अराजक रोडवेजकर्मियों ने लखनऊ के पत्रकार को मिल कर पीटा, मीडिया संगठन चुप्पी साधे हैं

लखनऊ से खबर है कि मान्यता प्राप्त पत्रकार शशि नाथ दुबे के ऊपर आलमबाग रोडवेज के कर्मचारियों ने हमला कर उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया. शशि नाथ दुबे बिजनेस टाइम्स से राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं. वे टिकट बुक कराने के लिए आलमबाग बस स्टेशन पहुंचे और जयपुर जाने के लिए अपना रिजर्वेशन करने को कर्मचारियों से कहा. वहां पर मौजूद कर्मचारी ने उनसे कहा कि आपका टिकट हम बुक नहीं कर सकते. इसके लिए आप आरएम साहब से मिलिए. शशि नाथ दुबे अस्वस्थ होने के कारण बोले कि मैं अभी कई सीढ़ियां चढ़ा उतरा हूं, कम से कम आप यही कह दीजिए कि जगह नहीं है बस में. आप ये बात आन कैमरा बोल दीजिए, हम मोबाइल में रिकॉर्डिंग कर लेता हूं. Continue reading

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लखनऊ में सरकारी आवास का सुख भोग रहे किस पत्रकार पर कितने रुपये है बकाया, देखें लिस्ट

लखनऊ के पत्रकारों को अलाट 236 सरकारी आवास में काबिज ज्यादातर पत्रकार भूल बैठे हैं कि उन्हें किराया भी देना है. सूचना के अधिकार के तहत राज्य संपत्ति निदेशालय ने एक सूचना जारी की है जिसमें सरकारी आवासों में रहने वाले पत्रकारों पर बकाये की राशि का जिक्र है. Continue reading

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भ्रष्टाचार की पोल खोलने वाले मीडिया ग्रुप को धमकी दिला रहे है नगर निगम अधिकारी

लखनऊ । भ्रष्टाचार की पोल खोल अभियान से घबराये नगर निगम अधिकारी और कर्मचारी अब बचाव छोड़ आक्रामक मुद्रा में आ गये है। इस पहल से परेशान नगर निगम के अधिकारी अब फर्स्ट आई न्यूज के कर्मचारियों और अधिकारियों को जान से मारने की धमकी भरे फोन तो करवा ही रहे है साथ ही कार्यालय पर गुण्डें भेजकर फर्स्ट आई के डायरेक्टर्स का पीछा भी करवा रहे है। लेकिन नगर निगम के अधिकारियों के इस तरह के दुस्साहस से डरे बगैर इस मीडिया हाउस ने तय किया है कि नगर निगम में जड़ तक अपनी पैठ बना चुके करप्शन को आम जनता और शासन सत्ता के सामने लाकर ही दम लेंगे और इस अभियान को आगे भी जारी रखेंगे। इसके लिए मीडिया हाउस ने सभी अधिकारियों और उनके चापलूसों के खिलाफ पर्याप्त सबूत जुटा लिये है। इस भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेकने के लिए फर्स्ट आई की पूरी टीम कार्य कर रही है।

गौरतलब है कि कुछ समय से फर्स्ट आई मीडिया ने नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार की बखिया उधेड़नी शुरू की थी। इसके तहत पोल खोल अभियान की शुरूआत की थी। नगर निगम में संविदा कर्मचारियों की संख्या में घोटाले से लेकर टेण्डर घोटालों तक की सच्चाई खोल कर रख दी थी। इसके बाद उच्चाधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक में खलबली मच गयी थी। सूत्रों के मुताबिक उजागर किये गये कई मामलों में शासन ने जांच भी बैठायी, लेकिन कहा जाता है ना कि ढ़ाक के तीन पात। कुबेर जी की कृपा से न तो जांचों का कोई रिजल्ट आया और न ही शासन स्तर पर घोटालों की चर्चा ही हुई । शासन सत्ता का मजबूती से संरक्षण मिलने के बाद नगर निगम अधिकारियों के हौंसले इतने बुलन्द हो गये कि उन्होंने विभाग की सच्चाई उजागर करने वाले मीडिया ग्रुप के अधिकारियों को सबक सिखाने की ठान ली है। और अब वह सबक सिखाऊ अभियान में लग गये है।

इसी अभियान के तहत नगर निगम अधिकारियों के गुण्डों ने फर्स्ट आई मीडिया के डायरेक्टर्स को फोन पर गाली गलौज करते हुए निपटा देने की धमकी दी। यही नही जिस मोबाइल नम्बर से धमकी दी गयी उसी नम्बर से पहले न्यूज वेबसाइट पर चली खबरों के सम्बन्ध में धमकी दी गयी उसके बाद इसी ग्रुप की मैग्जीन में नगर निगम के भ्रष्टाचार की प्रमुखता से छापी गयी खबर पर भी उसी नम्बर से धमकी दी गयी । हालांकि यह मोबाइल नम्बर पुलिस को दे दिया गया है। लेकिन अभी भी नगर निगम अधिकारी अपनी हरकतों से बाज नही आ रहे है और गुण्डे़ भेजकर लगातार फर्स्ट आई के अधिकारियों का पीछा करवाना और उनके बारे में जानकारी इकट्ठी कराना इनका रोज का काम बन गया है।  लेकिन फर्स्ट आई मीडिया ग्रुप ने तय किया है कि इस तरह की बाधाओं से वह डरने के बजाय अपने काम को और भी मजबूती से अंजाम देंगे और नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार को लोगों के सामने लाकर ही रहेंगे।

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यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर संवाददाता सम्मेलन की यह तस्वीर हो रही वायरल

Dilip Mandal : यह बीजेपी कार्यकर्ताओं का सम्मेलन नहीं है. यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर हुए संवाददाता सम्मेलन की ताजा तस्वीर है. ये सब निष्पक्ष पत्रकार हैं. इनका बताया हुआ जानकर हम अपने विचार बनाते हैं. आपके प्रिय चैनल का रिपोर्टर भी यहीं है. भारतीय मीडिया एक पोंगापंथी सवर्ण पुरुष है. यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर संवाददाता सम्मेलन की वायरल हो रही तस्वीर. पहचानिए अपने प्रिय चैनल और अखबार के पत्रकार को. वह यहीं कहीं है. गौर से देखिए. यूपी के सीएम निवास पर संवाददाता सम्मेलन की तस्वीर.

Ambrish Kumar : यह फोटो दो दिन पहले मानसरोवर यात्रा और सिंधु दर्शन के यात्रियों को सरकार की तरफ से चेक बांटने के कार्यक्रम की है. इसमें भगवा गमछा बांटा गया था. बांटना तो मानसरोवर वाली समिति की तरफ से था पर सूचना विभाग के लोग भी बांट रहे थे. अपने परिचित पत्रकार भी गमछा ले आए हैं और इसकी पुष्टि भी की. हालांकि इस कार्यक्रम में बहुत से वरिष्ठ पत्रकार पहुंच नहीं पाए. विभाग की तरफ से समय पर सूचना न मिलने की वजह से वर्ना ज्यादातर को इस गर्मी में एक अदद गमछा तो मिलता ही. खैर अगली बार.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और अंबरीश कुमार की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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लखनऊ में थोक के भाव पत्रकार किए गए सम्मानित, देखें लिस्ट

लखनऊ में नेशनल मीडिया क्लब द्वारा आयोजित स्वच्छता अवार्ड व पत्रकार सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य अथिति के रूप में शिरकत की. इस मौके पर मुख्यमंत्री ने स्वच्छता के लिए उत्तर प्रदेश का पहला टोल फ्री नंबर जारी किया. आयोजन में नेशनल मीडिया क्लब ने पत्रकारिता दिवस के अवसर पर 60 वर्ष पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया।

थोक के भाव में सम्मानित किए गए ढेरों पत्रकारों के नाम इस प्रकार हैं- 

1. राजनाथ सिंह सूर्य (लखनऊ)

2. विभांशु दिव्याल (लखनऊ)

3. कमलेश त्रिपाठी (दिल्ली)

4. डॉ. दिलीप चौबे (दिल्ली)

5. डॉ. रामनरेश त्रिपाठी (इलाहाबाद)

6. रमाशंकर श्रीवास्तव (इलाहाबाद)

7. एस पी सिंह (इलाहाबाद)

8. रामदत्त त्रिपाठी (लखनऊ)

9. हुसैन अफसर (लखनऊ)

10. प्रमोद तिवारी (कानपुर)

11. शिवशंकर गोस्वामी (लखनऊ)

12. भोलानाथ कुशवाहा (मिर्जापुर)

13. उमाशंकर त्रिपाठी (लखनऊ)

14. राजेंद्र द्विवेदी (आज वाले)

15. बदरी विशाल (वाराणसी)

16. नवनीत मिश्र (लखनऊ)

17. दिनेश श्रीवास्तव (लखनऊ)

18. रामकृपाल (दिल्ली)

19. मार्तंड पुरी (दिल्ली)

20. सत्यमोहन पांडेय (फर्रूखाबाद)

21. दिलीप शुक्ला (लखनऊ)

22. अनिल शुक्ला (आगरा)

23. वीरेंद्र सेंगर (दिल्ली)

24. अशर्फीलाल (बरेली)

25. सीपी गोयल (मैनपुरी)

26. श्याम कुमार

27. विजय पंकज

28. रवींद्र सिंह

29. खान साहेब

30. अशोक शुक्ला

31. के बक्स

32. सदगुरुशरण

33. सुनील दुबे

34. प्रमोद गोस्वामी पीटीआई

35. सुरेंद्र द्विवेदी एएनआई

37. यदुनंदन लाल गोस्वामी

38. दिनेश श्रीवास्तव, नोएडा

इस मौके पर विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित, उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, लालजी टंडन,  सुनील भराला, सुरेश राणा, कृष्णा राज, महेंद्र सिंह, हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव, क्रिकेटर आर. पी. सिंह, संगठन मंत्री सुनील बंसल प्रमुख सचिव सूचना अवनीश अवस्थी समेत 2 दर्जन से ज्यादा विधायक और कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे. मुख्यमंत्री ने स्वच्छता अभियान के ब्रांड एंबेसडर हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव को सम्मानित भी किया.

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जाम लड़ाने के बदले अभियुक्त बाप-बेटों की साजिशों में भागीदार रहता है अंग्रेजी दैनिक का रिपोर्टर

अब नहीं जलता ‘शरद’ ऋतु का ‘दीप’…

लखनऊ। देश को लगातार गौरवान्वित करने वाले, ओलंपिक और अन्य अंतराष्ट्रीय स्पर्धाओं में मेडल दिलाने वाले और लगातार ऊंचाइयां छू रहे बैडमिंटन खेल को कुछ स्वार्थी तत्व और बिकाऊ कलमें प्रायोजित स्टोरियों के सहारे बदनाम करने की साजिश रच रही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि स्वार्थी-साजिशकर्ताओं का शिकार देश का एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्र भी हो रहा है।

इस समाचार पत्र की मालकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं सुविख्यात समाजसेवी परिवार से हैं। उनके अथक परिश्रम एवं संपादकीय कौशल से आज इनका पब्लिकेशन देश के प्रतिष्ठित मीडिया समूहों में शुमार होता है और देश की सेवा कर रहा है। लेकिन इस अंग्रेजी दैनिक में एक रिपोर्टर ऐसा भी है जो अपनी करतूतों और षडय़ंत्र से इस अखबार की छवि में बट्टा लगा रहा है।

इस पत्रकार के पास शौकनुमा कई लत भी हैं। अपनी गलत आदतों के कारण ये पत्रकार, बैडमिंटन एसोसिएशान के निष्कासित पदाधिकारी और यौन शोषण व गबन के आरोपी विजय सिन्हा और उनके पुत्र निशान्त सिन्हा के हर गलत काम में भागीदार रहता है। हालांकि आजकल यौन शोषण और गबन के अभियुक्त ये पिता-पुत्र भी खासे परेशान हैं, क्योंकि विजय सिन्हा गिरफ्तार होकर जेल में है और उनके पुत्र निशान्त सिन्हा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पीछे पड़ी है, जगह-जगह छापेमारी कर रही है। अभियुक्त निशान्त के बंगलुरू या फिर  दिल्ली में छिपे होने की संभावना जतायी जा रही है क्योंकि इनको खेल जगत के कई लोग इन शहरों में देख चुके हैं।

इन अभियुक्त  पिता-पुत्र के साथ बीबीडी यूपी बैडमिंटन अकादमी को जाम लड़ाने का अड्डा बनाने वाला अंग्रेजी दैनिक का पत्रकार भी आजकल बहुत परेशान है क्योंकि अब  यहां  ‘शरद’ ऋतु में इनकी हरकतों का ‘दीप’ नहीं जलता। पुलिस सूत्रों के अनुसार इस रिपोर्टर को भी पूछताछ के पुलिस कभी भी उठा सकती है।

गिरफ्तार अभियुक्त विजय सिन्हा व उनके पुत्र निशान्त सिन्हा के हर षडय़ंत्र और गलत काम में सहभागी यह पत्रकार आजकल  ‘अड्डे’ की तलाश में भटक रहा है। पहले इसका अड्डा बीबीडी यूपी बैडमिंटन अकादमी हुआ करता था। अकादमी से अभियुक्त बाप-बेटों (विजय सिन्हा व निशान्त सिन्हा)के तड़ीपार होने के साथ ही इस पत्रकार का भी हुक्का-पानी बंद हो गया। अब बीबीडी यूपी बैडमिंटन अकादमी में न ‘शरद’ ऋतु आती है न ही इनकी हरकतों का ‘दीप’ जलता है।  …सो परेशानी समझी जा सकती है। आखिर जाम लड़ाने के लिए कोई पनाहगाह तो चाहिए।

अड्डा बंद होने का असर इस पत्रकार की कलम व मनोदशा पर भी पड़ा है, ऐसे में ये अपनी बेसलेस लेखनी से अपने ही संस्थान की बदनामी करा रहा है। जरा सोचिए! जिस संस्थान की सर्वेसर्वा देश के प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने की महिला हों, उस संस्था का पत्रकार दो ऐसे अपराधियों (विजय सिन्हा व निशान्त सिन्हा)का हमसफर/हमकदम बन जाये जिनके घृणित कृत्य से पूरा खेल जगत शर्मसार हुआ हो, तब आश्चर्य होता है कि कैसे यह पत्रकार इस प्रतिष्ठित संस्थान में है|

मैं और हमारा संस्थान इस अंग्रेजी दैनिक अखबार और इसकी चेयरपर्सन/मालकिन का बहुत सम्मान करते हैं। लेकिन जब इस अखबार के पत्रकार की कारस्तानी हमारे सामने आयी, तो हम अपना कर्तव्य समझकर इसे प्रकाशित कर रहे हैं ताकि इस सम्मानित अंग्रेजी दैनिक और इसकी मालकिन को पता चल सके यह रिपोर्टर कहां…कहां और कब-कब अपनी हरकतों का ‘दीप’ जलाता है।

(लखनऊ से प्रकाशित हिंदी अखबार ”वायस आफ लखनऊ” से साभार)

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लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता का एक ताजा अनुभव

विष्णु गुप्त

क्या लखनऊ की पत्रकारिता अखिलेश सरकार की रखैल है? लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर क्यों बना हुआ रहता है? अखिलेश सरकार के खिलाफ लखानउ की पत्रकारिता कुछ विशेष लिखने से क्यों डरती है, सहमती है? अखिलेश सरकार की कडी आलोचना वाली प्रेस विज्ञप्ति तक छापने से लखनऊ के अखबार इनकार  क्यों कर देते हैं? अब यहां प्रष्न उठता है कि लखनऊ के अखबार अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने से डरते क्यों हैं? क्या सिर्फ रिश्वतखोरी का ही प्रश्न है, या फिर खिलाफ लिखने पर अखिलेश सरकार द्वारा प्रताडित होने का भी डर है?

सही तो यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने पर लखनऊ की पत्रकारिता को प्रताड़ित होने का भी डर है और रिश्वतखोरी से हाथ धोने का भी डर है। अखिलेश सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों तरह के हथकंडे अपना रखे है। एक हथकंडा पत्रकारों और अखबार मालिकों को रिश्वतखोरी कराने और दूसरे हथकंडे में खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करना।

अखिलेश सरकार के इस दोनों हथकंडों की परिधि में लखनऊ की पत्रकारिता पूरी तरह चपेट में हैं। ईमानदार और स्वतंत्र पत्रकारों की हत्या हुई, उत्पीड़न हुआ पर लखनऊ में अखिलेश सत्ता के खिलाफ पत्रकारों की कोई सशक्त आवाज नहीं उठी। यूपी के पत्रकारों की हत्या और उत्पीडन की आवाज दिल्ली तक तो पहुंची और दिल्ली में अखिलेश सरकार के खिलाफ पत्रकारों की आवाज भी उठी थी पर लखनऊ में सषक्त आवाज नहीं उठी। पत्रकारिता हमेशा सत्ता को आईना दिखाने के लिए जानी जाती है और यह धारणा विकसित है कि स्वच्छ और निडर पत्रकारिता ही अराजक, भ्रष्ट और निकम्मी सत्ता की कुंभकर्णी नींद से जगाती है और जन चेतना का संचार कर ऐसी सत्ता को जनाक्रोश का सामना कराती है। पर पत्रकारिता के इस धर्म का कहीं कोई वीरता है नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए यह चितांजनक स्थिति है, जिस पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

अभी-अभी हमने लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर देखा है, अखिलेश सरकार की शरणागत पत्रकारिता को देखा है। कैसे एक मामूली प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम का अखबार या चैनल संज्ञान लेने से इनकार कर देते हैं कि वह प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम अखिलेश सरकार के खिलाफ था। प्रसंग मेरी पुस्तक से जुड़ा हुआ है। सर्वविदित है कि अखिलेश के गुंडा राज पर एक मेरी पुस्तक आयी है, पुस्तक का नाम है, ‘अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार’। लोकशक्ति अभियान द्वारा लखनऊ में मेरी पुस्तक पर एक परिचर्चा कार्यक्रम रखा गया था। परिचर्चा कार्यक्रम में कई हस्तियां शामिल थीं, कई पत्रकार भी शामिल थे। परिचर्चा कार्यक्रम में लोगों ने पुस्तक पर खट्टी-मिटठी चर्चा की। हमने यह सोचा था कि परिचर्चा कार्यक्रम को एक समाचार दृष्टि से जरूर जगह मिलेगी। जिन अखबारों के प्रतिनिधि नहीं पहुंचे थे उन अखबारों को परिचर्चा कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति कार्यक्रम के आयोजक लोकशक्ति अभियान द्वारा भेज दी गयी थी। पर परिचर्चा कार्यक्रम की खबर कहीं भी नहीं छपी।   

मैं एक कॉलमनिष्ट हूं। लखनऊ के कई अखबारों में मेरा कॉलम भी छपता है। इसलिए मैने कई संपादकों को कॉल कर पूछ लिया कि भाई परिचर्चा कार्यक्रम की खबर क्यों नहीं छापी? यह तो साधारण और सूचनात्मक खबर थी। पहले तो आनाकानी हुई फिर संपादकों का कहना था कि अखिलेश सरकार से कौन बैर लेगा, अखिलेश के गुंडों से कौन लडाई मोल लेगा, आप तो दिल्ली वाले हैं, लखनऊ से सीधे दिल्ली पहुंच जायेंगे, आपको डर नहीं है पर हमे तो लखनऊ में रहना है, अगर अखिलेश सरकार की वापसी हो गयी तो फिर अगले पांच साल तक हमारा अखबार निशाने पर रहेगा। संपादकों की यह चिंता और डर के पीछे एक नहीं कई अन्य रहस्य भी है जिन्हें बेपर्दा करना जरूरी है।

अब यहां प्रश्न उठता है कि अखबारों और संपादकों के डर के पीछे अन्य रहस्य क्या है? संपादकों ने पूरा सच नहीं बताया। यह सही है कि राज्य सत्ता के खिलाफ लिखने और अभियानरत रहने से उत्पीड़न का खतरा रहता है। पर पत्रकारिता तो खतरों से खेलने का नाम है, पत्रकारिता तो जान पर खेलकर खबरें निकालने और सभी को सच का आईना दिखाने का नाम है? राज्य सत्ता से डरने वाले, गुंडों से डरने वाले, समाजविरोधी से डरने वाले, भ्रष्ट अधिकारियों से डरने वाले और ऐेसे लोगों के सामने शरणागत होने वाले लोग पत्रकार हो ही नहीं सकते हैं, ऐसे लोग चरणपादुका संस्कृति के होते हैं, दलाल किस्म के होते हैं, इनके लिए पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक सशक्त माध्यम भर होती है, पत्रकारिता को सरकार, गुंडों, असामाजिक तत्वों और भ्रष्ट अधिकारियों का चरणपादुका बना कर अपनी झोली भरते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता में लोग एक मिशन के तहत नहीं आते हैं, वीरता दिखाने के लिए नहीं आते हैं, परिवर्तन के लिए नहीं आते हैं, क्रांति के लिए नहीं आते हैं। सिर्फ और सिर्फ पेट पालने और नौकरी करने आते हैं। फिर अन्य लोगों और पत्रकारों में अंतर क्या रह जायेगा? पत्रकार फिर अपने को विशेष क्यों और कैसे कह पायेंगे।

जब हमने जानने की यह कोशिश की आखिर असली रहस्य क्या है तो पता चला कि यह रहस्य रिश्वतखोरी का है। लखनऊ में पत्रकारों को रिश्वतखोरी कराने की एक बडी विषैली संस्कृति बन चुकी है। रिश्वतखोरी कराने के लिए प्रतिस्पर्द्धा होता रहा है। प्राय: सभी सरकारो में यह संस्कृति रही है। पर अखिलेश की सरकार मे यह संस्कृति और भी विषैली बन गयी है। लखनऊ ही नहीं बल्कि नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों में सैकडों पत्रकारों को अखिलेश सरकार ने आवास की सुविधा दी है। सरकारी नियम के अनुसार जिसका जिस शहर में अपना आवास होता है उस शहर मेें ऐसे पत्रकार को सरकारी आवास नहीं मिल सकता है। पर दर्जनों-दर्जनों ऐसे पत्रकार हैं जिनका खुद का मकान है पर सरकारी मकान भी आंवटित करा रखे हैं। कई ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होने वर्षों पहले पत्रकारिता छोड रखी है, जिनका अब पत्रकारिता से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है फिर पत्रकार कोटे से सरकारी आवास की सुविधा भोग रहे हैं। कई ऐसे लोग भी है जिनकी जिंदगी कब्र में लटकी हुई है फिर भी पत्रकार के नाम पर सरकारी मकान की सुविधा से अपनी दो पीढियों को लाभार्थी करा रहे हैं। ऐसे लोग अखिलेश सरकार से डर कर पत्रकारिता का गला तो घोटेंगे ही, यह तय है।

सरकारी विज्ञापन एक बड़ा कारण है। छोटा-बड़ा सभी अखबार और चैनल आज सरकारी विज्ञापन पर निर्भर हैं। सरकारी विज्ञापन के लिए अखबार और चैनल फर्जी सर्कुलेशन दिखाते हैं। लखनऊ में कई ऐसे अखबार हैं जिनका सर्कुलेशन लाख-लाख तक है पर ऐसे अखबारों का कार्यालय भी ढंग का नहीं है, नियमित कर्मचारी तक नहीं है, पत्रकार के नाम पर ऑपरेटर रख कर अखबार निकाल लिया जाता है। बडे़ अखबार भी कोई दूध के धोये हुए नहीं है। बडे़ अखबारों के कई धंधे होते हैं, बडे अखबारों के मालिक पैरवी और दलाली का कार्य करते हैं। बडे़ अखबारों के वैध और अवैध धंघे तभी तक चलते रहेंगे और इनकी पैरबी और दलाली तभी तक चलती रहेगी जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। विज्ञापन भी तभी तक मिलते रहेंगे जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। अगर अखबार और चैनल सत्ता के साथ मधुर संबंध नहीं रखेगे तो फिर सत्ता इनकी फर्जी सर्कुलेशन की पोल देगी और सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया जायेगा। सरकारी विज्ञापन बंद होने से छोटे अखबार बंद हो जायेगे और बडे अखबारों का भी बुरा हाल हो जायेगा।

जिन लोगों ने अखिलेश सरकार के खिलाफ जाकर लिखने का साहस दिखाया है उन सभी पत्रकारों को अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पडा है। एक पत्रकार है जिनका नाम अपूप गुप्ता है, वे एक पत्रिका निकालते है, जिनका नाम दृष्टांत है। दृष्टांत नामक पत्रिका पिछले 15 सालों से सत्ता के खिलाफ बुलंदी के साथ लड रही है। अनूप गुप्ता और उनकी पत्रिका दृष्टांत की खासियत यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ आग उगलती रही है, अखिलेश सरकार के कुनबेवाद, गुंडावाद, भ्रष्टचारवाद के खिलाफ लिखते रहे हैं, एक पर एक भ्रष्टाचार, गुडागर्दी की कहानियां खोलते रहे हैं। पर इसकी कीमत अनूप गुप्ता को चुकानी पडी है।

पहले तो अखिलेश सरकार और उनकी भ्रष्ट नौकरषाही का बदबूदार चेहरों ने अनूप गुप्ता पर लालच का हथकंडा अपनाया। जब लालच के हथकंडे में अनूप गुप्ता नहीं फंसे तो फिर उन पर तरह तरह के जुल्म ढाये गये, उत्पीडन की कोई कसर नहीं छोडी गयी। अनूप गुप्ता की पत्रिका का निबंधन रद करा दिया गया, अनूप गुप्ता की हत्या तक कराने की कोषिष हुई। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रातोरात अनूप गुप्ता का आंवटित आवास का आंवटन रद कर दिया गया। अनूप गुप्ता का आवास से सारा सामान सडक पर फेक दिया गया। अगर अनूप गुप्ता भी अखिलेश सरकार की चाटुकारिता पंसद कर ली होती तो फिर न तो उनसे आवास छीना जाता और न ही उनका उत्पीडन होता। अखिलेश की सत्ता में एक पत्रकार को कैसे जला कर मार डाला गया था, यह भी उल्लेखनीय है।

लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता की जगह ईमानदार, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता की स्थापना की उम्मीद भी तो नहीं बनती है।

लेखक विष्णु गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और इनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। लेखक से मोबाइल नंबर 09968997060 या मेल आईडी guptvishnu@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार आनन्द राज सिंह

Ramendra Jenwar : हमारे बहुत पुराने मित्र, हास्टल’मेट और पूर्व पत्रकार आनन्दराज सिंह के निधन की खबर अभी अभी एक और पत्रकार मित्र रवि दत्ता जी से प्राप्त हुई.. गहरा आघात लगा… लखनऊ के मित्रोँ को फ़ोन करके जानकारी दी है…. आनन्दराज सिंह ने पत्रकारिता में अपना करियर नेशनल हेराल्ड मेँ कापी होल्डर की पोस्ट से शुरू किया था..फिर प्रूफ रीडर हुए.. फिर हेराल्ड मेँ ही उप संपादक हुए और उसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा… टाइम्स आफ इंडिया से लोकमत टाइम्स होते हुए ओमान डेली आब्जर्वर फिर दुबई मेँ खलीज टाइम्स आदि जाने कितने अंग्रेजी अखबारोँ मेँ काम किया…

मधुमेह के मरीज थे लेकिन शराब और सिगरेट से परहेज नहीँ कर पाए… निरामिष भोजन के भी शौकीन रहे…. शादी बेंगलुरू से हुई थी… हम सब लोग बाराती बनकर गए थे…. मूल रूप से गोँडा जिले के रहने वाले थे…. अंग्रेजी के प्रकांड ज्ञाता थे… विद्वता का आलम यह था कि एमए प्रथम वर्ष की परीक्षा मेँ उन्हेँ एक प्रश्न इतना भाया कि एक ही प्रश्न का उत्तर लिखने मेँ उन्होने तीन कापियाँ भर दीँ लेकिन प्रश्न तो पाँच करने होते थे…. फिर भी परीक्षक ने उनकी योग्यता से प्रभावित होकर उन्हेँ पास मार्क्स दे दिए थे… बाद मेँ विभाग्ध्यक्ष डा विमला राव ने उन्हें बहुत समझाया तब सेकेंड इयर मेँ पाचोँ सवालोँ के जवाब लिखे…..

दुबई में थे तब रोज रात को मुझे फ़ोन करते थे और चाहे अनचाहे पूरी रात उनसे बात करनी पड़ती थी… बीच बीच मेँ पैग बनाने का टाइम भी माँगते थे…. उनको किसी ने खाली हाथ कभी नहीँ देखा… हमेशा हाथ मेँ अँग्रेजी का कोई मोटा उपन्यास या कोई और किताब और उसमेँ एक पेँसिल…. यूपी प्रेस क्लब हमारा बहुत दिनोँ तक स्थाई अड्डा रहा…. और क्या लिखूँ समझ नहीँ पा रहा….अलविदा मित्र…….

किसी के जाने का मुझको गिला नहीँ है मगर,
बहुत करीब से उठकर चला गया कोई।

वरिष्ठ पत्रकार रामेंद्र जनवार के इस एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Surendra Pratap Singh हमेशा एक मित्र का जाना दुखद होता है और जब दिल के अत्यंत करीब हो तो घोर पीड़ादायक। हम आप के इस दुख में आप के साथ हैं। विनम्र श्रद्धांजलि।

Jagat Narain Singh किसी अपने की शरीरी विदाई पीड़ा देती है…

Sanjeev Pathak मुझे भी रवि द्वारा ये दुखद सूचना मिली… बहुत पुरानी बातें याद आ रही हैं उनसे जुड़ी हुई.. अभी जाऊंगा घर… देखा नहीं है… कहीं देवा रोड पर बनवाया था.. रवि के फोन का इंतज़ार है क्योंकि उसे घर पता है…

Pradeep Kumar Mishra आपकी मित्रता, संवेदना, मित्र को असमय खोने कष्ट, अत्यन्त क्लेशकारी है, परमशक्ति आपको संयम तथा स्व. आनन्दराज सिहं जी के परिवार को शान्ति पृदान करे…

Vir Vinod Chhabra बहुत दुखद खबर। मेरी भी इनसे तीन बार की मुलाक़ात हुई है। दिलचस्प शख्सियत थे। एक हाथ में अख़बार और दूसरे हाथ में सिगरेट हमेशा रही। विनम्र श्रद्धांजलि।

Siddharth Kalhans बेहद दुखद। आनंदराज सिंह हमारे जिले के रहने वाले थे और हमेशा मुझे अपने अनुज की तरह माना। एक बार जब हमने बहुत ठानी दुबई जाने की तो वहां की हकीकत से उन्होंने रुबरु करा कर मुझे जाने से रोक दिया।

Shubhendu Dass Very sad and shocking.He worked with me too about 32 years back. Rest in peace in his heavenly abode

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हेमन्त तिवारी जैसों को नहीं पहचाना तो फिर अगला नम्बर आपका होगा

न खुद दलाली कीजिए और न दलालों को अपने आसपास फटकने दीजिए

लखनऊ : चाहे वह सीवान का काण्‍ड हो या फिर चतरा का, पत्रकारों की मौत के असल कारणों का खुलासा तो बाद में ही हो पायेगा, लेकिन अब तक इतिहास बताता है कि ऐसे मामलों में उन लोगों की खास भूमिका रहती है, जो खुद को पत्रकार कहलाते हैं और असल पत्रकार जाने-अनजाने उनके पाले में पहुंच कर अपनी बरबादी का सामान जुटा लेता है। कम से कम, चालीस साल का जिन्दा इतिहास तो मुझे खूब याद है, जिसमें किसी पत्रकार की मौत के कारणों में से एक रहे हैं जो ऐसे पत्रकारों के करीबी बन कर असल वारदात को अंजाम दिला देते हैं।

चाहे वह सन-77 में दैनिक स्वतंत्र भारत के मुख्य उप सम्पासदक जिया सिद्दीकी रहे हों या फिर बीस साल पहले लखनऊ में मारा गया पारितोष पाण्डेय। शाहजहांपुर का जागेंद्र सिंह भी ऐसे लोगों की साजिशों के चलते मौत के घाट उतारा गया था। सिद्दीकी हत्याकांड में एक वकील का नाम आया था जो बाद में अपनी वकालत छोड़कर एक चौपतिया अखबार निकालने लगा। उस हत्या में असली हत्यारे के तौर पर नाम आया था एमपी सिंह। बाद में उसने अपने लाल अखबार को नवरात्र साप्ताहिक के तौर पर प्रकाशित करना शुरू किया, और उसकी प्रतियां केवल बड़े पुलिस अफसरों तक पहुंचने लगी। एमपी सिंह का धंधा आज भी बदस्तूबर चल रहा है।

पारितोष एक तेज-तर्रार पत्रकार था, लेकिन उसकी हत्य के बाद पता चला कि उसकी संगत ही बुरी थी। इस का पूरा प्रकरण तो बाद में आपको अगले अंक में बताऊंगा, लेकिन इतना जरूर है कि अपने तथाकथित पत्रकार-साथियों की साजिशों के चलते पारितोष की मौत हुई थी। जागेंद्र सिंह तो अभी एक साल पुराना मामला है। शाहजहांपुर का वह जोशीला पत्रकार था। कई अखबारों में उसने काम किया, लेकिन हर जगह उसका शोषण ही हुआ। नतीजा उसने अपनी नयी तर्ज की पत्रकारिता फेसबुक पर शुरू की। नाम रखा शाहजहांपुर समाचार। बहुत मेहनती आदमी था जागेंद्र सिंह। लेकिन खबरों को लेकर एक बार उसकी यूपी सरकार के मौजूदा मंत्री रामसिंह वर्मा से ठन गयी। जागेंद्र सिंह ने ऐलानिया कर दिया था कि रामसिंह वर्मा और उसका करीबी कोतवाल प्रकाश राय उनकी हत्या पर आमादा है।

जागेंद्र लगातार आर्तनाद करता रहा। चिल्लाता रहा कि उसकी हत्या हो जाएगी। लेकिन न जिलाधिकारी शुभ्र सक्सेना की कान में जूं रेंगी, न पुलिस का। अधिकांश पत्रकार तो सिरे से ही बिके हुए थे। आखिरकार भांड़ पत्रकारों को अपनी ओर मिला कर हत्यारों ने जागेंद्र सिंह की हत्या कर डाली। उसमें सबसे प्रमुख हत्यारा-षडयंत्रकर्ता था, उसका नाम था अमितेश सिंह। हत्या के बाद उसने अपने कई मित्रों और खुद मुझे भी फोन करके इस बारे में पूरी बात बता दी। अभी तीन महीना पहले ही उस युवक की हत्या उरई में हो गयी है।

अब जरा देखिये, जागेंद्र सिंह की हत्या को लेकर भी खूब खरीद-फरोख्त  हुई। खुद को बडा पत्रकार कहलाने वाले हेमन्त तिवारी ने इस मामले में प्रशासन की ओर से खूब पैरवी की। ऐसा लगा कि जैसे हेमन्त पत्रकार नहीं, बल्कि कोई धाकड़ दलाल है, जो पूरी मामले में दांव लगा रहा था। इसके पहले भी रवि वर्मा आदि दो अन्य पत्रकारों की मौत के बाद जब मैंने 187 पत्रकारों के हस्ताक्षर से यूपी सरकार को एक पत्रकार तैयार किया कि उनके परिजनों को आर्थिक राहत मिल जाए, उस पत्र को हेमन्त तिवारी ने मुझ से लेकर फाड़ दिया। यह तर्क देते हुए कि हिसाम सिद्दीकी जैसो लोग इस पत्र को बेच लेंगे, और हिसाम के हटने के बाद मैं खुद अफसरों से मिल कर उन पत्रकारों को राहत पहुंचा दूंगा। लेकिन हेमन्त ने ऐसा कभी भी नहीं किया।

इतना ही नहीं, हेमन्त तिवारी ने तो दलाल, बलात्कारियों, चोरों, धोखेबाजों और घटिया लोगों को वरिष्ठ पत्रकार का ओहदा दिलाने की फैक्ट्री ही खुलवा दी थी। जौनपुर के रतनलाल शर्मा को अपने साथ हेमन्त तिवारी ने वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर पोस्टर छपवा दिया था। इसके बाद ही शर्मा को पुलिस ने पांच लाख रूपया और एक महिला के साथ लखनऊ में बलात्कार का आरोप लग गया। शराब के नशे में अक्सर पिट जाने वाले हेमन्त तिवारी ने उस रतनलाल शर्मा को बचाने के लिए हरचंद कोशिशें कीं। यह हालत है पत्रकारों और पत्रकारिता का। जाहिर है कि जब तक हेमन्त तिवारी जैसे लोग पत्रकारिता में मौजूद हैं, पत्रकारों और पत्रकारिता पर हमेशा ही खतरनाक हमले होते ही रहेंगे।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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लखनऊ के दो पत्रकारों सिद्दीकी और परितोष के मारे जाने का असली कारण जानिए और पत्रकारिता में धंधेबाजी से बचिए

लखनऊ : स्‍वतंत्र भारत का मुख्‍य उप सम्‍पादक हुआ करते थे सिद्दीकी। एक बार वे अपने आफिस में रात की पाली में काम कर रहे थे। रात आधी से ज्‍यादा हो गयी थी। पेज छूटना ही था। 15 मिनट का समय था, इसलिए सिद्दीकी बाहर चाय की दुकान की ओर बढ़े। रास्‍ते में नाली के किनारे बैठ कर उन्‍होंने पेशाब करना शुरू किया। अचानक कुछ लोगों ने पीछे से चाकुओं से हमला कर दिया। वार इतना सटीक था कि सिद्दीकी ज्‍यादा चिल्‍ला भी नहीं सके और मौके पर ही ढेर हो गये।

सिद्दीकी उस वक्‍त स्‍वतंत्र भारत में बड़े पद पर थे। इसलिए इस हादसे से पूरा प्रदेश हिल गया। लेकिन जब इस मामले का खुलासा हुआ तो लोग सन्‍न हो गये। पता चला कि सिद्दीकी गर्म-गोश्‍त का धंधा करते थे। लड़कियों को फंसाना और उन्‍हें इधर-उधर भेजना उनका असली धंधा था। पुलिस ने सिद्दीकी की आलमारी पर सैकड़ों लड़कियों की तस्‍वीरें बरामद कीं, जिसमें अधिकांश अश्‍लील थीं। कई फोटो में लड़कियों के साथ कुछ पुरूष भी आपत्तिजनक मुद्रा में मौजूद थे, जससे यह भी नतीजा निकला कि सिद्दीकी लोगों को ब्‍लैकमेल करने का भी धंधा करते थे। कहने की जरूरत नहीं कि लड़कियों को ऐयाशों तक मुहैया कराने का काम अकेले किसी एक आदमी की क्षमता में नहीं थी। जाहिर है कि इसके लिए सिद्दीकी का एक पूरा का पूरा गिरोह भी सक्रिय था।

बहरहाल, पुलिस ने इस मामले में एक वकील एमपी सिंह को गिरफ्तार किया। लेकिन तकनीकी कारणों से एमपी सिंह बरी हो गया। लेकिन बाद में एमपी सिंह ने वकालत और पत्रकारिता का एक नया गठजोड़ बनाया। एक चौ-पतिया अखबार निकला, जिसका नाम था नवरात्रि साप्‍ताहिक। इस अखबार में एमपी सिंह ने कप्‍तान से लेकर डीजीपी तक के साथ अपनी फोटो लगा कर तारीफ करती खबरें छापना शुरू किया। बताया जाता है कि इसके बल पर एमपी सिंह का अखबार दारोगा और सीओ तक पर रुआब गालिब किया करता था। इसी प्रक्रिया में उसकी आमदनी भी बेशुमार थी।

बहरहाल, अभी दो दशक पहले ही परितोष पांडे नामक एक पत्रकार को उसके घर में गोली मार दी गयी। हमले में पारितोष मौके पर ही दम तोड़ गया। जब पुलिस ने छानबीन शुरू की तो पता चला कि परितोष का असली काम पत्रकारिता के नाम पर धौंस-पट्टी जमाना ही था। परितोष को तनख्‍वाह तो बहुत कम मिलती थी, लेकिन उसकी जीवन शैली बेहिसाब खर्चीली थी। किसी ऐयाश को मात करती। पुलिस ने पाया कि परितोष झगड़े की जमीनों पर हाथ रखता था। चूंकि उसके रिश्‍ते पुलिस और प्रशासन से करीब के थे, इसलिए जिस भी जमीन पर परितोष हाथ रख देता था, उस पर कोई और नहीं बालने का साहस कर पाता था। लेकिन आखिर यह कब तक चलता। एक दिन पाप का घड़ा भर गया और जमीन के झगड़े में उसे मौत के घाट उतार दिया गया। वह भी तब जब वह अपने घर में हत्‍यारों के साथ बैठ कर शराब पी रहा था। परितोष के श्‍वसुर लखनऊ के आज अखबार के ब्‍यूरो प्रमुख हुआ करते थे। नाम था राजेंद्र द्विवेदी। शुरुआत में तो पत्रकारिता में यह अफवाह फैली कि परितोष की हत्‍या उसके ससुराल के लोगों ने करायी थी, लेकिन जल्‍दी ही यह कोहरा छंट गया।

कहने की तरूरत नहीं कि इन दोनों ही हादसों में मृतकों ने जिन लोगों पर यकीन किया, उन्‍होंने ही उनका काम-तमाम कर दिया। इन सभी को इन दोनों ने पत्रकार बनाने का ठेका ले रखा था। यानी यह लोग उन बदमाशों को सहयोग करने के लिए उन्‍हें पहले पत्रकार बनाते थे, फिर अपना पत्र‍कार गिरोह का प्रदर्शन करते थे।  लखनऊ के तथाकथित पत्रकार हेमन्‍त तिवारी का नाम ऐसे ही लोगों में से एक है। हेमन्‍त तिवारी ने भी लोगों को पत्रकार ही नहीं, वरिष्‍ठ पत्रकार बनाने की फैक्‍ट्री खोल रखी है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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हे लखनऊ वालों, आप खामोश दर्शक बनकर पत्रकारिता की इज्जत लुटते हुए देखिये

मैं मुखालिफत करुँ तो कहिए- भुखरादी कर रहा है.. एक ही मसले पर एक ही संगठन के दो पत्रकार गुटो ने लखनऊ मे नितीश कुमार को ज्ञापन देकर पत्रकारों की खिल्ली उड़वायी…

1- राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कहा जाने वाला पत्रकार संगठन ifwj
2- इस संगठन से लम्बे समय से जुड़े हुए वरिष्ठ और नामी-गिरामी पत्रकार नेता।
3- देश मे लगातार पत्रकारों पर हो रहे हमलो की गंभीर समस्या।
4- एक बड़े प्रदेश बिहार के मुख्यमंत्री और बहुत बड़े कद के नेता नितिश कुमार
      
स्थान- वीवीआईपी गैस्ट हाउस

पत्रकारों की एक गंभीर समस्या को एक गंभीर पत्रकार संगठन एक गंभीर राजनेता/मुख्यमंत्री के सामने कैसे रख रहा है :-

मुलाहिजा फरमाइये :-

एक ही समस्या और एक ही संगठन का ज्ञापन एक ही समय पर एक ही व्यक्ति को दिया जाता है। पर सब कुछ एक होने के बाद भी एक ही संगठन  और एक ही समस्या के  दो ज्ञापन दो गुटो द्वारा एक ही राजनेता को दिये जाना कितना शर्मनाक और कितना बड़ा खिडवाल है, इस बात का अंदाजा लगाया आपने ! तो क्या खाक कोई सरकार पत्रकारों की समस्याओं को गंभीरता से लेगी। तो क्या खाक हम ये समझे कि ये पत्रकार नेता पत्रकारों के हितो की नियत से ज्ञापन सौप रहे है।

ये सब देखकर भी हमसे अपेक्षा की जाये कि हम ये न कहे कि नेताओं/अधिकारियों के साथ फोटो खिचवाने की होड़/हवस /दिखावे और निजी स्वार्थ से भरी सियासत की जा रही है। हम ये न कहे कि वो बड़े जो पत्रकारों के हर मंच पर कब्जा करके पत्रकार हितो की बड़ी-बडी   बाते करते है उनका मकसद सिर्फ पत्रकार राजनीति के नाम पर धंधेबाजी करना है। अपनी-अपनी दुकानें चलानी है और इस अंधी-दौड़ मे कुत्ते-बिल्लियो की तरह लड़ कर पत्रकारिता जगत को बदनाम करना है।

पत्रकारों का एक बड़ा तपका ये सब कर रहा है और दूसरा तबका पत्रकारिता की इज्जत का बलात्कार होते खामोशी से देख रहा है।  इन कृत्यों के खिलाफ विरोध स्वरूप किसी भी कलमकार के कलम से एक अल्फाज भी नहीं लिखा जाता।

हम लिखते हैं तो कहा जाता है :- भुखरादी कर रहा है…. नेतागीरी कर रहा है … गंदी राजनीति कर रहा है…..मैं फलाँ का आदमी हूँ…..फलाँ की वकालत कर रहा हूँ….     वरिष्ठों का अपमान कर रहा है…..राजनेताओं और नौकरशाहो तक हमारे बीच के झगड़े पहुँच रहे है…

तो ठीक है कुछ भी कहो, मैं लिखता रहूँगा। आप पत्रकारिता के नाम पर धंधेबाजी करते रहो…..इस धंधेबाजी के लिये आपस मे लड़ते मरते रहो… और आप लोग खामोश दर्शक बनकर पत्रकारिता की इज्जत का बलात्कार होते हुए देखो। और मै इसकी सिर्फ कलम से मुखालिफत करुँ, तो कहो भुखरादी कर रहा है साला ……।

नवेद शिकोह
वाट्सअप नंबर-08090180256 
मेल navedshikoh84

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बिना सेलरी और बिना नौकरी वाले ये लखनऊ के पत्रकार कहां से गाड़ियां, कोठियां, स्कॉच हासिल कर लेते हैं!

Zafar Irshad : मुख्यमंत्री जी को घेरे है चाटुकार पत्रकारों की टीम..प्रदेश में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश रखने वाले युवा मुख्य्मंत्री अखिलेश जी भी चाटुकार पत्रकारों के चक्कर में पड़ गए लगते है..उनके इर्द गिर्द वही पत्रकार चक्कर लगा रहे है,जो इससे पहले वाली सरकारों के दरबार में दण्डवत हाज़िरी लगाते थे..यकीन न हो इनका रिकॉर्ड देख लें की यह महानुभाव बड़का पत्रकार 4 साल पहले और उससे पहले कहाँ हाज़िरी लगाते थे..

मेरी एक बात समझ में नहीं आती है की यह पत्रकार कहीं नौकरी भी नहीं करते है न ही इन्हे सैलरी मिलती है, इसके बावजूद इनकी लखनऊ में बड़ी बड़ी कोठिया बंगले है, लम्बी लम्बी महंगी गाड़ियों में घुमते है, शाम को शानदार स्कॉच पीते है ..इनको यह फर्क नहीं पड़ता है किसकी सरकार है इनका जुगाड़ पानी चलता रहता है..आखिर कैसे?

मैं 20 साल से एक अच्छी नौकरी में हूँ लेकिन आज तक एक दो कमरे का घर नहीं बनवा पाया मोटर साइकिल से चलता हूँ..आखिर यह पत्रकार कहाँ से लाखों करोड़ों में खेलते है? पहले भी खेलते थे और आज भी खेलते है… मैंने सोचा था यह युवा मुख्यमंत्री ऐसे धन्धेबाज़ पत्रकारों से दूर रहेंगे, लेकिन अफ़सोस यह धन्धेबाज़ आज भी सत्ता के करीब है… कल कोई और सरकार आ गयी तो उसके भी करीब आ जाएंगे… मुख्यमंत्री जी, दूर रहें ऐसे धंधेबाजों से,  एक छोटे पत्रकार की सलाह है आपको, मानें या न मानें.. (प्लीज नोट :- मुझे कुछ भी आपसे नहीं चाहिए CM साहिब, मैं अपनी सैलरी से अपना और परिवार का पेट पाल लेता हूँ बस )…

पीटीआई कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Nadir Wahab Khan ज़फर साहब, आपने ऐसी नब्ज़ पे उंगली रखी है की कि खड़े खड़े कुछ लोग बरहना हो गए… मगर उन्होंने बेहयाई की ऐसी चादर ओढ़ रखी है, जो गेंडे की खाल से भी मोटी है. अखिलेश जी चाहते हुए भी कुछ करने से माज़ूर हैं क्योंकि वह चाटुकार मतलब परस्त नेता जी तक का दबाव रखते हैंं और मठाधीश तो हैं ही… अफसोस जो वाक़ई उनके हमदर्द हैं, उन्हें साज़िश के तहेत उन से दूर रखा गया और उनके खिलाफ़ अखिलेश जी के कान भरे गए. इसका परिणाम 2017 में उन्हें फेस करना पड़ेगा, जो उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. वही चाटुकार जब पब्लिक में होते हैं तो जमकर के अखिलेश जी की कामयाबियों की भर्त्सना करते हैं. यह कैसे लोग हैं भाई और इसमें उनके निजी स्टाफ के भी कुछ लोग शामिल हैं. आपने तो आईना दिखा दिया कि कुछ पत्रकार वेतन भी नहीं पाते और महंगी महंगी गाड़ियों में चल रहे हैं.

Hafeez Kidwai वाक़ई। हम तो रोज़ देखते हैं। कुछ की गाड़िया सिर्फ 5 कालिदास मार्ग जाने के लिए ही बनी हैं। हैरत होती है जब कोई cm इनके चँगुल में रोज़ फसता है। इनकी हर कद्दावर मंत्री से भी बराबर की दोस्ती होती है। ज़फर भाई यह लोग ब्रोकर हैं। आजकी तारीख में जो जितना बड़ा ब्रोकर वह उतना बड़ा पत्रकार।

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हे विक्रम राव, फ्रांस की बातें बाद में कर लेना, पहले आत्महत्या करने वाले बुजुर्ग पत्रकार त्रिपाठी जी की सुध तो ले लो

पता चला है कि मई दिवस पर IFWJ की रैली में जुटेंगे 1200 श्रमजीवी पत्रकार और के. विक्रम राव होंगे मुख्य वक्ता…. इनसे मेरा कहना है कि पहले मलिहाबाद तो जाओ, फिर कर लेना फ्रांस की बातें… लखनऊ में नाका थाना क्षेत्र में आर्थिक तंगी के चलते वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर त्रिपाठी (74) ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी. श्री त्रिपाठी नव जीवन अख़बार में काम करते थे उसके बंद होने के बाद से इनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. लेकिन इन पत्रकार नेताओं को कभी फुर्सत नहीं मिली कि वे ऐसे पीड़ित और गरीब पत्रकारों की सुध लेते.

दिवंगत बुजुर्ग / वरिष्ठ पत्रकार के घर या घाट पर पांच पत्रकार भी नजर नहीं आये. कहने को लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार संगठन और पत्रकार नेता खूब सक्रिय हैं. पत्रकारों के हितों की आवाज उठाने के लिये दुनियाभर में भव्य कार्यक्रम कराते हैं. अब एक मई को सुनिएगा बड़ी-बड़ी बातें. इन दिनों सत्ताधारियों को इकट्ठा करने का कार्य प्रगति पर है. कोई पत्रकार आर्थिक तंगी से मरे या भूखा मर जाये, हमारी बला से. हम तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं. खुदा ना खास्ता किसी बड़े न्यूज चैनल / अखबार के नामी गिरामी / संपन्न पत्रकार का देहांत होता तो लाइन लग जाती. क्योंकि वहाँ बड़े नेताओं / अधिकारियों के पहुँचने की उम्मीद होती, इनसे मिलन हो जाता, चेहरा दिखा देते, हाथ मिला लेते. लेकिन त्रिपाठी जी जैसे गरीब पत्रकार के आत्महत्या करने पर कोई पत्रकार घर या घाट पर नहीं जाएगा… लखनऊ के पत्रकार भाई लोग बहुत आगे की सोचते हो… यही है लखनऊ की दलाल पत्रकारिता का सच…

त्रिपाठी जी जैसे पत्रकारों को आत्महत्या इसलिए करना पड़ता है क्योंकि उनको दी जाने वाली सुविधाओं का हक पत्रकार नेता लोग हजम कर जाते हैं… जिस लखनऊ के पत्रकार संगठन / पत्रकार नेता दुनियाभर मे पत्रकारों के हितों के लिये भव्य आयोजन / सम्मेलन कर रहे हैं, बतौर पत्रकार नेता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियो से मिलने की होड है, आपस में मारामारी हो रही है, उसी शहर के असली / वरिष्ठ / बुजुर्ग पत्रकार भूखों मर रहे हैं, आर्थिक तंगी और तमाम परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं लेकिन कोई पत्रकार नेता / पत्रकार संगठन इसका संज्ञान नहीं ले रहा है… ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं।

नवेद शिकोह 
वाट्सअप- 8090180256
मोबाइल- 9369670660 
Navedshikoh84@Gmail.Com

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दलाल पीआर और फ्रॉड बिल्डर के फेर में फंसे लखनऊ के पत्रकार

लखनऊ की पत्रकारिता रो रही है….इस शहर में बड़े-बड़े संपादक हुए देश दुनिया में नाम कमाया….बीबीसी से लेकर रायटर्स और कई चैनलों में बड़े ओहदों पर पहुंचे पत्रकार इसी शहर की देन हैं….इतना ही नहीं वालस्ट्रीट जर्नल और गल्फ टुडे जैसे बड़े समूहों में अच्छे पदों पर पहुंचे कई नामचीन पत्रकार लखनऊ के पत्रकारिता से ही ककहरा सीखकर आगे बढ़े हैं..लेकिन अब जो यहां देखने को मिल रहा है उससे लग रहा है ज़हर खाकर जान दे दूं या पत्रकारिता को अलविदा कह दूं…..

यही दिन बाकी थे कि चिटफंडिया टाइप बिल्डर शाइन सिटी और एक लोकल पीआर कंपनी के संचालक के पैसे से मीडिया के लिए टी-20 कप क्रिकेट कप आयोजित किया जा रहा है….पीआर कंपनी का संचालक प्रेस कांफ्रेस में बता रहा है कि मैच किससे के बीच खेला जाएगा…कौन विजेता होगा किसको टी शर्ट और ट्राउजर मिलेगा…किसने नरलॉप का किचेन सेट …..छी-छी…

हजारों गरीब निवेशकों के पैसे जमा करा कर प्लॉट देने का वादा करने वाली शाइन सिटी का मालिक अपने पैसे से लखनऊ की पत्रकारिता से जुड़े लोगों को दारू पिलाकर नशे में कर रहा है ताकि उसके काले कारनामों का कोई चिट्ठा न खोल दे और उसका साथ देता रहे….  जेल की हवा खा चुका एक पीआर कंपनी का संचालक…. बताया तो यहां तक जा रहा है कि यह पीआर संचालक कुछ पत्रकारों की सीडी भी बना चुका है क्योंकि जो भी मुंह खोलता है उसको संपादक के जरिये नौकरी से निकवालने की धमकी देता है…

लखनऊ से नरेंद्र कुमार की रिपोर्ट. संपर्क: narenderzee02@gmail.com

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हिंदी न्यूज वेबसाइटों पर अब ऐसी खबरें भी छपने लगीं : ”शिवपाल के बेटे की शादी में दि पंजाब बैंड बजाएगा गाना”

Yashwant Singh : एक वेबसाइट है. ‘तहलका न्यूज’ नाम से. इस पर एक खबर की हेडिंग है : ”शिवपाल के बेटे की शादी में दि पंजाब बैंड बजाएगा गाना”. इस साइट पर यूपी के अखिलेश सरकार का एक विज्ञापन भी लगा है. सुना है इसे लखनऊ के एक ‘महान’ पत्रकार चलाते/चलवाते हैं. ये भी संभव है कि इस साइट के संपादक जी यानि संचालक जी इस वक्त इटावा की तरफ हों और इसी बैंड के किसी गाने में ‘शामिल बाजा’ माफिक डोल डाल कर रहे हों. 🙂

अरे भई संपादक जी, कम से कम ‘तहलका’ शब्द का तो मान रख लिया होता. चलिए अब ये भी बता दीजिए एक नई खबर डाल कर कि आपकी शादी में कौन सा बैंड बजा था और आपने किस कंपनी का सफारी सूट पहना हुआ था. 🙂

टीवी अखबारों के खिलाफ हम लोग तो खूब लिखते बोलते हैं, लेकिन अपने बीच के साथियों के कामकाज की भी खबर लेते रहने की जरूरत है. वैसे जो ट्रेंड चल पड़ा है उससे लग रहा है कि हिंदी न्यूज चैनलों और हिंदी अखबारों की तरह हिंदी न्यूज वेबसाइटें भी दलाली, विज्ञापन व तेलहाई के चक्कर में गंधा जाएंगी.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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upsacc की तरह ifwj के भी दो टुकड़े हो गये!

पत्रकारों के बटवारे का दर्द

-नवेद शिकोह-

पत्रकारों के बंटवारे के ‘जिन्नाओ’, कितने टुकड़े करोगे हमारे! फिल्म ‘जिस्म’ ने अच्छा बिजनेस दिया तो ‘जिस्म-टू’ बन गयी। इसी तरह नागिन-वन के बाद नागिन-टू, आशिकी के बाद आशिकी टू बनी। व्यवसायिक फिल्मों की व्यवसायिक सोच ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ये ट्रेन्ड शुरु किया था। भारत की आजादी के फौरन बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ। नफा-नुकसान की व्यवसायिक सोच के साथ भारत की आजादी की लड़ाई मे मोहम्मद अली जिन्ना का शामिल होना कितना महंगा पड़ा था। जिन्ना की व्यवसायिक सोच की गन्दी सियासत ने भारत का बटवारा करके हमारे देश के टुकड़े कर दिये।

पत्रकार साथियों,  आप लोग जिन्ना को नायक मानते हो या खलनायक! जब ऐसे व्यक्ति को हम सब खलनायक मानते है तो फिर स्वार्थ से भरी व्यवसायिक सोच वाले उन पत्रकारों का साथ क्यों देते हो जो संवाददाता समिति-1,  संवाददाता समिति-2,  ifwj-1, Ifwj-2 जैसे तमाशे करके पत्रकारों का बटवारा कर रहे है। यकीन मानिये इनके खुद के हाथ इतने कमजोर हैं कि ये आप जैसे भोले-भालो के कंधो के बिना बंटवारे के दंगे मे बंदूके चला ही नहीं सकते हैं। आप कब तक और कितने हिस्सों में बटोगे? आप ‘इनके आदमी’ और ‘उनके समर्थक’ के रूप में अपने खुद के अस्तित्व की हत्या क्यों कर रहे है? आपमें से ज्यादातर लोग मेरी बातो से सहमत होगे। और वो किसी भी गुटबाजी से सहमत भी नही है। वो खुद भी किसी गुट में नहीं हैं। लेकिन आप लोग गुटबाजी और पत्रकारों के बटवारे के विरोध मे सामने क्यो नही आते?

विरोध का मतलब तलवारे चलाना नहीं। किसी का अपमान करना भी नहीं। न्यायालय जाना भी नहीं। जिन्दाबाद- मुर्दाबाद के नारे लगाना, धरना-प्रदर्शन या अनशन पर बैठ जाना ही नहीं। सियासत करना या किसी का नेतृत्व स्वीकार करना भी नहीं। आप कलमकार है। पत्रकारों का बटवारा करने और उन्हें बाटने की गन्दी सियासत करने वालों के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध रूपी दो शब्द भी आप अपने कलम से नही लिख सकते! आप कब तक किसी बाजीराव, मनोज तिवारी, हिमांशु मिश्र, हिसाब सिद्दीकी या रुपेश बहादुर सिंह (लखनऊ के पत्रकारों के बदले हुए नाम) के आदमी बने रहेगे। क्यों ना हम-आप इनके-उनके आदमी बनने के बजाय मर्द बनकर पत्रकारों के बटवारे के खिलाफ आवाज उठाये और गंदी सियासत का खातमा करें।

आज वाट्सअप पर दिल्ली के एक कार्यक्रम की तस्वीरे देखकर दिली अफसोस हुआ। पता चला कि Upsacc की तरह ifwj जैसी  इतनी पुरानी पत्रकारों की ट्रेड यूनियन के भी दो टुकड़े हो गये। Ifwj के बटवारे पर गम-ओ-गुस्से के साथ मुनव्वर राना साहब के एक शेर का एक मिसरा और बात खत्म :- ”…सियासत एकता की जड़ में मठ्ठा डाल देती है”

नवेद शिकोह

लखनऊ मे पत्रकारों के बटवारे की गन्दी सियासत से त्रस्त एक मामूली पत्रकार

navedshikoh84@gmail.com

09369670660

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लखनऊ में पत्रकारों की राजनीति पर सवाल उठाओ तो पूछा जाता है- ‘किस गुट की तरफ से बोल रहे हो?’

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पर कहना के यूँ होता तो क्या होता.

इन दो व्यक्तियों की तस्वीरों को देखिये और पहचानने की कोशिश कीजिये… जितने अति वरिष्ठ हैं और जितने भी बड़े पत्रकारों के नेता हैं, उनमें से शायद बहुत कम ही इनको पहचानते होंगे… जो नहीं पहचानते, उन्हें मैं बता देता हूं- इसमें बायीं तरफ हैं Neeraj Mishra और दाहिनी तरह है Mukesh Verma. दोनों टीवी के बहुत कनिष्ठ पत्रकार हैं लेकिन दिल के बहुत बड़े हैं और साथियों के लिए जीना-मरना जानते हैं… इनका पत्रकार दोस्त था… नाम था Santosh Kumar Gwala…

बेहद ही नेकदिल और शानदार बन्दा… लेकिन मौत से किसकी यारी है… आज हमारी कल तुम्हारी बारी है… काल के गाल ने उसको लील लिया… युवा पत्रकार, जो करियर भी न संवार सका था. पीछे पत्नी और दो बेटियाँ… समस्या और भी थी- इनके पास न स्थायी नौकरी थी… न राज्य मुख्यालय की मान्यता… न पीएफ… न फंड… न ठेके-पट्टे-ट्रांसफर-दलाली का अनुभव… न बड़े भाइयों/बड़े पत्रकारों पर विश्वास… क्योंकि जो अपने साथियों के लिए कुछ नहीं कर पाए या कुछ नहीं करना चाहा तो ये कैसे उम्मीद लगाते…. उस समय स्वर्गीय Surendra Singh का उदाहरण इनके सामने था, जिनके लिए हम सब अति वरिष्ठ पत्रकार अब तक कुछ नहीं कर पायें हैं… खैर…

दोनों दोस्तों ने समझ लिया कि उनका एक साथी चला गया है, उसके परिवार पर बहुत बड़ा पहाड़ टूट गया है. सबने तमाम अपने दोस्तों से चर्चा की, चन्दा इकठ्ठा किया और अपने एक साथी के परिवार को तत्काल एक लाख रूपये की मदद उपलब्ध करवायी… इनकी पहुँच मुख्यमंत्री तक नहीं थी तो इन्होंने अपनी वेदना डीएम राज शेखर और एसएसपी राजेश पांडेय तक पहुंचाई. सोचिये कि हम पत्रकार बड़ी-बड़ी डींगे हांक कर जिन अफसरों को गाली देते हैं लेकिन अपने ही साथियों के दर्द में नहीं खड़े होते है… उन्हीं अफसरों ने हमसे इतर इन मेहनतकश पत्रकारों के लिए अपना हाथ बढ़ाया… स्वर्गीय संतोष के दोनों बच्चे प्रमुख स्कूलों में पढ़ते हैं, ऐसी स्थिति में उनके लिए फीस का इंतजाम किया गया… जिलाधिकारी ने प्रयास कर दोनों बच्चियों की इंटर तक की फीस स्कूल प्रबंधन से अनुरोध कर माफ़ करा दी… फिर स्वयं के प्रयासों से ढाई लाख रूपये की सहायता परिवार को उपलब्ध करवाई…

इसी तरह एसएसपी राजेश पांडेय जी ने भी प्रयास कर तकरीबन ढाई लाख रूपये परिवार को दिलवाए. ये बच्चे यहीं न थमे… इन्होंने और इनके साथियों ने प्रयास जारी रखा… जिन अफसरों और नेताओं को जानते थे उनसे गुजारिश करते रहे और सफलता पायी… अपने मरहूम दोस्त को मुख्यमंत्री से बीस लाख रूपये की सहायता दिलाने में सफल हुए… इनकी कोशिशें यहीं नहीं थमी हैं. नीरज कहता है कि हमारा साथी था, ऐसे कैसे उसके परिवार को अकेला छोड़ दें… मुकेश कहता है कि हमारे प्रयास अभी ख़त्म नहीं हुए हैं. कोशिश कर रहे हैं कि उसकी पत्नी को सरकारी नौकरी मिल जाए. मैंने आज पूछ लिया कि किसी पत्रकार संगठन या गुट की मदद नहीं ली.. तो बोला- छोड़िये न सर, सब बड़े भाई हैं… लेकिन मुझे पता है, उसने कहा इसलिए नहीं क्योंकि ये जानते थे कि अगर बड़े भाइयों से कहेंगे तो वो केवल रायता फैलाएंगे और वैसी ही “मदद” करेंगे, जैसी अपने साथियों की करते हैं…

यह किस्सा इस लिख रहा हूं कि मैंने कल एक और धरना देख लिया…. राज्यपाल के साथ तस्वीरें देखीं और एक विज्ञप्ति भी देखी… जिसमें “दिल्ली और पूरे भारत” में पत्रकारों पर हमले की चिंता थी… पहले बताया गया कि धरना दिल्ली में पत्रकारों पर हमले के विरोध में है…. पर जब भाई Shalabh Mani Tripathi, भाई Gyanendra Shukla, भाई Rajendra Kumar और कुछ साथियों ने मुद्दा उठाया कि यूपी में पत्रकारों के लिए क्या सब मीठा-मीठा हो गया है? तो दुबारा भेजे गए मैसेज में यूपी की घटनाओं को भी जोड़ दिया गया… बहुत अच्छा किया… लेकिन ये तो अन्याय है कि हम अब तक अपने लखनऊ के साथियों के लिए कुछ कर नहीं पाए हैं और दिल्ली के लिए धरना दे रहे हैं…. और फिर टीवी पत्रकारों के हमले के विरोध में धरने की जो तस्वीरें फेसबुक और वाट्सएप पर नज़र आयीं, उसमें लखनऊ के टीवी पत्रकार दिख ही नहीं रहे थे…

दरअसल अब तो ये हाल है कि पत्रकारों की कुछ भी एक्टिविटी होती है तो आम पत्रकार पूछते हैं कि किस गुट की तरफ से है… Kumar Sauvir, आनंद सिन्हा, Rajendra Kumar, Mohd Kamran और नावेद शिकोह जैसे लोग पत्रकारों की राजनीति पर सवाल उठाते हैं तो पूछा जाता है कि किस गुट की तरफ से बोल रहे हैं… लेकिन दोनों गुट इन सवाल पूछने वालों तो नहीं बनाए हैं? गुटों से ज्यादा अच्छे तो Jitendra Shukla साबित हुए हैं, जो कम से कम कुछ चन्दा इकठ्ठा कर साथियों के मदद करते हैं. दो गुटों का मैंने तब भी विरोध किया था और आज भी करता हूँ… तब किसी ने मुझे Pranshu Mishra गुट का बताया तो किसी ने हेमंत तिवारी भाई के गुट के होने का आरोप मढ़ दिया….

लेकिन सच्चाई ये है कि जितने अच्छे मित्र मेरे प्रांशु हैं, उतना ही सम्मान मैं हेमंत जी का भी करता हूं… कल जो धरने में थे उनमे भी कई बड़े भाई और साथी हैं… लेकिन हमें हासिल क्या हुआ? अगर कुछ हासिल हुआ तो आम पत्रकारों को भी बता दिया जाए… वरना हमें अपने छोटी भाइयों से सीखना चाहिए, जिन्होंने किसी की आलोचना किये बगैर अपने दोस्त की मदद की… हम में से किसी ने तो सुरेन्द्र सिंह, केडी शुक्ला के साथ चाय पी होगी… कभी तो ये हमारे सुख-दुःख में खड़े हुए होंगे… अगर दिल्ली के पत्रकारों के लिए हम इतना कर सकते हैं तो जिनके साथ उठे-बैठे उनके लिए तो कुछ करें…. साथियों और बड़े भाइयों बात बुरी लगी हो तो माफी… छोटे भाइयों को एक बार फिर मेरा सलाम…

खबर थी गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ…

लेखक नवल कान्त सिन्हा से संपर्क navalkant@gmail.com या +91 9415409234 के जरिए किया जा सकता है.


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प्रांशु मिश्रा जी, आपके धमकियाने का अंदाज़ भी निराला है!

”…Holi tak Sehat aur Iradon ka dhyan rakhiye… …Is season main bimar hoten hain to lumba jhelena padta hai…”

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति पार्ट 2 के अध्यक्ष प्रांशु मिश्रा के नाम खुला पत्र….

दुनिया भर में मनाया गया प्यार का दिन कहे जाने वाला दिन वैलेंटाइन डे. ऐसे में आपकी धमकियाना का जवाब तो प्यार ही होगा…आप चाहे जान ले लो या लंबा झिला दो लेकिन बदलता मौसम भी ये कह रहा है चलो नफरतो को हम भुला दे…

तेरा रुतबा, तेरा ओहदा तेरी कुर्सी  का गुरूर ..
मेरी हिम्मत, मेरा जज्बा मेरे मेकसद का सुरूर…

चलो हम अपनी जिदे भुला दे, चलो तुम अपना घमंड मिटा दो…हम अपना सिर झुका दे तुम अपना रुतबा बढ़ा लो …

समाचार पत्र और टीवी चैनल की ख़बरों में धमकियानो की ख़बरों को सुनकर देखकर कितने दिनों से यही तमन्ना थी काश मुझे भी कभी कोई धमकी दे। आख़िरकार वो दिन आ ही गया, हालाँकि इसका अहसास मुझे हो गया था लेकिन मेरी ख्वाइश को भाई प्रांशु मिश्रा की झल्लाहट ने पूरा कर दिया । मौसम का भी बदलाव था और प्रांशु मिश्रा की बौखलाहट ने उनकी मानसिकता को whatsapp group पर धमकी का रूप अख्तियार करा ही दिया। धमकी क्या दिया धमकी देकर, किया अपना ही खुलासा क्योंकि सबको पता हैं आजकल कौन है इनका आका । अरे शर्म करों नेताजी, आपकी महत्वकांछाओं ने आपकी आँखों का पानी भी मार दिया है।

ये तो देख लो किसको धमकिया रहे हों। हम भी औरों के तरह आपको 100 रूपये देकर आपकी समिति के सदस्य बने और आपको ही वोट देकर अध्यक्ष बनाया, इसका ये मतलब तो नहीं की हम आपसे सवाल भी नही कर सकते, सवाल व्यक्तिगत हो तो जवाब न दीजिये लेकिन सवाल पत्रकारों के हितों में हो तो जवाब देना होगा। आप तो स्वयं पत्रकार हैं, मुख्यमंत्री से भी सवाल करते हैं तो आज क्यों भाग रहे है, क्यों भगा रहें हैं, क्यों धमकिया रहें है । धमकी की ख्वाइश तो मेरी थी लेकिन जब पूरी हुई तो डरना भी स्वाभाविक था और धमकी देने वाला भी कोई कमज़ूर नही था, पढ़ा लिखा बुद्धिजीवी वर्ग से ताल्लुक रखने वाला था जो अपनी बुद्धि से जान माल के आलावा भी मुझे नुक्सान पंहुचा सकता था । अभी अपनेआप को हिम्मत दे ही पाया था की सुल्तानपुर में पत्रकार की निर्मम हत्या का समाचार ने और डरा दिया लेकिन आभार आप सभी भाई बंधू पत्रकार साथियों का जिन्होंने मुझे इन विषम परिस्थितयों में फिर से साहस बंधाया। आपकी धमकियाना दहशत से बहार आने पर यही सवाल था क्यों, ऐसा क्या हुआ , हम तो आपकी प्रशंसा कर रहे थे, जब हमने बात उठाई तो आपको ये डर कही आपको इसका क्रेडिट न मिला तो क्या होगा, जब हमने आपके प्रयासों की सराहना की तो आप धमकियाने लगे।

प्रेस क्लब की सदस्यता केवल एक मुद्दा ही नहीं जो आपकी पोल खोलता है ऐसे अनेक मुद्दे है जिनसे आप भागते नज़र आ रहे है । पत्रकार नावेद के सवालों से आप भाग रहे है । प्रेस क्लब की सदस्यता के मामले में आप जो प्रशंसा और प्रशस्ति पत्र बटोर रहे है उसकी सच्चाई कही खुल न जाये ये उसकी बौखलाहट है। प्रेस क्लब जिसका सञ्चालन UPWJ करता है जो IFWJ की प्रदेश इकाईं है उस पर दबाव बनाकर आप बैंगलोर अधिवेशन में अपने साथियों को IFWJ के पदों पर बैठने की बिसात तो बिछा ही चुके हैं। आपको और आपके साथियों को बधाई । प्रेस क्लब की सदस्यता का आप द्वारा कोई मांग पत्र भी प्रेस क्लब के अध्यक्ष या सचिव को नही दिया गया है जबकि इसके विपरीत वरिष्ठ पत्रकार दीपक गिडवानी शरत प्रधान से प्रशंसा पत्र बटोर लिए, समाचार पत्रों में अपनी प्रशंसा छपवायी और सोशल मीडिया पर वाह वाही भी करा ली और बैंगलोर तक प्रचार भी किया। खुश हो जाइये भाई लोग, खुल सकते हैं प्रेस क्लब के दरवाज़े, दिल को बहलाने के लिए ये ख्याल अच्छा है।

सवाल बहुत थे, बातें बहुत थी और आपकी गीदड़ भमकियों का ज़्यादा देर तक मुझपर असर भी नही होने वाला था लेकिन परिवार के साथ साथ घर की ज़िम्मेदारियों ने कहीं न कहीं मेरी क्रांतिकारी विचारधाराओं को ठहराव दे दिया और टकराहट से दूर कर दिया है । थोड़ी देर के लिए ही सही अगर आपकी बातों को सच मान लिया जाये तो होली से पहले मुझे लंबा झेलना पड़ सकता है । कौन झेलना चाहेगा होली मना लेने दीजिये तब तक आप को यदि मेरे कोई अलफ़ाज़ या मेरी बात अनुचित लगी हों तो उसके लिए मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूँ । आपसे निवेदन हैं आप मुझे माफ़ कर दें और होली मनाने दीजिये और गुझिया खिला कर गले से लगाइये । आप तरक़्क़ी करें –आज आप प्रदेश के पत्रकारों के नेता है कल IFWJ के नेता बनकर पूरे भारत के पत्रकारों के नेता बने यही दुआ है मेरी।

क्या खूब कहा है…

तुम करोगे याद एक दिन इस प्यार के ज़माने को…
चले जायेंगे जब हम कभी न वापस आने को…
करेगा महफ़िल में जब ज़िक्र हमारा कोई …
तो तुम भी तन्हाई ढूँढोगे आंसूं बहाने को …

आपका भाई
मोहम्मद कामरान
पत्रकार, लखनऊ
indiankamran@gmail.com

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उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र के नाम नवेद शिकोह का खुला पत्र

…. आँखों से आँखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम

भाई प्रांशु मिश्र

आपको पत्र लिखते वक्त मुझे अपनी एक गजल की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी :-

चाँद-तारों को जमी पर कैसे ला पाओगे तुम,
जुगनुओ को रौशनी में कैसे चमकाओगे तुम।
या हया अपनाओ या फिय बेहया हो जाओ तुम,
आँखों से आँखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम?

इसका आशय ये है कि आप सच या झूठ, सही या गलत, दोस्ती या दुश्मनी, बेईमानी या ईमानदारी, विरोध या समर्थन, दो में से किसी एक को ही अपना सकते हैं। यदि आप तानाशाही और भ्रष्टाचार की व्यवस्था का हिस्सा बन जाते है तो फिर आपको इसका विरोध करने का हक कहा रह जायेगा। फिर तो आप ऐसी व्यवस्था के समर्थक ही कहे जाओगे।

आमतौर से जब कोई चुनाव जीतता है तो उसके चाहने वालों को खुशी होती है। पर आपको ifwj में निर्विरोध राष्ट्रीय पार्षद चुने जाने से आपके चाहने वाले दुखी हैं।

बच्चा-बच्चा जानता है कि ये चुनाव पूरी तरह से अवैध था। असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक था। क्या आप IFWJ की काजल की कोठरी मे रहकर अपनी बेदाग छवि बचा पायेगे ? या फिर इस पद को अस्वीकार कर यहाँ की अनियमितताओ के खिलाफ जंग छेड़कर पत्रकारों के बीच बने भरोसे को कायम रखेंगे ? बीच का कोई रास्ता नहीं है। आपको कोई एक रुख अपनाना होगा।

उतर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में बहुत उम्मीद के साथ सैकड़ों पत्रकारों ने आपको अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी थी। पत्रकार संगठनो और उसके नेताओ की तानाशाही आपका चुनावी मुद्दा था । आप साफ-सुथरी छवि वाले नयी पीढ़ी के जिन्दा पत्रकार है।

( जिन्दा पत्रकार का आशय है-ऐसा वर्किग जर्नलिस्टस जिसकी मीडिया में एक ग्राउंड हो, जिसके बैनर को लोग जानते हो,, देखते हो/ पढते हो। जो अपनी खबरों के जरिये हजारो- लाखो या करोड़ों लोगों से जुड़ा हो। जबकि पत्रकारों की राजनीति/ संगठनों में ऐसे 90% मुर्दा पत्रकार शामिल होते है जिनकी पत्रकारिता की कोई बैक ग्राउंड ही नहीं। न वो लिखते हैं और न ही पढ़ते है और उनका फर्जी मीङिया बैनर महज कागजो की खानापूर्ति और भ्रष्टाचार पर आधारित होते है। या फिर वो जिन्होंने तीस- पैतीस साल पहले भले ही तीन-चार साल ही पत्रकारिता की हो, पर तीस-बत्तीस साल से अति सीनियर पत्रकार के तौर पर सिर्फ पत्रकारों की राजनीतिक ही से ही अपनी रोजी-रोटी चलाते है। ऐसे पत्रकारो को भी मै मुर्दा पत्रकार कहता हूँ। )

पत्रकार संगठनों के नाम पर पत्रकारिता की छवि धूमिल करने वालों को बेनकाब करने करने की चुनौती आपके चुनावी मुद्दों में शामिल थी। चुनाव के समय GBM में पत्रकारों ने बरसो से चली आ रही upwju/ प्रेस क्लब की अनियमितताओ और इसमें सुधार लाने का मुद्दा उठाया था। upwju/ प्रेस क्लब से आहत पत्रकारों को भरोसा था कि आप उनी उम्मीदो पर खरे उतरेगे । चुनाव जीतने के बाद upwju की अनियमितताओ को लेकर यहाँ के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी साहब को आपने खुला पत्र भी लिखा। ये पत्र खूब चर्चा मे रहा। हर पत्रकार तक पहुँचा। लोग खुश थे- चलो अब बरसों-बरस की – पीढियो पुरानी इस समस्या/ तानाशाही/ कब्जा/ भ्रष्टाचार के खिलाफ पहली बार किसी युवा पत्रकार नेता ने शंखनाद कर दिया। पत्रकारों की इस उम्मीद की रौशनी का ये चिराग ठीक से रौशन भी नही हुआ था कि आपकी किसी ख्वाहिश की हवा से बुझता हुआ दिखाई देने लगा। पीढ़ियों की कुव्यवस्था, तानाशाही, झूठ-फरेब और लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुलेआम मजाक बनाने वाले चुनाव में आप निर्विरोध चुन लिये गये। आप जाने-पहचाने पत्रकार और राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के नेता है। upwju के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी साहब को लिखे गये पत्र से ज्ञात हुआ था कि आप upwju और प्रेस क्लब के कारनामो से भी भलीभाँति अवगत है। फिर भी आपको ये तक नहीं पता चला कि जिस चुनाव में आपको निर्विरोध चुना गया है वो चुनाव असंवैधानिक है, अलोकतांत्रिक हैं, लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक है। झूठ है, छल है, धोखाधड़ी है, फरेब है, आँखों में धूल झोकना जैसा है। ये कैसे हो सकता है कि आपको ये सब पता न हो। और अगर मालुम था तो ऐसे चुनावो का विरोध करने के बजाय सत्य की लड़ायी लड़ने वाला, ईमानदार और साफसुथरी छवि वाला कोई पत्रकार कथित तौर पर किसी निर्विरोध पद को क्यों और कैसे स्वीकार कर सकता है।

क्या दुनिया का कोई ऐसा चुनाव हो सकता है जिसमे वोटरो/ नामांकन करने की इच्छा रखने वालों ( upwju के सदस्यों ) को चुनाव की कोई खबर ही नही दी गयी।

जायज और संवैधानिक चुनाव के लिये अति आवश्यक नियमो के तहत क्या चुनाव से पहले कोई अधिसूचना चस्पा की गयी ? क्या ये अवगत कराया गया कि ifwj का कौन सदस्य चुनाव मे सम्मिलित हो सकता है और कौन नही। देर से फीस जमा करने वाले वोट नही दे सकते थे। चुनाव नही लड़ सकते थे। किसी प्रत्याशी के प्रस्तावक भी नही बन सकते थे। ये अति आवश्यक बाते आम सदस्यो से क्यो छिपायी गयी ? क्या आप बता सकते है कि ifwj के चुनाव के लिये upwju के सदस्यो को किस माध्यम से ( ई मेल, वाट्सअप, फोन, एस एम एस, चिट्ठी, मौखिक, डू टू डोर या डुगडुगी के माध्यम से ) चुनाव होने की सूचना दी गयी थी। मेरी जानकारी मे तो किसी को किसी रूप से भी कोई भी जानकारी नही दी गयी। अपने गोल के लोगो ने ही मिलजुल कर फर्जी चुनाव का नतीजा घोषित कर दिया।

चंद लोग ही जो इनके गोल के नही है इन्हे अन्दर से किसी तरह चुनाव की खबर मिल गयी तो वे पर्चा भर पाये।

मैने करीब 90% upwju के सदस्यो ( वोटरो ) से बात की।सबका कहना था कि उनको किसी प्रकार से भी किसी चुनाव की कोई भी सूचना नही दी गयी। यहाँ तक कि प्रेस क्लब मे ऐसी कोई सूचना चस्पा तक नही की गयी।

अब आप ही बताइये। क्या बिना-दूल्हा दुल्हन को बताये हम उनकी शादी रचा सकते है।

क्या ऐसा संभव है कि पिता को पता न हो और संतान पैदा हो जाये?

क्या किसी मारुफ अखबार ने आईएफडब्लूजे के कथित चुनाव की खबर छापी ? इतने बड़े संगठन का यूपी के बड़े शहरों आगरा कानपुर इलाहाबाद गोरखपुर मेरठ में नामलेवा तक क्यो नहीं?

चुनाव न हो इसलिए लखनऊ में ९ का कोटा था मगर १८ पार्षद चुन डाले। यूपी के तमाम जिले से एक भी नहीं।

यह कैसे हो सकता है कि बीते २६ साल से अध्यक्ष पद के लिए कोई नामांकन ही नही करता है?

क्या ३० सालों में यूपी के आधे से भी कम यानी ३० जिलों में इतने सदस्य भी न बना पाए कि हर जिले से दो दो राष्ट्रीय पार्षद चुन कर आ सकें। क्या यही नेतृत्व की काबिलियत है।

सबसे अहम बात यह कि क्या हसीब साहेब के नेतृत्व वाली यूपीडब्लूजे कानपुर ट्रेड यूनियन कार्यालय से पंजीकृत हैं। अगर है तो उसके कागज सार्वजनिक किए जाएं। वरना दुकान बंद की जाए।

कभी पता किया कि कितने सदस्यों को श्रमजीवी पत्रिका मिलती है?

चुनाव के ये नियम कब और किसकी सहमति से बनाए गए। क्या इन नियमों को वर्किंग कमेटी ने पारित किया था। कौन चुनाव अधिकारी है और क्या वर्किंग कमेटी ने उसे बहुमत से नियुक्त किया था।अगर किया था तो वह मिनट सार्वजनिक किए जाएं। चुनाव अधिकारी कब संगठन का सदस्य बना और उसे किस आधार पर किसकी मरज़ी से इतना बड़ा काम सौपा गया।

प्रांशु भाई आप अक्सर दिखाई देते है। आपसे मुलाकात भी होती है। आप मिलनसार हैं, व्यवहारिक है। पत्रकारों के दुख- दर्द और समस्याओं पर नजर आते है आप। ये तमाम बातें और सवाल आप से मिलकर भी कर सकता था। लेकिन ये शिकायतें/सवाल/जिज्ञासाये/ फरियादे सिर्फ मेरी नही सैकड़ों पत्रकारों की हैं। ये सिर्फ मेरा पत्र नही पूरे पत्रकार बिरादरी के मन की बाते है। इसलिये इन बातो को पत्रकारों के वाट्सअप ग्रुपस और फेसबुक के माध्यम से आपको प्रेषित कर रहा हूं। ताकि पत्रकारों के बीच पारदर्शिता बनी रहे। और तमाम पत्रकार इस गुफ्तुगु के गवाह बने।

जवाब जरूर दीजियेगा। सैकड़ों पत्रकार आपके जवाब और आपके फैसले का इन्तजार करेंगे।

धन्यवाद आपका
नवेद शिकोह
(सिर्फ एक साधारण पत्रकार)
लखनऊ

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प्रेस क्लब सारे पत्रकारों के लिए खोलने के प्रस्ताव का दीपक गिडवानी ने स्वागत किया

That’s a good initiative, something i have been fighting for, for a long time. After a sustained effort and a major struggle, we had managed to get temporary membership for 18 journalists. But even these members have not been made permanent members. The fear of those wielding power at UP Press Club (for indefinite terms) is that news members might tip the balance against the ‘thekedaars’ in the next Club election (whenever that happens!)

We will have to continue the pressure for opening up membership, though within the rules and norms of the Press Club.  There is no harm in or objection to the membership applications being screened by the Club’s screening committee. The point is that the applications should either be accepted or rejected (giving a valid reason). This state of limbo suits the powers-that-be but is totally unjustified and unacceptable, and needs to be condemned in the stongest terms.

We journalist who raise such a hue and cry about freedom of expression and democratic norms become a laughing stock when we ourselves make a mockery of elections and tenure of elected representatives within our fraternity, occupying  our seats and positions for years beyond our fixed term, deliberately or due to the power lust of others. Hope this renewed initiative bears fruit.

Best etc…

Deepak Gidwani
Lucknow
09838007255


मूल खबर :

OPEN PRESS CLUB FOR ALL JOURNALISTS

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OPEN PRESS CLUB FOR ALL JOURNALISTS

Lucknow, 11 February 2016 : The UP State Accredited correspondent committee has passed a resolution demanding Opening of doors of the UP Press Club, for all accredited and other working journalists. In the meeting of the Correspondent committee held at Press room of Vidhan Bhawan and presided by its President Pranshu Mishra, a resolution to this regard was moved by Senior journalist and member of the executive committee Mr Kazim Raza.

Mr Raza in his proposal said that a lot of journalists have a strong connect with the UP Press Club. Most of the accredited correspondents as well as non accredited ones working both in field or desk often visit the press club either due to professional reasons or else personal ones.

The UP Press Club has a glorious past in the struggle of journalist movement and freedom of speech and expression. Therefore every journalist feels proud to be associated with its legacy. For the past many years journalists have a genuine complaint that despite fulfilling the requisite qualification they have not been granted membership of the press club.

Hence it’s high time that all those accredited and non accredited journalists who are desirous of the membership of the press club and meet the prescribed criteria should be given the membership as per the By laws of the club. Member of the UPSACC’s executive committee Shri Deepak Gidwani and Shri Mudit Mathur agreed to this demand of democratisation  of the club and Journalistic organisations in general.

The proposal to this effect was passed unanimously by all present in the meeting including Vice president of the UPSACC Shri Narendra srivastava, Secretary Neeraj Srivastava, Joint secretary  Ajay srivastava, Members Abhishek Ranjan, Kashi Yadav, Juber Ahmad,, Ashish Srivastava, Faizal Fareed and others. The meeting authorised the UPSACC president Pranshu Mishra to communicate these feelings as expressed in the resolution to the President of the UP Press club to take necessary steps to pacify the resentment among the journalists.

Regards
Neeraj Srivsatava
secretary
UPSACC‎

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मैं यादव सिंह से ना तो कभी मिला और ना ही देखा : नवनीत सहगल

भड़ास4मीडिया के पास लखनऊ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका दृष्टांत के संपादक अनूप गुप्ता का एक मेल आया है जिसमें दावा किया गया है कि सीबीआई के समक्ष यादव सिंह की गवाही से यूपी के सीनियर ब्यूरोक्रेट नवनीत सहगल के भ्रष्टाचार पर से पूरी तरह से पर्दा उठ जाएगा. श्री गुप्ता का कहना है कि इस काम में राष्ट्रीय हिन्दी समाचार पत्रिका दृष्‍टांत की तरफ से शीघ्र ही समस्त दस्तावेजों के साथ नवनीत सहगल के खिलाफ एक चौंकाने वाला खुलासा किया जाएगा.

अनूप गुप्ता ने अपने लंबे आलेख में दावा किया है कि समाजवादी पार्टी के शीर्ष स्तम्भों से सीधा ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर इन चीफ यादव सिंह की गिरफ्तारी के बाद आईएएस नवनीत सहगल और सलाखों के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है. आगे अनूप गुप्ता ने लिखा है- ”मैं विश्वास दिलाता हूं कि इस नौकरशाह पर शिकंजा कसते ही अरबों नहीं बल्कि खरबों के भ्रष्‍टाचार और काले धन का खुलासा सबके सामने होगा. जल्द ही नवनीत सहगल और बसपा सुप्रीमो मायावती के भाई आनन्द के बीच गुप्त तालमेल का भी खुलासा ‘दृष्टांत’ में किया जायेगा. इस खुलासे से न सिर्फ सूबे की जनता की आंखें खुली की खुली रह जायेंगी बल्कि सूबे की सत्ता भी हिलने पर विवश हो जायेगी”

इन आरोपों पर आईएएस नवनीत सहगल ने भड़ास4मीडिया को भेजे अपने लिखित जवाब में कहा है कि वे यादव सिंह से कभी नहीं मिले और न ही उन्हें देखा है. वे पिछले चार सालों से और पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान कभी यादव सिंह से नहीं मिले. उन्होंने सभी आरोपों को मूर्खतापूर्ण और मानहानि कारक करार दिया. साथ ही अनूप गुप्ता के चाल चलन पर सवाल उठाते हुए उनके द्वारा सैकड़ों बार फोन किए जाने और कई किस्म की धोखाधड़ी किए जाने के बारे में उल्लेख किया. नवनीत सहगल का पूरा जवाब इस तरह है:

”This is nonsense and defamatory. Sh Anoop gupta has a sick mind and is a fraud. He did a fraud with the information department of UP, for which a Criminal case has been filed against him and which is under investigation in Police Station at Hazratgunl Lucknow. I have personally filed a criminal defamation case against him, in which a non bailable warrants were issued against him, he has now filed a false medical certificate in the court that he is seriously ill, while he has been travelling and roaming around, this fact has been brought to the notice of the hon,ble Court. A senior journalist Sh. Sharad Pradhan (9415016288) has also filed a defamation case against him which is pending in the court. Around 75 prominent journalists of Lucknow had complained against him for his blackmailing activities and non journalist activities/ which is being investigated by the STF. He had filed a PIL in the mentioned case, which was dismissed by the Hon”ble High Court at Lucknow and thereafter he had also filed a appeal in the hon”ble Supreme Court, which when was being dismissed, then he himself withdrew the case. He had made more than 300 calls on my phone asking for favours, details of which have been filed in the court. For the above mail also, I will file a defamation CASE IN THE COURT OF LAW AS I have nothing to do with Mr Yadav singh, I have never seen him or met him in the past Four years and during the last government also, I had nothing to do with him. mr. anoop gupta’s ideas are flight of his fancy, imagination and baseless and totally false and defamatory.”

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Upwju में अंधेरगर्दी : मुतावल्ली बन कर फ्री की बिरयानी खाने वाले नमाज ही नहीं पढते

मुतावल्ली बन कर फ्री की बिरयानी खाने वाले नमाज ही नहीं पढते. इसका आशय ये है कि पुजारी दक्षिणा तो खूब ले और पूजा ही नहीं करे. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन आखिर है क्या? इसको समझो-जानो। इसके बाद इसकी लोकल इकाइ से जुड़ो। upwju (उत्तर प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन) के प्रदेश अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने किसी से ये नसीहत की और बस सिद्दीकी साहब की इस सलाह पर वो शख्स upwju को जानने समझने मे जुट गया। उस शख्स को इससे पहले तो बस ये पता था कि रोज दस्तरखान की मुफ्त में बिरयानी खाने का मतलब है upwju। इतनी सी जानकारी को मैंने आगे बढ़ाते हुए बताया- upwju का मतलब ऐसी elected body जिसमें चुनाव के अजब-गजब करिश्मे हैं। मसलन जो जीत गया वो फिर कभी हार नहीं सकता। अपनी कुर्सी के साथ वो अजेय हो जाता है और उसका ओहदा अमर।

इसके ओहदेदार बीस-तीस तीस साल से अपनी-अपनी कुर्सियों से चिपके हुए हैं। upwju में इस परम्परा को चलाने की भी बखूबी कोशिश की जाती है कि इसके वोटर आदिकाल (मतलब पुराने से पुराने) के हों। आम चुनाव में जनरल बाडी को सूचित ही नहीं किया जाता है। अपना गोल ही चुनाव लड़ता भी है और चुनाव का वोटर भी सिर्फ वही होता है। इस तरह की अनियमितताओं की इतनी लम्बी और इतनी मजाहिया फेरिस्त है कि लिखता चलूं तो पूरी novel हो जाये। अगर चंद बातों के साथ upwju की चर्चा खत्म करनी है तो इसकी जायज, अच्छी और सराहनीय गतिविधियों का जिक्र करें। मसलन एक मई को मजदूर दिवस का आयोजन। दूसरा- किसी वरिष्ठ पत्रकार या यूनियन लीडर के देहांत पर शोक सभा।

खैर, हसीब सिद्दीकी साहब की नसीहत लेकर वो शख्स जब मेरे पास आया तो मैंने अपने नजरिये से upwju का मतलब समझाया- किसी ट्रेड यूनियन का सबसे खास, सबसे जरूरी और सबसे अहम मकसद ये है कि श्रमजीवी मजदूर, कर्मचारी या पत्रकार इत्यादि का हक ना छीना जाये। उनके काम यानि नौकरी और वेतन और सुरक्षा का हनन न हो। उद्योगपतियो, पूँजीपतियों, मालिक, मैनेजमैन्ट और सरकार इत्यादि द्वारा कर्मचारियों के शोषण के खिलाफ लड़ने और कर्मचारियों को उनका हक दिलवाने के लिये ट्रेड यूनियनों का जन्म हुआ करता है।

मैं बताता चलूं की मै 20-22 सालों से लखनऊ के तकरीबन 9 जाने-पहचाने मीङिया समूहों के सम्पादकीय विभाग में लोकल रिपोर्टर से लेकर लोकल इन्चार्ज, ब्यूरो रिपोर्टर, ब्यूरो चीफ, न्यूज एडिटर से लेकर एडीटर के पदों पर रहा। इस दौरान तमाम अखबारों-न्यूज चैनलों में पत्रकारों के शोषण, वेतन न मिलने के दर्दनाक वाकियों को बहुत करीब से देखा, महसूस किया। अपने कैरियर के शुरुआती दो-चार सालों के दरमियान ही 1998 यानी 19 साल पहले स्वतंत्र भारत अखबार के कर्मचारी आन्दोलन में मैं खुद शरीक था।

इतने तजुरबों के आधार पर दावे के साथ कह रहा हूँ कि upwju ने किसी भी पत्रकार के शोषण के खिलाफ कोई लड़ाई नहीं लड़ी जबकि किसी भी ट्रेड यूनियन के अस्तित्व का मकसद ही उस क्षेत्र के कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ना ही है। आजकल न जाने कैसे-कैसे लोग अखबार-चैनल शुरू करते हैं। उसमे पत्रकारों की भर्तियाँ होती हैं। दो-चार महीने वेतन मिलने के बाद वेतन मिलना बंद हो जाता है। आज-कल, आज-कल …और तारीख पर तारीख… के इन्तजार में लम्बा वेतन बकाया हो जाता है। फिर मालिक या मैनेजमेंट भुक्तभोगी पत्रकारों से कहता है कि अखबार/चैनल के नाम पर वसूली करो-ब्लैकमेलिँग करो और अपनी तनख्वाह निकालो।

लखनऊ में ये हालत बरसों से चल रहे है। श्रीटाइम्स और अन्य कई संस्थनों से जुड़े पीड़ित पत्रकार भुक्तभोगी पत्रकार मुझे बताता है/ पूछते हैं – इतने महीने से वेतन नहीं मिला…… इतने महीने से बकाया वेतन देने का झूठा वादा किया जा रहा है। डीएम आफिस में कहाँ किससे शिकायत करें। क्या वेतन की माँग को लेकर कोर्ट जा सकते हैं? क्या प्रेस काउन्सिल हमारी कुछ मदद करेगी? आरएनआई / डीएवीपी में शिकायत करने से कुछ हासिल होगा। लेबर कोर्ट में वेतन न मिलने की शिकायत लेकर गये थे। वहाँ से नोटिस भी भेजा गया, फिर भी अभी तक बकाया तन्खवाह नहीं मिली।

आज की पत्रकारिता के जंगलो मे भटकते सैकड़ों युवा पत्रकारों में से किसी की भी कभी भी upwju ने क्या कोई मदद की? ऐसे हालात में ये पत्रकार कहाँ जायें, क्या करें। अपने कैरियर के 4-6 वर्षों मे ही ये पत्रकार निराश हो जाते हैं। भटक रहे हैं। कहां जायें? इनके पास तो मलाईदार upwju का आफिस/कुर्सी/ ओहदा भी नहीं है जिसकी मुजाविरी करें। नमाज पढ़े नही और मुतावल्ली बन कर खैरात बटोरें। हर रोज फ्री की बिरयानी सूतें।

खैर, जिस शख्स को हसीब सिद्दीकी साहब ने upwju के बारे में जानने समझने की नसीहत दी थी उस शख्स को मैंने भी एक सलाह दे डाली। कहा लखनऊ के शोषित-पीड़ित और बकाया वेतन वाले पत्रकारों को upwju के हसीब सिद्दीकी साहब के पास ले जाया करो और बताओ की upwju के बारे में इतना जान गया हूं कि जो आप भूल रहे, वो भी आपको समझा दूँ। आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं, जिस ओहदे पर काबिज हैं, उसकी पहली और आखिरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी ये है कि मालिक, सरकार या मैनेजमेन्ट किसी श्रमजीवी पत्रकार का हक न मारे, शोषण न करे, वेतन न रोके।

हसीब साहब, आपके लिये सलाह है कि किसी ट्रेड यूनियन वर्कर की तरह अब कुछ काम भी करिये। बाहर निकलये। वेतन ना देने वाले मालिकों/मैनेजमेंट से मिलिये, उन पर दबाव बनाइये। मौजूदा हालात के मारे मीडिया कर्मचारियों को लेकर लेबर कोर्ट जाईये। बकाया वेतन के लिये दर दर भटक रहे सैकड़ों पत्रकारों की कानूनी लड़ाई लड़िये। उन्हें उनका हक दिलवाने के लिये सड़कों पर उतरिये। ये सब जरूरी इसलिये है कि बिरयानी खाने वाले कुर्सी पर बैठे रहेंगे तो बिरयानी हजम कैसे होगी।

लेखक नावेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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‘नया लक्ष्य’ अखिलेश के हाथों लांच कराने वाले संजय ने लखनऊ के पत्रकारों को दिखाया उद्यमिता और सफलता का चरम लक्ष्य

शानदार, शानदार और शानदार… ‘नया लक्ष्य’ और संजय शर्मा के लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है. लखनऊ की पत्रकारिता में संजय ने वो मुकाम हासिल कर लिया है जहां तक पहुँचना असंभव नहीं तो मुश्किल बहुत है. संजय की पत्रकारिता उन लोगों के लिए प्रेरणा जरूर बन सकती है जो अपने दम पर कुछ करना चाहते हैं. दस साल पहले जब संजय ने वीकएंड टाइम्स शुरू किया था तब लोगों ने इसे हलके में लिया था मगर इस साप्तहिक ने देश भर में अपनी अच्छी रिपोर्टिंग से एक ख़ास मुकाम बना लिया. मई में संजय ने अपना अखबार 4PM लॉन्च किया और छह महीने में ही इस अखबार ने लोकप्रियता के वो रिकॉर्ड बना लिए जिसके लिए लोग तरसते हैं.

इस अखबार की हेडिंग और तीखी खबरों ने लखनऊ में उन बड़े अखबारों के पसीने छुड़ा दिए जिनकी सत्ता के खिलाफ लिखने में हवा खराब होती है. यूपी के माध्यमिक शिक्षा मंत्री पंडित सिंह ने जब एक नौजवान को गाली दी तो संजय ने 4PM में वही गालियां छाप कर एक नई बहस को जन्म दे दिया. केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने अपनी साइट पर यह अखबार लगा दिया. इस एक खबर पर 4PM की वेबसाइट पर साढ़े तीन लाख हिट आये जो एक रिकॉर्ड है. यही नहीं, यह खबर वायरल हो गई और फेसबुक पर दो हजार से अधिक लोगों ने इसे शेयर किया.

लखनऊ में सब जानते हैं कि खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ कोई नहीं लिखता मगर संजय के अखबार ने लगातार खनन मंत्री के कारनामों पर खबर लिखी जिससे बौखलाए मंत्री के गुर्गो ने अखबार के हॉकर को पीट दिया. मगर इसके बाद भी 4PM में इसी शैली की खबरें लगातार छपती रहीं और अखबार सुर्ख़ियों में बना रहा. ‘डीजीपी बिकता है बोलो खरीदोगे’ जैसी पहले पेज की ख़बरों ने संजय को बहुत उचाइयां दे दी. लोग हैरान थे कि संजय दो दो अखबार कैसे मैनेज करते हैं तभी संजय ने एक और धमाका कर दिया. उन्होंने ‘पाक्षिक’ प्रतियोगी पत्रिका निकालने का एलान कर दिया. लोग चौंके और उससे भी ज्यादा तब चौंके जब यह पता चला कि इसका विमोचन खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने घर से कर रहे हैं. इस मैगजीन की लॉन्चिंग के लिए संजय ने एक और रिकॉर्ड बना दिया. आज तक किसी अखबार या मैग्जीन के इतने होर्डिंग नहीं लगे जितने संजय ने अपनी इस मैग्जीन के लगा दिए. पूरा लखनऊ इन होर्डिंग से भर गया.

मुख्यमंत्री निवास पर इस तरह की शानदार लॉन्चिंग शायद पहले कभी नहीं हुई होगी. यह पहला मौका था जब मुख्यमंत्री के सामने पत्रकारों ने पत्रकारिता के मुद्दे पर भाषण दिया. नवभारत टाइम्स के संपादक सुधीर मिश्रा, बीबीसी के हेड रहे रामदत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार और न्यूज़ वर्ल्ड के यूपी हेड ज्ञानेन्द्र शुक्ल ने बहुत बढ़िया मुद्दे उठाये. मुख्यमंत्री भी शायद ही किसी कार्यक्रम में इतने खुश नजर आये हों. खुद सीएम ने कहा कि संजय इस पत्रिका की लॉन्चिंग कहीं और करना चाहते थे लेकिन मैंने ही कहा कि मेरे घर से करो. बेहद विनम्र स्वर में मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके घर पर कार्यक्रम है इसलिए वो सबका स्वागत कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि 4PM जब आने का समय होता है तब लंच के बाद उबासी और नींद आती है मगर संजय के अखबार की हेडिंग सबकी नींद उड़ा देती है. जाहिर है आज की तारीख में संजय ने खुद को मीडिया जगत का एक बड़ा ब्रांड बना लिया है.

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कार्यक्रम से संबंधित ढेर सारी तस्वीरें देखने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें>

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन के संपादक अनूप गुप्ता के खिलाफ लखनऊ में नया मुकदमा

(आईएएस नवनीत सहगल और पत्रकार अनूप गुप्ता)


खबर है कि लखनऊ से प्रकाशित क्रांतिकारी मैग्जीन ‘दृष्टांत’ के संपादक अनूप गुप्ता के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करा दिया गया है. यह एफआईआर मैग्जीन के पंजीकरण हेतु फर्जी दस्तावेजों के लगाने से संबंधित है. वहीं अनूप गुप्ता का कहनाा है कि भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट मंत्रियों की पोल लगातार खोलने के कारण उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा निशाना बनाया जा रहा है और दमनात्मक कार्रवाई की जा रही है.

पहले भी फर्जी मुकदमें कराए जा चुके हैं और उन मुकदमों के सिलसिले में कोर्ट जाने पर कोर्ट रूम में हमला कराया जा चुका है. सरकारी मकान का एलाटमेंट निरस्त किया गया. मैग्जीन का टाइटल निरस्त करने हेतु कार्रवाई की गई. अब फिर एक फर्जी मुकदमा किया गया है. अनूप गुप्ता के मुताबिक वे गिरफ्तारी से नहीं डरते लेकिन जिस तरह उनको टारगेट करके परेशान किया जा रहा है और उस पर लखनऊ के पत्रकार व पत्रकार संगठन चुप्पी साधे हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

अनूप गुप्ता ने बताया कि सत्ता का दमन जारी रखते हुए उन पर फर्जी मुकदमा लादते हुए जो एक और हमला किया गया है, यह सब सत्ता के अहंकार में डूबे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक नौकरशाह के इशारे पर हो रहा है. ऐसा उक्त नौकरशाह के काले कारनामों का लगातार खुलासा करने के कारण हो रहा है. अनूप के मुताबिक उक्त नौकरशाह के लूट के लगातार खुलासे जारी रहेंगे और किसी भी दमन के आगे कलम नहीं रुकेगी.

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें>>

नेता, अफसर, पत्रकार के भ्रष्टाचारी गठजोड़ ने चर्चित मैग्जीन ‘दृष्टांत’ का गला घोंटा

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पढ़िए ‘दृष्टांत’ मैग्जीन की कवर स्टोरी : काशी का कलंक

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अदम्य साहस के लिए प्रतिमा भार्गव और साहसी पत्रकारिता के लिए अनूप गुप्ता को दिया गया भड़ास सम्मान (देखें वीडियो)

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन ने यूपी सरकार के माननीय महबूब अली को क्यों बताया भ्रष्ट, पढ़ें पूरा विवरण

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यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति में छह पत्रकार नामित, देखें नाम

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति द्वारा समिति में 6 सदस्यों को मनोनीत किया गया है। इनके नाम इस प्रकार हैं…

1. रुचि कुमार (ब्यूरो चीफ, इंडिया टीवी)

2. शलभ मणि त्रिपाठी (ब्यूरो चीफ, आईबीएन7)

3. फैज़ल फरीद (चीफ रिपोर्टर, इंडियन एक्सप्रेस)

4. मनीष श्रीवास्तव (चीफ रिपोर्टर, नवभारत टाइम्स)

5. एस. एम. पारी (चीफ फोटोग्राफर, वॉयस ऑफ़ लखनऊ)

6. मो. ज़ुबैर अहमद रिपोर्टर कबीर टाइम्

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यादवगेट में फंस रहे कुछ बड़े टीवी चैनल और पत्रकार, पीएमओ को रिपोर्ट भेजी गई

दलाली करते थे नोयडा-लखनऊ के कई मीडियाकर्मी

नई दिल्ली:  नोयडा के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह ने ठेकेदारी में कमीशनखोरी और कालेधन को सफेद करने के लिए कागज़ी कंपनियों का संजाल बिछाकर उसमें मीडिया को भी शामिल कर लिया था। इस राज का पर्दाफाश कर रही है, यादव सिंह से बरामद डायरी। यादव सिंह से तीन चैनलों के नाम सीधे जुड़ रहे हैं। एक में तो उनकी पत्नी निदेशक भी है। डायरी में मिले सफेदपोशों, नौकरशाहों और पत्रकारों के नामों को लेकर सीबीआई काफी संजीदा है और उसकी रिपोर्ट सीधे पीएमओ को भेजी जा रही है। इस सिलसिले में यादव सिंह और उसके परिवार से कई परिवार से कई बार पूछताछ हो चुकी है। समाज को सच का आईना दिखाने का दम भरने वाले ये पत्रकार अपने लिए मकान-दुकान लेने के अलावा ठेका दिलाने को भी काम करते थे और उसके लिए मोटी करम वसूलते थे।

पत्रकारिता की आड़ में दलाली और भवन भूखंड लेने की बात कोई नई नहीं है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहते हुए नकदी व भवन-भूखंड देकर पत्रकारों को उपकृत करते थे। मुलायम की दरियादिली तब सुर्खियां बनी थी। सांसद रिश्वतकांड से लेकर टू जी तक नामचीन पत्रकारों की कारस्तानी किसी से छिपी नहीं है। मौजूदा दौर में शायद ही ऐसा कोई घपला घोटाला हो जिसमें पत्रकारों की प्रत्यक्ष भूमिका निकलकर न आती हो। यादवगेट में भी कई बड़े चैनलों और नोयडा व लखनऊ के पत्रकारों के नाम आ रहे हैं। नबंर वन चैनल का दावा करने वाले चैनल से जुड़ी कंपनी पर भूखंड की कीमत कम दिखाकर राजस्व चोरी करने का आरोप है। दूसरे एक बड़े चैनल के पत्रकार चर्चा में है। इस चैनल पर ब्लैकमेलिंग को लेकर पहले से मामला चल रहा है। इसके एक स्टेट हेड पर अपने रसूख का इस्तेमाल कर यादव सिंह से लाभ लेने की बात सामने आई है।

इनका नाम बाक़ायदा यादव सिंह की डायरी में दर्ज है। इनकी लखनऊ में अच्छी धमक है और वहां से राजनेताओं और नौकरशाहों से फोन कराकर प्राधिकरण के अधिकारियों से लाभ लेते रहते हैं। इससे संबंधित दस्तावेज सन स्टार के पास मौजूद हैं और दस्तावेज कभी झूठ नहीं बोलते। इसका खुलासा आगे के अंकों में करेंगे। इनके अलावा यादव की डायरी में नोयडा के ऐसे कई पत्रकारों के नाम हैं, जिनकी पत्रकारिता प्राधिकरण के इर्द-गिर्द चलती है। इसमें एक परिवार से दो लोग भी हैं। इन लोगों ने प्राधिकरण से भवन भूखंड के अलावा शेड लिया और प्राधिकरण की बदौलत करोड़पति बन गये। कुछ पत्रकार तो ऐसे हैं जो ग्रुप बनाकर दबाव डालते थे। प्राधिकरण से ठेका दिलवाते थे और बाद में कमीशन में मिले पैसे को बांट लेते थे। कुछ की नजदीकी पूर्व मुख्यमंत्री के भाई से थी, जिनकी एक ज़माने में तूती बोलती थी। ये जनाब आजकल गुमनामी में आनंद ले रहे हैं। जांच एजेंसियां यादव सिंह और उसकी डायरी से मिली जानकारी को अपने तरीके से सत्यापित करने में जुटी हैं, इस वजह से कई पत्रकारों के चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई हैं।

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक सन स्टार में प्रकाशित विद्याशंकर तिवारी की रिपोर्ट.

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यूपी के पत्रकारों ने अपने खानपान समारोह के लिए इकट्ठा पैसा बीमार पत्रकार को दे दिया

सभी मान्यता प्राप्त साथियों,

एक परंपरा इस बार टूट गई है। चुनाव में आपके 100 रुपए के आर्थिक अंशदान से एकत्र हुए फंड से इस बार नव निर्वाचित समिति आपके सम्मान में लंच का आयोजन नहीं कर सकेगी। साथ मिल बैठकर खाना फिर कभी किसी और मौके पर निश्चित ही होगा। लेकिन इस बार समिति के समक्ष दो विकल्प थे। एक तरफ चुनावी फंड से बचे तकरीबन 30 हजार रुपए से लंच के आयोजन तो दूसरी तरफ हम सब के साथी, पूर्व में मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सदस्य रहे सुरेंद्र सिंह व उनके परिवार की मदद का विकल्प।

मुझे खुशी और गर्व है कि समिति के सभी पदाधिकारियों ने दूसरे विकल्प का चुनाव किया। ऐसा नहीं है कि हम सभी नवनिर्वाचित सदस्य लंच नहीं चाहते थे। पर सवाल यह था कि क्या कोई और बेहतर तरीका है हमारे और आप सभी 475 लोगों के आर्थिक अंशदान के इस्तेमाल का। आप सभी को पता है कि श्री सुरेंद्र सिंह बीते 3 वर्षों से मोटर न्यूरोन डिसार्डर नामक लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं। मेडिकल साइंस में इस बीमारी का फिलहाल कोई इलाज नहीं है। सुरेंद्र जी का शरीर लकवाग्रस्त है..वह बोल नहीं सकते, अपने आप हिल भी नहीं सकते। बीते दो वर्षों में समिति के तत्कालीन पदाधिकारियों ने कभी भी उनकी सुध नहीं ली।

मान्यता समिति का अध्यक्ष निर्वाचित होने के तुरंत बाद इसी 31 अगस्त को मैं और हमारी समिति के कई साथी..सुरेंद्र जी के घर गए थे। उनकी और उनके परिवार की स्थिति देखकर हम सभी को बहुत तकलीफ हुई। हमने उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिलाया था। उसी के बाद समिति ने प्रमुख सचिव सूचना और फिर मुख्य सचिव से मुलाकात कर यह मांग की थी कि सुरेंद्र जी के परिवार को मुख्यमंत्री सहायता कोष से आर्थिक मदद की जाए।

हमें फिलहाल सरकार से जवाब का इंतजार है। सरकारी तंत्र किस रफ्तार से काम करता है इसका आपको अंदाजा है। इस बीच में हम उनके लिए कुछ कर सकें यह जरूरी था। ऐसे में यह फैसला किय गया कि चुनाव फंड में बजे 30 हजार रुपए में कुछ और अंशदान समिति के पदाधिकारी अपनी सुविधा के अनुरूप करें। हमारे बीच में पूल हुई धनराशि के बाद हमने फिलहाल 55 हजार रुपए श्री सुरेंद्र सिंह के परिवार को उपलब्ध कराए हैं।

अपना एक साथी इस कदर तकलीफ में हो और हम लंच करें यह हमें उचित नहीं लगा। हमें यह भी सोचना होगा कि क्या हम कोई ऐसा सिस्टम बना सकते हैं जिससे हर बार मदद के लिए हमें सरकार का मूंह न ताकना पड़े। समिति के पास कोई आर्थिक स्रोत है नहीं, इस बार कुछ फंड था तो उसका इस्तेमाल हो गया। भविष्य के लिए हमें कोई नीति निर्धारित करनी होगी। आपके सुझाव आमंत्रित हैं।

अभिवादन सहित
आपका
प्रांशु मिश्र

अध्यक्ष
मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
09415141305

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UPSACC : रात भर चली मतगणना, आज सुबह आया रिजल्ट, प्राशु मिश्रा अध्यक्ष निर्वाचित (देखें लिस्ट)

उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता संवाददाता समिति का चुनाव हो गया. कल वोट पड़े और रात भर चली मतों की गिनती के बाद आज सुबह परिणाम घोषित कर दिया गया. राज्य मुख्यालय के 438 पत्रकारों ने अपने मतों का प्रयोग किया था. कल शाम से शुरू होकर आज सुबह 4 बजे तक चली मतगणना के बाद परिणाम आज सुबह घोषित हुआ. अध्यक्ष पद पर प्रांशु मिश्रा निर्वाचित घोषित किए गए हैं. नरेंद्र श्रीवास्तव और संजय शर्मा उपाध्यक्ष उपाध्यक्ष बने हैं.

नीरज श्रीवास्तव ने सचिव के पद पर बाजी मारी है. अजय श्रीवास्तव और अमितेश श्रीवास्तव संयुक्त सचिव निर्वाचित हुए हैं. अशोक मिश्रा को कोषाध्यक्ष के पद पर सफलता मिली है. कोषाध्यक्ष पद पर 8 वोट से अशोक मिश्रा की हुई जीत के बाद कोषाध्यक्ष पद के दूसरे प्रत्याशी एस.एम्. पारी ने कोषाध्यक्ष पद के लिए पुनर्मतगणना की मांग की है. इस मांग पर आज पुनः पुनर्मतगणना की जाएगी. कार्यकारिणी सदस्य के लिए हुए चुनाव में अभिषेक रंजन, मुदित माथुर, अनूप श्रीवास्तव, दीपक गिडवानी, हरीश कांडपाल, काशी प्रसाद यादव, काजिम रजा, आशीष श्रीवास्तव विजयश्री हासिल करने में सफल हुए.

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उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के चुनावी महाभारत में जीत गया अहंकार, खंडित हो गयी पत्रकार एकता

लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनावी महाभारत के संग्राम में कोई अगर जीता तो वह है अहंकार। महाभारत की तरह उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के चुनावों में पत्रकारों की सेना दो खेमों में विभाजित हो गई। ऐसा सम्भवतःपहली बार हो रहा है जब एक ही समिति के लिए दो- दो जगह चुनाव आयोग का गठन होकर दो जगहों पर चुनाव सम्पन्न हुए। इन चुनावों में कोई गांधी जैसा भी सामने नही आया जिसने विभाजन को रोकने के लिए कोई व्रत, सत्याग्रह किया हो। इन घटनाओं से तटस्थ पत्रकार को झटका लगा है उनको लगता है पत्रकार एकता को गहरी चोट लगी है।

अब से पहले उत्तर प्रदेश के पत्रकारों की एकता का दम भरने वाली मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति में दलीय निष्ठा से ऊपर रह कर विभिन्न ट्रेड यूनियन के सदस्य व अन्य एक ही पैनल से चुनाव लड़ते तथा सभी वर्गों का समर्थन हासिल करते थे, किन्तु इस बार 600 से अधिकार पत्रकारों की मतदाता सूची में सिर्फ एक ही खेमें का नेतृत्व करने की मानो होड़ मची थी। इतना भ्रम व असमंजस पत्रकारों में था कि कई पत्रकार तो दोनो ही खेमों में प्रत्याशी बन गए। कईयों ने तो दोनों ही तरफ दोनों दिन वोट भी दिये। सर्वमान्य नेतृत्व के आकांक्षी लोगों को तगड़ा झटका लगा है।

महाभारत की तरह पत्रकारों के इन चुनावों में लगभग सभी किरदारों ने अपनी-अपनी भूमिका अदा की, द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह भी विवश थे, क्योकि वे हस्तिनापुर की तरह सिंहासन के प्रति वफादार, मौन थे। कृष्ण भी थे, किन्तु कोई अर्जुन जैसा कायर योद्धा नहीं था जो महाभारत की तरह पत्रकारों इस चुनावी रण में अपनों को सामने देखकर रण छोड़ना चाहता हो। कोई यह मानने को तैयार न था कि अपनों से हार में असल विजय है।

पत्रकारों के इस विभाजन से अगर किसी को सबसे ज्यादा नुकसान होगा तो वह है पत्रकारों का। यह चुनाव पत्रकारों के कल्याण कार्यक्रम के किसी एजेण्डे के बिना लड़ा गया। जानकारों का मानना है कि पत्रकारों के विभाजन से प्रदेश में पत्रकार उत्पीड़न की घटनाएं बढेंगी। पत्रकारों के विभाजन की पीड़ा भी कम कष्टकारी नहीं है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्रित्व काल में पत्रकारों के सभी संगठनों को एक मंच पर आने की अपील की थी किन्तु उसका असर नहीं दिखा था। उनकी पार्टी की ही सरकार में पत्रकारों का एक और विभाजन हो गया है। इस बार चुनावों में 29 व 30 अगस्त को दो दिन मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव सम्पन्न हुए। सरकार के सचिवालय प्रशासन ने पत्रकारों के एक गुट को सचिवालय एनेक्सी में चुनावों की तथा दूसरे गुट को विधान भवन प्रेस रूम में अनुमति देकर आग में घी का काम किया।  

इन चुनावों में पत्रकारों को विभाजित करने के सारे शिगूफे छोड़े गए असली बनाम नकली पत्रकार, लिख्खाड बनाम अण्डे बेचने वाले पत्रकार, प्रिंट मीडिया बनाम इलेक्ट्रानिक मीडिया आदि आदि। इसी बीच किसी ने प्रस्ताव रखा कि जब दो-दो पत्रकारों की कमेंटियां बन ही रहीं है तो फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया, फोटोग्राफर, स्वतन्त्र पत्रकार व साइबर व सोशल मीडिया के लोग भी क्यों न अपनी-अपनी कमेटियां बना लें। जिस तरह पत्रकार विभाजन की तरफ बढ रहें है, ऐसे में आगे आने वाले दिनों में ऐसे दिन भी देखने को मिल सकते हैं कि अलग-अलग माध्यम के पत्रकार अपने गुट बना लें। समानान्तर समिति बन जाने से अब रोज-रोज नए विवाद सामने न आयेंगे, इसकी क्या गारण्टी! समिति के दो-दो अध्यक्ष, चार-चार उपाध्यक्ष, दो-दो सचिव व कोषाध्यक्ष, संयुक्त सचिव के चार-चार, तथा कार्यकारिणी सदस्य के 8 व 11 पदाधिकारी अपनी अपनी कर सकते हैं।

कहीं असली -नकली का खेल न शुरू हो जाए। एक दूसरे पर कीचड उडेलने से परहेज क्यों करेगें। एक-दूसरे पर जालसाजी के आरोप मढे जा सकते हैं। एक दूसरे को नैतिकता की दुहाईं, यहां तक एक दूसरे की पोल-पट्टी खोलने का घिनौना खेल भी खेला जा सकता है। इसका अन्त कहां होगा कोई नही जानता। एक बात और किसी भी समिति का कार्यकाल क्या होगा यह तय किया जाना अभी भविष्य की गर्त में है….। यह भी शक्ति प्रर्दशन होगा कि आखिर सरकार किस समिति को मान्यता देती है।

चुनावों पूर्व समझा जा रहा था कि चुनावों तक विवाद का अंत हो जाएगा, चुनावों से पहले एकता के प्रयास किए गये किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। रण के चुनावी मैदान में उन्मादी योद्धा बेताब थे उनको युद्धविराम का संदेश देना उल्टा पडा। आखिर सभी प्रयास असफल साबित हुए। जब कभी पत्रकार एका में बाधको का विश्लेषण होगा तो तब दोनो ही तरफ के चुनाव अधिकारियों की भूमिका पर चर्चा अवश्य होगी। जरूरत अब साक्षात् शिव की है जो समुद्र मन्थन की भांति पत्रकारों के चुनावों के मन्थन से निकले विष का पान कर लें।    

लेखक अरविन्द शुक्ला लखनऊ के पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09935509633 के जरिए किया जा सकता है.


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