‘इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने नोटबंदी को बर्बादी लाने वाला एक अधकचरा कदम बताया

अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari : मोदी का घपला Modi’s bungle… भारत में मोदी के नोटबंदी के क़दम को ‘इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने अपने ताज़ा अंक (3 दिसंबर) में अच्छे उद्देश्य से बर्बादी लाने वाला एक अधकचरा कदम बताया है। इस लेख में दुनिया के उन देशों का उल्लेख है जिनकी सरकारें ऐसी कार्रवाई करके अपने देशों को बर्बाद कर चुकी हैं। आज तक एक भी देश को ऐसे क़दम से कोई लाभ नहीं हुआ है। “फिर भी मोदी ने उनसे कोई सबक़ नहीं लिया और एक ऐसा घपला कर दिया जिससे उसके घोषित उद्देश्यों के पूरा होने पर भी देश को अनावश्यक नुक़सान होगा।”

‘इकोनॉमिस्ट’ ने मोदी को ऐसी अफ़रा-तफरी मचाने वाले क़दम को वापस लेने की भी सलाह दी है। इसमें मोदी के इस प्रकार के बयानों का मज़ाक़ उड़ाया गया है कि धनी लोग नींद की गोलियों के लिये भाग रहे हैं और ग़रीब चैन की बंशी बजा रहे हैं। पचास दिन की प्रतीक्षा के बाद भारत में कोई स्वर्ग नहीं उतरने वाला है। इस टिप्पणी के अंत में इस बात पर संतोष किया गया है कि भारत में उत्तर कोरिया की तरह तानाशाही नहीं है। यहाँ के लोग चुनावों में मोदी के द्वारा मचाई गयी इस अफ़रा-तफरी का पूरा जवाब देंगे। ग़ौर करने लायक बात है कि 8 नवंबर को घोषित नोटबंदी पर ‘इकोनॉमिस्ट’ की लगभग महीने भर बाद, शायद यह पहली प्रतिक्रिया है। हम यहाँ ‘इकोनॉमिस्ट’ के इस लेख को साझा कर रहे हैं, लिंक ये है : ‘Economist’ Article on Demonetisation

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नोटबंदी से आरबीआई के नीतिगत निर्णय पूरी तरह अप्रभावित… आरबीआई ने नोटबंदी के प्रभाव को अपने नीतिगत निर्णयों के मामले में ज़रा सा भी महत्व न देने का फैसला किया है । नोटबंदी के बाद बैंकों में साढ़े ग्यारह लाख करोड़ नगद जमा हो चुके हैं, लेकिन उम्मीद के विपरीत आरबीआई ने रेपो रेट ( समय-समय पर बैंकों की ज़रूरत के अनुसार उन्हें आरबीआई से दी जाने वाली राशि पर ब्याज की दर) और रिवर्स रेपो रेट ( ज़रूरत पड़ने पर बैंकों से आरबीआई द्वारा अल्पावधि के लिये ली जाने वाली राशि पर ब्याज की दर) में कोई परिवर्तन नहीं करने का निर्णय लिया है। अर्थात, आरबीआई का यह साफ़ अनुमान है कि आज बैंकों के पास जो इतना रुपया इकट्ठा हो रहा है वह एक नितांत सामयिक मामला है । करेंसी की आपूर्ति में थोड़ी सी सहूलियत होने के साथ ही यह पूरी राशि कपूर की तरह बैंकों से उड़ जायेगी।

इसीलिये नोटबंदी से बैंकों में लाई गई राशि से आरबीआई अपनी नीति में किसी प्रकार के दीर्घकालीन प्रभाव के परिवर्तन करने के पक्ष में नहीं है । बैंकों में नगदी की भरमार की सामयिक समस्या से निपटने की सारी ज़िम्मेदारी उसने बैंकों के ही सिर पर मढ़ दी है । अब ब्याज की दरों को गिराने अथवा बढ़ाने से जुड़ा सारा जोखिम सभी बैंकों को खुद पर लेना होगा । इसमें आरबीआई की उनको कोई मदद नहीं मिलेगी । आरबीआई ने अभी बिना किसी ब्याज पर बैंकों को उसके पास सीआरआर (कैश रिज़र्व रेशियो) के तौर पर सौ फ़ीसदी राशि जमा करा देने की सुविधा जरूर मुहैय्या कराई है।

सुनने में आया था कि आरबीआई ने सरकार को बाज़ार को स्थिर करने के लिये बाज़ार से तीन-चार लाख करोड़ रुपये उठाने की योजना लागू करने का प्रस्ताव दिया था । लेकिन ऐसी किसी भी मार्केट स्टैबिलाइजेशन स्कीम को लाने के लिये सरकार को संसद की मंज़ूरी की ज़रूरत पड़ेगी । जब मोदी जी खुद इस संसद नामक जगह से भाग रहे हैं, आयकर विधेयक का काँटा अभी अटका हुआ ही है, तब एक और ऐसी वित्तीय स्कीम के लिये संसद में जाने की हिम्मत जुटाना इस सरकार के वश में नहीं है । इसीलिये आरबीआई ने भी बैंकों को उनकी जमा राशि पर किसी प्रकार का लाभ देने से इंकार कर दिया है। आरबीआई ने आज इतना जरूर स्वीकारा है कि नोटबंदी का विकास की गति पर धक्का लगा है, इसकी दर में तेज़ी से गिरावट आयेगी । लेकिन इससे मुद्रा-स्फीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसके बारे में उसका कोई आकलन नहीं है।

इसीलिये आज के समय में वह अपनी बैंकिंग नीतियों के मामले नोटबंदी के विषय को पूरी तरह से दरकिनार करके चलने में ही अपनी बुद्धिमत्ता मान रही है। नोटबंदी के महीने भर बाद अारबीआई का यह रुख़ मोदी सरकार के नोटबंदी के ‘क्रांतिकारी’ क़दम के मुँह पर एक बड़ा तमाचा है । सबको अब यही लग रहा है कि अंततोगत्वा यह क़दम भारत की जनता के जीवन में तबाही लाने वाला और एक विकासमान अर्थ-व्यवस्था में अंतर्घात करने वाला क़दम साबित होगा जिसके दुष्प्रभाव से कोई नहीं बचेगा, बैंक भी नहीं । इसमें लाभ होगा सिर्फ पेटीएम आदि की तरह की कुछ ग़ैर-बैंकिंग निजी वित्तीय कंपनियों को। यह भी कहा जा सकता है कि यह एक स्वेच्छाचारी शासक द्वारा अपनी प्रजा का उत्पीड़न करने का एक निष्ठुर खेल भर है।

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

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