वाकई अखिलेश यादव का ‘काम बोलता है’? पढ़िए इसे और गिनिए, पचास सेकेंड हुए या नहीं!!

Chandan Srivastava : ‘काम बोलता है।’ इस शीर्षक से पचास सेकंड का विडियो आ रहा है जो अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल के कामों का गुणगान होगा। काम बोल रहा है। बाराबंकी से मां-बेटी का अपहरण हुआ। बीती रात को दोनों की लाश मिली है। बेटी की मेरे घर से थोड़ी दूर चिनहट इलाके में और मां की देवां इलाके में। दोनों के साथ बलात्कार किए जाने की भी बात आ रही है।

काम बोल रहा है। यूपी के हाईवेज पर दिनदहाड़े मांओं के बेटियों के सामुहिक बलात्कार हो रहे हैं और डीजीपी, मुख्य सचिव जैसे वरिष्ठतम अधिकारी सपाई नेताओं का पांव पूज रहे हैं। जो नहीं पूज रहे उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी देने का काम नेताजी कर रहे हैं।

काम बोल रहा है। इस कदर कि कल हाईकोर्ट ने कहा प्रदेश में संवैधानिक तंत्र ध्वस्त हो चुका है। राष्ट्रपति शासन लगाने पर कल विचार भी करेगी कोर्ट।

काम बोल रहा है। अकेले लखनऊ में मच्छर जनित रोगों से इतनी मौतें हुईं कि हाईकोर्ट की त्यौरियां चढ़ने के बाद मौत का आंकड़ा जुटाने के लिए ‘डेथ ऑडिट कमेटी’ सरकार ने बना डाली। मेरा दावा है कि आपने बहुत सी ऑडिट कमेटियों के बारे में सुना होगा लेकिन ‘डेथ ऑडिट कमेटी’ पहली बार सुन पाए होंगे।

काम बोल रहा है। केंद्र सरकार बुंदेलखंड पैकेज से लगाए जनता के स्वास्थ्य के लिए रुपये भेज रही है और रुपये खर्च हो रहे हैं, सैफई में फिल्मी हीरोइन नचाने पर।

काम बोल रहा है। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे के लिए जमीनों के अधिग्रहण से पहले अपने लोगों को जमीनें खरीदवा कर सर्किल रेट बढ़ा दिए गए ताकि सरकारी धन से मोटा मुआवजा मिले और जिन इलाकों में पराए लोगों यानि आम लोगों की जमीनें थीं, उन इलाकों का सर्किल रेट गिरा दिया गया।

काम बोल रहा है। दुर्गा पूजा कराने वालों को एडवांस में जमानत भरनी पड़ी। और मस्जिदों के आसपास के मंदिरों के लाउडस्पीकर उतरवाए जाते रहे। काम बोल रहा है। काम बोल रहा है। काम बोल रहा है। पचास सेकंड हुए कि नहीं?

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‘आपने कहा प्रजापति को बचा लो, मैने बचा लिया।’ अखिलेश यादव उवाच।

प्रजापति माने गायत्री प्रजापति जो महज कुछ साल पहले तक bellow poverty line यानि बीपीएल श्रेणी का राशन कार्ड इस्तमाल करता था, आज उसकी सम्पत्ति एक हजार करोड़ बताई जाती है। कई बार लोकायुक्त से लगाए हाईकोर्ट तक की निगाहें उस पर टेढ़ी हुई लेकिन उस पर कोई मुसीबत न आने पाए यह सुनिश्चित कर रहे थे यूपी के मुख्यमंत्री।

वह अपने मुख्यमंत्री पद की ताकत का इस्तमाल खाली प्रजापति जैसे भ्रष्टों और राजा भईया जैसे गुंडों को बचाने में नहीं करते रहे, वह प्रदेश के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों को अपने बाप, चाचा, भाईयों आदि के पांवों का बोशा करने के लिए भी भेजा करते हैं। यह भी उन्हीं की स्वीकरोक्ति है।

इन सबके बावजूद कुछ लोगों को जब अखिलेश की बेदाग छवि की वकालत करते देखता हूं तो गैंग्स ऑफ वासेपुर का रामाधीर सिंह याद आ जाता है। ‘जब तक इस देस में सनीमा है लोग सूतिया बनते रहेंगे।’

बस इसमें सनीमा के साथ मीडिया जोड़ दीजिए।

अरे हां, शाहजहांपुर में एक 16 साल की बच्ची ने खुद को पंखे से लटका कर अपना जीवन समाप्त कर लिया है। उसे कुछ लोग लम्बे समय से परेशान कर रहे थे और पुलिस उसकी शिकायत नहीं ले रही थी।

वैसे यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं। यूपी में ऐसी दसियों घटनाएं रोज होती हैं। दरअसल अखिलेश यादव की साफ-सुथरी छवि को देखते यूपी पुलिस एफआईआर रजिस्टरों को गंदा नहीं करना चाहती।

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‘मैने मुख्य सचिव दीपक सिंघल से कहा कि जाओ नेताजी के पांव पकड़ लो।’ यह किसी और का नहीं स्वयं हमारे यूपी के मुख्यमंत्री का आज का उवाच है। यूपी के सबसे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को अपना पद बचाने के लिए ऐसे लोगों के भी पैर पकड़ने पड़ते हैं जिनकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं होती। जो नहीं तैयार होते उनका हश्र अमिताभ ठाकुर और सूर्य प्रताप सिंह का कर दिया जाता है।

पता नहीं पांव पकड़ने को लाचार इन बड़े अधिकारियों के आत्म सम्मान को भ्रष्टाचार का दीमक किस कदर चट कर जाता है कि अपने उन बच्चों की आंख में देखते हुए भी इन्हें शर्म नहीं आती जो इन्हें अपना हीरो समझते हैं। यूपी में सपा-बसपा सरकार में यही होता रहा है। मायावती तो फिर भी इस कदर मजबूर नहीं होने देती पर सपा में मुख्य सचिव और डीजीपी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पांव पकड़ते हैं तो जिले के डीएम-एसपी इलाकाई विधायक और जिलाध्यक्ष का। इसी प्रकार तहसीलदार-थानेदार सभासद, वार्ड अध्यक्ष, प्रधान, ब्लाक प्रमुख इत्यादि का।  जो जितना नीचे का अधिकारी है उसे उतने अधिक समाजवादी पांवों का बोशा करना पड़ता है।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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