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साहित्य

एक सफल आंदोलन पर केन्द्रित जरूरी किताब ‘और कोकाकोला हार गया’

उत्तराखंड के युवा पत्रकार प्रवीन कुमार भट्ट की किताब ‘और कोका कोला हार गया’ एक नई उम्मीद जगाती है। इस किताब में कोका कोला संयंत्र के खिलाफ देहरादून के छरबा गांव के लोगों द्वारा एक साल तक किए गए आंदोलन को सिलसिलेवार दर्ज किया गया है। ‘और कोका कोला हार गया’ ग्रामीणों की एकजुटता के आगे एक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी के घुटने टेक देने की कहानी भर नहीं है बल्कि अपने जंगल, जमीन और पानी की रक्षा के लिए ग्रामीणों के संघर्ष का दस्तावेज भी है। एक सफल आंदोलन पर सिलसिलेवार लिखी गई यह पुस्तक देश भर में जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलनों से जुड़े आंदोलनकारियों के लिए भी प्रेरणादायक है। ‘और कोका कोला हार गया’ पुस्तक यह बताती है कि किस प्रकार सरकार द्वारा खुली छूट देने के बावजूद विदेशी कंपनी कोका कोला छरबा गांव में अपना संयंत्र स्थापित नहीं कर पाई।

उत्तराखंड के युवा पत्रकार प्रवीन कुमार भट्ट की किताब ‘और कोका कोला हार गया’ एक नई उम्मीद जगाती है। इस किताब में कोका कोला संयंत्र के खिलाफ देहरादून के छरबा गांव के लोगों द्वारा एक साल तक किए गए आंदोलन को सिलसिलेवार दर्ज किया गया है। ‘और कोका कोला हार गया’ ग्रामीणों की एकजुटता के आगे एक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी के घुटने टेक देने की कहानी भर नहीं है बल्कि अपने जंगल, जमीन और पानी की रक्षा के लिए ग्रामीणों के संघर्ष का दस्तावेज भी है। एक सफल आंदोलन पर सिलसिलेवार लिखी गई यह पुस्तक देश भर में जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलनों से जुड़े आंदोलनकारियों के लिए भी प्रेरणादायक है। ‘और कोका कोला हार गया’ पुस्तक यह बताती है कि किस प्रकार सरकार द्वारा खुली छूट देने के बावजूद विदेशी कंपनी कोका कोला छरबा गांव में अपना संयंत्र स्थापित नहीं कर पाई।

दरअसल उत्तराखंड सरकार ने 17 अप्रैल 2013 को कोका कोला बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक एमओयू साइन किया। एमओयू के मुताबिक सरकार ने छरबा ग्राम समाज की 368 बीघा भूमि 19 लाख रू/ प्रति बीघा के हिसाब से कोका कोला कंपनी को संयंत्र स्थापित करने के लिए देने का निर्णय किया। ग्रामीणों को सरकार के इस निर्णय की जानकारी 18 अप्रैल 2013 को समाचार पत्रों के माध्यम से मिली। सरकार ने ग्राम समाज की भूमि का सौदा विदेशी कंपनी के साथ करने से पहले ग्रामीणों को जानकारी तक देना जरूरी नहीं समझा। हालांकि कोका कोला ने छरबा में 600 करोड़ के निवेश और लगभग 1000 युवकों को रोजगार देने का दावा किया लेकिन ग्रामीणों ने कोका कोला संयंत्र के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया।

सरकार ने छरबा में शीतला नदी के किनारे जिस जमीन का सौदा कोका कोला कंपनी के साथ किया था उस जमीन पर वन विभाग के मुताबिक 25 वर्ष पुराना जंगल खड़ा है और उस जंगल में 70000 से अधिक पेड़ हैं। कोका कोला संयंत्र लगाने पर न सिर्फ इन पेड़ों की बलि दी जाती बल्कि प्रतिदिन दो लाख लीटर पानी भी यमुना नदी और छरबा गांव की जमीन से खींच लिया जाता। कोका कोला कंपनी भयंकर रूप से प्रदूषण फैलाने के लिए भी कुख्यात है जैसा कि अन्य स्थानों पर स्थापित कोका कोला संयंत्रों से स्पष्ट हुआ है। इन सब बातों ने छरबा के ग्रामीणों को एकजुट करने का काम किया और उन्होंने कोका कोला के खिलाफ तब तक आंदोलन जारी रखा जब तक कि सरकार ने यह ऐलान नहीं कर दिया कि अब छरबा गांव में कोका कोला संयंत्र नहीं लगाया जाएगा।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सिर्फ 32 किमी की दूरी पर विकासनगर के निकट स्थित छरबा गांव दो बार केन्द्र व दो बार राज्य सरकार द्वारा आदर्श ग्राम पंचायत, मद्यपान की रोकथाम, पर्यावरण संरक्षण व पंचायत सशक्तिकरण के लिए पुरस्कृत किया गया है। अब एक साल तक चली लड़ाई के बाद छरबावासियों ने कोका कोला संयंत्र के खिलाफ जिस प्रकार जीत हासिल की है, इससे यह गांव नए संदर्भ में चर्चाओं में आ गया है। आम तौर पर बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों की चालबाजियों और प्रलोभनों के सामने ग्रामीणों के आंदोलन घुटने टेक देते हैं लेकिन छरबा के ग्रामीणों ने जिस प्रकार कोका कोला को मात दी है। वह नए आंदोलनों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।

‘और कोका कोला हार गया’ पुस्तक में छरबा आंदोलन के प्रत्येक पहलू पर बारीकि से नजर डाली गई है। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे, पर्यावरणविद् सुरेश भाई, वदंना शिवा, गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़ी राधा बहन सरीखी सख्सियतों के आंदोलन से जुड़ने से लेकर आंदोलन के पक्ष में देहरादून से लेकर दिल्ली तक हुए विरोध प्रदर्शनों का ब्यौरा भी इस किताब में मौजूद है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक की खूबसूरत बात यह है कि इस पुस्तक में न सिर्फ छरबा आंदोलन को संपूर्ण विवरण मौजूद है बल्कि सरकार के साथ कोका कोला के एमओयू की प्रति, छरबा ग्राम समाज की जमीन वापस लौटाने की मांग को लेकर की गई पीआईएल की प्रति तथा छरबा वासियों के पक्ष में आया कोर्ट के निर्णय की प्रति के साथ ही आंदोलन के ब्यौरेवार चित्र भी इस किताब में दिए गए हैं। इतना ही नहीं आंदोलन के दौरान सौपा गया लगभग हर ज्ञापन और लगाया गया हर बैनर व पोस्टर भी किताब के भीतर चित्र के रूप में मौजूद है।

‘और कोका कोला हार गया’ को एक सफल आंदोलन पर लिखी गई एक संपूर्ण पुस्तक इस कारण भी कहा जा सकता है कि इसमें आंदोलन से जुड़े सभी दस्तावेजों ज्ञापनों, चित्रों, एमओयू, न्यायालय में दायर याचिका व निर्णय का संकलन करने के साथ ही आंदोलन के समर्थन में आए छह राजनीतिक दलों, 39 संगठनों, 450 व्यक्तियों, 33 पत्रकारों और 41 स्थानों के नामों का भी जिक्र किया गया है जहां से आंदोलनकारी इस आंदोलन को समर्थन देने पहुंचे। समकालीन आंदोलनों पर शोध पर कर शोधार्थियों, समाजकर्मियों और आंदोलनकारियों के लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण साबित होगी। यह एक ताकतवर मल्टीनेशनल कंपनी के खिलाफ लड़ी गई ग्रामीणों की सफल लड़ाई की कहानी है। जिसे जागरूक पाठकों को जरूर पड़ना चाहिए। जैसा कि इस पुस्तक के अंतिम कवर पृष्ठ पर दर्ज है-‘छरबा में कोका कोला की हार और स्थानीय जनता की जीत कई अन्य समुदायों के लिए एक प्रेरणा है जो दुनिया के अलग अलग भागों में प्राकृतिक संसाधनों पर अपने हक हकूक बनाए रखने के लिए लड़ रहे हैं’। ‘और कोला हार गया’ पुस्तक की भूमिका प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन ने लिखी है।

‘और कोका कोला हार गया’ पुस्तक का विमोचन देहरादून में 26 सितम्बर 2014 को किया गया। विमोचन कार्यक्रम में पर्यावरणविद् सुरेश भाई, छरबा के निवर्तमान ग्राम प्रधान रोमी राम जसवाल व छरबा के लगभग 20 ग्रामीण, प्रो. वीरेन्द्र पैन्युली, उत्तराखंड महिला मंच की संयोजक कमला पंत, महिला समाख्या की राज्य समन्वयक गीता गैरोला, दून लाईब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के रिसर्च एसोसिएट चंद्र शेखर तिवारी, कमल जोशी, जनकवि अतुल शर्मा, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष अशोक वर्मा, समय साक्ष्य प्रकाशन की संचालक रानू विष्ट, सामाजिक कार्यकर्ता इंद्र सिंह नेगी, प्रेम पंचोली व दुर्गा प्रसाद कंसवाल सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे। यह पुस्तक छरबा गांव के लोगों के संघर्ष को समर्पित की गई। 

किताब लेखक प्रवीन कुमार भट्ट से उनके मोबाइल नंबर 07579243444 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

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