पत्रकारिता के रंगरूटों, भक्त पत्रकारों… पहले बरखा पर आरोप तो जान लो!

Sanjaya Kumar Singh : बरखा दत्त के पक्ष में… पत्रकारिता के रंगरूटों, भक्त पत्रकारों – बरखा पर आरोप जान लो… संस्कारी सरकार के भक्तों के संस्कार इतनी बदबू फैला रहे हैं कि नए बने शौंचालयों का कोई फायदा ही नहीं हुआ। कहीं चिट्ठी बह रही है तो कहीं आरोप। स्वच्छता अभियान का जो हो, बदबू तो बढ़ रही है। इसके लिए रोहित सरदाना जैसे लोगों को बताना होगा कि सवाल खुले में ना करें – बदबू बहुत ज्यादा हो गई है। वैसे तो रोहित की हैसियत नहीं है कि बरखा दत्त के बारे में रवीश से पूछते पर भक्तों की मंडली सोशल मीडिया पर रोहित को कंधे पर बैठाकर जिस ढंग से नाच रही है उसमें भक्तों को बताना जरूरी है कि मुद्दा है क्या और बरखा पर शोर मचाने वाले, उसपर आरोप लगाने वालों को सच बता दिया जाए।

कल मैंने स्मृति ईरानी को लिखी उनकी चिट्ठी की भाषा, शैली, संयम, शब्दों के चयन और रुख की तारीफ की तो एक मित्र ने पूछा, “क्या इससे बरखा के पाप धुल जायेंगे या उनकी पत्रकारिता की खोई साख अब वापस आएगी!” मैंने पूछा, “आप बरखा के किस ‘पाप’ की बात कर रहे हैं? उसपर कोई एफआईआईर है? जेल गई? जिनलोगों पर एफआईआर है, जेल हो आए, तड़ी पार हैं पहले उनकी बात कीजिए। बरखा पर ही करनी है तो पहले एक एफआईआर करवाइए। फिर बात कीजिए। अच्छा लगेगा।”

उन्होंने लिखा, “जब किसी की साख ही न बची हो तो उसकी बातों की मार्केट वैल्यू कुछ नहीं होती जनता के बीच (खास जमात के समर्थकों और पिछलग्गुओं के अलावा)। नीरा राडिया से लेकर गुजरात और कारगिल की रिपोर्टिंग के सबूत ही काफी हैं और टेलीविजन की दुनिया की गन्दगी और बातों को मैं भी बेहतर जनता हूं। अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं तो वाद बेकार है, साथ ही आपसे विवाद करने का भी मेरा कोई मंतव्य नहीं क्योंकि मैं आपका सम्मान करता हूं, भले ही कहीं पर मतभिन्नता होती हो।”

इन्होंने मुझे असमंजस में डाल दिया। मेरे सवाल का जवाब तो नहीं दिया आरोप यह कि, “अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं।” इसी पोस्ट पर एक अन्य मित्र ने लिखा, “बरखा का कैरेक्टर पता है तुम्हे? दलाली तथाकथित पत्रकारों का असली पेशा हो गया है आजकल”। जुमलों की सरकार और भक्ति के जमाने में जब प्रधानमंत्री मन की बात कर रहे हैं तो कोई भी अपने मन की बात को “खबर” बना दे रहा है। मैंने बरखा के चरित्र पर सवाल उठाने वाले से कहा, “मेरी उम्र 52 साल है और ये फेसबुक पर लिखा है। आप मुझे तुम कह रहे हैं तो सीनियर और अनुभवी होंगे। किसी महिला का कैरेक्टर कैसे मालूम करते हैं और उसपर आरोप लगाने के लिए कोई सबूत चाहिए होता है या यूंही मोदी जी की तरह कह दिया तो मान लूं?

बरखा पर लगे आरोपों का पता लगाने के लिए गूगल सर्च करने पर एक ब्लॉग http://sins-of-barkha.blogspot.in मिला। मुझे लगा सारे मामले एक ही जगह मिल जाएंगे काम आसान हो जाएगा पर यहां एक नया आरोप मालूम हुआ कि बरखा को पिछले वित्त मंत्री ने 300 करोड़ रुपए का कर्ज दे रखा है। एक प्रतिशत के मामूली ब्याज पर। यह एक अप्रैल 2011 की पोस्ट है। इसमें लिखा है आरटीआई कार्यकर्ताओं को इस मामले पर आरटीआई लगाना चाहिए पर आरटीआई और दिल्ली विश्वविद्यालय में तो अब कोई अंतर रह नहीं गया है तो आगे कुछ नहीं है। ना इस ब्लॉग पर कोई दूसरा आरोप। हां, ब्लॉग लेखक ने यह जरूर कहा है कि बरखा को जानने के लिए राडियागेट या बरखागेट गूगल कर लिया जाए। मैंने ऐसा ही किया। अब मुझे http://barkhagate.blogspot.in मिला। इस पर जो लिखा मिला सो इस प्रकार है…

So what the heck is ‪#‎Barkhagate‬?

Its a scam involving journalist @bdutt and a lobbyist for leading Telcos and Industrialists by name Radia, in connection to the support to UPA government in 2009 between Congress and DMK. The transcript of the whole conversation was put up on the website of the Open The Magazine….

…”As talks between the DMK and Congress (‘them’) broke down over joining the Government in May 2009, Radia was actively involved in opening channels between the two parties through, among others, television journalist Barkha Dutt”

ध्यान दीजिए इसमें बरखा दत्त अकेले नहीं हैं। लेकिन नाम उनका ही लिया जाता है। इसके अलावा, यहां चार वॉयस ट्रांसक्रिप्ट पोस्ट किया होना दिखाई दे रहा है। पर ये चारो नहीं चले। देखें पहली तस्वीर। यह मामला 2010 से सार्वजनिक जानकारी में है। कोई एफआईआर या कार्रवाई की सूचना ना मुझे है ना इस ब्लॉग पर इसलिए यह माना जा सकता है कि सरकार को इस मामले में कोई मतलब नहीं है या सरकार की राय में यह अपराध नहीं है। राडियागेट मैं नहीं देख रहा क्योंकि अभी मुद्दा राडिया नहीं बरखा हैं। अगर किसी को राडिया से बरखा के और कनेक्शन की जानकारी हो तो लिख सकता है। मुझे नहीं पता है। मैंने नहीं सुना और मैं ऐसा कुछ नेट पर ढूंढ़ नहीं पाया।

बरखा पर तीसरा गंभीर आरोप कारगिल युद्ध के दौरान उनकी लाइव रिपोर्टिंग से कार्रवाई की जगह मालूम हो जाना और पाकिस्तानी हमले में भारतीय सैनिकों के घायल होने का आरोप है। मुझे लगता है कि यह मामला पूरी तरह सच और जैसा बताया जा रहा है वैसा ही हो तो भी यह गलती सिर्फ बरखा की नहीं है। पूरी एनडीटीवी टीम और लाइव प्रसारण से जुड़े नियमों, देख-रख और निगरानी करने वालों के साथ-साथ इस संबंध में नियम बनाने वालों की चूक का मामला है। बरखा तो युदस्थल से रिपोर्ट कर रही थीं और बहादुरी का काम कर रही थीं उसे लाइव दिखना और देखने वालों द्वारा इसका का दुरुपयोग किया जाना बहुत ही विस्तृत मामला है और बरखा की दिलेरी की जगह उसे इसके लिए दोषी ठहराना अनुचित है। यह मामला मई – जून 1999 का है।

इसके बाद मुंबई पर आतंकवादी हमला अप्रैल 2012 में हुआ था। तब भी टीवी के सीधे प्रसारण से समस्या हुई थी। और तब यह गलती बरखा ने नहीं, देश के कई नामी-गिरामी टीवी चैनलों और पत्रकारों ने की थी। एक बार गलती और उसका खामियाजा जानने के बाद ना किसी ने सावधानी बरती ना किसी को इसकी जरूरत लगी ना ऐसा कोई नियम बनाया गया, पूरे तीन साल तक और देश की मीडिया या कहिए देश ने वही गलती दोहराई जो बरखा औऱ एनडीटीवी ने की थी। इससे सीख लेने की जरूरत नहीं है? क्या इस संबंध में नियम अब स्पष्ट घोषित हैं? दिशा निर्देश स्पष्ट हैं? कभी किसी ने पूछा? सोचा? लेकिन बरखा दत्त दोषी है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.



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