रंडियों के गांव वाली चित्रलेखा

कुमार सौवीर

नटपुरवा, हरदोई : गर्म-गोश्‍त की दूकानों वाले गांव से पहले करीब डेढ़ दर्जन अधेड़ और युवक मेरी कार को घेर लेते हैं और फिर शुरू हो जाती है इन दुकानदारों के बीच ग्राहकों को अपनी तरफ खींचने की आपाधापी। कोई गेट खोलने में जुटा है तो कोई रास्‍ता रोक रहा है। ग्राहक को लुभाने और खींचने के लिए मानो गदर-सी मच गयी है।

एक बोला: एक से बढिया बिटियन हौ हमरे लगे। पहिले दीखि ल्‍यौ। बिटियन के दिखावै के कउनौ पइसा नाय हौ। परसंद लगै तब पइसा दीह्यौ। कउनौ जबरजस्‍ती तौ ह्यौ ना।

दूसरा: ( एक-दूसरे को मोटी गाली देते हुए ) हटौ ना। हमका बात करै द्यौ। साहब, पहिले देख्‍य ल्‍यौ। माल त अइसन ह्यौ—

फिर शुरू हो जाता है दुकानदारों के बीच झगड़ा और आपसी नंगी गालियों का तूफान। कान की लवें गरम हो गयीं। लकीर की तरह गहरे गड्ढों के बीच पसरी सड़क पर अपनी कार आगे बढ़ा लेता हूं। कुछ दूर एक दूकान के सामने रूक कर जैसे ही चंद्रलेखा का पता पूछने की कोशिश करता हूं तो दुकानदार हम लोगों के हाथ पकड़ कर भीतर खींचना चाहता है: एइसन ब्‍यवस्‍था पूरी ह्यौ इहां। आवौ ना साहब। इहां सबै बिटियन तइयार हैं।

एक किशोर तो पूरी दीनता के साथ बोल पड़ा : हमार बहिन के द्यौ खिल्‍यौ ना साहब।

ऐसे ही अनुनय-विनय और अपने पीछे छोड़ी गयीं अरदासों के छींटों से बचने के लिए हम फिर आगे बढ़े। साथ में दो तेज-तर्रार पत्रकार। चंदौली वाले अनिल सिंह और हरदोई के आदर्श त्रिपाठी। संडीला में मिल गये थे आदर्श। अगला करीब 20 मील का रास्‍ता और वापसी उनके साथ रही। दलालों की बातचीत वाले माहौल की ही तरह सड़क के नाम पर शर्मनाक रास्‍ता, धंसी पुलिया, खतरनाक गड्ढे और धूल के बगूले। संडीला के बाद से ही बिजली तो दूर, खंभे तक का नाम-निशान नहीं। हम आये हैं यहां चंद्रलेखा से मिलने। 55 बरस वाली चंद्रलेखा यहां गोदौरा के पास नटपुरवा में रहती है। एक बेटी और 3 बेटे। बेटी की शादी कर दी है, जबकि बेटे मजदूरी करते हैं। चंद्रलेखा ने दूसरों के कुछ खेत बटाई पर हासिल कर लिए हैं।दरअसल, नटपुरवा और सिकरोरी गांव बिलकुल सटे हुए हैं। बीच में एक नहर है, लेकिन इन दोनों की संस्‍कृति बिलकुल अलग। व्‍यवसाय तो दूर, इन दोनों के बीच बात-बोली तक कत्‍तई नहीं। पूछने पर सिकरोरी वाले अपना नाक-भौं सिकोड़ते हुए सपाट जवाब देते हैं : अरे साहब, यह रंडियों का गांव है। चाहे वो मौलवी साहब रहे हों या पंडित जी, संडीला से आगे बढ़ने पर जितने भी लोगों से नटपुरवा का पता पूछा, जवाब शरारती मुस्‍कान के साथ ही मिला।

करीब साढ़े 3 सौ साल पहले शुरू हुई थी नटपुरवा की मौजूदा हालत। 7 बेटियों के बाप जब्‍बर बाबा जब घर चलाने में असमर्थ हो गये तो पास के मंडोली गांव के जमीनदार के खेतों में बेटियों ने मजदूरी शुरू कर दी। जमींदार की नीयत बदली और बच्चियों को मजूरी में अनाज ज्‍यादा मिलने लगा। नीयत और लालच की डगर में जब्‍बर की गृहस्‍थी के चूल्‍हे भड़कने लगे और उसी रफ्तार से सातों लड़कियों का यौवन भी जमींदार की हवास में स्‍वाहा हो गया। और नट, बंजारा जैसी कुशल जातियों की युवतियों की ऐसी कमाई पर नटपुरवा में फलता-फूलना शुरू हो गया। आज करीब 5 हजार आबादी वाली में यहां की करीब एक दर्जन युवतियां मुम्‍बई में हैं। 7 तो दुबई में कमा रही हैं। लेकिन कई लड़कियां ऐसी तो रहीं जो गांव की दहलीज से निकल कर कमाई के लिए बाहर गयीं, लेकिन कभी लौटी ही नहीं।लेकिन चंद्रलेखा ऐसी नहीं थीं। एक वेश्‍या श्‍याहन के पुत्र थे महादेव। पास वाले सिकंदरपुर वाली पार्वती से शादी हो गयी महादेव की। चंद्रलेखा उन्‍हीं की बेटी है। तीन और भाई हैं। लेकिन महादेव और पार्वती ने बेटी चंद्रलेखा को गांव की तर्ज पर जिन्‍दगी के बजाय उसे पढ़ाने-लिखाने का रास्‍ता दिखाया। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

गांव की दस्‍तूर के मुताबिक गांव की बहुओं को तो पूरा सम्‍मान मिलता है, लेकिन बेटियों का बिकना अनिवार्य। उनके दुकानदार होते हैं पिता और भाई। रास्‍ता बताती हैं वे महिलाएं जो उम्र चुक जाती हैं और इस तरह वे भूख और अपनी बाकी उम्र काटने की जुगत लगाती हैं। चंद्रलेखा  के साथ भी यही हुआ। श्‍याहन ने अपनी पोती को उस धंधे में लगा ही दिया। दादी की साजिश के चलते बुआ राजेश्‍वरी ने एक ग्राहक खोजा था। तब चंद्रलेखा की उम्र थी महज 15 साल। अचानक एक शाम उसके घर एक आदमी आया तो घरवाले घर के बाहर चले गये। वह कयामत की रात थी चंद्रलेखा के लिए जब उसे किसी शेर ने बकरी की तरह बेतरह नोचा-खसोटा। बाद में पता चला कि उसकी अस्‍मत 200 रूपये की कीमत पर अदा की गयी है। घर में शराब और गोश्‍त का जश्‍न मनाया गया कि लड़की अब कमाने लगी है। और उसके बाद तो यह नीयत ही बन गयी। रोज ब रोज, यही सब। हर रात मौत, जीवन नर्क। बेटियों और बहनों की देह से बरसते नोटों पर जी रहे लोगों कोई दिक्‍कत नहीं। कौन बोले। विरोध की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी। हम लोगों को खुद को भड़वा और दलाल कहलाने में कोई गुरेज नहीं होता। खैर, चंद्रलेखा सुंदरता की कसौटी पर नहीं थी, सो, उसे नाचना पड़ा। शादी-मुंडन में। नाचना क्‍या, बस कुछ भोंडा सा कमरमटक्‍का और बेहूदा और अश्‍लील फिकरे। हर नोट दिखाने वालों का भद्दा अंदाज। भड़वे और दलाल बढ़ते रहे और देह-व्‍यापार भी। 30 साल की उम्र तक यही तक तो चलता ही रहा।
ढलती उम्र पर उसने अपनी देह बेचने का धंधा खत्‍म करना पड़ा। मजबूर भी थी मैं। एक सवाल पर चंद्रलेखा बताती है कि बदन बेचने की उम्र होती ही कितनी है। सिर्फ तब तक, जब तक उसे बच्‍चे न पैदा हो जाएं। उसके बाद उसकी तरफ कोई झांकता भी नहीं। हां-हां, पति तो खूब होते हैं हम लोगों के। हर रोज एक नया मर्द, हर रात सुहागरात और हर रात एक नया पति। सवालों के जवाब पर चंद्रलेखा साफ अल्‍फाजों में बोलती हैं कि किसी रंडी के बच्‍चों के बाप का नाम कौन जानता है। चंद्रलेखा के सबसे बेटे नीरज उर्फ टीटू ने अपने पिता का नाम पूछने पर बताया कि इस गांव में ज्‍यादातर लोगों को अपने पिता का पता ही नहीं। ऐसी कोई परम्‍परा यहां ही नहीं। शादी का मतलब यह नहीं होता है कि उसके पैदा होने वाले बच्‍चे के बाप का नाम पहचाना जाए।

चंद्रलेखा को खूब याद है वह दिन, जब लखनऊ के बख्‍शी तालाब इलाके के कठवारी गांव में राम औतार सिंह मास्‍टर के बेटे की शादी पर उसे नाच के लिए बुलाया गया था। जून की गर्मी सिर नचा रही थी। चंद्रलेखा की टीम थोड़ी देर से पहुंची तो अपने मेहमानों के सामने शेखी बखारने के लिए रामऔतार ने गुस्‍से में उसे रंडी की औलाद कहते हुए बंदूक दिखा कर डराया। रूंआसी चंद्रलेखा ने गुस्‍से में बोल दिया कि मैं रंडी जरूर में मेरी मां रंडी नहीं थी। चंद्रलेखा भी भिड़ गयी और साफ कह दिया कि अब वे नाच नहीं करेगी। चंद्रलेखा बताती है कि उसने नाच-गाना उसी समय बंद कर दिया और चंद्रिका माई मंदिर की सीढि़यों पर अपने घुंघरू को माथे लगाते हुए कसम खा ली कि चाहे कुछ भी हो जाए, मगर अब यह धंधा हमेशा के लिए बंद। मगर कुछ ही दिनों में आटा-दाल का दाम दिखने लगा, मगर वह संकल्‍प से हटी नहीं। कलपते बच्‍चों के लिए उसने गुड़ की कच्‍ची शराब बनाने की कोशिश की। महुआ वहां होता ही नहीं है। तैयारी के लिए अपनी चांदी के गहने बेचे। बच्‍चों की मदद से शराब बनायी और उसी दिन शाम को उसे बोतल भरने चली। उत्‍साह में छोटे बेटे मोनू ने मां की मदद के लिए माचिस जलाकर रोशनी करने की कोशिश की, लेकिन अचानक शराब भक्‍क्‍क्‍क्‍स से जल गयी। उसी समय से यह काम भी खत्‍म। अगले दिन से दूर के गांव में मजदूरी करने लगी। बड़ा बेटा नीरज उर्फ टीटू लखनऊ के नक्‍खास में एक ढाबे पर बर्तन धोने में लग गया।

कुछ दिनों तक यही चला कि इसी बीच एक सामाजिक कार्यकर्ता संदीप ने उसकी मदद की। शुरूआत हुई नटपुरवा की गंदगी दूर करने से। जबर्दस्‍त मेहनत हुई और जल्‍दी ही बदहाली के खिलाफ उसकी पहचान केवल हरदोई में ही नहीं, बल्कि देश भर में हो गयी। देह-व्‍यापार के खिलाफ उसका आंदोलन इतना मजबूत हुआ कि नटपुरवा में यह धंधा एक चौथाई ही सिमट गया। गांव के बच्‍चों के लिए उसने स्‍कूल खुलवाया। जनसमस्‍याओं के खिलाफ आंदोलन में चंद्रलेखा अब जनजागरण की प्रतीक हो गयी। मेधा पाटकर के साथ दिल्‍ली का प्रदर्शन हो या पेप्‍सी के खिलाफ बनारस में पुलिस की लाठियां, चंद्रलेखा का नाम हो गया। मुम्‍बई में नीता अम्‍बानी ने अपनी हीरोज अवार्ड के लिए उसे पांच लाख का पुरस्‍कार दिया। उसी रकम से उन्‍होंने अपना मकान बनवाया और कुछ सामान खरीदा। जमीन खरीदने की हैसियत ही नहीं।

चंद्रलेखा साफ कहती हैं कि इस गांव में अवैध शराब तो अभी तो बनायी-बेची जाती है। पुलिसवालों के तर्क अलग हैं। वे कहते हैं कि उन्‍हें रोक दिया तो ये डकैती शुरू करेंगे। तो इससे बेहतर है शराब का धंधा ही करते रहें। वेश्‍यावृत्ति की दिक्‍कत पर उन्‍होंने एक बार यहां के एक एसपी ओपी सागर से शिकायत की। जानते हैं कि क्‍या जवाब मिला। बोले कि अगर वहां धंधा होता है तुमको क्‍या ऐतराज। पैसा तो यहां आता ही है। बेशुमार। लेकिन पूरा गांव मौज करता है। रोज पार्टियां। बाहर से आने वाले लोगों की तादात बहुत है। लखनऊ से आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर, ठेकेदार। धुंधलाते ही यहां उन लोगों की बाढ़ आ जाती है जो यहां अपना चेहरा काला करते हैं। कई लोग तो ऐसे हैं जो यहां की लड़कियों को बाहर बुलाने के लिए बड़ी रकम अदा करते हैं। लेकिन इसमें खतरे खूब हैं।

इसी बीच अपनी बेटी पूनम की शादी की। शाहजहांपुर के एक यादव परिवार में। लेकिन चंद्रलेखा ने कभी कुछ छुपाया नहीं। अब वह गांव की दूसरी लड़कियों की शादी में जुटी है और इसके लिए वह रकम जुटा रही है ताकि गांव की दूसरी लड़कियों को उन माहौल न मिले जिसे उसने कभी भोगा है या दूसरी लड़कियां कर रही हैं। अब भी चंद्रलेखा रामचरित मानस, भागवत, पूजा, व्रत करती है ताकि आत्‍मबल बढ़ता रहे। गरीबों के लिए सरकारी मकान के बारे में कोई खबर ही नहीं। गिने-चुने इंडियामार्क-2 ही लगे हैं। शहर इतनी दूर है कि बीमारी पर ईलाज पहुंचने से मौत आ जाती है। च्ंद्रलेखा को एक जुझारू नेता महावीर सिंह दिखा जो हर आवाज पर मदद करने पहुंचा। आज वे विधायक हैं। वरना पुराने विधायक मन्‍नान तो मंत्री होने के बावजूद हमें नटपुरवा में कभी झांकने तक नहीं आये। यहां झांकने तो नरेश अग्रवाल भी कभी नहीं आये। नरेश अग्रवाल  को इस इलाके से कभी कोई मतलब ही नहीं। उनका यह इलाका हरदोई शहर तक ही सिमटा है ना, और वोट के अलावा वे कुछ सोचते तक नहीं। इसीलिए।

सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री ऊषा ने इस गांव को करीब से महसूस किया है। वे बताती हैं कि तब यहां आने वाला ग्राहक यहां लुट-पिट कर ही लौटता था। गनीमत कि अब तो हालात फिर बहुत ठीक हैं। चंद्रलेखा ने वाकई बेमिसाल काम किया है यहां। ऊषा बताती हैं कि अभी यहां बहुत कुछ किया जा सकता है, बशर्ते सरकारी अमला सक्रिय हो। मुख्‍य विकास अधिकारी आनन्‍द द्विवेदी इस इलाके को लेकर चिंतित हैं। वे कहते हैं कि अब इस क्षेत्र पर ध्‍यान दिया ही जाएगा। एडीएम राकेश मिश्र का मानना है कि ऐसे

विकास कार्यों के बल पर हालातों को काबू किया जा सकता है और महिला सशक्तिकरण की योजनाएं इसमें प्रभावी कारगर होंगी। मगर जिलाधिकारी अनिल कुमार को पता ही नहीं है कि हरदोई में क्‍या हो रहा है। वे नहीं जानते हैं कि इस जिले में कुछ ऐसा भी होता है। बहरहाल, वे पता करेंगे कि ऐसे गांव हमारे जिले में हैं भी या नहीं। लेकिन पुलिस अधीक्षक आरके श्रीवास्‍तव मानते हैं कि कानून को सख्‍ती से लागू करके अपराध को खत्‍म किया जाएगा। वे मानते हैं कि इस बारे में जल्‍दी ही काम किया जाएगा।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. यह लेख डीएनए में प्रकाशित हो चुका है.

राजस्थान की भाजपा सरकार मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी में..  इस वीडियो को ध्यान से जरूर सुनें और पूरा सुनें…

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सरकार बनी नहीं, हेमंत तिवारी मुख्य सचिव और डीजीपी बनवाने में जुट गया!

कुमार सौवीर

सरकार कहीं नही, पत्रकार लपके अफसरों की सेटिंग कराने… बेहद गहरी और अथाह कथा है सेटिंगबाज पत्रकारों की… मुख्‍यमंत्री कौन बनेगा, इसका पता भाजपा को भी नहीं मगर मुख्‍य-सचिव और डीजीपी के लिए लामबन्‍दी स्‍टार्ट… मुख्‍यसचिव के लिए संजय अग्रवाल और डीजीपी के लिए सुलखान सिंह के लिए पेशबंदी शुरू…

लखनऊ : न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा। यह कहावत तो आप सभी ने खूब सुनी होगी। लेकिन उसे चरितार्थ करने का जिम्‍मा निभाने के लिए यूपी के तथाकथित पत्रकारों के बीच धंधाबाजी की दूकान चमकाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। जाहिर है कि इन पत्रकारों का मकसद इस तरह की चर्चा छेड़ कर अपने लिए पसंदीदा माहौल तैयार कराना ही है, जहां वे बेहतर तरीके से पत्‍तलें चाट सकें।

जी हां, यह कवायद यूपी के मुख्‍य सचिव और डीजीपी की नियुक्ति को लेकर छेड़ी जा चुकी है। हैरत की बात है कि यह चर्चा तब शुरू हो चुकी, जब यूपी विधानसभा की कई सीटों के नतीजे तक नहीं सामने आ पाये। इतना ही नहीं, अभी यह तक तय नही हो पाया है कि बनने वाली सरकार का मुखिया यानी मुख्‍यमंत्री कौन होगा और, नयी सरकार किस तारीख को राजभवन में शपथ ग्रहण करेगी। लेकिन यूपी के धंधेबाज पत्रकर पत्रकार इस मामले में अपनी-अपनी टांग सरकार के फटे में फंसाने में आमादा दिख रहे हैं।  

शनिवार की शाम नेशनल वायस न्‍यूज चैनल में एक स्‍वयंभू पत्रकार हेमंत तिवारी ने अपनी रणनीति का खुलासा कर दिया। इस चैनल पर आयोजित एक परिचर्चा पर उन्‍होंने बताया कि किस-किस तर्क-कुतर्क के बल पर नयी सरकार के गठन के बाद प्रदेश के सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण ओहदों पर किन-किन लोगों की तैनाती होगी। जिन पदों पर नियुक्ति की बात हुई, उसमें मुख्‍य सचिव और प्रदेश पुलिस प्रमुख आदि प्रमुख हैं।

इस चैनल पर चल रही इस परिचर्चा को भांपने-सूंघने की कोशिश कर रहे एक दर्शक ने बताया कि इस परिचर्चा के दौरान हेमंत तिवारी को भी मौका दिया गया था। इस दौरान हेमंत तिवारी ने खुलासा कर दिया कि अगला डीजीपी और मुख्य सचिव कौन-कौन होगा। इस दर्शक को इस बात पर ऐतराज था कि जब यह भी नही पता चल पाया है कि कौन मुख्यमंत्री की पद की शपथ लेगा और कौन-कौन कैबिनेट मंत्री रहेगा, ऐसी हालत में नये डीजीपी और मुख्य सचिव के संभावित नामों का ऐलान कर देना चाटुकारिता ही नहीं तो और क्या है?

इस दर्शक के अनुसार हेमंत तिवारी ने अगले डीजीपी 1980 बैच के आईपीएस अफसर सुल्खान सिंह और 82 बैच के प्रवीण कुमार का नाम ले लिया, जबकि दूसरी ओर मुख्य सचिव के नाम पर वरिष्ठ आईएएस अफसर संजय अग्रवाल के नाम की घोषणा कर दी। कहने की जरूरत नहीं कि हेमंत तिवारी की लोकप्रियता पुलिस अफसरों से घनिष्‍ठता को लेकर मानी जाती है। इसी मसले पर एक अन्‍य वरिष्‍ठ पत्रकार ने एक तल्‍ख टिप्‍पणी कर दी कि डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी की तैनाती के लिए इन नामों को उछालने में जुटे हेमंत तिवारी दरअसल अपनी गोटी फिट कराने की फिराक में हैं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और मेरी बिटिया डॉट कॉम नामक न्यूज पोर्टल के संपादक हैं.

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डासना जेल में कैद आईएएस राजीव कुमार क्या ईमानदार अधिकारी है?

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : बेहद पढ़ाकू और परिश्रमी रहा है राजीव कुमार। शुरू से ही उसका सपना रहा है कि वह अपने देश और अपने देशवासियों की सेवा के लिए अपनी हर सांस अर्पित कर देगा। अपने इस सपने को साबित करने के लिए राजीव ने कठोर परिश्रम किया और वह आईएएस बन ही गया। लेकिन नौकरी की शुरूआती पेंचीदगियों ने उसे तोड़ना शुरू कर दिया। वह संशय में फंस गया कि उसके जीवन और उसके सपनों की नैया राजनीतिज्ञ निबटायेंगे या फिर उसके संवर्ग के वरिष्‍ठ सहयोगी। सोचा तो पता चला कि जिस तरह उसके वरिष्‍ठ सफलता की पींगें में लात उचका रहे हैं, वह ही रास्‍ता सर्वश्रेष्‍ठ है।

राजीव कुमार को उसके वक्‍त ने तोड़ा, उसकी नौकरी ने तबाह किया या फिर हताश खिलाड़ी जैसा हश्र हुआ राजीव का। आज तक पता नहीं। ले‍किन आजकल अंदाज यह लगाया जाता है कि राजीव एक ईमानदार और कम बोलने वाला शख्‍स है। वह मीडिया-फ्रेंडली कभी भी नहीं रहा। व्‍यवहार में हमेशा रूखापन रहा राजीव में। पत्रकार उसकी इस प्रवृत्ति से खासे नाराज रहे हैं।

लेकिन हकीकत यही है कि राजीव नीरा यादव के शिकंजे में फंस चुका था। नीरा ने अपने उसकी पोस्टिंग करा दी। बस, फिर क्‍या था। नीरा यादव ने उसकी इस ख्‍वाहिशों को पहचान लिया और उसे लपक कर अपने गले लगा दिया। राजीव नया लड़का था, नीरा की लालच में फंस गया। नीरा ने उसे अपना डिप्‍टी बनवा लिया। और फिर उसके माध्‍यम में ऐसे-ऐसे धोखाबाजियों करा लिया कि फिर तौबा-तौबा। नीरा यादव का हर धोखा उसने ईमानदारी में साबित करने में अपनी जिन्‍दगी भिड़ा दी। सन-95 में नोएडा में नीरा के अधीनस्‍थ बन कर उसने नीरा की जूतियां तक चाटना शुरू कर दिया।

लेकिन मामला फंस गया। राजीव भूल गया कि वह मूलत: नौकर है, शाहंशाह नहीं। नतीजा, मामला अदालतों तक पहुंच गया। सुप्रीम तक ने उसे तीन साल की सजा दे दी। साबित कर दिया कि राजीव कुमार बेईमान था, जिसने धोखाधड़ी के चलते सरकार को चूना लगाया। लेकिन जानने वाले आज भी जानते हैं कि राजीव कुमार वाकई ईमानदार शख्‍स है। लेकिन उसने अपने आकाओं की शह पर बेईमानियों पर ईमानदारियों का ठप्‍पा लगा दिया।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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कुमार सौवीर विस्तार से बता रहे हैं कि जयपुर में हेमंत तिवारी के साथ हुआ क्या था

अपना ही कीर्तिमान तोड़ दिया हेमन्त तिवारी ने, इस बार जयपुर के पिंक-सिटी प्रेस क्लब में कूटे गये : बिना इजाजत के लिए घुस गये जयपुर के प्रतिष्ठित प्रेस क्लब में : मना करने के बावजूद देर रात तक दारू पीकर किया खूब हंगामा, दी गालियां : मना करने पर की नंगी गालियों की बौछार, नहीं माने तो लोगों ने कर दी कुटम्मस : कल्याण सिंह से अपने अधिवेशन से समय न मिल पाने से खीझे थे हेमन्त :

कुमार सौवीर

लखनऊ : लखनऊ में दूसरी किस्म की पत्रकारिता के लिए खासे मशहूर हेमन्त तिवारी ने पिछले दिनों अपना ही एक नया रिकार्ड बना लिया। अपने पुराने कीर्तिमानों से ध्वस्त करते आमादा हेमन्त तिवारी ने अपना यह नया रिकार्ड जयपुर प्रेस क्लब में बनाया। नतीजा, यह कि उनकी हरकतों से आजिज पत्रकारों ने उन्हें वहां जमकर कूट दिया। खबर है कि हालातों की नजाकत को देखते हुए हेमन्त तिवारी मौके से भाग निकले। जयपुर प्रेस क्लब के वरिष्ठ पदाधिकारी बाबूलाल जी ने इस घटना की पुष्टि की है, लेकिन बताया है कि यह पिटाई जमकर नहीं, बल्कि हल्की-फुल्की ही हुई थी। हां, उन्होंने स्वीकार किया है कि अगर हेमन्त तिवारी मौके से फौरन न भाग निकलते तो उनकी जमकर पिटाई जरूर हो जाती।

खैर, सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों हेमन्त तिवारी और उनके एक अन्य‍ साथी जयपुर प्रेस क्लब में गये थे। वक्त था रात करीब 9 बजे का। जयपुर प्रेस क्लब के नियमों के अनुसार प्रेस क्लब में केवल वही लोग प्रवेश हासिल कर सकते हैं जो प्रेस क्लब के सदस्य हों। हां, अगर कोई सदस्य अपने किसी सदस्य को अपने साथ प्रेस क्लब में ले जाना चाहता है तो प्रेस क्लब प्रशासन से इसके लिए गेस्ट कार्ड जारी कराना अनिवार्य होता है। हालांकि इसके लिए कोई विशेष शुल्क नहीं लिया जाता है, लेकिन ऐसी व्यवस्था इसलिए की गयी है ताकि कोई अराजक व्यक्ति या समूह प्रेस क्लब की मर्यादा न तोड़ सके।

लेकिन उस रात हेमन्त और उनके एक साथी प्रेस क्लब में एक अन्य‍ सदस्य के साथ प्रेस क्‍लब भीतर चले गये। करीब पांच मिनट तक हेमन्त‍ ने अपने जयपुर आने का मकसद अपने साथियों को बताया। सूत्रों के अनुसार हेमन्त तिवारी चाहते थे कि राजस्थान के राज्यपाल और बड़े भाजपा नेता रहे कल्याण सिंह से अपने किसी तथाकथित प्रेस यूनियन की बैठक के लिए समय ले लें। लेकिन सूत्र बताते हैं कि कल्याण सिंह ने इस बारे में दो-टूक जवाब दे दिया। बताते हैं कि कल्‍याण सिंह ने साफ कह दिया कि पत्रकारों की मान्य यूनियनों के अलावा वे किसी ऐसे-वैसे गुट से अपना रिश्ता नहीं रखना चाहते हैं।

बहरहाल, अपने इस प्रयास की हार देखते ही हेमन्त तिवारी और उनके साथी अपना गम गलत करने के लिए जयपुर पिंक प्रेस क्लब में गैरकानूनी तौर पर घुस गये। हेमन्त और उनके साथी के इस प्रवेश पर प्रेस क्‍लब के पदाधिकारियों ने केवल पूछताछ की, लेकिन जब पता चला कि हेमन्त लखनऊ के रहने वाले हैं तो उन्होंने कोई खास ऐतराज नहीं किया। हां, इतनी चेतावनी जरूर दे दी कि आइंदा बिना गेस्ट-कार्ड हासिल किये वे क्लब में प्रवेश नहीं करें। बस, इसी बात पर हेमन्त का मूड खराब हो गया। बताते हैं कि कुछ देर वे चुपके से क्लब के बार में घुस गये, और वहां दनादन पेग पर पेग चढ़ाने लगे। प्रेस क्लब के एक पदाधिकारी बाबू लाल का कहना है कि हेमन्त ने राजस्थान, जयपुर प्रेसक्लब, राज्यपाल कल्याण सिंह और वहां के पत्रकारों को भद्दी गालियां देना शुरू कर दिया।

इस पर वहां मौजूद कई पत्रकारों ने इस पर सख्त ऐतराज किया, लेकिन हेमन्त बहुत ज्या़दा टल्ली हो चुके थे। उन्होंने अपनी गालियों की धार और तेज की, और ऐलान किया कि लखनऊ आने पर किसी भी राजस्थानी पत्रकार की ऐसी की तैसी कर दी जाएगी। इसी बात पर बात और बिगड़ गयी। कई लोगों ने उन्हें बाकायदा और अन-सिस्टमेटिकली पीट दिया।

इसकी बात की खबर यह है कि खुद को ज्यादा पिटने की आशंका से हेमन्त का नशा टूट गया और वे भयभीत होकर मौके से भाग खड़े हुए। राजस्थान श्रमजीवी  पत्रकार संघ के अध्यक्ष जगदीश जैमान ने इस बारे में बताया है कि कल रात पिंक सिटी प्रेस क्लब में हमारे एक सदस्य साथी के साथ श्री हेमंत तिवारी (उत्तर प्रदेश) तथा उनके साथ बैठे लोगों ने अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया जिस पर गौतम जी (+91 98-29-921411) एवं अन्य साथियों ने वहां पहुंच कर तुरंत करारा जवाब दिया। अपने को घिरा देख हेमंत और उसके साथी चोरों की तरह भाग निकले, अन्यथा उनका बुरा हश्र होता। क्या इस तरह की हरकतें उन्हें शोभा देती है? कभी सुनामी शोर, कभी अनुज पूर्व साथी सदस्यों के साथ इस तरह का व्यवहार, आखिर इनकी हताशा इन्हें किस ओर ले जायेगी?

ज्ञातव्य है कि हेमन्त तिवारी इसके पहले भी कई बार सरेआम पिट चुके हैं। ताजा हादसा तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक जैन धर्मशाला में हुआ जब जैन-समारोह पर्यूषण के दौरान उन्होंने वहां शराब पी कर हंगामा किया और वहां मुर्गों की हड्डियां फेंकी थीं। इसके बाद बस्तर की ओर बढ़ते हुए उन्होंने और उनके साथियों ने अनेक वरिष्ठतम पत्रकार साथियों के साथ अभद्रता, हाथापाई और गालियां दीं। इस हादसे में जैन धर्मशाला ने उन पर पचास हजार रूपयों का जुर्माना और आइंदा प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था। इसके पहले भी लखनऊ के जागरण चौराहे पर भी शराब के नशे में हंगामा करने में हेमंत पिट चुके हैं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

मूल खबर…

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सपा आलाकमान ने अखिलेश और शिवपाल में विवाद की खबरें पेड मीडिया में जानबूझ कर प्रायोजित कराई हैं!

Sneh Madhur : मीडिया चीख-चीखकर कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में मंगलवार को बलराम यादव को मंत्री पद से इसलिए हटा दिया गया क्योंकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पसंद नहीं था कि माफिया छवि वाले नेता मुख्तार अंसारी का परिवार समाजवादी पार्टी में शामिल हों. अखिलेश यादव की कोशिश है कि उनकी खुद की छवि यादव परिवार के अन्य सदस्यों से अलग नज़र आये. कहा जा रहा है कि बलराम यादव ने मुख्तार एंड फॅमिली को सपा में शामिल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी इसलिए उनको जप लिया गया.

अरे भाई, बलराम यादव ने तो सिर्फ मेहनत की थी और वह भी मुलायम सिंह जी के निर्देश पर की होगी? आदरणीय शिवपाल जी ने तो उन्हें बाकायदा पार्टी में शामिल किया. शिव पाल जी ने बिना मुलायम सिंह जी की अनुमति के ऐसा किया नहीं होगा? इस तरह से सेक्शन १२० के तहत तो मुलायम सिंह जी भी दोषी हुए? चलो, मुलायम सिंह जी तो मंत्री हैं नहीं, उन्हें अखिलेश निकाल नहीं सकते. लेकिन शिवपाल तो मंत्री हैं, उन्हें भी तो बलराम यादव की तरह मंत्रीपद से बर्खास्त किया जा सकता है?

करेंगे स्वच्छ छवि वाले युवा मुख्यमंत्रीजी? सुना है कि बलराम यादव की जगह उनके पुत्र संग्राम यादव को मंत्रीपद से नवाजा जाएगा. यह अच्छी बात है. भला पिता के गलत काम की सज़ा बेटे को क्यों दी जाए? फिर मंत्री पद तो घर में ही रहेगा-चाहे बेटा रहे मंत्री या पिता..! और फिर इससे युवाओं को मंत्रिमंडल में तरजीह देने का सन्देश भी जाएगा–एक तीर से दो शिकार..! अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर यादव एंड फॅमिली द्वारा प्रस्तुत किये गए इस योग का क्या नामकरण किया जाना चाहिए..युवाओं को प्रेरणा देने के लिए.. …सोचिये…जहाँ सोच, वहीं शौचालय….!

यूपी में कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार स्नेह मधुर के एफबी वॉल से.

Kumar Sauvir : यूपी में चुनाव की बिगुल बजने ही वाला है। हर दल अपने-अपने तरकश से तीर और तेजे तेज करने में जुटे हैं। लेकिन सरकार ने इस चुनाव पर अपनी पेशबंदी के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया है। तरीका है मीडिया को साधना। इसका बहुआयामी लाभ मिलने की उम्‍मीद में है समाजवादी पार्टी की सरकार। एक तो नकारात्‍मक खबरों की नकेल तरीके से ज्‍यादा कसी जा सकती है, साथ ही इस अभियान के तहत सरकार की उपलब्धियों को अधिक से अधिक पेश किया जा सकता है। इसके लिए खबरों की शैली में सरकारी प्रचार के नये-नये तरीके खोज कर बाकायदा बुलेटिन तैयार किये जा चुके हैं।

चैनलों से साफ कह दिया गया है कि वे ऐसे बुलेटिन खबरों के तौर पर पेश करें। उप्र सूचना विभाग के एक उच्‍च पदस्‍थ सूत्र ने बताया है कि प्रचार की इस नयी सरकारी शैली में सबसे फायदा मिला है ईटीवी को। सरकार से ईटीवी ने 15 करोड़ का पैकेज हासिल कर लिया है। ईटीवी ने पिछले साल भी 15 करोड़ ले लिया था। विगत बरस सरकार ने इण्डिया न्‍यूज को 10 करोड़, न्‍यूज नेशन और जी-समूह को पांच-पांच करोड़ रूपया थमाया था। बाकी अन्‍य चैनलों को तीन से पांच करोड़ तक सौंपे गये थे। एक चैनल के एक सूत्र का कहना है कि इस बरस ईटीवी और इण्डिया न्‍यूज को 15-15 करोड़ रूपये दिये जाने का फैसला हुआ है। न्‍यूज नेशन ने पांच करोड़ रूपया झटक लिया है। जबकि आजतक, आईबीएन-7, इण्डिया टीवी, एबीपी को तीन से पांच करोड़ रूपया दिया जाना है। इण्डिया वायस को तीन करोड़ मिलना है।

बताते हैं कि इण्डिया वायस रामगोपाल यादव का ही उपक्रम है। उधर जी-समूह को 10 करोड़ रूपयों का फैसला हुआ था। इसमें से तीन करोड़ रूपयों का रिलीज ऑर्डर उप्र सूचना विभाग द्वारा जारी भी कर दिया गया था। लेकिन कैराना को कश्‍मीर बताने वाले चैनलों का मुंह काला हो, के प्रकरण को जी-नेशनल ने जिस तरह प्‍ले किया, उससे उप्र सरकार और मुख्‍यमंत्री खासे नाराज हो गये थे। नतीजा यह हुआ कि इस खबर चलने के तत्‍काल बाद सूचना विभाग ने 3 करोड़ रूपयों का यह आरओ निरस्‍त कर दिया।

बहरहाल, सरकार की इस विज्ञापन नीति के बारे में सूत्रों का कहना है कि इस पैकेज में एक विशेष बुलेटिन का प्रसारण किया जाना अनिवार्य होगा। इसमें हर चैनल अपने स्‍तर से बुलेटिन तैयार कर रहा है। हालांकि इस बुलेटिन का मसौदा और उसका प्रोमो सूचना विभाग द्वारा ही अनौपचारिक तौर पर मंजूर किया जा रहा है। इस बुलेटिन में मुख्‍यमंत्री और उप्र सरकार की उपलब्धियों पर केंद्रित मैटर होगा। लेकिन इसे विज्ञापन के तौर पर पेश नहीं किया जाएगा। यह बुलेटिन हर चैनल अपने-अपने स्‍तर पर खबर के तौर पर पेश करेंगे। यह भी शर्त रखी गयी है कि इस चैनल को रोजाना कम से कम तीन बार यह बुलेटिन दिखानी ही पड़ेगी। सूत्र बताते हैं कि ईटीवी ने ऐसी बुलेटिन तीन बार प्रसारित कर दिया है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के एफबी वॉल से.

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सोशल मीडिया पर वायरल हो गई यूपी के मुख्य सचिव आलोक रंजन की क्रूर कथा

मुख्‍य सचिव आलोक रंजन को हार चाहिए, न मिले तो नकद तीस लाख रुपया दो… चोरी के आरोप में दो महीनों तक अवैध हिरासत में रखा अपने दो घरेलू नौकरों को… इसी सारे मामले से जुड़ी है लखनऊ के एसएसपी के तबादले की इंटरनल स्टोरी….

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : यूपी के मुख्‍य सचिव आलोक रंजन ने अपने घरेलू नौकरों पर जो कहर तोड़ा है, उसने मानवता ही सहम गयी। अपनी बहू के बेशकीमती हार की चोरी पर मुख्‍य सचिव इतना गुस्‍साये कि सारे कानून-कायदों को ही धता बता दिया। वे किसी भी कीमत पर यह चाहते थे कि हार बरामद हो जाए और अगर ऐसा न हो सके तो उस हार की कीमत वसूली पुलिस अफसरों के जिम्‍मे डाली जाए। अब चूंकि लखनऊ के एसएसपी राजेश पाण्‍डेय ने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जता दी, तो आखिरकार राजेश पाण्‍डेय को दण्डित कर लखनऊ की बड़े दारोगीगिरी से ही अपमानित कर दिया गया। यह मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खासा चर्चित हो चुका है और पूरा प्रकरण सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

आपको बता दें कि तीन महीने के लिए एक्‍सटेंशन पर मुख्‍य सचिव पद पर जमे आलोक रंजन के घर से विगत 28 फरवरी को एक बेशकीमती हार चोरी हो गया था। यह हार यूपी के एक बड़े उद्योगपति ने आलोक रंजन के बेटे के बहू-उत्‍सव अवसर पर भेंट किया था. लेकिन लाखों की कीमत का ये हार रिसेप्शन की रात चोरी हो गया। हीरों के इस हार के अलावा लाखों रूपए के जेवर और कैश पर भी किसी ने हाथ साफ़ कर दिया था। इस हार को बरामद करने के लिए चीफ सेक्रेटरी आलोक रंजन के दो सरकारी नौकर पुलिस ने हिरासत में लिए। ये नौकर अलोक रंजन के घर पर कई साल से काम रहे थे. सूत्रों के मुताबिक पुलिस ने इन दोनों नौकरों को दो महीने तक थाने में अवैध हिरासत में रखा और यातनाएं दीं. इस के बाद भी जब हार और कैश नहीं मिला तो सोमवार को चीफ सेक्रेटरी के कहने पर लखनऊ के बडे़ दारोगा राजेश पांडेय को ही हटा दिया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि आलोक रंजन चाहते थे कि अगर यह हार नहीं बरामद हो सकता हो तो फिर राजेश पांडेय ही उस हार के बदले पूरी नकदी का जिम्‍मा सभालें।

इंडिया संवाद न्यूज पोर्टल पर अंशुल जैन की एक रिपोर्ट छपी है जिसमें आलोक रंजन के घरेलू नौकर राजेश ने खुलासा किया कि 28-29 फरवरी को हुए रिसेप्शन के 4-5 दिन बाद उसे हार चुराये जाने के शक में पुलिस पकड़कर थाने ले आई। थाने पर उसे और एक अन्य नौकर सुशील रावत को काफी मारा-पीटा गया. यहाँ तक की दोनों को पुलिस ने सीएफएसएल लैब में लाई डिटेक्टर मशीन पर बैठा दिया. क्यूंकि दोनों ने हार चोरी नहीं किया था इसलिए वो चोरी गए हार के बारे में कुछ बता नहीं सके. पत्रकारों को पता न लग सके इसलिए दोनों नौकरों को पुलिस हज़रतगंज थाने से 20 किलोमीटर दूर बक्शी का तालाब थाने ले गई. दोनों नौकरों के खिलाफ पुलिस ने कोई रिपोर्ट तो नहीं लिखी लेकिन दो महीने तक अवैध हिरासत में ज़रूर रखा।

पुलिस सूत्रों का कहना था कि दोनों नौकर बेक़सूर थे लेकिन फिर भी चीफ सेक्रेटरी का हार बरामद करने का दबाव बढ़ता जा रहा था. इस बीच अखिलेश के पुराने मित्र रहे लखनऊ के डिप्टी एसपी अशोक वर्मा ने अखिलेश से मुलाकात की. वर्मा ने बताया कि नौकरों को बहुत ज्यादा यातनाएं देना उचित नहीं होगा क्यूंकि एक नौकर ने आत्महत्या करने तक की कोशिश की है. अखिलेश ने तब चीफ सेक्रेटरी को किनारे कर आदेश दे दिए कि नौकरों को तुरंत छोड़ दिया जाय।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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खबर को लेकर मेरी दो बार मुठभेड़ मुख्‍तार अंसारी से हो चुकी है

हम अपराधियों की हरकतों के खिलाफ युद्ध करें, उनके धंधे में भागीदारी क्‍यों

लखनऊ : यह कोई 13 साल पहले का हादसा है। मैं जौनपुर में हिन्‍दुस्‍तान अखबार का ब्‍यूरो प्रमुख था। खबर को लेकर दो बार मेरी मुठभेड़ मुख्‍तार अंसारी से हो गयी। एक बार एक ट्रैक्‍टर व्‍यवसायी आईबी सिंह के घर और दूसरी बार मोहम्‍मद हसन कालेज के प्रिंसिपल के यहां। तब मुख्‍तार अंसारी समाजवादी पार्टी के चहेते हुए करते थे। दोनों ही बार आयोजकों ने मुख्‍तार से मेरा परिचय कराया और मैंने सवाल पूछने शुरू किये।

मुख्‍तार के आसपास करीब दो दर्जन राइफलधारी अंगरक्षक थे, जो मुख्‍तार की भृकुटि देखते ही अपने असलहे इस अंदाज में चमकाते थे कि अब बस गोली मार ही देंगे। लेकिन मैं बेफिक्र था। मुख्‍तार ने दोनों ही बार मुझे मेरे सवालों का जवाब देने के बजाय अपने पैर पर पैर चढ़ाते हुए लुंगी सम्‍भाली और केवल इतना कहा:- तुम्‍हरी तौ हम कौउनो बात के जवाबै नाय देबै, जावौ। दूसरा प्रकरण। पूर्वांचल का दुर्दांत भगोड़ा हत्‍यारा था परशुराम यादव उर्फ परसू यादव। कई हत्‍याओं में वांछित था, एक बार मैंने अदालत के एक वारंट पर खबर लिख डाली कि:- दुर्दान्‍त हत्‍यारे परसू का हालपता ललई यादव राज्‍यमंत्री का सरकारी आवास।

इस पर खूब मचा हंगामा। मेरे खिलाफ मानहानि की नोटिसें भी आयीं। मुझे डराया भी गया कि परसू से भिड़ना खतरनाक है। यह भय तब भी दिखाया गया जब मैंने मुख्‍तार से सवाल पूछे थे। तब भी बवाल हुआ था जब मैंने कल्‍पू हत्‍याकांड पर बड़े नेताओं के खुलासे किया थे। तब भी मुझे डराया गया था, जब मैंने धनन्‍जय सिंह पर लिखना शुरू किया था। आज भी मुझे इशारा किया जा रहा है कि मैं कुकुर्मों के आरोपी स्‍वामी चिन्‍मयानन्‍द पर लिख रहा हूं। तब भी डराया गया था, जब मैं शाहजहांपुर वाले जागेंद्र सिंह हत्‍याकांड पर प्रदेश सरकार के मंत्री राम सिंह वर्मा को सीधे-सीधे जागेंद्र की हत्‍या का षडयंत्र करने वाला करार दे दिया था।

इसके और पहले भी मुझे डराया गया। लेकिन मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ा। क्‍योंकि वह मेरा निजी काम नहीं था। वह मेरा व्‍यावसायिक दायित्‍व था। अपराधियों और बेईमानों के साथ मेरे घनिष्‍ठ रिश्‍ते हैं और हमेशा रहेंगे। लेकिन वह रिश्‍ते उनकी करतूतों के खिलाफ युद्ध के होंगे। न कि मैंने उनके पाप-कर्मों के साथ कोई रिश्‍ते रखूंगा। हमारी दोस्‍ती उनसे जुड़ी खबरों को लेकर रहेगी, उन व्‍यक्तियों की करतूतों से हर्गिज नहीं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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हेमन्त तिवारी जैसों को नहीं पहचाना तो फिर अगला नम्बर आपका होगा

न खुद दलाली कीजिए और न दलालों को अपने आसपास फटकने दीजिए

लखनऊ : चाहे वह सीवान का काण्‍ड हो या फिर चतरा का, पत्रकारों की मौत के असल कारणों का खुलासा तो बाद में ही हो पायेगा, लेकिन अब तक इतिहास बताता है कि ऐसे मामलों में उन लोगों की खास भूमिका रहती है, जो खुद को पत्रकार कहलाते हैं और असल पत्रकार जाने-अनजाने उनके पाले में पहुंच कर अपनी बरबादी का सामान जुटा लेता है। कम से कम, चालीस साल का जिन्दा इतिहास तो मुझे खूब याद है, जिसमें किसी पत्रकार की मौत के कारणों में से एक रहे हैं जो ऐसे पत्रकारों के करीबी बन कर असल वारदात को अंजाम दिला देते हैं।

चाहे वह सन-77 में दैनिक स्वतंत्र भारत के मुख्य उप सम्पासदक जिया सिद्दीकी रहे हों या फिर बीस साल पहले लखनऊ में मारा गया पारितोष पाण्डेय। शाहजहांपुर का जागेंद्र सिंह भी ऐसे लोगों की साजिशों के चलते मौत के घाट उतारा गया था। सिद्दीकी हत्याकांड में एक वकील का नाम आया था जो बाद में अपनी वकालत छोड़कर एक चौपतिया अखबार निकालने लगा। उस हत्या में असली हत्यारे के तौर पर नाम आया था एमपी सिंह। बाद में उसने अपने लाल अखबार को नवरात्र साप्ताहिक के तौर पर प्रकाशित करना शुरू किया, और उसकी प्रतियां केवल बड़े पुलिस अफसरों तक पहुंचने लगी। एमपी सिंह का धंधा आज भी बदस्तूबर चल रहा है।

पारितोष एक तेज-तर्रार पत्रकार था, लेकिन उसकी हत्य के बाद पता चला कि उसकी संगत ही बुरी थी। इस का पूरा प्रकरण तो बाद में आपको अगले अंक में बताऊंगा, लेकिन इतना जरूर है कि अपने तथाकथित पत्रकार-साथियों की साजिशों के चलते पारितोष की मौत हुई थी। जागेंद्र सिंह तो अभी एक साल पुराना मामला है। शाहजहांपुर का वह जोशीला पत्रकार था। कई अखबारों में उसने काम किया, लेकिन हर जगह उसका शोषण ही हुआ। नतीजा उसने अपनी नयी तर्ज की पत्रकारिता फेसबुक पर शुरू की। नाम रखा शाहजहांपुर समाचार। बहुत मेहनती आदमी था जागेंद्र सिंह। लेकिन खबरों को लेकर एक बार उसकी यूपी सरकार के मौजूदा मंत्री रामसिंह वर्मा से ठन गयी। जागेंद्र सिंह ने ऐलानिया कर दिया था कि रामसिंह वर्मा और उसका करीबी कोतवाल प्रकाश राय उनकी हत्या पर आमादा है।

जागेंद्र लगातार आर्तनाद करता रहा। चिल्लाता रहा कि उसकी हत्या हो जाएगी। लेकिन न जिलाधिकारी शुभ्र सक्सेना की कान में जूं रेंगी, न पुलिस का। अधिकांश पत्रकार तो सिरे से ही बिके हुए थे। आखिरकार भांड़ पत्रकारों को अपनी ओर मिला कर हत्यारों ने जागेंद्र सिंह की हत्या कर डाली। उसमें सबसे प्रमुख हत्यारा-षडयंत्रकर्ता था, उसका नाम था अमितेश सिंह। हत्या के बाद उसने अपने कई मित्रों और खुद मुझे भी फोन करके इस बारे में पूरी बात बता दी। अभी तीन महीना पहले ही उस युवक की हत्या उरई में हो गयी है।

अब जरा देखिये, जागेंद्र सिंह की हत्या को लेकर भी खूब खरीद-फरोख्त  हुई। खुद को बडा पत्रकार कहलाने वाले हेमन्त तिवारी ने इस मामले में प्रशासन की ओर से खूब पैरवी की। ऐसा लगा कि जैसे हेमन्त पत्रकार नहीं, बल्कि कोई धाकड़ दलाल है, जो पूरी मामले में दांव लगा रहा था। इसके पहले भी रवि वर्मा आदि दो अन्य पत्रकारों की मौत के बाद जब मैंने 187 पत्रकारों के हस्ताक्षर से यूपी सरकार को एक पत्रकार तैयार किया कि उनके परिजनों को आर्थिक राहत मिल जाए, उस पत्र को हेमन्त तिवारी ने मुझ से लेकर फाड़ दिया। यह तर्क देते हुए कि हिसाम सिद्दीकी जैसो लोग इस पत्र को बेच लेंगे, और हिसाम के हटने के बाद मैं खुद अफसरों से मिल कर उन पत्रकारों को राहत पहुंचा दूंगा। लेकिन हेमन्त ने ऐसा कभी भी नहीं किया।

इतना ही नहीं, हेमन्त तिवारी ने तो दलाल, बलात्कारियों, चोरों, धोखेबाजों और घटिया लोगों को वरिष्ठ पत्रकार का ओहदा दिलाने की फैक्ट्री ही खुलवा दी थी। जौनपुर के रतनलाल शर्मा को अपने साथ हेमन्त तिवारी ने वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर पोस्टर छपवा दिया था। इसके बाद ही शर्मा को पुलिस ने पांच लाख रूपया और एक महिला के साथ लखनऊ में बलात्कार का आरोप लग गया। शराब के नशे में अक्सर पिट जाने वाले हेमन्त तिवारी ने उस रतनलाल शर्मा को बचाने के लिए हरचंद कोशिशें कीं। यह हालत है पत्रकारों और पत्रकारिता का। जाहिर है कि जब तक हेमन्त तिवारी जैसे लोग पत्रकारिता में मौजूद हैं, पत्रकारों और पत्रकारिता पर हमेशा ही खतरनाक हमले होते ही रहेंगे।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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कुमार सौवीर को जौनपुर में इस तरह परेशान किया मधुकर तिवारी ने

लखनऊ : जौनपुर में मधुकर तिवारी जैसे व्यक्ति ने सीधे मुझ पर ही हमला कर दिया। बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक शिक्षक के तौर पर भर्ती इस शख्स ने अपनी नौकरी तो आज तक नहीं की, लेकिन पत्रकार बन कर प्रशासन को धौंस खूब दी। चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने मुधकर तिवारी को हटा कर मुझे ब्यू्रो प्रमुख बनाया था, इसलिए मधुकर का कोप मुझ पर भड़का। अरे मधुकर तिवारी वही, जो सरकारी नौकरी पर होने के बावजूद हिन्‍दुस्‍तान अखबार से सम्‍बद्ध था और अपनी धौंस-पट्टी कायम किये हुए था। लेकिन उसकी करतूतों का खुलासा होने पर उसे हिन्‍दुस्‍तान से हटा दिया और मुझे जोधपुर से बुलाया गया। तब मैं जोधपुर के दैनिक भास्‍कर एडीशन में ब्‍यूरो प्रमुख था। खैर।

मेरे आने के बाद मधुकर तिवारी ने अपने हरकतें मेरे खिलाफ कर दीं। मेरी खबरों पर उसने शहर के दर्जनों डॉक्टरों को भड़काया और एक दिन मेरे दफ्तर पर प्रदर्शन तक करा दिया। लेकिन एक बार तो हद ही हो गयी। हुआ यह कि कलेक्ट्रेट बार एसोसियेशन के तत्कालीन अध्यक्ष यतीन्द्र नाथ त्रिपाठी और जिला उद्याग और व्यापार मंडल के अध्यक्ष इन्द्रभान सिंह इन्दू ने मेरे खिलाफ जहर-बुझा पत्रकार बनारस से लेकर नई दिल्ली तक सम्पादक को भेजा। पत्र में लिखा था कि कुमार सौवीर भ्रष्ट, चरित्रहीन हैं और अपने दफ्तर में भी अश्लील हरकतें करते रहते हैं। यह भी कि फर्जी खबर लिखते हैं और खबरों के नाम पर भारी उगाही भी होती है।

इस पर मुझे जौनपुर से वाराणसी ट्रांसफर कर दिया गया। इतना ही नहीं, दिल्ली से एक जांच दल मेरे खिलाफ जांच करने के लिए जौनपुर भेजा गया। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, हल्की ठेस जरूर लगी कि जौनपुर ने मुझे बेइज्जत कर दिया और कोई भी मेरे पास समर्थक के तौर पर नहीं आया। यह बहुत बड़ा धक्का था। दरअसल, मैंने बेहिसाब मेहनत की थी जौनपुर में। एक दिन भी छुट्टी नहीं ली। मैंने ऐसी-ऐसी खबरें ब्रेक कीं, जिसके बारे में कोई सोच तक नहीं सकता था। चाहे वह परसू यादव जैसा दुर्दान्त अपराधी रहा हो, मुख्तार अंसारी या धनन्जय सिंह रहे हों, उमाकांत यादव रहे हों, ललई हो, या फिर पारसनाथ यादव या उनका बेटा लकी यादव। मैंने हर एक की हरकत-करतूत को दर्ज किया। छोड़ा किसी को भी नहीं, चाहे वह मेरे मित्र रहे हों जावेद अंसारी, विद्यासागर सोनकर, या फिर अन्य कोई। जिसकी भी खबर मिली, मैंने उनकी खबर ली।

लेकिन जब जांच करने के लिए बड़े पत्रकार दिल्ली से आये, तो इंदू सिंह और यतींद्रनाथ त्रिपाठी जी ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया कि यह पत्र उन्होंने नहीं लिखा था। मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इन दोनों ने यह भी साफ लिखा कि कुमार सौवीर जैसा बेकाक, साहसी और मूलत: पत्रकार न तो कभी जौनपुर में आया है, और न कभी आयेगा। इन दोनों ने उस जांचदल को यह भी बताया कि मधुकर तिवारी ने जिले के पत्रकारों के हितों को लेकर एक अर्जी लिखने के लिए उनसे लेटरपैड मांगा था।

इतना ही नहीं, इंद्रभान सिंह इंदू ने तो जांच दल को यह तक लिख दिया था कि, “मधुकर तिवारी मूलत: —— है और मुझे शर्म लग रही है कि मधुकर तिवारी जैसा शख्स मेरा परिचित रहा है।”

कहने की जरूरत नहीं कि इसके बाद के प्रति जौनपुर और वहां के लोगों के प्रति मैं नत-मस्‍तक हो गया। मुझे यह भी पता चला कि उस जांच-दल के सामने ही इंदू सिंह ने जब मधुकर को गरियाना शुरू किया तो मधुकर तिवारी पूरे दौरान रोते हुए इंदू सिंह के पांव चांपे रहा। उसका केवल यही मकसद था कि कैसे भी हो, इंदू सिंह जांच-दल को कोई उल्‍टा-पुल्‍टा न लिख दें। लेकिन इंदू सिंह नहीं माने। मधुकर के गिड़गिड़ाने में उन्‍होंने और कोई बातें तो नहीं दर्ज कीं, लेकिन जो पत्र उन्‍होंने  जांच-दल को सौंपा दिया, उसमें दर्ज कर दिया कि यह पूरी साजिश मधुकर तिवारी ने ही की। वह तो बाद में मुझे उस पत्र की प्रति मुझे मिल गयी, जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है। यही वजह है कि मैं दूसरी जगह जाना छोड़ दे सकता हूं, लेकिन कोई भी मुझे जौनपुर आमंत्रित करे, तो मैं सारा काम धाम छोड़ कर जौनपुर निकल जाता हूं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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अमिताभ ठाकुर आईजी बन कर पूरी ठसक के साथ अपने आफिस में बैठे हैं

लखनऊ : मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान केवल सात दिन की तैनाती पाये वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक सुभाष चंद्र दुबे को दंगा न सम्‍भाल पाने को लेकर शासन ने दोषी ठहराया। दुबे को इस आरोप में मुजफ्फरनगर से हटाकर लखनऊ में पुलिस महानिदेशक कार्यालय में सम्‍बद्ध कर दिया गया और इसके 15 दिन बाद उन्‍हें निलम्बित भी कर दिया गया। अब हकीकत यह देखिये। सुभाष च्रंद्र दुबे की कार्यशैली बेदाग रही है। दुबे जहां भी रहे, अपनी कुशलता के झंडे गाड़ दिया। दंगा शुरू होने पर दुबे को शासन ने खासतौर पर सहारनपुर भेजा था। तब तक मुजफ्फरनगर में अपर महानिदेशक कानून-व्‍यवस्‍था, आर्इजी, डीआईजी समेत कई अधिकारी भी तैनात थे, ताकि वे अपनी निगरानी में दंगा सम्‍भालने की कोशिश करें। लेकिन प्रमुख गृह सचिव ने इसी बीच सात दिन की तैनाती के बाद ही दुबे को डीजीपी कार्यालय में अटैच कर दिया था।

कोई सहज बुद्धि का चपरासी या बाबू भी आसानी से समझ सकता है कि जब जहां एडीजी, आईजी, डीआईजी से लेकर भारी पुलिस बल मौजूद हो, ऐसे में एसएसपी जैसा अदना अफसर की क्‍या औकात होगी। लेकिन चूंकि इसके पहले प्रमुख सचिव गृह आरएन श्रीवास्‍तव से काफी नाराजगी हो गयी थी, इललिए आरएन श्रीवास्‍तव ने दुबे के गर्दन पर सस्‍पेंशन की आरी रख दी। दुबे पर श्रीवास्‍तव इस लिए खार खाये बैठे थे, क्‍यों कि उनके एक खासमखास आदमी और माध्‍यमिक शिक्षा के एक बड़े अफसर को दुबे ने 85 लाख रूपयों की नकदी के साथ गिरफ्तार किया था। यह रकम इंट्रेंस की घूस के तौर पर थी। लेकिन दुबे अडिग रहे, और मुजफ्फरनगर दंगे में उन पर काम लगा दिया गया।

लेकिन आज तक दुबे पर लगे आरोपों की फाइल देखने की जरूरत न तो मौजूदा प्रुमुख गृह सचिव देवाशीष पाण्‍डेय ने की, या फिर मुख्‍य सचिव आलोक रंजन ने। जानकार बताते हैं कि दुबे की यह फाइल देखते ही सच साफ दिख जाता है। इसके लिए आईएएस  बनने की जरूरत नहीं। ठीक यही हालत थी अमिताभ ठाकुर की। आठ साल पहले ठाकुर ने सरकारों की खाल खींचनी शुरू कर दिया। वजह थी, ठाकुर पर प्रताड़ना। ठाकुर का आईआईएम में दाखिला मिला, लेकिन शासन ने उसे छुट्टी नहीं दी। बोले, यह अराजकता है। अमिताभ ने उस पर ऐतराज किया तो शासन ने उसे औकात में लाने की साजिशें बुन दीं। पहले ढक्‍कन पोस्टिंग लगा दी।

यह भी सहन किया ठाकुर ने, लेकिन अपनी आवाज उठाये रखा। नतीजा यह हुआ कि शासन ने निलम्बित कर दिया। इतना ही नहीं, निलम्‍बन की तयशुदा समयसीमा खत्‍म होने के बावजूद निलम्‍बन खत्‍म नहीं किया। ठाकुर ने इसके लिए अदालत और सेंट्रल ट्रब्‍युनल पर अर्जी लगायी। आज ठाकुर आईजी बन कर अपनी पूरी ठसक के साथ अपने आफिस में बैठ रहे हैं। एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने अमिताभ के इस प्रकरण पर बहुत जोरदार चुटकी ली। बोले:- अब चाहे कुछ भी हो जाए, सरकारों और आला अफसरों की संवेदनहीनता व प्रताड़ना के चलते अमिताभ ठाकुर में प्रवेश कर चुका अदालती कीड़ा वापस नहीं जाने का।

सच भी है। आपको अगर इस लोकतंत्र में सत्ता सिस्टम से टकराना है तो राहत फिलहाल अदालत और मीडिया के माध्यम से ही मिल सकती है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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लखनऊ के दो पत्रकारों सिद्दीकी और परितोष के मारे जाने का असली कारण जानिए और पत्रकारिता में धंधेबाजी से बचिए

लखनऊ : स्‍वतंत्र भारत का मुख्‍य उप सम्‍पादक हुआ करते थे सिद्दीकी। एक बार वे अपने आफिस में रात की पाली में काम कर रहे थे। रात आधी से ज्‍यादा हो गयी थी। पेज छूटना ही था। 15 मिनट का समय था, इसलिए सिद्दीकी बाहर चाय की दुकान की ओर बढ़े। रास्‍ते में नाली के किनारे बैठ कर उन्‍होंने पेशाब करना शुरू किया। अचानक कुछ लोगों ने पीछे से चाकुओं से हमला कर दिया। वार इतना सटीक था कि सिद्दीकी ज्‍यादा चिल्‍ला भी नहीं सके और मौके पर ही ढेर हो गये।

सिद्दीकी उस वक्‍त स्‍वतंत्र भारत में बड़े पद पर थे। इसलिए इस हादसे से पूरा प्रदेश हिल गया। लेकिन जब इस मामले का खुलासा हुआ तो लोग सन्‍न हो गये। पता चला कि सिद्दीकी गर्म-गोश्‍त का धंधा करते थे। लड़कियों को फंसाना और उन्‍हें इधर-उधर भेजना उनका असली धंधा था। पुलिस ने सिद्दीकी की आलमारी पर सैकड़ों लड़कियों की तस्‍वीरें बरामद कीं, जिसमें अधिकांश अश्‍लील थीं। कई फोटो में लड़कियों के साथ कुछ पुरूष भी आपत्तिजनक मुद्रा में मौजूद थे, जससे यह भी नतीजा निकला कि सिद्दीकी लोगों को ब्‍लैकमेल करने का भी धंधा करते थे। कहने की जरूरत नहीं कि लड़कियों को ऐयाशों तक मुहैया कराने का काम अकेले किसी एक आदमी की क्षमता में नहीं थी। जाहिर है कि इसके लिए सिद्दीकी का एक पूरा का पूरा गिरोह भी सक्रिय था।

बहरहाल, पुलिस ने इस मामले में एक वकील एमपी सिंह को गिरफ्तार किया। लेकिन तकनीकी कारणों से एमपी सिंह बरी हो गया। लेकिन बाद में एमपी सिंह ने वकालत और पत्रकारिता का एक नया गठजोड़ बनाया। एक चौ-पतिया अखबार निकला, जिसका नाम था नवरात्रि साप्‍ताहिक। इस अखबार में एमपी सिंह ने कप्‍तान से लेकर डीजीपी तक के साथ अपनी फोटो लगा कर तारीफ करती खबरें छापना शुरू किया। बताया जाता है कि इसके बल पर एमपी सिंह का अखबार दारोगा और सीओ तक पर रुआब गालिब किया करता था। इसी प्रक्रिया में उसकी आमदनी भी बेशुमार थी।

बहरहाल, अभी दो दशक पहले ही परितोष पांडे नामक एक पत्रकार को उसके घर में गोली मार दी गयी। हमले में पारितोष मौके पर ही दम तोड़ गया। जब पुलिस ने छानबीन शुरू की तो पता चला कि परितोष का असली काम पत्रकारिता के नाम पर धौंस-पट्टी जमाना ही था। परितोष को तनख्‍वाह तो बहुत कम मिलती थी, लेकिन उसकी जीवन शैली बेहिसाब खर्चीली थी। किसी ऐयाश को मात करती। पुलिस ने पाया कि परितोष झगड़े की जमीनों पर हाथ रखता था। चूंकि उसके रिश्‍ते पुलिस और प्रशासन से करीब के थे, इसलिए जिस भी जमीन पर परितोष हाथ रख देता था, उस पर कोई और नहीं बालने का साहस कर पाता था। लेकिन आखिर यह कब तक चलता। एक दिन पाप का घड़ा भर गया और जमीन के झगड़े में उसे मौत के घाट उतार दिया गया। वह भी तब जब वह अपने घर में हत्‍यारों के साथ बैठ कर शराब पी रहा था। परितोष के श्‍वसुर लखनऊ के आज अखबार के ब्‍यूरो प्रमुख हुआ करते थे। नाम था राजेंद्र द्विवेदी। शुरुआत में तो पत्रकारिता में यह अफवाह फैली कि परितोष की हत्‍या उसके ससुराल के लोगों ने करायी थी, लेकिन जल्‍दी ही यह कोहरा छंट गया।

कहने की तरूरत नहीं कि इन दोनों ही हादसों में मृतकों ने जिन लोगों पर यकीन किया, उन्‍होंने ही उनका काम-तमाम कर दिया। इन सभी को इन दोनों ने पत्रकार बनाने का ठेका ले रखा था। यानी यह लोग उन बदमाशों को सहयोग करने के लिए उन्‍हें पहले पत्रकार बनाते थे, फिर अपना पत्र‍कार गिरोह का प्रदर्शन करते थे।  लखनऊ के तथाकथित पत्रकार हेमन्‍त तिवारी का नाम ऐसे ही लोगों में से एक है। हेमन्‍त तिवारी ने भी लोगों को पत्रकार ही नहीं, वरिष्‍ठ पत्रकार बनाने की फैक्‍ट्री खोल रखी है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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समाजवादी नवरात्र शुरू : एमएलए के भतीजे ने सरेआम नंगा किया अनाथ किशोरी को

: विन्‍ध्‍य-क्षेत्र में देवी उपासना, विधायक पूजा में और भतीजा चीर-हरण में : भदोही में सीए की पढाई करती युवती को दी भद्दी गालियां, कपडे फाड़ डाले : नवनीत सिकेरा की कम्पनी 1090 ने शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय पल्‍लू थाने पर झाड़ा : सपा के सांसद अबू आजमी के करीबी और एमएलए जाहिद बेग का भतीजा है सादाब : सिर्फ बेशर्म गिरोहबन्दी करते हैं भदोही के टुच्चे पत्रकार : अमर उजाला और आज ने तीन लाइनों में छापा:- सिर्फ छेड़खानी हुई : नियमित पैकेट हासिल करते हैं जाहिद बेग और विजय मिश्र से पत्रकार : बिटिया को न्याय पर चील मंडराये, पत्रकारों ने क्‍या इस मसले पर वाकई छोड़ दी अपनी कमीनगी : पुलिस अब तक नहीं गिरफ्तार कर सकी : पुलिस अधीक्षक का दावा- कोर्ट के पहले ही दबोचेंगे सादाब को : सपा विधायक के खेमे ने प्रशासन-पत्रकारों से की प्रभावी रणनीतियों की पेशकश : जनदबाव बढ़ा तो बिकाऊ पत्रकारों ने फिर थाम ली अपनी-अपनी कलम : दल्ला-भांड़ पत्रकार जो होता है वह वाकई दल्ला ही रहता है हमेशा : पत्रकार बनने का मकसद रौब ऐंठना-दलाली, खबरों से वास्ता नहीं : बेबस जनता, दबंग नेता, बेईमान पुलिस और तलवाचाटू पत्रकार :

-कुमार सौवीर-

भदोही : हालांकि उप्र में समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही हर दिन समाजवादी-उत्सव शुरू हो जाता है। लेकिन भदोही में समाजवादी देवी उपासना का एक अनोखा नजारा दिखा। विन्‍ध्‍याचल क्षेत्र में नवरात्र के पहले ही दिन समाजवादी पार्टी के एक मनबढ़ दबंग और उसके एक दोस्त ने भरे-बाजार अपने आफिस से लौट रही एक युवती पर न केवल नंगी गालियों की बौछार कर दी, बल्कि जब उस युवती ने उस पर ऐतराज किया तो सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में उन युवकों ने उस लड़की के कपड़े फाड़ दे दिये, और मौके से फरार हो गया। खास बात यह है कि यह युवक समाजवादी पार्टी के एक स्थाकनीय विधायक जाहिद बेग का सगा भतीजा है। जाहिद इस वक्‍त मुम्बई में देवी-उपासना के लिए मशहूर गुड़ी पड़वा उत्सव में व्यस्त हैं।

बहरहाल, इस हादसे ने पूरे भदोही को हिला दिया है। खबर है कि देर से ही सही, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज कर दिया है और दोषी अभियुक्तो की गिरफ्तारी के लिए टीमें लगा कर कई स्थानों पर छापामारी की गयी है। पुलिस अधीक्षक पीके मिश्र ने मुझे फोन पर माना कि यह बेहद शर्मनाक हादसा है, और पुलिस इस मामले में बहुत सक्रिय और संवेनदनशील है। उन्हों ने दावा किया कि आज किसी  भी वक्त किसी भी कीमत पर इन दोनों अभियुक्तों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाएगा।

कहने की जरूरत नहीं कि यहां के पड़ोसी जिले जौनपुर के भ्रष्ट, बेईमान और बेशर्म जिला प्रशासन की करतूतों के ठीक विपरीत भदोही के एसपी पीके मिश्र ने इस हादसे की खबर पाते ही तत्काल कार्रवाई की, रिपोर्ट दर्ज करायी और छापामारी शुरू कर दी। जबकि महिलाओं के प्रति जघन्य अपराधों पर भी जौनपुर की पुलिस और जुल्फी-प्रशासन लगातार न केवल संवेदनहीन बना रहा, बल्कि एक सामूहिक बलात्कार की पीडि़त किशोरी का मामला दर्ज करने के बजाय उसे पागलखाने तक भेजने की साजिश कर दी। बहरहाल, खबर यह है कि 19 बरस की एक बच्ची ईशा जायसवाल इंटर पास होने के बाद सीए की पढ़ाई कर रही है। उसके पिता रमेश की मृत्यु पहले ही हो चुकी है। घर में मां हैं, जो अपने एक बेटे और ईशा के साथ जीवन-निर्वाह कर रही है।

कल शाम सवा पांच बजे जब वह औराई रोड से लौट रही थी, बाईक पर सवार एक अन्य युवक के साथ सादाब ने भरे-बाजार उस लडकी को अश्लील गालियां देना शुरू कर दिया। इस हमले से भौंचक्की बच्‍ची ने जब उसे जवाब देने की कोशिश की, तो सादाब ने दौड़ कर उसे कई तमाचे जड़ दिये और उसके कपड़े बुरी तरह फाड़ डाले। उस वक्त बाजार में सैकड़ों लोगों की भीड़ जुट गयी थी। इतना ही नहीं, इस हमले से अर्धनग्ऩ हो चुकी इस लड़की के सीने पर सादाब ने एक जोरदार घूंसा मारा, कि वह सड़क पर ही कई गुलाटियां खाकर गिर पड़ी। इसके फौरन बाद सादाब और उसका दोस्ते मौके से भाग गये। इस बच्ची की आप-बीती आप सुनना चाहते हों तो इस लिंक को क्लिक कीजिएगा। यह बातचीत मैंने फोन पर ईशा से आज सुबह की थी।

https://www.youtube.com/watch?v=2VrhKh0RNxw

फिलहाल, इस घटना के बाद भदोही के पुलिस कप्तान पीके मिश्र खुद ही इस मामले की निगरानी कर रहे हैं। ईशा जायसवाल, 19 साल उम्र, चाटर्ड एकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रही है, पिता मर चुके हैं, मां जस-तस अपने बच्चे को पढ़ा रही है। शुक्रवार की शाम उसे भदोही के भरे बाजार में दो युवकों ने उसे बुरी तरह पीटा, उसके कपड़े फाड़ कर नंगा कर दिया। पूरे शहर में हंगामा हो गया। पुलिस ने संज्ञेय धाराओं में हमलावरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की, लेकिन इस खबर को भदोही में अपना चेहरा काला पोत रहे पराड़कर-पुत्रों ने बेच डाला। ज्यादातर ने तो इसे खबर माना ही नहीं। हिन्दुस्तान और आज ने केवल तीन-तीन लाइनों में केवल हल्की छेड़खानी का मामला दिखा कर छापा, जबकि दैनिक जागरण और अमर उजाला के रिपोर्टर तो उस खबर को घोंट कर पी गये।

जानते हैं क्यों? क्यों कि अपराधी का सगा चाचा जाहिद बेग समाजवादी पार्टी का स्थानीय विधायक है। खबर तो यहां तक है कि भदोही में रहने वाले अधिकांश पत्रकारों को जाहिद बेग और विजय मिश्र जैसे नेताओं की ओर से हर हफ्ते नजराना दिया जाता है। इतना ही नहीं, अधिकांश पत्रकार कालीन व्यवसाइयों से नियमित बंधी हुई रकम पाते हैं। और ऐसे कालीन व्यावसाइयों का करीबी रिश्ता सपा जाहिद बेग और विजय मिश्र से है। इनकी छींक भी इन अखबारों-चैनलों में मोटी हर्फ में छापी-दिखायी जाती है।

बहरहाल, मेरी बिटिया डॉट कॉम के हस्तक्षेप के बाद अब माहौल में हड़बड़ाहट का माहौल है। आज दोपहर भदोही के इस दर्दनाक और दारूण काण्ड पर मेरी बिटिया डॉट कॉम ने जब पूरी तरह खोल दिया, तो उसके बाद से ही लखनऊ और दिल्ली में प्रिण्ट और न्यूज चैनलों की नींद टूटी। पता चला है कि कल सारे यह पत्रकार अब अपनी दलाली के बजाय अपनी नौकरी बचाने की जुगत में जुट गये हैं।

अब तक मिली खबर के मुताबिक यहां के पत्रकार किसी कुख्यात गिरोह की तरह काम करते हैं। खबरों को रोटी देने वाले अपने मालिकों के इशारों पर ही तय किया जाता है कि किस खबर को छापना है अथवा नहीं। यह साजिश पिछले एक दशक से ज्यादा पनपी है। हालांकि इसके बावजूद यहां के कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो ऐसी गिरोहबंदी से दूर रहते हैं। लेकिन उन्हें हमेशा खतरा रहता है कि न जाने कब उनके खिलाफ साजिश बुन ली जाए। मेरी बिटिया डॉट कॉम ने भदोही में अमर उजाला के साजिद अंसारी और दैनिक जागरण के कैसर परवेज आदि से बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन उन लोगों ने मेरा फोन नहीं रिसीव किया।

कालीन-सिटी के तौर पर मशहूर भदोही बाजार में कालीन की ही तरह मासूम बच्चियों की इज्जत नीलाम करने की नापाक कोशिशों पर माहौल गरम हो गया है। कालीन व्यवसायियों और समाजवादी पार्टी के विधायक की खुली शह पर पूरे शहर में तहलका मचाने वाले विधायक जाहिद बेग के घरवालों ने तीन दिन पहले एक छात्रा को तो सरेबाजार कपड़े फाड़ कर नंगा करने की शर्मनाक हरकत कर दी, लेकिन अब आम आदमी विधायक-रिश्तेदारों की ऐसी हरकत पर खासा नाराज है और आम आदमी उसका खुले तौर पर विरोध करने पर आमादा है। आपको बता दें कि भदोही में हुए इस हादसे पर आम आदमी में भड़के गुस्‍से का श्रेय www.meribitiya.com का है, जिसने अपने जुझारू कार्यकर्ताओं को भदोही से लेकर वाराणसी तक और फिर लखनउ और दिल्‍ली में सक्रियता का संचार किया।

ताजा खबर यह है कि उस शर्मनाक के हादसे के घिनौने शख्स को सोमवार को कोर्ट में आत्म समर्पण करने की साजिशें चल रही हैं। हालांकि उस बच्ची के घर के आसपास पुलिस की निगरानी कर दी गयी है। पुलिस अधीक्षक का दावा  है कि चाहे कुछ भी हो, अभियुक्त सादाब को हर कीमत पर कोर्ट में जाने नहीं दिया जाएगा और उसे पहले ही पुलिस दबोच करके पुलिस, प्रशासन और सरकार की नाक-साख बचायेगी। खबर तो यहां तक है कि भदोही के कई संगठनों ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सादाब के मामले में अपनी कमर कस ली है।

उधर जनदबाव ने अपराधियों और उनके आकाओं के हाथों तोते उड़ा दिये  हैं। विधायक जाहिद के लोग अब प्रशासन से लेकर प्रशासन और पत्रकारों के बीच संतुलन बनाने की साजिशों में जुटे हैं। पता चला है कि वाराणसी, लखनऊ और दिल्‍ली तक में बैठे मीडिया संस्थानों ने अपने भदोही में बैठे अपने दलालों के पेंच कसने शुरू कर दिया है। नतीजा यह हुआ है कि वही पत्रकार जो अब तक उस बच्ची के साथ हुए उस शर्मनाक हादसे को केवल सामान्य छेड़खानी के तौर पर पेश कर रहे थे, वे अब खुलेआम अब साफ लिख रहे हैं कि इस मामले में विधायक जाहिद बेग के घरवालों की हरकत हैं।

हालांकि यह भी हकीकत यह है कि ऐसे ऊपरी दबावों के बावजूद कई पत्रकारों ने उस मामले में खुद खबर लिखने के बजाय उसे दबाने की साजिशें कीं। लेकिन कुछ संस्थानों और उनके ज्ञानपुर ब्यूरो आफिसों ने इस मामले को बेहद संज्ञेय मानते हुए उसे भदोही के पत्रकारों को दरकिनार करके खुद ही हस्तक्षेप किया और ज्ञानपुर डेटलाइन से खबर छापना शुरू कर दिया है। आज हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने इस मामले पर बड़ी-बड़ी खबरें छापीं और सीधे सपा विधायक जाहिद बेग का नाम लिया। लेकिन अन्ये अखबार आज भी विधायक और अपनी दलाली के चलते खबरों से परहेज करते रहे। हालांकि अभी खबर मिली है कि दिल्ली मुख्यालय के हस्तक्षेप के बाद अमर उजाला ने फैसला किया है आज यानी सोमवार को इस पर बड़ी खबर छापी जाएगी।

अब तो सोमवार को ही तय होगा कि एक मासूम बच्ची को सरेआम बेईज्जत करने वाले सादाब को बचाने वालों की साजिशें सफल होंगी या फिर पुलिस अधीक्षक पीके मिश्र के दावे कि सादाब के घिनौनी की हरकत के सामने पुलिस नहीं झुकेगी। यह भी देख्ना होगा कि अब पूरी तरह बिक चुकी भदोही की मीडिया की साजिशें अब समाजवादी पार्टी के विधायक जाहिद बेग और उनके लग्गू-भग्गू की उंगलियों पर नाचेगी या फिर उस मासूम बच्ची के पक्ष में होगी। यह तो यह भी देखना होगा कि समाजवादी पार्टी का नारा इस काण्ड  के बाद कुचल जाएगा या फिर यह काण्ड की चिंदी-चिंदी बिखेर जाएंगी। सादाब को कोर्ट से पहले दबोचने के पुलिस के दावे केवल नौटंकी है, या फिर उनमें कोई दम है। और सबसे बडी बात यह कि क्याए पूरे यूपी में केवल समाजवादी न्याय के तौर पर केवल जुल्फी-प्रशासन जैसे निकृष्ट और निकम्मे-नराधम-अकर्मण्य अफसर ही बिकते हैं या फिर भदोही में सीना ठोंक कर रहे पुलिस अधीक्षक पीके मिश्र जैसी नयी न्यायिक बयार चल रही है।

अब मेरा संशय पुख्ता हो गया है। वह यह कि जो वाकई दल्ला पत्रकार होता है, वह हमेशा दल्लागिरी ही करता रहेगा। चूंकि वह अपनी दलाली और अपने आकाओं के तलवे चाटने के अपने सर्वाधिक बिकाऊ धंधे से जुड़ा होता है, इसलिए उसके लिए पैसा सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। पैसा चाहे कैसे भी आये, चाहे खबर तोड़-मरोड़ कर, खबर दबा कर, उलटी खबर चेंप करके या फिर इनके साथ ही साथ उन पत्रकारों को दलाल करार देना, जो उसके आकाओं का अहित कर रहे हों।

लखनऊ के बड़े दलालों जैसे दिग्गज दलालों से लेकर मेरे खिलाफ जो अभियान दलाल पत्रकारों ने छेड़ रखा है, वह बेहद दिलचस्प है। लखनऊ से लेकर भदोही तक मेरे खिलाफ डंका बजा हुआ है। कोई मुझे दलाल बताता है, तो कोई मुझे भड़वा। कोई मुझे वेश्यालय का संचालक करार देता है तो कोई मुझे खुला बिकाऊ पत्रकार कहलाता है। जिस भी जिले में मैं पत्रकारों की निकृष्ट हरकतों का खुलासा करता हूं, तो वहीं के दलाल पत्रकार मुझे तेल-पानी लेकर चढ़ जाते हैं। इतना ही नहीं, कई ऐसे तथाकथित पत्रकार नेता भी सामने आ जाते हैं, जो ऐसे बडे दिग्गज पत्रकारों की पत्तलें चाटते हैं। गालियां तो मेरे खिलाफ इतनी दी जाती हैं, कि सुन-पढ़ कर लोगों के कानों की लवें तक सुलग जाएं।

आपको याद होगा कि जब मैंने लखनऊ के दलाल पत्रकारों पर हमला किया तो न जाने किस-किस जेल में बंद पत्रकारों ने जेल तोड़ कर मुझ पर हमला छेड़ दिया। और अब जब मैंने जौनपुर में लावारिस मिली सामूहिक बलात्कार पीडि़त बच्ची के हक में लिखना शुरू किया तो प्रशासन से लेकर पूरी पत्रकार बिरादरी ही हमलावर अंदाज में आ गयी। मुझ पर चरित्र-हनन का अभियान छेड़ दिया इन बेनामी पत्रकारों ने।

ताजा मामला भदोही का देखिये। जब एक अनाथ बच्ची को मुख्य बाजार में शाम सवा पांच बजे सपा विधायक जाहिद बेग के प्यारे-लाड़ले भतीजे शादाब बेग ने गालियां देकर उसके कपड़े फाड कर उसे नंगा कर दिया, तो एक पत्रकार नेता डॉक्टर जीपी सिंह उचक कर कूदते हुए सामने आ गये। खुद को उप्र जर्नलिस्ट् एसोसियेशन के जौनपुर अध्यक्ष बताते हैं जीपी सिंह। दीगर बात है कि लिखने की तमीज तनिक भी नहीं है इन अध्यक्ष को। हिन्दी लिख ही नहीं सकते और अंग्रेजी में बकवादी करते रहते हैं। नाम के आगे डॉक्‍टर लिखते हैं। भदोही में बच्ची के मामले में जब मैंने पत्रकारों को आड़े हाथों लिया तो वह उपजा अध्यक्ष ने कई समूहों में लिखा:- “जिस ग्रुप में पत्रकारो के खिलाफ लिखा जाएगा अभद्र टिप्पणी की जायेगी उस ग्रुप में मै नहीं रह सकता। धन्यवाद ।डा0 ज्ञान प्रकाश सिंह जिलाध्यक्ष उपजा जौनपुर”

मैंने फौरन जवाब दे दिया डॉ जीपी सिंह को:- ” आपने मेरी पोस्ट पर शायद अपना कॉमेंट किया है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपका यह कॉमेंट मेरे लिए धमकी है या सलाह? अगर सलाह है तो यह सिरे से बेहूदापन है और आपकी विद्रूप व घटिया एकांगी मानसिकता का प्रतीक भी है। इसलिए मैं उसको कूड़ेदान में फेंक दे रहा हूँ।और अगर धमकी है तो मैं आपकी ऐसी बंदर-गीदड़ धमकियों से नहीं डरता। यह नहीं हो सकता कि पत्रकार दलाली करने के लिए किसी बच्ची पर हुए हमले की खबर ही दबा दें, और मैं खामोश बैठा रहूँ।

और जो लोग ऐसे दलाल पत्रकारों का पक्ष ले रहे हैं, वो भी दलाल हैं। चाहे वे उपजा के हों या फिर बिना-उपजा के हों। मैं हमेशा खबरों के हत्यारों को दबोचे ही रहूंगा।”

जवाब फिर उसी डॉ जीपी सिंह ने दिया:- “जिस ग्रुप में पत्रकारो के खिलाफ लिखा जाएगा अभद्र टिप्पणी की जायेगी उस ग्रुप में मै नहीं रह सकता। धन्यवाद। डा0 ज्ञान प्रकाश सिंह जिलाध्यक्ष उपजा जौनपुर”

और उसके बाद वह शख्स उन सभी समूहों से लेफ्ट हो गये। लेकिन इसी बीच लखनऊ के एक चौ-पतिया पत्रकार रेहान अहमद सिद्दीकी ने भदोही काण्ड में एक ग्रुप में मुझे घेरा। बोले: ‪+91 98394 13786‬: “Yah pagal ho gaya hai jo patkaro ko kiya kiya bak rah hai,  yah is ko left karo, yah hum ko  ghurp se,  jab dhekho patkaro ko kuch na kuch bak rah hai”

मैंने तत्काल उस रेहान को जवाब दे दिया:- “तुम वाकई मुसलमान हो ? मुझे तो बताया गया था कि जो असली मुसलमान होता है वो इन्साफ का साथ देता है। एक बच्ची पर भदोही के दलाल पत्रकार घेराबंदी कर रहे हैं, मैं उनका विरोध कर रहा हूँ और तुम उलटे मुझे पागल करार दे रहे हो ? तनिक भी शर्म नहीं आती है तुमको खुद को मुसलमान कहते? या फिर तुम्हारी निगाह में मुसलमान का मतलब ही अलहदा होता है? अभी भी वक्त है। तनिक शर्म करो। खुद को इन्साफ की राह पर ले जाओ। मुसलमान बनो। आमीन।”

इस पर भड़क गये वह रेहान। लिखा:- +91 98394 13786‬: “Bath patkaro ki ho rahi hai aur yaha hindo aur musalmaan kah se aa gaya aur ladki ki madad karna hai tho wah chal kar karo patkaro ko ghaliya kiyu bak rahe ho aur thumari such samj gay hai thumare jaise log hi insanity khatam kar rahe hai Hindu aur musalmaan kah kar mai tho hindustani ho pahle jai barat jai hindustan baki thumare bare mai kuch nhai jaantha thum kon ho

Dalal kah nhai hai bhadhoi ho yah koi bhi jagah himaat hai tho ladki ki madad karne bhadhoi chalo tab insanity patah Chale gi ham bhadhoi chal kar uas ladki madad karne ko taiyaar hai hamare log bhi madad karegay jaisee madad ho ok”

उधर भदोही में एक सज्जन ने उस अपराधी शादाब और उसके सपा विधायक जाहिद बेग को अपना खैर-ख्वाह बना लिया। नाम है हरीनाथ यादव। हालांकि वे भदोही में दैनिक जागरण के कर्मचारी नहीं हैं, लेकिन विज्ञापन के सेक्शन में कमीशन-एजेंट हैं। आज उन्होंने मुझे दलाल बताया दिया और जब मैंने उनका प्रतिवाद किया तो वे साले और माधर— पर उतर आये। अब हरीनाथ को कौन बताये कि कोई भी पत्रकार शब्दा का उच्चालरण तो सही करता होगा। मसलन, माधर नहीं बल्कि सही शब्द- होता है मादर। कुछ भी हो, उन्होंने मुझे साला और माधरचोद की गाली दी है। लेकिन उन गालियों का मैं क्या करूंगा हरीनाथ यादव जी? ऐसा करो कि यह गालियां तुम खुद अपने लिए इस्तेमाल कर लो। तुम्हें और तुम्हारे आकाओं को इसकी ज्यादा जरूरत होगी। है न?

मामला बहुत बड़े संकट का था। बच्चों से गलती हो गयी तो भदोही वाले चच्चा ने लखनऊ वाले चच्चा से बातचीत की। और फिर भदोही वाले चच्चा ने अपने भतीजे को पुचकाते हुए कहा: जा बेटा। यह पकड़ दारू की बोतल, प्ले‍ट में बिरयानी और जरा कुछ दिन घूम जा जेल। बताना कि क्या-क्या हालचाल है वहां, क्या दिक्कतें हो रही हैं। हमारे सैकड़ों लोग वहीं रह कर अपना पुण्य-लाभ कर रहे हैं। अररररररर्रे नहीं मेरे लाल। जेल नहीं है वह। वहां तुम्हारे खाने-पीने का पूरा इन्तजाम करा दिया है। तुम्हारे लिए वहां जन्नत की सारी खासियतें-सुविधाएं मौजूद होंगी। घबराना मत मेरे लाल। वहां मस्त-मस्त मौज न मिले, तो कुत्ते की थाली में थूक कर चटवा लेना मुझसे।

तो भइया, यह किस्सा है भदोही का। यह शहर मर्दों, बहादुरों, साहसी, न्यायप्रिय, जुझारू, जाबांज, पड़ोसी-प्रिय, मेलजोल-प्रिय, शान्त, सरल और महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा में अपनी आन-बान-शान तक न्यौ‍छावर करने वाले श्री-वीर्य पुरूषों की जन्म-स्थ्ली है। ऐसे पुरूषों को भदोही और भदोही ऐसे पुरूषों को सर्वाधिक स्‍नेह लेते-देते हैं। इस स्वर्णिम-भूमि के सजग प्रहरी हैं एक निर्वाचित पदाधिकारी जी। बेहद धार्मिक और जनप्रिय। नवरात्र होते ही बम्बई की ओर भाग जाते हैं, क्योंकि उन्हें नवरात्र में केवल मुम्बई ही ऐसा माकूल उचित स्थान लगता है जहां देवी-पूजन और अराधना, अर्चना, पूजा, वेदी, आदि-इत्यादि में कभी कोई भी दोष नहीं दीखता। चहुंओर पुण्य ही पुण्य। सिर्फ और सिर्फ सबाब और सबाब के अलावा कुछ भी नहीं। क्या हिन्दू् और क्याल मुसलमान।

बस, इसी भदोही में 19 साल की एक लड़की एक दिन एक घने बाजार से गुजर रही थी। वक्त था कोई सवा पांच बजे शाम। एक निहायत सज्जन लड़के की नजर उस लड़की पर पड़ी। उसे लगा कि शायद उस लड़की के कपड़े गंदे हैं। इसलिए उसे इंगित करने के लिए उसे पहले पुकारा, फिर सरेबाजार उस लड़के ने उस लड़की के सामने साष्टांग प्रणाम किया। बोला:- आदरणीय बहन जी, लगता है कि आपके वस्त्र गंदे हो गये हैं, इसलिए उन्हें बदलना जरूरी है।

चूंकि वह लड़की उस महान लड़के को नहीं पहचानती थी, इसलिए उसने उसने उस लड़के के अनुरोध को ठुकरा दिया। लेकिन वह लड़का चूंकि धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत था, साथ ही नवरात्र का पहला ही दिन था, इसलिए उस युवक ने उसे पुन: टोका कि देवी-जागरण के मौके पर अपवित्र वस्त्रों का नहीं धारण करना चाहिए। लेकिन लड़की ने उस धार्मिक युवक की बात नहीं मानी।

अब चूंकि शास्त्रों में लिखा है कि सत्य और शुचिता के लिए यदि युद्ध भी करना पड़े तो वह धार्मिक कृत्य ही माना जाएगा। इसलिए उस युवक ने उस लड़की के कपड़े जबरन उतारना शुरू कर दिया। लड़की ने मना किया तो भी उस धार्मिक युवक ने यह धर्म-अनुष्ठान जारी रखा। ताकि बाजार और पूरी भदोही में स्वच्छता का संदेश फेल सके। लेकिन उस अधार्मिक लड़की ने इस पर ऐतराज किया, सीधे पहुंच गयी पुलिस के पास। एसपी साहब बोले कि उस धार्मिक को पकडूंगा। लेकिन पकड़ा नहीं। कल सोमवार को उस लड़की ने अदालत में अपना बयान दिया कि उस धार्मिक ने यह कृत्य किया है। उस दौरान वहां के कोतवाल मौजूद थे। लग्जरी कारों से वह महान और सज्जनता का प्रतीक लड़का और उसके दोस्त भी पहुंच गये। कोतवाल और पुलिस का काम होता है कि सज्ज नों को संरक्षण देना। इसलिए उस धार्मिक युवक और उसके करीब दो दर्जन मित्रों को कोल्डं-ड्रिंक की बोतलों का ढक्कान खोलने में बिजी थे, दे दनादन, पोक्क पोक्क।

दो-एक दिन में ही तुम्हारी जमानत की बात फाइनल कर दिया है। ऐश से जाओ जेल। गांधी जी भी जेल चुके हैं। जेल जाने से नेतागिरी मिलेगी, ओर नेतागिरी की रफ्तार तुम्हें तक खासी ऊंचाई तक ले जाएगी। आज जो यह पत्रकार हैं, इन्‍हें लगातार और नियमित तौर पर मैं प्रसाद देता रहता हूं। नहीं बेटा, चिन्‍ता मत करो। तुम खुद सोचा कि इतना बड़ा पुण्‍य-कर्म कर लिया तुमने, जबकि मेरे विरोधी मेरा भट्ठा बैठाने पर आमादा थे। लेकिन इन्‍ही मेरे पालतू ईमानदार पत्रकारों ने तुम्‍हारी ओर उंगली तक नहीं उठायी। सब जानते थे कि तुम मेरे घर में छिपे हो, लेकिन लिखा किसी पत्रकार ने कि तुम मेरे घर में छिपे हो।

छोड़ो बेटा, जेल जाओ। भदोही जेल नहीं है, जन्नत है। पुलिसवालों वहां भी तुम्‍हारे जूते चमकायेंगे। इतिहास देख लो कि कितने नेताओं ने जेल में शाहंशाह की है बरसों-बरस। तुमने तो किया है मर्दानगी का काम मेरे लाल। जो चाहोगे, मिल जाएगा जेल में। कोई कमी नहीं रहेगी घर-जेल के माहौल में। दो-चार दिन में जमानत करा दूंगा, फिर गंगाजल स्टाइल में लड़की के घर जाना। देवगन की फिल्‍म गंगाजल तो तुमने देखी ही होगी न, बिलकुल वैसे ही रंगबाजी में उसके घर जाना। अबे, कहां बच के जाएगी वह लौंडिया, जेल से निकलते ही हर कीमत वसूल लेना।

“ऐ देश के लफंगों, नेता तुम्हीं हो कल के
यह देश है तुम्हारा, खा जाओ इसको तल के।”

लेखक कुमार सौवीर यूपी के बेबाक और आजाद पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके वेब पोर्टल मेरी बिटिया डाट काम से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकारों को गालियां देता है दैनिक जागरण भदोही का पत्रकार हरिनाथ यादव!

Sanjaya Kumar Singh : छोटे शहरों के बड़े अखबारों की पत्रकारिता… भदोही में एक नेता के भतीजे ने किसी लड़की से छेड़खानी की और बात बढ़ी को उससे बदतमीजी की तथा उसके कपड़े भी फाड़ दिए। यह खबर भदोही से कायदे से रिपोर्ट नहीं हुई और लखनऊ के पत्रकार कुमार सौवीर ने इसपर अपने पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम पर विस्तार से लिखा और फेसबुक पर उसका लिंक भी दिया। खबर का शीर्षक था, “समाजवादी नवरात्र शुरू: एमएलए के भतीजे ने सरेआम नंगा किया अनाथ किशोरी को”।

इस क्रम में और भी खबरें कीं। उन्होंने एक और खबर लिखी, “भदोही काण्ड: धंधा है दलाली व चरण-चूमने का, खबर कैसे मिले”। इसे पप्पू जी यादव ने शेयर किया और टिप्पणी लगाई, “भदोही के पत्रकारों की जय हो”। इसपर हरिनाथ यादव ने कमेंट में दैनिक जागरण में छपी खबर लगाई और लिखा, “दैनिक जागरण ने प्रथम पेज पर प्रकाशित किया है। पत्रकारों पर आरोप मढ़ने से पहले अपनी गिरेबां में जरूर झांक लिया करें”। यहां तक तो मुझे मामला ठीक लग रहा था और लगा कि भदोही में भी कोई वीर और कर्मठ पत्रकार है जिसकी प्रतिभा दबी हुई है।

इसीलिए इसमें मेरी दिलचस्पी जगी। इसपर कुमार सौवीर ने लिखा, “Harinath Yadav : हादसे के तीन बाद तुम्‍हें खबर मिली, इसके लिए पहले शर्म के चलते अपना चेहरा काला कर लो। पत्रकारिता के बेशर्म चेहरा हो तुम। भदोही की अपनी ही बेटियों की इज्‍जत को इस तरह अपनी दलाली के लिए बेच रहे हो तुम। आक्‍थू।” आप कुमार सौवीर की भाषा और आक्थू कहने से असहमत और नाराज हो सकते हैं पर अभी मुद्दा वो नहीं है। वे खबर नहीं करने और इसका कारण दलाली बता रहे हैं। इसपर हरिनाथ यादव ने लिखा, “ Kumar Sauvir किसी जमाने में आप जौनपुर में एक अच्छे समाचार पत्र में कार्यरत थे। आपकी कारस्तानी के चलते आपको वहां से हटा कर मुख्यालय से जोड़ा गया था। बाद में वहां से आप को भगाया गया।” यह आरोप का जवाब नहीं है और आरोप के जवाब में आरोप लगाने से आरोप खत्म नहीं हो जाता।

इस पर कुमार सौवीर ने लिखा, “और तुम भदोही में रह कर भदोही की बेहाल बेटियों को न्‍याय दिलाने के बजाय सादाब जैसे अपराधियों की दलाली में उन बच्चियों की इज्‍जत और उनके भविष्‍य को बेच रहे हो। करते रहो। तुम्‍हारी नीय‍त ही यही है। इसके अलावा तुम क्‍या कर सकते हो। तैयार रहना, जल्‍दी ही तुम सब की खबर लूंगा। फेसबुक पर कमेंट और फिर जवाब भी कमेंट के रूप में हुई इस बातचीत का स्क्रीन शॉट कुमार सौवीर ने पोस्ट किया और है इसे पप्पू जी यादव ने भी साझा किया है। पर यह बातचीत मुझे मिली नहीं इसलिए संक्षेप में लिख रहा हूं। स्क्रीन शॉट पढ़ने में साफ नहीं है और पूरी बातचीत टाइप करने में समय लगेगा। इसलिए सिर्फ जरूरी अंश।

कुमार सौवीर ने लिखा कि लड़की सरेबाजार नंगा कर दी गई और महज छेड़खानी का सर्टिफिकेट देते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती है। इसपर हरिनाथ यादव ने लिखा, “ऑफिस में बैठकर समाज सेवा की बात करते हैं भदोही आयो और सच्चाई जानो घटना की और पत्रकारों के बारे में भी।” इसपर कुमार सौवीर ने लिखा, “खूब पता है क्या करते हो तुमलोग भदोही में रहकर। इतनी बड़ी घटना को तुमलोगों ने तीन दिनों तक छिपाए रखा। जबकि हादसे के एक घंटे बाद ही पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया था।” हरिनाथ यादव ने इसके जवाब में लिखा, “घटना के दिन मैं छुट्टी पर था। दूसरे दिन पता चलते ही समाचार प्रकाशित किया गया।” इसके बाद गाली और आरोप। अपने ऊपर गाली लगाने वालों को धमकी आदि-आदि।

मैं इस खबर की चर्चा पत्रकारों के निजी संबंध या आरोप-प्रत्यारोप के विश्लेषण के लिए नहीं कर रहा हूं। इस खबर के जरिए मैं यह दिखाना चाह रहा हूं कि छोटे शहरों में अंशकालिक पत्रकारों के सहारे, न्यूनतम वेतन से भी कम तनख्वाह पर काम करने वाले पत्रकारों के जरिए हिन्दी के बड़े और तेजी से बढ़ने वाले अखबारों की पत्रकारिता कैसी है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की जरूरत समाज को है पर उसकी क्या दशा है। गली-मोहल्लों में संवाददाताओं की फौज और हर शहर से अखबार और छोटी-छोटी जगहों से संस्करण निकालने वाले अखबार में अगर एक व्यक्ति छुट्टी पर हो तो खबर अगले दिन छपती है (आरोप तो ज्यादा है)। बिहार यूपी में ऐसे मामलों में होता यह है कि मीडिया में शोर मचने पर एफआईआर लिखी जाती है पर यहां एफआईआर होने के बाद भी खबर नहीं है।

अमूमन होता यह है कि हिन्दी पट्टी के सभी शहरों में रिपोर्टर शाम को 100 नंबर पर या पुलिस कंट्रोल रूम में किसी परिचित, मित्र या सूत्र को फोन करके खबरें लिख देता है और उसकी दिहाड़ी पूरी हो जाती है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में खबरें एफआईआर की तरह ही लिखी जाती हैं। यहां छेड़खानी का आरोप एक नेता के भतीजे पर है और प्रकाशित खबर में नीचे लिखा हुआ है कि कपड़े फाड़ दिए। सरे राह किसी लड़की का कपड़ा फाड़ देने बगैर छुए और जबरदस्ती किए संभव नहीं है और नए कानून के तहत मेरे ख्याल से यह बलात्कार की श्रेणी में आएगा पर एफआईआर क्या है और मामला क्या है यही सब देखना रिपोर्टर का काम होता है। अगर रिपोर्टर चूक जाए तो डेस्क पर बैठे लोगों का काम होता है कि रिपोर्टर को आवश्यक जानकारी देने के लिए कहा जाए। पर ऐसा कुछ जागरण के डेस्क ने नहीं किया और पुरानी खबर को आधी-अधूरी छाप दी।

इसलिए खबर बेचने का आरोप लग रहा है तो रिपोर्टर छुट्टी पर होने का बहाना बना रहा है और आरोप लगाने वाले पर आरोप लगा रहा है, उससे भी बात नहीं बनी तो गाली दे रहा है। ऐसी है हमारे यहां छोटे शहरों के बड़े अखबारों की पत्रकारिता। दिलचस्प है कि हरिनाथ यादव फेसबुक पर खुद को दैनिक जागरण से जुड़ा बता रहे हैं और जागरण का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं पर गालियां देकर। किसी संस्थान का प्रतिनिधि अपने संस्थान की ओर से बोलते हुए किसी को गाली लिखे – शर्मनाक से अच्छा शब्द नहीं मिल रहा है मुझे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…..

Shambhunath Shukla कुमार सौवीर हिम्मती पत्रकार हैं और शायद इसीलिए सांस्थानिक पत्रकारिता उन्हें स्वीकार नहीं कर पाई। पर आपने इस पूरे घटनाक्रम का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है। इन सारे अखबारों के मुफस्सिल संवाददाता बस किसी तरह दिहाड़ी पूरी करते हैं और खबरों के लिए वे थानेदार के भरोसे रहते हैं साथ ही उनके साथ मिलकर एकाध मामलों में पैरवी कर लेते हैं जो उनकी रोजमर्रा की आदत है। किसी खबर के प्रति उनका रवैया चलताऊ और निपटाऊ रहता है। पर यह सिर्फ रिमोट एरिया में ही नहीं। वर्नाक्यूलर अखबारों के राजधानी स्थित दफ्तरों में यही होता है। कल एनडीटीवी के प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस के न्यूज रूम से बैठकर शो किया था उसे देखकर आंखें खुली की खुली रह गईं। और अपने जनसत्ता वाले दिन याद आ गए जब हम सब एक्सप्रेस के न्यूज रूम में ही बैठते थे और उनसे खबरें साझा करते थे। शायद इसीलिए तब की हिंदी पत्रकारिता भी आज की तरह चलताऊ नहीं थी।

Kumar Pal सर स्थिति इससे भी कही ज्यादा जटिल और भयाभय है। कस्बों के रिपोर्टर ख़बरों में कम और दलाली में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। कहीं न कहीं इसके लिए मीडिया समूह भी जिम्मेदार है। हर एजेंसी से नियूनतम महिना तय है उसे हर महीने उतना देना ही देना है अगर नहीं दिया तो उसकी दुकान बंद। दरअसल अख़बारों ने मजबूर कर दिया है पत्रकारों को दलाली करने के लिए। अख़बार अब वेतन देने की बात नहीं करते अब सीधे सीधे बात होती है महीने में कितना दोगे। और अख़बार को कितने चाहिए जिससे सामंजस्य बैठ जाता है वही पत्रकार का तमगा लगाये दलाली करता फिरता है। आज पत्रकारिता गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। प्रतिभावान पत्रकार सड़कों की खाक छान रहे है और चापलूस मालिकों के चहेते बन मलाई खा रहे है। आज कल काम से ज्यादा चापलूसी भा रही है।

Sunil Singh छोटे शहरों में बाकई पत्रकार पुलिस थाने से खबर निकाल कर छाप देते हैं। उस खवर की गहराई में नही जाते हैं। और इनकी दलाली तो सबको मालूम ही है। दारू मुर्गे पर भी बिक जाते हैं।

Sanjeev Gupta ये 100 टका सच्चाई है। सही विश्लेषण।

मूल खबर पढ़ें….

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पत्रकारिता में बढ़ा हार्ट-अटैक और ब्रेन-स्‍ट्रोक का हमला, क्या हम अपने दोस्‍तों की सिर्फ तेरही-बरसी ही मनाते रहेंगे?

गैर-मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकारों के प्रति सतर्कता की जरूरत, सन्दर्भ संतोष ग्वाला व सुरेन्द्र सिंह की अकाल मौत

कितनी अनियमित होती है आम पत्रकार की दिनचर्या। कभी दफ्तर के कामधाम में डूबा होता है, कोई खबर पकड़ने की आपाधापी में, तो कोई बाइट लेने की दौड़ा-भागी में। न खाने का वक्‍त और न कौर चबाने का मौका। कई बार तो ऐसा होता है जब एक पत्रकार जब सोने जाता है, वह समय होता है बच्‍चों के स्‍कूल की तैयारी का। और जब वह थका-चूर होकर घर लौटता है तो घर के सारे लोग अपनी ज्‍यादातर नींद पूरी कर चुके होते हैं। ऐसे में किसी को जगाने-परेशान करने का कोई औचित्‍य तक नहीं होता। सोने का वक्‍त आते ही अगली खबर की प्‍लानिंग-रूपरेखा को लेकर बचे-खुचे दिमाग के तन्‍तु-रेशे आपस में लबड़-झबड़ करना शुरू कर देते हैं।

नतीजा, बीमारियों की आमद बिना किसी अग्रिम संकेत के किसी भी अच्‍छे-खासे पत्रकार के स्‍वास्‍थ्‍य के दरवज्‍जे की कुण्‍डी बजाय घर में घुस आ चुकी होती है। किसी को ब्‍लड-प्रेशर है तो किसी को सुगर। किसी को ब्रेन-स्‍ट्रोक हो जाता है, तो कोई हार्ट-अटैक के हमले से 50 फीसदी से भी सिमट जाता है। यह बात मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा हूं। चार साल पहले मैं भी ब्रेन-स्‍ट्रोक से डगमगा चुका हूं। गनीमत है कि मैंने खुद को बहुत जल्‍दी सम्‍भाला, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ज्‍यादातर पत्रकार इतने खुशनसीब नहीं होते हैं। आज अखबार वाले सुरेंद्र सिंह की छीछालेदर आप देख चुके हैं, जिन्‍हें कई दिनों पहले ही मौत ने शिकस्‍त दे दी थी। संतोष ग्‍वाला भी इसी में खप गये।

इसके 4 साल पहले मुझे भी एक जबरदस्त ब्रेन स्ट्रोक पड़ा। महीनों बिस्तर रहा। कई सेक्टर हमेशा के लिए बर्बाद हो गए। नुकसान अपूर्णनीय। लेकिन इसके बावजूद मैं बहुत जल्दी सम्हाल गया, मगर संतोष और सुरेन्द्र मौत के गाल में समा गए। हिसाम सिद्दीकी, शलभ मणि त्रिपाठी, रामदत्त त्रिपाठी, प्रांशु मिश्र, अलोक पांडेय, नवलकांत सिन्हा जैसे तमाम मित्र मजबूती के साथ खड़े रहे, जबकि आज पत्रकार एकता के डंके बजाने वाले बड़े पत्रकार न जाने किस बिल में घुसे ही रहे। झाँकने तक नहीं आये। मजे की बात यही लोग एकता के नाम पर एकता की किर्च-किर्च बिखार्ने की साजिश करते ही रहे। ख़ैर, ग्वाला और सुरेन्द्र की मौत के बाद अब हमारे सामने जिम्मेदारी है कि हम अपनी बिरादरी को मजबूत करें। अब खोजिए न, कि प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में कितने पत्रकार खामोश मौत के प्रगाढ़ आलिंगन में चले गए। हमेशा-हमेशा के लिए।

गजब है यार। इस तरह तो हमारे लोग एक-एक कर खपते जाएंगे और हमारा काम केवल उनकी याद में शोक-सभा आयोजित करना या तेरहीं-बरसी बनाता रह जाएगा। आज इसी समस्‍या पर चर्चा हो गयी। दोस्‍तों को लेकर बेहद आग्रही दीपक गिडवानी का कहना है कि पत्रकारों की बेहूदी दिनचर्या को लेकर अब जरूरत है कि हर पत्रकार अपने स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर सजग रहे और कम से कम एक साल में दो बार अपने शरीर का पूरा चेकअप कराता रहे। दीपक का कहना है कि इसमें केवल डेढ़ से लेकर दो हजार रूपयों का ही खर्चा है, और फायदा यह कि आप अपने शरीर को किसी आसन्‍न खतरे को पहचान सकते हैं और उसे दूर कर सकते हैं।

हर शख्‍स इस बात की जरूरत महसूस करता है। लेकिन उसे इस तरह की चिन्‍ता नहीं होती, जिसका इशारा दीपक गिडवानी ने किया। मैं दीपक की बात से पूरी तरह सहमत हूं। मैंने दीपक से कहा:- आइये दीपक। कल हम लोग इस मामले पर बात करते हैं। समय और जगह आप तय कर लीजियेगा।  बात तो ठीक है। हमने और दीपक ने तय किया है कि इस मसले पर हम शलभमणि त्रिपाठी, प्रांशु, ब्रजेश मिश्र, अनूप श्रीवास्‍तव, रामदत्‍त त्रिपाठी, शरद, योगेश मिश्र, मनोज रंजन त्रिपाठी, आलोक पाण्‍डेय, कमाल खान, नवल कान्‍त सिन्‍हा, घनश्‍याम शुक्‍ल, नीरज श्रीवास्‍तव, मुदित माथुर आदि दोस्‍तों के पास पहुंचें और उन्‍हें इस बारे में एक बड़ी बैठक की तैयारी सौंपने की जरूरत बतायें। यह सभी जिम्‍मेदार और संवेदनशील हैं, समस्‍या को चुटकियों में समझने और उसका निदान खोजने में सक्षम हैं।

मैंने यह भी कहा कि चूंकि किसी संस्‍था से सीधे-सीधे नियमित रूप से जुड़े पत्रकारों के लिए यह सतर्क रहने की जरूरत है, लेकिन जो पत्रकार मान्‍यता प्राप्‍त नहीं हैं, हमें उन पत्रकारों तक यह सुविधा मुहैया कराने की कोशिश करनी चाहिए। हमें देखना चाहिए कि कैसे गैर मान्यता पत्रकारों तक यह सुविधा मिल सकती है। गैर-मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकारों का स्‍वास्‍थ्‍य हमारे लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और सघन चिंता का विषय है। तो क्‍या किया जाए। पहला तरीका तो यह है कि इस मसले पर सीधे सरकार से बातचीत की जाए। इसके अलावा यह भी किया जा सकता है कि हमारा संगठन आईएमए यानी भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य संघ (आइएमए) से बातचीत करे, जो हर जिले में अपने निजी या सरकारी सदस्‍यों को इस बारे में शिविर लगाने की कोशिश करें। लेकिन एक बड़ी बाधा सामने जरूर है। हमें अपने बीच पैठ बिठाये दलालों-बिचौलियों को चिन्हीकरण करना पड़ेगा, जो वाकई कुल-कलंक हैं, पत्रकारिता के चेहरे पर कालिख हैं और बाकायदा कोढ़ हैं, भले वो किसी दूरस्थ जिले के दूरतम कस्बे के हों या फिर यही लखनऊ में कुंडली मारे बैठे हों। अगर आप ऐसा कर सकते हैं तो यकीन मानिए, कल आपका ही है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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उसका नाम था संतोष ग्‍वाला, अदना-सा पत्रकार, लेकिन गजब शख्सियत, अचानक उसकी मौत हो गयी…

लखनऊ : उसका नाम था संतोष ग्‍वाला। अदना-सा पत्रकार, लेकिन गजब शख्सियत। अचानक उसकी मौत हो गयी। पत्रकारिता उसका पैशन था। खबर मिलते ही मौके पर पहुंच जाना उसका नशा। घटना को सूंघ कर उसमें पर्त दर पर्त घुस जाना उसकी प्रवृत्ति थी। दीगर पत्रकारों की तरह वह न तो किसी संस्‍थान में स्‍थाई मुलाजिम था और न ही सरकार से उसे मान्‍यता मिली थी। न पेंशन, न मुआवजा, न भविष्‍य कोष और न ही सरकार से किसी राहत की उम्‍मीद। पत्रकारिता की पहली सीढी पर ही उसने पूरी जिन्‍दगी बिता दी। जाहिर है कि अचानक हुई उसकी अकाल मौत से पूरा परिवार और खानदान विह्वल सन्‍नाटा में आ गया।

शोक सभा में मौजूद कोई ढाई सौ पत्रकारों की भीड़ गमगीन थी। शोकसभा में उप्र मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति के अध्‍यक्ष प्रांशु मिश्र, मुदित माथुर समेत कई वरिष्‍ठ पत्रकारों के अलावा जिलाधिकारी राजशेखर, एसएसपी राजेश पाण्‍डेय आदि भी मौजूद थे। कई साथी पत्रकार फूट-फूट कर रो रहे थे। बोलने के दौरान शब्‍द नहीं, हिचकियां बरस रही थीं। ई-टीवी का संतोष तो बोलने से पहले लगा गश खाकर गिर पड़ेगा। सभी की चिंता का विषय यही था कि संतोष ग्‍वाला तो मान्‍यता प्राप्‍त नहीं था, ऐसे में उसे क्‍या सरकारी मिलेगी। ऐसे में उसका परिवार कैसे अपना गुजर-बसर करेगा।

एक युवा पत्रकार ने डीएम राजशेखर से करीब-करीब गिड़गिड़ाते हुए इस बात की गुहार लगायी कि वे संतोष के बेहाल परिवार के लिए कुछ ऐसी स्‍थाई राहत दिला दें, जिससे उन्‍हें मलहम लग सके। सबके बोलने के बाद राज शेखर बोले। पूरा सभागार में खामोशी हो फैल गयी। उन्‍हें लगा था कि अब उनकी मुराद अब डीएम पूरी कर ही देंगे। लेकिन राजशेखर ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। लेकिन इसके बावजूद राज शेखर ने जो भी कहा, वह दिल से कहा। और उनकी बात पर पूरा सभागार संतुष्‍ट हो गया।

डीएम ने सबसे पहले तो संतोष ग्‍वाला से हुई अपनी मुलाकातों का जिक्र किया, खबर और खबरची के प्रति उसकी निष्‍ठा पर चर्चा की, और इस पर भी गहरा दुख व्‍यक्‍त किया कि ऐसे निष्‍ठावान पत्रकारों और उनके परिजनों को ऐसी दुर्दशा का सामना करना पड़ता है। राज शेखर ने याद किया कि संतोष ने खबरों को लेकर तो उनसे कई बार बात की, लेकिन कभी दलाली जैसी कोई घटना-सूचना नहीं मिली। ग्‍वाला के परिजनों को राहत दिलाने की बाबत राजशेखर बोले कि वे डीएम के तौर पर इस बारे में उनके अधिकार बेहद सीमित हैं। लेकिन शासकीय धन के बजाय वे अपनी निजी क्षमता से इस परिवार की मदद करेंगे।

लेकिन हैरत की बात तो यह रही कि इस डीएम ने यह जरूर कह दिया कि मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव बेहद संवेदनशील हैं। मैंने उन्‍हें ग्‍वाला और उनसे जैसे पत्रकारों की हालत के बारे में जिक्र कर दिया है। मेरी बात पर मुख्‍यमंत्री जी सहमत थे ओर वे इस बात पर भी सहमत हैं कि अभिव्‍यक्ति के सेनानियों को समुचित राहत मिलनी ही चाहिए। बस्‍स्‍स्‍स्‍स। केवल इतनी ही बात कही राज शेखर ने। और फिर बात खत्‍म हो गयी। बाकी का वक्‍त ग्‍वाला के जाने को लेकर ही दुखमय रहा। केवल विषाद, हर्ष की अनुपस्थिति ही मंडराती रही। आश्‍वासन तो कुछ ठोस नहीं मिला, उस पर तुर्रा यह कि बड़े पत्रकार इस शोकसभा से दूर ही रहे। लेकिन जिन्‍हें छुटभैया पत्रकार कहा जाता है, उन्‍होंने अब तक अपनी कड़की के बावजूद तीन लाख रूपयों की भारी-भरकम रकम जुटा ली।

लेकिन चार दिन बाद ही राज शेखर का एक संदेशा सारे छोटे-छुटभैया पत्रकारों को झूम कर लहरा गया। पता चला कि ग्‍वाला के बच्‍चों की स्‍कूल में होने वाली फीस माफ कर दी गयी है। खुद राज शेखर ने उस स्‍कूल से बातचीत की और स्‍कूल प्रबंधक ने उन बच्‍चों की फीस पूरी तरह माफ कर दी, जब तक वे उस स्‍कूल तक पढेंगे। अभी यह सूचना पर यह पत्रकार खुश हो रहे थे, कि इसी बीच राज शेखर ने ढाई लाख रूपयों की एक बड़ी रकम संतोष के परिजनों तक पहुंचा दिया। यह रकम राजशेखर समेत कलेक्‍ट्रेट के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी जेब से एकत्र की थी।
उधर राजशेखर के साथ किसी कुशल दाम्‍पत्‍य-जीवन के दूसरे पहिये की तरह टंके हुए एसएसपी राजेश पाण्‍डेय भी कम नहीं निकले। इसी दौरान ढाई लाख रूपयों की मदद उन्‍होंने जिला पुलिस के अधिकारियों से जुटाई।

इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ था। लगा, मानो संतोष के परिजनों के घर भगवान ने छप्‍पर फाड़ कर सहयोग की बारिश कर दी। स्ट्रिंगर्स, संवादसूत्र और जूनियर रिपोर्टर जैसे मामूली काम में पूरी शिद्दत के साथ जूझ रहे पत्रकारों को यकीन भी नहीं हो रहा था कि उनके पास भी इस तरह के दैवीय तोहफे भी मिल सकते हैं।

लेकिन अभी शायद किसी चमत्‍कार की तरह वे यह पत्रकार स्‍तब्‍ध हो गये, जब उन्‍हें खबर मिली कि मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने संतोष के घरवालों को बीस लाख रूपयों की आर्थिक सहायता मंजूर की है। इतिहास गवाह है कि पत्रकारिता के सबसे निचले पायदान पर लटके किसी पत्रकार को सरकार से कोई भी मदद अब तक नहीं मिली थी। कहने की जरूरत नहीं कि संतोष की पैरवी राज शेखर ने की, और कोशिश भी की, आइंदा ऐसे छोटे पत्रकारों को भी इस तरह सहायता मिलती रहे।

अब आखिरी बात।

मैं राज शेखर से कभी भी नहीं मिला, लेकिन जब शोकसभा में उसका अंदाज देखा तो उसमें मुझे अपने भतीजे कंवल तनुज की छवि दिखी, जो बिहार के औरंगाबाद का जिलाधिकारी है। राज शेखर में भी उसी तरह का जोश, उसी तरह की भावनाओं के समंदर की हिलारें-लहरें। कुछ नया करने का जज्‍बा और जोश। हां, राजेश पाण्‍डेय को निजी तौर पर जानता हूं। मेरे के प्रति निहायत लापरवाह, लेकिन अपने दायित्‍वों को लेकर सर्वाधिक कर्मठ। बहुत संवेदनशील तो नहीं, क्‍योंकि पुलिस की नौकरी होती ही ऐसा है जहां सरकारी इशारा समझना सर्वाधिक जरूरी होता है। लेकिन जन-प्रतिबद्धता और ड्यूटी पर मुस्‍तैद हैं राजेश।

सवाल यह है कि जब राज शेखर ऐसा कर सकते हैं, तो फिर बाकी जिलाधिकारी क्‍यों नहीं। क्‍या वजह है कि राज शेखर ने बिना किसी प्रशासनिक जिम्‍मेदारी के संतोष जैसे पत्रकारों को सहायता दिलाने की परम्‍परा छेड़ दी। क्‍यों यह काम दीगर डीएम नहीं कर पाये। वजह यह संवदेनशीलता, जो किसी भी राजशेखर में इन-बिल्‍ट होती है। लेकिन जिन में नहीं होती है, उनमें सीखा जा सकता है, बशर्ते उनमें दमखम हो। और मैं समझता हूं कि आईएएस जैसी शीर्ष संस्‍थाओं से जुड़े लोगों में यह गुण बहुत आसानी से विकसित हो सकता है। बशर्ते उनमें दीगर तुच्‍छ स्‍वार्थों का बोलबाला न हो।
अरे कोई भी राज शेखर बन सकता है। बस कोशिश करो, नयी सोच विकसित करो, सकारात्‍मक बनो, थोड़ा समय समर्पित करो। बकवादी बंद करो। एेयाशी रोकाे। तुम लोकसेवक हो, राजनीति मत करो। बस।

आने वाला वक्‍त तुम्‍हारा ही होगा।
तुम ही शाहंशाह होगे।

प्रत्‍येक जिले के डीएम में राज शेखर बनने की कूवत है, तुम ही अपने वक्‍त राज शेखर होगे।

और हां, आखिरी बात पत्रकारों से। लखनऊ के बड़े पत्रकार-नेताओं की कुकुर झौं-झौं वाली प्रवृत्ति मत अपनाओ। ब्‍लैक मेलिंग से बचो। चरित्र सम्‍भालो। कुछ नया सोचा और करो। अफसरों की चरण-चम्‍पी या उनकी त्‍वचा-तैलीय करने की आदत छोड़ो। संतोष ग्‍वाला जैसा बनने की कोशिश करो मेरे दोस्‍त।

वक्‍त तुम्‍हारा ही होगा।

बशर्ते तुम खुद में खुद को जागृत कर पाओगे।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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वीमन हेल्पलाइन के बड़े दरोगा नवनीत सिकेरा को पत्रकार कुमार सौवीर ने दिखाया आइना

Kumar Sauvir : 1090 यानी वीमन हेल्प लाइन के बड़े दरोगा हैं नवनीत सिकेरा। अपराध और शोहदागिरी की राजधानी बनते जा रहे लखनऊ में परसो अपना जीवन फांसी के फंदे पर लटका चुकी बलरामपुर की बीडीएस छात्रा की मौत पर सिकेरा ने एक प्रेस-विज्ञप्ति अपनी वाल पर चस्पा किया है। सिकेरा ने निरमा से धुले अपने शब्द उड़ेलते हुए उस हादसे से अपना पल्लू झाड़ने की पूरी कवायद की है। लेकिन ऐसा करते हुए सिकेरा ने भले ही खुद को पाक-साफ़ करार दे दिया हो, लेकिन इस पूरे दर्दनाक हादसे की कालिख को प्रदेश सरकार और पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर पोत दिया है।

सिकेरा प्रेस विज्ञप्ति में कहते हैं:- “गुडम्बा थाना क्षेत्र में एक लड़की रानू (नाम बदला हुआ) ने शोहदों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकरण में रानू के पिता ने आरोप लगाया कि 1090 ने कोई मदद नहीं की। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि रानू की कोई कॉल 1090 को प्राप्त नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में जब कोई शिकायत प्राप्त ही न हो तो मदद कर पाना असंभव है। रानू की कोई भी शिकायत 1090 में दर्ज नहीं है।”

सिकेरा जी, जब आप फोन ही नहीं उठाएंगे तो हर फोन अनआन्सर्ड ही रहेगी ही। मेरे पास ऐसी पचासों शिकायत हैं, लेकिन आपके पास एक भी नहीं। और, फिर जो दर्ज रिपोर्ट होती भी है तो आप करते क्या हैं उसका सिकेरा जी। कम से कम एक मामले में तो मैं जानता हूँ कि उसमें 15 हजार वसूल लिया था आपके विवेचक ने। वह मेरी 84 वर्षीय माँ का मामला था जो अकेले ही रहती थीं और उसे एक अपराधी ने भद्दी गालियां देते हुए मकान खाली न करने पर जान से मार देने की धमकी दी थी। उस खबर पर पुलिस के प्रवक्ता और सूचना विभाग के कुख्यात चोंचलेबाज़ डिप्टी डायरेक्टर डा.  अशोक कुमार शर्मा ने इस डाल से उस डाल तक खूब कुलांचें भरी थीं, केवल प्रदर्शन के लिए। ऐसे में आपकी ऐसी सफाई बहुत शर्मनाक लगती है। काम करना बहुत साहस का काम होता है। कुर्सी तो कोई भी तोड़ सकता है। है कि नहीं बड़े दारोगा जी?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट>

यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

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यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

बधाई हो सरकार में बैठे समाजवादियों और तुम्हारे कारकूनों! तुम्हारे अटूट प्रयास आज फलीभूत हुए और नतीजा यह हुआ कि बीती रात एक मेडिकल छात्रा ने राजधानी के गुडम्बा कालोनी में अपने कमरे में पंखे से लटक  कर खुद को मौत हवाले कर दिया। बधाई हो। ताज़ा खबर है कि लखनऊ के एक डेंटल मेडिकल छात्रा ने छेड़खानी से त्रस्त होकर फांसी लगा ली। पिछले कई महीने से मोहल्ले से लेकर कॉलेज आसपास शोहदों ने उसका जीना हराम कर रखा था। मानसिक तनाव इतना बढ़ने लगा कि उसे खुद की जिंदगी ही अभिशाप लगाने लगी। उसे लगा कि उसका स्त्री-देह ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। बस फिर क्या था। इस बच्ची ने उस कलंक-अभिशाप को ही हमेशा-हमेशा के लिए धो डाला।

यह बच्ची अवध क्षेत्र के बलरामपुर जिले की थी। उसके पिता वहां दवा की दूकान चलाते हैं। यह बच्ची होनहार थी, सो आगे की पढाई के लिए लखनऊ अपने चाचा के परिवार के साथ रहने लगी। जल्दी ही उसकी मेहनत रंग लायी और उसे डेंटल कालेज में प्रवेश मिल गया। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता है कि महिला-शक्ति को सशक्तिकृत करने के दावे तो यूपी सरकार ने तो खूब किये। शुरुआत हुई महिला अपराधों पर कडा अंकुश लगाने के संकल्प से। योजना की संकल्पना तैयार की थी 2 साल पहले सुल्तानपुर की एक महिला युवा आईपीएस अधिकारी अलंकृता ने, जो उस वक्त वहां पुलिस कप्तान थी।

लेकिन शासन और पुलिस के बड़े हाकिमों ने उस संकल्पना को उस महिला से छीन लिया और लखनऊ के एसएसपी पद से हटाये गए नवनीत सिकेरा को उसका मुखिया बना डाला। जबकि होना तो यह था कि जिस अफसर ने उस योजना की रूप-रेखा बुनी थी, उसे ही उसका जिम्‍मा दिया जाता। इसलिए खास तौर पर भी, कि महिला होने के चलते वह महिलाओं की इस हेल्‍पलाइन को बेहतर ढंग से समझ और क्रियान्वित कर सकती थी। लेकिन उस योजना को नयी रंगरोगन से लीपपोत कर उसे 1090 का नाम गया। सिकेरा को मुखिया इस लिए बनाया गया क्योंकि अखिलेश यादव परिवार से सिकेरा की बेहद करीबी है। कुछ भी हो, 1090 ने और कोई काम भले किया हो या नहीं, लेकिन इसको लेकर फर्जी डंके खूब बजवा दिया।

लेकिन अपने दो साल के प्रयोग के अंतराल यह 1090 का प्रयोग पूरी तरह असफल हो गया। महिलाओं में विश्वास उपजाने के बजाय अब किशोरियां-महिलाओं के सपनों में 1090 के दारुण-डरावने सपने दिखने लगे हैं। हाल ही 1090 के एक प्रभारी अधिकारी तो एक वादी युवती से ही वही करतूत करने लगे, जिसके खिलाफ ही 1090 डंका बजाने का दावा था। पीडि़त महिला जब महिला अधिकार प्रकोष्‍ठ की महानिदेशक सुतापा सान्‍याल के पास पहुंची तो उन्‍होंने तत्‍काल इस मामले की खुद जांच करने का ऐलान किया। लेकिन अचानक ही आला अफसरों ने सुतापा सान्‍याल से यह मामला खींच कर सीधे नवनीत सिकेरा को थमा दिया। बाकी आप-सब को यह बताने की जरूरत तो है नहीं कि करीब एक महीना होने के बावजूद यह मामला ठण्‍डे बस्‍ते में ही पड़ा हुआ है। इसके पहले एक 84 वर्षीय महिला को एक शख्‍स ने कई-कई बार फोन करके भद्दी गालियां दीं और जान से मार डालने की धमकियां दीं। इसकी शिकायत जब 1090 और नवनीत सिकेरा तक की गयी, लेकिन कई कोशिशों के बावजूद कुछ भी नहीं हुआ। बाद में पता चला कि इस शिकायत पर गाजीपुर के थानाध्‍यक्ष ने उक्‍त अभियुक्‍त से 15000 हजार रूपया वसूल कर मामला रफा-दफा कर दिया।

यह तब हुआ जब सूचना विभाग के एक बड़े बडबोले और महीन अफसर अशोक कुमार शर्मा पुलिस के प्रवक्‍ता बने घूम रहे थे और इस मामले पर उन्‍होंने खुद हस्‍तक्षेप करने का दावा किया था। तो बोलो:- नवनीत सिकेरा जिन्‍दाबाद।

ऐसे में 1090 के प्रति आम महिला का विश्‍वास कैसे पनपता ?

एक ओर मुलायम सिंह यादव जब यह ऐलान करते घूम रहे थे कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, ऐसे में यह मेडिकल छात्रा किससे अपनी फरियाद करती। उस बच्‍ची ने फैसला किया। तय किया कि अब न बांस रहेगा और न बजेगी बांसुरी। बीती रात उसने अपने दोपट्टे से पंखे से फांसी का फंदा बनाया और झूल गयी फांसी पर वह होनहार बच्‍ची। आओ, अब 1090 का डंका बजाया जाए कि 1090 निदान नहीं, बिलकुल ढपोरशंख है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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अगर ऐसी पत्रकारिता करानी है मुझसे तो लाइये पचास लाख रुपया दीजिए नकद एकमुश्‍त

बिल्डर संपादक और सलाहकार संपादक के बीच का संवाद

यह किस्‍सा मुझे भोपाल में मिला। पता चला कि यहां एक नामचीन पत्रकार हैं। मान लीजिए कि उनका नाम है मस्‍त-मस्‍त शर्मा। असली नाम नहीं बताऊंगा। हां, उनका सरनेम शर्मा है, शर्तिया और सौ-फीसदी सच। शर्मा जी दिल्‍ली में भी आला दर्जे की पत्रकारिता कर चुके हैं। शुरुआत में तो वे भी मध्‍य प्रदेश के कई बड़े शहरों में भी काम कर चुके थे, लेकिन दिल्‍ली में तो उनके जलवे ही थे। नामचीन नेताओं-अफसरों से उनके निजी रिश्‍ते बन गये। दरअसल, बेहद बलौस और तराशी हुई नजर अता फरमायी है खुदा ने उन्‍हें। वगैरह-वगैरह। लेकिन जैसा कि पत्रकारों के सिर पर से बाल खिसकते-छनते हैं और दीगर पत्रकारों की ही तरह उनकी खोपड़ी पर भी बेरोजगारी के पाले-पाथर बरसे। वे बेरोजगार भी हुए। यह किस्‍सा उनके इसी दौर का तफसील है।

तो, हुआ यह कि भोपाल के एक बड़े बिल्‍डर-व्‍यवसायी ने एक तामझामा अखबार निकाला। अखबार की ब्राण्डिग के लिए उन्‍हें शर्मा जी से सम्‍पर्क किया। पद मिला सलाहकार सम्‍पादक का, वेतन मिला पचास हजार रूपया महीना, तैनाती मिली दिल्‍ली में। कोई बात नहीं। शर्मा जी ने तय किया कि इसमें भी गुजारा कर लिया जाएगा। गर्दिश में जब यही सब होना है, तो हो ही जाए। क्‍या दिक्‍कत।

दो महीने बाद शर्मा जी को बिल्‍डर-सम्‍पादक ने बुलाया। बोला:- कुछ खास किया जाना चाहिए शर्मा जी, वरना अखबार की हनक कैसे बनेगी। यह जो आपने नीचे वाले पत्रकार तो बिलकुल मूरख हैं।

शर्मा बोले:- फिर क्‍या सोचा है आपने।

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- अनोखा, अनोखा शर्मा जी, बिलकुल अनोखा आइडिया है मेरे पास।

शर्मा:- बोलिये।

बिल्‍डर:- आप तो सोनिया गांधी जी को करीब से जानते हैं ना। हो हो हो। मुझे पता चल गया है शर्मा जी, कि आप कितने महीन हैं। हो हो हो। आप मेरी भेंट करा दीजिए सोनिया गांधी से। बाकी मैं खुद ही कर लूंगा। दिल्‍ली, गुडगांव, फरीदाबाद में मैं कई नयी लांचिंग में जुट रहा हूं। अब ऐसा है शर्मा जी कि अगर सोनिया जी को हम अपने अखबार में बुला लें तो मजा ही आ जाएगा। दिल्‍ली पर राज करेंगे फिर हम सब। क्‍या ख्‍याल है आपका शर्मा जी।

शर्मा:- नहीं, मैं सोनिया जी को नहीं जानता।

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- कोई बात नहीं, उनके सलाहकार से मेरी भेंट करा दीजिए। मैं खुद ही सोनिया गांधी से सम्‍पर्क कर लूंगा।

शर्मा:- लेकिन मैं यह नहीं कर सकता।

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- क्‍यों

शर्मा:- क्‍योंकि यह मेरा काम आपके सम्‍पादकीय को सलाह देने का है।

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- और आप अब तक क्‍या-क्‍या सलाह दे चुके हैं हमें।

शर्मा:- आपको नहीं, आपके अखबार को सलाह देता हूं। हर हफ्ते दो-दो लेख लिखता हूं।

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- हां, हां। पता है मुझे कि आप क्‍या-क्‍या करते हैं। दो-चार पन्‍ने खराब करते हैं, और क्‍या करते हैं आप।

शर्मा:- सलाह के लिए पैसा देते हैं आप मुझे, दलाली के लिए नहीं।

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- और पत्रकारिता क्‍या है। दलाली नहीं है क्‍या

शर्मा:- अगर ऐसी पत्रकारिता करानी है आपको मुझसे, तो फिर वही ठीक। लाइये, पचास लाख रूपया दीजिए मुझको। एकमुश्‍त। नकद। पचास लाख रूपया

बिल्‍डर-सम्‍पादक:- पचास लाख , अबे तू आदमी है या चूतिया

शर्मा:- अबे जा बे मांकड़े। तेरी —– में इतनी दम ही नहीं है कि मुझे बर्दाश्‍त कर पाये। साले, पचास हजार की नौकरी दे कर क्‍या तूने मुझे खरीद लिया है क्‍या बे भों—- के।
फिर क्‍या होना था। कुछ भी तो नहीं। सिवाय इसके कि शर्मा तनतनाते हुए दफ्तर से निकले और फिर कभी पलट कर नहीं आये। अबे जा बे मांकड़े। तेरी —

लेखक कुमार सौवीर वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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ट्रिक्सी यानी कुतिया नहीं, बल्कि मेरी बेटी, बहन, दोस्तन, मां और दादी…

मेरी बेटी से बहन, दोस्त, मां और दादी तक का सफर किया ट्रिक्सी ने : ट्रिक्सी की मौत ने मुझे मौत का अहसास करा दिया : मुझसे लिपट कर बतियाती थी दैवीय तत्वों से परिपूर्ण वह बच्ची

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : मुझे जीवन में सर्वाधिक प्यार अगर किसी ने दिया है, तो वह है ट्रिक्सी। मेरी दुलारी, रूई का फाहा, बेहद स्नेिहल, समर्पित, अतिशय समझदार, सहनशील और कम से कम मेरे साथ तो बहुत बातूनी। अभी पता चला है कि ट्रिक्सी अब ब्रह्माण्ड व्यापी बन चुकी है। उसने प्राण त्याग दिये हैं।  ट्रिक्सी यानी मेरी बेटी, बहन, दोस्तन, मां और दादी। ट्रिक्सी को लोगबाग एक कुतिया के तौर पर ही देखते हैं, लेकिन मेरे साथ उसके आध्यात्मिक रिश्ते रहे हैं। शुरू से ही।

आज खोजूंगा आसमान में झिलझिलाते सितारों के बीच उसे। मुझे यकीन है कि मुझे देखते ही ट्रिक्सी अपने दोनों हाथ हिलायेगी जरूर। पूंछ हिलायेगी। बेसाख्ताै। वह लपकेगी मेरी ओर, और मैं लपकूंगा उसकी ओर। लेकिन अचानक वह फिर झिलमिला कर खो जाएगी, किसी थाली में भरे पानी में अक्सं को किसी दर्दनाक ठोकर की तरह। क्योंकि वह मर चुकी है ना, इसलिए। और फिर मैं फूट-फूट कर रो पड़ूंगा। क्योंकि मैं अभी मरा नहीं हूं। यही तो मेरे जीवन का सर्वाधिक पीड़ादायक पहलू है, कि लाख चाह कर भी मैं तत्काल मर नहीं सकता। मेरे और ट्रिक्सीे के बीच यह एक अमिट दीवार खिंच चुकी है। अभिशाप की तरह। कम से कम तब तक, जब तक मैं खुद मर कर उसके पास नहीं जाता।

लेकिन पहले ऐसा नहीं था। तब हम दोनों दो बदन में विचरते एक प्राण की तरह हुआ करते थे।

सिर्फ पांच दिन की ही थी ट्रिक्सी, जब मेरे घर आयी थी। ट्रिक्सी यानी पामेरियन फीमेल बच्ची। साशा-बकुल की ख्वाहिश थी, इसलिए राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कालेज के प्रोफेसर एसडी सिंह उसे लेकर अपनी घर से लाये थे। तब मैं अपनी टांग तुड़वाकर भूलुण्ठित लेटा था। शायद 12 मई-2000 की घटना है यह। एसी तब था ही नहीं। इसलिए गर्मी से राहत के लिए मैं जमीन पर ही लेटा था, कि अचानक डा सिंह एक झोला में लेकर सफेद फाहे जैसी इस बॉल को लेकर आये। उन्होंने बताया कि उसका जन्म 5 मई को हुआ है। उसके आगमन से मेरा पूरा परिवार हर्ष में डूबा था, जबकि ट्रिक्सी अपनी मां को खोजने के चक्कर में भौंचक्कीे भटक रही थी। साशा-बकुल उसे हाथोंहाथ थामे थे। हम सब उसके लिए अजनबी थे, इसलिए वह बार-बार हम सब के चंगुल से छूट कर अपनी मां को खोजने में इधर-उधर छिप जाती थी। इसी बीच एक दिन वह मासूम मनी-प्लांट के झंखाड़ में छिप गयी। पूरा घर बेहाल रहा। बहुत देर खोजने के बाद वह दिखी तो मैंने उसे हल्के एक थप्प़ड़ रसीद किया। उसके बाद से ही वह समझ गयी कि उसे इसी घर में हमेशा रहना है। हम सब ने उसका नाम ट्रिक्सी रखा।

इसके बाद से ही ट्रिक्सी ने इस घर को अपना घर मान लिया और फिर वह इस घर की सबसे दुलारी बन गयी। कूं कूं से जल्दी ही उसकी आवाज भौं भौं तक पहुंच गयी। और इसी के ही साथ उसकी घर के प्रति जिम्मेूदारी भी बढ़ गयी। सबसे पहला जिम्मा तो उसने कॉलबेल का सम्भाला। घर के बाहरी गेट से किसी के खटकने से पहले ही ट्रिक्सी कूद कर दरवाजे पर निरन्तबर निनाद छेड़ देती थी। उसका यह तरंगित स्वार तब ही थम पाता था, जब घर का कोई न कोई सदस्य दरवाजे पर पहुंच न जाए।

लेकिन उसका रौद्र रूप तब प्रकट होता था, जब कोई चोर-सियार टाइप शख्स या जीव हमारे घर के आसपास फटकता था। खास कर दूधवाला। यह जानते हुए भी कि अगर यह दूधवाला न आये तो ट्रिक्सी को सबसे ज्यादा दिक्कत होगी, लेकिन ट्रिक्सी दूधवाले को सूंघते ही पागल हो जाती थी। भौंक-भौंक कर उस पर फेचकुर फेंकने के दौरे पड़ते थे। उसे सम्भा्ल पाना मुश्किल होता था। शायद उसे साफ पता चल चुका था कि दूधवाला दूध में पानी मिलाता है। लेकिन शरीफ व साफ दिलशख्स को ट्रिक्सी सिर्फ पासवर्ड चेक करने की अंदाज में उसे सूंघ कर ही छोड़ देती थी। गजब थी ट्रिक्सी, कि पोस्टमैन जैसे किसी भी शख्स पर उसने कभी भी अपनी नाराजगी व्यक्त नहीं की। बच्चों के प्रति उसमें दैवीय स्नेख रहता था। मेरी पोती या कोई भी मित्र के बच्चे जब भी आये, उनके सामने वह हमेशा शांत और संयत ही रहती थी। तब भी, जब वे बच्चे उसके मूंछ उखाड़ते या उसे छेड़ते थे। ट्रिक्सी हमेशा खामोश रहती। बहुत ज्यादा हो जाता तो वह ऐसे शरारती बच्चों से दूर हट जाती। लेकिन जवाब में काटना या पंजा मारने के बारे में तो उसने कभी भी नहीं सोचा।

घर से अगर कोई सदस्य बाहर जा रहा है तो ट्रिक्सी उदास हो जाती थी, लेकिन उसके घर वापसी के वक्त वह इतना खुश हो जाती थी, मानो उसे कोई बड़ी लॉटरी मिल गयी। रात को मेरे घर वापस के वक्त‍ वह शाम से ही प्रतीक्षा शुरू कर देती थी। मैं आया ही नहीं, कि वह मेरे आसपास गोल-गोल चक्कर लगाती थी। कूं कूं कूं कूं। कुर्सी पर बैठने के बाद वह उचक कर मेरी गोद में दोनों पैर घुसेड़ कर मुझसे बतियाती थी। बहुत देर तक। वह मुझे बताती थी कि उसका दिन कैसा बीता, कौन-कौन घर आया, किसने घंटी बजायी, किसको काटने-नोंचने की कोशिश की, बकुल-साशा-इंदिरा ने किस-किस बात पर उसे डांटा, कितनी बार उसे दुलराया, कौन-कौन चिडि़या मेरे मुंडेर पर बैठी जिसे भौंक कर भगाया, कौन बंदर को उसने काटने की कोशिश की, वगैरह-वगैरह। एक-एक बात वह मुझसे करती थी, लेकिन चूंकि मैं उसकी बात समझ नहीं पाता था, इसलिए केवल हां हां, अच्छा, ओके, पक्का जैसे दिलासा देता रहता था।

हालांकि बाद में साशा की डिमाण्ड पर एक जर्मन स्पिट भी आयी। नाम रखा गया बोल्डी। ट्रिक्सी ने उस पर शासन करना शुरू कर दिया और बोल्डी ने आधीनता स्वीकार कर लिया। अब दोनों मिल कर हंगामा करते थे। उछलकूद। घर हरा भरा हो गया। अब दोनों मिल कर चूहों का शिकार करती थीं। किसी शातिर शिकारी की मानिन्द। लेकिन इन दोनों ने अब किसी तीसरे को भगाने की हर चंद कोशिश की। मैं बनारस में एक मासूम-अनाथ बिल्ली ले आया था। नाम रखा था संगीत। वह भी बहुत प्यारी बच्ची थी। लेकिन एक दिन ट्रिक्सी और बोल्डी ने मिल कर उसका अंतिम संस्कार करा दिया। कोई पांच साल पहले बोल्डी को खून के दस्तर हुए और उसी में उसकी मृत्यु हो गयी। अब ट्रिक्सीई अकेली हो गयी। लेकिन उसने अपना प्रेम बाकी के सदस्यों पर लुटाना शुरू कर दिया। समझदारी का आलम यह रहा कि उसे पता था कि कौन शख्स को घर के भीतर क्याल सम्मान दिया जाना चाहिए। भड़ास4मीडिया के यशवंत जब भी घर आये, ट्रिक्सी ने हमेशा स्वा‍गत किया।

ट्रिक्सी ने घर के हर संकट में मुझे मजबूत बनाये रखा। वह भी तब जब कि घरेलू संकट के चलते उसे एक साल बड़े भाई-भाभी के यहां रहना पड़ा। बाद में जब मैंने गोमती नदी के किनारे जंगल में रहने का फैसला किया, तब ट्रिक्सी को छोड़ना मेरी मजबूरी थी। लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन हुआ रहा हो, जब मुझे ट्रिक्सी की याद नहीं आयी। ट्रिक्सी की याद आते ही मेरी आंखें नम हो जाती थीं।

और आज तो बज्रपात ही हो गया।

जिसे मैं अपनी बेटी से ज्यादा प्यार करता था, वह इस दुनिया को छोड़ कर चली गयी। हमेशा-हमेशा के लिए।

अरे बेटा, यह तो तनिक सोचतीं तुम, कि मरघट तुम्हारी नहीं, मेरी प्रतीक्षा में है।

तुम मुझसे पहले कैसे मर गयीं ट्रिक्सी?

लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415302520 या kumarsauvir@gmail.com पर कर सकते हैं.

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यूपी में जंगलराज : सूचना दिलाने के बजाय आयुक्त बिष्ट ने वादी को बेइज्जत कर नज़रबंद कराया

: राज्य सूचना आयोग के अफसरों की मनमर्जी बेलगाम, कार्यकर्ताओं में क्षोभ : लखनऊ : सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी छवि चमकाने और पार्टी की जड़ों को जमाने की लाख कोशिश कर लें, उनके अनेक बड़े सूबेदार सारा मटियामेट करने में जुटे हैं। ताजा मामला है राज्य के चर्चित सूचना आयुक्त अरविन्द सिंह विष्ट का, जिन्होंने आज दोपहर एक सूचना कार्यकर्ता के साथ भरे दफ्तर गालियां दीं और अपने सुरक्षाकर्मियों को बुला कर उन्हें एक कमरे में बंद करा दिया। ताज़ा खबर मिलने तक तनवीर बिष्ट के कमरे में गैरकानूनी ढंग से नज़रबंद हैं और उन्हें किसी से भी मिलने से पाबंदी लगा दी गई है।

आपको बता दें कि बिष्ट पत्रकार होते हुए सूचना आयोग में आये हैं। मुलायम सिंह यादव के सगे समधी होने के चलते बिष्ट को सूचना आयुक्त की कुर्सी मिली, लेकिन इसके बाद से बिष्ट का लहजा अभद्र होता जाता रहा। चूंकि बिष्ट आयुक्त पद पर हैं और लगातार यही प्रचार कर रहे हैं की सपा सरकार में वे जो भी चाहें, कर सकते हैं। इसलिए अफसरशाही में उनकी पकड़ होती जा रही है। यही से पकड़, दबाव और धंधे की दूकान चल रही है बिष्ट की।

इतना भी रहता तो भी ठीक था, लेकिन अब बिष्ट का दर्प-घमंड अब उनके सर पर चढ़ कर बोल रहा है। अपने कार्यालय में सूचना कार्यकर्ता-आवेदकों से बिष्ट आयेदिन अभद्रता और उन्हें बेइज्जत करने पर आमादा रहते हैं। अनेक कार्यकर्ताओ का आरोप है कि अफसरों से सूचना दिलाने के बजाय बिष्ट अफसरों को कृपा बरसाते हैं और अफसरों के सामने ही कार्यकर्ताओं-आवेदकों सरेआम गरियाते और सुरक्षाकर्मियों की धौंस पर आवेदकों को नजरबन्द तक कर देते हैं। कई बार तो सूचना आयोग में आवेदकों की पिटाई तक करायी जा चुकी है।

आज बिष्ट का कहर तनवीर सिद्दीकी पर टूटा। बेहद गंभीर और शालीन प्रवृत्ति वाले तनवीर ने दो दिन पहले ही हजरतगंज वाले गांधी प्रतिमा पर सैकड़ों सूचना कार्यकर्ताओं के साथ प्रदर्शन और धरना दिया था। इस आंदोलन का मकसद सूचना आयुक्तों की मनमर्जी और निर्णयों में हो रही उनकी धांधली का विरोध करना ही था। लेकिन बिष्ट इस पर भड़क गए। आज जैसे ही तनवीर को बिष्ट ने देखा, तनवीर को गालियां देना शुरू कर दिया। तनवीर ने जब उनकी अभद्रता का विरोध करना चाहा तो बिष्ट ने अपने सुरक्षाकर्मियों को बुला कर उन्हें एक कमरे में बंद करा दिया।

लखनऊ से बेबाक पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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आईजी साहब, आपको बधाई… आपने आगरा के पत्रकारों को लंगड़ाकर चलना सिखा दिया…

Kumar Sauvir : जय हिन्द आईजी साहब! कैसे हो मेरे माई-बाप हजूर सरकार? पहले तो आपको बधाई कि आपने आगरा के पत्रकारों को लंगड़ाकर चलना सिखा दिया। पत्रकारों के बदन पर वो लाठियां भांजी है आपने, कि पूछिए मत। देखने वाले दंग थे कि…. छोड़िये यह सब।

अब अरज यह है कि दो-चार दिन विश्राम करने के बाद आप बाकी यूपी के निरीक्षण पर भी निकलियेगा जरूर। अपनी लाठियों पर तेल पिला दीजियेगा। कहीं ऐसा न हो जाए कि आपकी लाठी नाचे और आपको मज़ा भी न आये। मज़ा तो तब ही है कि पत्रकार आपकी लाठी के हर प्रहार पर आर्तनाद करें और कई महीनों तक अस्पताल पर लेटे ही रहें।

सरकार! मैं आपका प्रशंसक हूँ हुजूर। कहाँ आप आईजी साहब जैसा आला हाकिम और कहाँ निरीह-भुक्खड़ पत्रकारों। बहुत लिखते हैं यह ससुरे पत्रकार। बाल की खाल निकालते हैं। हर बात अकारण और नकारात्मक।

और कहाँ आप हुजूर। कितनी मेहनत करनी पड़ती है आपको, मुझे पता है। हर थाने से नियमित हफ्ता-हिस्सा बटोरना क्या कम मेहनत का काम होता है? सिपाही से लेकर सीओ तक की अनुशासनिक जांच में जो पैकेट हर पेशी पर आपकी ड्योढ़ी पर बतौर नज़राना मिलते है, उसे गिनना किसी पहाड़ से कम नहीं होता है। मुझे पता है माई बाप।

रात को दारु पीकर जो गभीर कृत्यों को आप सम्पन्न करते है वो आपकी कार्य कुशलता का प्रतीक होता है। आप देखिये न कि अरविन्द जैन जब आईजी थे तो उन्होंने मायावती सरकार की आन-बान-शान के अपने पुनीत दायित्व को पूरा करने के लिए यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा का घर ही फुंकवा दिया था। हुआ कुछ? ऐसे एक नहीं, अनेक आईजी भरे पड़े हैं यूपी में। यूपी है ही टेंशनाइजेशनल। उप्पर से ऐसे टुटपुंजिया पत्रकारों का वक्त बेवक्त बवाल करना वाकई बेहूदा ही होता है। हे ईश्वर। मैं तो कहता हूँ माई-बाप, कि आपके तो इन नमुरादों की खोपड़ी ही तोड़नी चाहिए।

न न। पत्रकार नेताओं की चिंता मत कीजिये। वह मामला तो हमारे बड़े पत्रकार नेता खुद ही सुलझा लेंगे। उन्हें ऐसे सम्भालने निपटाने का ख़ासा तजुर्बा है। सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सुरक्षित रहेगी। हाँ, खर्चा जरूर ज्यादा हो जाएगा। लेकिन आपके पास पैसों-रुपयों की तो कोई दिक्कत होती नहीं है। कौन आपके टेंट से जानी है रकम। दारोगा-एसपी ही अदायगी करेंगे। बदस्तूर। सो डोंट वरी सरकार।

मैं तो कहता हूँ हज़ूर, कि इन पत्रकारों की पिटाई का मासिक कार्यक्रम शुरू कर दीजिये सरकार। किसी सरकारी जलसे-समारोह की तरह। हर जलसे में दस-बीस पत्रकार भी अगर बिस्तर-नशीन हो गए तो सरकार का एक नया कल्याणकारी कार्यक्रम भी शुरू हो जाएगा। नया विभाग शुरू खुल सकता है। नाम हो सकता है कि:- विकलांग पत्रकार कल्याण एवं पुनर्वास विभाग।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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चंदौली का हेमंत हत्याकाण्ड : पत्रकारिता बनाम गजब छीछालेदर

: टीवी-24 ने हेमंत को अपना यूपी प्रमुख का ऐलान किया : अनाम से सदुलपुर टाइम्सं का भी यूपी रिपोर्टर था हेमंत : परिवारीजनों को दी गयी पांच लाख रूपयों की आर्थिक मदद :  चंदौली : यह मत समझिये कि चंदौली जैसे जिलों के छोटे-मोटे पत्रकार ही गड़बड़ी करते हैं। यूपी से लेकर दिल्‍ली तक के आला पत्रकार भी ऐसी-ऐसी करतूतें-दलाली करते मिल जाएंगे कि आप दांतों के तले उंगलियां दबा लें। नजीर है चंदौली के हेमंत यादव का मामला, जो लेखपाल और सिपाही से उगाही के लिए तहसीलदार, सीओ, चौकी प्रभारी और थानाध्‍यक्ष के दावा ही मंडराता रहता था। लेकिन जैसे ही हेमंत की हत्‍या हुई, दिल्‍ली के एक न्‍यूज चैनल ने उसे अपना यूपी प्रभारी होने का दावा कर लिया। टीवी-24 नाम के इस चैनल ने हेमंत की हत्‍या के बाद जो प्रमाणपत्र जारी किया है, उसमें हेमंत को पूरे प्रदेश में संवाददाताओं की नियुक्ति का अधिकार देने के साथ ही साथ उसे विज्ञापन का भी पूरा जिम्‍मा भी थमा दिया है।

हैरत की बात है कि यह प्रमाणपत्र 14 जनवरी-09 से लेकर 31 दिसम्‍बर-15 तक वैध होने का दावा किया गया है। दिलचस्‍प बात तो यह है कि चैनल टीवी-24 ने जिस पत्रकार हेमंत यादव को अपना यूपी ब्‍यूरो प्रमुख प्रमाणित किया है, हेमंत उस चैनल के लिए चंदौली के लिए काम तो करता था, लेकिन लिखा-पढी में उसे खुद को सदुलपुर टाइम्‍स का यूपी रिपोर्टर बताता था। उधर उप्र मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार समिति के अध्‍यक्ष प्रांशु मिश्र ने बताया है कि प्रदेश सरकार ने चंदौली में मारे गये पत्रकार हेमंत यादव के परिजनों को पांच लाख तीस हजार रूपयों की आर्थिक सहायता मंजूर कर दी है। चंदौली जिला प्रशासन ने बीती शाम इस बारे में आर्थिक सहायता का चेक हेमंत के परिजनों को सौंप दिया। चंदौली के उपजा अध्‍यक्ष दीपक सिंह ने भी फोन पर भी इस आर्थिक सहायता की पुष्टि की है।

हम आपको बता दें कि पिछले 3 अक्‍टूबर की रात आठ बजे चंदौली के पत्रकार हेमन्‍त यादव की तब गोली मार कर हत्‍या कर दी गयी थी जब वे अपनी बाइक से धीमा थाना क्षेत्र के जमुरखा गांव के बाहर एक पुलिया से गुजर रहे थे। हत्‍यारों ने उनका पीछा किया और चलते-चलते उनकी दाहिनी कांख और ढुड्ढी पर फायर कर दिया। हेमंत की मौके पर ही मौत हो गयी। हत्‍या की खबर मिलते ही टीवी-24 ने उसे अपना यूपी ब्‍यूरो चीफ होने का दावा कर लिया। जानकार बताते हैं कि इस चैनल के अधिकृत हस्‍ताक्षरी इकबाल सिंह अहलूवालिया द्वारा जारी इस प्रमाणपत्र की शैली ही खबरों की दुनिया की भाषा के अनुसार निहायत मूर्खता और दलाली से सनी हुई लग रही है। एक सूत्र का दावा है कि इस चैनल ने हेमंत की मौत को बेचने के लिए ही यह प्रमाण पत्र जारी किया है। मैंने इस प्रमाणपत्र पर दर्ज फोन नम्‍बर पर सम्‍पर्क करने की कोशिश की लेकिन फोन नहीं उठाया गया।

यह तो वह कारस्‍तानी है जो हेमंत की मौत के बाद दर्ज हुई, लेकिन हेमंत यादव ने अपने जीते-जी लिखत-पढत में टीवी-24 का नाम नहीं किया। कागजों में वह खुद सदुलपुर टाइम्‍स का यूपी का रिपोर्टर ही बताता था।  अब यह सदुलपुर टाइम्‍स एक मिस्‍ट्री बन गया है। लेकिन जरा आप ही बताइये कि सदुलपुर टाइम्‍स का नाम आपने सुना है कभी? कहां से छपता है, दैनिक, साप्‍ताहिक है, मासिक है, हिन्‍दी में है या उर्दू अथवा अंग्रेजी में, कहां से प्रकाशित होता है, कहां छपता है, कहां बिकता है, किसी को कुछ नहीं पता। यूपी तो छोडि़ये चंदौली के पत्रकारों ने भी कभी नहीं सुना। इसी अनाम-बे-छपे अखबार का खुद को, कागजातों में, पूरे यूपी का रिपोर्टर बताता था हेमंत यादव। जब पिछले साल उसे ग्राम प्रधान द्वारा किया गये तथाकथित ग्राम समाज की जमीन के आबंटन के विवाद में जेल भेजा गया तो उसने हिन्‍दुस्‍तान, अमर उजाला के सम्‍पादक, चंदौली प्रभारी और रिपोर्टर के साथ ही साथ धीना थाना के तत्‍कालीन पुलिस थानाध्‍यक्ष का मानहानि का मुकदमा की धमकी देते हुए 25-25 लाख रूपयों के मुआवजा की नोटिस भेजने की तैयारी कर दी।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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चंदौली-कांड: पुलिस, प्रधान, दलाल व पत्रकार की करतूत है हेमन्त की हत्‍या

: चंदौली में जितने दारोगा, उससे छह गुना पत्रकार : हत्‍या का मामला खोलने के बजाय सिर्फ मटरगश्ती कर रही है पुलिस, सिर्फ वादा : बात-बात पर वसूली करते हैं चंदौली के पराडकर-वंशज : चंदौली : 12 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस अब तक हेमंत यादव के हत्यारों को नहीं खोज पायी है। हां, पिछले छह दिनों से पुलिस ने इस मामले में तीन लोगों को हवालात में बंद रखा है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल पाया। हैरत की बात है कि इस हत्या  को लेकर चंदौली के एक बड़े पत्रकार संगठन उपजा में जबर्दस्त उठापटक शुरू हो चुकी है। यहां के एक बड़े पदाधिकारी विनय वर्मा ने उपजा से इस्तीफा दे दिया है। हत्या और उसकी साजिश की तपिश इस संगठन के मौजूदा अध्यक्ष दीपक सिंह का चेहरा झुलसा रही है।

आपको बता दें कि पिछले 3 अक्टूअबर की रात आठ बजे चंदौली के पत्रकार हेमन्त यादव की तब गोली मार कर हत्या  कर दी गयी जब वे अपनी बाइक से धीमा थाना क्षेत्र के जमुरखा गांव के बाहर एक पुलिया से गुजर रहे थे। हत्यारों ने उनका पीछा किया और चलते-चलते उनकी दाहिनी कांख और ढुड्ढी पर फायर कर दिया। हेमंत की मौके पर ही मौत हो गयी। कहने की जरूरत नहीं कि चलती बाइक में जिस तरह से यह फायर किये गये, वह उसमें शातिर शूटर का ही कमाल प्रतीत होता है।

हेमंत की उम्र 40 बरस, गठीला बदन, तेज-तर्रार, सौम्या, शालीन, भाषा पर पकड़, खबर सूंघने की क्षमता, दो मासूम बच्चे, पत्नीे, मां-पिता और थोड़ी खेती-बगिया। बस इतनी ही सम्पत्ति थी हेमंत यादव के पास। चंदौली के धानापुर का रहने वाला था हेमंत, लेकिन लम्बे समय तक वाराणसी में उसने काम किया। वह क्या काम था, किसी को कुछ भी नहीं पता। लेकिन करीब सात साल पहले वह चंदौली में सक्रिय हुआ। तब तक चंदौली की पत्रकारिता में कई पत्रकारों की दूकानों चकाचक चौंधियाती रहती थीं। हेमंत ने अपनी धुंआधार आमद ने अपनी बड़ी दूकानें फैलाये लोगों की थाली से रोटियां छीनना शुरू कर दिया। जहां यहां के मठाधीश केवल फोन पर अपना काम निपटा लेते थे, हेमंत ने गांव-गांव, बाजार, टोल-टैक्सी बैरियर, दफतर, चौकी, थाना, डीएम, कप्ताान तक को छान मारा। उसके साथ कलम भी थी और कैमरा भी। कोटेदार की दूकान की फोटो खींची, ग्राहकों से बयान लिया और मालिक को हड़का दिया। शाम तक दो-चार हजार रूपया की दिहाड़ी हो ही जाती थी हेमंत थी। चूंकि दिग्गज पत्रकारों की दिहाड़ी दस-पंद्रह के आसपास थी, अफसरों में धमक भी थी, लेकिन इसके बावजूद मठाधीशों को हेमंत की आमद सख्त नागवार लगी। जाहिर है कि कुछ ही दिनों में दिग्गज पत्रकारों का आसन डोलने लगा। 

इसी बीच पंचायत चुनाव की गुडडुगी बजने लगी। धीमा थाना के एवती गांव के प्रधान ने ग्राम सभा की जमीन का एक बड़ा हिस्सा। बांटने की तैयारी शुरू कर दी। यह लोहिया गांव है। एक दिन सरकारी अमला एवती गांव पहुंच गया। हेमंत को खबर लगी कि इसमें भारी घोटाला होने वाला है। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें 60 बीघा जमीन थी तो कुछ उसे कम बताते हैं। बहरहाल, हेमंत अपने एक साथी देवानंद उपाध्याय के साथ कैमरों से लैस होकर मौके पर पहुंच गया। यानी शेर की मांद में भेडिय़े घुसने लगे। प्रधान के रिश्ते दिग्गज पत्रकारों से थे, तो उसने धौंस जमानी शुरू कर दी। बात भड़की। उस दिन थानाध्य क्ष महेंद्र यादव अवकाश पर थे और प्रभारी थे बिसनू राम गौतम। प्रधान और एक बड़े पत्रकार के मुंहलगे। पुलिस ने हेमंत और देवानंद को दबोचा और थाने पर ले गये। खबर पाकर हेमंत के साथी दीपक कुमार और संजय उपाध्याय थाने पर गये तो पुलिस ने उन्हेंप भी दबोच लिया और सरकारी कामधाम में हस्तक्षेप तथा धोखाधड़ी आदि अनेक धाराओं में उन चारों को जेल भेज दिया। करीब 20 दिनों तक पत्रकारों की यह टोली जेल में रही।

लेकिन हैरत की बात है कि उपजा के अध्यक्ष दीपक सिंह ने अपने अखबार दैनिक हिन्दुस्तान में यह खबर लिखी कि उगाही और वसूली के लिए यह घटना फर्जी पत्रकारों के नाम पर कलंक बने लोगों ने किया है। यह भी खबर उछली कि दीपक सिंह ने प्रभारी थानाध्‍यक्ष सरोज को फोन करके कहा था कि यह साले सब फर्जी हैं, इनकी —– में डण्‍डा डाल दो, तो सब सुधर जाएगा। सरोज समेत जिले के अधिकांश दारोगों पर दीपक का खासा दबाव बताया जाता है। हालांकि दीपक इस बात से इनकार करते हैं। हिन्‍दुस्‍तान में यह छपते ही हंगामा खड़ा हो गया। उपजा के पूर्व अध्यक्ष विनय वर्मा ने इसके विरोध में उपजा की प्राथमिक सदस्य‍ता से ही इस्तीफा दे डाला और दीपक और उनकी टोली के लोगों पर बेहिसाब आरोप उछाल डाले। उधर दीपक ने भी विनय पर हमला बोलना शुरू कर दिया। दीपक का आरोप है कि सारी कारस्‍तानी विनय वर्मा की है वह भी बहुत विद्वान और चालू-टाइप आदमी हैं। जबकि विनय इस जिले की पत्रकारिता में होने वाले सारे बवालों की असल जड़ करार देते हैं। फिलहाल चंदौली की पत्रकारिता के हवन-कुण्ड में आजकल हाहाकारी लपटें भड़क रही हैं।

लेकिन हैरत की बात है कि इतना बवाल होने के बावजूद पुलिस अब तक इस मामले को सुलझाने के लिए सिरा तक नहीं पकड़ पायी है। घोटालों-रैकेटों को कोसों दूर बैठ कर फौरन सूंघ लेने वाले यहां के महान पत्रकारों को यह तक पता नहीं चल पाया है कि यह पूरा मामला क्‍यों हुआ। हालांकि हकीकत यह है कि इस बारे में जानते सब जानते हैं, मगर बोलते नहीं हैं। जाहिर है कि मगरमच्छों से पटे तालाब में बैठै दलाल पत्रकार किस-किस से झगड़ा पाले।

आपको बता दें कि चंदौली में 500 से ज्यादा पत्रकार हैं। अकेले उपजा में ही सवा दो सौ से ज्यादा सदस्य  हैं। इसके अलावा ग्रामीण पत्रकार एसोसियेशन, आल इंडिया मीडिया जर्नलिस्ट एसोसियेशन और भारतीय पत्रकार संघ की जड़ें भी यहां खूब गहरी हैं। न जाने आईएफडब्यूजे के लोग यहां क्या करते हैं। उपजा के ताजा अध्यक्ष दीपक सिंह को यह तो पता है कि इस जिले में 4 तहसील और इतने ही एसडीएम हैं, लेकिन उन्हें  यह कोई सूचना नहीं है कि इस जिले की जनसंख्या कितनी है और इस जिले का क्षेत्रफल कितना है। वे गर्व के साथ बताते हैं कि बडी संख्या में पत्रकारों के चलते थाना ही नहीं, चौकी स्तर तक पत्रकारिता की पहुंच हो गयी है। लेकिन आप दस-बीस साल तक के किसी भी अखबार का कोई भी अंक पलट लीजिए, आपको कोई भी एक खबर ऐसी नहीं मिलेगी, जिसमें दलाली से इतर कोई तथ्य हो। दीपक की गतिविधियों के खिलाफ उपजा छोड़ने वाले पूर्व अध्यक्ष विनय वर्मा मानते हैं कि यह हालत दर्दनाक है। उनका कहना है कि इस बारे में जल्दी् ही एक बड़ा अभियान छेड़ने जा रहे हैं।

हे ईश्‍वर। चंदौली में इतनी भारी संख्‍या में पत्रकार हैं। लेकिन वे क्‍या करते होंगे, हैरत की बात है। जरा सोचिये कि अगर कोई एसडीएम से रोजाना कम से कम सवा सौ पत्रकार मिले, तो वह क्‍या काम कर सकता है, यह यक्ष-प्रश्‍न है।

लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार कुमार सौवीर ने यह ग्राउंड रिपोर्ट चंदौली जाकर पड़ताल करने के बाद लिखी है.

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देखिये, कितनी बेशर्मी के साथ यह प्रेसनोट हिंदुस्तान अखबार में छापा गया है

Kumar Sauvir : पिछले दस बरसों से एडवरटोरियल पर खूब हंगामा चल रहा है। कई प्रतिष्ठित अखबारों ने इस से अपना पल्‍ला छुड़ाने की कोशिश भी की है। कम से कम हिन्‍दुस्‍तान दैनिक ने तो घूस को घूंसा नाम से एक आन्‍दोलन तक छेड़़ रखा था। लेकिन अब तो एडवरटोरियल से भी बात कोसों दूर आगे खिसक आ चुकी है। हैरत की बात है कि यह शुरुआत हिन्‍दुस्‍तान ने ही छेड़ दिया है। जरा देखिये इस खबर को, और फिर बताइयेगा कि आखिर हमारे समाचारपत्र किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। देखिये, कितनी बेशर्मी के साथ यह प्रेसनोट छापा गया है।

मियां-बीवी से जुडे इस पीस में मोबाइल नम्‍बर तक छाप दिया गया है, कि मरीज सम्‍पर्क करें। अब ऐसा तो कोई भी यकीन नहीं करेगा कि सम्‍पादकीय में से किसी की नजर ही नहीं पड़ी होगी। हैरत की बात तो यह है कि पहले अखबारों में ऐसे मामलों का खुलासा होने पर भूल-सुधार की व्‍यवस्‍था हुआ करती थी। लेकिन अब तो हम्‍माम खुलाआम फर्रूखाबाद बन चुका है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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आईएफडब्‍ल्‍यूजे के नेताओं ने किया रायपुर में नंगा नाच, हेमन्‍त और कलहंस की करतूत से पत्रकार समुदाय शर्मसार

: जैनी धर्मशाला में पर्यूषण के दौरान हड्डियां और बोतलों के साथ हंगामा : यह आपके अध्‍यक्ष महोदय हैं। उप्र मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार समिति के। ये समिति के ठेकेदार हैं और पुलिस में उनकी दलाली बेहिसाब है। इसलिए जितना भी कुकर्म कर सकते हैं, कर लेते हैं। नाम है हेमन्‍त तिवारी। फिलहाल तो उनके चेहरे पर कुकर्म एक नया काला धब्‍बा जुड़ गया है। ताजी सूचना ये है कि छत्‍तीसगढ़ के रायपुर में जैन समुदाय की निरंजनी धर्मशाला ने हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस आदि अराजक पत्रकारों की करतूत पर खफा होकर 50 हजार रुपयों का जुर्माना लगाने की धमकी दी लेकिन बीच-बचाव कर मामला निपटा दिया गया। इन पत्रकारों पर आरोप है कि उन्‍होंने जैन समुदाय के पर्युषण अवसर पर जैन समुदाय की निरंजनी धर्मशाला के चार कक्षों में जमकर मदिरा और मांसाहार किया।

हालांकि हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस ने छत्‍तीसगढ के दौरे पर गये आईएफडब्लूजे यानी श्रमजीवी पत्रकार संगठन के प्रतिनिधि मंडल से क्षमा-याचना की है। लेकिन खबर है कि इस प्रतिनिधिमंडल ने इस माफी की याचना को मंजूर करने से साफ मना कर दिया है। सूत्र बताते हैं कि इस यात्रा से लौटने के बाद आईएफडब्लूजे हेमंत और कलहंस पर कड़ी अनुशासनिक कार्रवाई कर सकता है। हेमन्‍त और सिद्धार्थ की इस हरकत को लेकर लखनऊ के पत्रकारों में भी खासी नाराजगी का माहौल है।

आपको बता दें कि लगातार अपनी गुण्‍डागर्दी और अराजकता हरकतों के चलते यह दोनों जोड़ीदार लगातार चर्चाओं में बने रहते हैं। कभी लखनऊ में शराब में धुत्‍त होकर हेमन्‍त कभी एक थानाध्‍यक्ष  की सरेआम पिटाई कर देता है तो कभी किसी चौराहे पर आम आदमी को पीट देते हैं। चंद अफसरों और पुलिसवालों के चहेते दलाली की दलाली राजनीति के गलियारों में भी खासी चर्चित हो चुकी है।

रायपुर से मिली खबरों के मुताबिक आईएफडब्‍ल्‍यूजे यानी श्रमजीवी पत्रकार संघ के अधिवेशन में यहां आये हेमन्त तिवारी तिवारी और कलहंस आदि अनेक पत्रकारों ने शराब के नशे मे जमकर बवाल किया और महिलाओं के सामने नंगा-नाच किया। इस दौरान कई महिलाएं भी घटनास्‍थल पर मौजूद थीं। ज्ञातव्‍य है कि हेमन्‍‍त तिवारी श्रमजीवी पत्रकार संघ के सचिव हैं। हैरत की बात तो यह है कि इस घटना के वक्‍त आईएफडब्‍ल्‍यूजे के अध्‍यक्ष के विक्रमराव भी मौजूद थे। इतना ही नहीं, इन लोगों ने श्री राव के साथ भी बेहद बेहूदगी की।

आईएफडब्लूजे के रायपुर मे हो रहे अधिवेशन मे हेमन्त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस ने रायपुर के पास परसगाव के विश्राम गृह मे जम कर दारू पी और उत्पात मचाया।  वहाँ रात्रि भोजन के लिये रुके आईएफडब्लूजे अध्यक्ष के विक्रम राव महासचिव परमानन्द पांडे एवं उनकी पत्नी, यूपी यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीक़ी एंव उनकी पत्नी उड़ीसा के उपेन्द्र पादी एवं उनकी पत्नी बिहार के देबाशीष बोस ने जब इसका विरोध किया तो उन सभी के साथ अभद्रता की। नशे मे धुत हेमन्त को जब विश्वदेव राव (के विक्रम राव का पुत्र एव लखनऊ मे कार्यरत पत्रकार) ने समझाने की कोशिश की तो वह उस से गाली गलौज पर उतर आया और धमकी देने लगा की उसको जेल मे बन्द करवा देगा। हेमंत ने गालियां देते हुए कहा कि यूपी में राव की नहीं, हेमंत तिवारी का राज चलता है और यूपी सरकार मेरे इशारे पर चलती है। नशे में धुत्‍त हेमन्त ने कहा की छत्तीसगढ़ के न्यायाधीश और केन्द्रीय मन्त्री राजनाथ सिंह से उसके बहुत निकट सम्बन्ध है। घटना के साक्षी रहे सूत्रों ने बताया कि हेमन्‍त ने देबाशीष बोस के साथ भी बेहद बदतमीजी की, जो अपने कैंसर की बीमारी के बावजूद इस अधिवेशन में शामिल होने आये थे। बता दें कि श्री बोस इस समय चौथे दौर के कैंसर से पीड़ित हैं।

बताते हैं‍ कि इस घटना को लेकर छत्‍तीसगढ के पत्रकारों में खासा रोष है। उन लोगों ने तो यहां तक फैसला कर दिया था कि हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस को पहले जम कर पीट दिया जाए और फिर पुलिस को खबर देकर हेमन्‍त और कलहंस को हवालात की हवा खिला दी जाए। लेकिन कई पत्रकार नेताओं ने इस आग्रह का विरोध किया कि पुलिस मे मामला जाने से संगठन की बहुत बदनामी होगी। इस बात पर यह तय हुआ की बस्तर पहुँच कर हेमन्त पर संगठन की कार्यकारिणी उन पर कार्यवाही करेगी और उसे तत्काल प्रभाव से निलम्बित करेगी। लखनऊ मे भी इस बात से हड़कम्प मच गया है। मुख्यमन्त्री और शिवपाल तक इस बात की ख़बर पहुँच चुकी है।

लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

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हेमंत और कलहंस ने मुझे तबाह-बर्बाद करने का संकल्‍प लिया… प्रभात त्रिपाठी भी मुझसे निपटेंगे…

दो गुटों में बंटे लखनऊ के पत्रकारों का एक चुनाव आज, दूसरा कल

Kumar Sauvir : पत्रकार समिति चुनाव में दलाल और प्रकाशक…. पत्रकार कहां हैं… गजब दौर है पत्रकारिता का, शर्म उन्‍हें बिलकुल नहीं आती… दोस्तों। सभी हमारे मित्र हैं और सभी लोग पत्रकार समिति की कार्यकारिणी पर कब्ज़ा करने की लालसा पाले हैं। गुड। वेरी गुड। इन सभी को जीत चाहिए। होनी भी चाहिए। गुड। वेरी गुड। लेकिन क्या किसी ने यह सोचा कि आपको और हम मित्रों को क्या चाहिये, जो मतदाता हैं। जिनके वोट से इन नेताओं की गिरी पीसने के सपने बुने जा रहे हैं। देखिये। इस सवाल का जवाब खुद में खोजिए कि हमारा नेता कौन होगा। कोई पक्का दलाल, झूठा, चाटुकार, दहशतगर्द, कोई मुनाफाखोर प्रकाशक, धंधेबाज, रैकेटियर, गिरोह की तरह कई कई अखबारों का धंधा करने वाला, विज्ञापन की खुली दलाली करने वाला या या या या फिर कोई, वाकई, पत्रकार। जिसके दिल में पत्रकारीय मूल्यों का जज़्बा हो, जूझने का दम हो, पत्रकार हितों के प्रति निष्ठां हो और सबसे बड़ी बात कि आप आदमी के प्रति समर्पण भी हो।

हमारे सामने हैं कई नेता जी येन-केन-प्रकारेण समिति पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। सबसे बड़ा नाम है हेमंत तिवारी। रोज़ शराब में धुत्त, जुआ खेलना और हर हफ्ते सड़क पर मार खाना उनका शगल है। दलाली की हर सीमा पार कर चुके हैं हेमंत। पुलिस अफसरों के मुंहलगे हेमंत को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक दर्जन बार डांट चुके हैं। तीन साल से समिति पर कब्जाए हैं और इसी चक्कर में समिति का भी दो फाड़ कर दिया। पत्रकारों के लिए केवल हवा, काम कुछ नहीं।पत्रकारिता में उनका क्या योगदान है यह आप खुद पूछ लीजिये। हाँ पत्रकार जगेंद्र सिंह के आत्महत्या मामले में उन्होंने खुली दलाली की। ठीक उसी तरह जैसे गोमतीनगर के एक रेस्टोरेंट के बवाल पर तीन लाख रुपये उगाहे गए थे। यह कर्म है पत्रकार का। आप सरेआम गुंडागर्दी करेंगे और उसका दाग बर्दाश्‍त करेंगी पूरी पत्रकार बिरादरी। नहीं जनाब, अब यह नहीं होगा।

उनके चेले सिद्धार्थ कलहंस उनके पिछलग्गू। पूरा प्रेस क्लब पर जबरिया कब्ज़ा है कलहस का। इन दोनों का पत्रकारिता में क्‍या योगदान है, जरा खुद से पूछिये। जनवाद, वामपंथ और धर्मनिरपेक्षता का झंडा उठाने वाले कलहंस का योगदान सिर्फ है कि वे जितना भी हो सकते हैं, इन नारों को कुचल सकते हैं। वर्ना पूछिए कि मान्यताप्राप्त पत्रकारों को प्रेस क्लब की सदस्यता क्यों नहीं दे रहे हैं कलहंस। क्‍यों प्रेसक्‍लब को बिरयानी और शराब की भट्ठी में तब्‍दील कर दिया गया है। क्‍यों वह पत्रकार कम, ठेकेदार और दलाल ज्‍यादा आते हैं। एक साल पहले सुरेश बहादुर सिंह पर हुआ हमला क्‍यों हुआ था, इसका खुलासा करने का जिम्‍मा किस पर था। खैर, अब बताइये कि आप किस को वोट करेंगे।

अब ताजा खबर यह है कि हेमन्‍त तिवारी और कलहंस ने मुझे तबाह-बर्बाद कर डालने का संकल्‍प ले लिया है। बोलेंगे कि मीडिया सेंटर और प्रेस रूम मे पीटे जाएंगे कुमार सौवीर। न जाने किस को मिलेगी इसकी सुपारी। कुछ भी हो , मेरे लिए यह हर्ष की बात है। जो दलाल हैं, वे दलाली करते रहें और जो पत्रकार हैं वे पत्रकारिता करते हुए सरेआम पिट जाएं, उससे ज्‍यादा गर्व की बात मेरे लिए और क्‍या हो सकती है। और आगे बढिए। अध्यक्ष प्रभात कुमार त्रिपाठी समाजवाद का उदय, समीर त्रिपाठी लखनऊ सत्ता, सतीश प्रधान नार्थ इंडिया स्टेट्समैन, सरोज चंद्रा खरी कसौटी। प्रभात त्रिपाठी ने तो अभी मुझे वाट्सपर धमकी दे डाली कि मैं किसके हाथों में खेल रहा हूं और मुझसे वे निपटेंगे भले ही अगला जन्‍म लेना पड़े।

खैर, अगली लिस्‍ट में उपाध्यक्ष संजय शर्मा 4 pm वीकेंड टाइम्स, जेड ए आज़मी स्पष्ट वकता, अध्यक्ष पद हेतु सरोज चंद्रा खरी कसौटी से। सचिव नीरज श्रीवास्तव नवसत्ता, राजेश शुक्ला संचार प्रकाश, संयुक्त सचिव अजय श्रीवास्तव रोज़ की खबर, अब्दुल वहीद वहीद भारत टाइम्स। सदस्य मोहम्मद क़तील शेख और केके विश्नोई खरी कसौटी। एक समाचार पत्र ही नही कई कई एडिशन छपते है और भारी सर्कुलेशन दिखाकर विज्ञापन का काम करने वाले प्रत्याशी पत्रकारों के संघठनों का नेतृत्व करेंगे या विज्ञापन मांगने मंगताई करेंगे। हैरत की बात यह है की लगभग सारे प्रत्याशी समाचार पत्र के अलावा अनेक व्यवसायों में भी लिप्त है। किसी का पेट्रोल पंप तो किसी का स्कूल, किसी की प्रिंटिंग प्रेस, तो किसी का कोई और व्यवसाय। अब तो बेहतर यह। होगा कि पत्रकार मतदाता ही तय करें कि ये उचित है कि धनबली लोगों को पत्रकारों के संवेदनशील संग़ठन का नेतृत्व दिया जाये? करीब करीब सभी प्रत्याशी सरकारी बंगलो पर भी कब्ज़ा जमाये है। लेखन की तमीज ज्यादार लोगों में हरगिज़ नहीं है। नैतिकता की बात करने वाले अनैतिक आचरण कर रहे है और चुनाव में नेतृत्व चाहते है पत्रकार के नाम पर।

लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.


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पत्रकारों का गुस्‍सा हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे नेताओं पर है

मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकारों, जाओ मूली उखाड़ो, पेट साफ हो जाएगा… हेमन्‍त-कलहंस को धरचुक्‍क दिया तो नया पांसा पड़ा… तू डाल-डाल, मैं पात-पात कहावत सच… हेमन्‍त-कलहंस धड़ाम… 

Kumar Sauvir : आयुर्वेद में मूली का अप्रतिम व्‍याख्‍यान है। मूली के जितने गुण आयुर्वेद, यूनानी और ऐलोपैथी सभी पैथियों ने पहचाने हैं, वह अनिर्वचनीय है। लेकिन दिक्‍कत यह है कि लखनऊ और आसपास के जिलों में खेतों की जगह अब मकान उग चुके हैं। अगर ऐसा न होता दोस्‍तों, तो मैं आज मैं अपने सभी मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार भाइयों को ऐलानिया सुझाव देता कि:- दोस्‍तों। जाओ, जहां भी दिखे, मूली उखाड़ लो। पत्रकार नेताओं ने अपनी काली-करतूतों के चलते जो बदहजमी का माहौल किया है, उसे सिर्फ मूली ही निदान है।

यह सलाह उप्र के राज्‍य स्‍तरीय मान्‍यताप्राप्‍त समिति के सदस्‍यों के लिए बिलकुल मुफीद है। समिति को बिलकुल मजाक-माखौल बनाने पर आमादा समिति के कलमुंहे पत्रकार नेता। सिर्फ दलाली और नेताओं की चाटुकारिता पर आमादा इन पत्रकार नेताओं ने अब नया पैंतरा फेंका है, वह यह कि चुनाव अब 29 अगस्‍त को होगा। आपको बता दें कि पत्रकारों का गुस्‍सा हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे नेताओं पर है, जो पिछले तीन साल से अवैध तरीके से समिति पर कब्‍जा किये हुए हैं। पत्रकारों ने नये चुनाव की गुजारिश की तो उसे हेमंत-कलहंस ने ठुकरा दिया, नतीजा पत्रकारों ने आम बैठक आहूत करके छह सितम्‍बर को चुनाव का ऐलान किया। यह फैसला हेमंत-कलहंस को हडबड़ा गया, तो उन्‍होंने चुनाव करने की तारीख पांच सितम्‍बर कर दिया।

हेमंत-कलहंस की इस करतूत पर जवाब देते हुए कल पत्रकारों ने तय किया कि यह मतदान की तारीख अब 30 अगस्‍त को होगी। इसके लिए इन लोगों ने अनेक कारण गिनाये, मसलन त्‍योहार वगैरह। लेकिन हकीकत यह थी कि यह लोग चाहते थे कि हेमंत-कलहंस की करतूत को जवाब दिया जा सके। लेकिन आज दोपहर अचानक हेमंत-कलहंस ने एक नया धामिन-दांव चलाया और खबर फैला दी कि चूंकि रक्षाबंधन समेत अनेक त्‍योहार सिर पर है, इसलिए अब नया चुनाव 29 अगस्‍त को ही होगा।

जाहिर है कि पत्रकारों की परस्‍पर यह लड़ाई अब चरम पर पहुंच गयी है। भले ही यह युद्ध हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे पत्रकारों की दलाली और निकृष्‍टता के विरूद्ध विशुद्ध पत्रकारीय हितों को लेकर चल रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि हेमंत-कलहंस के इस दांव ने पत्रकारीय दायित्‍वों को कमजोर करने की कोशिश तो कर ही दी है। हकीकत यही है कि समिति को कब्‍जाने के खिलाफ पत्रकार नेताओं ने हेमंत-कलहंस की मनमानी के खिलाफ बिगुल बजा दिया था और जो खुद को शेर-ए-हिन्‍द बनते नहीं थकते थे, पत्रकारों ने उन्‍हें उनके ही पिंजरे में बंद कर दिया था, वह प्रयास फिलहाल कमजोर हो चुका है। हालांकि अब फैसला तो भविष्‍य के गर्भ में ही है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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यूपी मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति : तीन बरसों से कुंडली मारे बैठे हैं, विरोध हुआ तो भड़क गये हेमंत और कलहंस

न करेंगे और न किसी को करने देंगे, विधानभवन के प्रेस-रूम में पुरानी समिति की करतूतों पर पत्रकारों का आक्रोश, उप्र अगले महीने संपन्न होंगे उप्र मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव

लखनऊ : राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव पिछले तीन बरस से न होने से खफा पत्रकारों ने आज विधानभवन के प्रेस-रूम में एक बैठक कर अपना जमकर आक्रोश व्‍यक्‍त किया। विधानसभा की कार्यवाही स्‍थगित होने के बाद प्रेस रूम में जुटे भारी तादात में मौजूद इन पत्रकारों ने तय किया कि चूंकि चूंकि मान्‍यता समिति पूरी तरह अवैध, असंवैधानिक और अराजक लोगों के हाथ की कठपुतली बन चुकी है, इसलिए अब जरूरी है कि इस समिति का तत्‍काल चुनाव करा लिया जाए ताकि समिति को सही और जायज लोगों के हाथों तक सौंपा जा सके। बहरहाल, इस बैठक में पांच सदस्‍यीय चुनाव समिति का गठन तय हो गया।

बाद में चुनाव समिति ने ऐलान किया कि उप्र मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति का चुनाव अगले महीने के पहले सप्‍ताह तक संम्पन्न हो जाएंगे। समिति की आम सभा की बैठक में आज विधान भवन स्थिति प्रेस रूम कक्ष में हुई। पत्रकारों से खचाखच इस बैठक में सर्व-सम्मति से पांच सदस्यीय चुनाव समिति का गठन किया गया। इस समिति में शिवशंकर गोस्वामी, विजयशंकर पंकज, किशोर निगम, संजय राजन और मनोज छाबड़ा को सर्वसम्मति से नामित किया गया है।

चुनाव समिति की बैठक में तय किया गया की समिति की कार्यकारिणी का नया चुनाव अगले एक महीने के भीतर ही संम्पन्न करायेगी। हालांकि समिति की बैठक के ठीक बाद चुनाव समिति के विजय शंकर पंकज ने बताया कि यह समिति उप्र मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति क़ी कार्यकारिणीं का चुनाव सितम्बर-15 के पहले हफ्ते के भीतर ही संम्पन्न कर देगी। चयन समिति ने आज देर शाम तक समिति के नए चुनावों को लेकर गहन चर्चा और चुनाव संबंधी अनेक आवश्यक तैयारियों को अंतिम रूप दिया। उधर जैसे ही प्रेस रूम में आयोजित उस बैठक की खबर हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस आदि को मिली, हेमंत-कलहंस ने एक संयुक्‍त बयान जारी करते हुए इस बैठक को निरस्‍त करार दे दिया।

कहने की जरूरत नहीं कि यह हेमंत-कलहंस का यह बयान आज हुई हंगामी बैठक से तिलमिलाते हुए ही जारी किया गया है। आपको बता दें कि समिति का कार्यकाल केवल दो साल का ही  था, लेकिन अवैधानिक और गैरकानूनी तरीके से हेमन्‍त तिवारी और कलहंस ने उस समिति को जबरिया अपने कब्‍जे में रखने का हरचंद कोशिश की है। इस गुट का मानना है कि कैसे भी हो, इस चुनाव को लगातार टालते ही रखा जाए। जबकि इस हेमंत-कलहंस की जोड़ी की करतूतों को लेकर पत्रकार बुरी तरह भड़के और नाराज हैं। उनका कहना है कि हेमंत-कलहंस की यह करतूत आम पत्रकारों के गुस्‍से में घी डाल कर उसे भड़काने वाली है।

बहारहाल, हेमंत-कलहंस ने इस बयान में  कहा है कि समिति का चुनाव कराने की यह कवायद एक फर्जी और भ्रामक सूचना है।  जिसमे उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का एक फर्जी ई-मेल आईडी का भी इस्तेमाल किया गया है। ऐसी कोई बैठक समिति की ओर से बुलाई ही नहीं गयी थी और न ही चुनाव के लिए किसी को अधिकृत किया गया है। केवल मुट्ठी भर लोगों के साथ बैठ कर कोई ऐलान कर देना आम सभा का अपमान है. हैरत की बात है कि तीन साल होने जाने के बावजूद चुनाव न करके हेमंत-कलहंस जोड़ी अब खुद को चुनी गयी समिति चुनाव और नयी कार्यकारिणी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर आम सभा के सभी लोगों और खास कर नए सदस्यों की राय जानना चाहने का पाखंड कर रही है।

केवल दलाली के बल पर आकण्‍ठ में डूबी इस जुगुलबंदी का दावा है कि समिति की कार्यकारिणी के 12 सदस्य इस मामले में अनौपचारिक बैठक कर पत्रकारों के हितों के लिए हो रहे कामों की समीक्षा व प्रगति पर चर्चा कर चुके हैं. समिति के प्रयासों से सभी मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए मेडिकल बीमा, दुर्घटना बीमा, समूह बीमा व पेंशन जैसे महत्वपूर्ण काम प्रदेश शासन  में परिक्षण का स्तर पूरा कर चुके हैं और उम्मीद है कि जल्द ही इसकी स्वीकृत मिल जाएगी. राज्य के मान्यता प्राप्त पत्रकार देश के सात राज्यों की तरह इस तरह की सुविधा पहली बार पा सकेंगे. हैरत की बात है कि बिलकुल दलाली और निरकुंश बन चुकी अवैध समिति की हेमंत-कलहंस की जोड़ी अब उन पत्रकारों पर लांछन डाल रही  है, जो इस अवैध समिति को खारिज कर नये तरीके से एक जिम्‍मेदार समिति का चुनाव कराने की पैरवी कर रहे हैं।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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वाह रे यूपी की अखिलेश सरकार : बागी सूर्य प्रताप सिंह की जगह दागी प्रदीप शुक्ला… यही है समाजवाद!

Kumar Sauvir : हैल्लो हैल्लो..  हेलो माइक टेस्टिंग हेलो… जी अब ठीक है। शुरू करूँ? … ओके. तो सुनिए… नमस्कारररररर… यह रेडियो यूपी है। अब आप उत्तर प्रदेश से जुडी अहम् खबरें सुन रहे हैं। सरकार ने यूपी में अरबों-खरबों के सरकारी घोटालों के मामले में साढ़े 3 साल तक डासना जेल में बंद रहे वरिष्ठ आईएएस अफसर को सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो का डीजी और प्रमुख सचिव की कुर्सी सौंप दी है। जबकि सरकारी घोटालों और भारी षडयंत्रो का भंडाफोड़ करने वाले जुझारू वरिष्ठतम आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह की कुर्सी छीन कर उन्हें बेआबरू करके बेकार ढक्कन की तरह सड़क पर फेंक दिया है। यूपी सरकार और उसका कामकाज पूरी सक्रियता, ईमानदारी और जान प्रतिबद्धता के साथ जी-जान के साथ प्रदेश के सर्वांगीण विकास में जुटी हुई है। समाचार समाप्त हुए। (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.)

Surya Pratap Singh : लो हम सड़क पर आ गए! अखबारों से ज्ञात हुआ कि आज मेरा स्थानांतरण कर ‘प्रतीक्षा’ में रख दिया गया | किसी विभाग से किसी प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को हटाकर ‘प्रतीक्षा’ में तभी डाला जाना चाहिए, जब उस विभाग में कोई ‘घुटाला’ या कदाचार किया गया हो, तथा उस अधिकारी को निष्पक्ष जांच हेतु हटाना जरूरी हो | मैंने तो ऐसा अपनी समझ से कुछ नहीं किया| अब मुख्य सचिव के समकक्ष वरिष्ट आईएएस अधिकारी, अर्थात मैं, बिना कुर्सी-मेज व् अनुमन्य न्यूनतम सुविधाओं का पात्र भी नहीं रहा और सडक पर पैदल कर दिया गया, चलो …..व्यवस्था के अहंकार की जीत हुई | ज्ञात हुआ है कि लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव की ‘अहंकारी व बलशाली’ इच्छा के सामने सारी व्यवस्था ‘नतमस्तक’ है, ‘हुजुरेवाला’ चाहते है कि मुझे तत्काल सड़क पर पैदल किया जाये, निलंबित कर तरह-२ से अपमानित किया जाये, दोषारोपित किया जाए, कलंकित कर ‘सबक’ सिखाया जाये | जन-उत्पीडन और कदाचार के खिलाफ कोई आवाज न उठे | व्यवस्था को लगता है कि जब बाकि नौकरशाह ‘जी हजुरी’ कर सकतें है तो हम जैसे लोग क्यों नहीं, हमारी मजाल क्या है ? मैंने तो नौकरी छोड़ने (VRS) की इच्छा भी व्यक्त का दी, अब बचा क्या है ? ये मेरा कोई दाब नहीं …मैं व्यवस्था से अलग होकर जन-पीड़ा से जुड़ना चाहता हूँ और प्रभावी ढंग से जनता की बात उठाना चाहता हूँ ..इसमें भी क्या कोई बुराई है…मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं…मेरे लिए ‘रोजी-रोटी’ का सवाल नहीं है .. ? अब क्या विकल्प है ?…..या तो मेरे VRS के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाये या अस्वीकार, यदि कोई कार्यवाही लंबित है तो मुझे न बता कर अख़बारों के माध्यम से क्यों सूचित किया जा रहा है, मुझे नोटिस/जांच के बारे में कागजात/नोटिस उपलब्ध कराये जाएँ ताकि मैं उसका जबाब देकर न्याय पा सकूँ या फिर मैं अपने ‘अकारण उत्पीडन’ के खिलाफ माननीय न्यायलय की शरण में जा सकूँ | क्या इस सब का उदेश्य क्या केवल मेरे VRS को सेवा निबृति तक लटकाए रखने का है ?… ताकि मैं व्यवस्था से बाहर जा कर जन-सामान्य की समस्याओं को और प्रभावी ढंग से न उठा सकूँ…मेरी आवाज को दबाये रखा जाये.. ? आज कई परामर्श स्वरुप चेतावनी/धमकी प्राप्त हुईं, लगता है कि क्या अब प्रदेश ही छोड़ना पड़ जायेगा….या फिर छुपे-छुपे फिरना पड़ेगा..अंग्रेजी उपनिवेशवाद की याद आती है…आपातकाल जैसा लगता है… | वाह री ! उत्तर प्रदेश की ‘लोकतांत्रिक’ व्यवस्था, जंहा लोकतंत्र के ‘सारे स्तम्भ’ बाहर से बातें तो बड़ी-२ करतें है परन्तु ऊपर सब मिलकर (निजी स्वर्थार्थ घाल-मेल कर) गरीब, पीड़ित जनता के लिए स्थापित ‘व्यवस्था’ का शोषण करते हैं….. मौज मानते है… | यह व्यवस्था केवल ‘Hands-in-Glove’ नहीं अपितु ‘Greesy Hands-in-Glove’ लगती है, जिसमे Greese अर्थात मलाई का सब कुछ खेल लगता है ….. चाटो मलाई…मक्खन…. बाकि सब ढक्कन …….. चलो …अब ‘जातिवादी’ …….अनिल यादव जैसे अहंकारी मौज मनाये, हंसें हमारी विवशता पर ….. हम तो आ गए सड़क पर …..औकात दिखा दी हमें …हमारी…. बड़े वरिष्ट आईएएस अधिकारी बने फिरते थे हम … ….अब आया न ऊंट …’शक्तिशाली (कु) व्यवस्था’ के पहाड़ के नीचे…कंहा गयी जनता की आवाज….कंहा गयी जनसमस्याए.. अनिल यादव ने सारी व्यवस्था को रोंद डाला …हर आवाज को कुचल डाला …आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे के ‘मिट्टी भराव’ में अब दब जाएँगी विरोध की सभी आवाजें…और उसके ऊपर उड़ेंगे ‘(कु)-व्यवस्था’ के पंख लगे ‘फाइटर प्लेन’ के छदम सपने.. …किसानों के मुआवजे की बात बेमानी हो जाएगी….नक़ल माफिया …भूमाफिया ..खनन माफिया….’जातिवाद’ ….क्षेत्रवाद….परिवारबाद….जीतेगा …..हारेगी जन-सामान्य की आवाज….हारेगी ‘माताओं-बहनों, गरीबों की चीत्कार… जीतेगा वलात्कारी का दुस्साहस …. | वाह री ….वर्तमान व्यवस्था…कंही आंसू पोंछने को भी हाथ नहीं उठ रहे… कंही जश्न ऐसा कि थिरकने से फुर्सत ही नहीं …… लो चलो हम सड़क पर आ गए…… कबीर का यह कथन अच्छा लगता है …कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर….. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर!! (यूपी के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.)

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सब जानते हैं कलहंस का असली धंधा क्या है, उस कुमार सौवीर से तो बाद में निपट लूंगा : हेमंत तिवारी

 

: जो मनमर्जी और गुण्‍डागर्दी का कड़ा विरोध करे, वही सबसे बड़ा गुण्‍डा : मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति में गुण्‍डागर्दी पर हेमन्‍त तिवारी की नई व्‍याख्‍या : 25 तक कोई फैसला नहीं हुआ तो 27 को होगी फैसलाकुन बैठक :

लखनऊ : हम आपको बताये दे रहे हैं वह फोन वार्ता का लब्‍बोलुआब, जो शरत प्रधान और हेमन्‍त तिवारी के बीच हुई थी। बातचीत का मकसद था उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति का बरसों से लटका चुनाव और उस पर कुण्‍डली पर बैठे तथाकथित और खुद को दिग्‍गज कहलाते नहीं थकते पत्रकार। परसों शाम मुख्‍यमंत्री कार्यालय एनेक्‍सी वाले मीडिया सेंटर में शरत प्रधान ने वहां मौजूद पत्रकारों को उस बातचीत का मोटी-मोटा ब्‍योरा सुनाया।

शरद: क्‍या चल रहा है हेमन्‍त ?
हेमन्‍त: आजकल तो बस मौज ही मौज चल रही है। आइये, मैंने महफिल सजा रखी है।

शरद: लेकिन उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति का क्‍या चल रहा है ?
हेमन्‍त: चकाचक, क्‍यों कोई दिक्‍कत है क्‍या?

शरद: अरे यार, तीन साल हो चुका है, लेकिन तुम चुनाव क्‍यों नहीं करा रहे हो ? जबकि नियमानुसार बहुत पहले ही यह चुनाव हो जाना चाहिए। आखिर क्‍या चाहते हो तुम ? यह हम पत्रकार बंधुओं की कमेटी है, तुम्‍हारा जेबी संगठन नहीं। जिसे तुम जैसा चाहो, घुमाते-नचाते रहो। अरे कोई कानून-कायदा भी होता है। तुमने तो बिलकुल मजाक ही बना रखा है इस समिति को। जिस भी ओर देखो, थुक्‍का-फजीहत ही हो रही है तुम्‍हारी भी हो और समिति की भी। और तुम हो कि बिलकुल इस समिति की कुर्सी पर कुण्‍डली मारे बैठे हो। यह क्‍या तरीका है ?
हेमन्‍त: अरे मैं तो कब से तैयार हूं कि समिति का चुनाव कराय लिया जाए। लेकिन कुछ गुण्‍डे ही अपनी गुण्‍डागर्दी पर आमादा है। न कुछ करते हैं और न किसी को करने देते हैं। आखिर मै अकेली नन्‍हीं जान क्‍या-क्‍या करूं? किस-किस से जूझूं?

शरद: लेकिन गुण्‍डा कौन है, जो गुण्‍डागर्दी करके समिति के चुनाव को कराने में अड़ंगा लगा रहा है?
हेमन्‍त: अरे वही, आप तो जानते ही हैं उसे

शरद: कौन?
हेमन्‍त: कुमार सौवीर, और कौन

शरद: क्‍यों, कुमार सौवीर ने क्‍या किया?
हेमन्‍त: अरे यह पूछिये कि क्‍या-क्‍या नहीं किया। मेरे खिलाफ क्‍या-क्‍या नहीं प्रोपेगण्‍डा किया। वही तो सब सरभण्‍ड किये दे रहा है। वरना मैं तो दो साल पहले ही समिति का चुनाव करवा चुका होता।

शरद: कोई भी गुण्‍डागर्दी नहीं कर रहा है। अब सीधे-सीधे यह बताओ कि चुनाव कब करा रहे हो ? हम लोग इस वक्‍त एनक्‍सी के मीडिया सेंटर में मीटिंग कर रहे हैं इस वक्‍त।
हेमन्‍त: मुझे भी पता चला था, इसीलिए मैंने अपनी अलग मीटिंग अपने घर में करनी शुरू कर दी है। इसी बैठक में तय किया जाएगा कि समिति का क्‍या किया जाए।
शरद: देखो, साफ बात है कि अगर तुम 25 जुलाई को समिति की एजीएम नहीं बुलाते हो, तो हम लोग 27 जुलाई को मीटिंग बुला कर नये चुनाव का ऐलान कर देंगे। फिर तुम जाने और तुम्‍हारा काम-धाम। (फोन कट गया)

यह है वरिष्‍ठ पत्रकार शरद प्रधान और हेमन्‍त तिवारी के बीच हुई टेलीफोन पर हुई बातचीत का मोटी-मोटा ब्‍योरा। इस बातचीत का खुलासा शरद प्रधान ने परसों शाम को मुख्‍यमंत्री कार्यालय एनेक्‍सी मीडिया सेंटर में किया था, जब समिति का चुनाव न कराने से भड़के पत्रकारों ने इसी मसले पर मीटिंग बुलायी थी। इसके पहले भी अनेक जगहों पर नोटिसें चस्‍पां की गयी थीं, लेकिन हेमन्‍त तिवारी एण्‍ड कम्‍पनी ने उसे हर जगह से फाड़ दिया था।

खैर, तय हुआ है कि कल यानी 25 जुलाई तक कोई नतीजा नहीं निकलता है तो 27 जुलाई को मीडिया सेंटर में नयी समिति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। उधर कुछ और लोगों ने हेमन्‍त तिवारी और उसके समर्थकों से बातचीत की। उनमें से एक से तो साफ कहा कि अब जरा मैं अपने निजी मामलों से निपट लूं फिर निपटूंगा उस कुमार सौवीर से निपट लूंगा। एक ने तो यहां तक कह दिया गया है कि अब कुमार सौवीर को सावधान हो जाना चाहिए। मामला खतरनाक होता जा रहा है। बड़े ऊंचे लोग लग गये हैं अब।एक मित्र ने बताया कि हेमन्‍त तिवारी ने कुमार सौवीर को ठिकाने लगाने की व्‍यवस्‍था कर ली है। उसका कहना था कि पुलिस महकमें में चूंकि उसके कई बड़े अफसर हैं और कई बड़े अपराधियों से भी हेमन्‍त के करीबी रिश्‍ते हैं, इसलिए कुमार सौवीर की शामत अब शायद आने ही वाली है। हाय अल्‍लाह। न जाने क्‍या होने वाला है अब।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.


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