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नुक्कड़ नाटकों के क्रांतिकारी रहनुमा गुरशरण सिंह के जन्मदिन पर विशेष

-अमरीक-

गुरशरण सिंह हमारे दौर के योद्धा थे। एक विलक्षण सांस्कृतिक महा-लोकनायक। एक ऐसी मशाल जो मनुष्य विरोधी हर अंधेरे को चीरने के लिए सदैव तत्पर रहती है। उन्होंने लोक चेतना के लिए जो किया और जैसा जीवन जिया, उसे पीढ़ियां-दर-पीढ़ियां यकीनन याद रखेंगी। उस विरली-निराली एक शख्सियत के कई मकबूल नाम थे। गुरशरण सिंह..भाजी..बाबा…भाई मन्ना सिंह…। आकड़ों और (विश्व स्तरीय) रिकॉर्डों का संकलन करने वाली नामी-गिरामी संस्थाओ तथा व्यवस्थाओं की जानकारी में हो या नहीं, लेकिन यह तथ्य ऐतिहासिक ओर बेहद जिक्रेखास है कि गुरशरण सिंह ऐसे नाटककार-संस्कृति कर्मी रहे जिन्होने अपने सूबे (पंजाब) के एक- एक गांव, कसबे और शहर में जाकर नाटक किए। बेशक ज्यादा तादाद नुक्कड़ नाटकों की रही। उन्हें नुक्कड़ नाटकों का अनथक व क्रांतिकारी रहनुमा बेवज़ह नहीं कहा जाता।

भारत, उत्तर भारत, पंजाब का सियासी व सामाजिक इतिहास और गुरशरण सिंह का रंगकर्म-सफरनामा साथ-साथ चले है। जिस भी घटना ने देश और पंजाब की दशा-दिशा पर अहम असर छोड़ा, उन्होंने बाकायदा उस पर नाटक लिखा और किया। उनमें से कई घटनाएं आज भले ही विस्मृत है पर उन पर भाजी के लिखे नाटक जिंदा है। पंजाब में एक काला दौर ऐसा रहा है जब लोग अखबारों की खबरों और विश्लेषणों पर कम, गुरशरण सिंह के नाटकों और तर्कों पर ज्यादा भरोसा करते थे। खालिस्तानी-सरकारी आतंकवाद के उस खौफनाक दौर में गुरशरणजी ने जो महान काम किया, उसकी मिसाल समूची दुनिया में शायद दूसरी नहीं। उस काली आंधी में जब सूबे की ज्यादातर कलमें खामोश थीं और संस्कृतिकर्मी खौफजदा होकर घरों में आराम कुर्सियों पर बैठ गए थे तो इस बुजुर्ग बाबा ने खिलाफ वक्त को यूं ही बगल से नहीं गुजरने दिया। चौतरफा खूनखराबा और आपाधापी के बीच, ऐन जमीनी स्तर पर जाकर अमन और सद्भाव के लिए सशक्त काम किया। अपनी कला के जरिए अवाम को बड़ी बारीकी से समझाया-बताया कि हिन्दू-सिख एकता कायम रहेगी तो पंजाब बचेगा,देश बचेगा, वर्ना कुछ नहीं बचेगा।

आंतकवाद के काले दौर में कट्टरपंथी मरजीवड़े आतंकी तो गुरशरण सिंह के मुखर खिलाफ थे ही- हुकुमत तथा गैर वामपंथी सियासत भी उनके मुखालिफ थी। वजह भी शीशे की मानिंद साफ थी। उनके उस दौर के नाटको में संत जनरैल सिंह भिंडरावाला, संत हरचन्द सिंह लौंगोवाल, जत्थेदार,गुरूचरणसिंह तोहड़ा, जत्थेदार तलवंडी , सुरजीत सिंह बरनाला, और प्रकाश सिंह बादल के साथ-साथ इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह, दरबारा सिंह, राजीव गांधी और कैप्टन अमरिंदर सिंह भी बकायदा पात्र होते थे। सबके सब खलनायक की भूमिकाओ में होते थे।

प्रसंगवश, भाजी का एक नाटक है ‘हिटलिस्ट’। इस नुक्कड़ नाटक का मंचन एक बार अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास किया गया।’संत जी’ इसमें पात्र बनाये गये थे। उन दिनो संत जी की दहशत समूचे पंजाब में बेतहाशा दनदना रही थी और उनकी बदनाम, जालिम तथा जानलेवा ‘हिटलिस्ट’ के किस्से खासजनों तथा आम लोगों को खूब थर्राते थे। चलते नाटक के बीच गुरशरण सिंह जी को धमकी दी गई, नाटक फौरन बंद करने का फरमान सुनाया गया और सूचित किया गया कि आज के बाद उनका नाम हत्यारी हिटलिस्ट में शुमार हो। लेकिन न नाटक रुका और न जान से मार दिये जाने की धमकी फौरी तौर असर दिखा पाई, उल्टे भाजी का बुलंद और अडिग जवाब था कि हथियारों के बूते उन्हें खौफजदा करने की कोशिश न की जाए। हथियार उन्हें भी चलाने-उठाने आते हैं। कोई गलतफहमी नहीं रहनी चाहिए, एक हिटलिस्ट अवाम के भीतर भी आकार ले रही है और उनमें उन सब के नाम शिखर पर हैं जो धर्म और राजनीति के नाम पर निहत्थे व बेगुनाह लोगों पर जुल्म कर रहे हैं।

गुरशरण सिंह

खैर, इस घटना के बाद गुरशरण सिंह को सरकारी एजेंसियों के जबरदस्त दबाव के चलते अमृतसर छोड़कर चंडीगढ़ चले जाना पड़ा। हालाकि उनके प्रशंसकों का एक बड़ा तबका भी चाहता व मानता था कि भाजी को जुनूनी आतंकियो का आसान शिकार कतई नहीं बनना चाहिए। इसी मानिंद गुरशरण सिंह के एक और मशहूर नाटक में बादल, बरनाला और कैप्टन पात्र थे। उसके एक मंचन के दौरान बतौर मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला भी दर्शक-दीर्घा में थे। खुद को पात्र और वह भी खलनायक के तौर पर देखकर वह नाराज होकर उठकर चले गए, पर गुरशरण सिंह ने इस सबकी कोई परवाह नहीं की। यही बरनाला जी मुख्यमंत्री थे और एक नाट्य उत्सव में मुख्य अतिथि थे। वहीं भाजी ने भी नाटक प्रस्तुत करना था। मुख्यमंत्री को बावक्त आता न पाकर उन्होने रोष स्वरूप बहिष्कार कर दिया और नाट्यशाला से बाहर आकर नाटक किया। वह बेखौफ तार्किक प्रतिरोध से लबालब से भरे हुए थे।

सोलह सितम्बर 1929 को जन्मे गुरशरण सिंह ने बतौर इंजीनियर लंबा अरसा भाखड़ा डैम में बिताया। वहां वह अक्सर श्रमिक हितों को लेकर लैक डैम के प्रबंधतंत्र से टकराया करते थे। उसी सिलसिले में उन्होने कुछ निर्णायक हड़तालों और आंदोलनो की मजबूत अगुवाई भी बखूबी की। भाजी के भीतर सक्रिय नाटककार ने भाखड़ा डैम पर जन्म लिया। वह श्रमिकों और कर्मचारियों के बीच अर्थपूर्ण नाटक प्रस्तुत करते तो बहुधा प्रबंधन और शिखर अफसरशाही को उनके तीखे तेवर रास न आते। मगर गुरशरण पूरी जिद और लोक समर्पण की भावना से जुटे एवं अड़े रहते। जून, 1975 के बर्बर आपातकाल का उन्होंने हर लिहाज से पुरजोर से विरोध किया था। आपातकाल के जोरदार विरोध में नाटक किए तथा कई सेमीनार आयोजित किए। बौखलाई सरकार ने कई तरह की धमकियां देकर उन्नीस सितम्बर 1975 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। बेशक इस इंकलाबी संस्कृतिकर्मी की सरकार विरोधी सांस्कृतिक गतिविधियां नहीं ही रूकीं। वह निरन्तर अलख जगाते रहे।

जून-84 और नवम्बर-84 ने पंजाबियों और पंजाब को बहुतेरे जख़्म दिये हैं। उस अवधि में भी गुरशरण सिंह पंजाब और पंजाबियत की गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति बनकर सामने आए। खालिस्तानी और राज्य आतंकवाद के प्रबलविरोधी गुरशरण ने आपरेशन ब्लू स्टार का भी अपने तई जबरदस्त विरोध किया और गाँव कस्बों तथा शहरो में जाकर नुक्कड़ नाटक करके तत्कालीन पंजाब संकट की असली परतों से अवाम को रू-ब-रू करवाया। यही काम उन्होंने नवंबर-84 के भयावह सिख विरोधी कत्लेआम के बाद किया। तब उन्होंने ने दिल्ली, कानपुर, हरियाणा व अन्य हिंसाग्रस्त इलाकों में जाकर नुक्कड़ नाटक किया। उनके हर नाटक में यह खुला संदेश है कि व्यवस्था न बदली और हम खामोश रहे तो बार-बार जून-84 और नवंबर-84 होंगे। 1969-71 की नक्सलबाड़ी लहर के साथ भाजी की खुली और सक्रिय सहानुभूति थी। उस लहर ने पंजाब में दस्तक दी तो उन्होने उसके पक्ष में सांस्कृतिक मोर्चा संभाला।

पंजाबी के कतिपय नामवर लेखक, कवि व नाटककार नक्सलबाड़ी लहर की देन है। अवतार सिंह पाश, सुरजीत पातर, लालसिंह दिल, अमरजीत चंदन, संतराम उदासी, मित्रसेन मीत, वरियामसिंह संधू, अत्तरजीत,त्रिलोचन तथा अजमेर सिंह औलख आदि कुछ खास नाम है। इन सबका गुरूशरण सिंह से लगाव जगजाहिर है। बहुत कम लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि पाश का पहला चर्चित कविता संग्रह और वरियामसिंह संधू का पहला कहानी संग्रह गुरशरणजी ने ही छापा था। कितने ही लेखक व नाटककार उनके संरक्षण में परिपक्व हुए और आम पाठकों तक पहुंचे। उन्होंने बलराज साहनी प्रकाशन की स्थापना की थी, जिसका मूल मकसद अच्छा जनवादी और प्रगतिशील साहित्य बेहद कम कीमत पर साहित्यप्रेमियों तक पहुंचाना था। अपनी इस मुहिम को उन्होंने ताउम्र जारी रखा। लोक मुद्दों और लोक साहित्य-संस्कृति पर आधारित कुछ पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन भी गुरशरण सिंह ने समय-समय पर किया। बलराज साहनी उनके गहरे दोस्त थे तो मशहूर फक्कड़ हिन्दी कवि कुमार विकल भी बहुत करीबी दोस्तो में शुमार थे। उन्होंने प्रेमचंद से लेकर असगर वजाहत तक की कहानियों पर आधारित पंजाबी में कालजयी नाटक लिखे।

कई पंजाबी उपन्यासों में गुरशरणजी नायक के तौर पर जनहित में लड़ाइयां लड़ते दिखते हैं। केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक मित्रसेन मीत ने तो अपने तीन उपन्यासों में उन्हे नायक बनाया है। तीनों उपन्यास हिन्दी में एक ही जिल्द में ’रामराज्य ’ के नाम से अनुदित होकर संकलित है। बेशुमार कहानियों और नाटको में भी गुरशरण सिंह ने अपने बड़े कद के साथ, पात्र बनकर उपस्थित हैं। उन पर ढेरों कविताएं और गीत भी है। ऐसा विरल सम्मान और स्नेह पंजाबी में शायद ही किसी और को हासिल हो।

गुरशरण सिंह की अपार लोकप्रियता की ही मिसाल है कि पंजाब में सैकड़ों, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें उनके कई नाटकों के दृश्य और संवाद हूबहू बखूबी याद हैं। इन नाटको में ‘बाबा बोलदा है’, ‘टोया’, ‘हिटलिस्ट’, ‘कुर्सीवाला-मंजीवाला’, ‘जंगीराम दी हवेली’, ‘ऐह लहू किस दा है’, ‘धमक नगारे दी’, ‘कुर्सी मोर्चा ते हवा दे विच लटकदे लोग’, ‘नवां जनम’ आदि प्रमुख हैं। ये वे नाटक हैं जिनका मंचन उन्होने पंजाब के चप्पे-चप्पे में किया है। एक गांव में किये जा रहे नाटक को आस-पास के कई गांवों के लोग, हजारों की संख्या में एकजुट होकर देखते थे।

उन्होने दूरदर्शन के लिए धारावाहिक भी बनाया था-’भाई मन्ना सिंह’। इस धारावाहिक में पंजाब के संताप से जुड़ी कहानियो की नाटकीय प्रस्तुति होती थी। इस धारावाहिक ने उन्हें और ज्यादा मकबूल किया और उनका एक और नाम भाई मन्ना सिंह पड़ गया। देश के कई अन्य इलाको में भी वह भाई मन्ना सिंह के नाम से खासे मशहूर हैं। गौरतलब है कि धारावाहिक के लिए भाजी ने किसी किस्म का विचारधारात्मक समझौता नहीं किया था और पंजाब की बाबत् एक सही समझ शेष देश को देने की कोशिश की थी। यह काम उन सरीखा शख्स ही कर सकता था।

गुरशरण सिंह ने प्रगतिशील इंकलाबी संगठनों को एक मंच पर लाने की कई बार कोशिश की। प्रमुख संगठन हर बार शहीद भगत सिंह शहादत दिवस पर उनके पुश्तैनी गांव खटकर कलां में बदस्तुर जुटते। इसी मानिंद हमख्याल लोग आए बरस जालंधर स्थित देशभगत यादगार हाल में होने वाले ‘मेला गदरी बाबयां’ इकठ्ठा होते।

उन्होंने एक बेमिसाल काम सुदूर देशों मे नुक्कड़ नाटक करने का किया। यही वजह है कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग जानते-मानते हैं। पंजाबी-हिन्दी के साथ-साथ गुरशरणसिंह ने अंग्रेजी में भी नाटक किये। विमर्श और संवाद का कोई भी मौका वे छोड़ते नहीं थे। विद्यार्थी तथा युवा संगठनो में भी उन्होंने खूब काम किया। विद्यार्थियों और युवाओं को वह अपनी असली ताकत मानते थे। महिला व बाल सरोकार भी उनकी चिन्ताओं में शिद्दत से शुमार थे।

इन पंक्तियों के लेखक ने बतौर पत्रकार गुरशरणसिंह के कई इंटरव्यू लिये। एक बार उनसे पूछा कि मूलवाद और प्रगतिशीलता विरोधी ताकतों से लड़ने का ऐसा जज्बा पहले-पहल कब पनपा? एक वाकया उन्होंने सुनाया। 1947 में बँटवारे के वक्त वह करीब सत्रह साल के थे। अमृतसर के हाल बाजार से एक जुलूस निकल रहा था। अलफ नंगी औरतों का। वे मुसलिम परिवारों से थी और घोड़ों पर सवार, तलवारों-बरछों से लैस जुनूनी लोग उन्हे घेरे चल रहे थे- शर्मनाक तरीके से उन्हें अपमानित करते हुए। किशोर गुरशरण यह सब देखकर दहल गए और तभी प्रण लिया कि आज के बाद हर तरह की धार्मिक कट्टरता के खिलाफ काम करेगें। ताउम्र उन्होंने किया भी।

चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने आतंकवादियों से खुली बातचीत की कवायद शुरू की। साप्ताहिक सण्डे-मेल के लिए इस मुद्दे पर मैने गुरशरण जी का लम्बा साक्षात्कार लिया। रोष में उन्होंने कहा था कि आतंकी संगठनों से भारत सरकार को जरूर बात करनी चाहिए, लेकिन बातचीत में उन समूहों को भी शामिल करना चाहिए, जिन्हें आंतकवादियो ने निशाने पर लिया। तत्कालीन केंद्र सरकार की शर्त थी कि आमने-सामने संवाद से पहले आतंकवादियों को हथियार छोड़ने होंगे और भारतीय संविधान में आस्था रखनी होगी। गुरशरण सिंह का दो टूक कहना था कि यह शर्त दरअसल एक सरकारी मजाक है। खालिस्तानी आंतकवादियों से बातचीत तो करनी ही इसलिये है कि वे हथियार छोड़ दें और भारतीय संविधान को मान लें। भाजी का कहना एकदम सही था। बाद में वह सरकारी कवायद एकदम मजाक बनकर रह गई थी।

वह पंजाब के रेशे-रेशे से वाकिफ थे।

एक बार उन्होंने न छापने की शर्त पर मुझे बताया था कि एक आला सरकारी एजेंसी के बड़े अधिकारी उनसे मिलने आए और पेशकश की कि जितना चाहे (सरकारी) पैसा ले लीजिए, आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम तेज कीजिए पर सरकार के प्रति अपना रवैया नर्म कर लीजिए। गुरशरण सिंह ने सख्ती से इंकार करते हुए उक्त अधिकारियों को चलता किया तथा खूब खरी-खोटी सुनाई। भाजी ने जितना काम खालिस्तानी आतंकवाद पर किया, ठीक उतना ही सरकारी आतंकवाद के खिलाफ भी। उनका साफ मानना था कि व्यवस्था की विसंगतियां धार्मिक कट्टरतावाद और साम्प्रदायिक हिंसा को बल देती है। उन्होंने फर्जी मुठभेड़ों का भी जबरदस्त विरोध किया। जहां संत भिंडरावाला और कतिपय सियासतदानों को उन्होने नाटकों का खलनायक बनाया वहीं सूबे के तत्कालीन डीजीपी रिबेरो, केपीएस गिल व राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर रे सरीखे मुठभेड़ विशेषज्ञों को भी नहीं छोड़ा ।

अब जिस्मानी तौर पर भाजी गुरशरण सिंह नही हैं पर उनका नाम जिन्दा है और सदैव जिंदा रहेंगे। और सदा जिंदा रहेंगे उनके विचार। उनके आलोचक सही ही कहते हैं कि उनके समूचे कृतित्व में कला-सौंदर्य कम बल्कि चिंतन-विचार ज्यादा है। वह हमेशा इसी पर अडिग रहे कि कला कला के लिए नहीं, अवाम और उसके बेहतरी के लिए होती है।

तो सदा रहेगी गुरशरण सिंह की रोशनी……!

लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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