसल काटे मोदी जी. इसी की तो आशंका थी, यही तो हो रहा है. सैनिकों की जान के साथ भी राजनीति ! धिक्कार है ऐसी ओछी राजनीति पे. क्या मोदी जी के हनुमान इस पोस्टर पर ये नहीं लिख सकते थे कि —देश के लिए जान देने वाले सैनिकों को नमन —- गौर से देखिए. सैनिकों की जगह वे मोदी जी और पर्रिकर जी को शत-शत नमन कर रहे हैं. तभी तो कह रहा हूं-  खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी.”

पत्रकार द्अरविंद कुमार सिंह, ओम थानवी, शीतल पी. सिंह और नदीम एस अख्तर की एफबी वॉल से.

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किसान चैनल से नरेश सिरोही का अलग होना वाकई एक दुखद घटना है

Arvind K Singh : किसान चैनल के सलाहकार श्री नरेश सिरोही का उससे अलग होना वाकई एक दुखद घटना है। प्रधानमंत्री इसे जिस स्तर का बनाना चाहते थे और उसका जो नतीजा आना था वह नहीं आ पाया। लेकिन इसके पीछे जिस तरह की शक्तियां किसान चैनल को शक्तिहीन करने में लगी थीं, वह कोई छिपी बात नहीं रह गयी है। रही बात राजनीति करने की तो तमाम पैदल लोगों की जमात के बीच नरेश सिरोही को इससे बड़ा पद मिला हुआ था। किसान चैनल में आकर वे बंध से गए थे।

उनको मैं 1988 से जानता हूं और एक सजग किसान नेता के रूप में खेती बाड़ी से जुड़े तमाम सवालों पर लगातार मुखर रहे। लेकिन दूरदर्शन की नौकरशाही से जूझते हुए एक बेहतर चैनल खड़ा करने की उनकी कोशिश को जमीन पर उतारने के राह में तमाम रोड़े थे। चाहे वह स्टाफ का चयन हो या दूसरे मसले कई मोरचे लगातार खुले रहे। और प्रसार भारती के अध्यक्ष को भी एक दौर में ऐसा लगने लगा कि अगर सिरोहीजी के नेतृत्व में यह चैनल चल निकला तो फिर उनकी कद काठी मोदीजी की निगाह में और ऊंची हो जाएगी। इस बात का अंदाज चैनल के उद्घाटन के दौरान ही लग गया था।

जिला स्तर पर निगरानी और सलाह के लिए एक तंत्र खड़ा करना अच्छी बात थी। अगर जिलों में रेलवे स्टेशन से लेकर जिला दूरभाष समितियां हैं तो ऐसी समिति से किसी को आपत्ति का क्या औचित्य है। दूसरी सरकारी समितियों में तो सरकारी सदस्यों को कुछ लाभ भी मिलता है लेकिन इसमें सदस्यों को कुछ मिल भी नहीं रहा था। ऐसे आरोपों को लगाने का औचित्य समझ से परे है। सिरोहीजी के पास खेती बा़डी से जु़डे सवालों पर एक मजबूत दृष्टि रही है। उसे जमीन पर उतारने का तंत्र उनको मिल गया होता तो मुझे भरोसा था कि यह एक बेहतरीन और गांव गिरांव की आवाज बनता। लेकिन शायद इसकी नियति ही कुछ और है। फिर भी सिरोही जी ने अपने कार्यकाल में जितना बेहतरीन काम काज करने की कोशिश की और चैनल को जैसी दिशा दी है उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

राज्यसभा टीवी में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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अरविंद कुमार सिंह का रोहित सरदाना से सवाल- सुधीर चौधरी को चिट्ठी लिख कभी पूछा कि जिंदल से सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी?

Arvind K Singh : रवीश कुमार की चिट्ठी पर चिट्ठी…. रवीश कुमार की चिट्ठी पर एक पत्रकार साथी रोहित सरदाना ( जीन्यूज) ने कुछ सवाल खड़ा किया है। हालांकि ये दोनों पत्रकार साथी ऐसे नहीं है जिनके साथ मैने काम किया हो या कोई गहरा संबंध हो। लेकिन बात मुद्दे की उठी है तो बिना हस्तक्षेप किए रहा नहीं जा रहा है। रवीश कुमार का जहां तक मैने आकलन किया है, उनसे मेरा दूर का संबध है। फिर भी कभी कभार उनको एकाध सलाह दी तो उसे माना और जवाब भी दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते हैं जिस पर आम तौर पर मुख्यधारा का टीवी शांत रहता है।

यह सही है कि रवीश कुमार ने बरखा दत्त को चिट्ठी नहीं लिखी है। लेकिन मैं साथी रोहितजी से यह जानना चाहता हूं कि क्या उन्होने सुधीर चौधरी जी को चिट्ठी लिख कर कभी पूछा है कि आखिर उन्होने नवीन जिंदल के साथ ऐसी सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी औऱ यह भी कि क्या उमा बंसल नामकी शिक्षिका का जीवन बरबाद करते समय उनको पत्रकारिता की नैतिकता का खयाल नहीं रहा था।

मेरे हिसाब से उन्होंने जो सवाल उठाया है वह बेमानी है। रवीश या कोई भी पत्रकार पूरी दुनिया का ठेका लेकर नहीं चल सकता है। जो सवाल झकझोरता है उस पर अगर कोई पत्रकार खुल कर बोलता है तो वह उन पत्रकारों से ज्यादा ईमानदार है जो मन ही मन घुटते हैं। मेरे हिसाब से एक पत्रकार के तौर पर रवीश कुमार अगर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं तो यह एकदम बुरा नहीं है। वे किसान या मजदूर की बात करते हैं तो किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध नहीं करते।

कायदे से कोई किसी को संबोधित चिट्ठी लिखता है और अपनी भावनाओं का इजहार करता है तो उसमें किसी और को कूदना नही चाहिए। न ही किसी का प्रवक्ता बनना चाहिए। यह सामान्य शिष्टाचार है। एक पत्रकार होने के साथ चिट्ठी के महत्व को मैं बाकी साथियो से अधिक जानता हूं क्योकि बीते तीन दशकों से मेरे अध्ययन का यह प्रमुख विषय रहा है।

खुली चिट्ठियां लिखने का रिवाज पुराना है। रवीश कुमार की चिट्ठियां बेशक सवाल खड़े करती हैं। सवाल एमजे अकबर पर या अरुण शौरी जैसे एक दौर के दिग्गज पत्रकारों पर उठाना क्यों बुरा है और अखिलेश यादव पर उठाना क्यों अच्छा है। मेरे हिसाब से रवीश कुमार ने सही सवाल उठाया है और ऐसे सवालों को उठाना जारी रखना चाहिेए।

सवाल पूछना और सवाल उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। रोहित जी भी सवाल उठाने के लिए आजाद हैं। वे बरखा दत्त से सवाल कर सकते हैं, खुली चिट्ठी लिख सकते हैं। लेकिन किसी और पर सवाल उठाने से कैसे रोक सकते हैं। और यह एजेंडा कैसे तय कर सकते हैं कि रवीश को या किसी को कैसा सवाल पूछना चाहिए और किससे सवाल पूछना चाहिए। बस इतना ही।

राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में इतनी स्वायत्तता के बाद भी ऐसी कमजोर सरकार पहले कभी नहीं दिखी

Arvind K Singh : उत्तर प्रदेश के इतिहास में पंडित गोविंद बल्लभ पंत से लेकर मायावती तक तमाम मुख्यमंत्री रहे। लेकिन अखिलेश यादव को जैसा ऐतिहासिक मौका मिला था वैसा किसी और को नहीं। कुछ महीनों पांचतारा रथ यात्रा में प्रदेश देखा और थाली में उनको राज्य की सत्ता सौंप दी गयी। लेकिन इस सत्ता से वे जो सामाजिक आर्थिक बदलाव करके दुनिया के प्रशासकों में अपना नाम लिखा सकते थे वह नहीं कर पाए।

न किसानों का दर्द दूर कर पाए न कानून व्यवस्था दुरुस्त कर पाये। इतनी स्वायत्तता के बाद भी ऐसी कमजोर सरकार पहले कभी नहीं दिखी। जितनी नियुक्तियां की उनमें से अधिकतर अयोग्य और कुपात्र। बेहतर लोग नेपथ्य मे रहे। जैसे अब हाथ पांव मार कर वे कुछ फैसले पर रहे हैं, पहले ऐसा ही करते तो आज तस्वीर अलग होती। लेकिन अब पछताने से क्या फायदा। जो समय बीत गया है वह वापस लौट कर नहीं आएगा। और गद्दी से हटने के बाद यह प्रदेश उनको वैसे ही याद करेगा जैसे त्रिभुवन नारायण सिंह को करता है, एक शालीन व्यक्ति के रूप में।

राज्यसभा टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के एफबी वॉल से.

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प्रसार भारती के संघी अध्यक्ष सूर्य प्रकाश को राज्यसभा टीवी के पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने दिया करारा जवाब

Arvind K Singh : राज्य सभा की भूमिका पर सवाल… प्रसार भारती के अध्यक्ष श्री ए.सूर्य प्रकाश ने दैनिक जागरण में राज्य सभा की भूमिका पर सवाल खड़ा किया है। तथ्यात्मक लेख है। वे संसदीय मामलों के जानकार हैं लेकिन इस लेख में जान बूझ कर तमाम तथ्यों को छिपाया है। विपक्ष को भरोसे में न ले पाना यह सरकार की कमजोरी हो सकती है। लेकिन इस आधार पर किसी सदन को समाप्त करने का विचार अलोकतांत्रिक है। संभव है कि उन्होंने प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए ऐसा लिखा हो। लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कभी भी इसकी आलोचना नहीं की है।

यह सही है कि दूसरे सदन को बनने की प्रक्रिया में तमाम सवाल उठे थे। तो भी जब 13 मई 1952, को राज्य सभा की पहली बैठक में उस दौर के सभापति और देश के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने जो वक्तव्य दिया था उसे सूर्यप्रकाशजी को जरूर कोट करना चाहिए था। वह था- ”नई संसदीय व्यवस्था के तहत दूसरे सदन के साथ हम पहली बार शुरुआत कर रहे हैं और इस देश की जनता के सामने ये न्यायोचित ठहराने के लिए हमें अपनी पूरी शक्ति से कोशिश करनी चाहिए, कि दूसरा सदन कानूनों को जल्दबाजी में बनाए जाने से रोकने के लिए जरूरी है। जो प्रस्ताव हमारे सामने रखे जाएं, उन पर हमें निरपेक्ष और तटस्थ होकर चर्चा करनी चाहिए।”

अगर इस लिहाज से देखें तो राज्य सभा वही काम कर रही है जो उसे सौंपा गया था। कोई भी कानून जल्दबाजी में क्यों पास होना चाहिए। इस नाते भूमिका पर सवाल खड़ा करने वाले जरा अपने गिरेबां में भी झांके। यह टिप्पणी इस नाते नहीं लिख रहा हूं कि मैं राज्य सभा टीवी में काम करता हूं। बल्कि इस नाते कि एक पत्रकार हूं और जानता हूं कि संसद की पूर्णता दोनों सदनों से है और किसी एक के साथ छेड़छाड़ करने का विचार भी रखना वास्तव में संविधान की आत्मा से खिलवाड़ होगा।

राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Rajesh Khare बहुत शानदार। आप जैसे पत्रकारों ने ही पत्रकारिता को ज़िंदा रखा हुआ है वरना आजकल तो पत्रकारिता के नाम पर कुछ और ही हो रहा है।

Narender Singh Bisht The Rajya Sabha or the council of states is the upper house of the parliament of India, in Indian federal structure Rajya Sabha is a representative of the states in the union legislature, Hence Rajya Sabha is granted powers that protected the rights of states against the union. It is fine, but nowadays the soul of the Rajya Sabha to take care of the state’s interest is in the back seat, Rajya Sabha is now look alike an appeasement house, who gets the ticket ? those who are defeated in Lok Sabha election or big names have nothing to do with state’s interest . PAID SEAT ……. PHEW !!!!

Arvind K Singh प्रिय मित्र बिष्ट जी, आपने जिस बीमारी की बात की है वह राज्य सभा तक ही सीमित नहीं। बाकी सदनों में और भी खराब हालत है। राज्य सभा में तो ऐसे चंद नाम ही लिए जा सकते हैं। लेकिन कई दल तो टिकट ही पैसे लेकर देते हैं। उनकी सरकार भी बनती है।तो क्या लोकतंत्र को समाप्त कर राजशाही वापस लायी जाये। या फिर समस्या का निदान निकालने की तरफ ध्यान दिया जाये।

Narender Singh Bisht आदर सहित नमस्कार अरविंद जी , आप ने राज्यसभा की बात की है जो सीधा जनप्रतिनिधि नहीं है , कौन हैं ये लोग लोकसभा चुनाव में हारे हुए , बड़े नाम जो किसी काम के नहीं, और हद तो तब हो जाती है जब लोकसभा चुनाव में नकारे गए लोग मंत्री और प्रधानमत्री तक बन जाते हैं लगता है नियम सुवधानुसार लागू होते है ये लोकतंत्र का मज़ाक नहीं है क्या?  रही बात लोकसभा की ज़्यादा गंदगी है बिकुल सही है मगर जनता ने चुना है कुछ कह भी नहीं सकते ……….. सर आप ज़्यादा गुण व्यक्ति हैं मुझसे आधिक जानते है.

Arvind K Singh चुनाव सुधार राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच का विषय है। लेकिन इसके नाम से किसी संस्था को कैसे कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। कुछ लोगों की गलतियों के लिए पूरी संस्था तो जिम्मेदार नहीं हो सकती मित्र.

Satyendra Pratap Singh मेरे विचार भी अब तक नरेंद्र सिंह बिष्ट जी से मेल खाते थे लेकिन आपका पोस्ट और खासकर डॉ राधाकृष्णन का बयान पढ़कर मेरा विचार बदल गया।

Jai Pandey लोकसभा में फूलन देवी जी और शहाबुद्दीन जी के चुने जाने का यह अर्थ तो नहीं कि कल हममे से कोई लोकसभा भंग करने की मांग कर दे. कहा भी तो गया है, प्रजातंत्र मूर्खों का शासन है.

Obaid Nasir PM jo nahi kahna chahte apne bhakton se kahla dete hain Jab pahle leader of opposition aur ab leader house (RS) Arun Jaitly kahte hain ke unelected elected pe apni marzi thopna chahte hai to samajh lijiye inke nazdeek upper house ki kya auqaat hai. Actually by nature fascist virodh bardasht nahi kar sakte.Kal jab courts aur CAG Congress sarkar ka virodh out of way ja kar kar rahe the tab yehi dhoort baghlein baja rahe the.

Anil Sinha ekdam sahi! satta ke galiyaron se hokar aanewali patrakarita loktantra ko bhi daau par lagane ko taiyar ho jati hai!

Madhurendra Kumar सर……राज्यसभा के औचित्य पर सवाल निराधार है लेकिन उसकी कार्यप्रणाली सवालों में है और उसकी प्रमुख वजह है इस सदन के सदस्यों की संदिग्ध भूमिका, अनैतिक तरीके से उच्च सदन में उनकी एंट्री और फिर अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए संवैधानिक प्रक्रिया में रोड़ा बनना.

Arvind K Singh मधुरेंद्रजी..कार्यप्रणाली पर एकदम सवाल उठाना चाहिए। आपकी बात से सहमत हूं मैं.

Shalini Rai Rajput दरसल जो लोग चुनाव नही जीत पा रहे हैं उन्हे सत्ता में मंत्री पद देने के लिए राज्यसभा के माध्यम से बैकडोर एन्ट्री गलत है. लोकतंत् र का मजाक उडता है. मनमेहन सिंह जैसी प्रतिभा को लाना अलहदा बात है और टीवी अदाकारा को लाना अलग वो भी शिक्षामंत्री बनाने के लिए.

रवि शंकर पूर्णतः सहमत हूँ। मेरा तो मानना है कि संविधान सभा का भी पुनर्गठन किया जाना चाहिए।संविधान संशोधन का अधिकार संसद के पास नहीं होना चाहिए। जिस संविधान के तहत संसद का गठन होता है, उसी संसद को संविधान संशोधन का अधिकार देना ही तानाशाही व्यवस्था का स्वरूप है। इस लिहाज से तीन सभाएं होनी चाहिए।

Nirmal Pathak चिंता मत कीजिए । अभी जब सत्ता से बाहर होंगे तो यही लोग राज्यसभा का औचित्य समझायेंगे।

Atal Behari Sharma अरविन्द भाई सिद्धान्त तौर पर हमारे बुजुर्गो ने जो बात रखी वो उचित थी। और राज्य सभा का खात्मा लोकतन्त्र के हित में नही है। पर जो कुछ राज्यसभा में मोदी सरकार आने के बाद तमाशा हो रहा है उसको नजर अंदाज नही किया जा सकता सभापति के तौर पर उपराष्ट्रपति महोदय का वर्तन भी निष्पक्ष और तटस्थ नही है। इस स्थिति को लोकतंत्र को मजबूत करने वाला तो कतई नहीं कहा जा सकता। इसे जनता के सामनेे न्यायोचित नही ठहराया जा सकता। लोकसभा की निरंकुशता को रोकने और कानून बनाने में संतुलन बनाये रखने के लिए , कानूनों को जल्दबाजी में बनाए जाने से रोकने के लिए राज्यसभा जरूरी है। जो प्रस्तावो परं निरपेक्ष और तटस्थ होकर चर्चा करनी चाहिए। अगर इस लिहाज से देखें तो राज्य सभा यह काम नही कर रही है। इस कारण इसकी भूमिका पर सवाल खडे हो रहे हैं।

आलोक कुमार सही कहा आपने- कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, कोई यूं ही बेवफा नहीं होता।

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बस्सी साहब 21वीं सदी के स्वामिभक्त नौकरशाही के सबसे बेहतरीन नायक हैं!

Arvind K Singh : बस्सी साहब ने वाकई शानदार पारी खेली। अगर सभी प्रशासनिक अधिकारी उनकी तरह हो जायें तो नौकरशाही में धर्मवीर, भूरेलाल या के.एफ.रुस्तमजी जैसों का नाम निशान ही मिट जाएगा। बस्सी साहब ने ऐसी लंबी लकीर खींच दी है कि जिसे पार कर पाना शायद आगे के पुलिस आयुक्तों के लिए बहुत कठिन होगा।

वे 21वीं सदी के स्वामिभक्त नौकरशाही के सबसे बेहतरीन नायक हैं। काफी समय से उनके पूरे कार्यकाल के आकलन के बाद यह टिप्पणी की है। इंतजार है कि उनकी अगली पारी किस महान संस्था के साथ आरंभ होती है। काफी मेहनत की है, फल तो मिलेगा ही।

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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चैनलों के कुछ गेस्ट रंगे सियार जैसे हैं… धन्य हैं आप देव…

Arvind K Singh : चैनलों के कुछ गेस्ट बनाम रंगा सियार…. कुछ चैनलों के कुछ गेस्ट अजीब हैं। वे बड़े लोग हैं। चैनलों पर जाकर भाषण देते हैं। कुछ जगह पैसे मिलते हैं, कुछ जगह मुफ्त में। कुछ जगह सुना है वे खुद पैसे देते है। फिर तुर्रा ये कि उनका चेहरा बिकता है। वे कहीं जाते नहीं है। जमीन से उनको लेना देना नहीं है। वे जो कहते हैं उसका उलटा होने पर भी शरमाते नहीं।

उलटे दम ठोंक कर कहते हैं…देखिए हमने जो कहा था वही सही हुआ न….धन्य हैं आप देव..आप जमीन पर उतरेंगे नहीं…स्टूडियो और घरो के बीच अपने लैपटाप पर ही चिपके रहेंगे तो आपको जनता की मनोदशा कैसे समझ में आएगी। फिर भी वे विशेषज्ञ हैं, तमाम लिस्टों में नाम लिखवाना उनको आता है। लेकिन भाई रंगा सियार तो किसी न किसी दिन धुलेगा ही…

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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