इन 315 पत्रकारों पर है प्रेस क्लब आफ इंडिया का बकाया, देखें लिस्ट

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के तीन सौ पंद्रह सदस्यों पर क्लब का पैसा बकाया है. क्लब की प्रबंधन समिति ने सभी को मेल भेज कर बकाया जमा करने का अनुरोध किया है. कुछ पत्रकारों पर क्लब की सालाना सदस्यता शुल्क बकाया है तो कइयों पर खाने-पीने का पैसा बाकी है.

प्रेस क्लब आफ इंडिया का कहना है-

” कुल 315 सदस्यों ने पत्र और फोन के बावजूद बकाया राशि जमा नहीं की. पैसे न देने वाले डिफाल्टर सदस्यों की लिस्ट जारी की जा रही है. पिछले सालों के सदस्यता शुल्क चुकाने की आखिरी तारीख 15 अप्रैल 2017 है. अब वार्षिक सदस्यता शुल्क अप्रैल में ही देना होगा. जो सदस्य अप्रैल में वार्षिक सदस्यता शुल्क नहीं चुकाएंगे उन्हें क्लब की सुविधाओं का लाभ नहीं मिलेगा.”

डिफाल्टर पत्रकारों के नाम और बकाया राशि देखें…

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काक्रोच क्लब आफ इंडिया में तब्दील हो गया पीसीआई! (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया को अगर काक्रोच क्लब आफ इंडिया भी कह लें तो कोई बुरा न मानेगा क्योंकि एक तो वैसे ही होली नजदीक है और दूजे प्रेस क्लब की टेबल पर सरेआम काक्रोच घूमते टहलते और आपके खाने में मुंह मारते मिल जाएंगे. सबकी दुर्व्यवस्था की खोज खबर रखने वाले पत्रकारों के अपने ही क्लब का क्या हाल है, इसे देखने लिखने वाला कोई नहीं.

पिछले दिनों भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह जो प्रेस क्लब आफ इंडिया के सदस्य भी हैं, क्लब पहुंचे और खाने-पीने का आर्डर किया तो देखा कि एक काक्रोच बार-बार टेबल के बीच में आकर उन्हें सलामी देकर वापस नीचे चला जा रहा है. कई बार जान-बूझ कर अनदेखा करने के बावजूद जब काक्रोच जिद पर अड़ा रहा कि वीडियो बनाकर न्यूज छापो तो यशवंत को मजबूरन अपना मोबाइल कैमरा आन करना पड़ा और गवाह के बतौर क्लब के एक वेटर को सामने खड़ा करके सवाल करना पड़ा ताकि कोई यह न कह सके कि वीडियो फेक है.

हालांकि खुद के घर की गंदगी को दबाने, तोपने, ढंकने की जिम्मेदारी घर के सदस्यों पर रहती है और घर की बात घर में ही रह जाए टाइप भावना जोर मारती रहती है, लेकिन जब गंदगी इतनी हो जाए कि बदबू आने लगे तो इसे दुनिया समाज के सामने लाना जरूरी हो जाता है ताकि गंदगी और बदबू की सफाई के लिए कोई अभियान चल सके.

भड़ास के एडिटर यशवंत ने फेसबुक पर कुछ यूं लिखा है :

Yashwant Singh : प्रेस क्लब इंडिया या काक्रोच क्लब आफ इंडिया! परसों प्रेस क्लब गया. खाने-पीने का आर्डर किया. अचानक एक छोटे जीव ने ध्यान खींचा. एक प्यारा-सा काक्रोच बार-बार टेबल के बीच में आकर मुझे सलामी देकर वापस नीचे चला जाता, इठलाते हुए. कई बार अनदेखा किया. पर नटखट और पब्लिसिटी का भूखा यह चुलबुल काक्रोच जिद पर अड़ा रहा कि हे यशवंत, वीडियो बनाकर मेरी न्यूज छापो, दुनिया को मेरे अस्तित्व और विकास के बारे में बताओ. आखिरकार मुझे मजबूरन अपना मोबाइल कैमरा आन करना पड़ा. गवाह के बतौर क्लब के एक वेटर को सामने खड़ा करके इस प्राणी के क्लब में ठाठ से वास करने के बारे में जानकारी हेतु सवाल किया. आप भी देखें वीडियो..

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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प्रेस क्लब आफ इंडिया में नदीम अहमद काजमी का जंगलराज

अमित भनोट पीआईबी एक्रेडेटेड जर्नलिस्ट हैं. दिल्ली में नौ साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. दलाल स्ट्रीट मैग्जीन में डिप्टी एडिटर हैं. बावजूद इसके कई साल से प्रयास करने पर भी उन्हें प्रेस क्लब आफ इंडिया की मेंबरशिप नहीं दी गई. ऐसा इसलिए क्योंकि नदीम अहमद काजमी का जंगलराज प्रेस क्लब आफ इंडिया में चलता है. हाल फिलहाल बनाए गए पांच सौ नए मेंबर्स की डिटेल अगर निकलवा ली जाए तो आपको सैकड़ों ऐसे मेंबर मिलेंगे जिनका बैकग्राउंड पत्रकारिता का नहीं है. लेकिन उन्हें अपने धर्म या जाति का होने के कारण सदस्य बना दिया गया है ताकि प्रेस क्लब में वोटबैंक का राजनीति में पलड़ा भारी रहे.

सोचिए, इतने पढ़े लिखे और इतने बड़े प्रेस क्लब के नेता लोग जब वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं तो वो किस मुंह से राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को वोट बैंक की पालिटिक्स के नाम पर देश और समाज को तबाह करने का आरोप लगा सकते हैं. नीचे एक पत्र है जो अमित भनोट ने भड़ास4मीडिया को लिख भेजा है. ऐसे ढेरों जेनुइन पत्रकार साथी हैं जिन्हें प्रेस क्लब की सदस्यता सिर्फ इसलिए नहीं दी गई क्योंकि वो नदीम अहदम काजमी नामक शख्स के करीबी नहीं हैं या उनकी जाति या धर्म के नहीं हैं.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Yashwant ji

press club of India ke baare me Aawaz uthane ke liye badhai. Mai pichle 9 saal se dilli me patrakarita kar Raha hu aur ek Dalal Street magazine me dy editor hu. sath me PIB accredited journalist bhi hu (no1136). Bavjood iske pichle Kai saalo ke prayas ke Baad bhi mujhe press club ki membership nahi mil Saki hai.

Mai jab bhi Apne kisi varishth patrakar Sathi se bolta hu ki pib hone ke bavjood bhi kyo membership nahi di ja Rahi to wo ashcharya vyakt Karta hai but kuch kar nahi pata. Mera form bhi PCI me filed hai per membership kyo nahi Mili koi nahi batata. Kai log membership ke liye rishwat Dene ki baat bhi keh chuke hai but wo Mai Dena nahi chahata.

Jaha tak office bearers ka sawal hai to wo to Cabinet Sectary se bhi jyada busy rehte hai aur kabhi kuch nahi karte. Aur to aur PCI ke bahar bouncer jaise log Khade rete hai Jo hum jaise patrakaro Ko chor thahrate hai aur ghusne se rokte hai..kripya bataye ki mujhe Kya karna chahiye. Vaise mai kai Baar kisi niji company ke managers ke sath press club ja Chuka hu Jo iske member Kai saalo se hai aur kuch paisa Dene ke Baad mujhe bhi member banane ki baat karte hai. Kya mujhe membership ke liye rishwat Deni chahiye…?

Amit Bhanot
Deputy Editor
Dalal Street Magazine

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प्रेस क्लब आफ इंडिया अपने सबसे खराब दौर में, विनीता ने उठाई आवाज़

Vineeta Yadav : प्रेस क्लब में यूँ तो कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन कुछ लोगों ने कहीं न कहीं ये विश्वास दिला दिया था कि क्लब को हमारे जैसे लोगों की भी शायद ज़रूरत है और शुरुआती दो साल हमने अपनी भागीदारी देने की कोशिश भी की क्लब को बेहतर तस्वीर में लाने के लिए. लेकिन इस साल सारी मेहनत पानी सी हो गयी क्यूँकि तानाशाही का रवैया यूँ दिखा कि एक एक करके हर कोना ईमानदारी का ध्वस्त होता दिखने लगा.

मेरा फ़र्ज़ था कि ग़लत बात पर आवाज़ उठाए या इस्तीफ़ा देकर अपना पिंड छुड़ा लें लेकिन कुछ लोगों ने ज़िम्मेदारी याद दिलाई कि अपनी बात सामने रखें और पूरा साल ये बोलने में निकल गया कि भाई तुम ग़लत कर रहे हो, ये सबका क्लब है. लेकिन नहीं जी, कोई क्यूँ सुने!

बस वो करते गये और ज़हन में फ़ासले बढते गए! सबसे ज़्यादा दुःख तब हुआ जब प्रेस क्लब को किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा पाया! बेहद दुःख से मैं इस साल के कामकाज में ग़लत चीज़ें होने से न रोक पायी. इसी बात पर अपनी नाकाम कोशिश स्वीकारतीं हूँ. बस, बाक़ी दोस्तों से निवेदन है जो क्लब को बेहतर बना सकते हैं वो इस क्लब को बिना स्वार्थ के ख़ूबसूरत बनाएं!

एबीपी न्यूज में कार्यरत युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार विनीता यादव की एफबी वॉल से. इस स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Pawan Kumar : Tooooooo.. Late.

Vineeta Yadav : before ds also i hv told many members of club from my side about fact ! But nothing happened so better i accept my failure to stop wrong things in club , now upto u to think ! Almost meetings hv record dt i objected ! In last meet also i asked fr basic transparency but again same thing happened! I may be new to understand politics in club but my focus is to perform work , same time to object on wrong decisions so i did !

Vinod Tikoo : अगर सिस्टम को ठीक करना है तो सिस्टम के बीच रहकर ही कर सकते हो. परिस्थिति से भाग कर नही.

Vineeta Yadav : Sir Aapko lagta hai mein bhagne waalo mein hun? Ek cheez than li toh karke chona hai lekin 3saal diye meine club ko nd u know i did my work also but i hate to play dirty.

Yashwant Singh : आपको इस्तीफा नहीं देना है। आप के साथ हम जैसे हजारों मुट्ठी बुलन्द करके खड़े हैं। ड्रामेबाज़ और भ्रष्टाचारी नदीम अहमद काज़मी को सबक सिखाने का वक़्त आ गया है। मैंने खुद इनकी कई हरकतों को नजरदांज किया लेकिन आपके लिखने के बाद ये लग रहा है कि सच्चाई को साफ़ साफ़ बता कह बोल देने का दौर आ गया है। छल के दम और दाम पर प्रेस क्लब हड़पने की साजिश कामयाब नहीं होगी।

Siddhartha Rangnath Rameshwaram : आप को डटे रहना चाहिए। आप के साथ मेरे जैसे कई लोग हैं।

Pankaj Chaturvedi : मैं तो गत चार सल से वहां गया भी नहीं ना ही वोट डालने क्‍यों कि असल में वह दारूखेरों का अडडा बन गया है गंभीर विचारों का कोई स्‍थान नहीं

Abhay Parashar : यहाँ से गलत सोच और विचारधारा वालों को निकालना चाहिए जो क्लब को अपनी जागीर समझते है और पत्रकारो को धोखा दे रहे है।

Sanjay Sharma : प्रेस क्लब ही नहीं राजनीति तो हर जगह घुसी हुई है। ईमानदारी की डगर आसान नहीं होती क्योकि आज बेईमान सब ताकवर हो गए है।

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प्रेस क्लब आफ इंडिया : किसी ज़माने में यहां का खाना अच्छा होता था, आज लगा ये मयखाना ही अच्छा…

Ajit Anjum : मैं आमतौर पर प्रेस क्लब जाता नहीं क्योंकि मैं पीता नहीं… साल में दो तीन दिन चाहे अनचाहे चला जाता हूं… कुछ दोस्तों की ज़िद पर या तो वोट देने या किसी के साथ खाने के लिए.. पिछले साल वोट देने तो नहीं जा पाया लेकिन आज अपने मित्र राजीव कुमार और शिल्पा जी के कहने पर ना ना करते हुए कुछ खाने के लिए प्रेस क्लब पहुँच गया और एक एक करके पाँच तरह का स्नैक्स मंगवाकर खाने की नाकाम कोशिश करता रहा…

मोमो, चिली पनीर, तंदूरी चिकन, फ़िश फ्राई और चिकन चिली.. एक भी आइटम ऐसा नहीं था, जो मुँह का ज़ायक़ा ख़राब करने में सक्षम न हो.. शिल्पा-राजीव को कोसता भी रहा और तय किया कि भूख से निजात का कोई दूसरा विकल्प जब तक होगा, यहाँ खाने तो नहीं आऊँगा… हाँ, पीने वालों को ये मयखाना मुबारक… किसी ज़माने में यहाँ का खाना अच्छा होता था आज लगा कि ये मयखाना ही अच्छा.. प्रेस क्लब के आसपास फुटपाथ पर या जंतर मंतर के ढाबे पर इससे लाख गुना बेहतर खाना आपको मिल जाएगा..

इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम की एफबी वॉल से.

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PCI और IWPC को LEFT बनाम RIGHT का रंग देने वाले इसे सियासी अखाड़ा बनाने पर क्यों उतारू हैं?

दिल्ली के दो बड़े पत्रकार क्लब (प्रेस क्लब ऑफ इंडिया P.C.I और इंडियन वूमैन प्रेस कोर I.W.P.C) पिछले दो तीन वर्ष से पूरी तरह सियासी रंग में रंग गए हैं। ये दोनों क्लब दो धड़ों में बंटे हैं- वामपंथ और दक्षिण पंथ। दिल्ली का मीडिया अपने हितों की कम और अपनी अपनी विचारधारा की पार्टियों की ज्यादा चिंता करता है। चाहे फिर वो पत्रकारों की हत्याएं हों या फिर महिला पत्रकारों के शोषण या फिर वेतन का मामला हो या मीडिया संस्थानों से बड़े पैमाने पर छंटनी। लाखों की सैलरी पाने वाले वो सभी दिग्गज चुप्पी साध जाते हैं जो हर छोटे से मुद्दे पर बवाल खड़ा कर देते हैं और धरने प्रदर्शनों का आयोजन करते हैं।

P.C.I और I.W.P.C दोनों का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका है। वामपंथी खेमा दोनों जगह काबिज है और यहां होने वाले ज्यादातर कार्यक्रम सियासी विचारधारा पर आधारित होते हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया अभी हाल ही में भारत विरोधी कार्यक्रम को लेकर आलोचना का शिकार बना था। IWPC में भी दो साल चुनाव नहीं हुए। पदाधिकारियों से लेकर 21 सदस्यों की कार्यकारिणी निर्विरोध चुनी जाती रही और एक खास विचारधारा वाले गुट का कब्जा रहा। इस साल भी सभी पदाधिकारी निर्विरोध चुन लिए गए लेकिन कार्यकारिणी के लिए 28 उम्मीदवार मैदान में थे। इस चुनाव को पूरा सियासी रंग दिया गया। दो-तीन उम्मीदवारों को संघ और बीजेपी के उम्मीदवार बता कर दो साल से काबिज रहे गुट ने जोरदार प्रचार किया और कार्यकारिणी के चुनाव को LEFT बनाम RIGHT का रंग दे दिया। जो महिला पत्रकार वोट डालने आ रही थीं उन्होनें वोट मांग रहे उम्मीदवारों पर सवाल दागे- तुम्हारे पैनल में कितने RIGHT वाले और कितने लेफ्ट वाले हैं। अफवाह तो यहां तक उडायी गयी कि बीजेपी अपने उम्मीदवार खड़े करके I.W.P.C  पर कब्जा करना चाहती है।

लगभग 23 साल पुराने इस क्लब में ऐसी ओछी राजनीति बहुत सी महिला पत्रकारों को रास नहीं आती। बहुत सी संस्थापक सदस्य और अन्य सदस्य यहां आना बंद कर चुकी हैं। आप इसी बात से अंदाज़ लगा सकते हैं कि केवल एक तिहाई सदस्य ही वोट डालने आते हैं। कल्याणी शंकर, मृणाल पांडे, शांता सरबजीत सिंह, रश्मि सक्सेना, कुमकुम चड़्डा, सुषमा रामाचंद्रन और अन्य कई वरिष्ठ  महिला पत्रकारों ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव के कार्यकाल में 1994 में महिला पत्रकारों के लिए जगह लेकर इस क्लब की स्थापना की थी। यहां तक कि फर्नीचर और क्रॉकरी वो अपने घर से लेकर आयीं। लेकिन आज ये क्लब ओछी राजनीति का अड्डा बन रहा है। कुछ महिला पत्रकार एक संगठन के रूप में संगठित ना होकर विचारधारा पर आधारित गुटों में क्लब को बांट चुकी हैं जो कि किसी भी पत्रकार संगठन की सेहत के लिए खतरे का सूचक है।

एक महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मीडिया की मारी प्रतिमा भार्गव आई नेक्स्ट अखबार के दुर्व्यवहार की कहानी सुनाते सुनाते रो पड़ीं (देखें वीडियो)

सात अक्टूबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया में ‘मीडिया की मारी प्रतिमा बोलेगी’ कार्यक्रम में आगरा की समाज सेविका प्रतिमा भार्गव ने आई-नेक्स्ट अखबार के दुर्व्यवहार, मानहानि, प्रताड़ना की कहानी सुनाते सुनाते रो पड़ीं. घटिया किस्म की पेज थ्री और पेड पत्रकारिता करने वाले इस अखबार ने मसालेदार खबर परोसने के चक्कर में इस समाजसेविका के चाल चलन चरित्र पर ऐसी फर्जी मनगढ़ंत खबर छाप दी कि इनका जीना मुश्किल हो गया. घर परिवार समाज में इनकी इज्जत दाव पर लग गई. प्रतिमा ने इस दौरान क्या क्या झेला, उन्होंने विस्तार से बताया. बताते सुनाते वह रोने लगीं. उनके साथ आए उनके पुत्र की भी आंखों से आंसू बह निकले.

इस महिला ने दैनिक जागरण समूह के अखबार आई-नेक्स्ट द्वारा किए गए उत्पीड़न की जो दर्दनाक कहानी बताई, उसे सुन कर पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया और ज्यादातर लोग भावुक हो गया. सबने एक सुर से जागरण समूह के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता, शैलेष गुप्ता, संजय गुप्ता समेत आई-नेक्स्ट के ग्रुप एडिटर आलोक सांवल और आगरा के एडिटर सचिन वासवानी के लिए शेम शेम कहा और इनके कुकृत्य की निंदा की. 

कार्यक्रम में प्रस्ताव पारित कर जागरण समूह से अपील की गई कि वह फौरन आई-नेक्स्ट आगरा के संपादक और खबर लिखने वाले रिपोर्टर को बर्खास्त करें. प्रतिमा भार्गव मामले में प्रेस काउंसिल आफ इंडिया ने भी संपादक की निंदा करने का फैसला दे रखा है. ऐसे में जागरण समूह द्वारा आई-नेक्स्ट आगरा के संपादक सचिन वासवानी और रिपोर्टर अरुण रावत को अब तक पद पर बनाए रखना न सिर्फ निंदनीय बल्कि शर्मनाक भी है. प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि संपादक और रिपोर्टर को पद से न हटाने तक इन दोनों की तस्वीरें और मोबाइल नंबर सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, मोबाइल मीडिया पर शेयर किया जाए ताकि हर कोई इन्हें फोन कर प्रतिमा भार्गव की जिंदगी को नरक बना देने के लिए शेम शेम कह सके, साथ ही फोटो देखकर इनकी शक्ल पहचान सके ताकि ऐसे पतित पत्रकारों से हर कोई दूर रहे. प्रतिमा भार्गव ने अपनी जो पूरी कहानी सुनाई उसे इस वीडियो के जरिए देख सुन सकते हैं :  https://www.youtube.com/watch?v=DbUz2v6PacA

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एक बड़े मीडिया हाउस के खिलाफ दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस / संवाद आयोजित कर भड़ास ने बनाया नया रिकार्ड (देखें तस्वीरें)

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प्रेस काउंसिल अध्यक्ष ने कहा – पत्रकारों पर हमला संज्ञेय अपराध, पांच साल सजा होनी चाहिए

दिल्ली : प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन न्‍यायमूर्ति सीके प्रसाद ने कहा है कि आंकड़ों के हिसाब से पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ी नहीं हैं। पीसीआई की एक उप समिति ने इस तरह की धममियों से निपटने के लिए कानून संबंधी अपनी सिफारिशें दे दी हैं। पत्रकार पर उसके काम को लेकर किया गया हमला काफी गंभीर मामला है। इसे संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। हमने इस अपराध के लिए पांच साल की सजा की सिफारिश की है। उन्होंने कहा कि इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया को भी पीसीआई के तहत लाया जाना चाहिए।

प्रसाद ने कहा कि यदि कोई आपको थप्‍पड़ मारे तो आपको वह ज्‍यादा खराब लगेगा बजाय इसके कि वह आपका मोबाइल चुरा ले। मेरे कहने का आशय यह है कि मोबाइल की चोरी तो एक संज्ञेय अपराध है लेकिन किसी व्‍यक्ति पर हमला करना इस श्रेणी में नहीं आता है। यदि कार्य के दौरान किसी पत्रकार को धमकाया जाता है अथवा उस पर हमला होता है तो इसे भी संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। हमने इस अपराध के लिए पांच साल की सजा की सिफारिश की है। 

जब उनसे पूछा गया कि क्या मानहानि को दंडात्‍मक अपराध बनाया जाना चाहिए, तो प्रसाद का जवाब था कि मानहानि का दायरा बहुत बड़ा है। कोई व्‍यक्ति एक मुकदमा केरल में दर्ज करता है जबकि दूसरा असम में, इसी से समस्‍या उत्‍पन्‍न होती है। इसके लिए गाइडलाइन होनी चाहिए। यदि मानहानि का कोई एक आर्टिकल प्रकाशित हुआ है तो कोई व्‍यक्ति सिर्फ एक ही स्‍थान पर मुकदमा दर्ज कर सके। कानून को इस बारे में विचार करना चाहिए कि केस वहीं दायर किया जाएगा जहां पर आर्टिकल प्रकाशित हुआ है। मानहानि के किसी एक आर्टिकल को लेकर आप किसी पत्रकार से 30 स्‍थानों पर जाने को नहीं कह सकते हैं। लेकिन आप नागरिकों के अधिकारों में भी कटौती नहीं कर सकते हैं। ऐसे में आपको प्रयास करने होंगे कि ऐसे मामलों को एक साथ रखा जाए।

यह समाचार सविस्तार अंग्रेजी में पढ़ें – 

Make attacks on journalists cognisable offence – bring electronic media under Press Council: Justice C K Prasad

Former Supreme Court judge Justice C K Prasad is Press Council of India (PCI) chairman, the Council now addressing recent assaults on journalists. Speaking with Himanshi Dhawan, Prasad discussed this vital issue, guidelines on hotly debated criminal defamation – and PCI seeking charge of electronic media too:

PCI’s noted a number of recent attacks on journalists – is there a marked increase?

Statistics don’t suggest more numbers of journalists being attacked – but when something happens in a gap of four weeks, it becomes a matter of concern.

Only recently, a couple of journalists have been killed.

Is PCI seeking a separate law to tackle intimidation of journalists?

Yes, a Press Council sub-committee submitted this recommendation. PCI adopted the report because assault to a journalist with reference to their work becomes very serious.

The problem is, simple hurt, as we call it in law, is a non-cognisable offence, meaning if somebody assaults you, you have to go file a complaint. You can’t go to a police station.

If your mobile’s stolen, you can go to the police station and lodge a complaint. I personally believe you’ll feel worse if someone slaps you, rather than if he steals your mobile. Theft of a mobile’s a cognisable offence – assault on a person is not.

Consequently, the procedure’s long-drawn. You go to court, file a complaint, meet lawyers. It’s very difficult.

If a journalist is assaulted or intimidated in connection with performance of duty, it should be a cognisable offence. We’ve recommended punishment for five years. If somebody assaults someone today, i don’t think anyone goes to jail – there may be a fine of Rs 500.

But if there’s an attack on a journalist about work, there should be a minimum punishment, say, six months which may extend to five years.

There’s also discussion on whether defamation should be a penal offence.

When i assess it objectively, civil litigation in this country is very cumbersome. Criminal litigation is a little faster – therefore, people resort to that.

If you say there shouldn’t be criminal defamation, it is too bold a statement.

My view is that for the defamatory act, where the prosecution will lie, that has to be decided. A defamatory statement is read widely. Somebody files a case in Kerala. Another files a case in Assam. That creates problems.

There should be guidelines. With respect to a particular defamatory article, one can file only in one particular place. The law may contemplate the case be filed only where the article’s been published. You can’t ask a journalist to go to 30 places for one defamatory article.

But you can’t curtail citizens’ rights also – you must make efforts that cases are clubbed together.

The earlier PCI chair sought for PCI to be renamed Media Council, taking electronic media also under its ambit – what’s your view?

I stand by the Council’s view that electronic media be brought under PCI. When the Press Council was constituted, electronic media was unknown here. Today, it has significant impact.

We’ve decided we’ll take cognisance of cases of threat of killing or assault of journalists even if they’re from electronic media.

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘समाचार4मीडिया’ से साभार

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जानिए वे कारण जिसके चलते भारी मतों से जीत गया जलाली-नदीम पैनल… (देखें जीत-हार का अधिकृत डाटा)

: प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में राहुल-नदीम पैनल ने विरोधी पक्ष का सूपड़ा साफ किया : राष्ट्रीय सहारा के संजय सिंह ने लगातार पांच चुनावों में भारी मतों से जीतकर रिकार्ड बनाया :

राष्ट्रीय राजधानी में मीडिया कर्मियों के प्रमुख संगठन  प्रेस क्लब आफ इंडिया (पीसीआई) के वाषिर्क चुनाव में राहुल जलाली-नदीम काजमी के नेतृत्व वाले पैनल ने भारी बहुमत से जीत हासिल की है। कार्यकारणी के लिये चुने गये सदस्यों में ‘राष्ट्रीय सहारा’ के संजय सिंह ने लगातार पांच बार ‘प्रेस क्लब आफ इंडिया’ के चुनाव में जीत दर्ज कर इतिहास रचा। निवर्तमान (आउटगोइंग) कमेटी में वे कोषाध्यक्ष थे और इस बार उन्होंने फिर इसी पद पर लड़ने से इनकार कर दिया था। एक्जक्यूटिव के लिये इस बार भी उन्हें रिकार्ड मत हासिल हुये। विरोधी पैनल यानि कि लाहिड़ी-प्रदीप पैनल ने अफवाहें फैलाकर और तरह-तरह के अनर्गल लांछन व आरोप लगाकर ‘वोट फार चेंज’ के लिये वोट मांगे, लेकिन समझदार सदस्यों ने उनके मंसूबे पर पानी फेर दिया। वोटरों ने निवर्तमान मैनेजिंग कमेटी द्वारा कराये गये विकास कायरे को तरजीह दी और एक बार फिर इस कमेटी को पीसीआई की जिम्मेदारी सौंपते हुये यह संदेश दिया कि अब वही क्लब को संचालित करेगा, जो पारदर्शिता, सुचिता और स्वछता के साथ क्लब को आगे ले जायेगा। धुप्पलबाजी और गाल बजाकर क्लब पर कब्जा करने की कवायद फलीभूत नहीं होगी।

30 मई को हुये मतदान के 31 की रात घोषित चुनाव परिणाम के अनुसार मीडियानेट के राहुल जलाली अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुये जबकि द स्टेट्समेन के श्री कृष्णा उपाध्यक्ष निर्वाचित हुये। एनडीटीवी के नदीम अहमद काजमी दोबारा महासचिव और एबीपी न्यूज चैनल की तेजतर्रार रिपोर्टर विनीता यादव दोबारा संयुक्त सचिव निर्वाचित हुई। आकाशवाणी के अरुण जोशी कोषाध्यक्ष पद पर चुने गये। यही नहीं 16 सदस्यीय कार्यकारिणी में से 15 सदस्य राहुल जलाली पैनल के विजयी रहे। 11 बजे से 6.30 तक चले मतदान में कुल 1431 मत पड़े, जो कि एक रिकार्ड ही है।

कार्यकारिणी सदस्यों में राष्ट्रीय सहारा के संजय सिंह, जी न्यूज के नीरज ठाकुर, राष्ट्र टाइम्स के विजय शंकर चतुव्रेदी, न्यूज राइस के उज्जवल कुमार, हिंदुस्तान टाइम्स के फोटोजर्नलिस्ट अजय अग्रवाल, फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट रवि बत्रा, डीएनए के चन्द्रशेखर लूथरा, उत्तर उजाला के के.एन.जोशी, सहारा समय की कोमल शर्मा, डीएनए के मनन कुमार, टाइम्स आफ इंडिया के मानस प्रतीम गोहाई, सहारा समय के मृगांग प्रभाकर, भास्कर न्यूज के प्रफुल्ल कुमार सिंह और दैनिक हिन्दुस्तान के दिनेश तिवारी शमिल है। प्रतिद्वन्दी गौतम लाहिड़ी पैनल से एकमात्र विजयी प्रत्याशी सुश्री अन्नपूर्णा झा सदस्य कार्यकारिणी चुनी गयीं।

इस बार के चुनाव में अध्यक्ष पद के लिये राहुल जलाली को 792 वोट मिले। उन्होंने गौतम लाहिड़ी को हराया जिन्हें 586 वोट मिले। श्री जलाली पहले भी दो बार (वर्ष 2006 और 2007) पीसीआई में अध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं। उपाध्यक्ष पद के लिये श्री कृष्णा को 841 मत मिले। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की अबन्तिका घोष को हराया जिन्हें 505 वोट मिले। महासचिव पद के लिये नदीम अहमद काजमी को 884 वोट मिले। उन्होंने जनसत्ता (पूर्व) के प्रदीप श्रीवास्तव को हराया जिन्हें 494 वोट मिले। संयुक्त सचिव पद के लिये विनीता यादव ने राष्ट्रीय सहारा के राकेश आर्य को हराया। सुश्री विनीता को 828 वोट मिले जबकि श्री आर्य को 456 वोट से संतोष करना पड़ा। कोषाध्यक्ष पद पर अरुण जोशी को 874 वोट मिले जबकि इसी पद के लिये चुनाव लड़ने वाले राज्य सभा टीवी के संजय कुमार को 428 वोट मिले।

प्रेस क्लब प्रबन्धन ने मतदान के दिन सुचारू मतदान और सदस्यों को बेहतर व्यवस्था के लिये व्यापक प्रबन्ध किये थे। गेट के बाहर प्रचार और नारेबाजी में लगे दोनों पैनलों के प्रत्याशियों और भारी संख्या में उमड़े उनके समर्थकों और सुरक्षा बलों के लिये इस भीषण गर्मी में शीतल मिनरल वाटर का पर्याप्त नि:शुल्क प्रबन्ध किया गया था। लान में पंडाल डालकर और उसके चारों तरफ पानी के फुहारों वाले कूलरों और पंखे लगाये गये थे, ताकि सदस्यों को बाहर बैठने पर भी गर्मी या लू से बचाव हो सके।

11 बजे मतदान शुरू होने से पहले सुबह 10 से 11 बजे तक जनरल बाडी मीटिंग (जीबीएम) में वित्तीय वर्ष 2014-15 का वित्तीय लेखा-जोखा कोषाध्यक्ष संजय सिंह ने प्रस्तुत किया, जिसे सदस्यों ने हाथ उठाकर पारित कर दिया। उन्होंने बताया कि पिछले वित्तीय साल में हुये 4.61 करोड़ Rs आय के मुकाबले इस वित्तीय साल (2014-15) यानि कि उनके कार्यकाल में क्लब ने 5.15 करोड़ की आय अर्जित की है। इस तरह क्लब ने 11.76 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज प्राप्त कर एक रिकार्ड ही कायम किया है।

राष्ट्रीय सहारा अखबार के पत्रकार संजय सिंह : लगातार पांच चुनावों में भारी मतों से जीतकर रिकार्ड बनाया

संजय सिंह ने बताया कि इस साल जो सबसे बड़ा काम हुआ है, वह प्रेस क्लब को भारत सरकार द्वारा आवंटित भूखंड का फुल एंड फाइनल 1.31 करोड़ का भुगतान करना है। यह कार्य उनकी कमेटी द्वारा किये गये कायरे में ‘मील का पत्थर है। श्री सिंह ने विरोधी पक्ष के सवालों का माकूल और तर्कसंगत जवाब दिया। विरोधी पक्ष के सेक्रेट्री जनरल पद के प्रत्याशी प्रदीप श्रीवास्तव ने कहा कि क्लब में निर्माण कायरे पर कितना धन खर्च हुआ है, इसका उल्लेख नहीं किया गया है। श्री सिंह ने कहा कि बैलेंस सीट में ‘रिपेयर एंड रिन्यूअल’  के मद में इसका उल्लेख किया गया है। जिसमें साफ-साफ अंकित है कि इस कार्य में 15 लाख 55 हजार रुपये खर्च किये गये हैं। इस रकम से क्लब में बहुत सारे निहायत ही जरूरी कार्य कराये गये हैं,जैसे- क्लब गेट पर एटीएम (सेन्ट्रल बैंक) के लिये कमरे का निर्माण, जिससे प्रतिमाह भाड़े के रूप में क्लब को 25 हजार रुपये की आय हो रही है।

मीडिया सेन्टर का निर्माण, जिसमें पांच कम्प्यूटर टर्मिनल लगाये गये हैं। ‘भारत के प्रेस क्लब’ में रिसेप्शन और लाबी नहीं थी, उसका निर्माण कराया गया है, जिससे क्लब का इंटरेंस लुक भव्य हो गया है। रेलवे रिजव्रेशन कक्ष का स्थान बदलकर उसके लिये नया कमरा बनाया गया है और जनरल काउंटर की खिड़की बाहर कर दी गयी है, ताकि क्लब के अंदर गैर सदस्यों का प्रवेश रोका जा सके। 1956 से संचालित इस क्लब में रिकार्डस और कागजातों को सुरक्षित रखने का कोई बंदोबस्त नहीं था, जिसके लिये रिकार्ड रूम बनाया गया। कान्फ्रेंस हाल में कार्यक्रमों के दौरान आगंतुकों के खान-पान के लिये एक रिफ्रेशमेंट रूम का निर्माण किया गया, जिसकी निहायत ही जरूरत थी, इसके अभाव में यह कार्य सर्दी-गर्मी-बरसात में बाहर लान में किया जाता था।

तकरीबन 75 साल पुराने प्रेस क्लब भवन की सीवरलाइन बिल्कुल ही ध्वस्त हो गयी थी, और अक्सर ही सीवेज लाइन चोक हो जाती थी, जिसका निदान नया सीवर लाइन डालकर किया गया। क्लब भवन छोटा था और इसका इलेक्ट्रिक लोड कम था। दिनोंदिन क्लब का विस्तार होता गया। इलेक्टि़क से चलने वाले यंत्र और एसी की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हुयी, लेकिन इलेक्ट्रिक वायर, केबिल और पावर डिस्ट्रीबूसन यंत्र जर्जर हो चुके थे। क्लब में अक्सर ही विद्युत फाल्ट होने लगा था। पुराना मुख्य केबिल कम क्षमता का होने के कारण अक्सर ही फुंकने लगा था। पूरा क्लब ही एक तरह से लाक्षागृह बना हुआ था।

ऐसे में प्राथमिकता के आधार पर न सिर्फ विद्युत क्षमता बढ़ाई गयी, बल्कि पुराने उपकरणों, तारों और केबिल को बदलकर बिल्कुल ही नयी वायरिंग करायी गयी। यही नहीं, इतने बड़े क्लब की विद्युत सप्लाई जो सिर्फ एक ही जगह से केन्द्रित थी, उसका डिस्ट्रीबूसन चार भागों में बांटा गया। ताकि किसी एक हिस्से में कोई फाल्ट हो तो पूरे क्लब की बिजली न गुल हो। जाहिर है इतना सारा काम सिर्फ और सिर्फ साढ़े 15 लाख में कराया गया, जिसमें से तीन लाख रुपये भारत सरकार के उपक्रम ‘सेल’ ने मीडिया सेन्टर बनाने के लिये स्पांसर किये थे। यानि कि क्लब ने अपने पास से खर्च किये सिफ 12 लाख, जिसमें से तीन लाख रुपये पिछले 12 महीने में सेन्ट्रल बैंक एटीएम से भाड़ा के रूप में आ चुका है। विरोधी पक्ष निरुत्तर था और निराधार हो-हल्ला के सिवा उनके पास कुछ बचा नहीं था। जीबीएम समाप्त होने की घोषणा अध्यक्ष आनन्द सहाय ने की और 11 बजे से मतदान शुरू हुआ।

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में वोट देने से पहले दोनों पैनल की इन अपीलों को जरूर पढ़ें

पहली अपील नदीम-राहुल जलाली पैनल की तरफ से….

प्रिय सदस्यों,

बड़े रोष व दुख के साथ हमें यह ईमेल करना पड़ रहा है कि मुझे (नदीम काजमी और विनीता यादव) को निशाना बनाकर धन की अनियमितताओं सम्बंधी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों के लिए कुछ लोग व्यक्तिगत रुप से फेसबुक तथा सोशल मीडिया का सहारा लेकर छवि खराब कर रहे हैं। प्रेस क्लब के चुनाव के ऐसे मौके पर यह दुखद है कि ये आरोपों की तह में जाने और सच्चाई की पुष्टि किए बिना संदेशों को आगे भेजकर पत्रकार के रुप में अपनी साख तो गिरा ही रहे हैं,समूची पत्रकारिता की बिरादरी पर बट्टा लगा रहे हैं।

 

आईए अब मुख्य बात पर आते हैं। हम दोनों पर आरोप है कि एक भवन निर्माण कंपनी को प्रमोट किया है। सच्चाई और तथ्य यह है कि इस ग्रुप ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में तीन कार्यक्रमों पर अपनी स्पांसरशिप दी। पहला 6 अक्टूबर 2013 को दो कार्यक्रम हुए। पहला विश्वविख्यात धावक मिल्खा सिंह के साथ तथा दूसरा प्रसिद्ध गायक शंकर साहनी का। संयोगवश उस समय हम दोनों में से न कोई सेक्रेटरी जनरल था और न ही ज्वाइंट सेक्रेट्री पद पर। इस तथाकथित बिल्डर ने उस वक्त के सेक्रेटरी जनरल और पदाधिकारियों की तस्वीरें ले ली थी। अन्य कार्यक्रम पिछले साल हुआ दीवाली मेला था,जिसके लिए भी इस बिल्डर ने स्पॉसरशिप दी थी। इस कार्यक्रम में भी औपचारिकतावश चित्र लिए गए।

लेकिन हमारे इन बेनामी और पीठ पीछे वार करने वाले तथाकथित लोगों ने पिछले और पुरानी फोटो में हेराफेरी कर भ्रामक आरोपों को जन्म दिया। चित्र में बाकी सभी की फोटो हटाकर केवल एक फोटो लेकर भ्रम व फरेब का जाल बुनकर प्रचार की कोशिश की। इस बिल्डर से रही बात पैसों के लेनदेन की तो कार्यक्रम में सभी सम्बंधित व्यक्तियों को पैसों की अदायगी बिल्डर के माध्यम से सीधे तौर पर की गई। इसमें न प्रेस क्लब और न हम दोनों में से किसी का कोई लेनदेन नहीं है। फिर यह प्रश्न कहां रहता है कि हम बिल्डर के पेरोल पर हैं?

इसके साथ-साथ एक बात और अहम है कि पिछले कुछ वर्षों में तमाम ऐसे कार्यक्रम प्रेस क्लब में हुए हैं जो क्लब के इतिहास में पहली बार आयोजित किए गए और उससे क्लब की प्रतिष्ठा को चार-चांद लगें। ज्वाइंट सेक्रेटरी विनिता यादव ने पहली बार क्लब में महिला दिवस का आयोजन करवाय़ा गया और मालिनी अवस्थी जैसी विख्यात गायिका ने शिरकत की। पुस्तक मेले का आयोजन भी पहली बार किया गया। मैनेजिंग कमेंटी मेंबर दिनेश तिवारी ने आरएनआई से रजिस्टर्ड पत्रिका स्क्राइब्स वर्लड, का कुशल संपादन कर उसे सदस्य और केन्द्र सत्ता तक पहुंचाया। अरुण जोशी ने रविवार स्पेशल के रुप में खानपान पर विशेष जोर दिया। प्रेसीडेंट आनंद सहाय ने 100 से अधिक पत्रकारिता से जुड़े कार्यक्रमों को अंजाम दिया। हम तो क्लब की उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसकी नींव टी आर रामाचंद्रन व संदीप दीक्षित ने चार साल पहले रखी थी। ऐसे में यह बात हमें ध्यान रखनी होगी कि ऐसे कार्यक्रमों के लिए धन चाहिए होता है। प्रेस क्लब के पास ऐसी कोई आमदनी का साधन नहीं है। उसके लिए शराब कंपनियों,निर्माण कंपनियों आदि से सहायता सीधे तौर पर लेनी होती है। हमने तो क्लब की परंपरा का पालन किया है। इसमें आखिर क्या गलत है?

पर हमारे विरोधी क्लब को आगे बढ़ते हुए और क्लब कल्चर की खुशबू और क्लब को चहकता-महकता हुआ नहीं देखना चाहते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि रविवार को बच्चों की धमा-चौकड़ी, महिलाओं की उपस्थिति, शाम की मस्ती और प्रोफेशनल गतिविधियां यहां पर हों। वे क्लब को सूनसान, वीरान और अपने हितों के लिए बनाना चाहते हैं। पर ऐसा आप होने देंगे और न हम होने देंगे।

नदीम-राहुल जलाली पैनल को वोट दें।

नदीम अहमद काजमी
सेक्रेट्री जनरल (पीसीआई)
विनीता यादव
ज्वाइंट सेक्रेटरी (पीसीआई)

—-

दूसरी अपील… गौतम लाहड़ी-प्रदीप श्रीवास्तव पैनल की तरफ से….

प्रिय मित्रों…

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का चुनाव 30 मई को होने वाला है… जाहिर सी बात है कि जो लोग चुनाव मैदान में हैं… वो खुद को बेहतर बताने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे… और इसमें कोई हर्ज भी नहीं है… लेकिन कुछ बुनियादी सवाल हैं… जो लोगों को जरूर सोचने चाहिए….

जलाली-नदीम पैनल का कहना है कि दूसरे पैनल (गौतम लाहड़ी, प्रदीप श्रावास्तव-संजय कुमार पैनल) के पास कोई एजेंडा नहीं है…. वो अपना पूरा पैनल तक नहीं उतार पाए हैं… पूरा पैनल नहीं उतार पाने की बात सौ फीसदी सच है… दरअसल हम हर प्रत्याशी के लिए एक-एक लाख रुपये की जमा राशि नहीं जुटा पाए… जो जलाली-नदीम एंड कंपनी ने बड़ी आसानी से जुटा लिए… हमारे पैनल में अमीर पत्रकार नहीं है भाई… मुझे तो सबसे बड़ा खतरा ये नजर आ रहा है कि कल को ये लोग कह सकते हैं कि…. लाख रुपये नहीं कमाते तो क्लब के सदस्य ही नहीं बन सकते…

दूसरी बात, अगर हम चुनाव जीतते हैं तो मैनेजिंग कमेटी में 8 लोग तो नदीम की टोली के ही रहेंगे… और वो हमारी किसी भी गलत कोशिश का विरोध करने की हालत में होंगे… नई कमेटी पर लगाम कसने की हालत में होंगे…. जबकि नदीम की टोली जीतती है तो… तो उनकी बेजा हरकतों (कहने और बताने की ज्यादा जरूरत नहीं रह गई है) के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला कोई नहीं होगा… अब ये बात अच्छी है या बुरी… इसका फैसला… सदस्यों को करना है…

रही बात एजेंडे की…. तो हमने अपना एजेंडा पेश किया है… हम प्रेस क्लब में खाने-पीने की चीजों के दाम कम से कम करने की कोशिश करेंगे… ताकि आम पत्रकार भी अपने परिवार के साथ यहां का लुत्फ उठा सके…सदस्यों साथ आने वाले उनके परिजनों को इज्जत बख्शेंगे… और उनसे कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूले जाने पर कमेटी में सहमति बनाएंगे… हम क्लब के सदस्यों के लिए एक सुकून का माहौल देने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे… रही बात मुनाफे की… तो हो सकता है हम नदीम की तरह ज्यादा मुनाफा ना कमा सकें…

दरअसल मुनाफे के अर्थशास्त्र को समझना बहुत जरूरी है… मुनाफा आता कहां से है… जब आप खाने-पीने का सामान महंगा करते हैं… कामगारों की सुविधाओं में कटौती करते हैं… क्लब की सुविधाओं… मसलन प्रेस कांफ्रेंस के लिए कमरा महंगे किराए पर देते हैं… क्लब के किसी निजी आयोजन के लिए प्रायोजक लाते हैं (अब प्रायोजकों से मिले पैसे क्लब के खाते में आते हैं या नहीं… इस पर बात फिर कभी..)… क्लब को एक मुनाफाखोर साहूकार की तरह चलाते हैं…

नदीम एंड कंपनी सभी सदस्यों से भारी सेक्युरिटी मनी तो लेते हैं… लेकिन किसी मेंबर की जेब में पैसा ना हो तो… खाने-पीने का हक तक छीन लिया है… पहले हर सदस्य बिल पर साइन कर सकते थे…. और उसे बाद में चुकता कर सकते थे… लेकिन नदीम की टोली ने तो इसे परचून की दुकान बना दिया है… जहां बगैर पैसे दिए कोई सामान नहीं मिल सकता…

प्रेस क्लब के महंगे खाने-पीने के सामान के लिए पैसे किसकी जेब से निकलता है… दरअसल यहां पत्रकारों को चूसकर ही मुनाफा कमाया जा रहा है… वो भी एक जमाना था जब जनहित के काम में लगे संगठनों को यहां रियायती किराए पर या फिर मुफ्त में प्रेस कांफ्रेंस के लिए हॉल दिया जाता था… लेकिन नदीम की कमेटी ने बड़े मुनाफे के चक्कर में… क्लब की उस आदर्श परंपरा को दफना दिया… तिलांजलि दे दी… और क्लब को दारू पीने के अड्डे के रूप में तब्दील कर दिया…

आप बार-बार जमीन और बिल्डिंग की बात करते हैं… कहते हैं हमने इतने करोड़ रुपये जमा कर दिए… भाई ये काम सालों से चल रहा है… आप कृप्या झूठ ना बोले… पीछे भी तमाम लोग इस पर काम करते आए हैं… इसका श्रेय लेने की कोशिश ना करें… आप 40 लाख रुपये खर्च कर जिम बनाते हैं… फिर खुद ही उसे कबाड़ बताते हैं… अंदर के जिस कमरे में बैठकर एक मेंबर… खाना खाता है… वहां के एयरकंडीशनर का आप कवर तक नहीं लगा सकते… सवाल नीयत का है…

हम इस संस्था को पत्रकारिता का मंदिर (TEMPLE OF JOURNALISM) के रूप में विकसित करना चाहते हैं… जहां आकर किसी को फख्र महसूस हो… उसे ऐसा ना लगे कि वो किसी बार में आया है… आज देश के समाने जिस तरह की चुनौतियां है… उसे देखते हुए युवा पत्रकारों को प्रेस क्लब से जोड़ने… उन्हें सही दिशा देने की जरूरत है… उऩ्हें पत्रकारिता की मर्यादा से रूबरू कराने की जरूरत है… क्लब को एक ग्लोबल मीडिया सेंटर के रूप में विकसित करने की जरूरत है… हमारे वरिष्ठ पत्रकार इस काम में हमारा सहयोग कर सकते हैं… हमें उन लोगों के साथ भी जुड़ने की जरूरत है… जो जनहित के काम में दूर-दराज-गांव-देहात के इलाके में लगे रहते हैं… उन्हें अपनी बात कहने के लिए मंच प्रदान करने की भी जरूरत है… सरकार की नीतियों पर नेताओं को बुलाकर सवाल-जवाब करने की जरूरत है… और अंत में सबसे बड़ी बात… पत्रकारों के बीच जो गैर-बराबरी की दीवार खड़ी की गई है… उसे ध्वस्त करने की जरूरत है…. ताकि हम… पत्रकारों के खिलाफ दमन… शोषण की हालत में उनकी आर्थिक और कानूनी मदद कर सकें… और पूरी ताकत से पत्रकार एकता जिंदाबाद का नारा बुलंद कर सके।

एक बार फिर से गौतम लाहड़ी-प्रदीप श्रीवास्तव-संजय कुमार के पैनल को भारी मतों से विजयी बनाने की अपील के साथ…

VOTE FOR CHANGE…

गौतम लाहड़ी – प्रदीप श्रीवास्तव – संजय कुमार के पैनल को वोट दें

आभार

संजय कुमार


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प्रेस क्लब आफ इंडिया अब सेफ जगह नहीं, सीसीटीवी फुटेज लीक होने से हड़कंप (देखें वीडियो)

बिल्डरों से अपवित्र रिश्ते रखने समेत कई किस्म के गंभीर आरोपों में घिरे प्रेस क्लब आफ इंडिया के महासचिव नदीम अहमद काजमी जो इस बार भी चुनाव में इसी पद के लिए उम्मीदवार हैं, पर एक नया आरोप ये लगा है कि उनके नेतृत्व में प्रेस क्लब आफ इंडिया के भीतर होने वाली सीसीटीवी रिकार्डिंग के चुनिंदा फुटेज अपने विरोधियों को नुकसान पहुंचाने के इरादे से लीक करा दिए गए हैं. इसी तरह का एक फुटेज भड़ास4मीडिया के भी हाथ लगा है जिसमें प्रेस क्लब चुनाव के दो प्रत्याशियों में किसी बात पर कहासुनी हो रही है.

सवाल ये है कि ये सीसीटीवी फुटेज लीक कैसे हुआ. अगर जानबूझ कर कराया गया है तो फिर ये गंभीर मामला है. सैकड़ों मीडियाकर्मी बेहद सहज भाव से यहां बैठता, खाता पीता है, बिना चिंता किए हुए कि उसकी प्राइवेसी रिकार्ड हो रही है या नहीं. पर जिस तरह प्रेस क्लब के सत्ताधारी पैनल के कुछ लोगों ने ये फुटेज लीक किया है, उससे सारे प्रेस क्लब सदस्यों के कान खड़े हो गए हैं. फुटेज लीक करते हुए आरोप लगाया गया है कि इसमें दिख रहे दो सदस्य नियमों का उल्लंघन कर पब्लिक प्लेस में स्मोकिंग कर रहे हैं. साथ ही लड़ झगड़ रहे हैं. अगर ऐसा है तो प्रेस क्लब की कमेटी की बैठक बुलाकर आंतरिक अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, न कि फुटेज लीक कर प्रेस क्लब की प्राइवेसी भंग करने जैसा घृणित काम करना चाहिए.

भड़ास को फारवर्ड किए गए इस फुटेज के साथ एक लेटर भी पहुंचा है जिसमें किन्हीं रवि बत्रा नामक फोटो जर्नलिस्ट ने लिखा है- ”This is a demonstration of Mr. Pradip srivastav, the General-Secretary candidate, breaking the law pertaining to smoking in public and his presidential running mate Mr. Gautam Lahiri bursting out in violence. Do you want this unruly behavior to be your vote for change? Certainly not. Please watch this video, showing presidential and sec-gen candidates not only violating laws, but also getting into public spat.”

‎आप भी देखिए सीसीटीवी फुटेज और तय करिए कि क्या प्रेस क्लब की प्राइवेसी इसी तरह भंग करने की छूट नदीम अहमद काजमी एंड कंपनी को देते रहना चाहिए… जो लोग खाते पीते समय गलत कर दिख रहे हैं, उन पर तो आंतरिक बैठक बुलाकर एक्शन हो सकता है. लेकिन जो लोग प्रेस क्लब की प्राइवेसी लीक कर रहे हैं, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए. उनकी सबसे बड़ी सजा यही है कि उन्हें तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित करते हुए उनके खिलाफ वोट देने का आह्वान करना चाहिए. बाकी प्रेस क्लब सदस्यों की मर्जी. सीसीटीवी फुटेज लिंक यूं है…

https://www.youtube.com/watch?v=nSjUJYEqUww

इस फुटेज को देखने के बाद तत्काल प्रेस क्लब प्रबंधन को जांच कर यह बताना चाहिए कि किसने यह सीसीटीवी फुटेज लीक किया है. इस फुटेज को देखने के बाद से कहा जाने लगा है कि दिल्ली स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया अब खाने-पीने के लिहाज से सेफ स्थान नहीं रह गया है. यहां सुरक्षा और अनुशासनात्मक कारणों से भले ही सीसीटीवी कैमरा लगा है जो बिलकुल उचित है लेकिन क्लब के कुछ पदाधिकारी इन सीसीटीवी फुटेज को अपने निहित स्वार्थ के हिसाब से लीक करके दूसरे मीडियाकर्मियों को बदनाम करने कराने का काम रहे हैं. विरोधियों का आरोप है कि यह ताजा फुटेज भी प्रेस क्लब चुनाव में कुछ लोगों को बदनाम करने के इरादे से सत्ताधारी पदाधिकारियों नदीम अहमद काजमी एंड कंपनी की तरफ से लीक किया गया है. अगर ऐसे ही प्रेस क्लब में बैठे लोगों की रिकार्डिंग लीक होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब लोग प्राइवेसी बचाने के लिए प्रेस क्लब जाना ही छोड़ देंगे. आप भी प्रेस क्लब जाने से पहले एक बार जरूर सोच लें कि कहीं ऐसा न हो कि आपका खाना गाना हंसना बोलना लड़ना झगड़ना एक दिन लीक हो जाए और आपको पता तक न चले यह लीक किसने कब क्यों किया.

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प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के तानाशाह बने नदीम को हटाने के लिए पत्रकारों ने की बड़ी लामबंदी

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प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के तानाशाह बने नदीम को हटाने के लिए पत्रकारों ने की बड़ी लामबंदी

देश में पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया का चुनाव 30 मई को है। इस बार का चुनाव हर साल क्लब की प्रबंध समिति के लिए होने वाले चुनाव से थोड़ा हटकर है। चार साल पहले क्लब में आर्थिक गड़बड़ियों के कारण पुष्पेन्द्र और परवेज अहमद को हटाने के लिए जिस तरह बड़ी तादाद में पत्रकार एकजुट हुए और पुष्पेन्द्र एंड कंपनी का हराकर संदीप दीक्षित व रामचंद्रन के पैनल को भारी जीत दिलाई गई, ठीक उसी तरह इस बार नदीम अहमद काजमी और राहुल जलाली पैनल को हराने के लिए पत्रकार एकजुट हो गए हैं।

बिल्डर कनेक्शन? : प्रेस क्लब में बुलाकर प्रेस क्लब की तरफ से एक विवादास्पद बिल्डर तरुण शीन (दाएं) को एवार्ड देते नदीम अहमद काजमी (बाएं).

पुष्पेन्द्र को हराने वाले संदीप दीक्षित के समर्थन वाली टीम लगातार चौथी बार फिर चुनाव मैदान में है। इस साल इस टीम में नदीम और राहुल जलाली के खिलाफ न सिर्फ बगावत का माहौल बन गया है अपितु क्लब के कायदे-कानून से खिलवाड़ करने, नए मेम्बर बनाने में धांधली और आर्थिक अनियमितता बरतने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। दरअसल पिछले साल महासचिव का चुनाव जीते नदीम अहमद काजमी जो इस बार फिर इसी पद के लिए चुनाव मैदान में हैं, के खिलाफ कुछ महीना पहले उसी वक्त से विरोध का माहौल बन गया था जब पिछली बार अध्यक्ष पद पर जीते आनंद सहाय ने प्रबंध समिति के क्रियाकलापों के कारण समय सीमा से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने इसके बाद से खुद को क्लब की सक्रिय राजनीति से भी अलग कर लिया। जिस पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ को हटाते समय उन पर क्लब में आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप लगाए गए थे और उन्हें तानाशाह बताया गया था, नदीम के साथ अब तक जुडे़ रहे लोगों ने ही आरोप लगाने शुरू कर दिए कि नदीम अहमद काजमी ठीक उसी शैली में काम करने लगे हैं जैसे पुष्पेन्द्र करते थे।

इसका परिणाम ये हुआ कि न सिर्फ आनंद सहाय ने कमेटी से नाता तोड़ लिया वरन पुष्पेन्द्र को हराने के लिए हिन्दी-अंग्रेजी के पत्रकारों का जो एक बड़ा गुट तैयार हुआ था वो गुट पूरी तरह अब इस चुनाव में नदीम के पैनल से दूर दिख रहा है। इसी गुट से जुड़कर पिछले तीन सालों में क्लब की प्रबंध कमेटी में रहे कई वरिष्ठ सदस्य भी तटस्थ भूमिका में दिख रहे हैं। दरअसल, इस बार नदीम के साथ प्रेसीडेंट के लिए चुनाव लड़ रहे राहुल जलाली के चयन पर भी अधिकांश लोगों को ऐतराज था। क्लब की कमेटी को चलाने वाले वरिष्ठ सदस्यों के एक गुट को ये भी ऐतराज था कि नदीम अहमद काजमी जो पिछले कई सालों से क्लब कमेटी में विभिन्न पदों पर रह चुके है, उनको इस बार चुनाव नहीं लड़कर दूसरे साथियों को आगे करना चाहिए। लेकिन अपनी दादागिरी और सदस्यों से बदसलूकी में पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ की तरह माहिर नदीम अहमद काजमी का तर्क था कि क्लब संविधान के मुताबिक वे महासचिव पद पर दो बार चुनाव लड़ सकते हैं। हांलाकि उनके तर्क से तो सहमत हुआ जा सकता है लेकिन अब तक कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और कई बार कार्यकारिणी सदस्य रह चुके नदीम अहमद काजमी इस सवाल का जवाब देने को कतई तैयार नहीं हैं कि बिना किसी लाभ वाले क्लब कार्यकारिणी के पदों पर वे आखिर क्यूं बने रहना चाहते हैं। आखिर उन्हें फिर से इस पद पर काबिज होने की क्या जरूरत है।

दरअसल एक नहीं कई ऐसे कारण बताए जा रहे हैं जिसके कारण न सिर्फ निवर्तमान कमेटी के अधिकांश सर्मथकों ने खुद को तटस्थ कर लिया वरन नदीम गुट पर घपले घोटालों और अनियमितता बरतने के आरोप भी लगने लगे। इस चुनाव में सबसे बड़ा आरोप तो नदीम गुट पर यही है कि उन्हें एक साल पहले कंपनी एक्ट में हुए बदलाव की जानकारी हो चुकी थी लेकिन उसके बावजूद कोई उपाय नहीं किया गया। नए बदलाव के मुताबिक कंपनी एक्ट के तहत बने क्लब व दूसरी संस्थाओं में प्रबंध समिति का चुनाव लड़ने वाले हर पदाधिकारी को बतौर जमानत राशि एक लाख रुपए जमा कराने का प्रावधान किया गया है। निर्वतमान कमेटी ने इस जानकारी को सार्वजनिक तो किया ही नही अपितु वित्तमंत्री अथवा कंपनी मंत्रालय पर दबाव बनाकर क्लब को अलाभकारी संस्था बताकर नए नियम से छूट लेने का कोई प्रयास भी नहीं किया। बड़े-बडे़ पत्रकारों के समूह वाले प्रेस क्लब के तमाम सदस्यों से इस काम में सहयोग की अपील की जाती तो ये कोई मुश्किल काम नहीं था।

निवर्तमान कमेटी के कुछ सदस्यों के दबाव में प्रशांत टंडन के नेतृत्व में एक कमेटी जरूर बनाई गई थी कि किस तरह इस नए नियम को बदलने के उपाय किए जाएं। लेकिन प्रशांत टंडन ने जो सुझाव दिए उन्हें माना ही नहीं गया। बाद में चुनाव प्रक्रिया से ठीक पहले टंडन ने इसी नाराजगी में नदीम के साथ चुनाव लड़ने से मना कर दिया। टंडन ने जो रिपोर्ट दी उसमें ये भी था कि इस नियम में बदलाव कराने के लिए प्रेस क्लब की कार्यकारिणी की तरफ से कोई प्रयास ही नहीं किया गया। अलबत्ता कुछ दिन पहले ही कंपनी मंत्रालय और वित्र मंत्रालय को दो ईमेल भेजने की रस्म अदायगी जरूर की गई जिसका सरकारी जवाब भी वैसा ही मिलना था जैसा प्रयास किया गया।

दरअसल निर्वतमान कमेटी ने ये सारा खेल इस लिए खेला था कि नए नियम में ये प्रावधान है कि निर्वतमान कमेटी के सदस्य अगर पुनः चुनाव लड़ते है तो उन्हें एक लाख की जमानत राशि जमा नहीं करानी होगी। नदीम अहमद काजमी चाहते थे कि इस नियम के मुताबिक विपक्ष में एक लाख रुपए की जमानत राशि जमा करवाकर कोई पैनल चुनाव में खड़ा नहीं होगा और वे एक बार फिर क्लब पर कब्जा जमा लेंगे। लेकिन जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई तो नदीम को अपने फैसले पर पछतावा हुआ, क्योंकि क्लब के सदस्यों ने इस बात पर भारी विरोध जताया क्योंकि कानूनन ये निर्वतमान कमेटी जमानत राशि से छूट पाने की हकदार तभी हो सकती है जब पूर्व में उसने कोई जमानत धनराशि जमा की हो। भारी विरोध के कारण नदीम गुट की मंशा पूरी नहीं हुई और पूरे पैनल को जमानत राशि जमा करानी पड़ी। लेकिन अब इस पर भी अपनी पीठ थपथपाने का काम किया जा रहा है।

एक लाख रुपए की जमानत राशि जमा कराने को लेकर प्रेस क्लब में चुनाव से पहले खूब हल्ला मच रहा है। जितने मुंह उतनी बातें। कोई कह रहा है कि एक बिल्डर ने सभी पदाधिकारियों की जमानत राशि भरने का इंतजाम किया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि क्लब में अलग-अलग तरह के सामान सप्लाई करने वाली कंपनियों और ठेकेदारों ने अपने-अपने चहेते सदस्यों की जमानत राशि का इंतजाम किया। क्लब में ये मांग भी उठ रही है कि नदीम पैनल से चुनाव लड़ने वाले कई लोगों के बैंक खातों की आयकर जांच करायी जाए क्योंकि कई महीने से बेरोजगार तथा लोगों से निजी जरूरतों के लिए उधार मांगने वालों ने एक लाख रुपया कहां से लाकर जमा कराया। क्लब में सवाल उठ रहे हैं कि कहीं नदीम गुट को मदद करने के लिए बिल्डर लाबी एक्टिव तो नहीं है! 

इस आरोप को इसलिए भी बल मिला है कि परिमा ग्रुप के सीएमडी तरुण शीन को प्रेस क्लब के बैशाखी फंक्शन में नदीम अहमद काजमी ने मंच पर बुलाकर स्टेट गुरु का अवार्ड देकर सम्मानित किया था। कई राज्यों में निवेशकों से धोखाधड़ी के मुकदमों में आरोपी तरूण शीन को किस अधिकार से ऐसा सम्मान दिया गया। प्रेस क्लब से मिले इस सम्मान का उल्लेख अब तरूण अपने बडे़-बड़े विज्ञापनों में अपनी ब्रांडिग के लिए कर रहा है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि तरुण शीन को ये सम्मान कितने में बेचा गया? उसका हिस्सा कमेटी के किन-किन सदस्यों की जेब तक पहुंचा? तरुण शीन की क्लब कमेटी से डील कराने वाली शख्शियत कौन है? निवर्तमान कमेटी से चुनाव लड़ने रहे अधिकांश लोगों द्वारा बतौर जमानत राशि जमा कराई गई एक लाख की रकम पर उठ रहे सवालों का संबंध कहीं इसी डील से तो नहीं। नदीम के पैनल में इस बार भी बड़े पद पर चुनाव लड़ रही एक महिला सदस्य जो पहले पिछले दो सालों से कमेटी में हैं, इस मुद्दे पर क्लब के सदस्यों को जिस तरह अपनी सफाई दे रही हैं, उसने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सवाल सिर्फ बिल्डर को सम्मानित करने, एक लाख रूपए कहां से जमा कराए गए, इसी का नहीं है। अधिकांश सदस्यों में ये भी नाराजगी है कि इसी साल पत्रकार श्रेणी से क्लब के करीब 400 नए सदस्य बनाए गए। मार्च महीने में बनाए गए इन सदस्यों में से 150 सदस्यों की पहली सूची तो नोटिस बोर्ड पर चस्पा की गई लेकिन करीब 250 मेम्बरों के फार्म की न तो स्क्रूटनी की गई न कमेटी से मान्यता ली गई। इनमें ऐसे लोगों की लंबी सूची है जो पत्रकार श्रेणी में सदस्य बनने के पात्र ही नहीं थे। या जो इस श्रेणी के पात्र थे उन्हें पिछले कई सालों की तरह इस बार भी सदस्यता नहीं दी गई। ऐसे ही सदस्यों में राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सप्पल की सदस्यता पर भी सवाल उठ रहे हैं। पहला सवाल तो यही है कि सप्पल इस श्रेणी में आते ही नहीं हैं क्योंकि वे पत्रकार हैं ही नहीं और उन्होंने पत्रकार होने का दावा करने के लिए जो दस्तावेज लगाए उसके मुताबिक वे सिर्फ एसोसिएट श्रेणी के सदस्य बन सकते हैं।

राज्यसभा टीवी में बतौर रिर्सचर दिलीप खान भी पात्र न होने के बावजूद पत्रकार श्रेणी की सदस्यता लेने में सफल रहे। ये मात्र उदाहरण हैं। नियमों को दरकिनार कर पत्रकार श्रेणी में क्लब की सदस्यता दिए जाने वाले पत्रकारों की लंबी फेहरिस्त है। सवाल ये नहीं कि ऐसे लोगों को सदस्यता क्यों दी गई। सवाल ये है कि ऐसे प़त्रकार जो वर्षों से श्रमजीवी पत्रकारिता कर रहे हैं और क्लब की सदस्यता लेने के पात्र हैं उन्हें सिर्फ इसलिए सदस्यता नहीं दी जा रही कि वे चुनाव के वक्त अपने विवेक से अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन तमाम विरोध और आरोपों के बावजूद नदीम पैनल 400 नए सदस्यों के वोट हर हाल में मिलने के बूते चुनाव में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। अब ये तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि ये नए सदस्य नदीम पैनल को वोट देकर क्लब की सदस्यता दिए जाने का कर्ज चुकाएंगे या अपने विवेक का इस्तेमाल कर पत्रकारिय चरित्र को पेश करेंगे।

क्लब में नए सदस्य बनाने में तो चुनाव जीतने की रणनीति के तहत जो गड़बड़झाला हुआ वो हुआ ही है। सबसे बड़ा स्कैंडल तो नदीम कमेटी द्वारा शुरू की गई क्लब की मैग्जीन में है। क्लब द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पुस्तिका का कार्यकारी संपादक क्लब के ही एक सदस्य और कई सालों से लगातार कार्यकारिणी में रहे दिनेश तिवारी को बनाया गया है। त्रैमासिक रूप से निकलने वाले इस पत्रिका के लिए उन्हें 35 हजार रुपए का पारिश्रमिक और 10 हजार डिजाइनिंग खर्चा किसकी अनुमति से दिया जा रहा है। नियमतः किसी भी क्लब सदस्य को क्लब के कार्य में योगदान के लिए पारिश्रमिक दिया जाना आर्थिक अनियमितता है। तो क्या ये माना जाए कि अपने चहेतों का निजी लाभ देने के लिए नदीम अहमद काजमी भी पुष्पेन्द्र की तरह क्लब की नीतियों से खिलवाड़ कर रहे हैं। नियमों में ऐसा प्रावधान करने के लिए नियमतः एजीएम की अनुमति लेनी होती है और क्लब के नियमों में संशोधन करना पड़ता है लेकिन सवाल है ऐसा क्यूं नहीं किया गया।

क्लब का बड़ा मुद्दा है क्लब की नई इमारत बनाने का। पिछले 15 साल से ठीक चुनाव के वक्त क्लब की नई बिल्डिंग बनाने का झांसा सदस्यों को दिया जाता है और नई बिल्डिंग का एक ले आउट प्लान पेश किया जाता है लेकिन पिछली सभी कमेटी के ये वादे मुंगेरी लाल के हसीन सपने साबित हुए है। नदीम-राहुल पैनल फिर इसी मुद्दे को ऐसे पेश कर रहा है मानों कल-परसों में क्लब की नई बिल्डिंग बनाकर पेश कर देंगे।

कितनी हास्यापद बात है कि एक तरफ तो क्लब को जल्द से जल्द नई बिल्डि़ग में पहुंचाने के दावे चुनाव में किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ क्लब की आर्थिक हालत ये है कि क्लब के सदस्यों से लंबे समय से चंदा लिया जा रहा है जिसकी सूची नोटिस बोर्ड पर चस्पा है। क्लब को अगर दूसरी बिल्डिंग में शिफ्ट करने की ईमानदार मंशा है तो फिर पिछले एक साल में क्लब में 20 लाख रुपए नए निर्माण कार्यों पर क्यों खर्च कर दिए गए जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। सवाल उठ रहे हैं कि कहीं ये निर्माण कार्य किसी को लाभ पहुंचाने के लिए तो नहीं किए गए।

नदीम अहमद काजमी की टीम ने पिछले साल नई दिल्ली से कांग्रेस सांसद अजय माकन के सासंद निधि कोष से 40 लाख रुपए की धनराशि खर्च करके एक जिम शुरू कराया था। लेकिन इसकी सेवा के लिए क्लब के सदस्यों से भारी भरकम फीस वसूलने के कारण मात्र दो लोग ही इस जिम का लाभ ले रहे हैं। अब ये भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस जिम के उपकरणों को लगाने वाली कंपनी से कोई कमीशन लिया गया था। देश की जनता के खून पसीने की कमाई और टैक्स से सांसदों को मिलने वाली सांसद निधि को आखिर किस रणनीति के तहत जिम बनाने जैसे काम में कमेटी ने खर्च करवाया। सासंद निधि कोष का पत्रकारों की किसी संस्था द्वारा ऐसा दुरूपयोग कराने का ये अनोखा मामला है।

नदीम पैनल के खिलाफ आक्रोश के कई कारण हैं। मसलन निजी रंजिश के कारण किसी भी सदस्य को क्लब से निष्कासित कर दिया जाता है तो कई दफा क्लब में अनुशासनहीनता करने वाले सदस्यों के खिलाफ शिकायत करने के बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती क्योंकि उन पर क्लब की कमेटी का वरदहस्त होता है। क्लब में खाने-पीने की वस्तुओं के बढे़ हुए दाम दूसरे क्लबों की अपेक्षा बहुत अधिक होने से भी क्लब के मेम्बर नाराज हैं। क्लब में कुछ कर्मचारियों को मिली खुली छूट और घटिया सर्विस के कारण सदस्य बेहद खफा हैं।

क्लब में पैनल के खिलाफ बन रहे आक्रोश भरे माहौल को देखकर सत्ताधारी पैनल ने क्लब में पुष्पेन्द्र के सर्मथकों की फिर से घुसपैठ की आंशका का नया शिगूफा छोड़ा है। नदीम पैनल कभी अपने खिलाफ लड़ रहे पैनल को संघ का पैनल बताकर वामपंथी वोटों का काटने की कोशिश कर रहा है। लेकिन क्लब के सदस्य बखूबी जानते हैं कि गौतम लाहिडी और प्रदीप श्रीवास्तव वाले विरोधी पैनल का किसी राजनीतिक दल या पुष्पेन्द्र गुट से कोई संबध नहीं रहा है। देखना है कि चार साल बाद फिर से क्लब के किसी तानाशाह को हटाने के लिए लामबंद हुए पत्रकार अपने प्रयास में सफल होंगे या एक और साल इसी पैनल की दादागिरी का आनंद लेंगे।

प्रेस क्लब आफ इंडिया के एक सदस्य द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.


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Sunil Verma : कई साथी जिक्र कर रहे थे कि प्रेस क्लब के चुनाव में इस बार बिल्डर लॉबी जबरदस्त एक्टिव है… कान लगाकर सुना तो ज्ञान मिला कि बिल्डर लॉबी ने नई बिल्डिंग का ठेका मिलने के लालच में चुनाव लड़ रहे कई पत्रकार भाई लोगों को एक लाख रूपए दिए हैं…. मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा, पर हो भी सकता है! किसी मित्र के पास और जानकारी हो तो मेरा भी ज्ञान बढ़ाना।

प्रेस क्लब आफ इंडिया के सदस्य सुनील वर्मा के फेसबुक वॉल से.

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कंपनी एक्ट में बदलाव के कारण प्रेस क्लब आफ इंडिया का चुनाव टला!

प्रेस क्लब आफ इंडिया के सालाना चुनाव कई हफ्तों के लिए टल गए हैं. इसके पीछे कई तरह के कयास लगाए गए. कुछ लोगों ने गंभीर किस्म के आरोप भी लगाए. पर अब प्रेस क्लब आफ इंडिया की मैनेजिंग कमेटी ने स्पष्ट किया है कि आखिर किन वजहों से चुनाव टालने को मजबूर होना पड़ा. इसके पीछे वजह बताया गया कंपनी एक्ट में कई महत्वपूर्ण बदलाव. उन बदलावों के अनुरूप प्रेस क्लब को ढालने के लिए वक्त चाहिए. इसी वजह से चुनाव टालने जैसा बड़ा व मुश्किल फैसला लेना पड़ा. यह वजह कितना पर्याप्त है चुनाव टालने के लिए, ये तो प्रेस क्लब के सदस्य गण बताएंगे लेकिन प्रेस क्लब आफ इंडिया की तरफ से इसके सदस्यों को चुनाव टालने को लेकर जो मेल भेजा गया है, उसकी एक प्रति भड़ास के पास भी है, जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

NOTICE

The Managing Committee meeting held on 24th March, 2015 deliberated upon following issues.  The summary of proceedings of MC is put up for general information of the members.  Section 96 of the Companies Act, 2013 requires that every company other than a One Person Company shall in each year hold in addition to any other meetings, a general meeting as its annual general meeting and shall specify the meeting as such in the notices calling it, and not more than fifteen months shall elapse between the date of one annual general meeting of a company and that of the next.

And section 137 requires that a copy of the financial statements, including consolidated financial statement, if any, along with all the documents which are required to be or attached to such financial statements under this Act, duly adopted at the annual general meeting of the company, shall be filed with the Registrar within thirty days of the date of annual general meeting.

And Similarily, section 152 of the Companies Act, 2013 provides that :

(a) Save as otherwise expressly provided in this Act, every director shall be appointed by the company in general meeting.

(b) No person shall be appointed as a director of a company unless he has been allotted the Director Identification Number under section 154.

(c) Every person proposed to be appointed as a director by the company in general meeting or otherwise, shall furnish his Director Identification Number and a declaration that he is not disqualified to become a director under this Act.

(d) A person appointed as a director shall not act as a director unless he gives his consent to hold the office as director and such consent has been filed with the Registrar within thirty days of his appointment in such manner as may be prescribed.

Deposit (Refundable) of Rs 1 Lakh as a precondition along with the DIN to contest election in Section 160 of the new act has also created an ambiguity and the MC has mandated a committee of its members to examine this aspect of law and submit a report.

Aforesaid changes in the Companies Act, 2013 have necessitated the postponement of PCI election 2015 by a few weeks, because the election of  Governing Body committee members (directors) can only be held in Annual General Meeting of the company. The audited annual accounts of PCI for Financial year 2014-15 are to be compulsorily required to be presented before the General Body for its adoption and the audit of accounts usually takes at least two months to complete.

In the light of above compulsion by the Companies Act, 2013, the MC has no choice but to defer the election be a few weeks. Provisional balance sheet for the year (2014-15) shall be ready in next 20 days and MC is confident that the Statutory Auditors will be able to complete the process of audit pertaining to account (2014-15) by the end of April, 2015.

Taking all requirements, in the view MC felt that the election to elect a new MC would be held at the AGM of the company  in the month of May 2015.

In the meantime, the present Managing Committee hereby resolves that after 30th March (the day of announcement of results of the last year election) it will regard itself, in spirit as serving in care-taker capacity so that an important landmark in the life of club resulting from the changes in the Companies Act, 2013 may be fulfilled.

In the changed capacity from March 31st the present MC would continue to fulfill all its statutory commitments which inter alia include the work related to preparation of annual accounts, all routine work needed for the functional operation of the Club, any old work of ordinary nature, besides bringing out notification for the election officer for overseeing the election to be scheduled in May 2015. In its extended phase, the committee will refrain from taking decisions on policy matters

Managing Committee
Press Club of India
New Delhi

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नदीम अहमद काजमी ने बिल्डर से कांट्रैक्ट साइन करने की इच्छा के कारण प्रेस क्लब इलेक्शन टलवाया?

: Raise a voice against delay in elections and demand immediate elections : New Delhi : On March 23, 2015, the office bearers and managing committee of the PRESS CLUB OF INDIA (PCI) held a meeting in which it was decided to postpone the Club’s elections, which were originally scheduled to take place in March. 

It is learnt that this is all the game-plan of the Club’s current Secretary General Nadeem Ahmad Kazmi, who wants to inordinately postpone the elections, so that he gets the chance to sign the contract with a builder to construct the new building for the Press Club, and, pocket hefty commission amount. I urge upon all the Press Club members to raise a voice against this (delay in elections), and demand immediate elections.

Press Club’s Assange… a whistle-blower…

(एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित)

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के कोषाध्यक्ष संजय सिंह को डेंगू, राम मनोहर लोहिया में भर्ती

प्रेस क्लब आफ इंडिया के कोषाध्यक्ष और राष्ट्रीय सहारा के नेशनल ब्यूरो में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार संजय सिंह के बारे में सूचना मिली है कि उन्हें मच्छर ने काट लिया है जिसके कारण उन्हें डेंगू हो गया है. उन्हें दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उन्हें जब भर्ती कराया गया उस समय उनका प्लेटलेट्स साठ हजार के करीब था और घटते घटते अब बीस हजार के करीब पहुंच गया है. संजय की नाजुक स्थिति पर डाक्टर लगातार नजर बनाए हुए हैं. कई पत्रकारों और संगठनों के लोगों ने संजय से उनकी सेहत को लेकर मुलाकात की.

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Report of the Press Council on threats to media in Telangana

The Report of three-member Committee consisting of Shri Rajeev Ranjan Nag as Convenor and S/Shri Krishna Prasad and K. Amarnath as Members constituted on 12.9.2014 by the Chairman, Press Council of India to probe threats to the media in Telangana following remarks reported to have been made by the Chief Minister of the State, Shri K. Chandrasekhar Rao, in Warangal City on 9th September, 2014 was adopted by the Council in its meeting held on 27.10.2014 at New Delhi. 

An open enquiry was made by the Committee with the journalists/Journalists’ Unions and State Government officers. On the basis of evidence and arguments at Hyderabad and Warangal, the Committee gave its findings and recommendations observing that no media person/house/journalist/journalist’s union denied that the Chief Minister had made the comments. They were of the firm opinion that the CM had deliberately and wilfully made these threats to browbeat the media so that it would not critically scrutinize his policies, programs and actions, and so that other media may fall in line, or else.

The Committee attempts to meet the CM of Telangana, the Chief Secretary and DGP to elicit their views on the points of reference made to the Committee was not successful.  While making general observation that those in public life and power politics to exercise restraint and behave in irresponsible and glacial manner, the Committee recommended that-

The PCI and the Government of India should impress upon the CM of Telangana state that blatant threats to the media and media personnel violates the oath of office he took to protect and defend the Constitution of India and follow the rule of law.

The CM of Telangana should be directed to restrain himself from making provocative statements against journalists or in saluting and supporting organizations which seek to limit the flow of information to the people, on the basis of nativity or domicile status.

The State Government of Telangana should be directed to take immediate action to create the conditions and atmosphere where free and fair journalism can be practiced by print and electronic journalists without fear of retribution by the State or the sword of ‘business terrorism’ by non-state actors.

All the cases registered against journalists for participating the protest actions should be withdrawn or fast tracked. Prompt action should be taken against the police official responsible for attacking the journalists and roughing up women journalists at Hyderabad and Warangal.  The photographers and videographers whose equipment was damaged during the police action should be compensated.

The State should not discriminate against the journalists on the ground of their nativity. 

The State Government should immediately take steps to enable MSOs to withdraw their illegal blackout of TV9 and ABN Andhra Jyothy in the interest of freedom of media and people’s right to know, as enshrined in the Constitution.

Print and electronic media organizations must put in place sterner mechanisms for greater editorial scrutiny of public interest journalist.
   
The Council, adopting the report decided to release in the public domain.

PR/3/14-15-PCI.

Dated: 27.10.2014.

Press Release

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प्रेस क्लब आफ इंडिया की वेबसाइट पाकिस्तानियों ने की हैक, साइबर सेल में मुकदमा दर्ज

पाकिस्तान से गरमा-गरमी के इस दौर में पाकिस्तानी हैकरों ने भारतीय मीडिया पर निशाना साधते हुए प्रेस क्लब आफ इंडिया की वेबसाइट को हैक कर लिया है. पाकिस्तानी हैकर्स ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की वेबसाइट को हैक करने के बाद इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर नकारात्मक और अश्लील कमेंट किया है. साथ ही हैकर्स ने साइट पर पाकिस्तान का झंडा लगा दिया है. यहां ‘फ्री कश्मीर’ के लिए संदेश भी लिखे हैं. हैकरों ने लिखा है कि उनका अगला निशाना भारत सरकार की वेबसाइट है.

पाकिस्तानी हैकरों ने यह धमकी दी है कि उसके निशाने पर भारत सरकार की वेबसाइट भी है, जल्द ही इस पर कब्जा किया जाएगा.  प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की साइट पर चेतावनी भरे लहजे में लिखा गया है कि भारत के क्रेडिट कार्ड, बैंक अकाउंट, सर्वर खतरे में हैं. गौर हो कि चंद दिन पहले प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने अपनी जारी विज्ञप्ति में अनुरोध किया था कि पीसीआई की वेबसाइट पर की गई किसी भी घोषणा का संज्ञान न लें क्योंकि हो सकता है कि यह घोषणा हैकर्स या शरारती तत्वों द्वारा दिगभ्रमित करने के लिए डाली गई हो.

प्रेस क्लब आफ इंडिया के कोषाध्यक्ष संजय सिंह ने बताया कि प्रेस क्लब की तरफ से दिल्ली क्राइम ब्रांच साइबर सेल में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है. प्रेस क्लब की वेबसाइट हैकरों के कब्जे से छुड़ाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. पुलिस-प्रशासन और आईटी से जुड़े लोग लगे हुए हैं. उम्मीद है शीघ्र ही सब कुछ नार्मल हो जाएगा. फिलहाल साइट के होमपेज को हैकरों से छुड़ाकर उस पर प्रेस क्लब आफ इंडिया की तरफ से ‘अंडर मेंटनेंस’ लिख दिया गया है. पाकिस्तानी संदेश और झंडे आदि हटा दिया गया है. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की साइट का नाम-पता www.pressclubofindia.org है.

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