प्रेस काउंसिल अध्यक्ष ने कहा – पत्रकारों पर हमला संज्ञेय अपराध, पांच साल सजा होनी चाहिए

दिल्ली : प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन न्‍यायमूर्ति सीके प्रसाद ने कहा है कि आंकड़ों के हिसाब से पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ी नहीं हैं। पीसीआई की एक उप समिति ने इस तरह की धममियों से निपटने के लिए कानून संबंधी अपनी सिफारिशें दे दी हैं। पत्रकार पर उसके काम को लेकर किया गया हमला काफी गंभीर मामला है। इसे संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। हमने इस अपराध के लिए पांच साल की सजा की सिफारिश की है। उन्होंने कहा कि इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया को भी पीसीआई के तहत लाया जाना चाहिए।

प्रसाद ने कहा कि यदि कोई आपको थप्‍पड़ मारे तो आपको वह ज्‍यादा खराब लगेगा बजाय इसके कि वह आपका मोबाइल चुरा ले। मेरे कहने का आशय यह है कि मोबाइल की चोरी तो एक संज्ञेय अपराध है लेकिन किसी व्‍यक्ति पर हमला करना इस श्रेणी में नहीं आता है। यदि कार्य के दौरान किसी पत्रकार को धमकाया जाता है अथवा उस पर हमला होता है तो इसे भी संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। हमने इस अपराध के लिए पांच साल की सजा की सिफारिश की है। 

जब उनसे पूछा गया कि क्या मानहानि को दंडात्‍मक अपराध बनाया जाना चाहिए, तो प्रसाद का जवाब था कि मानहानि का दायरा बहुत बड़ा है। कोई व्‍यक्ति एक मुकदमा केरल में दर्ज करता है जबकि दूसरा असम में, इसी से समस्‍या उत्‍पन्‍न होती है। इसके लिए गाइडलाइन होनी चाहिए। यदि मानहानि का कोई एक आर्टिकल प्रकाशित हुआ है तो कोई व्‍यक्ति सिर्फ एक ही स्‍थान पर मुकदमा दर्ज कर सके। कानून को इस बारे में विचार करना चाहिए कि केस वहीं दायर किया जाएगा जहां पर आर्टिकल प्रकाशित हुआ है। मानहानि के किसी एक आर्टिकल को लेकर आप किसी पत्रकार से 30 स्‍थानों पर जाने को नहीं कह सकते हैं। लेकिन आप नागरिकों के अधिकारों में भी कटौती नहीं कर सकते हैं। ऐसे में आपको प्रयास करने होंगे कि ऐसे मामलों को एक साथ रखा जाए।

यह समाचार सविस्तार अंग्रेजी में पढ़ें – 

Make attacks on journalists cognisable offence – bring electronic media under Press Council: Justice C K Prasad

Former Supreme Court judge Justice C K Prasad is Press Council of India (PCI) chairman, the Council now addressing recent assaults on journalists. Speaking with Himanshi Dhawan, Prasad discussed this vital issue, guidelines on hotly debated criminal defamation – and PCI seeking charge of electronic media too:

PCI’s noted a number of recent attacks on journalists – is there a marked increase?

Statistics don’t suggest more numbers of journalists being attacked – but when something happens in a gap of four weeks, it becomes a matter of concern.

Only recently, a couple of journalists have been killed.

Is PCI seeking a separate law to tackle intimidation of journalists?

Yes, a Press Council sub-committee submitted this recommendation. PCI adopted the report because assault to a journalist with reference to their work becomes very serious.

The problem is, simple hurt, as we call it in law, is a non-cognisable offence, meaning if somebody assaults you, you have to go file a complaint. You can’t go to a police station.

If your mobile’s stolen, you can go to the police station and lodge a complaint. I personally believe you’ll feel worse if someone slaps you, rather than if he steals your mobile. Theft of a mobile’s a cognisable offence – assault on a person is not.

Consequently, the procedure’s long-drawn. You go to court, file a complaint, meet lawyers. It’s very difficult.

If a journalist is assaulted or intimidated in connection with performance of duty, it should be a cognisable offence. We’ve recommended punishment for five years. If somebody assaults someone today, i don’t think anyone goes to jail – there may be a fine of Rs 500.

But if there’s an attack on a journalist about work, there should be a minimum punishment, say, six months which may extend to five years.

There’s also discussion on whether defamation should be a penal offence.

When i assess it objectively, civil litigation in this country is very cumbersome. Criminal litigation is a little faster – therefore, people resort to that.

If you say there shouldn’t be criminal defamation, it is too bold a statement.

My view is that for the defamatory act, where the prosecution will lie, that has to be decided. A defamatory statement is read widely. Somebody files a case in Kerala. Another files a case in Assam. That creates problems.

There should be guidelines. With respect to a particular defamatory article, one can file only in one particular place. The law may contemplate the case be filed only where the article’s been published. You can’t ask a journalist to go to 30 places for one defamatory article.

But you can’t curtail citizens’ rights also – you must make efforts that cases are clubbed together.

The earlier PCI chair sought for PCI to be renamed Media Council, taking electronic media also under its ambit – what’s your view?

I stand by the Council’s view that electronic media be brought under PCI. When the Press Council was constituted, electronic media was unknown here. Today, it has significant impact.

We’ve decided we’ll take cognisance of cases of threat of killing or assault of journalists even if they’re from electronic media.

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘समाचार4मीडिया’ से साभार

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Comments on “प्रेस काउंसिल अध्यक्ष ने कहा – पत्रकारों पर हमला संज्ञेय अपराध, पांच साल सजा होनी चाहिए

  • अनिल says:

    जब पत्रकार दलाली करे तो उसे उम्रकैद की सजा होना चाहिये।

  • प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन न्‍यायमूर्ति सीके प्रसाद ने जो कहा है वह पत्रकार जगत जिसे भारतीय संविधान में चौथा सतम्भ के रूप सम्मान प्राप्त है और जिसकी ज़िम्मेदारी का दायरा अन्य तीन स्तम्भों से कहीं अधिक और एक दम अलग व् व्यापक है जिसको समझकर ही पत्रकारिता के इस दायित्व और अलंकरण की मर्यादा बनाए रखना अति आवश्यक है। श्री प्रसाद ने पत्रकार जगत को और अधिक प्रभावी बनाने और निर्भीक रहते हुए अपने दायित्व की पूर्ती हेतु ये पक्ष रखा है जो वास्तव में सराहनीय है लेकिन चौथे स्तम्भ की वर्तमान छवि को लेकर आज देश और दुनिया में विपरीत ही सुनाई और दिखाई देता है इसमें भी व्यापक बदलाव की ज़रूरत है।


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