पत्रकारों का गुस्‍सा हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे नेताओं पर है

मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकारों, जाओ मूली उखाड़ो, पेट साफ हो जाएगा… हेमन्‍त-कलहंस को धरचुक्‍क दिया तो नया पांसा पड़ा… तू डाल-डाल, मैं पात-पात कहावत सच… हेमन्‍त-कलहंस धड़ाम… 

Kumar Sauvir : आयुर्वेद में मूली का अप्रतिम व्‍याख्‍यान है। मूली के जितने गुण आयुर्वेद, यूनानी और ऐलोपैथी सभी पैथियों ने पहचाने हैं, वह अनिर्वचनीय है। लेकिन दिक्‍कत यह है कि लखनऊ और आसपास के जिलों में खेतों की जगह अब मकान उग चुके हैं। अगर ऐसा न होता दोस्‍तों, तो मैं आज मैं अपने सभी मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार भाइयों को ऐलानिया सुझाव देता कि:- दोस्‍तों। जाओ, जहां भी दिखे, मूली उखाड़ लो। पत्रकार नेताओं ने अपनी काली-करतूतों के चलते जो बदहजमी का माहौल किया है, उसे सिर्फ मूली ही निदान है।

यह सलाह उप्र के राज्‍य स्‍तरीय मान्‍यताप्राप्‍त समिति के सदस्‍यों के लिए बिलकुल मुफीद है। समिति को बिलकुल मजाक-माखौल बनाने पर आमादा समिति के कलमुंहे पत्रकार नेता। सिर्फ दलाली और नेताओं की चाटुकारिता पर आमादा इन पत्रकार नेताओं ने अब नया पैंतरा फेंका है, वह यह कि चुनाव अब 29 अगस्‍त को होगा। आपको बता दें कि पत्रकारों का गुस्‍सा हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे नेताओं पर है, जो पिछले तीन साल से अवैध तरीके से समिति पर कब्‍जा किये हुए हैं। पत्रकारों ने नये चुनाव की गुजारिश की तो उसे हेमंत-कलहंस ने ठुकरा दिया, नतीजा पत्रकारों ने आम बैठक आहूत करके छह सितम्‍बर को चुनाव का ऐलान किया। यह फैसला हेमंत-कलहंस को हडबड़ा गया, तो उन्‍होंने चुनाव करने की तारीख पांच सितम्‍बर कर दिया।

हेमंत-कलहंस की इस करतूत पर जवाब देते हुए कल पत्रकारों ने तय किया कि यह मतदान की तारीख अब 30 अगस्‍त को होगी। इसके लिए इन लोगों ने अनेक कारण गिनाये, मसलन त्‍योहार वगैरह। लेकिन हकीकत यह थी कि यह लोग चाहते थे कि हेमंत-कलहंस की करतूत को जवाब दिया जा सके। लेकिन आज दोपहर अचानक हेमंत-कलहंस ने एक नया धामिन-दांव चलाया और खबर फैला दी कि चूंकि रक्षाबंधन समेत अनेक त्‍योहार सिर पर है, इसलिए अब नया चुनाव 29 अगस्‍त को ही होगा।

जाहिर है कि पत्रकारों की परस्‍पर यह लड़ाई अब चरम पर पहुंच गयी है। भले ही यह युद्ध हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे पत्रकारों की दलाली और निकृष्‍टता के विरूद्ध विशुद्ध पत्रकारीय हितों को लेकर चल रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि हेमंत-कलहंस के इस दांव ने पत्रकारीय दायित्‍वों को कमजोर करने की कोशिश तो कर ही दी है। हकीकत यही है कि समिति को कब्‍जाने के खिलाफ पत्रकार नेताओं ने हेमंत-कलहंस की मनमानी के खिलाफ बिगुल बजा दिया था और जो खुद को शेर-ए-हिन्‍द बनते नहीं थकते थे, पत्रकारों ने उन्‍हें उनके ही पिंजरे में बंद कर दिया था, वह प्रयास फिलहाल कमजोर हो चुका है। हालांकि अब फैसला तो भविष्‍य के गर्भ में ही है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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