नोटबंदी के महीने भर बाद छंटनी की मार अब मीडिया इंडस्ट्री पर भी!

नोटबंदी के महीने भर बीतते बीतते छंटनी की मार देने के लिए मीडिया घरानों ने भी तैयारी करनी शुरू कर दी है. मीडिया इंडस्ट्री ने विज्ञापन और आय घट जाने के कारण छंटनी और सेलरी कटौती जैसे रास्ते पर चलने का संकेत देना शुरू कर दिया है. टाइम्स आफ इंडिया के मालिक विनीत जैन ने तो बाकायदा ट्वीट कर के सेलरी कट की बात को सार्वजनिक तौर पर कह दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह कहते हैं : ”अंबानी अडानी के अलावा बाकी कारपोरेट समाज की चीख निकल पड़ी है नोटबंदी से. ये टाइम्स आफ इंडिया के मालिक हैं विनीत जैन, जिनका टाइम्स नाऊ चैनल मोदी जी/बीजेपी /RSS का “भोंपू” बन जाने पर ज़रा भी नहीं शर्माता! पर महीना बीतते न बीतते उनकी चीख निकल पड़ी है! पढ़िये क्या भाख रहे हैं? संबोधित भी मोदी जी को ही है!”

टेलीग्राफ अखबार से जुड़े सूत्रों ने खबर दी है कि अखबार प्रबंधन पहली दफे कास्ट कटिंग और छंटनी पर विचार कर रहा है. अखबार के पुलआउट बंद करने की तैयारी चल रही है और इससे जुड़े लोगों को निकालने या कम सेलरी में काम कराने की मंशा दिख रही है. कई हिंदी अखबार और न्यूज चैनलों के मैनेजर भी खर्चे बचाने के लिए विभिन्न उपाय आजमाने के लिए प्रबंधन के निर्देश पर बैठक करने लगे हैं. अतीत से सबक लेते हुए कहा जाए तो कास्ट कटिंग की पहली मार नई नियुक्तियों पर पड़ती है. नए लोगों की तैनाती नहीं की जाती और पुराने लोगों में से कइयों को परफारमेंस का आधार बनाकर बाहर कर दिया जाता है.

पत्रकार नरेंद्र नाथ ने नोटबंदी और छंटनी के मुद्दे पर फेसबुक पर लिखते हैं : ”नोटबंदी 30 दिन बाद अपडेट…नोटबंदी से तत्काल ग्रोथ में आधी फीसदी का फोरकास्ट कर दिया गया है। 7.6 ग्रोथ अब 7.1 होगी और आने वालों महीने में यह और कम हो सकती है। यह भविष्यवाणी कांग्रेसी, आपटार्ड, एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं की। ऐसा रिजर्व बैंक ने कहा है। मतलब कम से कम 2 लाख करोड़ का नुकसान इस प्रैक्टिस का कम से कम होने वाला है। 500, 1000 के लगभग सारे नोट बैंक में लौट आ जाएंगे। अभी तक लगभग 12 लाख करोड़ सिस्टम में वापस आ चुका है। यह तथ्य कांग्रेसी, आपटार्ड, एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं दिया है। ऐसा रिजर्व बैंक ने कहा है। मतलब लोगों के पास काला धन होने की बात गलत हो गयी। नोटबंदी के कारण अगले कुछ महीनों में छंटनी का बुहत बड़ा दौर शुरू होने वाला है। नयी नियुक्ति पर कंपनियों ने तत्काल रोक लगा दी है। ऐसा कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं कहा है। ऐसा सभी औद्योगिक संगठन कह रहे हैं जो अब तक सरकार के खुलकर साथ रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार की बहुत मदद की थी। नोटबंदी के बाद इंडिया में कंज्यूमर इंडेक्स 2008 के महामंदी के स्तर तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा भविष्यवाणी कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं दिया है। यह रिपोर्ट स्वतंत्र ग्लोबल मार्केट एजेंसी ने दी है। नोटबंदी का फैसला इंडियन इकोनॉमी को हर्ट करने वाला है जिसका बहुत बड़ा लॉजिक नहीं है। यह भविष्यवाणी कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया का नहीं कहना है। यह व्लर्ड की सारी मीडिया की हेडलाइन बन रही है। अब तक जनधन अकाउंट में मात्र 1 करोड़ रुपये अनअकाउंटेड मनी और कुल जमा में मात्र 2000 करोड़ अनअकाउंटेड राशि का पता लगा है। यह कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं कहा है। यह सरकार की प्रेस रीलीज कह रही है। नोटबंदी का फैसला चंद लोगों को सजा देने के लिए पूरे देश और चलती इकोनॉमी को स्थिर कर देने का फैसला साबित हो रहा है,ऐसा मेरा कहना है। आप बिकाऊ,भ्रष्ट,करप्ट या कोई भी विशेषण के साथ जवाब दे सकते हैं। आप वाह-वाह दुनिया की कल्पना रोक में रहने को स्वतंत्र हैं। आप जा रही लाखों नौकरियों के बीच जो बोले राज,वही बोले प्रजा का राग अलाप सकते हैं। आप बिहार-उत्तर प्रदेश के मजूदरों को काम छीने के बाद असमय लौट रहे मजदूरों के कष्ट को इग्नोर कर सकते हैं। बिना एक सवाल किये। बिना पूछे कि आखिर में कौन सी ऐसी अरजेंसी थी जिसके बाद यह फैसला लिया गया और क्या वह अरजेंसी अपने मकसद में पूरा करने में सफल हो रही? आप लांग रन में सब कुछ बहुत-बहुत बेहतर होगा,इसे सोच प्रसन्न रह सकते हें। बट इन लांग रन वी आल आर डेड।”

पत्रकार नदीम एस. अख्तर लिखते हैं : ”नोटबन्दी के तुरंत बाद मैंने जब लिखा कि मंदी के लिए तैयार रहिए, तो दोस्तों ने कहा कि डराइए मत। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ लेकिन ये कॉमन सेंस की बात है। अब पता ये चल रहा है कि सरकार ने करीब 15 लाख करोड़ के 500-1000 वाले नोट मार्किट से सोंख लिए और अब तक सिर्फ 4 लाख करोड़ के नोट ही बाजार में झोंक सकी है। यानी करीब 11 लाख करोड़ नकदी की भयंकरतम कमी। यानि जिस देश में 85-90 फीसद व्यापार नकद से होता हो, वहां नोटबन्दी करके नकदी की नाभिनाल ही काट दी गयी। असर ये है कि अर्थव्यवस्था के हर धड़े पे ब्रेक लग गई है और मेरा मानना है कि विकास दर 1-2 फीसद तो प्रभावित होगी ही। पक्का आंकड़ा तो गुना भाग करके कोई अर्थशास्त्री ही बता पाएगा लेकिन भारत जैसे विशाल देश में विकास दर की ये गिरावट हमारे-आपके जीवन पर भी बड़ा असर डालेगी। और मोदीजी की सरकार ने देश की इकॉनमी और इसकी जनता को ज़ोर का ये झटका कालेधन के नाम पे धीरे से दिया। अब सरकार खुद कालेधन के जुमले से पीछे हट रही है और मोदीजी कैशलेस इकोनॉमी की बात करने लगे हैं। बड़ा खेल है। पेटीएम में चीन के अलीबाबा का शेयर 40 फीसद है और उसे इस नोटबन्दी का सबसे ज्यादा फायदा हुआ है। टाइमिंग देखिये कि मोटा भाई यानि मुकेश अंबानी का मोबाइल वॉलेट भी आ गया है जो पेमेंट बैंकिंग की तरफ जाएगा। पेटीएम जा ही रहा है। यानि मोदीजी बार-बार जो कह रहे हैं कि अपने मोबाइल को ही अपना बैंक समझो, वो इसी पेटीएम, रिलायंस वॉलेट और इस जैसी कंपनियों की तरफ इशारा है। मतलब काले धन का जुमला अब कैशलेस इकॉनमी और मोबाइल वॉलेट पे आकर रुक गया है। बिना तैयारी के इतने बड़े देश को एक झटके में कैशलेस करने का मोदी सरकार का ये कदमआत्मघाती था। कुल्हाड़ी पे ही पैर मार दिया। लेकिन सवाल ये उठता है कि सरकार ने ये कदम नासमझी में उठाया या फिर सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से किया गया? आखिर वो इतने भी नादां नहीं के घर के चिराग से घर को ही आग लगा बैठें। ये देश के साथ लंबा गेम हुआ है, जिसका खामियाजा देश को आने वाले वर्षों में भुगतना ही होगा। अच्छे दिनों का वादा पूरा हो रहा है। अब ये मत पूछियेगा कि किसके अच्छे दिन?”

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