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सुख-दुख

कोरोना का मामला तो भारत के हाथ से निकलता जा रहा है!

मामला हाथ से निकल रहा है…. पहला चार्ट बता रहा है कि भारत में कोराना के केस अब 4 दिन में दोगुना हो रहे हैं। मैंने पिछले विश्लेषण में बताया था कि यह 5 दिन में दोगुना हो रहे थे. एक तरह से शुरुआती क़दमों पर पानी फिर गया है, रफ़्तार बढ़ गई है। इस पोस्ट को लिखे जाने तक 2388 केस और 50 मौते हो चुकी हैं।

दूसरा चार्ट बता रहा है कि भारत में एक्टिव मामलों में एक बड़ा उछाल दिख रहा है। जर्मनी और दक्षिण कोरिया रिकवर कर रहे है लेकिन इटली, स्पेन और अमेरिका मौत के दलदल में धँसते ही जा रहे हैं। जापान और कोरिया को छोड़कर भारत समेत सभी देशों में मृत्यु दर में अचानक बहुत तेज उछाल आया है।

तीसरा चार्ट बता रहा है 31 मार्च तक अमेरिका 1 मिलियन यानी 10 लाख टेस्ट कर चुका है और भारत अभी भी केवल 50 हजार टेस्ट ही कर पाया है। अगर टेस्टिंग ने रफ्तार नही पकड़ी तो कोरोना रफ्तार पकड़ लेगा। सरकार को तत्काल टेस्टिंग किट्स आयात करके हर हफ्ते 1 लाख टेस्ट का करना ही होगा। सरकार को मूल मंत्र याद रखना ही होगा- टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रेकिंग।

अपूर्व भारद्वाज इंदौर के सोशल एक्टिविस्ट और डेटा एक्सपर्ट हैं.

लगभग साढ़े 6 करोड़ की आबादी वाला देश ब्रिटेन प्रतिदिन 12,750 टेस्ट कर रहा हैं, लेकिन उसके बावजूद ब्रिटेन का मीडिया इस बात की आलोचना कर रहा है कि इतने कम टेस्ट क्यो किये जा रहे है! बोरिस जॉनसन सरकार इस आलोचना से परेशान होकर अब टेस्ट की संख्या बढ़ा रही है कुछ ही दिनों में वह कोरोना वायरस के प्रतिदिन 25,000 टेस्ट करने की तैयारी कर रही है।

भारत सवा सौ करोड़ लोगो का देश है यहाँ हम पर डे बहुत कोशिश करने के बाद मात्र 3500 टेस्ट कर रहे है स्वास्थ्य मंत्रालय बड़े गर्व से घोषणा करता है कि हम अपनी क्षमता का मात्र 38 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर रहे हैं और मीडिया तालियां पीटता है मोदी सरकार की वाह वाह करता है।

विकसित देश अब तक लाखो टेस्ट कर चुके हैं, जबकि भारत की सवा सौ करोड़ की आबादी में अब तक मात्र 47 हजार टेस्ट ही किये हैं।

हमारा मीडिया सरकार से यह सवाल पूछने के बजाए कि आप इतने कम टेस्ट क्यो कर रहे हैं? अपनी टेस्टिंग क्षमता का आधे से भी कम का इस्तेमाल क्यो कर रहे है? कोरोना को हिन्दू मुस्लिम एंगल देने में लग जाता है।

मीडिया यह फाल्स इमेज क्रिएट करने में लगा हुआ है कि भारत मे अन्य देशों की अपेक्षा मृत्यु बहुत कम हो रही है। दरअसल भारत में कोरोना वायरस संक्रमण का पता लगाने वाले टेस्ट ही बेहद कम हुए हैं इसलिए यह फाल्स इमेज बन रही है।

हम जानते ही नही है कि भारत में प्रति 10 लाख लोगों में महज़ 6.8 लोगों के टेस्ट किए गए हैं, जो दुनिया भर के देशों में सबसे निम्नतम दर है।

बड़े बड़े शहरों को छोड़कर किसी दूसरे शहर कस्बे में कोई मृत्यु हो रही है तो उसके बाद यह पता लग रहा है कि यह आदमी तो कोरोना से मरा है. यह तो हालत है देश की, ओर जुमला यह उछाला जाता है कि मोदी सरकार कोरोना से बहुत अच्छी तरह से निपट रही है।

इंदौर निवासी गिरीश मालवीय युवा विश्लेषक हैं।

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