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सुख-दुख

नहीं रहे गुवाहाटी के मूर्धन्य पत्रकार डीएन सिंह

गुवाहाटी। मुर्धन्य पत्रकार दयानाथ सिंह का निधन हो गया। रविवार को अहले सुबह गले में संक्रमण की शिकायत के बाद उन्हें जीएमसीएच में भर्ती कराया गया था जहां दोपहर को उनका निधन हो गया। 88 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार स्व. सिंह अपने पीछे पत्नी और पांच बेटियों को छोड़ गए हैं। उनका सोमवार को अंतिम संस्कार कर दिया गया। इससे पहले 10.30 बजे उनके पार्थिव शरीर को गुवाहाटी प्रेस क्लब लाया जाएगा जहां उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

गुवाहाटी। मुर्धन्य पत्रकार दयानाथ सिंह का निधन हो गया। रविवार को अहले सुबह गले में संक्रमण की शिकायत के बाद उन्हें जीएमसीएच में भर्ती कराया गया था जहां दोपहर को उनका निधन हो गया। 88 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार स्व. सिंह अपने पीछे पत्नी और पांच बेटियों को छोड़ गए हैं। उनका सोमवार को अंतिम संस्कार कर दिया गया। इससे पहले 10.30 बजे उनके पार्थिव शरीर को गुवाहाटी प्रेस क्लब लाया जाएगा जहां उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

निजी कंपनियों की नौकरी छोड़ कर 80 के दशक में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले डीएन सिंह हिंदी और अंग्रेजी के कई अखबारों में कार्यरत रहे। पिछले 15 साल से गुवाहाटी प्रेस क्लब के कार्यालय सचिव के रूप में कार्य संभालते हुए भी डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते थे। मिलनसार और मृदुभाषी स्वभाव के धनी इस व्यक्ति के चले जाने से मीडिया जगत के लोग आहत हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी उनकी निरंतर सक्रियता सबको प्रेरित करती थी।

रायबरेली, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी डीएन सिंह ने अपने जीवन काल में बहुत उतार-चढ़ाव देखे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत द्वारा सारी संपत्ति जप्त कर लिए जाने के बाद उनका परिवार हुबली (कोलकाता) आ गया था। वहां उन्होंने बड़े संघर्ष के साथ कोलकाता के सिटी कालेज से बीकाम की परीक्षा पास की। बाद में निजी कंपनियों में नौकरी की जहां मजदूरों के हित में आवाज उठाने के चलते उन्हें नौकरी गंवानी पड़ी। इस दौरान उन्हें बहुत ही कष्ट का सामना करना पड़ा था।

संघर्षमय जीवन के बीच उन्हें सीखने की अदुभुत ललक थी। यही कारण रहा कि कई भाषाओं पर उन्हें अच्छी पकड़ थी। भाषा का ऐसा ज्ञान कि सामने वाला पकड़ नहीं पाता था कि वे जो भाषा बोल रहे हैं वह उनकी मातृभाषा नहीं है। अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, असमिया, भोजपुरी और मैथिली के अलावा बोड़ो भाषा की पत्रिकाएं भी पढ़ा करते थे। इतना ही नहीं, कन्नड़ का भी उन्हें ज्ञान था।

नीरज झा की रिपोर्ट.

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