कर्जखोर माल्या पर सिस्टम की दरियादिली से दुखी वेस्ट यूपी के एक प्रगतिशील किसान ने सुनाई आपबीती

Mukesh Yadav : किसान Vs माल्याज : नीचे एक किसान की आपबीती है… यह पोस्ट इस व्यवस्था का आईना है, जरूर पढ़िए. अंधभक्त भी देखें कि ‘सीमा पर जवान, खेत में किसान’ शहादत दे रहे हैं और माल्या अम्बानी अडानी जैसे लुटेरे टैक्सपेयर्स का पैसा लूटकर प्रधामनंत्री टाइप के लोगों को किस तरह जेब में रखते हैं. संविधान इनकी डस्टबिन में पड़ा है और जज पुलिस इनकी ‘शुभ दीपावली’ की मिठाई खाकर जमीर इनके यहां गिरवी रख चुके हैं. अब आप बताइये कौन देशभक्त और कौन देशद्रोही?

वेब जर्नलिस्ट मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

डॉ. अजित : विजय माल्या बेशर्मी से देश का कई हजार करोड़ डकार कर आराम से देश में विलासिता भोग रहा है। खबर ये भी है कि जल्द ही वो लंदन शिफ्ट होने वाला है। सिस्टम उसका कुछ नही बिगाड़ पाएगा। वो आराम से यहां से निकल जाएगा। जबकि इसके उलट किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण के बदलें बैंक किसानों के नाक में दम कर देते हैं। मार्च के महीने में क्या मजाल वो अपना गन्ना भुगतान भी निकाल सके। मैनेजर उनका पैसा सीधा लोन अकाउंट में ट्रांसफर कर देते हैं।

आरसी कटने पर जिल्लत मत पूछिए। कुछ किसान तो कई कई दिन राजस्व बंदी गृह में भी रहकर आते हैं। एक ये माल्या है जिस पर बैंक का इतना बड़ा कर्जा है और उसका कोई कुछ नहीं उखाड़ पा रहा है और एक श्रमजीवी किसान है जिस पर कुछ लाख रुपए होने पर ही उसकी नाक में दम कर दिया जाता है जबकि वो कर्जा चुकाने की ईमानदार मंशा रखता है। ये देश के सिस्टम का कैसा दोहरा रवैया है। जो अन्नदाता है गरीब है उस पर कर्जे का ऐसा तकादा कि वो आत्महत्या तक कर लेता है और जो अमीर धनपशु है उससे कर्जा न वसूल पाने की अजीब सी बेबसी।

अब सैद्धांतिक बात से परे खुद का उदाहरण देता हूँ। हम भले ही बड़ी जोत के किसान रहे हैं मगर कई साल पहले हम खुद किसान क्रेडिट कार्ड के लोन के ऐसे चक्रव्यूह में फंसे थे कि बैंक मैंनेजर ने आरसी काटने की धमकी दी और लोन वसूली का ऐसा मानसिक दबाव बनाया कि पूछिए मत। लोन की राशि लाखों में थी। सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव और बैंक के दबाव के चलते अंतोतगत्वा हमने अपना एक दशहरी आम का बाग बेच कर वो कर्जा चुकाया था।

गाँव में जमीन बेचने का जो सामाजिक कलंक होता है वो गाँव देहात से जुड़े लोग बखूबी समझते हैं। आज जब विजय माल्या की बेशर्मी और सरकार की मजबूरी देखता हूँ तो अपने उस बाग़ बेचने वाले निर्णय पर अफ़सोस होता है। हमने तो कुछेक लाख के लिए अपने जी पर पत्थर रखकर सामाजिक प्रवंचना झेलते हुए वो कर्जा उतारा और एक ये माल्या है जो 7000 करोड़ का कर्जा होने के बावजूद भी ऐश कर रहा है और वो दिन दूर नहीं जब ये लन्दन शिफ्ट हो जाएगा।

सिस्टम का यही भेदभाव आदमी को विद्रोही बनने पर मजबूर करता है। मैं नहीं मानता कि नियम-कायदे मजबूत और कमजोर पर एक समान लागू होते हैं।

जिला मुजफ्फरनगर के पढ़े लिखे किसान डा. अजित के फेसबुक वॉल से.

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