जीएसटी के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार संजय कुमार सिंह की फर्म का चालू खाता बैंक ने ब्लॉक किया

जीएसटी की प्रयोगशाला की अपनी अंतिम किस्त लिख चुका हैं. यह 100 वीं किस्त है. इसी दरम्यान पता चला कि एचडीएफसी बैंक ने केवाईसी के चक्कर में (मतलब, जीएसटी जैसा कोई पंजीकरण हो) मेरी फर्म का चालू खाता ब्लॉक कर दिया है जबकि नियमतः मुझे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब आयकर रिटर्न व टीडीएस चालू खाता चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी हमें डिजिटल लेन-देन करना है। अभी उससे निपटना है।

जीएसटी पर लिखना मैंने 50 किस्त के बाद ही बंद करना सोचा था पर इतना मसाला था कि 100 किस्तें हो गईं। कुछ और व्यस्तताओं के कारण मैंने जीएसटी की प्रयोगशाला बंद कर दी पर जीएसटी की ही सख्ती में मेरा अकाउंट ब्लॉक हो गया है। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि जीएसटी में छूट का अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा उल्टे इसका दुरुपयोग हो सकता है और छूट देने के अधिकारों का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। असल में अंतिम लाभार्थी तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है।

जीएसटी से मेरी शिकायत यही है कि पहले 10 और अब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक के कारोबार को जब जीएसटी से मुक्त रखा गया है तो कंप्यूटर पर काम करने के कारण या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली के गाजियाबाद में रह कर दिल्ली और गुड़गांव के काम कंप्यूटर से करके ई-मेल से भेजने के कारण मुझपर जीएसटी की बाध्यता क्यों हो। यह तकनीक का उपयोग नहीं करने देना है। तकनीकी रूप से इसका कोई मतलब नहीं है। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है और पहले भी ऐसी कई कोशिशें नाकाम होती रही हैं पर अभी उस विस्तार में नहीं जाउंगा। फिलहाल राहत की बात यही है कि सरकार ने इन पर छूट दे दी है और अब मेरे जैसे मामलों में जीएसटी पंजीकरण की कोई तकनीकी बाध्यता नहीं है। लेकिन बैंक वालों को यह कौन समझाएगा? लकीर के फकीरों ने मेरा (असल में मेरी पत्नी की फर्म का) खाता ब्लॉक कर दिया है।

कारण यह है कि हमलोग घर से काम करते हैं और घर हमारा अपना है। अगर किराए का होता तो हम मकान मालिक से किराए का करार अपनी फर्म के नाम से करते और बैंक उस करार के आधार पर मान लेता कि मैं अपने किराए के घर से ही अपना कारोबार करता हूं। पर चूंकि घर मेरा अपना है इसलिए ऐसा कोई करार नहीं कर सकता और जरूरत नहीं है तो किराए पर ऑफिस के लिए जगह क्यों लूं? इसी तरह, अगर मैं घर से दुकान चला रहा होता (जो गलत है पर देश भर में खुलेआम चल ही रहे हैं) तो नगर निगम से दुकान और प्रतिष्ठान प्रमाणपत्र या व्यापार लाइसेंस ले लेता – अभी भी ले सकता हूं पर नहीं है इसलिए खाता ब्लॉक है क्योंकि उस पर पैसे (रिश्वत कहिए) खर्च नहीं किए हैं।

बैंक ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की सूची दी है जो तीन समूहों में है और मौखिक रूप से कहा गया है कि हरेक समूह का एक दस्तावेज चाहिए। समस्या हमारी इकाई की पहचान और पते को लेकर है क्योंकि हमारे मामले में ऐसे किसी दस्तावेज (दरअसल पंजीकरण) की आवश्यकता नहीं है और हम पर दबाव डाला जा रहा है कि हम कोई पंजीकरण कराएं और उसके नियमों में बंधें। लालफीताशाही के नियंत्रण में आएं। ऊपर मैंने कुछ उदाहरण दिए हैं और जो बाकी विकल्प हैं उनकी चर्चा करें तो आप पाएंगे कि देश में (दरअसल बैंक में) छोटा-मोटा प्रोपराइटरशिप कंसर्न चलाने से आसान है एचयूएफ चलाना। एचयूएफ यानी हिन्दू अविभाजित परिवार। कुछ लोग कहते हैं कि यह सुविधा हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए है। यहां मैं उस विस्तार में नहीं जाउंगा पर इसकी तुलना प्रोपराइटरशिप कंसर्न से करके बताउंगा कि बाप-दादा के धन पर ऐश करना तो वैसे ही आसान है एचयूएफ की सुविधाएं उसे भोगने की पूरी व्यवस्था करता है और बैंकों ने प्रोपराइटरशिप कंसर्न को उसी के मुकाबले रखकर काम करके पैसा कमाना मुश्किल बना दिया है या बना रहे हैं।

एंटाइटी यानी इकाई के सबूत के रूप में सोल प्रोपराइटरशिप कंसर्न या एचयूएफ से एक ही दस्तावेज मांगे जाते हैं जैसे बिजली, पानी, लैंडलाइन फोन का बिल जो इकाई के नाम पर हो। एचयूएफ के मामले में यह कर्ता यानी परिवार के मुखिया के नाम पर ही होगा और यही पर्याप्त है पर प्रोपराइटरशिप कंसर्न के मामले में यह कंसर्न के नाम से चाहिए। कंसर्न के मुखिया के नाम से नहीं चलेगा। इसी तरह जो भी दस्तावेज बताए गए हैं वे मेरे मामले में आवश्यक नहीं हैं इसलिए नहीं हैं और खाता ब्लॉक है (हालांकि उसमें बहुत पैसा नहीं है)। खास बात यह है कि बैंक इस बात की जांच खुद नहीं करेगा और उसकी चिट्ठियां इस पते पर डिलीवर हो रही हैं पर वह पर्याप्त नहीं है। बैंक वाले आकर भी जांच नहीं करेंगे और ना यह कहने या लिखकर देने से मानेगें कि हम जहां रहेते हैं वहीं से अपना काम भी कर लेते हैं। इसलिए जय जय।

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ये तो आईसीआईसीआई बैंक वालों की गुंडागर्दी है! (सुनें टेप)

बिना आधार कार्ड बैंक एकाउंट नहीं खोल रहे आईसीआईसीआई वाले! ICICI Bank, sector 4, Gurgaon शाखा ने एकाउंट खोलने के लिए आधार मांगा और कहा कि RBI के निर्देशानुसार, आधार के बिना एकाउंट नहीं खोल सकते। जब उनसे RBI के निर्देशों की कॉपी मांगी गई तो बैंक की कर्मचारी रानी सिंह ने कहा कि वे निर्देशों की कॉपी ईमेल पर भेज देंगी। ईमेल पर नहीं भेजा तो फिर फोन बात हुई। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए और निर्देशों की कॉपी नहीं दी।

बैंक कर्मचारी रानी के मोबाइल नंबर पर जो बातचीत हुई है, उसे सुनें। इस रिकॉर्डिंग क्लिप की बुनियाद पर ICICI Bank के खिलाफ निजता के अधिकार पर चोट का केस दर्ज करने जा रहा हूं। यह सबको पता है कि बैंक एकाउंट खोलने के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता संबंधित कोई भी कानूनी आदेश RBI या भारत सरकार ने लिखित में जारी नहीं किये हैं। क्या देश अब सिर्फ तानाशाही फरमानों से चलेगा? कानून नाम की कोई चीज़ नहीं रहेगी मोदी जी के राज में? सुनिए बातचीत का टेप…

मुकेश सोनी कुल्ठिया की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

देश में आर्थिक आपातकाल लगा जनता को बुरे हाल में छोड़ कर विदेश निकल लिए प्रधानमंत्री जी (देखें वीडियो)

Abhishek Sharma : मोदी जी, झांसा किसे? बहुत बड़ा अर्थशास्त्री नही हूँ, जितना आम आदमी को अर्थ की जानकारी है, हां, उससे थोड़ा 19-20 होगा ही। 24 घंटे का ड्रामा बहुत हो गया। अब आप जापान निकल लिए। ठीक है। जरुरी दौरे करें। देश तरक्की करे। आपके दौरों से इससे ज्यादा न मुझे न किसी और को कुछ चाहिए। बात अचानक नोट बंद करने की है। इतना तो मैं क्या आम आदमी भी जानता है कि देश के कुल धन का आधा टॉप 100 उद्योगपतियों के पास है। इनको सरकार नये इन्वेस्टमेंट में छूट देती है, लोन देती है, उनको कागजी मदद भी।

मगर मोदी जी उन सौ लोगों को छोड़ (देश में मौजूद) कुल रकम की आधी ब्लैक मनी के लिए पूरी जनता (सवा अरब) को आपने परेशान किया। जिनके पास देश की कुल रकम का आधा हिस्सा है क्या वह सौ लोग ईमानदार हैं? आंकड़े गवाह हैं कि सरकार भी उन्हीं सौ लोगों को पाल पोस रही है जिनके पास देश की आधी रकम है। अब बात सवा अरब लोगों की करूँ… आपने तय समय में ब्लैक मनी घोषित करने पर छूट दी। मतलब जो लुटेरे रहे हैं उनको आपने डिस्काउंट ऑफर दिया, इन लुटेरों में वह आईएएस बंसल भी हैं जिसने बेटे संग सुसाइड कर लिया आपके तोते और अध्यक्ष पर आरोप लगाकर।

मोदी जी अब सुनिए खरी खरी… आपको आधी रकम के मालिक टॉप सौ लोग पालने पड़ रहे हैं। देश के दस हजार ब्लैक मनी वालों को आप डिस्काउंट ऑफर दे रहे हैं और वह मध्यम वर्ग जो दो जून की रोटी के लिए जी रही है उसको आप बैंक में लाइन लगवा रहे हैं? कितने मासूमो की गुल्लक फूटी, कितने गृहणियों (गृह लक्ष्मियों) की पैसे बचाने की आदत पर आपने पानी फेरा, कितने सराफा वालों ने इस रकम का सोना बेच डाला, कितने पेट्रोल पम्प वालों ने जबरन 500 का पेट्रोल डाला, काशी में चिताएं जलाना दूभर हुआ, शादी ब्याह के सीजन में परिवारों को चुनौती दी।

मेरे कहने का अर्थ यही कि आर्थिक आतंकवादियों और धन पशुओ को आप डिस्काउंट ऑफर दे रहे हैं उनकी जांच तक नही कर रहे और ड्रामा इतना कि देश भक्ति उबालें मारने लगी आपकी और हां उन लोगों की भी जो आज छुट्टा कराने को दर दर भटके। क्या आपके नये 2000₹ और 500₹ को पाकिस्तान कॉपी कर नकली करेंसी नही बना पायेगा? आपकी दिल्ली में बैठकर दस रूपये के अवैध सिक्के ढाले जा रहे थे और आर्थिक आतंकवाद बाहर से आने का रोना रो रहे हैं। माना कि उत्तरप्रदेश में चुनाव सर पर हैं सपा, बसपा को आर्थिक दिक्कतें होंगी मगर यह ख्याल आपको आया कि यहाँ छुट्टा के लिए भटक रहा वोटर भी है? नोट- यह पोस्ट भक्तों के लिए नही है।

दैनिक जागरण में कार्यरत सीनियर सब एडिटर अभिषेक शर्मा की एफबी वॉल से.

दिल्ली में जनता का बुरा हाल जानने देखने के लिए इस वीडियो को जरूर देखें :  https://youtu.be/jtQYT8xc-dY

मजीठिया मंच : इमरजेंसी में भी प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर… देश में इमरजेंसी जैसी स्थिति है और हमारे प्रधानमंत्री चले जापान। पूराी आथ्र्ज्ञिक व्‍यवस्‍था दो दिन से ठप है। आम लोग परेशान हैं । 8 तारीख की घोषणाओं पर कहीं से काम नहीं हो रहा है। हर बार इस तरह के बदलाव को सह कह कर कि कुछ पेशनियां आम आदमी को झेलान हेााग। राष्‍ट्र हित में यह जरूरी है। लेकिन इस इमरजेंसी की हालत में व्‍यवस्‍था भी तो इमरजेंसी जैसी होनी चाहिए। बैंककों का दिन रात क्‍यों नहीं खोला जा सकता और आवश्‍यक स्‍थानों पर सरकार की ओर से लोगों की मदद की व्‍यवस्‍था क्‍यों नहीं है। इस पूरे प्रकारण में प्रधानमंत्री और सरकार की जिम्‍मेदारी क्‍या है। व्‍यवस्‍था को दुरुस्‍त है ही नहीं कहीं। दो दिन के बाद भी करेंसी की कोर्ठ ठोस व्‍यवसथा नहीं है। और यह मान लेना कि काला धन केवल करेंसी के रूप में है हम सबकी समझ से परे है।

फेसबुक पर बने मजीठिया मंच नामक पेज से.

इसे भी पढ़ें :

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बड़ौदा ग्रामीण बैंक ने एक निजी कंपनी का बीमा अपने ग्राहकों को जबरन बेचना शुरू किया

अटल पेंशन योजना व प्रधानमन्त्री बीमा योजना को ठेंगा दिखाकर आजकल बड़ौदा ग्रामीण बैंक एक निजी कंपनी का बीमा अपने ग्राहकों को जबरन बेंच रही है। इसके लिये शाखा प्रबन्धकों पर जबरन पॉलिसी बेचने का दबाव है। जो प्रबन्धक इस बीमा कंपनी इंडिया फर्स्ट की पॉलिसी नहीं बेचेंगे उन्हें चार्जशीट मिलेगी। उत्पीड़न होगा और इन्क्रीमेंट रुकेगा। इस बीमा कंपनी का कोई कर्मचारी नहीं, अधिकारी नहीं व अभी तक यूपी में कोई कार्यालय भी नहीं।

बैंकों पर दबाव डालकर बड़ौदा यूपी ग्रामीण बैंक के चेयरमैन ने अब तक ग्राहकों की मर्जी के बिना उनके खातों से पैसा सीधा इस बीमा कंपनी के खाते में डाल दिया। शिकायत यह भी है कि बड़ी संख्या में इस बीमा कंपनी के बॉन्ड ग्राहकों को नहीं मिल रहे हैं। सवाल उठता है कि बैंक जहां अधिकारियों कर्मचारियों की संख्या पहले से कम है, वहां कोई निजी बीमा कंपनी अगर बैंक संसाधनों व अधिकारियों से अपना व्यवसाय कराएगी तो आम उपभोक्ताओं का क्या होगा।

ये वो संदेश है जो सभी ब्रांच मैनेजरों को भेजा गया है…

All BH’s are advised to login atleast 2 new indiafirst mahajivan policies and maximum renewels on login days, scheduled on 19-5-2016 & 20-5-2016

रिपोर्ट- अनिल मधुकर, संपर्क : anilshuklamadhukar@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कर्जखोर माल्या पर सिस्टम की दरियादिली से दुखी वेस्ट यूपी के एक प्रगतिशील किसान ने सुनाई आपबीती

Mukesh Yadav : किसान Vs माल्याज : नीचे एक किसान की आपबीती है… यह पोस्ट इस व्यवस्था का आईना है, जरूर पढ़िए. अंधभक्त भी देखें कि ‘सीमा पर जवान, खेत में किसान’ शहादत दे रहे हैं और माल्या अम्बानी अडानी जैसे लुटेरे टैक्सपेयर्स का पैसा लूटकर प्रधामनंत्री टाइप के लोगों को किस तरह जेब में रखते हैं. संविधान इनकी डस्टबिन में पड़ा है और जज पुलिस इनकी ‘शुभ दीपावली’ की मिठाई खाकर जमीर इनके यहां गिरवी रख चुके हैं. अब आप बताइये कौन देशभक्त और कौन देशद्रोही?

वेब जर्नलिस्ट मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

डॉ. अजित : विजय माल्या बेशर्मी से देश का कई हजार करोड़ डकार कर आराम से देश में विलासिता भोग रहा है। खबर ये भी है कि जल्द ही वो लंदन शिफ्ट होने वाला है। सिस्टम उसका कुछ नही बिगाड़ पाएगा। वो आराम से यहां से निकल जाएगा। जबकि इसके उलट किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण के बदलें बैंक किसानों के नाक में दम कर देते हैं। मार्च के महीने में क्या मजाल वो अपना गन्ना भुगतान भी निकाल सके। मैनेजर उनका पैसा सीधा लोन अकाउंट में ट्रांसफर कर देते हैं।

आरसी कटने पर जिल्लत मत पूछिए। कुछ किसान तो कई कई दिन राजस्व बंदी गृह में भी रहकर आते हैं। एक ये माल्या है जिस पर बैंक का इतना बड़ा कर्जा है और उसका कोई कुछ नहीं उखाड़ पा रहा है और एक श्रमजीवी किसान है जिस पर कुछ लाख रुपए होने पर ही उसकी नाक में दम कर दिया जाता है जबकि वो कर्जा चुकाने की ईमानदार मंशा रखता है। ये देश के सिस्टम का कैसा दोहरा रवैया है। जो अन्नदाता है गरीब है उस पर कर्जे का ऐसा तकादा कि वो आत्महत्या तक कर लेता है और जो अमीर धनपशु है उससे कर्जा न वसूल पाने की अजीब सी बेबसी।

अब सैद्धांतिक बात से परे खुद का उदाहरण देता हूँ। हम भले ही बड़ी जोत के किसान रहे हैं मगर कई साल पहले हम खुद किसान क्रेडिट कार्ड के लोन के ऐसे चक्रव्यूह में फंसे थे कि बैंक मैंनेजर ने आरसी काटने की धमकी दी और लोन वसूली का ऐसा मानसिक दबाव बनाया कि पूछिए मत। लोन की राशि लाखों में थी। सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव और बैंक के दबाव के चलते अंतोतगत्वा हमने अपना एक दशहरी आम का बाग बेच कर वो कर्जा चुकाया था।

गाँव में जमीन बेचने का जो सामाजिक कलंक होता है वो गाँव देहात से जुड़े लोग बखूबी समझते हैं। आज जब विजय माल्या की बेशर्मी और सरकार की मजबूरी देखता हूँ तो अपने उस बाग़ बेचने वाले निर्णय पर अफ़सोस होता है। हमने तो कुछेक लाख के लिए अपने जी पर पत्थर रखकर सामाजिक प्रवंचना झेलते हुए वो कर्जा उतारा और एक ये माल्या है जो 7000 करोड़ का कर्जा होने के बावजूद भी ऐश कर रहा है और वो दिन दूर नहीं जब ये लन्दन शिफ्ट हो जाएगा।

सिस्टम का यही भेदभाव आदमी को विद्रोही बनने पर मजबूर करता है। मैं नहीं मानता कि नियम-कायदे मजबूत और कमजोर पर एक समान लागू होते हैं।

जिला मुजफ्फरनगर के पढ़े लिखे किसान डा. अजित के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के लिए अपराध, दहेज के लिए डकैती

एक थोड़ा चौंकानेवाला समाचार आया है। बिहार के भागलपुर जिले में एक पिता ने बेटी का दहेज जुटाने के लिए बैंक में डाका डाला। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों की गिरफ़्तारी की और उनके पास से छह लाख रुपये बरामद किए हैं। 

पुलिस के अनुसार छोटी लड़की के पिता कन्हैया ने अपनी सबसे छोटी बेटी के दहेज के लिए डाका डाला और इसमें उसके दामाद और अन्य रिश्तेदार भी शामिल थे। कुछ लोगों ने 26 मई को भागलपुर के घंटाघर में बिहार ग्रामीण बैंक को लूट लिया। गिरफ़्तार लोगों ने पूछताछ के दौरान बताया कि उन्होंने दहेज की रकम जुटाने के लिए डकैती की थी। डाके के बाद कन्हैया ने दहेज की रकम पहुंचाने के लिए लड़के वालों से संपर्क भी किया लेकिन पुलिस के दबाव के कारण ऐसा नहीं हो पाया। यूं पुलिस के हिसाब से इस लूट का मुख्य अभियुक्त कन्हैया यादव बैंक डकैती समेत कई मामलों में पहले से ही नामज़द है। यानि कि बड़ी लड़की का विवाह भी कन्हैया ने कुछ इसी तरह पैसे का इंतजाम करके किया था।

इस समाचार के दो पहलू हैं। पहला तो यह कि दहेज़ लेना और देना एक अनिवार्य प्रथा है चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। इसे समाज की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त है तभी कन्हैया के सभी रिश्तेदार उसके साथ इस वारदात में शामिल थे। दूसरा यह कि आरोपी अपराध के कई अन्य छोटे-मोटे मामलों में भी नामदर्ज़ है। अर्थात आजीविका के लिए भी छोटे मोटे अपराध समाज में स्वाभाविक हैं जो महज बिहार के दूरदराज के एक गांव तक सीमित न होकर भारत के किसी भी हिस्से में होते रहते हैं। बड़ी चोरियों डकैतियों की बात छोड़ दें जिन्हें एक संभ्रांत या प्रभावशाली तबके का  हासिल होता है। लेकिन यहां उल्लेखनीय यह है कि आज भी दहेज़ प्रथा भारतीय समाज में बहुत हद तक कायम है। भले ही वर्तमान समय में ऐसी अनेक अमानवीय रूढ़ियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, लेकिन इन्हीं कुप्रथाओं में से एक दहेज प्रथा आज भी विवाह संबंधी रीति-रिवाजों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस कुप्रथा ने समाज को स्त्रीविरोधी और पाखंड का प्रतीक बना रखा है। और इसने आधे भारतीय समाज को अशक्त कर दिया है। यह एक ऐसे दैत्य का स्वरूप ग्रहण कर चुका है, जो पारिवारिक जीवन को देखते ही देखते विषाक्त कर डालता है। इसका विकृत रूप समाज को भीतर से खोखला कर रहा है।

मध्य वर्ग इसका बहुत बड़ा वाहक है।  करोड़ों स्त्रियां इसकी बलिवेदी पर अपने प्राण दे चुकी हैं। इसने लाखों नारियों को पति का घर छोड़ने पर विवश किया है। समाज सुधारकों के प्रयत्नों के बावजूद दहेज़ प्रथा ने अत्यंत विकट रूप धारण किया हुआ है। यह कुप्रथा समाज तथा कन्या के माता पिता के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। हमारा समाज पुरुष प्रधान है। हर कदम पर केवल पुरुषों को बढ़ावा दिया जाता है। बचपन से ही लड़कियों के मन में ये बातें डाली जाती हैं कि बेटे ही सब कुछ होते हैं और बेटियां तो पराया धन होती हैं। उन्हें दूसरे के घर जाना होता है, इसलिए माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बेटा होता है न कि बेटियां। समाज में सबकी नहीं पर ज्यादातर लोगों की सोच यही होती है कि लड़कियों की पढ़ाई में खर्चा करना बेकार है। उन्हें पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना बेकार है, आखिरकार उन्हें दूसरों के घर जाना है। पर यदि बेटा कुछ बनेगा कमाएगा तो माता-पिता का सहारा बनेगा।

यद्दपि न तो आज बेटे, मां बाप के साथ रह पाते हैं न ही वे उनका बहुत ख्याल ही रखते हैं। एक और तथ्य यह भी कि लड़कों के ऊपर खर्च किए हुए पैसे उनकी शादी के बाद दहेज में वापस मिल जाता है। यही कारण है कि माता-पिता बेटों को कुछ बनाने के लिए कर्ज तक लेने को तैयार हो जाते हैं। पर पारम्परिक रूढ़िवादी समाज में लड़कियों की हालात दयनीय ही रहती है, उनकी शिक्षा से ज्यादा घर के कामों को महत्व दिया जाता है। ज्‍यादातर माता-पिता लड़कियों की शिक्षा के विरोध में रहते हैं। वे यही मानते हैं कि लड़कियां पढ़कर क्या करेगी। उन्हें तो घर ही संभालना है। परंतु माता-पिता को समझना चाहिए कि पढऩा-लिखना कितना जरूरी है वो परिवार का केंद्रबिंदु होती हैं । उसके आधार पर पूरे परिवार की नींव होती है। उसकी हर भूमिका चाहे वो बेटी की हो, बहन का हो, पत्नी की हो बहू का हो या फिर सास की, पुरुषों के जीवन को वही सही मायने में अर्थ देती है। लड़की के विवाह के लिए सामान्यत: निम्न मध्यमवर्गीय व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य से अधिक रूपये खर्च करने पड़ते हैं| इसलिए विवश होकर उसे या तो ऋण की शरण लेनी पड़ती है या अनुचित साधनों से वह धन की व्यवस्था करता है। ऋण लेकर विवाह करने पर कभी-कभी उसका समस्त जीवन ऋण चुकाने में ही निकल जाता है।

यह सब कुछ सातवें दशक की किसी फिल्मी कहानी सा लगता है। लगता है कि आज भी बहुल समाज उन्नीसवीं सदी में जी रहा है। दहेज़ की समस्या के कारण और अपने माता पिता की दयनीय दशा देखकर कभी-कभी कन्याएँ इतनी निराश और दुखी हो जाती हैं कि आत्महत्या कर लेती हैं। वे सोचती हैं कि अपने माता पिता की दयनीय दशा का कारण वे ही हैं इसलिए “न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी ” लोकोक्ति चरितार्थ करती हुई वे अपना जीवन ही समाप्त कर लेती हैं। दहेज लोभी व्यक्ति केवल विवाह के अवसर पर मिले दहेज को पा कर ही संतुष्ट नहीं होते बल्कि विवाह के बाद भी कन्या पक्ष से उनकी माँगें बराबर बनी रहती हैं और अपनी इन अनुचित माँगों की पूर्ति का माध्यम वे इन विवाहित कन्याओं (वधुओं) को ही बनाते हैं। इन माँगों के पूरा न होने की स्थिति में वे नव वधुओं को शारीरिक एवं मानसिक यातनाएं देते हैं। जैसे भूखा रखना, बात-बात पर कटूक्तियां कहना, मारना पीटना, अंग भंग कर देना आदि तरीकों से वे नवविवाहिता को अपने माता पिता से दहेज लाने के लिए विवश करते हैं। यदि इतने पर भी वे और दहेज नहीं ला पाती हैं, तो उन्हें जिंदा जला दिया जाता है या हमेशा के लिए त्याग दिया जाता है। एक बड़ी कठिनाई इस मामले में यह पेश आती है कि लड़की के माँ बाप हमेशा इस बात से भयभीत रहते हैं कि अगर लडके वालों कि बात नहीं मानी गई,उन्हें मन मुताबिक दहेज़ न दिया गया तो वे लड़की को परेशान करेंगे इसलिए वे दहेज़ की अनुचित मांग भी स्वीकार लेते हैं।

इस मामले में पढ़े-लिखे और कम पढ़े दोनों तरह के लोगों का एक ही तरह का सोच होता है। आश्चर्य तो यह कि वे मांए जो स्वयं इस कुरीति से प्रभावित हुई हैं वे भी इस काम को ठीक मान लेती हैं। कन्या के पढ़े-लिखे और अच्छी नौकरी करने के बावजूद वे दहेज़ देने की वकालत करने लगती हैं। जबकि सामने वाला उनकी इस कमजोरी का फायदा उठता है। यदि वे माँ बाप थोड़ी मजबूती दिखाएँ तो वरपक्ष को यह भी समझ आता है कि इनसे पंगा लेना ठीक नहीं। तब वह भी अपनी सीमा में रहने को बाध्य होता है। हमें यह समझना चाहिए कि ऐसी ही कमजोरी के कारण हम अपनी बेटी को दोयम श्रेणी के नागरिक के रूप में स्वीकार लेते हैं। यूँ ऊपरी तौर पर इस कुप्रथा का कोई भी पक्षधर नहीं दिखना चाहता परन्तु अवसर मिलने पर लोग दहेज लेने से नहीं चूकते|

ज्वलंत प्रशन यह है कि इस सामाजिक कोढ़ को कैसे समाप्त किया जाये ? दहेज के सन्दर्भ में नवविवाहिताओं की म्रत्यु सम्बन्धी मामलों में न्यायधीशों ने नववधुओं के पिता, सास-ससुर आदि को म्रत्यु दंड देकर इस कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में प्रयास किया है, परन्तु यह कुप्रथा सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है।  इसको दूर करने के लिए सरकार ने दहेज विरोधी क़ानून बनाया है। दहेज को अवैध घोषित कर दिया है, परन्तु क़ानून बन जाने से कुछ नहीं हो पा रहा है। इस कानून का दुरुपयोग भी होने लगा था अतः गत वर्ष इसमें संशोधन भी किया गया है।  फिर भी दहेज़ हत्याएं और प्रताङना एक वास्तविकता है। इसके विरोध में व्यापक जनचेतना की जरूरत है। व्यापक प्रयास करने की आवश्यकता है। इसे रोकने के लिए जागरूक नागरिकों को आगे आना होगा तथा दहेज़ देने और लेने वाले लोगों को इस बारे में प्रेरित करना होगा कि वे विवाह में किए जाने वाले फिजूल खर्च को बंद कर सादगी से ऐसे सामाजिक एवं पारिवारिक कार्यक्रम करें। सरकार के साथ-साथ समाज सेवी संस्थाएं तथा समाजसेवा में रुचि रखने वाले लोग इस प्रथा के विरुद्ध जागृति उत्पन्न करने तथा रोकने के कड़े उपाय करें, तो इससे छुटकारा पाया जा सकता है। इस तरह उन्हें कुछ अनुचित करने की आवश्यकता भी नहीं होगी और न  परेशानियों का सामना ही करना पड़ेगा। 

लेखक शैलेंद्र चौहान से संपर्क : shailendrachauhan@hotmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: