नहीं रहे गुवाहाटी के मूर्धन्य पत्रकार डीएन सिंह

गुवाहाटी। मुर्धन्य पत्रकार दयानाथ सिंह का निधन हो गया। रविवार को अहले सुबह गले में संक्रमण की शिकायत के बाद उन्हें जीएमसीएच में भर्ती कराया गया था जहां दोपहर को उनका निधन हो गया। 88 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार स्व. सिंह अपने पीछे पत्नी और पांच बेटियों को छोड़ गए हैं। उनका सोमवार को अंतिम संस्कार कर दिया गया। इससे पहले 10.30 बजे उनके पार्थिव शरीर को गुवाहाटी प्रेस क्लब लाया जाएगा जहां उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

निजी कंपनियों की नौकरी छोड़ कर 80 के दशक में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले डीएन सिंह हिंदी और अंग्रेजी के कई अखबारों में कार्यरत रहे। पिछले 15 साल से गुवाहाटी प्रेस क्लब के कार्यालय सचिव के रूप में कार्य संभालते हुए भी डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते थे। मिलनसार और मृदुभाषी स्वभाव के धनी इस व्यक्ति के चले जाने से मीडिया जगत के लोग आहत हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी उनकी निरंतर सक्रियता सबको प्रेरित करती थी।

रायबरेली, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी डीएन सिंह ने अपने जीवन काल में बहुत उतार-चढ़ाव देखे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत द्वारा सारी संपत्ति जप्त कर लिए जाने के बाद उनका परिवार हुबली (कोलकाता) आ गया था। वहां उन्होंने बड़े संघर्ष के साथ कोलकाता के सिटी कालेज से बीकाम की परीक्षा पास की। बाद में निजी कंपनियों में नौकरी की जहां मजदूरों के हित में आवाज उठाने के चलते उन्हें नौकरी गंवानी पड़ी। इस दौरान उन्हें बहुत ही कष्ट का सामना करना पड़ा था।

संघर्षमय जीवन के बीच उन्हें सीखने की अदुभुत ललक थी। यही कारण रहा कि कई भाषाओं पर उन्हें अच्छी पकड़ थी। भाषा का ऐसा ज्ञान कि सामने वाला पकड़ नहीं पाता था कि वे जो भाषा बोल रहे हैं वह उनकी मातृभाषा नहीं है। अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, असमिया, भोजपुरी और मैथिली के अलावा बोड़ो भाषा की पत्रिकाएं भी पढ़ा करते थे। इतना ही नहीं, कन्नड़ का भी उन्हें ज्ञान था।

नीरज झा की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

देवघर के वरिष्ठ पत्रकार आलोक संतोषी का निधन

अलविदा आलोक! यादों में हमेशा जिंदा रहोगे…  झारखंड के देवघर से एक दुखद खबर है। देवघर जिले के वरिष्ठ पत्रकार आलोक संतोषी ने हमारा साथ छोड़ दिया। अब आलोक हमारे साथ सिर्फ यादों में रहेंगे, खिलखिलाते हुए, जोर जोर से हंसते हुए। पिछले पांच साल से पेट के कैंसर की बीमारी ने आलोक को हरा दिया। ईलाज के दौरान उनको कई बार आर्थिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ा।

स्व. आलोक संतोषी

भड़ास पर भी आलोक को आर्थिक मदद करने के लिए खबर छपी। लोगों ने मदद भी की। मगर निर्दय काल ने आलोक के लिए कुछ ओर तय करके रखा था। सांस्कृतिक कार्यक्रम के स्टेज पर कार्यक्रम होस्ट करने से लेकर अखबार के लिए देर रात तक एसाइनमेंट के बीच आलोक का मुस्कुराता चेहरा मानो कैंसर को हर समय मुंह चिढ़ा रहा था। लेकिन निर्दयी काल आलोक के मुस्कुराते चेहरे को भी देख कर रुका नहीं। अफसोस। अलविदा आलोक! मेरे भाई! मेरे दोस्त। आपकी बात कानों में गूंज रही है। फिर मिलेंगे वहीं उस दुनिया में और सुनेंगे आपकी खिलखिलाती हंसी।

अलविदा दोस्त.…

आपका भाई.

अनंत

anantkumarjha@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पहली पीढ़ी के महान आर्थिक पत्रकार शशिकांत वसानी को मेरी श्रद्धांजलि

देश के पहले आर्थिक समाचार पत्र ‘व्‍यापार’ के संपादक शशिकांत वसानी हमारे बीच नहीं रहे। यह समाचार आज मुझे एक गुजराती अखबार कमोडिटी वर्ल्‍ड में छपी न्‍यूज से पता चला। मुंबई में रहते हुए 22 अक्‍टूबर 2017 को उन्‍होंने अंतिम सांस ली और उनकी बेटी अल्‍पा ने उन्‍हें मुखाग्नि दी। आर्थिक पत्रकार बनने में मैंने उनसे ही अपने जीवन में बहुत कुछ नहीं सब कुछ सीखा। एक कर्मचारी से ज्‍यादा उन्‍होने बेटे सरीखा रखते हुए एक-एक शब्‍द के बारे में समझाया, बनाया और गढ़ा।

मुझे भरोसा ही नहीं हुआ कि वसानी भाई चले गए इतनी जल्‍दी। 88 साल की उम्र में भी वे युवाओं को कार्य करने में पीछे छोड़ देते थे, रात दिन लिखना और पढ़ना और जो पूछने जाए उसे बडे प्‍यार से सीखाना एवं आवभगत करने में भी खूब आगे। उनकी याद खूब आ रही है। मैं महान आर्थिक पत्रकार शशिकांत वसानी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि देता हूं और नमन करता हूं। ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति प्रदान करें और हम सब पर उनका आशीर्वाद कायम रहे। वसानी जी का एक इंटरव्‍यू मुझे लेने का मौका मिला था जब भोपाल से प्रकाशित मीडिया विमर्श का अंक आया था गुजराती पत्रकारिता का भविष्‍य और मैं उस अंक का अतिथि संपादक था। मैने उनसे यह बातचीत दिसंबर 2014 में की थी। पेश है वह बातचीत:

-आप पहली पीढ़ी के आर्थिक पत्रका‍र हैं, कैसा लगता है यह महसूस करते हुए।
-भारत में आर्थिक पत्रकारिता के जनक हरजी भाई गिलानी हैं। वर्ष 1959 में गिलानी भाई को मन में यह विचार आया कि आर्थिक गतिविधियों की जानकारी लोगों तक पहुंचानी चाहिए जिससे लोगों को कारोबारी फैसलों से लेकर आर्थिक मोर्चे पर हो रही हलचल की जानकारी मिल सके। लोग आर्थिक मंथन के लिए एक बेहतर स्‍त्रोत पा सके। स्‍वतंत्रता के बाद ‘व्‍यापार’ पहला आर्थिक अखबार है। इस अखबार के बाद ही देश में अंग्रेजी, हिंदी एवं अन्‍य भाषाओं में आर्थिक समाचारों के अखबार आए। हालांकि, उस समय आर्थिक विकास कम था और समाचारों का प्रवाह नहीं था। खबरें कम मिल पाती थी, समाचार जुटाना भी काफी कठिन था। हालांकि, ‘व्‍यापार’ शुरुआत में जन्‍मभूमि समूह के अखबार ‘प्रवासी’ के सप्‍लीमेंट के रुप में निकला। जब इसकी मांग बढ़ी तो इसे स्‍वतंत्र अखबार के रुप में साप्‍ताहिक शुरु किया गया जो बाद में सप्‍ताह में दो बार बुधवार एवं शनिवार को निकलने लगा एवं अब तक इसी रुप में प्रकाशित हो रहा है।

-‘व्‍यापार’ में आपकी पारी कैसी रही।
-मैं ‘व्‍यापार’ से 1964 में जुड़ा और इस अखबार में तकरीबन 35 साल रहा। शुरुआत मेरी उप-संपादक के रुप में हुई। वर्ष 1972 में मैं सहायक संपादक बना और 1976 में गिलानी भाई सेवानिवृत्त हुए तो ‘व्‍यापार’ का संपादक बनने का गौरव मुझे मिला। हालांकि, उस समय मेरे मन में एक डर था कि देश के पहले आर्थिक अखबार को चलाने के लिए बड़ी हिम्‍मत की जरुरत होगी। ऐसे में गिलानी भाई ने मुझे भरोसा दिलाया कि आप इस जिम्‍मेदारी को बखूबी निभा लेंगे और मेरा मार्गदर्शन जब चाहो तब ले सकते हो। उन्‍होंने यहां त‍क कहा कि यदि मैं हिम्‍मत हार गया तो जिस पद पर आपको होना चाहिए, वहां बाहर से कोई और आएगा एवं जिंदगी भर यह मौका शायद फिर ना मिल पाएं। गिलानी भाई की कही बातों ने मेरे में हिम्‍मत पैदा की एवं नई जिम्‍मेदारी को लंबे समय तक बखूबी निभाया।

-देश के पहले आर्थिक अखबार की कंटेंट क्षेत्र में क्‍या खासियत रही।
-ज्‍यादातर गुजराती कारोबारी समुदाय के हैं और उनकी जरुरत को देखते हुए ‘व्‍यापार’ में मैंने रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया। ‘व्‍यापार’ को मैंने कमोडिटी केंद्रित अखबार रखा क्‍योंकि अधिकतर गुजराती कमोडिटी में ट्रेड करते हैं। अनाज, दलहन, तिलहन, मसाला बाजार, कपड़ा बाजार, मेटल बाजार, सोना-चांदी, हीरा बाजार से लेकर पशु आहार और सिलाई के काम आने वाली वस्‍तुओं तक की रिपोर्ट केवल ‘व्‍यापार’ में प्रकाशित होती थी। यानी हरेक तरह के कारोबार करने वाले कारोबारी के लिए ‘व्‍यापार’ में कुछ ना कुछ होता ही था जिसकी वजह से पाठक इसका बेसब्री से इंतजार करते थे। मौसम विभाग की सभी जानकारी आज आसानी से पाई जा सकती है लेकिन उस समय ‘व्‍यापार’ हर साल बारिश और बोआई की रिपोर्ट कारोबारियों और किसानों से मंगवाता था एवं प्रकाशित करता था। दिवाली पर स्‍पेशल अंक आता था जो हरेक कारोबार की सालाना भविष्‍यवाणी करता था। इस अंक से देश की अर्थव्‍यवस्‍था का दिवाली से दिवाली तक रहने वाला हाल का ब्‍यौरा होता था। इस अंक में अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ लिखते थे। हरेक व्‍यापार, उद्योग पर उसी क्षेत्र के विशेषज्ञों से ‘व्‍यापार’ के नियमित अंकों में लिखवाया जाता था। आयकर, बिक्रीकर, सेवाकर, अन्‍य कराधान, व्‍यापारिक कानून, नीतियों पर भी ‘व्‍यापार’ में जानकारी दी जाती थी। ‘व्‍यापार’ ने विशेषज्ञ वकीलों की एक टीम बना रखी थी जिनसे ऐसे हर विषय पर लिखवाया जाता था। यही वजह है कि जमकर किए गए काम से ‘व्‍यापार’ एक अहम ब्रांड बना। हालांकि, ‘व्‍यापार’ में उस समय शेयर बाजार की रिपोर्टिंग को कम स्‍थान दिया जाता था क्‍योंकि तब इक्विटी कल्‍चर का आज जितना विस्‍तार नहीं हुआ था।

-‘व्‍यापार’ में आपके लिए गर्व के क्षण।
-आर्थिक पत्रकारिता में ‘व्‍यापार’ की धाक इससे आंकी जा सकती है कि ‘व्‍यापार’ में उठे मुद्दों पर कई बार देश की संसद में चर्चा हुई, सवाल उठाए गए। आम बजट के कवरेज लिए उस समय ‘व्‍यापार’ का एक रिपोर्टर दिल्‍ली जाता था और पूरे बजट एवं उसके विश्‍लेषण को कवर किया जाता था। देश की आयात-निर्यात नीति हो या टेक्‍सटाइल पॉलिसी सभी तरह की नीतियों का भी इसी तरह लाइव कवरेज होता था। मुझे गर्व होता है कि जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और मैं उनसे मिला तो उन्‍होंने कहा कि मैं व्‍यापार को लंबे अर्से से भली-भांति जानता हूं। दिल्‍ली के राजनीतिक गलियारे में ‘व्‍यापार’ की खास अहमियत थी। इसी तरह, वर्ष 2003 में एमसीएक्‍स की लांचिंग सभा में उद्योगपति मुकेश अंबानी ने कहा था कि यहां शशिकांत वसानी जी भी आए हुए हैं और मेरे पिता धीरुभाई अंबानी उनसे आर्थिक मसलों और खबरों के विश्‍लेषण पर विचार विमर्श करते थे।

-आर्थिक पत्रकारिता में किस बात की सबसे बड़ी कमी है।
-मानव संसाधन की कमी और बिजनेस के बारे में अच्‍छी जानकारी न रखने वाले पत्रकारों की उस समय भी कमी थी और आज भी कमी है। देश में जब अंग्रेजी के आर्थिक अखबार निकले तो ‘व्‍यापार’ से कई अच्‍छे पत्रकार इनमें चले गए और यह भी खुशी की बात है कि आज वे बड़ी पोजीशन पर हैं। मुख्‍य गुजराती दैनिक ‘गुजरात समाचार’ और ‘संदेश’ ने अतीत में ‘व्‍यापार’ की तरह अपने अखबार शुरु किए लेकिन वे चल नहीं पाए और तीन-चार महीने निकलकर बंद हो गए। ये अखबार आर्थिक खबरों के पाठकों के बीच अपनी पैठ और पहुंच नहीं बना पाए। हालांकि, सभी गुजराती समाचार पत्रों में हर रोज दो से चार पेज आर्थिक खबरों से भरे होते हैं। गुजराती समुदाय निवेश और कारोबार से वास्‍ता रखता है, इसलिए ही केवल गुजराती समाचार पत्रों में आर्थिक खबरों को खासी अहमियत मिलती है। यद्यपि, अच्‍छे आर्थिक अखबार की गुजराती में हमेशा जरुरत रहेगी एवं बेहतर अखबार को पाठकों का उम्‍दा रिस्‍पांस मिलेगा।

-तब और अब के आर्थिक अखबारों में आप क्‍या अंतर पाते हैं।
-पहले और आज के आर्थिक समाचारों में खास अंतर आया है कि पहले शुद्ध समाचार ही अखबारों में आते थे लेकिन अब किसी न किसी से प्रेरित (इनस्‍पायर्ड) समाचार की भरमार है। कारोबारी और उद्योगपतियों से वे प्रेरित समाचार ज्‍यादा आते हैं जो उनके हितों को साधते हैं। लेकिन पहले अखबारों में केवल संपादक का ही दखल होता था तो यह सीधा ध्‍यान रखा जाता था कि किसी के हित तो अमुक समाचार से नहीं सध रहे।

(शशिकांत वसानी से कमल शर्मा की बातचीत पर आधारित)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मांगा था मजीठिया का हक, इसलिए नहीं छापा निधन का समाचार

जिनके साथ 25 साल गुजारा उनका भी मर गया जमीर, नहीं शामिल हुए अंतिम यात्रा में, यह है सहारा परिवार का सच…  वाराणसी : सहारा समूह के हुक्मरान सुब्रत राय सहारा एक तरफ जहां सहारा को एक कंपनी नहीं बल्कि परिवार मानने का दंभ भरते हैं, वहीं इसी सहारा समूह के पत्रकार रह चुके जयप्रकाश श्रीवास्तव के निधन की एक लाईन की खबर इसलिये राष्ट्रीय सहारा अखबार में नहीं लगायी गयी क्योंकि जयप्रकाश ने अखबार प्रबंधन से जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपना बकाया मांग लिया था।

राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार श्री जयप्रकाश श्रीवास्तव का सोमवार को वाराणसी के सिंह मेडिकल एण्ड रिसर्च सेंटर, मलदहिया में निधन हो गया। ६४ वर्षीय श्री जयप्रकाश श्रीवास्तव मधुमेह एवं हृदय रोग से पीड़ित थे। उनके निधन पर समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के अजय मुखर्जी सहित कई पत्रकारों ने शोक जताया है।  स्व॰ जयप्रकाश श्रीवास्तव लम्बे समय से पत्रकारिता से जुड़े रहे।  वे अपने पीछे पत्नी, तीन पुत्रियां और एक पुत्र छोड़ गये हैं।  उनके निधन पर देश भर के मजीठिया क्रांतिकारियों ने शोक जताया है और साफ कहा है कि इस क्रांतिकारी का बलिदान र्ब्यथ नहीं जाने दिया जायेगा।

जयप्रकाश श्रीवास्तव का कसूर बस इतना था कि उन्होंने मजीठिया के लिए श्रम न्यायालय में केस कर रखा था। नतीजा रहा कि उनके निधन का समाचार तक नहीं छापा गया। यह कड़वी हकीकत है,  सच कहने की हिम्मत का नारा देने वाले राष्ट्रीय सहारा अखबार का। इस अखबार की वाराणसी यूनिट में जयप्रकाश श्रीवास्तव लगभग 25 वर्ष रिपोर्टर रहने के बाद एक वर्ष पहले रिटायर हो गये थे। सोमवार की शाम हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। उनके निधन की जानकारी मिलते ही राष्ट्रीय सहारा में शोक सभा की तैयारी शुरू हुई। फोटो ग्राफर ने जयप्रकाश की फाइल फोटो कम्प्यूटर में खोज कर निकाला ताकि वह उनके निधन के समाचार के साथ प्रकाशित हो सके।

निधन का समाचार एक रिपोर्टर ने कम्पोज करना शुरू ही किया कि ऊपर से मौखिक निर्देश आ गया। बताया गया कि जय प्रकाश ने मजीठिया का हक पाने के लिए लेबर कोर्ट में संस्थान के खिलाफ मुकदमा कर रखा है इसलिए उनके निधन का समाचार राष्ट्रीय सहारा में नहीं छपेगा। यह सूचना मिलते रिपोर्टर ने खबर और फोटोग्राफर ने कम्प्यूटर से जयप्रकाश की फोटो डिलीट कर दी। इतना ही नही, इशारों में एक दूसरे को कुछ ऐसे संकेत हुए कि राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार साथी न तो संवेदना व्यक्त करने के लिए जयप्रकाश के घर गये और न ही उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। केवल एक स्टाफर और चार-पाच स्ट्रिंगर ही उनके घर गए।

जयप्रकाश ने लगभग 25 साल राष्ट्रीय सहारा में सेवा की। वह ब्यूरो के स्टाफ थे। उनके साथ ही सहारा में नौकरी शुरू करने वाले लगभग डेढ दर्ज़न कर्मचारी आज भी सहारा की वाराणसी यूनिट में है जिनके साथ जयप्रकाश के घरेलू रिश्ते रहे लेकिन ऐसे लोगों ने भी नौकरी जाने के भय में अपना जमीर गिरवी रख दिया। वे भी संवेदना व्यक्त करने के लिए जयप्रकाश के घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। सहारा को परिवार बताने वाले सुब्रत राय के इस संस्थान की ओर से एक माला तक नसीब हो सकी जय प्रकाश को।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

झारखंड में भूख से अबकी 40 साल का रिक्शा चालक मरा

डिजिटल इंडिया या भूखा इंडिया : आधार के निराधार फरमान से दम तोड़ता भूखा हुआ झारखंड

विशद कुमार, रांची

सिमडेगा की 11 वर्षीय बच्ची संतोषी की भूख से हुई मौत पर हंगामा अभी थमा भी नहीं है कि राज्य के धनबाद जिले का कोयलांचल क्षेत्र का झरिया में एक 40 वर्षीय रिक्शा चालक की मौत ने रघुवर सरकार के आधार के निराधार फरमान की हवा निकाल दी है। उल्लेखनीय है कि सिमडेगा जिला अन्तर्गत जलडेगा प्रखंड के कारीमाटी गांव की कोयली देवी की 11 वर्षीय बेटी संतोषी कुमारी की मौत भात—भात रटते रटते हो गई थी। उसे कई दिनों से खाना नहीं मिल पाया था और उसके परिवार का राशन कार्ड इसलिए रद्द हो गया था कि राज्य की रघुवर सरकार द्वारा साढ़े 11 लाख अवैध राशन कार्ड रद्द कर दिए गए, जिसमें से एक राशन कार्ड कोयली देवी का भी था। ठीक उसी तरह झरिया के बैद्यनाथ दास के घर में भी कई दिनों से अनाज का एक दाना नहीं था क्योंकि बैद्यनाथ दास का गरीबी रेखा से नाम हट गया था और राशन कार्ड भी रद्द हो गया था।

वह भाड़े का रिक्शा चलाता था मगर आटो रिक्शा की भरमार के कारण उसे सवारियां कम मिल पाती थीं। किसी किसी दिन फांका भी हो जाया करता था। ऐसे में वह काफी कमजोर हो चुका था। इसी फांकाकसी ने उसे इतना कमजोर कर दिया था कि कई दिनों से बिस्तर पड़ा था। इस तरह अंतत: बैद्यनाथ दास ने दम तोड़ दिया। बताते चलें कि पिछले  27 मार्च को राज्य की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा ने वीडियो कांफ्रेन्सिन्ग के माध्यम से राज्य के तमाम पदाधिकारियों को कड़ा निर्देश दिया था कि जिन जिन राशन कार्डों में आधार नंबर का जिक्र ना हो उन्हें रद्द कर दिया जाय। उन्होंने भारत सरकार की अधिसूचना का हवाला देते हुए तीन के अंदर बिना आधार नंबर वाले राशन कार्डों को रद्द करने का निर्देश दिया था। 29 मार्च को मुख्य सचिव के निर्देशों से संबंधित प त्र भी जारी किया गया था। जिसका अनुपालन करते हुए राज्य के साढ़े 11 लाख राशन कार्ड रद्द कर दिए गए। बैद्यनाथ दास भी राज्य के उन्हीं साढ़े 11 लाख अभागा राशन कार्डधारियों में से एक था जिनका राशन कार्ड ‘आधार के निराधार फरमान’ की बलिवेदी शहीद हो गया है।

बता दें कि बैद्यनाथ दास भाड़े पर रिक्शा चला कर परिवार के सात सदस्यों सहित अपना पेट पालता था। अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए कई महिनों से सरकारी कार्यालयों एवं पार्षद के यहां चक्कर लगा ​रहा था। आन लाइन आवेदन भी दिया था मगर उसका आवेदन स्वीकृत नहीं हुआ था। वैसे उसके बड़े भाई जागो दास का नाम बीपीएल सूची में दर्ज था अत: बीपीएल कार्ड के आधार पर उन्हें सरकारी राशन मिल जाया करता था, मगर बड़े भाई की मौत के बाद बीपीएल सूची से उसका नाम हट गया जिसे अपने नाम पर चढ़वाने की काफी जद्दोजहद के बाद भी बैद्यनाथ का नाम बीपीएल सूची में दर्ज नहीं हो सका।

तीन बेटियां और दो बेटों सहित पत्नी व उसकी रोटी का सहारा मात्र भाड़े का रिक्शा ही था। वह भी इस रफ्तार की दुनिया में टिक इसलिए नहीं पा रहा था कि लोग कम समय में अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिये आटो रिक्शा को ज्यादा महत्व देते थे। दो नाबालिग बेटों व दो नबालिग बेटियों सहित जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बड़ी बेटी की चिन्ता भी उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से कमजोर कर चुकी थी। अंतत: पेट की भूख ने उसकी जान ले ली। 

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के लिये इससे ज्यादा भद्दा मज़ाक और क्या हो सकता है कि भूख से मरने के बाद मरने वाले के घर भोजन की व्यवस्था की सारी औपचारिकताएं पूरी करने की कबायद शुरू होने लग जाती है, दूसरी तरफ मरने वाले के परिवार वालों पर ऐसे एहसानों के साथ यह दबाव बनाया जाता है कि वे बयान दे कि मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है। जैसा कि सिमडेगा की संतोषी की मां कोयली देवी के साथ हो रहा है। वही प्रक्रिया बैद्यनाथ के परिजनों के साथ भी दोहरायी जा रही है। थोड़ी देर के लिए हम मान भी लें कि ऐसी मौतें भूख से नहीं बीमारी से होती हैं तो यह भी साफ दिखता है कि ऐसी बीमारी भी कुपोषण के कारण ही होतीं हैं। तो क्या कुपोषण भूख से अलग कोई प्रक्रिया है? इस बड़े सवाल पर शासन या प्रशासन का क्या जवाब है, वह बताएगा?

कहां है ‘जनता के लिए जनता द्वारा जनता का शासन’?
अजीब इत्तेफाक है कि सिमडेगा झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 150 कि0मी0 दूर है तो धनबाद का झरिया भी राजधानी रांची से लगभग वही दूरी तय करता है।
मजे की बात तो यह है कि संतोषी की मौत को जलडेगा प्रखंड का बीडीओ और सिमडेगा का जिलाधिकारी ने मलेरिया से मौत बताया है वहीं कारीमाटी गांव की एएनएम माला देवी ने साफ दावा किया है कि संतोषी को उसने देखा था उसे कोई बीमारी नहीं थी अलबत्ता उसके घर में खाना नहीं था और भूख से ही उसकी मौत हुई है। बता दे कि सच बोलने के पुरस्कार स्वरूप माला देवी को निलंबित कर दिया गया है। ठीक उसी तरह बैद्यनाथ की मौत को भी जिला प्रशासन बीमारी से ही मौत बता रहा है जबकि पास पड़ोस के लोगों का मानना है कि आर्थिक अभाव के कारण ही उसकी मौत भूख से हुई है।

उल्लेखनीय है कि रघुवर की सरकार अव्यवहारिक नीतियों का ही खामियाजा राज्य की गरीब, दलित, पीड़ित,आदिवासी जनता ही भुगत रही है। क्योंकि जो अवैध राशन कार्ड धारी थे उनकी सेहत पर सरकार की उक्त नीति का कोई असर नहीं पड़ा है, इससे संबंधित खबरें स्थानीय अखबारों में टूकड़े टूकड़े में आती रही हैं कि नेटवर्क नहीं रहने एवं आधार से लिंक नहीं होने के कारण अमुक गांव में उपभोक्ताओं को राशन नहीं मिल पा रहा है, यह कि फलां गांव के कई गरीब, दलित, आदिवासी परिवार का राशन कार्ड रद्द कर दिया गया है, जिसे सरकारी स्तर से कोई तरजीह नहीं दी गई।

कहना ना होगा कि प्रशानिक लापरवाही एवं सरकारी अड़ियलपन का ही नतिजा है संतोषी कुमारी एवं बैद्यनाथ दास की मौत। इस तरह की मौतें रोज व रोज हो रही हैं, जो किन्हीं भी सूत्रों द्वारा सुर्खियों में आ गई तो उसे हम जान पाते हैं वर्ना ऐसे प्रभावित लोगों का दर्द उन्हीं तक सिमट कर रह जाता है। दिल को झकझोर देने वाली इन घटनाओं से जेहन में कई सवालों में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सच में इंसानियत मर गई है। पीड़ित परिवारों का सरकारी राशन कार्ड सिर्फ इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि वह आधार से लिंक नहीं था।

उल्लेखनीय है कि झारखंड देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है, यहां गरीब परिवारों को प्रत्येक राशन कार्ड के बदले 35 किलोग्राम चावल देने का प्रावधान है। सरकार द्वारा आधार की अनिवार्यता पर मजदूर संगठन समिति के महासचिव बच्चा सिंह कहते हैं कि ‘लोकतंत्र के इन पुजारियों का यह कौन सा लोकतंत्र है कि वे न्यायपालिका तक के आदेश की अवहेलना करने में पीछे नहीं हैं।‘ वे बताते हैं कि- ‘सरकार द्वारा 2013 के बाद से जारी किए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार संख्या का अधिकार अनिवार्य नहीं किया जा सकता।  विशेषकर सब्सिडी वाले अनाज खरीदने के लिए।‘

बच्चा सिंह बताते हैं कि – ‘भले ही लोगों के पास आधार कार्ड हों बावजूद अधिकारी उनके राशन कार्ड से लिंक करने में सक्षम नहीं हैं। क्योंकि इंटरनेट नेटवर्क अक्सर ख़राब रहता है, सर्वर काम नहीं करता है, तकनीकी ऑपरेटर अनुपस्थित रहते हैं, पोर्टल कुछ दिनों के बाद काम करना बंद कर देता है।’  वो कहते हैं कि — ‘राज्य में सार्वजनिक वितरण योजना के लाभार्थियों को इसलिए हटा दिया गया है क्योंकि राज्य सरकार को लक्ष्य हासिल करने की जल्दबाजी है।’

7 सितंबर को एक संवाददाता सम्मेलन में, खाद्य और नागरिक आपूर्ति के राज्य सचिव विनय चौबे ने घोषणा की थी कि झारखंड ने राशन कार्ड के साथ 100% आधार सीडिंग हासिल की है। इस प्रक्रिया के दौरान, उन्होंने दावा किया था कि 11.6 लाख लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली सूची से हटा दिया गया है क्योंकि वे नकली या नकली राशन कार्ड रखे हुए थे। दूसरी तरफ 2.3 करोड़ झारखंड के नागरिक जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आते हैं, में सरकार के खुद के ऑनलाइन उपलब्ध आंकड़े दिखाते हैं कि केवल 1.7 करोड़ लोगों ने आधार संख्या में वरीयता दी है। तो फिर सवाल उठता है कि आधार के नहीं रहने से उपभेक्ताओं का राशन कार्ड क्यों रद्द हुआ? जाहिर है इस तरह की संवेदनहीनता की वजह प्रशासनिक अकर्मण्यता एवं लापरवाही है।

इसे भी पढ़ें :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजेश शर्मा के निधन से भड़ास ने एक सच्चा शुभचिंतक खो दिया

राजेश शर्मा चले गए. दिवाली की रात. हार्ट अटैक के कारण. उमर बस 44-45 के आसपास रही होगी. वे इंडिया न्यूज यूपी यूके रीजनल चैनल के सीईओ थे. राजेश भाई से मेरी जान पहचान करीब आठ साल पुरानी है. वो अक्सर फोन पर बातचीत में कहा करते- ”यशवंत भाई, तुम जो काम कर रहे हो न, ये तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता. मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत करीब से देखा है. यहां सब मुखौटे लगाए लोग हैं. भड़ास के जरिए तुमने आजकल की पत्रकारिता को आइना दिखाया है.”

राजेश प्रैक्टिकल आदमी थे. वह मीडिया और बाजार के रिश्तों को अच्छे से समझते थे. वह कहते भी थे- ”यार, हम लोगों को टारगेट पूरा करना होता है, रिजल्ट देना होता है. तब जाकर सेलरी मिलती है.”

मेरी पिछली बातचीत राजेश शर्मा से तब हुई जब इंडिया न्यूज के मालिक कार्तिक शर्मा ने भड़ास पर मुकदमा किया था. बहुत सारी बातें हुई थी फोन पर. राजेश ने कहा था कि यार यशवंत, बहुत दिन हुआ, बैठते हैं अपन एक दिन.

काफी पहले की बात है. राजेश तब इंडिया न्यूज में नहीं थे. नौकरी तलाश रहे थे. उनके रिक्वेस्ट पर एक बार मैं तबके अपने मित्र रहे समाचार प्लस वाले उमेश शर्मा के पास ले गया. वहां से मिलकर हम दोनों बाहर निकले. राजेश के कार में ज्यों ही बैठा, त्यों कुछ लोगों ने मेरा नाम पूछा और मुझे बाहर निकाल कर टांग लिया. वे लोग खुद को पुलिस वाले बता रहे थे. राजेश बेहद डर गए, इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से. बाद में उन्होंने बताया था- ”यशवंत, मैं यार इतना डर गया था कि गाड़ी फुल स्पीड में भगाते हुए सीधे अपने घर जाकर ही रुका.” यह राजेश की साफगोई थी, उनकी सहजता थी जो इस बात को भी सीधे-सीधे कह दिया.

बता दें कि नोएडा पुलिस की एसटीएफ द्वारा की गई उस गिरफ्तारी के बाद मुझे दो दिन नोएडा के कई थानों के हवालातों में रखा गया. फिर डासना जेल भेज दिया गया जहां 68 दिन रहने के बाद छूटा. इस जेल जीवन पर ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिखी. यह गिरफ्तारी इंडिया टीवी, दैनिक जागरण समेत कई चैनलों-अखबारों के मालिकों-मैनेजरों-संपादकों की एक बड़ी साजिश के तहत हुई थी. तात्कालिक कारण बना विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी से मेरा पुराना झगड़ा. इन दोनों के कंधें पर बंदूक रहकर ढेर सारे मीडिया हाउसेज ने पूरी योजना बनाई कि अबकी यशवंत और भड़ास को नेस्तनाबूत कर देना है. इस साजिश में मीडिया मालिकों ने यूपी की तत्कालीन नई-नई आई अखिलेश सरकार के बड़े अफसरों और मुलायम घराने के कुछ बड़े नेताओं को भी शामिल कर लिया था, गलत तथ्य और गलत जानकारियां देकर.

खैर, बात हम लोग कर रहे थे राजेश शर्मा की.

भड़ास पर जब जब आर्थिक मदद के लिए अपील की गई, राजेश भाई ने हर बार चुपचाप पांच हजार या दस हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में डालने के बाद फोन पर कहते- ”यशवंत यार इस मदद के बारे में किसी से न जिक्र करना और न कुछ लिखना.”

राजेश प्रबंधन के हिस्से हुआ करते थे, इसलिए जानते थे कि भड़ास से खुलेआम संबंध शो करना करियर के लिए अच्छा नहीं. वो इसका जिक्र फोन पर मजाक में किया करते थे और चुटकी लेते हुए कहते थे- ”भड़ास से दोस्ती और दुश्मनी दोनों करियर के लिए बुरी है…” यह कहते हुए वह ठठा कर हंसते थे…

जिंदादिल राजेश से एक दफे लखनऊ के एक होटल में मुलाकात हो गई, अचानक. राजेश अपने आफिसियल टूर पर लखनऊ गए थे और होटल में रुके हुए थे. मैं एक प्रोग्राम में शिरकत करने होटल में गया हुआ था. हम दोनों होटल के रेस्टोरेंट में अचानक टकरा गए. निगाह मिलते ही राजेश भाई एकदम से खड़े हुए और दोनों हाथ फैलाकर मुस्कराते हुए आगे बढ़े, मैं भी उनकी ओर मुखातिब हुआ. उन्होंने गले लगाया और पीठ थपथपाते हुए कई बार कहा- ”मेरे भाई, मेरे भाई… जमाने बाद मिले हम लोग.” फिर देर तक बात हुई, हंसी-मजाक चला.


मूल खबर :


राजेश को लेकर बहुत सारी बातें हैं, यादें हैं. क्या-क्या कहा जाए. एक इतने जीवंत, सहज, सरल, जिंदादिल और भावुक आदमी का इतना जल्द चले जाना किसी को भी हजम नहीं हो रहा. पर मौत एक कड़वी सच्चाई है जिसे मन मसोस कर कुबूल करना पड़ता है, हजम करना पड़ता है. राजेश का शरीर भले ही आग के हवाले होकर राख में तब्दील हो चुका है लेकिन उनकी यादें हम जैसों के दिलों में हमेशा बनी रहेंगी, जीवंत रहेंगी…

राजेश मेरे अच्छे शुभचिंतकों में से थे लेकिन हम दोनों फेसबुक पर फ्रेंड नहीं थे. राजेश रिश्तों की शो-बाजी पसंद नहीं करते थे. और, शायद भड़ास वाला यशवंत होने के कारण मेरे साथ रिलेशन को पब्लिक डोमेन में चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि यह उनके करियर की भी मजबूरी थी. राजेश के मन-दिल को मैं समझता था इसलिए उनकी भावनाओं, उनकी मजबूरियों को भी महसूस करता था. सो, हम लोग फेसबुक पर भले फ्रेंड न रहे हों, लेकिन दिल के स्तर पर बेहद करीबी नाता था…

दोस्त, जिस भी दुनिया में गए हो, ऐसे ही हंसते मुस्कराते इठलाते जीना.. तुम्हारे जाने से मीडिया की दुनिया एक शानदार शख्सियत से महरूम हो गई है… खासकर मैंने अपना एक सच्चा शुभचिंतक / साथी खो दिया है जो हमेशा पूछा करता था- ”यशवंत, कोई दिक्कत हो तो बताना…” ये पूछना ही मेरे लिए काफी था क्योंकि आजकल की मायावी दुनिया में कौन किसकी चिंता करता है…

राजेश भाई, आप कहा करते थे, साथ क्या जाएगा, सब यहीं रह जाएगा, इसलिए किसके खातिर बेइमानी करना. आपके भीतर एक उदात्त किस्म का इंसान था जो सब कुछ, हर ओर-छोर महसूस करता था और सबकी सीमाओं-दायरों को समझा करता था. राजेश अपनी व्यस्त लाइफ, आफिसियल टूर आदि को लेकर कई बार चिंतित होते थे. कहते- यार सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती. एक जगह से टूर निपटा कर लौटे तो दूसरा टूर तैयार रहता है.

राजेश भाई, आपने देख लिया न करियर की आपाधापी का नतीजा. इस तनाव और भागदौड़ से निजात पाने के लिए एल्कोहल का सहारा लेते हैं. योगा कसरत के लिए समय निकाल नहीं पाते. नतीजा, शरीर और नसें दिन प्रतिदिन शिथिल होती जातीं. कई किस्म के लेयर्स नसों के भीतर चढ़ते भरते चले जाते हैं… एक दिन नतीजा आता है हार्ट अटैक के रूप में… उम्मीद करते हैं आपके असमय चले जाने से मीडिया के कुछ ऐसे साथी सबक लेंगे जो आपकी ही तरह की व्यस्ततम लाइफस्टाइल जीते हैं. मुझे याद आता है राजेश भाई आपके घर पर घंटों बैठकर बतियाना. तब मैं दिल्ली के बाबा नीम करोली आश्रम गया था और बगल में ही छतरपुर में आपका घर था. मैंने फोन लगाया और आपने फौरन घर पर बुला लिया. वह केयर, प्यार और सम्मान सब याद आ रहा.

लव यू राजेश भाई, सैल्यूट यू राजेश भाई…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक हैं. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

भड़ास पर राजेश शर्मा को लेकर छपी पिछली खबर ये है…

इस खबर में राजेश शर्मा की तस्वीर है, दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इंडिया न्यूज यूपी-यूके रीजनल चैनल के सीईओ राजेश शर्मा का हार्ट अटैक से निधन

दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ सबसे बाएं राजेश शर्मा

एक दुखद खबर आ रही है दिल्ली से. इंडिया न्यूज समूह के रीजनल न्यूज चैनल इंडिया न्यूज यूपी यूके के सीईओ राजेश शर्मा का ऐन दिवाली की रात हार्ट अटैक से निधन हो गया. उनकी उम्र 45 वर्ष के आसपास रही होगी. जिंदादिल स्वभाव वाले राजेश बेहद मेहनती और निष्ठावान शख्सियत थे. यही कारण है कि इंडिया न्यूज में एंट्री के बाद उन्होंने लगातार तरक्की की.

इंडिया न्यूज से पहले राजेश कई बड़े चैनलों में काम किए थे. आज दोपहर उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में कर दिया गया. दिल्ली के मूल निवासी राजेश के परिवार में अब उनकी पत्नी और इकलौती पुत्री हैं. राजेश शर्मा के निधन पर इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक तस्वीर शेयर करके ये लिखा है :

Rana Yashwant : बहुत याद आओगे : कोई मौक़ा चूकते हुए नहीं देखा तुमको. ज़िंदगी के हर पल में कुछ ना कुछ ज़िंदगी-सा होते रहना चाहिए – तुम्हारा सलूक ज़िंदगी के साथ ऐसा ही रहा. अचानक आ जाना, अपनापन जताना और फिर अचानक निकल जाना.

कल दिन में साथ थे तुम और कल ही अचानक हमेशा के लिए निकल भी गए. ऐसे कई मौक़े उम्र भर याद रहेंगे जब तुम्हारे साथ होने से ही मन/माहौल बदल गए. पिछले महीने मेरे जन्मदिन पर पास आकर जिस गर्मजोशी से तुम मिले, वही तुम हो और हमेशा रहोगे. ज़िंदगी को तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत रहेगी और मौत हमेशा शर्मिंदा रहेगी.

इसे भी पढ़िए : 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वरिष्ठ पत्रकार श्री सत्येंद्र आर शुक्ल (92) नहीं रहे

Sarvesh Kumar Singh : दुखद समाचार। वरिष्ठ पत्रकार श्री सत्येंद्र आर शुक्ल (92) नहीं रहे। 13 अक्टूबर को शाम 5 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। मेरे मित्र राजीव शुक्ला के पिता NUJI और UPJA के संस्थापक सदस्य थे। भगवान उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करे। विनम्र श्रद्धांजलि। शनिवार की अपरान्ह भैंसाकुण्ड श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि की गई। उनके ज्येष्ठ पुत्र राजीव शुक्ल ने मुखाग्नि दी। इस दौरान राजधानी के अनेक पत्रकार और उनके परिवारीजन मौजूद थे।

स्व. शुक्ल राजधानी के वरिष्ठतम पत्रकार थे। उन्होंने लखनऊ के अलावा जयपुर, चण्डीगढ़, आगरा और कानपुर में भी पत्रकारिता की। वह पत्रकार संगठन नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स इण्डिया और उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य थे। स्व शुक्ल की जन्म इटावा जिला के अजीतमल में 22 जुलाई 1927 को हुआ था। आपकी स्कूली शिक्षा गांव में ही हुई। तत्पश्चात आपने आगरा, कानपुर में शिक्षा ग्रहण की। आपने पढाई के दौरान छात्र कांग्रेस का भी नेतृत्व किया तथा आप आजादी के आन्दोलन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फोज को भी सहयोग प्रदान करते थे।

शुक्ल ने आगरा के उजाला, कानपुर में दैनिक जागरण, लखनऊ, जयपुर, चण्डीगढ़ और शिमला मेंं हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए पत्रकारिता की। इसके अलावा आप हिन्दुस्थान स्टैंडर्ड से भी लम्बे समय तक जुड़े रहे। आपने लखनऊ से हिन्द आब्जर्वर नामक समाचार पत्र का भी प्रकाशन किया शुक्ल ने स्कूली शिक्षा के साथ ही पत्रकारिता की शुरुआत कर दी थी। आपने 1945 में आगरा से प्रकाशित उजाला हिन्दी दैनिक समाचार पत्र मे उप सम्पादक के रूप में कार्य आरम्भ किया। तदुपरान्त आप 1947 में कानपुर में दैनिक जागरण के उप सम्पादक नियुक्त हुए। आपने हिन्दुस्थान स्टैंडर्ड, हिन्दुस्तान टाइम्स में विशेष संवाददाता और ब्यूरो प्रमुख के रूप में कानपुर, चण्डीगढ़, शिमला, जयपुर और लखनऊ में पत्रकारिता के लिए अतुलनीय योगदान दिया। आपने राजधानी लखनऊ से हिन्द आब्जर्वर नामक समाचार पत्र का भी प्रकाशन किया।

स्व. शुक्ल प्रेस कर्मचारियों और श्रमजीवी पत्रकारों के अधिकारों के लिए भी सदैव तत्पर और संघर्षरत रहे। आपने कानपुर में पत्रकारिता के दौरान कानपुर पत्रकार संघ की सदस्यता ग्रहण की। कानपुर पत्रकार संघ के सदस्य के रूप में आप भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ (आईएफडब्लजे) के सदस्य रहे। तदुपरान्त वैचारिक मतभेद होने के कारण आपने 1965 में उ.प्र.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की नींव डाली। उपजा की स्थापना के लिए आयोजित औपचारिक बैठक आपने अपने निवास पर ही आयोजित करायी। तदुपरान्त 16 मार्च 1966 को ट्रेड यूनियन एक्ट के अन्तर्गत उपजा का पंजीकरण कराया गया। आप उपजा के संस्थापक सदस्य होने के साथ-साथ पत्रकारों की राष्ट्रीय संस्था नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) के भी संस्थापक सदस्य हैं। 23 जनवरी सन् 1972 को एनयूजे की दिल्ली में हुई स्थापना के समय गठित पहली राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आपको उपाध्यक्ष चुना गया था।

पत्रकार सर्वेश कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

न्यूज24 के एसोसिएट प्रोड्यूसर कामता सिंह को जहर देकर और गला घोंटकर मारा गया था!

इसी साल मार्च महीने में न्यूज24 के एसोसिएट प्रोड्यूसर कामता सिंह की रहस्यमय हालात में मौत हो गई थी. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई है उसमें बताया गया है कि उन्हें जहर देकर और गला घोंटकर मारा गया. कामता चैनल से ड्यूटी करके रात 12 बजे सोने चले गए थे. साथ में पत्नी भी सो रही थीं. सुबह छह बजे वे नहीं उठे और न हलचल कर रहे थे. तब पत्नी उन्हें अस्पताल ले गईं. वहां डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. फिलहाल बिसरा रिपोर्ट का आना अभी बाकी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट की खबर हिंदुस्तान अखबार में छपी है, जो इस प्रकार है…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिताजी लालता प्रसाद सिंह का निधन

स्वर्गीय लालता प्रसाद सिंह

अमर उजाला, इंडिया टुडे, चौथी दुनिया समेत कई अखबारों मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिता जी लालता प्रसाद सिंह का मास्को में निधन हो गया. वे 92 वर्ष के थे. उनका काफी समय से इलाज चल रहा था और हर बार वह स्वस्थ होकर घर लौट आते थे. इस बार वह अस्वस्थ हुए तो अस्पताल से वापस नहीं लौट पाए. वह अपने पीछे दो पुत्र और एक पुत्री समेत नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. इन दिनों वह मास्को में अपने छोटे बेटे के यहां रह रहे थे.

शीतल पी. सिंह पिता जी की मृत्यु की खबर सुनते ही मास्को के लिए रवाना हो गए. कल पार्थिव शरीर के साथ वह लोग भारत आएंगे और संभव: परसों अपने गृह जिले सुल्तानपुर पहुंचेंगे. पिता लालता प्रसाद सिंह बेहद उदात्त चेतना के शख्स थे. वे हल्थ सर्विसेज में कार्यरत रहे. रिटायरमेंट के बाद वह सुल्तानपुर जिले के कादीपुर तहसील स्थित अपने गांव सराय कल्यान के निवास करते रहे. साथ ही साथ दिल्ली से लेकर मास्को तक अपने पुत्रों के यहां आते-जाते रहे. उनके निधन पर उनके पुत्र शीतल पी. सिंह और उनको जानने-चाहने वाले पत्रकार असरार खान ने फेसबुक पर जो लिखा वह इस प्रकार है–

Sheetal P Singh : पिता बहुत अस्वस्थ थे। कल शाम (22 सितंबर) उनकी आख़िरी शाम थी! बहुत जुझारू रहे। चार दशक मधुमेह के साथ निकाल गये। कई अस्पतालों को छकाया। छोटे भाई के यहाँ मास्को में थे बीते तीन महीने से। वापसी के दिन ब्रेन स्ट्रोक हुआ। मैं भी पता लगते ही आया। पिछले महीने मिलकर गया ही था।

Asrar Khan : प्रिय साथी शीतल सिंह और अभिन्न मित्र बीपी सिंह के पिता परम आदरणीय श्री लालता प्रसाद सिंह जी अब इस दुनिया में नहीं रहे… इस दुःखद समाचार को सहने की ताकत तो मुझमें नहीं है क्योंकि मेरे भी पिता की तरह थे और विचारों से इतना प्रगतिशील और आधुनिक थे कि सहज ही हम उन्हें मित्र और कामरेड भी समझते थे…. सच तो यह है कि एक साधारण व्यक्ति के रूप में वे एक महात्मा थे जो किसी भी महत्वाकांक्षा से परे विशाल ह्रदय वाले मानवता नैतिकता और उच्च आदर्शों एवं व्यवहार के प्रेरणाश्रोत थे… उनकी कमी कभी पूरी नहीं होगी… इन्हीं शब्दों के साथ मैं अतुलनीय व्यक्तित्व के धनी प्रिय पिता जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह का निधन

Sad news. journalist Arvind Narayan Singh, who had been associated with Nav Bharat Times, Rashtriya Sahara and Hindustan, died at his Indira Nagar, Lucknow residence on Sept. 7, Thursday. RIP

Devesh Singh : वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह हमारे बीच नहीं रहे। आज हम सब के बीच वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह नहीं रहे। प्रातः तकरीबन सवा चार बजे उन्होंने अन्तिम सांस ली। लंबे समय से वह हिपेटाइटिस से जूझ रहे थे। अन्तोगत्वा आज मौत के आगे जिंदगी ने घुटने टेक दिये। यूं तो मीडिया जगत में उनकी लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। हिन्दुस्तान अखबार से अलग होने के बाद वह कुछ बुझे-बुझे से रहने लगे थे। कभी उन्होंने अपने दर्द को बयां नहीं किया।

मीडिया में चंद लोग ही होंगे जिन्हें उनकी बीमारी के बारे में मालूम होगा। इधर काफी समय से उन्होंने गुमनामी की चादर ओढ़ दीनदुनिया से अपने को अलग कर लिया था। आज भी मेरी शादी में नाचते हुए उनका मुस्कराता चेहरा मुझे याद आ रहा है। हिन्दी भाषा पर उनकी गजब की पकड़ थी। पान खाने के वह बेहद शौकीन थे। अरविंद जी कम बोलेते थे। काफी नपी-तुली भाषा का इस्तेमाल करना उनकी आदत में शुमार था।

उन्होंने अपने को हमेशा तड़क भड़क जीवन शैली से अलहदा रखा। सादा जीवन के वह अनुयायी थे। आज जब वह हम सब के बीच नहीं है उनकी हर बात याद आती है। मेरा दुर्भाग्य रहा जो मुझे उनके साथ काम करने का मौका नहीं मिला। फिर भी मैं उनके काफी करीब था। अरविंद जी की एक बेटी है जिसकी मेडिकल की पढ़ाई पूरी हो चुकी है। दुख की इस घड़ी में ईश्वर उनके परिवार को सहन शाक्ति दे। अंतिम या़त्रा आज शाम चार बजे उनके निवास स्थान 15-सी नील बिहार कालोनी सेक्टर-14, इन्दिरानगर से भैंसाकुंड के लिए निकली। इस दौरान काफी संख्या में उनके जानने वाले मौजूद रहे।

लखनऊ के युवा पत्रकार देवेश सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

समाचार सम्पादक विजय विनीत को पितृशोक, मणिकर्णिका घाट पर हुआ अंतिम संस्कार

वाराणसी। ‘जनसंदेश टाइम्स’ के समाचार सम्पादक एवं संपादकीय प्रभारी विजय विनीत के पिता डा. रणवीर सिंह (87) ने शनिवार को अंतिम सांस ली। वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। उनका उपचार एक निजी अस्पताल में चल रहा था। उपचार के दौरान ही उन्होंने आंखें मूंद ली। मूलत: चंदौली जिले के उतरौत निवासी डा. रणवीर सिंह इसी जिले के बबुरी स्थित अशोक इंटर कालेज से प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

इन्होंने फिल्म अभिनेता सुजीत कुमार को भी पढ़ाया था। वे अपने पीछे तीन पुत्र और दो पुत्रियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनको फूलों से बहुत प्यार था। बचपन में इन्होंने बड़ा बाग स्थापित किया था। उनका अंतिम संस्कार रविवार को मणिकर्णिका घाट पर किया गया जहां काफी संख्या में उनको चाहने वाले, जानने वाले मौजूद थे। डा. रणवीर के पिता जगरूप सिंह अंग्रेजों के जमाने में प्राधानाध्यापक थे। दोनों शिक्षाविदों ने चकिया क्षेत्र में बड़ी संख्या में आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर, डॉक्टर और शिक्षक पैदा किए। छात्रों, अभिभावकों और क्षेत्र में इनका काफी मान-सम्मान था।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं.

इस वीडियो को बनाने के बाद वे दिल्ली जाकर एक होटल में रुकते हैं. वहां से गाजियाबाद की तरफ निकलते हैं और एक ट्रेन से कटकर जान दे देते हैं. नीचे दिए गए वीडियो को गौर से देखिए और सुनिए. ये अफसर यूनिवर्स की बात कर रहा है. जीवन के मकसद की बात कर रहा है. शांति और अध्यात्म की बात कर रहा है. अपने स्वभाव और परिजनों के व्यवहार की बात कर रहा है.

यह आईएएस अफसर धरती और यूनिवर्स में मनुष्य के होने की किसी सार्थकता को खारिज करता है. इस दुनिया को खुद के लिए रहने लायक नहीं पाता है. वह खुद को यहां मिसफिट बताता है. भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच का यह अधिकारी अंत में इस नतीजे पर पहुंच जाता है कि आत्महत्या का उसका चुनाव बेहद सही रास्ता है, सबसे उचित तरीका है, सभी समस्याओं-दुखों से निजात पाने का.

मौत को गले लगाना ही एक जीवन के लिए मंजिल नजर आने लगे, वह भी इस नतीजे पर कोई युवा आईएएस अफसर पहुंच जाए, ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले.

श्रद्धांजलि मुकेश पांडेय.

आप जिस भी दुनिया में चले गए हों, वहां आप को अपने स्वभाव के अनुरूप शांति और प्रेम मिले.

आत्महत्या करने से पहले बक्सर के सर्किट हाउस में रिकार्ड किए गए मौत के दर्शन वाला वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बेहतरीन अनुवादक और ब्लागर मनोज पटेल नहीं रहे

Amitaabh Srivastava : बेहतरीन अनुवादक, ब्लॉगर, फेसबुक मित्र मनोज पटेल का यूँ अचानक चले जाना! क्या कहें सिवाय इसके कि जीवन बहुत अनिश्चित है, समय बहुत क्रूर. पुस्तक मेले की मुलाकात याद आयी और मन भर आया. हम जैसों के लिए तो उनके अनुवाद एक नयी दुनिया की खिड़कियों का काम करते थे. उनका ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते पढ़कर ही कई नामों से परिचय हुआ था. बहुत अफ़सोस है मन में, बड़ा मनहूस दिन रहा आज. विनम्र श्रद्धांजलि

Gopal Rathi : दुखभरी खबर… हमारे फेसबुक मित्र द्वय शायर अमर नदीम साहब और दुनिया भर की कविताओं को हिंदी में अनुवादित करने वाले युवा कवि मनोज पटेल के दुखद निधन की खबर अभी अभी फेसबुक के माध्यम से मिली l अपने अपने क्षेत्र की इन सिद्धहस्त हस्तियों का फेसबुक पर हमारा मित्र होना हमारा सौभाग्य रहा l उनसे कभी नही मिला लेकिन उनके जाने पर दुख और वियोग की अनुभूति हो रही है l दोनों मित्रों को लाल सलाम l

Anil Janvijay : दुनिया भर के कवियों की कविताओं को हिन्दी में लाने वाले युवा कवि मनोज पटेल नहीं रहे। बेहद दुख हो रहा है। दिल रो रहा है।

Mridula Shukla : असमय चले जाना एक विलक्षण मनुष्य का, आत्मीय मित्र का शुभकामना लेने की हालत में नहीं हूँ मित्रों। विदा मनोज पटेल।

Arun Dev : मनोज पटेल ने वेब पर साहित्य को अपने परिश्रम और सुरुचि से समृद्ध किया है. वह इस तरह कैसे जा सकते हैं. उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था. समालोचन की तरफ से विनम्र श्रद्धासुमन.

Hemant Krishna : अपने अनुज मनोज पटेल नहीं रहे। ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ थम गया हो। आंखें अश्रुपूरित हो गई हैं। अपूरणीय क्षति। भगवान उनकी आत्मा को शांति और परिवार को सहन शक्ति प्रदान करे।

Pallavi Trivedi : जिस ब्लॉग को पढ़कर विश्व कविता से पहचान कायम हुई और साथ ही Manoj Patel से भी। यूं उनका अचानक चले जाना स्तब्ध कर गया। अब तक यकीन न हो रहा कि मनोज पटेल अब नहीं हैं। उनके ब्लॉग के रूप में वे हमेशा रहेंगे। हम जब भी ब्लॉग पर जाएंगे,वे वहीं मिलेंगे। विदा दोस्त … बहुत याद आओगे।

Ghanshyam Bharti : साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र और जिले की माटी के लाल मनोज पटेल का चुपके से जाना वास्तव में आत्मिक रूप से झकझोर देने वाली एक बड़ी घटना है। ऐसे में उस्ताद शायर मरहूम इरफान जलालपुरी की यह पंक्तियां बरबस ही याद आ रही हैं — “ओढ़कर मिट्टी की चादर बेनिशां हो जाएंगे, एक दिन आएगा हम भी दास्तां हो जाएंगे”

Hafeez kidwai : कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ…न मिलते है, न साथ चाय पीते हैं, न लड़ते हैं, न बहस होती है यहाँ तक बात भी तो नही होती है।फिर जब वह चले जाते हैं तो ज़िन्दगी में खालीपन सा क्यों आ जाता है। ऐसा कैसे लगता है की दिल के अंदर कोई फाँस सी लग गई हो। फेसबुक पर ऊपर नीचे ऊँगली चलाते कितने दोस्त पन्नों की तरह पलटते जाते हैं। कितनों के नाम तो कितनों की तस्वीर तो कितनों के अल्फ़ाज़ ज़बरदस्ती दिमाग में पालथी मारकर बैठ जाते हैं। जब यह उठकर जाने लगते हैं तो इनकी होशियारी तो देखिये, पूरा दिल ओ दिमाग साथ ले जाने लगते हैं। जाते जाते सूखी आँखों को लबालब भरे तालाब में बदल यह पलट कर भी नही देखते। मनोज पटेल चुपके से चले गए। सच कहें जो उनके अल्फाज़ो की चादर ओढ़ रात में सोया था, लगा कोई एक झटके में छीन ले गया। यह भी कितना अजीब है की बिला ज़रूरत वह चादर खुद बखुद उढ़ गई और खुद बखुद उड़ भी गई। मगर जब यह चादर हटी तो लगा की बचा ही क्या है अब हमारे पास। अजब दर्द के मारे हम, पता नही कहाँ से मनोज पटेल के अल्फ़ाज़ टकरा गए और हमारे इर्द गिर्द फैल गए, क्या पता की रात की एक करवट से यह लफ़्ज़ टूट जाएँगे और इनके टूटने की आवाज़ भी न सुनाई देगी। आज मनोज ने दिल को ऐसा झटका दिया है कि मेरे पास आने वाले अल्फ़ाज़ मुँह बाए खड़े हैं और कह रहें हैं कि अगर तुम ज़िंदा रहो तो चौखट पर आएं वरना कहो तो यहीं से अलविदा। पता नहीं, मैं कुछ कह नहीं सकता, जब तक मैं मनोज को अलविदा बोलकर आता हूँ तब तक मेरा इंतज़ार करना.

सौजन्य : फेसबुक

मनोज पटेल के नीचे दिए गए ब्लाग पर जाकर आप उनकी अनूदित रचनाओं को पढ़-जान सकते हैं :

‘पढ़ते-पढ़ते’ ब्लाग : मनोज पटेल

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नवगछिया के वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार झा उर्फ सुनील झा नहीं रहे

शुक्रवार को चार बजे सुबह पटना के आईजीआईएमएस में ली अंतिम सांस… बिहार के भागलपुर जिले के बिहपुर के दयालपुर ग्राम के निवासी सुनील कुमार झा का शुक्रवार को पटना के आईजीआईएमएस में इलाज के दौरान निधन हो गया. वे कैंसर से पीड़ित थे. कुछ दिनों पूर्व जब उन्हें परेशानी हुई तो उन्हें इलाज के लिए भागलपुर के जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया था. उन्होंने अन्न जल लेना पूरी तरह से बंद कर दिया था.

भागलपुर में सुधार नहीं होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान रेफर किया गया. लेकिन यहां भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ. शुक्रवार को सुबह चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके पार्थिव शरीर को दोपहर बाद तक उनके पैतृक आवास पर लाया गया. शनिवार को उनका दाह संस्कार किया गया. सुनील कुमार झा उर्फ सुनील दा करीब 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय थे. उन्होंने पटना व भागलपुर से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान, नई बात और दैनिक भास्कर में बिहपुर से कार्य किया. वे बिहपुर के पहले पत्रकार थे.

वे नवगछिया व्यवहार न्यायालय में अधिवक्ता भी थे. उनके निधन पर बड़े भाई विनोद कुमार, दिलीप कुमार झा, गोपी कृष्ण झा, मां गायत्री देवी गहरे सदमे में हैं. सुनील झा बेबाक और स्पष्टवादी पत्रकार के रूप में पूरे नवगछिया अनुमंडल में जाने जाते थे. वे प्रखर वक्ता भी थे. किसी मंच से उनका संबोधन श्रोताओं को ताली बजाने को मजबूर कर देता था. सुनील झा का स्कूली जीवन तुलसीपुर हाई स्कूल में बीता. वे यहां छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते थे. फिर उन्होंने अंग्रेजी भाषा से एमए किया और एलएलबी भी किया. सुनील झा के निधन पर नवगछिया अनुमंडल के पत्रकार शोक संतप्त हैं. पत्रकारों ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वेद उनियाल यानि एक ‘संघर्ष’ का ‘संघर्षमय’ अंत…

Yogesh Bhatt : एक ‘संघर्ष’ का ‘संघर्षमय’ अंत. आज की पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो वेद भाई (वेद उनियाल) के नाम से परिचित होंगे। वेद भाई संघर्ष का वो नाम है , जो जिया भी संघर्ष में और विदा भी संघर्ष करते करते हुआ। वेद उनियाल उत्तराखंड राज्य आंदोलन का वो नाम है, जिसने इस आंदोलन को उम्र भर जिया। न कोई कारोबार, न कोई सियासत, न कोई रोजगार, सिर्फ और सिर्फ संघर्ष। राज्य आंदोलन के दौर में वह सिर्फ प्रथम पंक्ति के योद्धा ही नहीं, बल्कि चिंतक, विचारक और प्रमुख रणनीतिकार भी रहे। अस्सी-नब्बे के दशक के दौरान जनांदोलनों, जन सरोकारों से जुड़े लोग बखूबी वेद उनियाल से वाकिफ हैं।

वेद उनियाल मूलत: हार्डकोर वामपंथी थे ,नक्सली धारा के छात्र नेता भी रहे। देहरादून डीएवी कालेज के छात्रसंघ महासचिव के रूप में उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई। इसके बाद चाहे शिक्षा का आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो, रोजगार आंदोलन हो या फिर जनसरोकारों से जुड़ी कोई भी लड़ाई, शायद ही कोई ऐसा आंदोलन रहा हो , जिसमें उनकी भूमिका न रही हो। राज्य आंदोलन के दौर में जब राजनीतिक विचारधारा का सवाल उठा, तो वेद भाई ने क्षेत्रीय दल को तरजीह देते हुए यूकेडी को चुना और उसके शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहे।

अनगिनत आंदोलन, भूखहड़ताल, जेल और पुलिसिया दमन, ये सब वेद भाई के जीवन संघर्ष का अभिन्न हिस्सा रहे। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह कभी भी सुविधाभोगी और अवसरवादी नहीं रहे। आंदोलन के दौर में ही वे गंभीर रूप से गठिया के शिकार हो गए , लेकिन बावजूद इसके उनका संघर्ष बरकरार रहा। उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तब गैर कांग्रेसी-गैर भाजपाई मोर्चा बनाने का जिम्मा उनके ही पास था। इतना ही नहीं उत्तराखंड क्रांति दल का राजनीतिक घोषणा पत्र बनाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती थी। निसंदेह वेद भाई जैसे जीवट, ओजस्वी और प्रखर आंदोलनकारी तेवर वाला जज्बा हर एक में नजर नहीं आ सकता। ये उनकी जीवटता ही थी कि दो दशक तक उन्होंने एक गंभीर रोग का डटकर मुकाबला किया।

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिस उत्तराखंड के लिए उन्होंने सब कुछ दांव पर रखा, वो उत्तराखंड, और सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि उनके आंदोलन के दौर के साथी तक न तो उनके संघर्ष को मान्यता दिला सके और न ही आंदोलनकारी के रूप में उचित सम्मान। अपने जीवन का अंतिम सोपान वेद भाई ने बेहद कठिनाई से जिया। एक तरफ बीमारी, दूसरी तरफ आर्थिक तंगी और इसी दौरान पुत्र शोक का वज्रपात उन्हें झेलना पड़ा। चंद गिने-चुने लोग ही रहे होंगे जिन्होंने कठिन वक्त में वेद भाई की सुध ली होगी। दुभाग्यपूर्ण तो यह था कि उनके अंतिम संस्कार के दौरान चंद आंदोलनकारी चेहरे, कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी ही शामिल रहे।

वेद भाई के जाने के बाद आज सरकारों पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार को दोष दिया जा रहा है कि उसने एक राज्य आंदोलनकारी नेता के लिए कुछ नहीं किया। यह बात बिल्कुल सही है, लेकिन यह भी सच है कि दोष सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि उन आंदोलनकारी शक्तियों का भी है, जो आज अपनी ही हैसियत खो बैठे हैं। निसंदेह यदि वेद भाई भाजपा या कांग्रेस में होते, तो शायद स्थिति कुछ अलग होती। मगर जब राज्य बनने के बाद सत्ता की मलाई चाटने वाली तमाम संघर्षशील ताकतों ने ही उनकी सुध नहीं ली, तो फिर सरकार से उम्मीद ही क्या की जाती? वैसे भी मौजूदा दौर में न तो आंदोलनकारियों की कोई हैसियत है और न उनके संघर्ष को कोई मान्यता।काश, वेद भाई की अंतिम यात्रा से ही सही आंदोलनकारी ताकतें (अगर कहीं बची हैं तो) कुछ सबक ले पातीं।

पत्रकार योगेश भट्ट की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Subhash Sharma आर्थिक तंगी तो वेद भाई ने आजीवन झेली । फ़िर हर हाल में खुश रहना और राज्य की चिंता करना तो उनकी आदत में शुमार हो गया था । दो वर्ष पूर्व उनके एक मात्र पुत्र की मृत्यु तो, उनके साथ ज्यादती ही थी । परेशानियों की इंतेहा हो गयी थी । राज्य आंदोलन को गति देने के लिये उन्होंने लगभग 16 दिनो (या शायद उससे ज्यादा) की भूख हड़ताल की, तो वो भी पूरी ईमानदारी से । जिन पुलिस अधिकारी ने प्रशासन के आदेश पर उनकी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिये उनको जबरन गोद में उठा कर अस्पताल में पहुँचाया था, उन्होंने मुझे बताया था कि, सूख कर हड्डियों का ढाँचा रह गये थे वेद भाई ! इसी भूख हड़ताल ने उनके लीवर, उनका नर्वस सिस्टम बहुत ज्यादा डेमेज कर दिया था । यही बीमारी बढ़ती गयी और धीरे धीरे उनके शरीर के अधिकाँश हिस्सों को प्रभावित करती चली गयी । हाँ, मस्तिष्क से वे पूरी तरह स्वस्थ थे । आदरणीय भाभीजी ने जिस तरह वेद भाई का साथ निभाया, वो तो अनुकरणीय है ही । परन्तु ओमी भाई ने भी वेद भाई का साथ बहुत ही ईमानदारी से निभाया । उनके इस तरह जाने का बहुत दुख है, पर नियति के आगे किसी का वश नहीँ । वेद भाई का फ़िर से क्रान्तिकारी अभिवादन।

Suresh Belwal भगवान वेद भाई की पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करे । कुछ व्यक्ति शायद मानव कल्याण के लिए ही पैदा होते हैं और अपना काम करके चले जाते हैं । ऐसे दधीचि को मेरा प्रणाम।

Sarswati P Sati वेद भाई का जाना संघर्षों के एक इतिहास की पुस्तक का गुम हो जाना जैसा है। अफ़्सोश यह प्रांत उनके लायक न बन पाया

Ganesh Kothari जिसने भी राज्य की चिंता की ..वो ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से तन्ग ही हैँ और ज़िसने कुछ भी नहीं किया वो मौज में …वाह रे उत्तराखंड की प्रबुद्ध और जागरुक जनता …

Prabhat Dhyani श्रद्वांजलि। उत्तराखण्ड़ राज्य निर्माण का सपना देखने वाले तथा उस सपने को हकीकत में साकार करने के लिये अपने सर्वस्व को झोंक देने वाले बड़े भाई वेद उनियाल जी का निधन उन तमाम साथियों के लिये बड़ी क्षति है जो समय-समय पर उनका मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे।तथा उनसे प्रेरणा लेते थे। साथियों से निवेदन है कि वेद भाई उत्तराखण्ड़ राज्य निर्माण के बाद हुयी प्रदेश में मची लूट तथा राज्य अवधारणा को दरकिनार करने से बहुत दुःखी व मायूश थे। वे इस बात को लेकर भी साथियों से बहुत ज्यादा निराश थे कि प्रदेश में मजबूत क्षेत्रीय विकल्प नहीं बन पाया जिसके कारण राज्य विरोधी ताकतें मजबूत होती गयी। उनके निधन पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्वांजलि यही होगी कि हम उस विचार व संकल्प को पूरी प्रतिबद्वता के साथ साकार करें।

Rajeev Uniyal हार्दिक अश्रुपूर्ण नमन मैंने वेद भाई को नजदीक से देखा है सदैव ऊर्जा से ओतप्रोत रहते थे और एक सुनहरे भविष्य का सपना उनकी आंखों में रहता था दुखद है कि सरकार और समाज दोनों ही ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया वैसे वेद भाई किसी सम्मान व मान की परवाह करते भी नहीं थे और सदैव संघर्षशील रहते थे

Dhirendra Kumar Uniyal भगवान वेद भाई कि आत्मा को शांति प्रदान करे ॥ सभी निकट जनो को धैर्य व साहस प्रदान करे ॥ सच्चे आंदोलनकर्ता किसी के मोहताज नहीं होते वो सबके दिलो मे होते हैं चाहे वो बाबा उत्तराखण्डी हों , चाहे बाबा बमराडा हों , चाहे श्रीदेव सुमन हों ॥ स्वार्थ वस सब श्रद्धाजंलि व माल्यापर्ण तक हीं सीमित रहते हैं जबकि हमे उनके आदर्शों पर चलकर उनके सपनों को साकार करना पडेगा जिसके लिये हम कटिबद्ध हैं ॥

Arya Surendra सच लिखा, अच्छा लिखा। पोस्ट में उठाया गया सवाल न तो सरकार और न ही किसी भी संगठन को कठघरे में खड़ा करता है। यह सामाजिक संवेदना का विषय है। इस स्तर पर पूरे समाज मे हो रहे क्षरण पर हमारा ध्यान नहीं जाता। ज्यादातर आंदोलन, संघर्ष और हड़ताले एक छोटे वर्ग के हित लाभ से जुड़े एजेंडे पर राजनीतिक उद्देश्य से होते हैं इसलिए उस एजेंडे/संघर्ष और उसके नेतृत्व से बड़े समाज का कोई भावात्मक लगाव नहीं रहता जो बाद में उसके व्यवहार में उदासीनता के रूप में दिखाई देता है।

Amitabh Srivastava He was always ready with answers for every question we asked him. The more difficult the problem the brighter his solution. But unfortunately he had no answers about his own life’s problems. RIP.

Geeta Ram Gaur इस महान संघर्षशील व्यक्तित्व को दिल से भावनात्मक श्रद्धांजलि ईश्वर इन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें , भाई जी आपके इस लेख ने उनसे जुडे लोगों को आईना दिखाने का काम किया है और आत्म अवलोकन करने पर मजबुर कर दिया है , साथ ही आपने सच्ची श्रदांजलि लेख के माध्यम से भी दी है_ॐ शांति -3
Dataram Chamoli भट्ट जी आपने सही कहा कि आंदोलनकारी ताकतें (अगर कहीं बची हैं तो) कुछ सबक लें। सवाल अकेले वेद उनियाल जी का नहीं है। इससे पहले स्वर्गीय बी. एस. परमार उत्तराखंडी के अंतिम दिन भी बहुत खराब रहे। इलाज और रोटी के लिए वे मोहताज रहे। अफसोस कि उक्रांद के काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट, पुष्पेश त्रिपाठी जैसे साधन संपन्न नेताओं ने उनका हाल जानने की जरूरत तक नहीं समझी थी। खैर, हम आम लोग तो यही प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर वेद जी की आत्मा को शांति प्रदान करे।

Ashish Uniyal योगेश भाई आपका लेख लुंजपुंज होती संवेदनाओं को कितना झकझोर पाएंगा, यह तो नहीं बताया जा सकता लेकिन आपके दिखाए इस दर्पण में आंदोलनकारी ताकतों को अपना चेहरा अवश्य देखना चाहिये!

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूपी में खनन माफिया ने अमर उजाला के पत्रकार को कुचल कर मार डाला, अखबारों ने लिखा दुर्घटना में मौत

खनन माफिया के शिकार अमर उजाला के पत्रकार मिंटू मिश्रा

एक और कलम के सिपाही की निर्मम हत्या कर दी गई. खनन माफिया ने बेहजम (लखीमपुर खीरी) के अमर उजाला के पत्रकार मिंटू मिश्रा की शाम होते ही भरे चौराहे पर टैक्टर टाली से कुचल दिया. इससे उनकी मौके पर ही मौत हो गयी. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अखबारों ने पत्रकार की हत्या को दुर्घटना में मौत बताकर छापा. इससे साथी पत्रकारों में आक्रोश है. पुलिस ने भी दुर्घटना का मुकदमा दर्ज किया है. हत्या के दो घंटे बाद मौके पर पहुंची थी पुलिस. आक्रोशित लोगों ने लखीमपुर मैगल गंज मार्ग जाम कर अपना विरोध प्रकट किया.

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में हुई पत्रकार की मौत अखबारों की सुर्खी बना. लेकिन इन सुर्खियों में कहीं भी उसकी हत्या का उल्लेख नहीं था. किसी अखबार ने उसे अपना पत्रकार मानकर उसकी हत्या का उल्लेख करना मुनासिब नहीं समझा. नतीजन मामले को दबाने के प्रयास तेज हो गए. लखीमपुर खीरी जिले में बेख़ौफ़ खनन माफिया ने एक पत्रकार की ट्रैक्टर ट्राली से कुचलवा कर के निर्मम हत्या करा दी. वही चंद कदमों की दूरी पर बनी पुलिस चौकी ने घटना की जानकारी होने के बावजूद भी घटना स्थल पर पहुंचना मुनासिब नहीं समझा.

थाना नीमगाँव के बेहजम कस्बा निवासी पत्रकार शैलेंद्र मिश्र उर्फ़ मिंटू रोज की तरह शाम करीब सात बजे अपने घर से निकल कर के इलाहाबाद बैंक के पास चौराहे पर पान की दुकान के पास खड़े थे. तब तक तेज़ रफ़्तार से उलटे हाथ पर आ रहे ट्रैक्टर ने शैलेंद्र मिश्र को टक्कर मार दी जिससे शैलेंद्र की घटना स्थल पर ही मौत हो गयी. घटना की जानकारी होते ही लोगों की भीड़ जुटने लगी. लेकिन घटना स्थल से पांच सौ मीटर की दूरी पर बनी पुलिस चौकी ने घटना की जानकारी होने के दो घण्टे बाद भी मौके पर पहुंचना जरूरी नहीं समझा. इस बात से मृतक पत्रकार के परिजनों ने आक्रोशित होकर शव को रोड पर रख कर जाम लगा दिया. जाम लगते ही प्रशासन के हाँथ पाँव फूलने लगे, लेकिन पत्रकार के परिवार को न्याय नहीं मिला।

दरअसल खनन माफिया बड़े पैमाने पर अवैध खनन करता है. दिखाएंगे अगर एक ट्राली तो खनन करते थे कई ट्राली. जब इस पर पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए तैयार हुआ तो उसे धमकी मिली. इसकी उसने शिकायत भी दर्ज कराई. इसके बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई और उसे ट्राली ने रौंद दिया. परिवारीजनों ने शव वहां से हटाने से मना कर दिया क्योंकि वह हत्या का मामला दर्ज कराने के लिए प्रयास कर रहे थे. अब खनन में खनन माफिया, नेता, अधिकारी सब सवालों के घेरे में हैं. परिवार वाले हत्या कह रहे हैं और अधिकारी इसे दुर्घटना कह रहे हैं. स्वयं एस डी एम पर तहरीर बदलवाने के आरोप लग रहे हैं.

पत्रकार हत्या की घटना को छिपाने व खनन माफिया रियासत को बचाने के लिए दो बार तहरीर बदलवाई गयी. इसका खुलासा तब हुवा जब उनके परिवार वालों से बात की गई. मृतक पत्रकार के भाई शिशु मिश्र ने बताया कि एसडीएम व थानेदार ने कहा कि मुकदमा लड़ते फिरोगे,  दुर्घटना लिखवाओगे तो कुछ क्लेम मिल जायेगा. कुछ टीवी चैनलों ने इसे हत्या कहकर रिपोर्ट चलाई. कुछ पत्रकार संगठन भी मैदान में कूदते नजर आ रहे हैं. इस मुद्दे पर अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति ने रात को आपात बैठक भी बुलाई.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

पत्रकार रामजी मिश्र ‘मित्र’ की रिपोर्ट. संपर्क : ramji3789@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुम्बई के जाने माने प्रेस फोटोग्राफर राजू उपाध्याय का दुर्घटना में निधन

मुम्बई के जाने माने फ़िल्म प्रेस फोटोग्राफर राजू उपाध्याय का वाराणसी से सटे गोपीगंज थाना इलाके के छतमी में एक ट्रक से हुई दुर्घटना में गुरुवार की सुबह निधन हो गया। वो मूलतः भदोही जिले के रहने वाले थे। वो सोमवार को भदोही आए थे। उनकी पत्नी यहां सीतामढ़ी में शिक्षिका हैं। हादसे के वक्त राजू सीतामढ़ी स्थित आवास से दवा लेने के लिए बाइक द्वारा गोपीगंज बाजार जा रहे थे।

अपने घर से वो थोड़ी ही दूर आगे बढ़े थे कि एक ट्रक ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। घटना के बाद चालक ट्रक के साथ फरार होने की कोशिश में था लेकिन पुलिस ने दबोच लिया। उनके निधन की खबर मिलते ही मुम्बई के फ़िल्म पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गयी। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार मिथलेश सिन्हा ने राजू उपाध्याय के निधन पर शोक जताया है। राजू उपाध्याय का बॉलीवुड में कभी सिक्का चलता था। अपने समय की बॉलीवुड पत्रिकाएं फ़िल्म फेयर, मूवी, माधुरी आदि में उनकी क्लिक की हुई तस्वीरें खूब छपती थीं।

वे अपने जमाने के सितारे दिलीप कुमार, राजकपूर सहित अमिताभ बच्चन के काफी लाडले थे। हाल ही में उन्हें शाहरुख खान ने एक कैमरा भी उपहार में दिया था। बताते हैं कि राजू उपाध्याय आमिर खान के भी काफी करीबी थे और आमिर अपने साथ किसी भी कार्यक्रम में राजू उपाध्याय को जरूर ले जाते थे। मुम्बई के चेम्बूर में रहने वाले राजू उपाध्याय इन दिनों अपने गांव गए थे जहां यह दुर्घटना हुई।

उन्हें हाल में ही दादासाहेब फॉल्के एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। राजू उपाध्याय के निधन पर चैम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट ने गहरा शोक जताया है। चैम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट के अध्यक्ष इंद्र मोहन पन्नू, उपाध्यक्ष अतुल मोहन ने राजू उपाध्याय के निधन पर गहरा दुख जताते हुए उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार
मुंबई
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पठानिया जी का अंतिम संदेश- ”जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती”

भला ऐसे भी कोई जाता है… : जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती। मेरे व्हाट्सएप पर वरिष्ठ पत्रकार पठानिया जी का अंतिम संदेश यही था। पत्रकारिता में अपना जीवन खपा देने वाले बड़े भाई समान मित्र राकेश पठानिया अंतिम समय में मुझे याद करते रहे। (जैसा पारिवारिक सदस्यों ने आज अल सुबह बताया)। पता नहीं दोस्ती के कई कर्ज चुकाने बाकी रह गए।

जीवन सच में अनमोल है। आपके लिए खुद की जि़ंदगी न जाने क्या महत्व रखती है, लेकिन परिवार के लिए आप ही जि़ंदगी हो। यह वक्त न तो किसी तरह के वाद-विवाद का है और न ही इस असमय मृत्यु के कारणों की पड़ताल का। हम सबका फर्ज यह है कि हम पठानिया जी के परिवार की ऐसी क्या मदद करें कि उनका आगे का जीवन आसानी से कट सके। दोस्तों! पठानिया जी की पहचान एक कर्मठ पत्रकार के रूप में रही। पत्रकारिता के अलावा उनका कोई अतिरिक्त व्यवसाय नहीं रहा। धर्मपत्नी गृहिणी हैं, जबकि दो बच्चे अभी छोटी कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

मैं दिल से आभारी हूँ धर्मशाला के प्रतिष्ठित व्यवसायी एवम दिवंगत पठानिया जी के मित्र श्री मुन्नू ठाकुर जी का जो संकट की इस घड़ी में पांच लाख की आर्थिक सहायता के साथ सामने आए हैं। वहीं नूरपुर के पूर्व विधायक श्री राकेश पठानिया ने दिवंगत पत्रकार राकेश पठानिया जी के एक बच्चे की शिक्षा का पूरा खर्च वहन करने की बात कही है। उम्मीद है दैनिक जागरण संस्थान उन्हें समुचित मुआवज़ा प्रदान करेगा। हमसे जो हर संभव मदद होगी, उसके लिए हम तैयार हैं।

पत्रकार शशिभूषण पुरोहित की फेसबुक वॉल से. 

जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर

etv वाले मृत्युंजय की फेसबुक पोस्ट ने आज मझे सुबह सवेरे बुरी तरह झटक दिया था। पोस्ट में कांगड़ा जिले में पत्रकारिता के सूरमा और जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर मिल गयी। मृत्युंजय ने पत्रकार समाज को हुयी इस बड़ी क्षति की सूचना देकर अपना धर्म निभाया लेकिन राकेश पठानिया जैसे पत्रकारिता के ‘वीर पुरुष’ को मौत यूँ घेरकर निगल लेगी यह सब यकीं करना मुश्किल हो रहा था। तब फेसबुक पर कई पोस्टों ने तेज़ी पकड़ी तो बीसियों बार पढ़ पढ़कर भी दिल को दिन भर दिलासे देने जुटा रहा क़ि नहीं यह कैसे हो सकता है! लेकिन यह सच था क़ि शान ए धर्मशाला हमारे बड़े भाई राकेश पठानिया अब नहीं रहे थे। फट से जागरण में फोन घुमाया तो पुराने मित्रों ने बताया क़ि हाँ यह सही है लेकिन सब अचानक।हुआ है। पिछली शाम तक ठीक थे। दिनेश कटोच ने ही इन मेरे जागरण वाले मित्र को भी बताया था क़ि पठानिया अब ठीक हैं। शुक्रवार को तो पठानिया ने जागरण में भी खुद ही बताया था क़ि अब उन्हें लग रहा है क़ि वह ठीक हो जाएंगे। मतलब सब सामान्य था। मगर शनिवार की रात पठानिया के जीवन के लिए एक ऐसी घुप अँधेरी रात साबित हो गयी थी क़ि जिसका कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था। बताया गया क़ि टांडा मेडिकल कॉलेज में केमोथेरापि के बाद शनिवार को उनकी तबियत आधी रात के बाद एकाएक ऐसी बिगड़ी क़ि थामी नहीं जा सकी। दिन भर मित्रों से चर्चा करता रहा पठानिया की। कइयों ने अपने अपने अनुभव बांटे।

अभी रात सामने आ गयी। अब सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन आँखों के आगे से भाई पठानिया की सूरत-सीरत हटने का नाम नहीं ले रही थी तो सोचा क़ि क्यों न श्र्द्धांजलि के कुछ शब्द उन्हें मैं भी समर्पित कर दूँ। राकेश पठानिया सचमुच पूरी तरह।से पत्रकारिता को ही समर्पित थे। पहले कभी जनसत्ता तो फिर उसके बाद दैनिक जागरण। जागरण के लिए उन्होंने बतौर पत्रकार ही नही बल्कि एक अभिभावक की भूमिका भी निभायी। प्रेस स्थापित करने से लेकर अखबार के हर खरे बुरे के चिंतक और किसी भी संकट के दौर में बेहतरीन व्यवस्थापक। यूँ तो वह बड़े अंतर्मुखी थे।लेकिन कभी कभी घुटन से बचने के लिए दिल की बातें साझी भी कर लिया करते थे। वह एक सरल सकारत्मक व्यक्तितव के धनि थे। बुरा करने से बचते थे और ऐसी ही सलाह भी दूसरों को दिया करते थे। पत्रकारिता में भिड़न्त और सींगबाज़ी इन्हें पसंद नहीं थी।

उन्हें मैंने ऐसे महसूस किया कई बार क़ि वह समाज में सभी पक्षों के पैरोकार थे। पत्रकारिता से वह सब नहीं जिससे किसी भी पक्ष को क्षति हो। खिलाफ खबर भी लिखेंगे लेकिन शब्द शिष्टता और शब्द संयम पर पूरा जोर। मैंने उन्हें एक टीम लीडर के रूप में कई बार बढ़िया काम करते हुए देखा। वह किसी को नाराज करने के पक्ष में कभी नहीं रहते। टीम में सभी को प्यार से और कम संसाधनों की स्थिति में अपना बेहतर देने की सदा प्रेरणा देने की उनके प्रयासों को हम कई बार देखते और महसूस करते थे। यह उनके व्यक्तितव का ही करिश्मा था क़ि जागरण के संजय गुप्ता इन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे और इन पर हर मामले में भरोषा करते थे। तात्कालिक मुख्य महा प्रबन्धक निशिकांत ठाकुर हिमाचल के तमाम बड़े निर्णय पठानिया से ही मशविरे के बाद लेते थे। उनसे जुडी कई स्मृतियाँ जेहन में उछल कूद-भागमभाग कर रही है और दिल-दिमाग को बेचैन कर रही हैं। भाई आपको हमेशा याद रखेंगे और आपका वो फोन उठाते ही जुबां से निकलने वाला ‘जय देया महाराज’।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश्वर ठाकुर की फेसबुक वॉल से.

(स्व. राकेश पठानिया)

बड़का चली आ…

मैं जागरण आफिस छोटे पाउ नवनीत  कन्ने मिलना गया तां ओहथु बड़का ओरां दुस्सी पे। मैं पैरीं हत्थ लाये तां बड़के गले ने लाई ल्या। पूछ्या अज कतां?  मैं ल्या अज तुहां सोगी मिलना आई गया, बड़का बड़ा खुस, शीशे पार नवनीत हल्की स्माइल दई ने दुरे ते हाल चाल पुछि ल्या। बड़के चा मंगाई लई,गप्प छप चली,बड़के कताबा ताई कई सुझाब दई पाए। कुछ ईजा करना कुछ उंझा। मिंझो पता हा बड़का ठीक नी ए, पर बड़के कुछ बी शो नी होना दित्ता, फेस पर से नेचुरल रौनक नी थी पर बड़का पूरा जोर लाये की कुछ भी शो न होय। जेलु में एचपीसीए दे भ्रष्टाचार दे खिलाफ मामला चकया तां बड़के बड़ी मदद कित्ती। प्रेस क्लब दे पचां धूप्पा च कुर्सी लाई ने बड़के ते सलाह लेनी। बड़के वाल बड्डा आरी एक्सपीरियंस था।

बड़का गर्मजोशी ने मिलदा था पर सलाई दिन्दी बारी बड़ा गंभीर। ए मत करदे,से करी लेना। मैं तिन की साल पहले शिमले आई रया तां मुलाकात घटी गई। विच पाकिस्तान दे मैचे खिलाफ जेलु मैं मुहिम चलाई तां बड़का बड़ा खुस पर बमारिया दी बजा ने बेशक बड़का डोन होना शुरू होई आ था पर खबर से दई कड़क इ लिखनी। मैं पूछ्या बड़का अजकल सुझदे नी, बोल्या अजकल यरा मेरे ते दौड़ पज्ज नी हुंदी तां एथि डेस्क पर ठीक रहन्दा। नवनीत कन्ने मिलला तां नवनीते गलाया बड़के दा जिंदगी भर दा एक्सपीरियंस अजकल अहाँ दे कम्मे ओ दा। एथि बड़के जो कोई टेंशन ब नी ए। बमारी ते तंग होई बड़के रिजाइन करना लाया हा तां नवनीते रिक्वेस्ट कित्ती तुहां टेंशन मत ल्या।

जागरण आफिस आई ने जे दिल करे से करा, जेलु दिल करे तेलु आ कन्ने जा। भाई, इन्हा दे ओने ने सांझो सबनी जो बड़ा कुछ सिखने जो मिलदा, नवनीत दी सेंसटिविटी मिंझो कॉलज टेमे ते पता थी हुन तां वैसे बी नवनीत काफी मैच्योर है उन्नी इकी तीरे ने दो निशाने लाये। बड़का बी अडजस्ट कन्ने बड़के दे एक्सपीरियंस दा फायदा उपरे ते बड़के दा दिल भी ओर ओई जाँदा। कल पता लग्गा बड़का अपना एक्सपीरियंस जागरण आफिस बंडी ने पता नी कतां जाई रया। हुन बड़के दी सकल नी सुजनी बस,ख़बरां च बड़के दी झलक सुजनी जेडी बड़के वाकियों जो बंडी। बड़के दी कमी कदी पूरी नी ओई सकदी। भगवान बड़के दी आत्मा जो शांति दें। जय हिंद

-विनय शर्मा
डिप्टी एडवोकेट जनरल
हिमाचल सरकार

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नहीं रहे धर्मशाला के वरिष्ठ पत्रकार राकेश पठानिया

(स्व. राकेश पठानिया)

एक कलमकार की मौत और सौ सवाल : कहने को तो अब हिमाचल प्रदेश का शहर धर्मशाला प्रदेश की दूसरी राजधानी है और स्मार्ट सीटी भी बनने जा रही है, मगर आज से दो दशक पहले भी धर्मशाला की प्रदेश की राजनीति में काफी अहमियत थी। तब की पत्रकारिता आज के दौर से कहीं अलग और काफी मुश्किल भरा टास्क थी। कुछ गिनी चुनीं अखबारें प्रदेश के बाहर से छपकर आती थीं और इनके पत्रकारों के तौर पर घाघ लोगों का कब्जा था। किसी नए खबरनवीस के लिए अखबार में जगह तलाशना कोयले के खान में हीरा तलाशने जैसा मुश्किल काम था। सीनियर भी ऐसे थे, जो उस समय के दौर में मिलने वाली तबज्जों और आवभगत के चलते किसी को करीब फटकने नहीं देते थे, और शागिर्द की बात करें तो ऐसा सांप सूंघ जाता था कि मानो वह एकलव्य बनकर उनके लक्ष्य को भेदने को तैयार हो।

ऐसे ही दौर में कुछ अच्छे लोगों की अंगुली पकड़ कर एक दुबले पतले लड़के ने भी कलम को हथियार बनाकर एक लक्ष्य निर्धारित किया। तब पत्रकार बनने के लिए तनख्वाह की सोचना तो दूर की बात खबर भेजने तक के लिए जेब ढिली करनी पड़ती थी। वो समय ऐसा था जब पत्रकारिता का जुनून जिसके सिर पर चढ़ता, वो वेतन की परवाह किए बिना खुद की जेब से भी खर्चा करके पत्रकार बनना चाहता था। पत्रकार भी वही बनते जो फक्कड़पन की परवाह किए बिना अपनी खबर के प्रकाशित होने पर अपना सीना चौड़ा किए संतोष के साथ शान से जीते थे। तब जनसत्ता जैसी व्यवस्था से लडऩे वाली अखबार का साथ मिलना किसी सपने के साकार होने जैसा ही था।

ऐसे ही दौर में कलम थामने वाला यह पतला दुबला युवक था राकेश पठानिया। पत्रकारिता के शोक या कहें जुनून ने उसके सामान्य से व्यक्तित्व को तराशने के साथ-साथ कुछ ऐब भी दे दिए। लगातार धूम्रपान करना और जमकर शराब पीने की लत एक दाग की तरह थी। शायद यही लत इस कलमकार को हम सब से दूर ले जाने वाली थी। या कहें कि उसका शांत स्वभाव और गुस्से व रोष को अंदर ही दबाए रखने की कला उसे अंदर से खोखला कर सकती थी। ये सब बातें इसलिए कर रहा हूं कि रविवार को गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह-सुबह उठते ही राकेश पठानिया की असमय मृत्यु का दहलाने वाला समाचार मिला। सिर्फ मैं ही नहीं उन्हें जानने व उनके साथ उठने बैठने वाला हर इनसान सकते में था। यह बात तो हर कोई जानता था कि राकेश पठानिया की तबीयत ठीक नहीं चल रही है और काफी समय से उनका ईलाज चल रहा है।

इसकी बीमारी के चलते उन्हें सीटी आफिस से हटाकर बनोई स्थित प्रकाशन कार्यालय के डैस्क में भेज दिया गया है। दो दशक से जो जगह जिसकी कर्मस्थली रही हो और अचानक बूरा समय आते ही उस जगह से बेदर करना भी किसी सदमे से कम नहीं रहा होगा। डैस्क में काम के साथ-साथ ईलाज भी चलता रहा, मगर दुबले शरीर में काम व चिंता के बोझ के अलावा भी की तरह जलते सिगरेट के धूंए से बेदम हो चुके फेफड़े साथ छोड़ चुके थे। चरमरा चुकी चिकित्सा व्यवस्था भला किसी पत्रकार को छोड़ती भी कैसे। बीमारी कुछ और ईलाज कुछ। जब असल बीमारी को पता चला तब तक मौत का केंकड़ा फेफड़ों को कुतर चुका था। शांत स्वभाव भला बदलता भी कैसे। दर्द व रोष को अंदर ही दबाने की कला अब धीरे-धीरे इस खबरनवीस को किसी ओर ही दुनिया में ले जाने को आतूर थी। किसी को इसकी भनक तक नहीं चली थी, नहीं तो बाद में अफसोस करने वाले भला इस तरह उसे तिल-तिल मरता नहीं देखते।

महज ५४-५५ वर्ष की उम्र में राकेश पठानिया की मौत से पत्रकार समाज सकते में है। पगार से ज्यादा बेगार की चीज बन चुकी पत्रकारिता के चलते राकेश पठानिया की शादी भी काफी अधिक उम्र में हुई थी। एक बेटा महज सात साल का और बेटी १२ वर्ष की है। छोटे-छोटे बच्चों के सिर पर से बाप का साया उठना और भी चिंता का विषय है। घर-परिवार की बात करें तो वर्षों से किराए के मकान में रहने वाला परिवार आज भी वहीं पर है। ऐसे में परिवार की  चिंता भी हर किसी के जहन में है। दैनिक जागरण में सीनियर चीफ रिपोर्टर की पोस्ट पर नियमित कर्मी होने के चलते अब सबका ध्यान कंपनी से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर टिका है। सभी मदद को तैयार हैं, मगर कितनी मदद होगी इस पर स्वत: सोचा जा सकता है। आखिर आज दिन तक एक पत्रकार की मौत पर परिवार को मिला भी क्या है। अफसोस और जीवन में किए कार्यों की प्रशंसा के चंद शब्दों से ज्यादा कोई दे भी क्या सकता है। आर्थिक मदद भी कर देंगे तो क्या इतने छोटे बच्चों के लंबे पड़े भविष्य की सफलता के लिए इनके साथ टिके रहना हर किसी के बस में है। पत्रकारों की हालत तो यह है कि दूसरों के दुखों को बखान तो कर सकते हैं, मगर खुद पर मुसीबत आती है तो अपने ही कन्नी काटे जाते हैं। कुल मिलाकर पत्रकारिता संकट के दौर में है। वेतन के लिए पत्रकार नौकरियां खोए बैठे हैं। अधिकार मिल नहीं पा रहा, ऊपर से एक पत्रकार का इस तरह जाना पत्रकारिता के भविष्य की तस्वीर नहीं तो ओर क्या है।

अपनी खबर कर काफी खुश हुए थे राकेश पठानिया

प्रिंट मीडिया का एक पत्रकार वर्षों तक अपने काम में लगा रहता है। इस दौरान वह कईयों की मदद करता है और कईयों का रोष मोल लेता है। ऐसे में उसके लिए प्रशंसा के बोल उसके और उसे जानने वालों के बीच ही दबे रह जाते हैं। अखबारों को पढऩे वाले लाखों पाठकों तक उसकी खबरें तो पहुंचती हैं, मगर उसकी पहचान और चेहरा दबा रह जाता है। ऐसे में अगर कोई उसकी प्र्रतीभा को सम्मान देता है और उसकी खबर किसी अखबार में छपती है, तो उसे आम आदमी से कहीं ज्यादा खुशी होती है। ऐसा ही राकेश पठानिया के साथ तब हुआ जब फरवरी 2016 में उन्हें सम्मान दिया गया और मैने वेबसाइट में उनकी खबर चलाई। उनका फोन आया और उन्होंने एक आम पाठक की तरह आभार जताते हुए मुझे कहा कि आज अपनी खबर पढ़कर उन्हें लगा कि उनकी भी कोई उपलब्धि है, जो खबर बनकर उन्हें अच्छी लगी। प्रस्तुत है वह खबार…….

दैनिक जागरण के राकेश पठानिया को एक्सीलेंस अवार्ड

धर्मशाला, 21 फरवरी। राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र दैनिक जागरण के के धर्मशाला स्थित जिला कांगड़ा ब्यूरो के प्रभारी एवं सीनियर चीफ रिपोर्टर राकेश पठानिया को पत्रकारिता में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। शनिवार को आयोजित समारोह में समाचार पत्रिका समस्त भारत की ओर से उन्हें यह सम्मान बीसीसीआई सचिव एवं एचपीसीए अध्यक्ष, सांसद अनुराग ठाकुर और दिव्य हिमाचल के संपादक अनिल सोनी ने प्रदान किया। राकेश पठानिया जिला कांगड़ा के उन सफलतम पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने उस दौर से पत्रकारिता की शुरुआत की थी, जब पत्रकार बनना किसी चुनौती से कम नहीं था। उस दौरान पत्रकार को इतना वेतन तक नहीं मिल पाता था कि परिवार का गुजार कर सकें। उन्होंने विपरित परिस्थितियों के बावजूद पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई। शुरुआत में राकेश पठानिया उस समय की प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता के रिपोर्टर रहे। इसके बाद उन्हें वर्ष 2000 के करीब दैनिक जागरण  का जिला प्रभारी बनाया गया। तब से लेकर आज तक वे दैनिक जागरण परिवार का हिस्सा बने हुए हैं। मौजूदा समय में राकेश पठानिया जिला प्रेस क्लब धर्मशाला के प्रधान भी हैं।

रविंद्र अग्रवाल
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लोकस्वामी मैग्जीन के संपादक रजनीकांत वर्मा का निधन

लोकस्वामी समूह के ग्रुप एडिटर रजनीकांत वर्मा नहीं रहे. हार्ट अटैक के कारण उनका निधन हो गया. वे पचपन साल के थे. वे पिछले कुछ समय से बीमार भी चल रहे थे जिसके कारण उनका इलाज चल रहा था. उत्तराखंड के हल्द्वानी (नैनीताल) के रहने वाले रजनीकांत ने करियर का काफी लंबा अरसा इंदौर में व्यतीत किया.

वे लोकस्वामी से पहले शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कार्यरत थे. वे ‘माया’ पत्रिका में भी रह चुके हैं. रजनीकांत वर्मा काफी समय से दिल्ली में रहकर ‘लोकस्वामी’ हिंदी पाक्षिक पत्रिका का संपादन करते थे. वे लंबे समय तक इंदौर में रह चुके हैं. वे पिछले 26 साल से लगातार लोकस्वामी समूह से जुड़े हुए थे. लोकस्वामी समूह के समूह संपादक रजनीकांत वर्मा के अचानक चले जाने से उनके जानने वाले स्तब्ध हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सन्मार्ग अखबार के संपादक आनंद बहादुर सिंह का बनारस में निधन

वाराणसी। राजा टोडरमल के वंशज और पत्रकारिता के युग पुरुष सन्मार्ग अखबार के संपादक अनंदबहादुर सिंह का इलाज के दौरान शनिवार को तड़के 4 बजे निधन हो गया। उनके निधन से पत्रकारिता क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। श्री सिंह की 87 वर्ष कीअवस्था थी। उनके निधन की जानकारी जैसे ही समाज के बुद्धिजीवी, पत्रकारों और उनके शुभचिंतकों को लगा जो जैसे था उनके भदैनी स्थित आवास की ओर दौड़ पड़ा। श्री सिंह का जन्म 29 अगस्त 1930 (लोलार्कछठ) के दिन हुआ था। वह शुरु से धार्मिक प्रवृत्ति और काशी के गंगो-जमुनी यकजहती के संवाहक थे। उनका श्री संकटमोचन मंदिर के महंत परिवार से ताल्लुकात होने की वजह से उनकी रूचि गोस्वामी तुलसीदास जी में रही। वह रामचरित मानस में जबरदस्त पकड़ रखते थे। इतना ही नही वह काशी के इतिहास के बारे में भी अच्छी जानकारी रखते थे।

श्री सिंह ने अपने पत्रकारिता क्षेत्र में कैरियर वाराणसी के लोकप्रिय सांध्यकालीन अखबार सन्मार्ग से सन् 1952 में जुड़कर की। शुरूआती दौर में संपादक स्व. पं. गंगाशंकर मिश्र के साथ काम शुरु किया और उनसे संपादन के गुर भी सीखे। श्री सिंह धीरे-धीरे अखबार के संपादक नियुक्त हुए तो सन्मार्ग को काफी ऊंचाई तक ले गए। श्री सिंह के पास 65 वर्ष के पत्रकारिता का अनुभव था। सरल स्वभाव के धनी श्री सिंह पत्रकारिता की नर्सरी थे जिसके छत्रछाया में कई दिग्गज पत्रकारों ने कलम चलाना सीखा। अवस्था हो जाने की वजह से उन्हें पांच दिन पूर्व सर सुंदरलाल अस्पताल में यूरिन इंफेक्शन के कारण भर्ती कराया गया था, जहा उनका शनिवार तड़के निधन हो गया। श्री सिंह अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़ गए है। श्री सिंह का एक लड़का विजयबहादुर सिंह और दो लड़की सविता राय और सरिता शर्मा है। श्री सिंह का अंतिम संस्कार हरिश्चन्द्र घाट पर किया गया। उन्हें मुखाग्नि बेटे विजयबहादुर ने दी।

स्वतंत्रता संग्राम में गए थे जेल

परिवारीजनों की माने तो आनंदबहादुर सिंह स्वतंत्रता संग्राम के वक्त जेल भी भेजे गए थे लेकिन बाद में वह छुटे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लिया। हालाँकि जेल जाने का कोई प्रमाण मौजूद नही है। जब देश में सन् जून 1975 में आपातकाल लगा उस वक़्त भी अनंदबहादुर सिंह ने कलम को अपना हथियार बनाया था। श्री सिंह को श्रद्धांजलि देने वालों में संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र, ख्यात न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. विजयनाथ मिश्र, धर्मेंद्र सिंह, संपूर्णानंद तिवारी, एसपी सिटी, भदैनी टाइम्स के संपादक अवनिन्द्र कुमार सिंह, काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी सुभाष सिंह, अत्रि भरद्वाज, विकास पाठक, विनय मौर्या, अभय शंकर तिवारी,  सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आगरा-मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रवाल का निधन

मथुरा के नियति हास्पीटल में आज सुबह करीब सवा आठ बजे वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रवाल जी ने आंखें मूंद ली। उन्होंने आज अखबार में लंबे समय तक क्राइम रिपोर्टर और फिर सिटी इंचार्ज के तौर पर सेवा दी। इससे पहले उन्होंने विकासशील भारत में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम किया। आज अखबार छोड़ने के बाद वे डीएलए से जुड़ गए। यहां उन्होंने बतौर सीनियर क्राइम रिपोर्टर काम किया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका अंतिम पड़ाव पुष्पांजलि ग्रुप के पुष्प सवेरा अखबार में सिटी इंचार्ज के रुप में रहा। ये वही पुष्पांजलि ग्रुप है जिसके हास्पीटल में उनके इलाज के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1 साल के इलाज के लिए भेजी गई 5 लाख रुपये की धन राशि का महज 4 महिने में ही गोलमाल कर दिया। हालांकि तमाम मीडियाकर्मियों और सामाजिक व राजनीतिक लोगों ने उनके इलाज में प्रत्यक्ष व परोक्ष सहयोग किया पर उन्हें बचाया न जा सके।

श्री अग्रवाल अपनी नेक, ईमानदार और धारदार क्राइम रिपोर्टिंग के लिए प्रदेशभर में जाने जाते हैं। पिछले 40 सालों में उत्तर प्रदेश का उन जैसा दूसरा तेज तर्रार क्राइम रिपोर्टर न हुआ। उनकी क्राइम बीट पर पकड़ के कारण ही प्रदेश में इन सालों में जो भी डीजीपी हुए वे हमेशा विनोद अग्रवाल से प्रभावित रहे। विनोद अग्रवाल ने अपनी ईमानदार पत्रकारिता की एक नई पीढ़ी तैयार की। उनके सिखाए कई क्राइम रिपोर्टर आजकल मीडिया के नामचीन संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेन्द्र पटेल की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुंबई की वरिष्ठ फिल्म पत्रकार पिरोज वाडिया का निधन

SAD DEMISE OF SENIOR JOURNALIST PIROJ WADIA

Dear Member,

With great sorrow and regret we have to inform you that Piroj Wadia, a senior film journalist and Press Club member passed away today in Mumbai after a brief illness. Piroj, aged 67 was in journalism for almost four decades with Free Press Journal, The Daily, Indian Express and Cine Blitz.

She will be laid to rest on Tuesday 7.45 am at Tower of Silence, Kemps Corner. Our heart goes out to her family and may they have the strength to bear this huge loss.

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नहीं रहे लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार केसी खन्ना

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) के दशकों पुराने सहयोगी केसी खन्ना का निधन हो गया है। अंग्रेजी दैनिक दि पॉयनियर के उप समाचार संपादक रहे केसी खन्ना आईएफडब्लूजे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व यूपी प्रेस क्लब की गवर्निंग बाड़ी के सदस्य रहे थे। दिवंगत पत्रकार केसी खन्ना की रस्म पगड़ी शनिवार १७ जून शाम ४ बजे राजाजीपुरम गोल चौराहे गुरुद्वारे में होगी।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार रत्न शंकर व्यास का निधन

Ak Lari : वरिष्ठ पत्रकार रत्न शंकर व्यास का निधन। वह ‘आज’ अखबार से जुड़े थे। वह ‘आज’ अखबार में संपादक रहे लक्ष्मी शंकर व्यास के बड़े पुत्र थे। अवस्था करीब 76 साल थी। रिटायर्ड होने के बाद ‘आज’ अखबार में संम्पादकीय लेखन का दायित्व निभा रहे थे। जानकारी के अनुसार रत्न शंकर जी तीन दिन से कार्यालय नहीं आ रहे थे। अस्वस्थ थे। घर पर ही इलाज चल रहा था।

आज सुबह थोड़ी तबीयत खराब होने पर डाक्टर को दिखाया। आराम भी हुआ लेकिन शाम को बेचैनी महसूस होने और अपने डॉक्टर के कहने पर उन्हें रात करीब आठ बजे लक्ष्मी अस्पताल लाया गया। एक घंटे तक इलाज चला। शायद दिल का दौरा पड़ा था। उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी अन्नत यात्रा मंगलवार सुबह नौ बजे दण्डपाणि गली स्थित आवास से मणिकर्णिका घाट के लिए निकली।

वह अपने पीछे तीन पुत्रियों, एक पुत्र और तीन भाईयों सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गये है। स्वर्गीय व्यास ने अर्थशास्त्र में काशी विद्यापीठ से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की थी। शुरुआती दौर में वह बैंकिंग से जुड़े रहे। बाद में उन्होंने श्रमजीवी पत्रकार के रूप में काम शुरू किया। आजीवन पत्रकारिता से जुड़े रहे। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ।अन्तरराष्ट्रीय राजनीति, खेल समेत हर तरह के लेखन में माहिर थे। व्यंग्य लेखन और कार्र्टून बनाने में भी उनका कोई सानी नहीं था।

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एके लारी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कैंसर से पीड़ित वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह का निधन

Jaishankar Gupta : करीब चार दशकों की दोस्ती को एक झटके में तोड़ कर धर्मेंद्रपाल सिंह का इस तरह असमय चले जाना भारी दुख दे गया। 1980 में हमारी मुलाकात लोदी एस्टेट में स्थित असली भारत के दफ्तर में हमारी मुलाकात हुई थी। हम वहां संवाददाता सह उप संपादक थे। धर्मेंद्र हिन्दुस्तान अखबार में कार्यरत थे लेकिन हमारे संपादक, पूर्व सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रहे अजय सिंह से करीबी के कारण धर्मेंद्र वहां आते जाते या कहें सलाहकार सहयोगी की भूमिका में थे। 1997 में जब हम हिन्दुस्तान से जुड़े तब वह वहां वरिष्ठ और पुराने सहयोगी के रूप में मिले। कुछ बातों को लेकर मतभेद भी होते थे लेकिन मनभेद कभी नहीं हुए। कम मिलते थे लेकिन निजी रिश्तों में प्रगाढ़ता में कमी कभी नहीं आई। कैंसर से वह जूझ रहे थे। और कुछेक अवसरों पर और खासतौर से आपरेशन के बाद तो लगा कि उन्होंने अपराजेय कहे जानेवाले कैंसर को परास्त कर दिया है लेकिन कल रात वह इस लड़ाई को हार गए। मन बोझिल और सदमें में है। अपने बेलौस ठहाकों के लिए मशहूर मित्र को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। शोक की इस घड़ी में हमारी सहानुभूति और संवेदना सुषमा जी और उनके परिवार के साथ है।

Omkar Chaudhary :  आज एक और मित्र चले गए। वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह (पूर्व खेल संपादक हिंदुस्तान) का कल रात निधन हो गया। वे पिछले कुछ सप्ताह से रीढ़ की हड्डी के कैंसर से पीड़ित थे। जबड़े का ऑपरेशन हुआ था। तब लगा था कि सब ठीक हो गया है। कुछ दिन ठीक रहे। लेखन भी करते रहे। अचानक सुषमा भाभी का फोन आया कि कमर में तेज दर्द है। इस रविवार के लिए लेख नहीं भेज पाएंगे। मन में शंका हुई। उसी सप्ताह हाल जानने के लिए घर गया तो बिस्तर पर पाया उन्हें। बात बात पर ठहाके लगाने वाले धर्मेन्द्रपाल असहाय होकर दर्द से कराह रहे थे। मेरे बहुत बेहतरीन दोस्त थे। शुभ चिंतक थे। शानदार पत्रकार थे। बहुत पीड़ा है उनके जाने की। शब्दों में बयान करना मुश्किल है। कितने ही पल याद आ रहे हैं। मेरा अश्रुपूर्ण नमन।

Umakant Lakhera : दुखद सूचना. परम मित्र, वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह (दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व खेल संपादक) का आज 6 जून को सुबह निधन हो गया। वे पिछले कुछ सप्ताह से रीढ की हड्डी के कैंसर से पीड़ित थे। उनका अंतिम संस्कार आज सुबह 11 बजे दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकट CNG शवदाह गृह पर किया गया। Our beloved friend Sh Dharemendra Pal Singh, a senior journalist & former Sports Editor, Dainik Hindustan has passed away today morning, He was suffering from backbone cancer for the last few weeks. The last rites conducted at CNG crematorium Nigumbodh Ghat at 11 am today (June 6, 2017).

सौजन्य : फेसबुक

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

SAD DEMISE OF SENIOR JOURNALIST MANI D’MELLO

Dear Member,

We are extremely sorry to inform you that senior journalist and Mumbai Press Club member, Mani D’Mello, passed away this morning at Holy Family Hospital, Bandra, following a prolonged illness.

D’Mello aged 54 years, a seasoned crime reporter, worked in various capacities in several newspapers such as Mid-Day, Free Press Journal (FPJ), Times of India and television news channels. During his tenure at FPJ, Mani mentored many reporters who still considered him as their guide.

He will be laid to rest on Thursday. Funeral procession will start at 4.30 pm from his residence — Carters Apts, Sherly Rajan Road, Bandra West.

Mass will be at 5.00 pm at St Anne’s Church, Pali Hill, Bandra West followed by burial at St Andrews Church, Hill Rd, Bandra (West).

Our heart goes out to his family and may they have the strength to bear this huge loss.

Regards,

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पहले प्रदीप संगम, फिर ओम प्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी का जाना….

एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग या दुर्योग, जो कहिए… मेरे ज्यादातर प्रिय पत्रकारों का समुदाय धीरे-धीरे सिकुड़ता छोटा होता जा रहा है… दो-तीन साल के भीतर एकदम से कई जनों का साथ छोड़कर इस संसार को अलविदा कह जाना मेरे लिए स्तब्धकारी है… पहले आलोक तोमर, फिर प्रदीप संगम, उसके बाद ओमप्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी… असामयिक रणछोड़ कर चले जाना या जीवन के खेल में आउट हो जाना हर बार मुझे भीतर तक मर्माहत कर गया… सारे पत्रकारों से मैं घर तक जुड़ा था और प्यार दुलार का नाता बहुत हद तक स्नेहमय सा बन गया था… इनका वरिष्ठ होने के बाद भी यह मेरा सौभाग्य रहा कि इन सबों के साथ अपना बोलचाल रहन-सहन स्नेह से भरा रसमय था… कहीं पर कोई औपचारिकता या दिखावापन सा नहीं था… यही कारण रहा कि इनके नहीं होने पर मुझे खुद को समझाने और संभलने में काफी समय लगा…

फिलहाल तो बात मैं संतोष जी से ही शुरू करता हूं । मेरा इनसे कोई 23 साल पुराना नाता रहा। भीकाजी कामा प्सेस के करीब एक होटल में शाम के समय कुछ लोगों से मिलने का कार्यक्रम था । मेरे पास अचानक हिन्दुस्तान से संतोष जी का फोन आया- अनामी शाम को एक जगह चलना है, तैयार रहना। मैने जब जिज्ञासा प्रकट की तो वे बौखला गए। अरे जब मैं बोल रहा हूं तो फिर इतने सारे सवाल जवाब क्यों? बस् इतना जान लो कि जो मेरी नजर में सही और मेरे प्रिय पत्रकार हैं, बस्स मैं केवल उन्ही दो चार को बुला भी रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले तो मेरी संतोष जी से दर्जनों बार फोन पर बातें हो चुकी थी, मगर अपने अंबादीप दफ्तर से 100 कदम से कम की दूरी पर एचटी हाउस की बहुमंजिली इमारत में कभी जाकर मैं संतोष जी से मिला नहीं था। ना ही कभी या कहीं इनसे मिलने का सुयोग बना था। मैं फटाफट अपने काम को निपटाया और फोन करके एचटी हाउस के बाहर पहुंच गया। वहां पर संतोषजी पहले से ही मौजूद थे। मुझे देखते ही बोले- अनामी… मेरे सिर हिलाने पर उनने लपक कर मुझे गले से लगा लिया। साले कलम से जितना आक्रामक दिखते हो उतना तीखा और आक्रामक तो तुम लगते नहीं। अब इस पर मैं क्या कहता… बस्स जोर से खिलखिला पड़ा तो वे भी मेरे साथ ही ठहाका लगाने लगे। यह थी मेरे प्रति संतोष जी की पहली प्रतिक्रिया।

देर रात तक मेहमानों के संग बातें होती रहीं और साथ में मदिरामय माहौल भी था। इससे मैं काफी असहज होने लगा तो संतोष जी मुझे कमरे से बाहर ले गए और ज्ञान प्रदान किया। जब तुम कहीं पर पत्रकार के रूप में जाओ तो जरूरी नहीं कि सारा माहौल और लोग तुम्हारी अपेक्षाओं या मन की ही बातें करेंगे। कहीं पर असामान्य लगने दिखने से बेहतर है कि तुम खान पान पर अपने ध्यान को फोकस कम करके काम और जो बातचीत का सेशन चल रहा है उसमें औरों से हटकर बातें करो ताकि सबों का ध्यान काम पर रहे और खान पान दोयम हो जाए। इन गुरूमंत्रों को बांधकर मैं अपने दिल में संजो लिया और अंदर जाकर बातचीत के क्रम को एक अलग तरीके से अपने अनुसार किया।

पत्रकारिता के लगभग दो दशक लंबे दौर में बहुत दफा इस तरह के माहौल का सामना करना पड़ा। जब अपने साथी मित्रों का ध्यान काम से ज्यादा मदिरा पर रहा तो मैंने अपने अनुसार बहुत सारी बातें कर ली और मदिरा रानी के संग झूले में उडान भर रहे मेरे मित्रों ने मेरी बातों पर कोई खास तवज्जो नहीं दी। इसके फलस्वरूप मेरी रिपोर्ट हमेशा औरों से अलग और कुछ नयी रहती या होती थी। इस पर अगले दिन अपने साथियों से मुझे कई बार फटकार भी खानी पड़ी या कईयों ने मुझे बेवफा पत्रकार का तगमा तक दे डाला था कि खबरों के मामले में यह साला विश्वास करने लायक नहीं है। आपसी तालमेल पर भी न्यूज को लेकर किसी समय सीमा का बंधन नहीं मानेगा।

तमाम उलाहनों पर भिड़ने की बजाय हमेशा मेरा केवल एक जवाब होता कि न्यूज है तो उसके साथ कोई समझौता नहीं। इस तरह के किसी भी संग्राम में यदि मैं कामयाब होता या रहता तो संतोषजी का लगभग हमेशा फोन आता, वेरी वेरी गुड अनामी डार्लिंग। वे अक्सर मुझे मेरे नाम के साथ डार्लिंग जोडकर ही बोलते थे। मैने उनसे कई बार कहा कि आप जब डार्लिंग कहते हैं तो बबल कहा करें जिससे लोग समझेंगे कि आप किसी महिला बबली से बात कर रहे हैं…. अनामी में डार्लिंग जोडने से तो लोग यही नहीं समझ पाएंगे कि आप किसी को अनामी बोल रहे है या नामी बोल रहे है या हरामी बोल रहे हैं। मेरी बातें सुनकर वे जोर से ठहाका लगाते… वे कहते- नहीं, बबल कहने पर ज्यादा खतरा है यार… अनामी इतना सुंदर और अनोखा सा इकलौता नाम है कि इसको संबोधित करना ज्यादा रसमय लगता है।

इसी तरह के रसपूर्ण माहौल में मेरा नाता चल रहा था. मुझसे ज्यादा तो मुझे फोन करके अक्सर संतोषजी ही बात करते थे। हमेशा एचटी हाउस की जगत विख्यात कैंटीन में मुझे बुलाते और खान पान के साथ हमलोग बहुत मामले में बात भी कर लिया करते थे। उनका एक वीकली कॉलम दरअसल दिल्ली की समस्याओं पर केंद्रित होता था। कई बार मैने कॉलम में दी गयी गलत सूचनाओं जानकारियों तथ्यों और आंकड़ो की गलती पर ध्यान दिलाया तो मुझे हमेशा लगा कि शायद यह उनको बुरा लगेगा। मगर एक उदार पत्रकार की तरह हमेशा गलतियों पर अफसोस प्रकट किया और हमेशा बताने के लिए प्रोत्साहित किया।

हद तो तब हो गयी जब कुछ प्रसंगों पर लिखने से पहले घर पर फोन करके मुझसे चर्चा कर लेते और आंकड़ो के बारे में सही जानकारी पूछ लेते। उनके द्वारा पूछे जाने पर मैं खुद को बड़ा शर्मसार सा महसूस करता कि क्या सर आप मुझे लज्जित कर रहे हैं, मैं कहां इस लायक कि आपको कुछ बता सकूं। मेरे संकोच पर वे हमेशा कहते थे कि मैं भला तुमको लज्जित करूंगा, साले तेरे काम का तो मैं सम्मान कर रहा हूं, मुझे पता है कि इस पर जो जानकारी तुम दोगे वह कहीं और से नहीं मिलेगी।

उनकी इस तरह की बातें और टिप्पणियां मुझे हमेशा प्रेरित करती और मुझे भी लगता कि काम करने का मेरा तरीका कुछ अलग है। आंकड़ो से मुझे अभी तक बेपनाह प्यार हैं क्योंकि ये आंकड़े ही है जो किसी की सफलता असफलता की पोल खोलती है। हालांकि अब नेता नौकरशाह इसको लेकर काफी सजग और सतर्क भी हो गए हैं मगर आंकडों की जुबानी रेस में ज्यादातर खेलबाजों की गाड़ी पटरी से उतर ही जाती है। संतो,जी र मेरा प्यार और नेह का नाता जगजाहिर होने की बजाय लगातार फोन र कैंटीन तक ही देखा जाता। हम आपस में क्या गूफ्तगू करते यह भी हमारे बीच में ही रहता।

एक वाक्या सुनादूं कि जब वे मयूरविहार फेज टू में रहते थे तो मैं अपने जीवन में पहली और आखिरी बार किसी पर्व में मिठाई का एक पैकेट लेकर खोजते खोजते सुबह उनके घर पर जा पहुंचा। । घर के बाहर दालानव में मां बैठी थी। मैने उनसे पूछा क्या आप संतो,जी की मां है ? मेरे सवाल पर चकित नेत्रों से मुझे देखते हुए अपने अंचल की लोक भाषा में कुछ कहा जिसका सार था कि हां । मैने उनके पैर छूए और तब मेरा अगला सवालथा कि क्या वे घर पर हैं ? मां के कुछ कहने से पहले ही तब तक भीतर से उनकी आवाज आई जी हा अनामी डार्लिंगजी संतोष जी घर पर हैं आप अंदर आईए। उनकी आवाज सुनकर मां ने जाने का रास्ता बना दिया तो मैं अंदर जा पहुंचा।

मेरे हाथ में मिठाई का डिब्बा देखकर वे बोल पड़े ये क्या है ? थोडा तैश में बोले गजब करते हो छोटे भाई हो और बड़े भाई के यहां मिठाई लेकर आ गए। अरे बेशरम मिठाई खाने आना चाहिए ना कि लाना। मैं भी थोडा झेंपते हुए कहा कि आज दीवाली था और आप दिल्ली के पहले पत्रकार हो जिसके घर मैं आया हूं। तो बोले- मुझे ही आखिरी पत्रकार भी रखना जब किसी पत्रकार के यहां जाओगे मिठाई लेकर तो वह तेरी ईमानदारी पर संदेह करेगा कि घर में मिठाई के कुछ डिब्बे आ गए तो लगे पत्रकारों में बॉटकर अपनी चौधराहट दिखाने। कुछ देर के बाद जब मैं जाने लगा तो मुझे मिठाई के दो डिब्बे तमाया एक तो मेरी तरफ से तुमको और दूसरा डिब्बा जो लाया था उसके एवज में यह दूसरा डिब्बा।

मैं दोनों डिब्बे थामकर जोर से हंसने लगा,तो वे थोडा असहज से होते हे सवाल किया कि क्या हुआ? मैंने कहा कि अब चौधराहट मैं नहीं आप दिखा रहे हैं। फिर हमलोग काफी देर तक खिलखिलाते रहे और अंत में फिर चाय पीकर घर से बाहर निकला। दीपावली या होली पर जब कभी शराब की बोतल या कभी कभी बंद पेटी में दर्जनों बोतल शराब की घर पहुंचा देने पर ही मैं अपने उन मित्रों को याद करता जिनके ले यह एक अनमोल उपहार होती। बाद में कई विधायकों को फोन करके दोबारा कभी भी शराब ना भेजने का आग्रह करना पड़ता ताकि मुझे से कपाने के लिए परिश्रम ना करना पड़े।

इसी तरह 1996 के लोकसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली के सांसद सज्जन कुमार की एक प्रेसवार्ता में मैं संतोषजी के साथ ही था। मगर सज्जन कुमार के बगल में एक मोटा सा आदमी बैठा था । दोनों आपस में कान लगाकर सलाह मशविरा कर रहे थे। बातचीत के दौरान भी अक्सर उनकी कनफुसियाहट जारी रही। प्रेस कांफ्रेस खत्म होने के बाद मैं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के तालकटोरा रोड वाले दफ्तर के बाहर खडा ही था कि सज्जन कुमार के उसी मोटे चमच्चे पर मेरी नजर गयी। तीसरी दफा अंदर से निकल कर अपनी गाड़ी तक जाना और लौटने की कसरता के बीच मैने हाथ जोडते हुए अभिवादन के साथ ही पकड़ लिया। माफ करेंगे सर मैं आपको पहचाना नहीं?

दैनिक जारगण के रिपोर्टर ज्ञानेन्द्र सिंह मेरे साथ था। मैने अपना और ज्ञानेन्द्र का परिचय दिया तो वो बोल पडा अरे मैं गोस्वामी एचटी से । मगर इस क्षणिक परिचय से मैं उनको पहचान नहीं सका। तब जाकर हिन्दुस्तान के चीफ रिपोर्टर रमाकांत गोस्वामी का खुलासा हुआ। मैने कहा कि सर आप मैं तो सज्जन का कोई पावर वाला चमच्चा मान रहा था। मेरे यह कहने पर वे झेंप से गए मगर तभी उन्होने हाथ में लिए अंडे पकौडे और निरामिष नाश्ते को दिखाकर पूछा कुछ लोगे ? मैने उनसे पूछा कि क्या आप लेते है ? तो वे एक अंहकार भाव से बोले मैं तो पंडित हूं ? तब मैंने तुरंत पलटवार किया मैं तो महापंडित हूं इसको छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे बुरी तरह शर्मसार हो उठे। मगर कभी दफ्तर में आकर मिलने का न्यौता देकर अपनी जान बचाई। मैने इस घटना को संतोषजी को सुनाया तो मेरी हिम्मत की दाद दी। हंसते हे कहा की ठीक किय़ा जो लोग पत्रकार होकर चमच्चा बन जाने में ज्यादा गौरव मानते हैं उनके साथ इस तरह का बर्ताव जरूरी है।

शांतभाव से एक प्यार लगाव भरा हमारा रिश्ता चल रहा था कि एकाएक पता लगा कि वे अब दैनिक जागरण में चले गए. इस खबर पर ज्यादा भाव ना देकर मैं एक बार अपने भारतीय जनसंचार संस्थान काल वाले मित्र उपेन्द्र पांडेय से मिलने जागरण पहुंचा तो संयोग से वहीं पर संतोषजी से मुलाकात हुई। जागरण के कुछ स्पेशल पेज में आए व्यापक परिवर्तनों पर मैने उपेन्द्र से तारीफ की तो पता चला कि आजकल इसे संतोषजी ही देखरहे हैं। तब मैंने पूरे उल्लास के साथ उनके काम करने के अंदाज पर सार्थक प्रतिक्रिया दी। मैंने यह महसूस किया कि वे हमेशा मेरी बातों या सुझावों को ध्यान से लेते थे। मैने कहा भी कि आप आए हैं तो भगवती जागरण में धुंवा तो प्रज्जवलित होनी ही चाहिए। मेरी बातों को सुनकर संतोषजी ने फिर कहा अनामी तेरी राय विचारों का मैं बड़ा कद्र करता हूं क्योंकि तुम्हारा नजरिया बहुतों से अलग होता है। यह सुनकर मैंने अपना सिर इनके समक्ष झुका लिया तो वे गदगद हो उठे। उन्होंने कहा तेरी यही विन्रमता ही तेरा सबसे बड़ा औजार है। लेखन में एकदम कातिल और व्यक्तिगत तौर पर एकदम सादा भोला चेहरा। अपनी तारीफ की बातें सुनकर मैं मारे शरम के धरती में गड़ा जा रहा था।

जागऱण छोड़कर उपेन्द्र के साथ चंड़ीगढ बतौर संपादक दैनिक ट्रिब्यून में चले गए। 1990-91 में लेखन के आंधी तूफानी दौर में कई फीचर एजेंसियों के मार्फत ट्रिब्यून में मेरी दर्जनों रपट लेख और फीचर छप चुके थे। 193 में मैं जब चंडीगढ़ एक रिपोर्ट के सिलसिसे में गया तो उस समय के ट्रिब्यून संपादक विजय सहगल जी से मिला। परिचय बताने पर वे एकदम चौंक से गए। बेसाख्ता उन्होंने कहा अरे अनामी मैं तो अभी तक अनामी को 40-45 साल का समझ रहा था. आप तो बहुत सारे प्रसंगों पर रोचक लिखते हैं। सहगल जी की बातें सुनकर मैं भी हंसने लगा। लगभग यही प्रतिक्रिया थी पहले चौथी दुनिया और बाद में राष्ट्रीय सहारा के पटना ब्यूरो प्रमुख परशुराम शर्मा की। 1995 में एक दिन नोएडा स्थित सहारा दफ्तर में मिल गए। परिचय होने पर उन्होंने मुझे गले से लगा लिया- अरे बाप रे बाप,  कितना लिखता है तू। मैं तो उम्रदराज होने की सोच रहा था पर तू तो एकदम बच्चा निकला। दो दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उनका स्नेह बरकरार है।

कभी कभी मैं लिखने की रफ्तार तथा छपने की बारिश पर सोचता हूं तो अब मैं खुद चौंक जाता हूं। पहले लगता था कि मेरे हाथ में सरस्वती का वास हो। लंबा लिखना मेरा रोग था। कम शब्दों में लिखना कठिन होता था। बस कलम उठाया तो नदियां बह चलीं वाली हालत थी। पर अब लगता है मेरे लेखन का खुमार ही पूरी तरह उतर-सा गया हो। अब तो लिखने से पहले उसकी तैयारी करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर लगता है मानो लिखना संभव हो पाता है। मुझे कई बार चंडीगढ भी बुलाया पर मैं जाकर मिल ना सका। उपेन्द्र पांडेय ने मुझे दिल्ली का भी फोन नंबर दिया और कई बार बताया भी कि संतोष, अभी दिल्ली में ही हैं, मगर मैं ना मिल सका और ना ही बातचीत ही हो सकी। अभी पिछले ही माह उपेन्द्र ने फोन करके कहा कि अब माफी नहीं मिलेगी, तुम चंडीगढ़ में आओ, बहुत सारे मित्र तुमसे मिलने के लिए बेताब हैं।

मैं भी अप्रैल में दो तीन दिन के ले जाना चाह रहा था। इसी बहाने अपनी मीरा मां और रमेश गौतम पापा समेत अजय गौतम और छोटे भाई के साथ एक प्यारी सी बहन से भी मिलता। कभी हजारीबाग में रहकर धूम मचाने वाले ज्योतिषी पंडित ज्ञानेश भारद्वाज की भी आजकल चंडीगढ में तूती बोल रही है. संतोष जी के साथ एक पूरे दिन रहने और संपादक के काम काज और तमाम बातों पर चर्चा करने के लिए मैं अभी मानसिक तौर पर खुद को तैयार ही कर रहा था कि एक रोज रात 11 बजे एकाएक फेसबुक पर भडास4मीडिया में संतोष तिवारी के न रहने की खबर देखकर सन्न रह गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानों वे रूठ गए हों मुझसे। कोई उलाहना दे रहे हों कि साले दो साल से बुला रहा हूं तो तेरे को फुर्सत नहीं थी तो ठीक है अब तू चंडीगढ़ आ तो सही पर अब मेरे पास भी तुमसे मिलने का समय नहीं।

मैं इस लेख को देर रात तक जागकर कल ही लिख देना चाह रहा था पर मेरे सामने संतोषजी इस कदर मानों आकर बैठ गए हों कि मेरे लिए उनकी यादों से निकलना और शब्द देना संभव नहीं हो पाया। और अंतत: पौने एक बजे रात को मैंने अपना कम्प्यूटर बंद दिया। आज सुबह से ही मेरे भीतर संतोषजी समाहित से हैं। लगता है मानो वे मेरे लेख को देख रहे हों और जल्दी जल्दी लिखने को उकसा रहे हों। आमतौर पर मेरे नयन जल्दी सजल नहीं होते मगर हिन्दी पत्रकारिता ने एक सुयोग्य उत्साही संपादक को खो दिया है। अपने सहकर्मियों को अपने परिवार का सदस्य सा मानकर प्यार और स्नेह देने वाले दिल्ली में कितने लोग रह गए है? उपेन्द्र पांडेय के लाख कहने पर भी अब तो फिलहाल चंडीगढ जाने का उत्साह ही नरम पड़ गया। किस मुंह से जाउं या किसके लिए? फिलहाल तो संतोषजी की अनुपस्थिति / गैरमौजूदगी ही मेरे को काट रही है. मुझे बारबार अनामी डार्लिंग की ध्वनि सुनाई पड़ रही है कि दिल्ली जैसे शहर में संतोषजी के अलावा और कौन दूसरा हो सकता है जो अनामी डार्लिंग कहकर अपना प्यार स्नेह और वात्सल्य दिखला सके।

और अंत में, माफ करेंगे प्रदीप संगम जी और ओम प्रकाश तपस जी। आलोक तोमर भैय्या पर तो एक लेख लिखकर मैं अपना प्यार तकरार इजहार कर चुका हूं। मगर आप दोनों पर अब तक ना लिखने का कर्ज बाकी है। पूरा एक लेख आप लोगों पर हो, यह मेरा प्रयास होगा। फिलहाल तो इस मौके पर केवल कुछ यादों की झांकी। संगम जी से मैं सहारनपुर से जुडा था। जिंदगी में बतौर वेतन कर्मी यह पहली नौकरी थी। शहर अनजाना और लोग पराय़े। मगर डा. रवीन्द्र अग्रवाल और प्रदीप संगम ने मुझे एक सप्ताह के अंदर शहर की तमाम बारीक जानकारियों से अवगत कराया। संगम जी के घर के पास में ही मैं भी किराये पर रहता था तो सुबह की चाय के साथ देर रात तक संगम क्लास जारी रहता। भाभी का व्यावहार स्नेहिल और मिलनसार स्वभाव था। इससे मेरे मन के भीतर की लज्जा खत्म हो गई और संगम जी का घर एक तरह से हमारे लिए जब मन चाहा चले गए वाला अपना घर हो गया था। बाद में संगमजी दिल्ली हिन्दुस्तान में आए तो 1988 की बहुत सारी यादें सजीव हो गयी। हम लोग कनाट प्लेस में अक्सर साथ रहते। मगर सपरिवार संगम जी हिमाचल घूमने क्या गए कि पहाड की वादियों में ही एकाएक हमलोगों को अलविदा बोल गए।

यह मेरे लिए भी एक सदमा था। तभी नवभारत टाईम्स में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तपस जी एकाएक हमारे बीच से चले गए। बात 1994 की है जब मैंने दिल्ली के दो गांवों पर एक स्टोरी की. दिल्ली और साक्षरता अभियान को शर्मसार करने वाले दो गांव यमुना नदी के मुहाने पर है। मैं जहांगीरपुरी के निर्दलीय विधायक कालू भैय्या को तीन किलोमीटर तक पैदल लेकर इस गांव में पहुंचा और मुस्लिम बहुल इस गांव की बदहाली पर मार्मिक रपट की। राष्ट्रीय सहारा में खबर तो पहले छपी मगर हमारे डेस्क के महामहिमों के चलते यह खबर पहले पेज पर ना लेकर भीतर के किसी पेज में लगा दी गयी। अगले दिन मैंने काफी नाराजगी भी दिखाई मगर चिड़िया चुग गयी खेत वाली हालत थी।

खबर छपकर भी मर गयी थी, मगर एक सप्ताह के भीतर ही नवभारत टाईम्स में यही खबर छपी- ‘दिल्ली के दो अंगूठा टेक गांव’। खबर छपने पर दिल्ली में नौकरशाही स्तर पर हाहाकार मचा। सरकार सजग हुई और एक माह के अंदर ज्ञान पुर्नवास साक्षरता आदि की व्यवस्था करा दी गयी। मैने खबर की चोरी पर तपस जी से फोन पर आपत्ति की. मैने कहा कि आपको खबर ही करनी थी तो एक बार तो मुझसे बात कर लेते मैं आपको इतने टिप्स देता कि आप और भी कई स्टोरी बना सकते थे। मैं तो फिर से इस प्रसंग पर अब लिखूंगा ही नहीं क्योंकि पेपर वालों को इसकी समझ ही नहीं है। मेरी बातों पर नाराज होने की बजाय तपस जी ने खेद जताया और मिलने को कहा। जब हम मिले तो जिस प्यार उमंग उत्साह और आत्मीयता से मुझसे मिले कि मेरे मन का सारा मैल ही धुल गया। हम लोग करीब 16-17 साल तक प्यार और स्नेह के बंधन में रहे। इस दौरान बहुत सारी बातें हुई और वे सदैव मुझे अपने प्यार और स्नेह से अभिभूत रखा। मगर एक दिन एकाएक सुबह सुबह तपस जी के भी रूठने की खबर मिली. हर अपना वो वो पत्रकार लगातार मेरी नजरों से ओझल हो रहे हैं जिसको मैं बहुत पसंद करता हूं। हे भगवान मुझे इस दुर्भाग्य से बचाओ प्रभू।

लेखक अनामी शरण बबल आईआईएमसी के पासआउट हैं और कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क asb.deo@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: