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उत्तर प्रदेश

सीकरौरा नरसंहार : सुनवाई के दौरान गुम हुई फाइल मिली, बढ़ेंगी डान बृजेश सिंह की मुश्किलें

सीकरौरा नरसंहार एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार चर्चा का मुख्य बिन्दु समाजसेवी राकेश न्यायिक हैं। न्यायिक ने तमाम न्यायालयों के अभिलेखों कें आधार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सीकरौरा नरसंहार की फाइल जानबूझ कर जिला शासकीय अधिवक्ता अनिल सिंह व सहायक जिला शासकीय अधिवक्ताओं, अन्य पुलिस, न्यायिक कर्मचारियों की मिलीभगत से गुम कर दी गई। पिछले 8 सालों से गिरफ्तार व देश के विभिन्न जेलो में बन्द होते हुए वर्तमान में वाराणसी के केन्द्रीय कारागार शिवपुर में निरुद्ध माफिया डान बृजेश सिंह को आज तक उपरोक्त मुकदमे में तलब कर रिमांड तक नहीं बनवाया गया है बल्कि अभियुक्तों को बचाने के लिए सत्र न्यायालय की पत्रावली तक को गायब करा दिया गया है। 

सीकरौरा नरसंहार एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार चर्चा का मुख्य बिन्दु समाजसेवी राकेश न्यायिक हैं। न्यायिक ने तमाम न्यायालयों के अभिलेखों कें आधार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सीकरौरा नरसंहार की फाइल जानबूझ कर जिला शासकीय अधिवक्ता अनिल सिंह व सहायक जिला शासकीय अधिवक्ताओं, अन्य पुलिस, न्यायिक कर्मचारियों की मिलीभगत से गुम कर दी गई। पिछले 8 सालों से गिरफ्तार व देश के विभिन्न जेलो में बन्द होते हुए वर्तमान में वाराणसी के केन्द्रीय कारागार शिवपुर में निरुद्ध माफिया डान बृजेश सिंह को आज तक उपरोक्त मुकदमे में तलब कर रिमांड तक नहीं बनवाया गया है बल्कि अभियुक्तों को बचाने के लिए सत्र न्यायालय की पत्रावली तक को गायब करा दिया गया है। 

26 अप्रैल 2002 को माननीय चतुर्थ द्रुतगामी न्यायालय वाराणसी ने फरार घोषित करते हुए आदेश किया है कि ‘26.04.02- पुकार कराई गई। अभियुक्त बृजेश सिंह अनुपस्थित, अभियोजन की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता उपस्थित नहीं हैं। यह पत्रावली सत्रवाद संख्या 55/87 से दिनांक 16.1.90 के आदेशानुसार पृथक की गई है। आदेश पत्र के अवलोकन से विदित होता है कि दिनांक 16.1.90 के बाद से अब तक अभियुक्त बृजेश सिंह की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। इस वाद में घटना वर्ष 1986 की है तथा सत्रवाद 1987 से लम्बित है। तीन वर्ष तक सत्र परीक्षण के लम्बित रहने के पश्चात अभियुक्त बृजेश सिंह को 12 वर्ष में भी न्यायालय में उपस्थित नहीं किया जा सका है। 

‘इन परिस्थितियों में अभियुक्त बृजेश सिंह के फरार होने पर कोई संदेह नहीं है। अतएव अभियुक्त को फरार घोषित किया जाता है। अभियोजन की ओर से पैरवी करने के लिए कोई सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता उपस्थित नहीं है। सत्रवाद संख्या 55/87 से पत्रावली पृथक की गई है, जिसमें सभी साक्षियों का साक्ष्य अंकित किया जा चुका है। उक्त वाद तर्क के स्तर पर है। अभियोजन की ओर से द0प्र0सं0 की धारा 299 के अन्तर्गत किसी कार्यवाही हेतु निवेदन नहीं किया गया है और न ही कोई उपस्थित है। इन परिस्थितियों में द0प्र0सं0 की धारा 299 की कार्यवाही समाप्त की जाती है। यह पत्रावली अभिलेखागार में इस निर्देश के साथ प्रेषित की जाती है कि जब भी अभियुक्त बृजेश सिंह गिरफ्तार किया जाएगा या न्यायालय के समक्ष उपस्थित होगा, उसका विधि के अनुकूल विचारण इस सत्रवाद में किया जाएगा। पत्रावली अभिलेखागार प्रेषित की जाए। हस्ताक्षर अस्पष्ट, चतुर्थ द्रुततगामी न्यायालय, वाराणसी, दिनांक 26.04.2002.’

न्यायालय के उपरोक्त आदेश पर पत्रावली को अभिलेखागार में रख दिया गया है। उपरोक्त आदेश से यह भी स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष बृजेश सिंह को सजा दिलाने के लिए तत्पर नहीं था। यही नहीं, बल्कि बचाने के लिए न्यायालय में अभियोजन उपस्थित ही नहीं हुआ। इन्ही तमाम न्यायालय के आदेश दिखाते हुए समाज सेवी राकेश न्यायिक ने अभियोजन व पुलिस पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कार्यवाही की मांग की है।

 गौरतलब है कि तत्कालीन जिला वाराणसी व वर्तमान में जिला चन्दौली थाना बलुआ के सिकरौरा गांव में 09 अप्रैल 1986 की रात  11.30 बजे आपसी रंजिश में ग्राम प्रधान रामचन्द्र यादव सहित सात लोगों की निर्मम हत्या कर दी गयी थी। हत्यारोपी पूरे परिवार को खत्म कर समाज में किस तरह की दहशत पैदा करना चाहते थे, उसका अन्दाजा प्रथम सूचना रिपोर्ट के पढ़ने से लगाया जा सकता है। जब मृतक रामचन्द्र यादव की पत्नी ने हत्यारोपियों से गिड़गिड़ाते हुए कहा कि मेरा पूरा परिवार खत्म हो गया, मैं जी कर क्या करूंगी, मुझे भी गोली मार दो। इस पर हत्यारोपियों ने कहा था कि तुम्हारी उजड़ी हुई मांग का सिन्दूर मेरे आतंक के रूप में प्रदर्शित होगा। 

हत्यारे काफी कू्ररता से परिवार के सभी सदस्यों को खत्म करना चाहते थे क्योंकि उन्होंने उन मासूमों को मारने में भी जरा सी हिचक नहीं दिखाई थी, जो अभी अपने पैरों पर खड़ा तक नहीं हो सकते थे। हत्या में पंचम सिंह, वकील सिंह, देवेन्द्र प्रताप सिंह, राकेश सिंह, बृजेश कुमार सिंह उर्फ बीरू, विनोद कुमार पाण्डेय, रामदास उर्फ दीनानाथ सिंह नामजद अभियुक्त दर्ज किए गए थे। घटना में माफिया डान बृजेश सिंह घायल होने के कारण मौके से ही गिरफ्तार हुआ था। पुलिस ने विवेचना के बाद सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल कर दिया था, जिसको संज्ञान में लेते हुए माननीय न्यायालय ने सत्र परीक्षण संख्या 55/87 धारा 147, 148, 149, 307, 302, थाना बलुआ (तत्कालीन वाराणसी, वर्तमान में जिला चन्दौली) दर्ज हुआ था। ट्रायल के दौरान ही 16 जनवरी 1990 के बाद से बृजेश न्यायालय में हाजिर नहीं हुआ, जिससे जमानतदार राजेन्द्र सिंह व घनश्याम सिंह को नोटिस जारी करते हुए जमानत राशि भी जब्ती की कार्यवाही न्यायाल ने करा दी थी। इस दौरान बृजेश सिंह देश भर में एक के बाद एक दुस्साहसिक घटनाओं को अंजाम देता रहा। कई सफेदपोश उसके संरक्षणदाता बन गए। 

अट्ठाईस वर्षों तक पुलिस से आंख मिचौली खेलते हुए बृजेश सिंह को सन् 2008 में दिल्ली पुलिस ने उड़ीसा से गिरफ्तार किया था। ज्यादातर मामलों में बृजेश सिंह को न्यायालय में रिमांड मिल चुका है लेकिन समाज को कलंकित करने वाले सिकरौरा नरसंहार की घटना में आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी रिमांड न बनना अभियोजन और पुलिस की संदिग्ध भूमिका को दर्शाता है।

लेखक राकेश न्यायिक से संपर्क : 7565980603

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