‘कलिकथा वाया बाइपास’ उपन्यास में ‘किशोर बाबू’ वाला किरदार अशोक सेकसरिया का है!

रविवार को कोलकाता व आस-पास से सैकड़ों की संख्या में साहित्यकार, समाजवादी, शिक्षाविद व पत्रकार अशोक सेकसरिया को उनके घर में अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे. इनमें से ज्यादातर लोग पूर्वाह्न 10.30 बजे से केवड़ातला स्थित श्मशान घाट के लिए चली उनकी शवयात्र में भी शरीक हुए. दिवंगत अशोक सेकसरिया के पार्थिक शरीर को उनके भतीजे सौरभ व गौरव ने मिल कर मुखाग्नि दी. अनेक नम आंखें तब तक वहां मौजूद रहीं, जब तक कि विद्युत शवदाह-गृह से उनकी अस्थियां नहीं निकल आयीं.

अंत्येष्टि में पहुंचनेवालों में कोलकाता के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ कृष्णबिहारी मिश्र, प्रखर समाजवादी योगेंद्र पॉल सिंह, बालेश्वर राय, डॉ अमरनाथ, कवि नवल, प्रभाकर चतुर्वेदी, लक्ष्मण केड़िया, अगम शर्मा, विनोद सिंह, कपिल आर्य, आमोद व ब्रजकिशोर झा, आदित्य गिरि, रामविलास व आनंद लाल दास, संजय भारती, महेश चौधरी, ब्रजमोहन सिंह, सेराज खान बातिश, सुरेश शॉ, जितेंद्र सिंह, राज्यवर्धन और पत्रकार कृपाशंकर चौबे, निर्भय देव्यांश, गंगा प्रसाद, जय नारायण प्रसाद आदि शामिल रहे. इसके पहले सेकसरिया जी के आवास पर महिला साहित्यकारों व शिक्षाविदों ने भी पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित की. इनमें अल्का सरावगी, कुसुम खेमानी, शर्मिला बोहरा, जमुना केशवानी व रेखा शॉ आदि प्रमुख हैं. कोलकाता व नयी दिल्ली समेत देशभर में हिंदी और हिंदीतर जगत के साहित्यकारों, पत्रकारों व समाज-संस्कृतिकर्मियों से उनके निजी संबंध थे और वह सबकी फिक्र करते थे.

समाजवादी चिंतक तथा साहित्यकार अशोक सेकसरिया विशिष्ट गांधीवादी व समाजसेवी सीताराम सेकसरिया के ज्येष्ठ पुत्र थे. उनकी स्कूली शिक्षा माहेश्वरी विद्यालय में हुई. उन्होंने दैनिक हिंदुस्तान, जन, दिनमान, वार्ता आदि पत्रिकाओं के लिए काम किया. उनकी लेखनी में आधुनिक समाज का विश्लेषण दिखाई देता है. उन्होंने कई लघु कथाएं भी लिखी हैं. उनका कथा संग्रह ‘लेखकी’ है. श्री सेकसरिया जन, चौरंगी लेन और सामयिक वार्ता के संपादक मंडल में रहे. उनके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विषय पर लेख दिनमान में छपते रहे. अशोक सेकसरिया आजीवन अविवाहित रहे और वह बेहद सादगी से रहते थे. वह 82 वर्ष के थे.

जब भी देशभर में लोहिया के समाजवाद की विचारधारा और गांधीवाद पर चर्चा होगी, तो कोलकाता से एक ऐसे मौन समाजवादी साधक की बात जरूर उठेगी, जो जीवनभर अविवाहित रह कर एक असाधारण विरासत का वाहक बना और अपने ही अंदाज में जीता रहा. पर असल में वह समाजवादी नहीं, बल्कि नितांत गांधीवादी थे.  बात हो रही है शनिवार रात दिवंगत हुए अशोक सेकसरिया की. समाजवादी योगेंद्र पाल सिंह व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र समेत अनेक साहित्यकारों और समाजसेवियों ने सेकसरिया के अचानक अवसान से दुखी हैं. समर्थ होते हुए भी रोजमर्रा की जरूरत के अत्यंत सीमित साधनों के साथ जीवन जीनेवाले अशोक सेकसरिया हमारे बीच नहीं रहे. सही मायने में समाजवादी धारा के ऐसे विरले चिंतक, लेखक व कार्यकर्ता का यूं हम सबसे बिछड़ना ऐसी विकराल शून्यता छोड़ गया है, जिसे आनेवाले समय में भर पाना बेहद कठिन होगा.

अपने निजी अनुभवों के आधार पर डॉ योगेंद्र पॉल सिंह कहते हैं कि दरअसल अशोक सेकसरिया पर 60 के दशक में समाजवादी पार्टी पत्रिका जन के तत्कालीन संपादक ओम प्रकाश दीपक, विजय देव नारायण शाही जैसों का काफी असर था. लोहिया से अशोक सेकसरिया प्रभावित जरूर थे, पर उन्हें अपना आदर्श नहीं मानते थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि कोलकाता से निकलने वाले रविवार के लिए अशोक सेकसरिया छद्म नाम से भी लिखा करते थे.  समझा जाता है कि कोलकाता की विख्यात उपन्यासकार अलका सरावगी ने अपने ‘कलिकथा वाया बाइपास’ शीर्षक उपन्यास में जिस केंद्रीय किरदार ‘किशोरबाबू’ को रखा है, वह और कोई नहीं, बल्कि अशोक सेकसरिया जी ही हैं. हालांकि इसे लेकर विद्वानों में मतभेद हो सकता है.

दिवंगत सेकसरिया पश्चिम बंगाल में जबरन भूमि-अधिग्रहण का विरोध करनेवाले चुनिंदा हिंदी लेखकों में भी शुमार रहे हैं. किशन पटनायक व सुनील के बाद अशोक सेकसरिया के देहावसान को समाजवाद की वैकल्पिक राजनीति के लिए बहुत बड़ा नुकसान माना जा रहा है. वर्ष 1982 में एशियाई खेलों पर अशोक सेकसरिया का लेख और 1984 में उनके लिखे ‘हिंदू होने की पीड़ा’ शीर्षक अग्रलेख को पढ़ कर इस देश का किशोर-युवा वर्ग उद्वेलित हो गया था. मूल रूप से राजस्थान के मारवाड़ के मारवाड़ से संबद्ध सेकसरिया जी दैनिक हिंदुस्तान, समाजवादी पार्टी पत्रिका जन, साप्ताहिक समाचार पत्र दिनमान व मासिक पत्रिका वार्ता आदि से जुड़े रहे. एक जमाने में अपनी उम्दा लघुकथाओं के लिए वह चर्चित रहे. आगे चल कर प्रयाग शुक्ल के प्रयास से उनका एक लघुकथा संग्रह ‘लेखकी’ बीकानेर के वाग्देवी पब्लिकेशन से प्रकाशित हुआ था. इनका कुछ दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है.

वयोवृद्ध साहित्यकार, समाजवादी चिंतक व पत्रकार अशोक सेकसरिया तीन दिनों पहले कोलकाता के अपने 16 लॉर्ड सिन्हा रोड स्थित आवास पर फिसल कर गिर गये थे, जिससे उनकी कमर की हड्डी टूटी और रीढ़ की डिस्क खिसक गयी थी. फिर उन्हें मध्य कोलकाता के तालतला इलाके के एक नर्सिग होम में भरती कराया गया, जहां पर उनका ऑपरेशन हुआ. वह स्वस्थ भी होने लगे थे कि सहसा शनिवार रात करीब 10.45 बजे खबर आयी कि दिल का दौरा पड़ने से उनके प्राण-पखेरू उड़ गये.



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