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सुख-दुख

दुनिया भर के मुसलमान इन कंपनियों का कर रहे हैं बहिष्कार!

यूसुफ़ किरमानी-

देखो दोस्तों, किसी भी चीज़, व्यक्ति, पार्टी के बहिष्कार का असर तो पड़ता है। बशर्ते इसमें एकजुटता हो। गाजा के मुद्दे पर दुनियाभर में स्टारबक्स का बहिष्कार हो रहा है। आज जो आंकड़ा आया है, उसके मुताबिक 12 बिलियन डॉलर या 10 अरब भारतीय रुपये से ज्यादा का नुकसान सिर्फ इसलिए हुआ है कि लोग स्टारबक्स की कॉफी पीने नहीं जा रहे हैं।

अब दिल्ली के कनॉट प्लेस में ही स्टारबक्स की दुकान है। लेकिन पांच बार मुफ्त पीने का अवसर मिलने के बाद मैंने मना कर दिया। मजबूर होकर हमें मुफ्त में कॉफी पिलाने वाले सीसीडी में चले गए। वैसे हमारे प्रेस क्लब की काफी-चाय बुरी नहीं है।

आप लोगों में से जो चाहे मेरे साथ प्रेस क्लब में चाय-काफी पी सकता है। स्वागत है। लेकिन कोई स्टारबक्स की डिमांड न करे। यहां तक मेरे बहुत नजदीकी लोगों के लिए भी स्टार बक्स को लेकर न है।

यही हाल कोकाकोला का भी है। आप लोग गूगल करके पता कर लीजिएगा। इजिप्ट, तुर्की, स्पेन, इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी अरब में कोकाकोला का बहिष्कार चल रहा है।

मैं शुरू से ही कोक पसंद नहीं करता। यानी मौजूदा घटनाक्रम से भी कई साल पहले से मुझे कोक पसंद नहीं था। गर्मियों में हमदर्द का रूह अफजा या डाबर का शरबत ज्यादा पसंद रहता है। अगर 12 मास की बात करें तो जैन साहब की शिकंजी या घर की शिकंजी से लाजवाब कुछ भी नहीं होता। बाकी हरियाणा-पंजाब की लस्सी मिल जाए तो बात बन जाती है।…जो अक्सर मिल ही जाती है।

बिना केएफसी के बात अधूरी रहेगी। वो लोग भी मक्खी मार रहे हैं। वहां तले हुए मुर्गे के पीस तरह-तरह की शक्ल में मिलते हैं। आप जो भी समझें, केएफसी का चिकन मुझे कभी पसंद नहीं रहा। दिल्ली में वैसे भी हमारे पास कुरैशी कबाब से लेकर करीम, अल जवाहर, असलम चिकन, ओखला में अल नवाज, ज़हरा, नज़ीर जैसे आउटलेट हों तो उसके आगे केएफसी की क्या औकात।

इसी तरह लखनऊ में मोबीन, रहमत, इदरीस, दस्तरख्वान, टुंडे, जहांगीर हैं तो इन्हें छोड़कर कौन केएफसी जाएगा। हां, केएफसी एक विश्वव्यापी ब्रांड है। बस यही न। लेकिन हमारे अपनों को टक्कर नहीं दे सकता। भारतीय ब्रांड के आगे केएफसी फीका है। अब लखनऊ में नॉन वेज खाने के बाद अगर आपने प्रकाश की कुल्फी नहीं खाई या चौक वाली मशहूर कुल्फी या मक्खन मलाई नहीं खाया तो सारा खाना बेकार। कुल्फी न सही तो राधेलाल की मिठाई नहीं खाई तो सारा टेस्ट खराब।

दिल्ली में भी आप जामा मस्जिद में है तो खाने के बाद कल्लन की मिठाई या कोने पर पान की दुकान से पान नहीं खाया तो सब बेकार। ओखला में भी अल नवाज के पास पान की दुकान का टेस्ट भी बहुत आला है। वैसे मैं खुद पान नहीं खाता लेकिन कुछ यार-दोस्त हैं जो पान खाते हैं तो इलायची चखना पड़ती है।

कहने का आशय ये है कि अगर आप स्टारबक्स या कोकाकोला, केएफसी, नस्ले वगैरह वगैरह का बहिष्कार कर रहे हैं तो कुछ बुरा नहीं कर रहे हैं। फर्क पड़ता है। करके देखिए। ऐसा नहीं है कि हमारा बहिष्कार नहीं होता, हमारा भी हो रहा है। कुछ लोगों ने अब्दुल पंचर वाले से पंचर लगवाना छोड़ दिया है लेकिन उन्हें दूसरा ऑप्शन नहीं मिल रहा है। कुछ ऑप्शन के रूप में सिर्फ अब्दुल ही है। उसकी जगह कोई नहीं ले सकता।

तो आज का ज्ञान क्या है। ज्ञान ये है कि विदेशी सामान का बहिष्कार जरूरी है। भारतीय लोगों और भारतीय सामानों का बहिष्कार गैरजरूरी है। गोश्त को छोड़कर हलाल वगैरह के चक्कर में ज्यादा मत पड़िए। दूसरों को हलाल करिए। देश के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत में विदेशी कपड़ों को जलाया गया था। गांधी जी से लेकर जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, अरुणा आसफ अली, सरोजनी नायडू आदि इस मुहिम में शामिल थे। …तो विदेशी चीजों का बहिष्कार करने में कोई बुराई नहीं है। बाकी आप आजाद हैं। किसी पर कुछ थोपा नहीं जा सकता।

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1 Comment

1 Comment

  1. rajesh sharma

    December 12, 2023 at 2:42 pm

    शुरू में ऐसा लगा आप किसी गंभीर विषय पर बात कर रहे हैं और मैंने उसे मन लगाकर पढ़ पर बाद में पता लगा कि आप खुद भीअब्दुल वाली कम्युनिटी से हैं तो फिर दिल को तसल्ली हुई कि यह सब सच्चाई नहीं आपके दिल की भड़ास है खैर आप भी पंचर की दुकान खोली अब ऐसा कीजिए कल से रोटी खाना बंद कर दीजिए आप कामयाब होंगे बाकी आगे आपका खुदा खैर करे

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