ये दरोगा है या गली छाप गुंडा, देखें वीडियो

ताजनगरी आगरा में एक दबंग दरोगा की दादागिरी का वीडियो वायरल हुआ है। नोटबंदी के बाद बैंको और एटीएम के बाहर पैसा निकालने-बदलने के लिए लोगों की अच्छी खासी भीड़ देखी जा रही है। ताजगंज इलाके में एचडीएफसी बैंक के बाहर भीड़ लगी हुई थी तभी एक दबंग दरोगा बैंक के गेट पर पहुँच कर जबरन लाइन में लग गया। इस पर वहां घंटों से लाइन में लग रहे लोगों ने विरोध किया तो दबंग दरोगा खाकी की हनक दिखाने लगा.

दरोगा एक व्यक्ति पर खाकी की दादागिरी दिखाते हुए उस पर हावी हो गया. भद्दी-भद्दी गालियां देने लगा. इस पर दूसरे लोगों ने भी आवाज उठाते हुए दरोगा का विरोध किया तो दबंग दरोगा ने न सिर्फ गालियां दी बल्कि मारपीट शुरू कर दी. दरोगा ने सर्विस रिवाल्वर भी निकालने का प्रयास किया. इस दौरान सुरक्षा में तैनात वहाँ मौजूद सिपाही दबंग दरोगा की दादागिरी मूक दर्शक बन देखते रहे. जब बात बढ़ने लगी तो पुलिस वाले दरोगा को ले जाने लगे. लेकिन दरोगा की दबंगई सातवें आसमान पर नजर आ रही थी. बाद में बमुश्किल दरोगा को सिपाही समझा बुझाकर अपने साथ ले गया.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/qdNil9XD_To

आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट.

इस वीडियो को भी देखिए…

नोटबंदी से खुश इस बनारसी महिला की बातें सुनिए

https://youtu.be/pbTcDjPZadA

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यूपी में जंगलराज : धरना देने पर पुलिस वाले पीटते रहे, लड़के इंकलाब जिंदाबाद बोलते रहे (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : ये वीडियो अंग्रेजों के जमाने का नहीं है. आज की तारीख का है. पुलिस वाले पीटे जा रहे हैं और ये नौजवान इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं. इनका अपराध बस इतना है कि इन्होंने भोपाल में आठ लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिए जाने के घटनाक्रम का विरोध करते हुए न्यायिक जांच की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे. ढेर सारे पुलिस वाले आए और बिना चेतावनी दिए माइक दरी छीन झपट कब्जे में लेकर युवकों को पीटना शुरू कर दिया.

दो लोगों को तो थाने ले जाकर इस हद तक टार्चर किया गया कि बेहोश हो गए. इन्हें गंदी गंदी गाली दिया. सिमी आतंकी का तमगा देते हुए मुठभेड़ में मार डालने की धमकी दी. जी, सही समझे, पुत्तर प्रदेश के जंगलराज का यह मामला है, वह भी राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके हजरतगंज में.

सोचिए, यूपी में क्या खूब विकास हो रहा है. मुझे मालूम है कि इस स्टेटस को न भाजपाई लाइक करेंगे और न ही सपाई, और न ही इन दोनों दलों के शुभचिंतक और प्रशंसक. सेलेक्टिव और टारगेटेड क्रिटिसिज्म व जर्नलिज्म करने वाले अपनी सुविधा के हिसाब से लाइक शेयर करते हैं. अगर आप खुद को निष्पक्ष मानते हैं तो जरूर इसे लाइक करके शेयर करें ताकि यूपी पुलिस के क्रूर चेहरे को एक्सपोज किया जा सके.

वीडियो लिंक ये है :

https://www.youtube.com/watch?v=omXNQ2B-NyE

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को जानने समझने के लिए इसे पढ़ें…

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तो ये है यूपी में यश भारती एवार्ड हथियाने का फार्मूला!

Maheruddin Khan : काफी सोच विचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि यह अनुभव मित्रों के साथ साझा करना चाहिए. गत सप्ताह एक सज्जन मेरे पास आए. मैं उन्हें पहचान नहीं पाया तो उन्होंने बताया कि 20-25 साल पहले नवभारत टाइम्स में मुलाकात होती थी, उस समय आपने मेरी बहुत मदद की थी जिसके चलते मैं राजनीति में बड़े लोगों से मिल सका. उन्होंने बताया कि मैं आपको लखनऊ ले जाने के लिए आया हूँ, आपको मुख्यमंत्री से मिलाना है और यश भारती सम्मान दिलाना है. 

मैंने बताया कि इसकी लिस्ट तो जारी हो गई है तो वह बोले- 52 लोगों की लिस्ट जारी हुई थी, जो आज 65 हो गई है, अगले सप्ताह समारोह से पहले 70 पार कर जाएगी, आप अपना बायोडाटा लेकर मुख्यमंत्री से मिल कर यशभारती का आग्रह कर दें, बाकी मेरी ज़िम्मेदारी. मैंने सम्मान के लिए आग्रह करने से इंकार कर दिया तो वह नाराज होकर बोले- आप नहीं सुधरेंगे, 20 साल पहले भी आपने मेरी तरफ से दिए जा रहे गिफ्ट को लेने से इनकार कर दिया था.

वरिष्ठ पत्रकार मेहरुद्दीन खान की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव की तारीफ करने वाले उनके चमचे पत्रकार और बुद्धिजीवी यह जरूर पढ़ें…

Chandan Srivastava : यूपी के बेहाल हाल के लिए अखिलेश यादव के पास दो बहाने होते हैं। एक वह खुद बोलते हैं, दूसरा उनके टुकड़ों पर पल रहे चमचे पत्रकार, बुद्धिजीवी आदि बोलते हैं। अखिलेश कहते हैं कि यूपी के आपराधिक वारदातों की कवरेज ज्यादा ही होती है जबकि चमचे कहते हैं अखिलेश के काम में मुलायम, शिवपाल वगैरह अड़ंगा लगाते रहते हैं, समस्या वहीं है। कुल मिलाकर अखिलेश पाक-साफ। आपको ढाई साल पहले ले चलता हूं जब हमारे मुख्यमंत्री के दोस्ताना ने प्रदेश में सैकड़ों लोगों की जान ले ली।

कानपुर में एक एसएसपी हुआ करते थे तब यशस्वी यादव। महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस थे। सीएम साहब से याराना था। इसलिए उन्हें विशेष रूप से यूपी लाया गया। सब चर ही रहे हैं तो यार क्यों छूट जाए? तू भी आजा थोड़ा तू भी चर ले। तो सीएम के यह दोस्त किसी की नहीं सुनते थे। आईजी-डीआईजी छोड़िये, डीजीपी की क्या बिसात कि उन्हें कुछ कह सके। बहरहाल कानपुर में कुछ जुनियर डॉक्टरों का सपा के एक विधायक से तूतूमैंमैं हो गया। एसएसपी साहब ने आव देखा न ताव रात में मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में घुस-घुसकर डॉक्टरों पर पुलिसिया लठ्ठ बरसवाया। जो भी सफेद गाउन में दिखा सब पीटे गए। अधेड़ और बुजूर्ग प्रोफेसर भी गिरा-गिरा के थूरे गए। कईयों को गिरफ्तार करके लॉकअप में भी ठूसा गया। पिटाई भी खाए और 7-criminal law amendment act जैसे गम्भीर कानून के तहत मुकदमा भी दर्ज हो गया।

सुबह वही हुआ जो एक हवलदार भी जानता था। डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी। शाम होते-होते प्रदेश भर के सरकारी डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। उनकी बहुत सामान्य मांग थी। यशस्वी यादव को हटाओ, हमारी भी शिकायत दर्ज करो और हमारे साथियों को रिहा करो। सरकार सभी मांग मानने को तैयार थी सिवाय सीएम के दोस्त को एसएसपी पद से हटाने के। हुक्मरान ने इसे नाक का सवाल बना लिया। ऐसा लगा कि हूकुम के दोस्त को नहीं खुद हूकुम को पद से हटाने की मांग है। हड़ताल आगे बढ़ी। दो ही दिन में इलाज के बिना दर्जनों मौतें होने लगीं। अखबार रंगे हुए थे। गरीब मर रहे थे, कोई नहीं जानता कि उनमें कितने यादव थे और कितने मुसलमान।

काश कि मौत को भी वोट बैंकों का इल्म होता। खैर। सीएम के दोस्त को हटाने के लिए सरकार नहीं तैयार हुई। यह राजा के शान में गुस्ताखी होती। राजा दहाड़ा, मरने दो, हम एस्मा भी नहीं लगाएंगे। धरती के तथाकथित दूसरे भगवानों ने भी अपने पेशेवर शपथ को तिलांजलि दी। हड़ताल में प्राइवेट डॉक्टर भी शामिल हो गए। अब खतरा दरबारियों के वर्ग को था। लेकिन राजा तो राजा होता है। आठ दिन, नौ दिन, दस दिन बीत गए। दिन बीतते जा रहे थे। मौत को ओवरटाइम करना पड़ रहा था।

अंततोगत्वा हाईकोर्ट जागा। सुओ मोटो लिया गया। एसएसपी को हटाने का आदेश सुनाया गया। डॉक्टरों की मांग को जेनुइन करार देते हुए, उनकी ओर से भी मुकदमे दर्ज करने का हुक्म हुआ। हड़ताल वापस हुई लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मात्र केजीएमयू में साठ से अधिक लोगों की जानें जा चुकी थीं।  मुझे अंदर की बातें नहीं पता कि उस न्यायप्रिय राजा के हाथ, उसके किस चाचा ने रोक रखे थे। राजा का दोस्त थोड़ा गुबार थमते ही, इस बार राजधानी का कोतवाल बना। बताते हैं वहां अपने ताकत से मदमस्त वह अंजाने में राजपरिवार को ही नाराज कर बैठा। फिर उसे एक पल में वापस वहीं फेंक दिया गया, जहां से वह लाया गया था। समाजवाद में राजपरिवार की छोटी सी नाराजगी वह कर देती है जो सैकड़ों इंसानी बलि नहीं कर सकतीं।

Ram Janm Pathak : मुद्दे की बात। भले ही उत्तर प्रदेश दिल्ली से सटा हो, भले ही दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से जाता हो, लेकिन दिल्ली की तरह आज भी उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार या गुंडागीरी कोई मुद्दा नहीं है। भ्रष्टाचार या अपराध से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई विवाद है भी तो बस इस इतना कि गुंडा, बेइमान, भ्रष्टाचारी चाहे नेता हो या अफसर, अगर हमारे खेमे का है तो किसी को कोई दिक्कत नहीं है। अगर दूसरे के खेमे का है तो थोड़ी बहुत चिल्ल-पों होती है। बाकी सब खत्म।

मायावती कितनी भ्रष्टाचारी हों, उनके समर्थक कभी इस पर सवाल नहीं उठाते। मुलायम, शिवपाल से लेकर कोई भी यादव नेता कितना ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो, उनके समर्थक और मतदाताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि वे खुश होते हैं। उनके बयान सुनो तो कहेंगे पंडितो-ठाकुरों ने बहुत सालों तक लूटा है, अब हमें भी लूटने दो। उन्हें नहीं पता कि सपा हो या बसपा, सभी दलों में लूटने वालों में पंडित-ठाकुर, बनिया-वैश्य कम नहीं हैं।

बसपा और सपा से लोहा लेने खड़ी हुई भाजपा कि हालत यह है कि उसके पास भी आपराधिक पृष्ठभूमि, सामंती, जातिवादी, सांप्रदायिक नेताओं की पूरी फौज खड़ी है। वहां तो कई मुख्तार अंसारी, पंडित सिंह, उड्डू सिंह-पुड्डू सिंह पर अकेले ब्रजभूषण शरण ही भारी हैं। ज्यादा चूं-चपड़ कोई करेगा तो योगीजी किस दिन काम आएंगे।

मुद्दे की बात यह है कि मुलायम सिंह इस यथार्थ को भलीभांति जानते हैं। मुलायम जानते हैं कि स्वच्छ छवि मीडिया में चमकने के लिए अच्छी हो सकती है, वह कम से कम उत्तर प्रदेश में चुनाव नहीं जिता सकती। इसलिए उंडे-गुंडे, अपराधी-मवाली, अच्छे-बुरे सबका एक जखीरा बनाओ और सत्ता तक पहुंचो। उत्तर प्रदेश में मतदान करते समय मतदाता इमेज, विकास, ईमानदारी, भलाई, यह सब नहीं देखता। उसके लिए सबसे ज्यादा प्यारी है अपनी जाति। अपनी बिरादरी, अपना भाई-भतीजावाद।

अखिलेश आज अगर अपनी पार्टी बना भी लें तो वे केजरीवाल नहीं है, न यूपी दिल्ली है कि जनता उनकी दीवानी हो जाएगी। उन्हें सिर्फ कुछ यादवों और मुसलमानों के वोट मिल जाएं,यही बहुत है। हो सकता है कि कुछ शहरी युवा उन्हें वोट दे दें। इसके अलावा, और कौन वोट देगा अखिलेश को? सवर्णों में कितने प्रतिशत लोग हैं जो अखिलेश का समर्थन करेंगे? भाजपा के पास एक भी बेदाग चेहरा नहीं है। इसीलिए वह बहाना बनाती है विकास का और बगल में रामंदिर दबाए रहती है। चुनाव मैदान में अभी उम्मीदवारों की सूची जारी होगी तो एक से बाहुबली, वंशवादी, ये और वो-पूंजीपति, पैसावाले–यही सब उनके पास भी हैं।

यह बात भी मुलायम सिंह जानते है। -इसलिए मुख्तार, अफजाल, अमर, राजा भैया, अमनमणि जैसे लोगों के बीच अखिलेश का चेहरा दिखाते रहो, यही चाहते हैं।  और यह नाटक करीब-करीब संपन्न हो गया है। इसमें काफी कुछ तयशुदा, लिखित और पूर्वभाषित था। बीच में कुछ इधर-उधर जरूर हुआ है। बाकी सब कुछ वही रहेगा।

आने वाले चौबीस घंटे में अनुमान है कि हवाएं तेज चलेंगी। गरज के साथ-साथ कहीं छीटें भी पड़ सकती हैं। प्रदूषण आंखों में जलन देगा। बेहतर है गलमुच्छा बांध कर निकलें।  ज्यादा बेहतर है निकलें ही नहीं।  समाचार समाप्त हुए।

Arvind K Singh : पैदल होने के कगार पर खड़े अखिलेश यादव को अब अचानक रिक्शा चालकों की दिक्कतें याद आ गयी हैं। चुनाव के पहले उनके लिए काफी लंबे दावे किए गए थे। लेकिन उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जा सका। अब चुनाव सिर पर है तो फिर किसान, मजदूर और गरीब सबकी तरफ उनका ध्यान जा रहा है। लेकिन अब इन घोषणाओं का कोई अर्थ नहीं है, न ऐसी उदारता का। जब तक तथाकथित राजाज्ञाएं निकलेंगी तब तक चुनावी आचार संहिता लागू हो जाएगीं। पांच साल का समय कायाकल्प के लिए बहुत अधिक होता है, लेकिन इनका अधिकतम समय घर परिवार और मित्र मंडली में लगा रहा। गांव गिरांव के लिए जो करना था, वह अखिलेश यादव नहीं कर सके। अब पछताने या दावे करने से कुछ नहीं होने वाला है। अखिलेश से काफी उम्मीदें थीं लेकिन उन्होंने भी निराश ही किया है।

पत्रकार त्रयी चंदन श्रीवास्तव, राम जन्म पाठक और अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में डेंगू से मौत के मुद्दे को नवभारत टाइम्स ने लगातार छापा, नभाटा की पूरी टीम बधाई की पात्र

Dhananjay Singh : हाई कोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव से पूछा है क्यों न धारा 356 लगाकर सरकार बर्खास्त कर दी जाय? कारण परिवार का लफड़ा नहीं केवल लखनऊ में ही डेंगू से होने वाली मौतें, बाकी सूबा भी रामभरोसे! दो महीने से इस मुद्दे पर कोई सरकारी मीटिंग नहीं हुई, अधिकारिक रूप से सरकार राजधानी में 90 मौतें मान रही है और चर्चा के मुताबिक यह संख्या 500 हो सकती है. कोई ऐसा मोहल्ला नहीं होगा जहाँ डेंगू न फैला हो!

देश भर के चैनल सपा कार्यालय से लेकर सीएम आवास की दूरी नाप रहे हैं लेकिन उन्हें दुर्व्यवस्था और मौतें नहीं दिख रहीं। अखबार देखता रहा हूँ तो नवभारत टाइम्स ने जिस तरह लगातार इस मुद्दे को छापा है वह बाकी अखबारों के लिए आइना है जिसमें वो खुद को देखें। नवभारत टाइम्स की टीम बधाई की पात्र है जो एक वाजिब मुद्दे पर लगातार डटी हुई है। क्या डेंगू के प्रकोप पर लगातार खबर और जागरूकता फैलाने से सत्ताधारी दल की गुड बुक से हट जाने का डर है ?फिर राजधानी की बेहद जरूरी खबर पर पर्दा डालने का क्या मतलब?

पत्रकार धनंजय सिंह की एफबी वॉल से.

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मुलायम कुनबे में झगड़े से जो बड़े खुलासे हुए, उसे आपको जरूर जानना चाहिए….

Nikhil Kumar Dubey : घर के झगड़े में जो बड़े ख़ुलासे हुए…

1: यादव सिंह घोटाले में रामगोपाल और अक्षय फँसे हैं, बक़ौल शिवपाल. 

2: अमर सिंह ने सेटिंग करके मुलायम को जेल जाने से बचाया था: ख़ुद मुलायम ने बताया.

3: शिवपाल रामगोपाल की लड़ाई में थानों के कुछ तबादले अखिलेश को जानबूझकर करने पड़े थे: ख़ुद अखिलेश ने कहा.

4: राम गोपाल नपुंसक है : अमर सिंह ने कहा.

5: प्रतीक काग़ज़ों में पिता का नाम एम एस यादव लिखते हैं लेकिन मुलायम के किसी हलफ़नामे में उनके दूसरे बेटे का नाम नहीं

6: प्रमुख सचिव बनने की योग्यता मुलायम के पैर पकड़ने से तय होती है : अखिलेश.

Shamshad Elahee Shams: मैं पहलवान मुलायम सिंह का न कभी प्रशंसक रहा न कभी उसके साईकिल छाप समाजवाद का वकील. बहुत दिनों से सैफई में कब्बड्डी का मैच देशभर का मनोरंजन कर रहा है उसे मैं भी देख रहा हूँ. मुलायम सिंह की घटिया राजनीति जिसका इतिहास सिर्फ और सिर्फ अवसरवादिता, धोखेबाजी-टिकियाचोरी का रहा हो आखिर उस पर वक्त क्यों जाया किया जाय? ताश के पत्तो का महल एक न एक दिन ढहना ही है, आज नहीं तो कल. मुलायम सिंह की राजनीति को गौर से देखने वाले सभी जानते है कि उस पर भरोसा करना खुद को धोखा देना है. जिसका मुलायम सिंह दोस्त उसे दुश्मन की जरुरत नहीं. मुलायम सिंह ने चौधरी चरण सिंह, वी. पी. सिंह, काशीराम-मायावती, भाकपा-माकपा, नितीश कुमार, लालू प्रसाद किस किस को धोखा नहीं दिया? प्रदेश की सारी सत्ता का केंद्रीयकरण सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार में ही कर देने वाले के दिमाग की मैपिंग करें तो यही पता चलेगा कि उसे खुद पर और अपने परिवार के लोगों के आलावा किसी दूसरे पर कभी विश्वास नहीं रहा. मुलायम सिंह ने लोहिया छाप समाजवाद के नाम पर सिर्फ अपने परिवार का एकाधिकार जिस तरह स्थापित किया वह राजनीति के किसी भी मापदंड के अनुसार निंदनीय है. आखिर जो जीवन भर बोया, अंत में वही काटेगा. आज तक दूसरो के साथ जो किया वक्त ने दिखा दिया कि उसका जवाब खुद उसका लड़का ही एक दिन उसे देगा. कल्याण सिंह और मुलायम सिंह, दोनों के राजनीतिक चरित्र एक जैसे रहे है दोनों की गति एक ही होनी है, एक की हो चुकी दूसरे की प्रक्रिया चल रही है.

Vishnu Nagar : लखनऊ की राजनीतिक ड्रामेबाज़ी में मुलायम सिंह यादव ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने कोई ऐसा अपराध किया था, जिसमें उन्हें जेल हो सकती थी लेकिन तिकड़मेश्वर ने उन्हें किसी तरह बचा लिया। वह केस क्या था, क्या यह वही था, जिसमें आय से अधिक संपत्ति का मामला था और सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि प्रमाण के अभाव में वह इस मामले को बंद करना चाहती है मगर उसने अभी तक मामला बंद नहीं किया है और मोदी सरकार बंद होने देगी भी नहीं। कांग्रेस -भाजपा दोनों इसका इस्तेमाल मुलायम सिंह को चंगुल में फँसाये रखने के लिए करती रही हैं और सब जानते हैं कि सीबीआई का रुख़ सरकार के हिसाब से बनता -बिगड़ता है। तो क्या यही मामला है या कोई और मामला, जिसमें तिकड़मेश्वर ने उन्हें बचाया?यह जानना दिलचस्प होगा और तिकड़म से बचाया गया है उन्हें तो कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए?

Vivek Dutt Mathuria : तस्वीर साफ है मुलायम अखिलेश को ट्रेंड कर रहे हैं बस ….जो मुलायम के मन में है उसे न शिवपाल जानते और न अमर सिंह. इतिहास गवाह है मुलायम सियासत में खुद के अलावा किसी के नहीं हुए….वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, वामपंथी, मायवती, अजित सिंह और न जाने कितने हैं ज़िनके कांधे पर पैर रख कर यहां तक पहुंचे हैं अब भाजपा के नजदीक दिख रहे हैं.

Khushdeep Sehgal : समाजवादी कुनबे की हालत देखकर एक किस्सा याद आ गया. एक बुजुर्ग सेठ को मौत से बड़ा डर लगता था. उसने खूब पूजा-पाठ करने के बाद ईश्वर से मौत से बचने का वरदान ले लिया. वरदान ये था कि यमदूत जब भी उसे लेने आएगा तो वो उसे दिख जाएगा, ऐसे में वो अपने पैर तत्काल यमदूत की ओर कर दे, जिससे यमदूत उसे ले नहीं जा पाएगा. साथ ही सेठ को ये ताकीद भी किया गया कि वो इस वरदान का किसी और से भूल कर भी ज़िक्र नहीं करेगा. एक बार सेठ बीमार होने के बाद बिस्तर पर पड़ गया. फिर वो घड़ी भी आ गई जब यमदूत उसे ले जाने के लिए आ पहुंचा. लेकिन सेठ के पास तो वरदान था, झट अपने पैर उसने यमदूत की ओर कर दिए. यमदूत फिर उसके सिर की ओर पहुंचा. सेठ ने फुर्ती से फिर अपने पैर यमदूत की ओर कर दिए. अब यही चक्कर काफी देर तक चलता रहा. यमदूत जिधर जाए, सेठ उधर ही अपने पैर कर दे. सेठ इस तरह जान बचाता रहा. यमदूत थक कर सेठ को छोड़कर जाने ही लगा था. लेकिन सेठ को पैर इधर-उधर करते देख घरवालों ने समझा कि उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. घरवालों ने रस्सियों से सेठ के पैर बांध दिए. यमदूत का काम हो गया. अब जैसे ही वो सेठ के सिर की तरफ आया तो सेठ के मुंह से निकला…”साला जब भी मरवाया, घरवालों ने ही मरवाया”…

सौजन्य : फेसबुक

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वाकई अखिलेश यादव का ‘काम बोलता है’? पढ़िए इसे और गिनिए, पचास सेकेंड हुए या नहीं!!

Chandan Srivastava : ‘काम बोलता है।’ इस शीर्षक से पचास सेकंड का विडियो आ रहा है जो अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल के कामों का गुणगान होगा। काम बोल रहा है। बाराबंकी से मां-बेटी का अपहरण हुआ। बीती रात को दोनों की लाश मिली है। बेटी की मेरे घर से थोड़ी दूर चिनहट इलाके में और मां की देवां इलाके में। दोनों के साथ बलात्कार किए जाने की भी बात आ रही है।

काम बोल रहा है। यूपी के हाईवेज पर दिनदहाड़े मांओं के बेटियों के सामुहिक बलात्कार हो रहे हैं और डीजीपी, मुख्य सचिव जैसे वरिष्ठतम अधिकारी सपाई नेताओं का पांव पूज रहे हैं। जो नहीं पूज रहे उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी देने का काम नेताजी कर रहे हैं।

काम बोल रहा है। इस कदर कि कल हाईकोर्ट ने कहा प्रदेश में संवैधानिक तंत्र ध्वस्त हो चुका है। राष्ट्रपति शासन लगाने पर कल विचार भी करेगी कोर्ट।

काम बोल रहा है। अकेले लखनऊ में मच्छर जनित रोगों से इतनी मौतें हुईं कि हाईकोर्ट की त्यौरियां चढ़ने के बाद मौत का आंकड़ा जुटाने के लिए ‘डेथ ऑडिट कमेटी’ सरकार ने बना डाली। मेरा दावा है कि आपने बहुत सी ऑडिट कमेटियों के बारे में सुना होगा लेकिन ‘डेथ ऑडिट कमेटी’ पहली बार सुन पाए होंगे।

काम बोल रहा है। केंद्र सरकार बुंदेलखंड पैकेज से लगाए जनता के स्वास्थ्य के लिए रुपये भेज रही है और रुपये खर्च हो रहे हैं, सैफई में फिल्मी हीरोइन नचाने पर।

काम बोल रहा है। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे के लिए जमीनों के अधिग्रहण से पहले अपने लोगों को जमीनें खरीदवा कर सर्किल रेट बढ़ा दिए गए ताकि सरकारी धन से मोटा मुआवजा मिले और जिन इलाकों में पराए लोगों यानि आम लोगों की जमीनें थीं, उन इलाकों का सर्किल रेट गिरा दिया गया।

काम बोल रहा है। दुर्गा पूजा कराने वालों को एडवांस में जमानत भरनी पड़ी। और मस्जिदों के आसपास के मंदिरों के लाउडस्पीकर उतरवाए जाते रहे। काम बोल रहा है। काम बोल रहा है। काम बोल रहा है। पचास सेकंड हुए कि नहीं?

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‘आपने कहा प्रजापति को बचा लो, मैने बचा लिया।’ अखिलेश यादव उवाच।

प्रजापति माने गायत्री प्रजापति जो महज कुछ साल पहले तक bellow poverty line यानि बीपीएल श्रेणी का राशन कार्ड इस्तमाल करता था, आज उसकी सम्पत्ति एक हजार करोड़ बताई जाती है। कई बार लोकायुक्त से लगाए हाईकोर्ट तक की निगाहें उस पर टेढ़ी हुई लेकिन उस पर कोई मुसीबत न आने पाए यह सुनिश्चित कर रहे थे यूपी के मुख्यमंत्री।

वह अपने मुख्यमंत्री पद की ताकत का इस्तमाल खाली प्रजापति जैसे भ्रष्टों और राजा भईया जैसे गुंडों को बचाने में नहीं करते रहे, वह प्रदेश के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों को अपने बाप, चाचा, भाईयों आदि के पांवों का बोशा करने के लिए भी भेजा करते हैं। यह भी उन्हीं की स्वीकरोक्ति है।

इन सबके बावजूद कुछ लोगों को जब अखिलेश की बेदाग छवि की वकालत करते देखता हूं तो गैंग्स ऑफ वासेपुर का रामाधीर सिंह याद आ जाता है। ‘जब तक इस देस में सनीमा है लोग सूतिया बनते रहेंगे।’

बस इसमें सनीमा के साथ मीडिया जोड़ दीजिए।

अरे हां, शाहजहांपुर में एक 16 साल की बच्ची ने खुद को पंखे से लटका कर अपना जीवन समाप्त कर लिया है। उसे कुछ लोग लम्बे समय से परेशान कर रहे थे और पुलिस उसकी शिकायत नहीं ले रही थी।

वैसे यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं। यूपी में ऐसी दसियों घटनाएं रोज होती हैं। दरअसल अखिलेश यादव की साफ-सुथरी छवि को देखते यूपी पुलिस एफआईआर रजिस्टरों को गंदा नहीं करना चाहती।

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‘मैने मुख्य सचिव दीपक सिंघल से कहा कि जाओ नेताजी के पांव पकड़ लो।’ यह किसी और का नहीं स्वयं हमारे यूपी के मुख्यमंत्री का आज का उवाच है। यूपी के सबसे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को अपना पद बचाने के लिए ऐसे लोगों के भी पैर पकड़ने पड़ते हैं जिनकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं होती। जो नहीं तैयार होते उनका हश्र अमिताभ ठाकुर और सूर्य प्रताप सिंह का कर दिया जाता है।

पता नहीं पांव पकड़ने को लाचार इन बड़े अधिकारियों के आत्म सम्मान को भ्रष्टाचार का दीमक किस कदर चट कर जाता है कि अपने उन बच्चों की आंख में देखते हुए भी इन्हें शर्म नहीं आती जो इन्हें अपना हीरो समझते हैं। यूपी में सपा-बसपा सरकार में यही होता रहा है। मायावती तो फिर भी इस कदर मजबूर नहीं होने देती पर सपा में मुख्य सचिव और डीजीपी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पांव पकड़ते हैं तो जिले के डीएम-एसपी इलाकाई विधायक और जिलाध्यक्ष का। इसी प्रकार तहसीलदार-थानेदार सभासद, वार्ड अध्यक्ष, प्रधान, ब्लाक प्रमुख इत्यादि का।  जो जितना नीचे का अधिकारी है उसे उतने अधिक समाजवादी पांवों का बोशा करना पड़ता है।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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”सबकी पाती” (सपा) के ‘पत्र’ काल के दौर में ”चोथा मुर्गा” यानी शार्ट कट बोले तो ‘सीएम’ का पत्र जनता के नाम

बेचारी जनता,

मेरे चरणों में आपका सादर प्रणाम, उम्‍मीद है कि आप सब लोग कुशलपूर्वक होंगे. ऐसा लिखना पड़ता है अन्‍यथा मुझे पूछने की जरूरत ही क्‍या थी? साढ़े चार साल कुछ नहीं पूछा. वैसे पत्र लिखने का दौर चल रहा है तो सोचा एक पत्र आपलोगों के नाम भी लिख दूं. खैर, विश्‍वास है कि फैमिली ड्रामा देखकर आपलोगों का टाइम मस्‍त गुजर रहा होगा. इधर थोड़ा रायता ज्‍यादा फैल गया है नहीं तो पिछले साढ़े चार साल में जिस तरीके से हमने परिवार के साथ मिलकर सरकार चलाई है, उसमें मुजफ्फरनगर से लगायत मथुरा-बनारस सब आपने महसूस ही किया होगा. कब्‍जा, वसूली से हमें फुरसत ही नहीं थी. हमने और हमारी फैमली ने साढ़े चार साल सरकार चलाई और सीबीआई की छोड़कर किसी की नहीं सुनी. कई मामलों में तो कोर्ट की भी नहीं. जनता का सुनने का तो सवाल ही कहां उठता है.

अब जब चुनाव सिर पर आ चुका है तो न्‍यूज चैनलों की दिक्‍कत को देखते हुए हमने सपरिवार निर्णय किया कि उनके लिए कुछ किया जाए. उन्‍हें अगर मसाला नहीं मिलता है तो उनकी टीआरपी नहीं आती है, उनके रिपोर्टर-एंकर चीखे-चिल्‍लाए बिना कमजोरी फील करने लगते हैं, इसलिए हमने यह योजना बनाई. इसी योजना की कड़ी में हमने कौमी ‘एकता’ के विलय को लेकर अपने ‘एकता’ को भी कालीदास और विक्रमादित्‍य मार्ग से निकालकर सड़क पर ला दिया, जिससे एकता कपूर का सीरियल बनाकर न्‍यूज चैनल वाले दिखा सकें. आशा है कि टीवी चैनलों को अब खबरों की कमी को लेकर कोई परेशानी नहीं होगी. चीखने-चिल्‍लाने वाले रिपोर्टरों और एंकरों को भी सर्जिकल स्‍ट्राइक और रामलीला के चक्‍कर में टाइम बरबाद नहीं करना पड़ रहा होगा. उन्‍हें चीखने-चिल्‍लाने का पूरा मौका मिल रहा होगा और उनकी कमजोरी की फीलिंग जा रही होगी. मारधाड़-नोकझोंक-नारेबाजी से भरपूर दृश्‍य देखकर रिपोर्टरों का भी माइक फड़क रहा होगा. चोंच फड़फड़ा रहा होगा. हमारे और चाचा के पीटे गए समर्थकों के मुंह में माइक लगाकर पूछने का मौका भी होगा कि कैसा महसूस हो रहा है. मुंबई हमले के दौरान जमीन पर लोटकर रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर अब साइकिल पर बैठकर रिपोर्ट दे रहे होंगे. कोई लेट कर भी कर रहा होगा. यानी ड्रामा इधर भी चल रहा है तो उधर भी आपलोग पूरा ड्रामा कर ही रहे होंगे.

खैर, हम समाजवादियों ने साढ़े चार साल जमकर सरकार चलाई. ऐसी सरकार चलाई कि सभी को खाने-पीने का बराबर मौका दिया. सबने खाया. कोई पहाड़ खोदकर खाया तो किसी ने नदी खोद डाली. कुछ थानों पर बैठकर खाए. कुछ तहसील और जिला मुख्‍यालय पर भी खाते रहे. कुछ योजनाएं भी खाई गईं. हमने खाने में कोई कमी नहीं होने दी. केंद्र सरकार की तरह ‘ना खाएंगे और ना खाने देंगे’ कहकर हमने लोगों की दाल-सब्‍जी के बारे में सोचने से परहेज किया. केंद्र भले ही महंगाई बढ़ाकर जनता को ना खाने दे, लेकिन हमने सभी समाजवादियों को खाने की पूरी छूट दी. साढ़े चार साल कई मुख्‍यमंत्रियों ने मिलकर सरकार चलाई और कानोंकान किसी को खबर नहीं हुई कि सरकार कैसे चली, सबको हमने बराबर मौका दिया, लेकिन कुछ लोग ज्‍यादा बेइमानी पर उतर गए. बेइमानी में ईमानदारी का तनिक भी ध्‍यान नहीं रखा गया.

इधर, थोड़ा घरेलू परेशानी बढ़ गई है. टाइम साजिश से निपटने और रचने में जा रहा है, इसलिए सरकार को भगवान भरोसे छोड़कर संघर्ष की तैयारी कर रहा हूं. आपलोगों को तो पता ही है कि समजावादी संघर्ष से कभी पीछे नहीं हटते हैं. हम सब समाजवादी है इसलिए सब संघर्ष कर रहे हैं. इधर पापा और चाचाओं के चलते व्‍यस्‍तता बढ़ गई है सो आपलोगों को लोकसेवकों, अरे वही नौकरशाह, जो खुद को भगवान से कम नहीं समझते, उनके भरोसे छोड़कर मामला निपटाने में जुटा हुआ हूं. मेरे कुछ खास प्रिय लोकसेवक हैं, जो जनता की सारी समस्‍या कागजों पर दूर कर देंगे. यह लोकसेवक कागजी घोड़े दौड़ाने में माहिर हैं. साढ़े चार साल हमने जमीन काम करने से परहेज किया ताकि कोई कब्‍जा का आरोप ना लगा सके .हवा में हमने बहुत सारे महल बनवाए हैं. प्रमुख सचिव साहब हवामहल खड़ा करने में माहिर हैं. हमने एक्‍सप्रेस-वे भी बनवा दिया है ताकि सारे कागजी घोड़े इसी पर दौड़ाए जा सकें. आशंका है कि कई कागजी घोड़े तो एक्‍सप्रेस-वे बनने से पहले बुआजी के कार्यकाल से भी दौड़ रहे होंगे. कुछ माहिर नौकरशाह हमारे साथ बुआजी के दौर का कागजी घोड़ा भी दौड़ा रहे होंगे.

मैं पूरे साल अंदरूनी संघर्ष में बिजी रहा, इसलिए टाइम का पूरा अभाव रहा. उम्‍मीद करता हूं कि हमारे अधिकारियों की कर्मठता से आप सब लोग सुखी होंगे. बिजली, पानी और सड़क तो खैर कोई समस्‍या ही नहीं होगी. आशा है कि कर्मठ अधिकारियों की कृपा से बिजली भले टाइम से नहीं पहुंच रही होगी, लेकिन बिल आपलोगों को टाइम से मिल रहा होगा. बिजली से पहले बिल पहुंचना इन कर्मठ अधिकारियों के प्रयास का ही फल है. कहीं-कहीं तो हमारी सरकार ने खंभे पहुंचाने से पहले ही बिल पहुंचाने का प्रयास किया है. कई जगहों पर इसमें हमें सफलता मिली है. वैसे, बिजली आप तक भले ना पहुंची हो, लेकिन खंभे जरूर गड़ गए होंगे. बिल भी आ रहा होगा. आप लोग बिल भरें हम अगली बार सरकार बनने पर पूरा बिजली चुका देंगे. चुनाव का टाइम आ रहा है तो खर्च बढ़ने वाला है. आप लोग बिल चुका देंगे तो हमारे काम आ जाएगा.

पीएम साहब, जिस तरीके से चैनलों और अखबारों के जरिए पाकिस्‍तान को नेस्‍तनाबूद कर दिया, उसी तरह हमने राज्‍य के प्रत्‍येक गांव में खुशहाली पहुंचा दी है. जनता को खुशहाली महसूस कराने के लिए हमने प्रचार में बहुत पैसा झोंका है. उम्‍मीद है कि जनता खुशहाली महसूस करने लगी होगी. हमारी सरकार ने रोजगार के कई अवसर बनाए. हमारे पूरे परिवार को रोजगार मिला. ऐसी आशा है कि आप लोगों को भी रोजागार दिख रहा होगा. हमने अपने बहुत से कार्यकर्ताओं को थाने और तहसीलों में आपका काम कराने के एवज में वसूली का रोजगार दिया. जो प्रतिभाशाली थे, उन्‍हें जमीन कब्‍जा के रोजगार में लगाया. ट्रांसफर-पोस्टिंग के रोजगार में भी कई लोगों का भला करने में समाजवादी सरकार सफल रही. हमारी सरकार ने चाचाजी के नेतृत्‍व में वहां-वहां नहरें खुदवा दीं, जहां कभी पानी पहुंचने की गुंजाइश नहीं है. चाचा से निपट कर जल्‍द ही हम रोजगार और महंगाई का हवाई सर्वेक्षण करवाएंगे. गन्‍ना का मूल्‍य भले ही नहीं बढ़वाया, लेकिन चीनी मिलों का ब्‍याज माफ किया ताकि किसानों को लाभ मिल सके. हमारी सरकार समरसता में भरोसा करती है. हमने लोगों के मन से पुलिस का डर बाहर किया. शरीफ गुंडों को परेशान करने वाले पुलिस को हमारे कार्यकर्ताओं ने पीटकर संदेश दिया कि यहां किसी को अपने पद का दुरुपयोग नहीं करने दिया जाएगा. हमारे नेताओं ने पुलिस का सही इस्‍तेमाल करते हुए कई लोगों को सबक भी सिखाया. पूरा साढ़े चार साल मस्‍ती से गुजरा, लेकिन अमर सिंह की वापसी ने सारा गुड़ गोबर कर दिया.

एनसीआर की जिम्‍मेदारी संभालने वाले बड़के चच्‍चा बड़े माहिर पत्रबाज हैं. ‘रागो’ चच्‍चा अपने को ‘रागा’ से बड़ा जानकार मानते हैं. यह पत्र लिखने की कला भी मैंने उन्‍हीं से सीखी, लेकिन अमर सिंह की एंट्री चच्‍चा के लिए परेशानी का सबब बन गई. उनके धंधे पर बन आई है और मैं चच्‍चा और उनके धंधे की परेशानी नहीं देख सकता था इसलिए चच्‍चा के निर्देशन में चाचा के खास बन रहे अमर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला. चच्‍चा से पहले अमर सिंह का ही तो धंधा इधर चल रहा था. मैंने चच्‍चा के कहने पर ही यादव सिंह को बहाल किया था. नाम से समझ आया कि यह कोई अपना ही बंदा है. वइसे भी, चच्‍चा की ईमानदारी पर हमें कोई शक नहीं था इसलिए हमने यह भी कनफर्म नहीं किया कि वह करता क्‍या है? यादव सुनते ही हमे पूरा विश्‍वास हुआ कि यह आदमी समाजवादी होगा. पक्‍का समाजवादी. हमने समाजवाद को मजबूत करने के लिए उसे बहाल कर दिया, लेकिन कुछ लोग समाजवाद को बरबाद करने के लिए यादव को बुआजी का सिंह बनाकर सीबीआई के झमेले में ले गए.

गायत्री यानी ‘गाय’ तेरी पर भी लोग मिथ्‍या आरोप लगाने से नहीं चूके. ‘गाय’-‘भैंस’ तो हम समाजवादियों का प्रिय पशु है. खासकर भैंस. गाय तो भाजपा वालों को भी बहुत प्रिय है. खासकर चुनाव के दौरान. खैर, भैंस-गाय अगर हमारे प्रिय नहीं होते तो हम भला आजम चा का भैंस क्‍यों ढूंढवाते. प्रदेश की उस पुलिस से हमने भैंस ढूंढवा ली, जो साइकिल तक नहीं ढूंढ पाते. आप समझ सकते हैं कि यूपी की पुलिस कितना लगन और मेहनत से काम करती है. इस दौरान पुलिस ने भालू को भी बांध कर पीटा कि वह कबूल कर ले कि वह आजम चा की भैंस है, लेकिन दूध नहीं निकलने की चलते यह प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा. भैंस का फोटो लेकर उसे पहचानना कोई आसान काम नहीं होता, लेकिन पुलिस ने ना केवल सभी का चेहरा पहचाना बल्कि उसे बरामद भी किया. हमने जब ‘गाय’तेरी प्रजापति को काम दिया तो कुछ सवर्णों को यह रास नहीं आया. बुआ इसलिए इन्‍हें मनुवादी कहती हैं. जब यह बंदा गाय भी है और प्रजा का पति भी तो क्‍या इसे अपनी प्रजा के लिए जमीन-जायदाद खरीदने का अधिकार नहीं है? इस आदमी ने ईमानदारी से हमारे पूरे परिवार का ध्‍यान रखा, तो क्‍या इसे कुछ खोदने-खनने का अधिकार नहीं है?

खैर, आप लोग को अधिकारियों के भरोसे छोड़कर चाचा से निपटने में जुटा हुआ हूं. उनसे तो निपट लेता लेकिन पिताजी ने रायता फैला दिया है, लेकिन कोई बात नहीं सरकार जाने तक मैं सबसे निपट लूंगा. यह सच्ची की लड़ाई नहीं है. हम ड्रामा कर रहे हैं. राज्यपाल साहेब बहुत नियम कानून बतियाते हैं तो बस उनको ही बिजी करने के लिए हमलोग रोज मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी और शपथ का कार्यक्रम करा रहे हैं ताकि वह व्यस्त तो रहें ही उनका भी कुछ खर्चा होता रहे. बर्खास्तगी और शपथ तो हमारा घरेलू मसला है, इससे जनता को का लेना-देना है. जितनी बार मन होगा, उतनी बार करेंगे. बस गुजारिश है कि आप लोग सरकार को निपटाने के बारे नहीं सोचिएगा नहीं तो स्‍मार्ट फोन से हाथ धो बैठेंगे. सरकार बन गई तो आप को स्‍मार्ट फोन मिलेगा और हम बहती गंगा में हाथ धोएंगे. आप लोगों को दीपावली की हार्दिक ‘शुभ काम ना आएं’. जय समाजवाद जय परिवारवाद.

आपका ही अपना
चोथा मुर्गा

इस व्यंग्य कथा के लेखक अनिल सिंह लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन में वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई चैनलों, अखबारों और पोर्टलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क anilhamar@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

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यूपी में सत्ता के करीबी बड़े अफसरों में भी अंदरखाने शह-मात देने की खूब हो रही लड़ाई!

कल किसी वक्त चर्चा बहुत तेज छिड़ गई कि मुलायम सिंह यादव फिर से सीएम बनेंगे और सारे झगड़े को शांत कराएंगे तो देखते ही देखते यह खबर भी दौड़ने लगी कि मुलायम के सीएम बनने पर दीपक सिंघल तब मुख्य सचिव बनाए जाएंगे. इसके बाद तो कई बड़े अफसरों की हालत पतली होने लगी. दबंग और तेजतर्रार अफसर की छवि रखने वाले दीपक सिंघल की इमेज खराब करने के लिए कई अफसरों की टीम अलग अलग एंगल से सक्रिय हो गई.

अपने कुछ महीने के कार्यकाल में दीपक सिंघल ने यूपी की नौकरशाही पर नकेल कस कर उसे बेहद सक्रिय कर दिया था और हर तरफ सक्रियता दिखने लगी थी. अब फिर से हालात एकदम पहले जैसे हो गए हैं. अफसर अपनी कुर्सी पर जमे हुए मस्त हैं और धैर्य से सत्ता की लड़ाई देख रहे हैं. विकास कार्य ठप हैं. कोई किसी की सुन नहीं रहा. फाइलें जहां तहां अटकी पड़ी हैं.

ऐसे में दीपक सिंघल के ज्यों फिर से मुख्य सचिव बनने की संभावना को लेकर चर्चा छिड़ी तो यूपी के मुख्यमंत्रियों के पैसे विदेश में सेटल करने और मीडिया मैनेज करने के लिए कुख्यात एक बड़े अफसर ने अपने मीडिया रसूख का इस्तेमाल करते हुए सीएनएन आईबीएन वालों को एक फर्जी सूचना प्लांट करा दी कि दीपक सिंघल तो अमर सिंह का एक गलत काम कराने के लिए नोएडा जाने के चक्कर में नप गए थे. मजेदार यह कि आईबीएन सीएनएन वालों ने बिना छानबीन किए इसे चला भी दिया.

अखिलेश यादव अभी हाल के भाषण में कह चुके हैं कि उन्हें नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव का फोन आया कि गायत्री प्रजापति को हटा दो तो उन्होंने प्रजापित को हटा दिया और इसी तरह यह भी बता दिया कि नेताजी का फोन आया कि दीपक सिंघल को हटा दो तो इन्हें हटा दिया. यानि स्पष्ट है कि दीपक सिंघल को हटाया जाना किसी किस्म के गलत काम या किसी नकारात्मक फीडबैक के चलते नहीं बल्कि यह विशुद्ध मुलायम सिंह यादव का फैसला था.

मुलायम सिंह की राजनीति को जानने वाले यह भी जानते हैं कि वो जो बोलते हैं, करते नहीं और जो करते हैं उसे बोलते नहीं. उनके इसी धोबिया पाट दांव के कारण समय समय पर बड़े धमाके सामने आते रहे हैं. बात हो रही थी अफसरों की लड़ाई की. चर्चा है कि गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से पहली बार हटाए जाने के बाद कुछ अफसरों ने फीडबैक दिया था कि आपको दीपक सिंघल ने हटवा दिया. तब प्रजापति मुलायम सिंह यादव के पास गए और बोले कि हमको दीपक सिंघल ने अखिलेश का कान भरके हटवा दिया.

चर्चा के मुताबिक इस बात से भड़के मुलायम ने अखिलेश को फोन करके सिंघल को हटाने के लिए कह दिया और गलत फीडबैक के कारण दीपक सिंघल पर गाज गिर गई. जानकारों की मानें तो यादव कुल के झगड़े के पल पल बनते बिगड़ते समीकरण पर नजर गड़ाए यूपी के बड़े अफसरों में एक दूसरे को शह मात देने का खतरनाक खेल चल रहा है जिसमें मीडिया का निहित स्वार्थों के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है. देखते रहिए, अगले कुछ दिनों में मीडिया वाले कैसी कैसी एकतरफा खबरें अफसरों को लेकर छापते दिखाते हैं.

लखनऊ से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन में प्रकाशित हुई मुलायम खानदान की अकूत संपत्ति पर कवर स्टोरी

लखनऊ से अनूप गुप्ता के संपादकत्व में निकलने वाली चर्चित मैग्जीन दृष्टांत में जो कवर स्टोरी है, वह पठनीय तो है ही, आंख खोल देने वाली भी है. जिस अखिलेश यादव के ढेर सारे लोग प्रशंसक हैं और उनमें जाने कौन कौन से गुण देखते हैं, उसी के शासनकाल में जो लूटराज अबाध निर्बाध गति से चला है, वह हैरतअंगेज है. अब जबकि चुनाव में चार दिन शेष रह गए हैं तो सब के सब पवित्र और पुण्यात्मा बन सत्ता व संगठन के लिए मार कर रहे हैं ताकि जनता मूल मुद्दों से भटक कर इनमें उनमें नायकत्व तलाशे. नीचे पूरी कवर स्टोरी है ताकि आप सबकी समझदानी में लगा झाला खत्म हो सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

उत्तर प्रदेश का लूटकाल

अनूप गुप्ता

लगभग ढाई दशकों से तथाकथित अंगूठा छाप नेता परियोजनाओं की आड़ में यूपी का खजाना लूटते रहे। जिन नौकरशाहों के हाथ में लूट को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे भी लूट की बहती गंगा में हाथ धोते रहे। परिणामस्वरूप जनता की गाढ़ी कमाई से भरा सरकारी खजाना खाली होता चला गया और नौकरशाहों से लेकर खादीधारियों के निजी खजाने लबालब होते चले गए। सूबे का विकास केन्द्रीय सरकारों की भीख पर निर्भर होने लगा तो दूसरी ओर नेताओं के पास अकूत धन-सम्पदा इकट्ठी होती चली गयी।

जिनकी हैसियत चार पहिया वाहन खरीदने तक की नहीं थी, अब उन्हीं के बेटे, नाती-पोते, बहू-बेटियों और पत्नी के पास लग्जरी कारों का काफिला है और वह भी चन्द वर्षों में। जो लखपति थे वे अरबपति हो गए और जो करोड़पति थे उनके पास इतनी दौलत इकट्ठा हो गयी कि उन्हें खुद ही नहीं मालूम कि वे कितनी दौलत के मालिक हैं। हैरत तो इस बात की है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव (अधिकतम पांच वर्ष) में चुनाव आयोग को सौंपे गए हलफनामे में उनकी सम्पत्ति आश्चर्यजनक तरीके से कई गुना बढ़ती रही और वह भी बिना किसी उद्योग धंधे के। जनता की गाढ़ी कमाई से भरे सरकारी खजाने लूटने वाले सफेदपोशों की लम्बी फेहरिस्त है। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अल्प समय में आश्चर्यजनक तरीके से दौलत इकट्ठा कर ली कि उनका कथित भ्रष्ट चेहरा आम जनता के सामने आ गया।

सरकार खजाने पर हाथ साफ कर अपना घर भरने वालों में एक चर्चित नाम मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार का है। व्यवसाय के रूप में सिर्फ खेती दर्शाने वाला मुलायम परिवार मौजूदा समय में अरबों की धन-सम्पदा के मालिक हैं। आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर उनके खिलाफ जनहित याचिका भी दायर की जा चुकी है। मामला सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई तक भी पहुंचा। जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित करने का दावा किया तो दूसरी ओर सीबीआई ने भी जांच के उपरांत रिपोर्ट तैयार कर लेने का दावा किया। रिपोर्ट तैयार हुए वर्षों बीत गए लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई रुचि दिखायी और न ही सीबीआई ने। हाल ही में दैनिक समाचार पत्रों में एक खबर प्रकाशित हुई कि, ’सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी‘। हैरत इस बात की है कि सीबीआई तो काफी पहले ही अपनी जांच पूरी कर चार्जशीट तैयार करके बैठा है। उसे इंतजार है तो सिफ केन्द्र सरकार की तरफ से इशारे का। जिस दिन केन्द्र सरकार ने सीबीआई को इजाजत दे दी उसी दिन मुलायम एवं उनके परिवार का भविष्य तय हो जायेगा।

पिछले दिनों प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में एक खबर प्रसारित-प्रकाशित हुई। अखबारों और खबरिया चैनलों ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम सिंह यादव एवं उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी। बाकायदा मुलायम की फोटो के साथ खबर को प्राथमिकता दी गयी। इस बात की जानकारी जब वर्ष 2005 से लेकर अब तक न्याय की लड़ाई लड़ रहे पीआईएल दाखिल करने वाले अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी को हुई तो उन्होंने आनन-फानन में सोशल साइट्स पर मीडिया के झूठ का खुलासा किया। बकायदा कोर्ट के नवीनतम आदेश की काॅपी भी सोशल साइट्स पर डाली ताकि तथाकथित समाजवादियों की छवि को फर्जी ढंग से सुधारने में लगे लोगों के चेहरों पर से नकाब उतारी जा सके। अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सोशल साइट्स पर जो लिखा, कुछ इस तरह से है- ‘‘कुछ भांड़-भड़ुए, दलाल मीडिया वालों द्वारा झूठी अफवाह फैलायी जा रही है कि सीबीआई जाँच की अर्जी खारिज कर दी गयी। कोर्ट आर्डर सहित प्रेषित कर रहा हूँ! मुलायम, अखिलेश, प्रतीक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चल रही जाँच जारी है। साथ ही कोर्ट ने दसूरी याचिका फाइल करने की अनुमति दी है। जल्द ही दूसरी याचिका फाइल करूंगा।’’

सोशल साइट् पर दस्तावेजों के साथ डाली गयी पोस्ट भी सभी मीडिया कर्मियों ने पढ़ी और देखी होगी। चर्चा भी हुई होगी। हैरत इस बात की है कि पीआईएल दाखिल करने वाले ने दस्तावेजों के साथ अफवाहों का खण्डन किया लेकिन किसी मीडियाकर्मी ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ सच्चाई लिखने की हिम्मत नहीं जुटायी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मीडिया की तीसरी आंख मुलायम की खिलाफत से सम्बन्धित दस्तावेजों को अनदेखा कर गयी? जानते सभी हैं लेकिन लिखने और दिखाने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है। सभी चुनाव के दौरान लाखों-करोड़ों के विज्ञापन बटोरने की आस लगाकर बैठे हैं।

पिछले दिनों आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी से ‘दृष्टांत’ की दूरभाष पर वार्ता हुई। श्री चतुर्वेदी की मानें तो वे कोर्ट के उस फैसले को भी चुनौती देंगे जिसमें वर्ष 2012 में वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को सीबीआई जांच से यह कहकर बाहर कर दिया था कि डिम्पल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं हैं लिहाजा वे जांच के दायरे में नहीं आतीं। विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि यह असंवैधानिक फैसला न्यायालय द्वारा दिया गया था। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में यदि परिवार के सदस्यों (बहू) को बाहर कर दिया जाएगा तो शायद देश में आय से अधिक सम्पत्ति का मामला किसी पर बनेगा ही नही। जब श्री चतुर्वेदी के वकील ने कोर्ट से यह जानकारी हासिल की कि सीबीआइ की जाँच अब तक कहाँ पहुँची? इस सवाल पर न्यायालय ने दूसरी याचिका फाइल करने को कहा है। यदि देखा जाए तो कानूनी रूप से किसी मुकदमे को कोर्ट ही बंद कर सकती है।

गौरतलब है कि लगभग एक दशक बाद तक सीबीआई ने कोर्ट को कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है। जब रिपोर्ट की काॅपी ही कोर्ट को नहीं सौंपी गयी है तो कोर्ट इस अधूरे मामले को अपने स्तर से कैसे बंद कर सकती है? यहां तक कि सीबीआई ने जांच रिपोर्ट की काॅपी याचिकाकर्ता को भी उलपब्ध नहीं करवायी है। अभी हाल ही में 19 सितम्बर 2016 को इस मामले की सुनवाई हुई है। हैरत की बात यह है कि सारी सच्चाई और दस्तावेजों के बावजूद मीडिया कर्मियों को यह खबर कहां से मिल गयी कि सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी। साफ जाहिर है कि पिछले ढाई दशकों से यूपी को बुरी तरह से लूट रहे सफेदपोशों को बचाने में मीडिया दलालों की भूमिका निभा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेशों के बावजूद पेड न्यूज का धंधा अपने चरम पर है। उसका जीता-जागता उदाहरण सबके सामने है।

लगभग एक दशक पूर्व वर्ष 2005 में विश्वनाथ चतुर्वेदी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके कुटुम्ब के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। याचिका में मुलायम की लूट का कच्चा चिट्ठा खोला गया था। दस्तावेजों के साथ याचिका में स्पष्ट लिखा गया था कि 1977 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने थे, तब से लेकर वर्ष 2005 तक तकरीबन 28 वर्षों में उनकी सम्पत्ति में 100 गुना वृद्धि हुई है। मुलायम और उनके परिजनों ने यह सम्पत्ति कहां से और कैसे इकट्ठा की है? इसकी जांच होनी चाहिए। उस वक्त समाजवादी पार्टी की तरफ से यह प्रचारित किया गया कि विश्वनाथ चतुर्वेदी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं। राजनैतिक द्वेष के कारण ही ऐसा किया जा रहा है। इस पर विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट में अर्जी देकर स्पष्ट किया था कि वह किसी राजनीतिक दल से सम्बन्ध नहीं रखते बल्कि वह पेशे से पत्रकार हैं। समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी बनती है कि आम जनता के धन को लूटे जाने का वह हर तरह से विरोध करें। मुलायम एवं परिवार के समक्ष कोई विकल्प निकलता न देखकर वर्ष 2005 में डाली गयी याचिका के जवाब में मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में 1 मार्च 2007 को आए सीबीआई जांच के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाली गयी थी। लगभग पांच वर्ष तक सुनवाई के बाद वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया था लेकिन मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल यादव को जांच के दायरे से यह कहकर बाहर कर दिया था, ‘जिस वक्त का यह मामला है उस वक्त वे सार्वजनिक पद पर नहीं थीं लिहाजा उनके खिलाफ सीबीआई जांच नहीं की जा सकती।’

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब डिंपल यादव किसी पद पर नहीं थीं तो उनके पास आय से अधिक धन कैसे जमा हो गया? आयकर विभाग ने इस मामले को संज्ञान में क्यों नहीं लिया? क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए कि जब डिंपल के पास आय का कोई स्रोत नहीं था फिर उनके पास करोड़ों की सम्पत्ति कैसे इकट्ठा हो गयी? इस सम्बन्ध में पीआईएल दायर करने वाले विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि यदि न्यायपालिका इसी तरह से तथाकथित भ्रष्ट लोगों की पत्नी को राहत देती रही तो ऐसे में किसी भी भ्रष्टाचारी को सजा नहीं मिल पायेगी। भविष्य में भी लोग अनाधिकृत रूप से कमाए गए धन को अपनी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर चैन की सांस लेंगे।

गौरतलब है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर ने मुलायम और उनके कुनबे के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले को वर्ष 2006 से 2012 तक सुना। विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर सवा साल में ही सुनवाई पूरी कर सीबीआई जांच के आदेश भी दे दिए गए थे। लगने लगा था कि जल्द ही मुलायम और उनका कुनबा सलाखों के पीछे नजर आयेगा लेकिन मुलायम कुनबे ने बचने की गरज से पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी। उस याचिका की ओपन कोर्ट में जो सुनवाई शुरू हुई वह 5 वर्षों तक अनवरत चलती रही। लगभग पांच वर्ष पूर्व ही 17 फरवरी 2011 को पुनर्विचार याचिका पर फैसला भी रिजर्व हो गया था। बस फैसला सुनाना भर शेष था। सपा विरोधी दलों में बेचैनी से फैसले का इंतजार हो रहा था। सभी को उम्मीद थी कि याचिका के साथ जो पुख्ता दस्तावेज लगाए हैं वे मुलायम और उनके कुनबे को सलाखों के पीछे ले जाने के लिए काफी हैं। सूबे की आम जनता से लेकर सपा विरोधी दल इंतजार करते रह गए इसी दौरान मुलायम सिंह यादव के वकील व समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रहे वीरेन्द्र स्वरूप भाटिया की बरसी में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के साथ मंच पर एक साथ विराजमान नजर आये। किसी को उम्मीद नहीं थी लेकिन घटना अप्रत्याशित थी।

वैसे तो न्यायाधीश अल्तमश कबीर को नैतिकता के आधार पर इस केस से अलग हो जाना चाहिये था लेकिन रिटायर होने से पहले ही उन्होंने 13 दिसम्बर 2012 को एक विरोधाभाषी व असंवैधानिक फैसला सुनाया। इस फैसले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिम्पल यादव को यह कहकर बाहर कर दिया कि वह किसी लाभ के पद पर नही थी इसलिए इनकी जांच नहीं होगी। उस वक्त सूबे में अखिलेश यादव की सरकार ने सांस लेनी शुरू ही की थी। इस विरोधाभाषी फैसले के बाद चर्चाएं तो बहुत हुईं लेकिन न्यायपालिका के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। गौरतलब है कि उस दौरान अल्तमश कबीर ने अपने फैसले में मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और प्रतीक यादव के खिलाफ जांच जारी रखने का निर्देश दिया था, जबकि उस वक्त प्रतीक यादव भी किसी लाभ के पद पर नहीं थे। यदि पूर्व न्यायाधीश ने लाभ के पद पर न होने का हवाला देकर डिंपल यादव को सीबीआई जांच से बरी कर दिया था तो उस स्थिति में प्रतीक यादव को भी सीबीआई जांच से बरी हो जाना चाहिए था। शायद सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में इस तरह का अदभुत फैसला आज तक नहीं हुआ होगा और वह भी एक जाने-माने न्यायाधीश की कलम से। सही मायने में कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून की धज्जियां उड़ाकर रख दी थीं। इस सम्बन्ध में अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि वे इस असंवैधानिक फैसले को चुनौती देंगे। वह निर्णय पूरी तरह से गैरकानूनी था।

अब यह भी जान लीजिए कि आखिरकार तमाम असंभावनाओं के बावजूद मीडिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्लीनचिट दिए जाने की खबर कैसे प्रकाशित-प्रसारित हो गयी? इस दुर्लभ काम को अंजाम देने की भूमिका निभायी है अमर सिंह ने। सभी जानते हैं कि अमर सिंह में न्यायपालिका से लेकर औद्योगिक घरानों, सीबीआई और मीडिया तक को मैनेज करने की क्षमता कूट-कूट कर भरी है। पेड न्यूज के इस खेल ने अपना काम कर दिखाया। अखबारों में झूठी खबर छपते ही अमर सिंह समाजवादी पार्टी में नायक की भूमिका में नजर आने लगे। मुलायम ने भी इन्हें उपकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमर सिंह को एक बार फिर से सपा में महासचिव पद का दर्जा दे दिया गया।

गौरतलब है कि ये वही अमर सिंह हैं जो एक बार फिर से समाजवादी पार्टी में वापसी से पहले करीब छह साल तक सक्रिय राजनीति में हाशिए पर रहे। इस दौरान वे गंभीर बीमारी से भी जूझते रहे। इस दौरान उन्होंने अपने लिए दूसरे राजनैतिक दरवाजे भी देखे। जब कहीं से उन्हें सम्मान मिलता नजर नहीं आया तो उन्होंने खुद की राष्ट्रीय लोकमंच के नाम से राजनीतिक पार्टी भी बनाई। वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव में उन्हांेने चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम के खिलाफ अमर्यादित भाषा तक का प्रयोग किया। खुले मंच से मुलामय की सत्ता को यूपी में जड़ से मिटाने की सौगंध तक खायी। अमर सिंह को अपनी राजनैतिक हैसियत का अंदाजा उस वक्त हुआ जब वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की जमानतें तक जब्त हो गईं।

अमर सिंह वर्ष 2014 में राष्ट्रीय लोक दल से लोकसभा का चुनाव लड़े। उम्मीद थी कि उन्हें सम्मानजनक वोट मिलेंगे लेकिन हुआ वही जिसकी उम्मीद थी। अमर सिंह को लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली। जब कहीं दाल नहीं गली तो दोबारा उसी पार्टी में आने के रास्ते तलाशने लगे जहां उनके विरोधियों की संख्या अनगिनत थी। इसके बावजूद अमर सिंह ने अपनी कला का परिचय दिया और सपा में शामिल हो गए। पार्टी में तमाम विरोध के बावजूद उसी सम्मानजनक स्थिति को पाने के लिए अमर सिंह ने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में मुलायम और कुनबे को राहत दिलवाने का वायदा किया। कोर्ट ने भले ही मुलायम को ठीक तरह से राहत न दी हो लेकिन अमर सिंह ने मीडिया को सेट करके राहत देने सम्बन्धित ऐसी फर्जी खबर प्रकाशित-प्रसारित करवा दी जिससे प्रभावित मुलायम कुनबा अमर सिंह का मुरीद हो गया। मुलायम ने भी अहसान का बदला चुकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमर सिंह को एक बार फिर से पार्टी में महासचिव का पद दे दिया गया।

अब यह भी जान लेना जरूरी है कि आखिरकार कोर्ट ने क्या कहा था और मीडिया को क्या बताया गया? मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में लंबित विश्वनाथ चतुर्वेदी की कुछ अर्जियों पर आदेश देने से सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर मना कर दिया है कि इन अर्जियों में उठे सवालों का जवाब 2013 में मुलायम परिवार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए सीबीआई जाँच के आदेश के समय ही दे दिया गया था। इस पर श्री चतुर्वेदी के सीनियर अधिवक्ता के टी एस तुलसी ने कहा, ‘आपके आदेश पर सीबीआई ने आज तक क्या जाँच की है? इसकी जानकारी याचिकाकर्ता को  प्राप्त नहीं हुई है।’ जाँच रिपोर्ट मँगाये जाने के सवाल पर कोर्ट ने कहा, ‘यह माँग आपकी इस याचिका में नही है।’ परिणामस्वरूप कोर्ट ने उक्त माँग के लिए अलग से याचिका दाखिल करने की अनुमति देते हुए कहा कि इसके लिए दूसरी याचिका दाखिल कर सकते हैं। श्री चतुर्वेदी के सीनियर वकील केटीएस तुलसी ने कहा, ‘सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मुकदमा दर्ज करने की इच्छा जताई थी लेकिन बाद में एफआईआर रजिस्टर की गयी अथवा नहीं, इसकी कोई जानकारी याचिकाकर्ता को नहीं दी गयी लिहाजा सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट मांगी जाए।’ इस पर कोर्ट ने कहा, ‘ये मांग मौजूदा अर्जी का हिस्सा नहीं है।’ इस पर कोर्ट याचिकाकर्ता के वकील को अनुमति दी है कि इस मांग के साथ अलग से याचिका दाखिल की जाए। याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मीडिया कर्मियों से साफ कहा है कि कोर्ट के इस आदेश में कहीं पर यह नहीं कहा गया है कि मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच की अर्जी खारिज की जाती है। साफ जाहिर है कि यह सारा खेल मुलायम के अमर-प्रेम का जीता-जागता उदाहरण है और अमर सिंह का मीडिया को हैण्डिल करने का नायाब तरीका।

आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एण्ड फैमिली को क्लीनचिट देने का गैरकानूनी तरीका पिछले लगभग चार वर्षों से जारी है। वर्ष 2012 में भी कुछ इसी तरह से मुलायम एण्ड फैमिली को क्लीनचिट देने की कोशिश हुई। उस वक्त केन्द्र में कांग्रेस के मनमोहन सिंह की सरकार थी। तत्कालीन केन्द्र सरकार को जब अपनी प्रतिष्ठा से जुडे़ ‘खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक’ को पास करवाने के लिए सांसदों की जरूरत हुई तो उस वक्त मुलायम सिंह यादव के साथ एक समझौता हुआ। समझौता यह था कि केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई से उनके आय से अधिक मामले पर क्लीनचिट दिलवा दे। कोशिश भी कुछ ऐसी ही हुई। गौरतलब है कि आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल में सीधे सुप्रीम कोर्ट से राहत दिलवा दी गयी थी। जब तक केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार (वर्ष 2009 से 2014 तक) रही, मुलायम सिंह यादव लगातार कांग्रेस की हर मुसीबत में उसका साथ देते रहे। मुलायम यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि उनकी नकेल केन्द्र सरकार के ही हाथों में है। यदि जरा सी आनाकानी की तो केन्द्र के इशारे सीबीआई अपना खेल दिखा देगी। हालांकि इस तरह के दबाव को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव शुरू से नकारते आए हैं लेकिन कांग्रेस को हर मुसीबत के दौर में आंख बंद करके समर्थन देना इस बात का प्रमाण है कि मुलायम किसी तरह से आय से अधिक सम्पत्ति के मामले से बाहर निकलने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। जब केन्द्र की तरफ से अहसान के बदले ज्यादा दबाव पड़ा तो दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उस केस से यह कहते हुए अपना पीछा छुड़ा लिया कि जो करना है सीबीआई करे और जो दिखाना सुनाना है सरकार को दिखाए सुनाए। ये वही सुप्रीम कोर्ट था जिसने बाद में इस बात को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया था कि सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन कानून मंत्री को क्यों सौंपी। तरीका तो यही कहता है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उस केस से अपना पीछा छुड़ा लिया था तो उसे सीबीआई की कार्यप्रणाली पर उंगली नहीं उठानी चाहिए थी।

खैर दिसम्बर 2012 में विश्वनाथ चतुर्वेदी बनाम यूनियन आफ इंडिया जनहित याचिका (क्रमांक 633, 2005) के मामले में दो साल से सुरक्षित रखे फैसले का पिटारा खोला गया। उम्मीद थी कि पिटारा खुलते ही मुलायम सलाखों के पीछे नजर आयेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उस दौरान भी अफवाह फैली थी कि मुलायम को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जल्द ही सीबीआई क्लीनचिट दे देगी। कहा तो यही जा रहा है कि सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट का चिट्ठा चार वर्ष पूर्व ही बनकर तैयार हो गया था। इसी दौरान लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गयीं। कांग्रेस की तरफ से आश्वासन दिया गया कि दोबारा सत्ता में आते ही उन्हें सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट का चिट्ठा थमा दिया जायेगा। दुर्भाग्यवश केन्द्र से कांग्रेस का सफाया हो गया और मोदी सरकार सत्ता में आ गयी। मुलायम सिंह यादव, विश्वनाथ चतुर्वेदी और कांग्रेस के बीच चली त्रिकोणीय जंग में शामिल एक मध्यस्थ ने उस वक्त अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए विश्वास के साथ कहा था, ‘सरकार सबसे बड़ी चीज होती है। वह जो चाहे कर सकती है। चतुर्वेदी जैसे लोगों को यह बात समझ नहीं आती है तो यह उनका प्राब्लम है।’ इस शख्स के दावों में दम था क्योंकि मैनेज करने का काम इसी शख्स ने किया था। यहां बात हो रही है अमर सिंह की। उस वक्त अमर सिंह का सपा में सिक्का बोलता था।

मुलायम को आय से अधिक सम्पत्ति में राहत देने की सभी तैयारियां हो चुकी थीं, अंततः हुआ वही जिसकी उम्मीद एक वर्ग विशेष को थी। सीबीआई का शिकंजा कानूनी पेंच में फंस गया। जब कहीं से बात नहीं बन सकी तो याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी पर चारों तरफ से दबाव बनाया गया। साम, दाम, दण्ड, भेद की तर्ज पर पूरी समाजवादी पार्टी विश्वनाथ चतुर्वेदी के पीछे पड़ गयी थी। तत्कालीन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने श्री चतुर्वेदी की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम कर रखा था। उस वक्त श्री चतुर्वेदी राजेन्द्र नगर, लखनऊ में रहते थे। उनके घर की तंग सीढ़ियों पर इतने पुलिसवाले भरे रहते थे कि एकबारगी लगता था कि इतना सुरक्षित आदमी इतनी असुरक्षित सी जगह पर आखिर क्यों रहता है? यहां पर विश्वनाथ चतुर्वेदी की मुश्किलों का जिक्र सिर्फ इसलिए किया गया ताकि इस मामले की गंभीरता को समझा जा सके। इतना सब कुछ होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव और उनके परिजनों को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत नहीं मिल सकी। अमर सिंह ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी लेकिन मुलायम को क्लीनचिट नहीं मिल पायी। लगभग एक दशक बाद एक बार फिर से मुलायम को क्लीनचिट दिलवाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। अमर का तंत्र पूरी शिद्दत के साथ उन रास्तों को तलाश रहा है जिन रास्तों से मुलायम को क्लीनचिट मिलने की संभावना है। हाल ही में मीडिया के सहारे मुलायम को क्लीनचिट दिए जाने की झूठी खबर प्रकाशित करवाकर खेल को और रोचक बना दिया गया है। इस खबर को याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने चैलेंज किया है। साथ ही कोर्ट आर्डर की कुछ काॅपियां सुबूत के तौर पर सोशल मीडिया पर डाली हैं ताकि भ्रामक खबर का और दलाल की भूमिका निभाने वाले कुछ मीडिया घरानों के चेहरों से नकाब उतारा जा सके।

वर्तमान सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को 1977 में जब पहली बार मंत्रीपद नसीब हुआ उस वक्त उन्होंने अपनी सम्पत्ति मात्र 77 हजार रुपए बतायी थी। 28 वर्षों के बाद 2005 में जब विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट में आय से अधिक सम्पत्ति से सम्बन्धित मुलायम के खिलाफ याचिका दायर की थी उस वक्त उनकी सम्पत्ति करोड़ों में पहुंच गयी थी। वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव ने जब मैनपुरी से चुनाव लड़ा तो उस वक्त उन्होंने अपनी सम्पत्ति 1 करोड़ 15 लाख 41 हजार 224 बतायी थी। पांच वर्ष बाद 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम ने जो हलफनामा दिया था उसमें उन्होंने अपनी सम्पत्ति 2 करोड़ 23 लाख 99 हजार 310 रुपए बतायी थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने अपनी सम्पत्ति 15 करोड़ 96 लाख 71 हजार 544 दर्ज करवायी। बिना किसी उद्योग धंधे के 77 हजार से लगभग 16 करोड़ की सम्पत्ति मुलायम ने कैसे जमा कर ली? यह प्रश्न हैरान कर देने वाला है।

गौरतलब है कि यह सम्पत्ति तो मुलायम सिंह यादव ने स्वयं अपने हलफनामें में दिखायी है जबकि हकीकत यह है कि मौजूदा समय में मुलायम और उनके परिजनों के पास अरबों की अकूत सम्पत्ति मौजूद है। यदि सीबीआई इस अकूत सम्पत्ति के बाबत आय का स्रोत मुलायम से पूछे तो निश्चित तौर पर यूपी के सरकारी खजाने को लूटे जाने का खुलासा हो सकता है। यह भी जान लीजिए, ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो आज भी जब चुनाव प्रचार के लिए गांव-देहातों में जाते हैं तो स्वयं को किसान का बेटा बताते हैं। हैरत की बात है कि यूपी के एक किसान का बेटा इतनी जल्द 77 हजार की सम्पत्ति से करो़ड़ांे की सम्पत्ति का मालिक कैसे बन बैठा? यूपी का आम किसान कर्ज और भुखमरी से आत्महत्या कर रहा है। सूबे के आम किसानों का परिवार दो जून की रोटी के लिए शहरों में मजदूरी करने पर विवश है और मुलायम सिंह यादव एक ऐसे किसान हैं जिन्होंने कृषि से न सिर्फ अपने भरे-पूरे परिवार को ऐश की जिन्दगी दी बल्कि परिजनों के नाम इतनी सम्पत्ति जुटा ली जिससे उनकी आगे आने वाली कई पीढ़ियां घर बैठे-बैठे ऐश का जीवन जी सकती हैं। सूबे का किसान जानना चाहता है कि उनके हाथों में ऐसा कौन सा अलादीन का चिराग हाथ लग गया जिससे उन्होंने उस यूपी में अरबों की सम्पत्ति सिर्फ खेती-किसानी से जुटा ली जिस यूपी का शेष किसान आजादी के लगभग 70 वर्षों बाद भी अपने परिवार को दो जून की रोटी नहीं दे पाया।

सिर्फ मुलायम के नाम से सैफई सहित अन्य गावों में 7 करोड़ 88 लाख 88 हजार रुपए की कृषि योग्य भूमि उनके हलफनामे में दर्ज है। इलाकाई लोगों का दावा है कि हकीकत में उपरोक्त जमीनों की कीमत अरबों में है। इटावा की फ्रेण्ड्स कालोनी में एक 5000 वर्ग फीट का आवासीय प्लाॅट है। हलफनामे में इस प्लाॅट की कीमत एक करोड़ 44 लाख 60 हजार दर्शायी गयी है जबकि इस प्लाॅट की वास्तविक कीमत पांच करोड़ के आस-पास है। इटावा के सिविल लाइन में आवासीय भवन संख्या 218 का क्षेत्रफल 16 हजार 10 वर्ग फीट है। इसकी कीमत हलफनामे में 3 करोड़ 16 लाख 28 हजार 339 दर्शायी गयी है। सच तो यह है कि इस आलीशान कोठी की कीमत लगभग 15 करोड़ के आस-पास है। ये वह अधूरी सम्पत्तियां हैं जो मुलायम ने खेती के धंधे से कमायी हैं। ये वह सम्पत्तियां हैं जो आजमगढ़ से सांसद मुलायम सिंह यादव ने अपने हलफनामे मे कुबूल की हैं। वास्तविकता में उनके नाम पर कितनी सम्पत्तियां हैं? शायद उम्र के इस पड़ाव में उन्हंे भी ठीक तरह से याद नहीं होंगी। इसके अतिरिक्त बेटे, बहू के नाम से अरबों की सम्पत्ति का मालिक है मुलायम परिवार और यह सारी सम्पत्ति बिना किसी उद्योग धंधे के खेती करके कमायी गयी है। आम जनता का हैरत होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर एक जनहित याचिका दायर की थी।

क्या कहते हैं विश्वनाथ चतुर्वेदी

दिसम्बर 2012 में वर्तमान सांसद डिंपल यादव को केस से बाहर किए जाने के सम्बन्ध में याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि उक्त फैसला मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर ने भले ही दिया हो लेकिन यह फैसला मैं उनका व्यक्तिगत फैसला मानता हूं। ऐसा विरोधाभाषी फैसला सुप्रीम कोर्ट का कतई नहीं हो सकता। एक तरफ तो डिंपल यादव को यह कहकर केस से बाहर कर दिया जाता है कि जिस वक्त केस दर्ज किया गया उस वक्त डिंपल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं थीं। गौरतलब है कि उस वक्त प्रतीक यादव भी किसी लाभ के पद पर नहीं थे। इन परिस्थितियों में प्रतीक यादव के खिलाफ भी केस खारिज हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सिर्फ डिंपल यादव को ही इस केस से बाहर किया गया क्योंकि डिंपल यादव वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी हैं। मुलायम ने इसे अपने परिवार के सम्मान से जोड़ लिया था। डिंपल यादव को अनैतिक तरीके से केस से बाहर निकालने के लिए सपा प्रमुख ने कौन सा तरीका अख्तियार किया? इस पर भी जांच होनी चाहिए। बात खुलकर सामने आनी चाहिए ताकि आम लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा न उठे। ज्ञात हो आय से अधिक सम्पत्ति मामले की सुनवाई माननीय जज अल्तमश कबीर ही सुन रहे थे।

अल्तमश कबीर को वर्ष 2011 में राजधानी लखनऊ में मुलायम के वकील व समाजवादी पार्टी सांसद रहे स्व0 वीरेन्द्र भाटिया की बरसी में मुलायम और अखिलेश के साथ मंच पर एक साथ देखा गया था। यदि मुलायम परिवार के साथ उनके इतने नजदीकी सम्बंध थे तो उन्हें इस मुकदमे से अपने आप को नैतिकता के आधार पर अलग कर लेना चाहिए था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप अखिलेश यादव की पत्नी सांसद डिम्पल यादव उन्होंने यह कहकर जांच के दायरे से बाहर कर किया दिया कि वे कोई पब्लिक पोस्ट होल्ड नहीं कर रही थीं जबकि उस वक्त पब्लिक पोस्ट होल्ड न करने वाले प्रतीक यादव भी थे।

संदेह के घेरे में ‘थिंक टैंक’

हालांकि मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में समाजवादी पार्टी के थिंक टैंक माने जाने वाले रामगोपाल यादव की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन उन्होंने जिस तरीके से पिछले 28 वर्षों के राजनैतिक कैरियर में धन सम्पदा इकट्ठा की है वह चर्चा करने लायक अवश्य है। राज्यसभा में निर्वाचन के लिए प्रो0 रामगोपाल यादव ने 3 नवम्बर 2014 को रिटर्निंग आफिसर के समक्ष शपथ पत्र प्रस्तुत किया था। शपथ पत्र के मुताबिक प्रो0 रामगोपाल ने चल-अचल सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग 10 करोड़ के आस-पास बतायी थी। हालांकि शपथ-पत्र में सम्पत्ति जुटाने के साधन का उल्लेख नहीं किया जाता है अन्यथा उनकी अकूत सम्पत्ति का खुलासा शपथ पत्र दाखिल करते ही हो जाता। यह काम विशेष तौर पर आयकर विभाग का होता है या फिर प्रवर्तन विभाग का। हैरत की बात है कि दोनों ही जिम्मेदार विभागों में से किसी ने भी प्रो0 रामगोपाल यादव से उनकी आय से अधिक सम्पत्ति के बाबत पूछताछ तक नहीं की।

गौरतलब है कि प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के चचेरे छोटे भाई हैं। पेशे से अध्यापक रहे श्री यादव वर्तमान में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। वह मुलायम सिंह यादव के थिंक टैंक भी कहे जाते हैं। प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। पार्टी में हैसियत मुलायम के बाद दूसरे नम्बर की मानी जाती है। यह दीगर बात है कि उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय मुलायम सिंह यादव को जाता है। रामगोपाल यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव के साथ 1988 में राजनीति में कदम रखा। वह इटावा के बसरेहर से ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं। जीत के इसी स्वाद ने उन्हें अपना राजनैतिक सफर जारी रखने पर विवश कर दिया। कहा जाता है कि इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। मुलायम का पूरा परिवार भले ही कई बार मुसीबतों में रहा हो लेकिन रामगोपाल यादव को मुसीबत छू तक नहीं सकी।

प्रो. रामगोपाल वर्ष 1989 में जिला परिषद का चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने। वर्ष 1992 में पहली बार राज्यसभा के सदस्ये बने। इसके बाद से प्रो0 रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंचते रहे। वर्तमान समय में भी वे राज्यसभा के सदस्य हैं। ये मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक सलाहकार भी रह चुके हैं। ये उस वक्त सुर्खियों में आए जब उन्होंने आईएएस अफसर दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में केंद्र सरकार द्वारा रिपोर्ट मांगने पर यहां तक कह दिया था कि यूपी को आईएएस अफसरों की जरूरत ही नहीं है। उनके बयान से साफ जाहिर था कि वे यूपी में आईएएस अफसरों को ही भ्रष्टाचार की जननी मानते हैं। इन्होंने डा0. लोहिया का सामाजिक और राजनीतिक दर्शन विषय पर शोध किया और पीएचडी उपाधि ली। समाजवादियों को लोहिया के विचारों से अवगत कराने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। बेहद गरीबी में पले-बढ़े प्रो. रामगोपाल यादव आज करोड़ों की हैसियत रखते हैं। शपथ पत्र में इन्होंने अपनी आर्थिक हैसियत 10 करोड़ से भी ऊपर बतायी है। ये वह सम्पत्ति है जिसका उन्होंने शपथ पत्र में खुलासा किया है। यानि ये तो सफेद धन है जबकि जानकारों का कहना है कि वर्तमान समय में प्रो0 रामगोपाल के पास अकूत संपत्ति है।

हैरत की बात है कि बेहद गरीबी से निकलकर आए प्रो0 रामगोपाल यादव वर्तमान में करोड़ों की हैसियत रखते हैं, वह भी बिना किसी उद्योग धंधे के! इसके बावजूद आयकर विभाग ओर प्रवर्तन विभाग इनकी जांच तक नहीं करता। हाल ही में इनका नाम महाभ्रष्ट यादव सिंह के साथ भी जोड़ा जाता रहा है। हालांकि प्रो0 रामगोपाल यादव ने यादव सिंह ने अपने सम्बन्धों को सिरे नकारा है लेकिन पार्टी के ही सदस्य यह बात दावे के साथ कहते हैं महाभ्रष्ट यादव सिंह को प्रो0 रामगोपाल यादव का संरक्षण था। चर्चा तो यहां तक है कि यादव सिंह की काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन्हें भी मिलता था। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है? यह जांच का विषय हो सकता है। दावा करने वाले यहां तक कहते हैं कि जिस दिन प्रो0 रामगोपाल यादव पर शिकंजा कसा गया उस दिन यूपी के गर्भ में दबे हजारों करोड़ के घोटालों पर से पर्दा उठ जायेगा। पार्टी के लोग तो यहां तक कहते हैं कि कोई बड़ा फैसला लेते समय मुलायम सिंह यादव प्रो. रामगोपाल यादव से सलाह लेना नहीं भूलते हैं।

मुलायम परिवार की पृष्ठभूमि

मुलायम सिंह यादव के किसान पिता सुधर सिंह मूल रूप से फिरोजाबाद की तहसील शिकोहाबाद के रहने वाले थे। बाद में वे इटावा के सैफई में जाकर बस गए। मुलायम पांच भाइयों में दूसरे नम्बर पर हैं। शिवपाल यादव को छोड़कर उनके सभी भाई खेतीबाड़ी करते रहे हैं। मुलायम के सबसे छोटे भाई राजपाल यादव लगभग एक दशक पूर्व यूपी वेयरहाउसिंग कापोर्रेशन में बाबू हुआ करते थे। मुलायम का राजनीति में कद बढ़ तो राजपाल यादव ने वर्ष 2006 में नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव वाया सांसद यूपी के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं। अखिलेश यादव का जन्म मुलायम की पहली पत्नी मालती देवी से हुआ था जिनकी 23 मई 2003 में मृत्यु हो गयी थी। उसके बाद मुलायम ने साधना गुप्ता से विवाह कर लिया। बताया जाता है कि साधना ने मुलायम के राजनैतिक कद का खूब फायदा उठाया। आज वह भी अरबों की सम्पत्ति की मालकिन बतायी जाती हैं। ये पैसा उनके पास कहां से आया? इस पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

बताया जाता है कि अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त एक मंत्री उन्हें प्रत्येक माह करोड़ों की वसूली का धन पहुंचाता है। इसके कितनी सच्चाई है? यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि साधना वर्तमान समय में करोड़ों की मालकिन हैं। मुलायम सिंह यादव पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव और पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास के कार्यकाल 1977 से लेकर 17 फरवरी 1980 तक मंत्री रहे। इसके बाद मुलायम सिंह यादव 1982 से 8 नवम्बर 1984 तक विधान परिषद में विपक्ष के नेता रहे। 17 मार्च 1985 से 10 फरवरी 1987 तक मुलायम सिंह यादव नेता विपक्ष विधानसभा रहे। 4 जुलाई 1995 में वे दोबारा नेता विपक्षी दल चुने गए लेकिन उन्होंने पद लेने से इंकार कर दिया। मुलायम सिंह यादव 5 दिसम्बर 1989 से 24 जून 1991, 4 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1995 और 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007 तक यूपी में मुख्यमंत्री के पद पर रहे। वर्ष 2005 में ही मुलायम सिंह के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति बटोरने से सम्बन्धित पीआईएल दायर की गयी थी। मुलायम सिंह यादव अब तक तीन बार सांसद बन चुके हैं। वर्तमान समय में वे आजमगढ़ से सांसद हैं।

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

विगत माह 19 सितम्बर 2016 को सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सुनवायी के दौरान माननीय न्यायाधीश ने जो कहा और मीडिया को जो सुनाया गया वह कुछ इस तरह से है। मामला कोर्ट नम्बर 6 में केस नम्बर 7 पर सूचीबद्ध था। कोर्ट ने कहा, ’इस मामले में हम सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को नहीं कह सकते। इस केस में कोर्ट 13 दिसम्बर 2012 को ही आदेश जारी कर चुका है। अब सीबीआई स्वयं इस मामले की जांच करे।‘ इस पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा, ’वर्ष 2007 में उनके आरोपों के आधार पर सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मामला बनने की बात कही थी, फिर भी अभी तक नियमित केस दर्ज नहीं किया गया। चार अलग-अलग अर्जियों पर 10 फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित रख लिया गया था लेकिन फैसला अब तक नहीं सुनाया गया है।‘

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुवेर्दी ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, वर्तमान यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, कन्नौज से लोकसभा सांसद डिंपल यादव और मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक यादव के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का आरोप लगाया था, साथ ही एक जनहित याचिका भी दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में डिंपल यादव को यह कहकर केस से अलग कर दिया था कि जिस वक्त जनहित याचिका दायर की गयी थी उस वक्त डिंपल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं थीं लिहाजा उन पर केस नहीं बनता। इस पर याचिकाकर्ता ने अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा है कि यदि इसी तरह से अन्य भ्रष्ट लोगों की पत्नियों की सम्पत्तियों पर भी यदि मामला ठुकराया जाता रहा तो भविष्य में किसी भ्रष्ट नेता अथवा अधिकारी पर शिकंजा कसा ही नहीं जा सकता। कोर्ट के इस आदेश पर मीडिया को क्या सुनाया गया? मीडिया ने क्या सुना और उसने क्या लिखा? मीडिया ने विधि संवाददाता अथवा विधि सलाहकार से सलाह-मशविरा किए बगैर अपने अखबार में सुर्खियां बना दी कि, मुलायम और उनके परिवार को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत। साफ जाहिर है कि दागी मुलायम और उनके परिवार वालों की छवि सुधारने की गरज से ही पेड न्यूज का सहारा लिया गया और मीडिया को मैनेज करने की भूमिका निभायी सपा में दूसरी पारी खेलने वाले मैनेजमेंट गुरु अमर सिंह ने। मुलायम ने भी उन्हें तोहफे के रूप में दोबारा महासचिव का पद दे दिया।

याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेद ने याचिका दाखिल कर मामले में नियमित एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा कि 2007 में उनके आरोपों पर सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मामला बनने की बात भी कही थी, फिर भी अभी तक नियमित केस दर्ज नहीं किया गया। चतुर्वेद ने कहा कि चार अलग-अलग अर्जियों पर 10 फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो आज तक सुरक्षित है।

मुलायम और उनके परिवार को क्लीनचिट देने सम्बन्धी खबर ने मुलायम के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले को एक बार फिर से ताजा कर दिया। सत्ता विरोधी दल एक बार फिर से इस मुद्दे को लेकर चर्चा कर रहे हैं जबकि आय से अधिक सम्पत्ति मामले का खुलासा करने वाला व्यक्ति मीडिया की भूमिका को लेकर खासा खफा है। उनकी नाराजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सोशल साइट पर मीडिया को आपत्तिजनक शब्दों से भी नवाजा है। साथ ही कहा है, ‘विधानसभा चुनाव में सपा की छवि सुधारने की गरज से पार्टी के तथाकथित मैनेजर अमर सिंह ने ही मीडिया के सहारे दुष्प्रचार किया है जबकि मामला जस का तस है।’

साभार- ‘दृष्टांत’ मैग्जीन

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मुलायम की हालत सांप छछूंदर वाली!

कहा जा रहा है कि बाप-बेटे की भावुक राजनीति सपा को बचा लेगी। वैसे यह भी सच है कि इन दिनों नेता जी मुलायम सिंह यादव की हालत साँप छछूंदर वाली हो गयी है। भाई का साथ देते है तो बेटा नाराज और बेटे के साथ जाते है तो भाई के साथ धोखा।  नेता जी ऐसा चाहते भी नहीं।  वे तो सबको लेकर चलना चाहते है और पार्टी को आगे ले जाने के लिए ही सब कुछ कर रहे है। लेकिन हो कुछ भी नहीं रहा है। नेता जी के लिए सब अपने ही है लेकिन सबको मुलायम सिंह की फ़िक्र नहीं है।  सपा के लिए नेता जी वट  वृक्ष की तरह है लेकिन इस वृक्ष की सभी टहनियां अलग होने पर आमदा है। लेकिन एक बात तय है की बाप बेटे की भावुक राजनीति सपा को बचा ले जायेगी। यही वजह है की सपा में संग्राम जारी होने के बावजूद अभी तक टूट की कहानी से सब बच रहे है। 

मुलायम सिंह यादव ने महाबैठक बुलाई तो संग्राम सड़क तक आ गया।  सपा कार्यालय के बाहर अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के समर्थकों के बीच जमकर नारेबाजी और हाथापाई हुई।  पुलिस ने समर्थकों को तितर-बितर करने के लिए बल का प्रयोग किया। महाबैठक में मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव पर जमकर हमला बोला और मुलायम के कहने से अखिलेश और शिवपाल यादव गले मिले।   हालांकि मुलायम के बोलने के दौरान दोनों के बीच बहस की भी खबर है। चचा भतीजा के बीच की राजनीति में मुलायम सिंह फस से गए है।

मुलायम सिंह यादव ने कल महाबैठक में कहा कि शिवपाल यादव बड़े नेता हैं। पार्टी में टकराव से दुखी हूं। लोहिया जी के दिखाए मार्ग पर आगे चलें। उन्होंने आगे कहा कि जरूरत पड़ी तो हम जेल जाने से भी पीछे नहीं हटे। पार्टी बनाने के लिए बहुत संघर्ष किया। हम जेल भी गए कोई नहीं जानता। साथ ही उन्होंने पार्टी नेताओं को हिदायत दी की ज्यादा बढ़-चढ़कर बातें नहीं करें।  जो उछल रहे हैं, वे एक भी लाठी नहीं झेल सकते।  हमें अपनी कमजोरियां दूर करनी चाहिए। हम कमजोरी दूर करने के बजाय लड़ने लगे।

मुलायम सिंह यादव ने इशारों में साफ कहा कि पद मिलते ही दिमाग खराब हो गया। अगर आलोचना सही है तो सुधरने की जरूरत है। कुछ नेता केवल चापलूस हैं। नारेबाजी करने वाले बाहर होंगे।  उन्होंने कहा कि मैं पीएम बन सकता था, लेकिन समझौता नहीं किया। ऐसा नहीं है कि युवा मेरे साथ नहीं हैं, मैंने युवाओं को टिकट दिया है। मुलायम ने कहा, मेरे भाई हैं अमर सिंह। तुम्हारी हैसियत क्या है जो उन्हें गाली देते हो। अमर सिंह ने हमें कई बार बचाया है। शिवपाल और अमर सिंह के खिलाफ नहीं सुन सकता। शिवपाल और अमर सिंह का साथ कभी नहीं छोड़ूंगा।

कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने भावुक होकर कहा कि मैं नई पार्टी क्यों बनाऊंगा? मैं भी किधर जाऊंगा, मैं बर्बाद हो जाऊंगा। नेताजी मेरे लिए गुरु हैं, वह चाहें तो मुझे पार्टी से बाहर निकाल सकते हैं। वह कहते तो मैं इस्तीफा दे देता। अखिलेश ने अमर सिंह पर निशाना साधा और कहा कि पार्टी के खिलाफ साजिश करने वालों के खिलाफ बोलूंगा। वहीं शिवपाल यादव ने समर्थकों को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि अखिलेश ने अलग पार्टी बनाकर दूसरे दल के साथ चुनाव लड़ने की बात कही है। मैं कसम खाकर कहता हूं कि अखिलेश ने यह बात कही थी। क्या मैंने सीएम अखिलेश से कम काम किया है। मेरे विभाग छीने गए पर मेरा कसूर क्या था। मैंने सीएम और नेताजी के हर आदेश को माना। पार्टी में कुछ लोग सत्ता की मलाई चाट रहे हैं। हमने पार्टी बनाने के लिए संघर्ष किया। क्या सरकार में मेरा योगदान नहीं है। अब नेताजी नेतृत्व संभालें।

दरअसल, समाजवादी पार्टी किस रास्ते की ओर बढ़ रही है, यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है, क्योंकि इस दल में जारी सत्ता संघर्ष किसी ठोस नतीजे की शक्ल नहीं ले सका है। बीते लगभग एक माह से इस दल में करीब-करीब हर दिन कुछ न कुछ अप्रत्याशित हो रहा है। गत दिवस मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह और उनके कुछ साथियों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके कुछ देर बाद उनके दूसरे चाचा रामगोपाल यादव पार्टी से बाहर कर दिए गए। उनके निष्कासन की सूचना देने के साथ ही शिवपाल सिंह ने उन पर कई तरह के आरोप भी मढ़े। शिवपाल और रामगोपाल के खिलाफ कार्रवाई से इसकी तो पुष्टि हो गई कि सपा में इस कलह का एक कारण इन दोनों के बीच तनातनी भी है, लेकिन अभी यह सार्वजनिक होना शेष है कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच किन बातों को लेकर मतभेद हैं और वे कितने गंभीर हैं। यह भी अस्पष्ट ही है कि मतभेद बाहरी लोगों की वजह से हैं, जैसा कि अखिलेश बता रहे हैं या फिर अंदर यानी परिवार के लोगों के कारण, जैसा पार्टी के कुछ विधायक रेखांकित कर रहे हैं।

जैसे कल तक निगाहें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से बुलाई गई बैठक की ओर थीं वैसे ही अब मुलायम सिंह की ओर हैं। कहना कठिन है कि क्या कुछ होता है और ऐसे कोई फैसले लिए जाते हैं या नहीं, जिनसे पार्टी को चपेट में लेने वाली परिवार की लड़ाई का पटाक्षेप हो। मगर यह साफ है कि यदि उठापटक का सिलसिला इसी तरह कायम रहा तो सपा को नुकसान होना तय है। किसी दल में सत्ता और संगठन के लोगों के बीच कलह का यह पहला मामला नहीं। अतीत में कांग्रेस समेत अन्य अनेक सियासी दल ऐसी कलह से दो-चार हो चुके हैं और उनसे यही स्पष्ट हुआ है कि अंतत: संगठन के लोग ही पराजित नजर आए हैं। पता नहीं सपा में क्या होगा, लेकिन इसमें दोराय नहीं कि आज के दिन इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत मुख्यमंत्री अखिलेश ही हैं।

तमाम समस्याओं, बाधाओं और आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद उन्होंने विनम्र एवं विवादों से दूर रहने वाले नेता की छवि अर्जित की है। उनकी इस छवि की अनदेखी करने की स्थिति में कोई भी नहीं। यह भी उल्लेखनीय है कि अब वैसी राजनीति के लिए स्थान और भी कम हो गया है, जिसका प्रतिनिधित्व मुलायम सिंह और शिवपाल करते चले आ रहे हैं। पिछले एक माह में यह दूसरी बार है जब अखिलेश ने यह साबित करने की कोशिश की है कि सत्ता की कमान उनके हाथ में है और वह पार्टी के हित में कठोर फैसले लेने में भी सक्षम हैं। आम जनता जिस तरह साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं की मुरीद होती है, वैसे ही इसकी भी कि नेता कठोर फैसले ले सकने में सक्षम है या नहीं? भले ही दोनों पक्षों की ओर से जवाबी कार्रवाई के बाद भी सपा टूट की ओर बढ़ती नहीं दिख रही, लेकिन यह भी ठीक नहीं कि कलह सतह पर बनी हुई है।

सपा की लड़ाई अपनी है लेकिन उस लड़ाई में कई सियासी पार्टी चुनावी गणित खोज रहे हैं। खोजना भी चाहिए। सभी खोजते हैं। सपा की लड़ाई भी जब सियासी खेल पर ही आधारित है तो फिर अन्य दल इस खेल में राजनितिक लाभ क्यों न देखे। बीजेपी की अपनी रणनीति है और बसपा की। अगर सपा के भीतर टूट की कहानी बनती है तो साफ़ है इसका सबसे ज्यादा लाभ बसपा और कांग्रेस को मिलेगा। मुस्लिम वोटर बीजेपी को हारने के लिए बसपा और जहां कांग्रेस मजबूत है उसके साथ चला जाएगा। 

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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यादव कुल में लातम-जूतम : कहीं आईपीएस अमिताभ ठाकुर और पत्रकार यशवंत सिंह के श्रापों-आहों का असर तो नहीं!

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में भयंकर ड्रामा चरम पर है. सारे चेहरे बेनकाम हो रहे हैं, मुलायम सिंह यादव से लेकर रामगोपाल यादव तक और शिवपाल यादव से लेकर अखिलेश यादव तक. हर कोई स्वार्थ, लिप्सा और सत्ता की चाहत में किसी भी लेवल पर गिरने को तैयार है. जनता हक्की बक्की देख रही है. उधर, कुछ लोगों का कहना है कि आईपीएस अमिताभ ठाकुर व भड़ास फेम पत्रकार यशवंत सिंह जैसे बहादुर, ईमानदार और सरोकारी लोगों के साथ सपा की इस सरकार के राज में जो जो बुरा बर्ताव किया गया, उसकी आहों व बददुवाओं का असर है कि अखिलेश यादव राज बवंडर में है और यादव कुल के किसी भी व्यक्ति का जीवन शांत नहीं रह गया है.

इस यादव कुल की आपसी लातम-जूतम को देखकर दुनिया आनंदित हो रही है और इनकी लगातार सामने आती खलनायकी भ्रष्टाचारी वाली छवि से नाराज लोग इन्हें चुनावों में सबक सिखाने को आतुर हैं. कट्टर यादवों को छोड़ दें तो इस समय सारे लोग इस सपा सरकार के जंगलराज और इनकी आपसी जूतम-पैजार से परेशान है. प्रदेश में सारा काम ठप पड़ा हुआ है. अफसर भी मजे लेकर तमाशा देख रहे हैं.

रामगोपाल यादव सीबीआई और बीजेपी के चंगुल में हैं जिसके कारण उन्हें शिवपाल ने पार्टी से निकाल दिया वहीं मुलायम सिंह दलालों अपराधियों आदि को अपना बहुत करीबी बताकर अपने बेटे अखिलेश का विरोध कर रहे हैं. वहीं अखिलेश मुगल शासक के राजाओं की तरह सत्ता मिल जाने के बाद किसी भी तरह अपना कद और पद बड़े से बड़ा बनाना चाहते हैं ताकि यादव कुल में सीएम पद के लिए कोई दूसरा प्रतिस्पर्धी न पैदा हो सके. इस प्रकार यह खानदान आपस में ही चरम मारकाट में लिप्त होकर एक दूसरे को एक्सपोज कर रहा है. उत्तर प्रदेश में जंगलराज का जो लंबा दौर चला है उसमें बहुत से ईमानदार, निर्दोष और साहसी लोगों को शासन सत्ता का उत्पीड़न झेलना पड़ा.

मीडिया मालिकों और संपादकों के सांठगांठ के दबाव में यूपी सरकार ने भड़ास4मीडिया के एडिटर को 68 दिनों के लिए जेल भेज दिया था और तरह तरह के फर्जी मुकदमें लाद दिए थे ताकि कभी जमानत न हो पाए. इसी तरह निर्भीक आईपीएस अमिताभ ठाकुर को पग पग पर परेशान किया गया और जितना प्रताड़ित किया जा सकता था, उन्हें किया गया. अमिताभ और यशवंत दोनों ने फेसबुक पर अपने अपने अंदाज में लिखा है कि उनकी बददुवाओं और आहों का असर पड़ा है जिसके कारण प्रकृति निरंकुश और अन्यायी यादव कुल के साथ अपने तरीके से न्याय कर रही है. आइए पढ़ते हैं अमिताभ और यशवंत ने एफबी पर क्या क्या लिखा है :

Amitabh Thakur : इनकी दुर्दशा में कुछ मेरी भी आहें जरूर शामिल रही होंगी जो मैंने अकेली रातों में उनके अन्याय के साए में निकालीं. चलो, कम से कम अब मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ कार्यवाही तो हो रही है. xxx अब जब मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने श्री प्रजापति को दुबारा बर्खास्त करते हुए कड़ा कदम उठाया है तो हम उम्मीद करेंगे कि वे मेरी पत्नी द्वारा जून 2015 में श्री प्रजापति के खिलाफ थाना गोमतीनगर में दर्ज कराये गए एफआईआर में उन्हें गिरफ्तार कराते हुए हमें न्याय देंगे. xxx My silent tears on all the torture I faced through misuse of their authority seem to get some solace today. xxx Thank God, now justice is being done against minister Gayatri Prajapati. Now when CM Sri Akhilesh Yadav has taking strong action against Mr Prajapati by sacking him again, we hope the CM will also take police action against Mr Prajapati by arresting him in the FIR registered by my wife Nutan in Gomtinagar police station in June 2015 for trying to frame us in false cases, which is pending since then.

Yashwant Singh : प्रकृति का न्याय है भाई। एक फ़क़ीर का श्राप था इन रामगोपाल जी पर। और, यादव खानदान पर भी। इन्हें नष्ट होना है। जिन जिन पर श्राप होंगे, वो नष्ट होंगे। भ्रष्टाचारियों और आततायियों को रोने के लिए कंधे न मिलेंगे। खुद को बिना अपराध 68 दिन जेल में रखने के चलते दिए गए श्राप का असर होना ही था। यादव खानदान के गलत कामों और जंगलराज से पीड़ितों की आह भी तो लगेगी इनको, इसलिए ये नष्ट होंगे। कुछ श्राप जल्द लगते हैं, कुछ आहों का असर सदियों में दिखता है। इसके उलट वाइस वर्सा कुछ आहों का असर तत्काल दिखता है और कुछ श्राप का सदियों में।

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यूपी में जंगलराज : …उस ग़रीब की किस्मत पर अगले दिन थानेदार ने ‘अपहरणकर्ता’ लिख दिया!

Sheetal P Singh : यह एक सौ प्रतिशत सच्ची कथा है… सत्ताइस बरस के दलित / पिछड़े शासन के बावजूद किसी दलित / पिछड़े की यूपी में कितनी सुनवाई है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं…उ०प्र० के अवध क्षेत्र के एक गाँव में एक मल्लाह परिवार एक ठाकुर साहब की जायदाद पर (जंगल और नदी का तट) हाड़तोड़ मेहनत से कुछ बँटाई की खेती और कुछ जंगली उत्पाद (जलाऊ लकड़ी) आदि के संयोजन पर जीवित है। पति पत्नी और कुछ बच्चे!

ठाकुर साहब के जंगल में एक दो कमरे का पक्का घर और इस मल्लाह परिवार का झोपड़ा है। कुछ सैकड़ा जंगली और कुछ दर्जन इमारती दरख़्त और साथ बहती नदी। एक दुबे जी यहाँ लकड़ी के ठेकेदार के तौर पर नमूदार हुए। उनके बेरोजगार बेटे और उसके कुछ दोस्त पक्के घर में जम गये और जंगली लकड़ी कटवाने लगे। बियाबान देखकर उन्होंने एक कुटीर उद्योग भी डाल लिया। पड़ोस के जिले से एक “पकड़” कर लाये और साथ डाल लिया। पकड़ के बाप ने हाल ही में जमीन बेची थी सो दुबे जी के सपूत और उनके गैंग ने पचीस लाख की फिरौती तय कर ली।

मल्लाह परिवार इस ठेकेदार क्लब को भोजन सप्लाई करता और बचत से अपने बच्चों का पेट भरता। एक रात पुलिस आई। दुबे जी के सपूत को फोन आ चुका था वे तो फुर्र हो गये पर पुलिस मल्लाह को ले गई। ठोंका और किसी क़िस्म की घूस दे पाने में अक्षम बेगुनाह को तीसरे दिन अपहरणकर्ताओं के साथ मुलज़िम क़रार दे दिया। मजिस्ट्रेट सिर्फ पुलिस का लिखा पढ़ते हैं आदमी का माथा नहीं! सो पैंतालिस बरस नदी किनारे किसी तरह ज़िन्दा रहने के बाद पहली बार मल्लाह को पता लगा कि जेहल क्या होती है, मुक़दमा और वक़ील क्या होता है? वक़ील जमानत की फ़ीस लेता है। फ़ीस केस की धारा के हिसाब से होती है और हज़ूर लोगों के पास किसी मजलूम की फ़रियाद सुनने का बखत नहीं होता।

दुबे गैंग फ़रार है वह कोर्ट में सुविधानुसार समर्पण करेगा। उत्तर प्रदेश के करीब ३५ बरस से पत्रकार (मान्यताप्राप्त) ने जिले के कप्तान साहेब को चालान से पहले तथ्य बता दिये थे पर साहब को उस समय नींद आ रही थी। वे सो गये और उस ग़रीब की क़िस्मत पर अगले दिन थानेदार ने “अपहरणकर्ता” लिख दिया जिसने शायद पच्चीस हज़ार रुपये भी एक साथ आजतक अपने हाथ में न पकड़े हों! मल्लाह की बीबी जमानत के लिये वक़ील की फ़ीस भरने के लिये आस पड़ोस में हफ़्ते भर से चन्दा और रहम माँग रही है। मैं पोस्ट लिख रहा हूँ, नेता जी परिवार का झगड़ा सुलझा रहे हैं, बीजेपी राम जी की चिंता में है, मायावती मुसलमानों की चिंता में!

लेखक शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और मूलत: सुल्तानपुर के निवासी हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से लिया गया है.

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यूपी में जंगलराज : सिपाहियों ने संपादक के मुंह में जबरन डाली शराब, जमकर की पिटाई

उत्तर प्रदेश में जंगलराज चरम पर है. समाजवादी पार्टी के नेताओं में आपसी घमासान का पूरा फायदा पुलिस और प्रशासनिक अफसर उठा रहे हैं. अखिलेश यादव की अनुभवहीनता और अहंकार पूरे प्रदेश को अंधेरे की तरफ ढकेल रही है. कोई किसी की सुनने वाला नहीं है. यूपी के एटा में एक ऐसी घटना हुई है जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. यह एक संपादक के साथ हुआ. इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि आम आदमी का क्या हाल होगा. एटा में पुलिस वालों ने एक स्थानीय अखबार के संपादक पर बर्बर जुल्म ढाया.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक एटा में एक महिला की मदद के लिए जब स्थानीय अखबार के संपादक ने पुलिस से मदद मांगी तो पुलिस वालों ने पीटकर संपादक को ही अस्पातल पहुंचा दिया. स्थानीय दैनिक अखबार मनसुख टाइम्स के संपादक बब्लू चक्रवर्ती ने एक औरत के सिर से खून बहता देखा. उन्होंने महिला की मदद करने के लिए पुलिस वालों से कहा. पुलिस वाले बुरी तरह शराब पिए हुए थे. उन्हें संपादक का अंदाज नागवार लगा तो संपादक को ही पकड़कर बिठा लिया और उनके मुंह में जबरन शराब डाल दी. इसके बाद पुलिस वालों ने पत्रकार की जमकर पिटाई की.

संपादक पुलिस वालों के पास जिस समय मदद की गुहार लगाने गए थे, उस समय सभी पुलिसकर्मी थाने में रसरंजन में लीन थे. टाइम्स ऑफ इंडिया को पीड़ित पत्रकार ने बताया कि यह घटना रविवार रात 9:15  की है, जब वह अपना काम खत्म कर ऑफिस से घर जा रहा था, कि तभी उसने कोतवाली नगर थाना के परिसर में एक महिला को देखा, जिसके सिर से बहुत तेजी से खून बह रहा था. पत्रकार ने दरियादिली दिखाते हुए जब उस महिला से हादसे के बारे में पूछा तो उसने पुलिस की बर्बरता की कहानी सुनाई. बात सुनने के बाद पत्रकार ने वहां मौजूद पुलिसवालों से महिला मदद करने और अस्पताल ले जाने को कहा ताकि महिला का खून बंद हो सके. लगभग 20 मिनट तक पुलिसवालों ने पत्रकार को कोई जवाब नहीं दिया. इसके बाद दो कॉन्स्टेबल अपने हाथों में कच्ची शराब से भरा ग्लास लेकर केबिन में आए और पत्रकार से उसके बारे में पूछताछ शुरू की. पुलिसकर्मी इस कदर नशे में धुत थे कि उन्होंने पत्रकार द्वारा महिला की मदद किए जाने की बात को अनसुना कर दिया.

पीड़ित पत्रकार ने कहा कि उनके इस तरह के व्यवहार को देखकर जब मैंने उन्हें फोन पर उनके सीनियर अधिकारियों से उनके बारे ये सब बताने की बात कही तो उन कॉन्स्टेबल ने 6 पुलिसकर्मियों को बुला लिया और इसके बाद हर कोई मुझे गाली देने लगा. उन लोगों ने इसके बाद लात-घूसों से मेरी पिटाई शुरू कर दी. उन लोगों ने कच्ची शराब मेरे मुंह में उड़ेल दी. इसके बाद मैंने एक अपने पत्रकार मित्र को वहां बुलाया, जिसने मुझे अस्पताल पहुंचाया. पीड़ित पत्रकार ने घटना की शिकायत लिखित में एसएसपी से की. जिन दो कॉन्स्टेबल्स ने पत्रकार पर हमला किया था, उन्हें लाइन हाजिर कर दिया गया है.

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मथुरा और बनारस में 25-25 मौतों के लिए बुनियादी रूप से स्टेट जिम्मेदार है

Abhishek Srivastava : बीते चार महीनों के दौरान हर महीने कम से कम दो बार जगदीश बहराइच के अपने गांव से मुझे फोन करता रहा। आज फिर उससे बात हुई। हर बार फोन कर के एक ही बात कहता है- बाबूजी, हमार औरत अभी ले नहीं आई। कछु पता लगे तो बतइहो…।” मथुरा में 2 जून को जय गुरुदेव के अनुयायियों पर हुई गोलीबारी के बाद से उसकी औरत और लड़की गायब है। ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके परिजनों का आज तक पता नहीं लगा। इनके स्‍वयंभू नेता रामवृक्ष यादव की मौत की पुष्टि भी अब तक नहीं हो सकी है।

इस अधूरी कहानी के बीच कल जय गुरुदेव के लोगों की बनारस में हुई भगदड़ में मौत की जब ख़बर आई, तो दिल दहल गया। इस बार झंडा रामवृक्ष ने नहीं, पंकज यादव ने थाम रखा था। आवेश तिवारी लिखते हैं कि लाशों के बीच से लोग खून में सने जय गुरुदेव के झंडे बंटोर रहे थे। पढ़ते हुए याद आया कि वृंदावन के अस्‍पताल में 2 जून की घटना में गोली खाए देवरिया के एक बुजुर्ग से मुलाकात हुई थी। घटना का विवरण देते हुए उन्‍होंने कहा था, ”गुरु बोले थे कि जब अन्‍याय हो तो झंडा आगे कर देना। हम झंडा आगे किए तो छाती पर गोली मार दिया।”

जय गुरुदेव के अनुयायी बेहद गरीब-गुरबा, सीधे-सादे और ग्रामीण लोग हैं जिनका ब्रेन वॉश कर दिया गया है। झंडा उनकी आस्‍था का प्रतीक है जो उन्‍हें ताकत देता है। हमारे पास उन्‍हें देने को कुछ नहीं है। लाशों के बीच से उनका झंडा बंटोरना एकबारगी विद्रूप लग सकता है, लेकिन यह उस देश के पढ़े-लिखे और खाए-अघाए लोगों पर एक तीखी टिप्‍पणी है जो उन्‍हीं की तरह किसी दूसरे का झंडा तो ढोते रहते हैं, लेकिन अपनी बौद्धिकता के दंभ में किसी और के झंडे तले खड़े मजबूर लोगों को नीची निगाह से देखते हैं।

जय गुरुदेव के अनुयायी मथुरा में 25 मार दिए गए, तो बनारस में 25 हादसे में मर गए। दोनों के लिए बुनियादी रूप से स्‍टेट ही जिम्‍मेदार है लेकिन उनके लिए इस देश में फासीवाद कभी नहीं आया। उनके लिए जनवादियों से कभी आह्वान नहीं किया गया। पास्‍टर निमोलर होते तो लिखते, ”पहले वे आस्तिकों को मारने के लिए आए/मैं चुप रहा क्‍योंकि मैं नास्तिक था/फिर वे मुझे मारने के लिए आए/और तब तक कोई नहीं बचा था/ जो मेरे लिए बोलता”।

पत्रकार और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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अगर आप पांडेय जी हैं तो लुटने-पिटने के बावजूद यूपी के थाने में नहीं लिखी जाएगी एफआईआर!

Sushant Jha : मुझे पहले भी लगता था कि Akhilesh Yadav उतने बुरे आदमी नहीं है और ट्विटर का असर वाकई धीरे-धीरे हो रहा है.  ताजा घटना सुनिए. Kumar Alok में वरिष्ठ संवाददाता है DD News में. हमारा पुराना परिचय है, हालांकि वे आभासी रूप से बाएं बाजू वाले हैं. कल उनके साथ लूटपाट हुई, हमला हुआ और वे जख्मी हो गए.

बहन के यहां से इंदिरापुरम्(गाजियाबाद) के ज्ञानखंड से लौट रहे थे. तभी अपराधियों ने हमला किया. जो कुछ साथ में था-मसलन मोबाइल, घड़ी, कुछ रोकड़े-सब छीन लिये और प्रतिरोध करने पर जबर्दस्त पिटाई की. जैसे-तैसे पास के अस्पताल गए और सिर में टांके लगवाए. किसी का मोबाइल मांगकर परिवार को फोन किया. पुलिस में शिकायत करने पर पहले नाम पूछा गया. नाम बताया- कुमार आलोक, पिता का नाम-सिद्धेश्वर पांडे.

“ओहो पांडेयजी हैं! अरे महाराज, जाइये इलाज-बिलाज करवाइये ठीक से. कहां पड़े हुए हैं थाना के चक्कर में”.

जाहिर है FIR नहीं लिखी गई.

अभी कुछ देर पहले Manjit Thakur ने ट्वीट किया जिसमें यूपी के आलाअधिकारी, CM अखिलेश और बसपा को टैग किया गया. मैंने भी रिट्वीट किया.

खबर है कि संबंधित थाना क्षेत्र के ASI और दो पुलिस कांस्टेबुल सस्पेंड कर दिए गए हैं.

देश अलग अंदाज में बदल रहा है. जाति के नाम पर न्याय नहीं देनेवाले भी बदस्तूर मौजूद हैं. लेकिन काम करनेवाले भी धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं.

पत्रकार सुशांत झा की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

मनोहर झा यूपी है साहेब .. खुद को सुलझाने में इतने व्यस्त है अखिलेश बाबु की शहर में क्या हो रहा है कुछ पता नहीं और ये वही यूपी है जहाँ जाति देख के थानेदार नियुक्त किये जाते है।

Kumar Devbrat भैया कुछ हो सका इसका कारण न तो ट्विटर है और न ही देश का बदलना,कुछ हो सका इसका कारण सिर्फ और सिर्फ आने वाला यूपी चुनाव है !

Sushant Jha ट्विटर-वा न होता तो चुनावी मौसम में भी सुनता कौन? और सुनाता कौन?

Kumar Devbrat जी माध्यम है कारण तो फिर भी चुनाव ही माना जाएगा,नहीं तो अखिलेश यादव के राज में बलात्कार भी लड़कों की सिर्फ गलती भर मानी जाती है!

Bhaskar Jha Aap ke twit karne se police wale suspend hue…sahi bat ye hai ki indra puram thane ka bura haal hai.. ek jankar ke flat me chori ki koshish hui, to police kahti hai ki gahr ka dhyan kyo nahi rakhte… SO shayad Gorakhnath yadav hai…

N Vishwas Vishwas Thana in charge ka surname pata karwaiye sab kude pata chal jayega .

Harshit Bhardwaj प्रश्न ये है की आलोक जी पत्रकार न होते, मंजीत जी और आपका सहयोग न होता तब भी यही होता?

Ashish Tiwari 16 करोड़ यूपी वालों के लिए कौन कौन ट्वीट करेगा???…

Ritesh Verma यूपी में हर जिले की पुलिस का वेरिफाइड ट्विटर हैंडल है. वेबसाइट वाले भी अगर किसी खबर पर उनको टैग करते हैं तो वो फटाफट डिटेल रिप्लाई करते हैं कि क्या एक्शन लिया गया है, क्या हो रहा है.

Amit Ganguly Halanki Ritesh Bhaiya, har bio me likha hota hai “Don’t report crime here. Not monitored 24X7.” Issi se hausla toot jata hai

Sanjay Mehta सब बीमारी चहचहाने से दूर होगी क्या?

पंकज कुमार झा आपके इस ख़बर का अखिलेश के अच्छे या बुरे होने से सम्बंध नही है. ज़ाहिर है बात ऊपर तक पहुँची और शायद पत्रकार का मामला होने के कारण करवाई हो गयी. अन्यथा यह वाक्य यही दिखाता है कि यूपी का एक एक अमला न्याय देने से पहले जाति देखता है, ग़ैर मुस्लिम ग़ैर यादव के लिए आज वहां जीना रोज़ का संघर्ष है.

Gaurav Tripāthi क्यों सम्बंध नहीं है..?? ट्विटर पर उत्तर प्रदेश पुलिस किसके मार्गदर्शन और दिशानिर्देश पर आयी..

Pooja Nagar Mavi यूपी में घुस के अपने कपड़े लत्ते समेत बाहर निकल आए… गनीमत समझिए

Bhaskar Jha लूटपाट गाजियाबाद का श्रृंगार है ….घबरायें नहीं

Mukul Shrivastava बस कुछ महीने और इनको बूझ जाएगा कैसे पुत्तर प्रदेश की जनता इनका कल्याण करेगी |

Shivam Bhatt UP पुलिस की डिजिटल विंग गजब ढाए है। तीन लोगों का दिमाग है इसके पीछे। लखनऊ के आईजी सतीश गणेश, dgp और dgp के PRO राहुल श्रीवास्तव। कंप्लेंट के लिए थाने जाना बेवकूफ़ी है अब।

Radhey Shyam Yadav Ye Jatiwadi Log police hi nahi har Jagah Mil Jayenge Jo Sarkar ke Adheen Kam kar rahe hain wo kaam hi nahi karna chahte

Bishwajeet Jha पूरे यूपी में पुलिस स्टेशन जाने पर fir नही होता जब तक आपका पहचान बड़े लोग और अधिकारी से न हो fir करता ही नही यूपी पुलिस

Bishwajeet Jha देश का दुर्भाग्य ही समझे फ़िर इस तरह का व्यवहार पुलिस नागरिक के साथ करता हैं राज्य सरकार कों इस विषय में गंभीरता लेना चाहिये

Shaneer N Siddiqui यूपी के खासकर लखनऊ के कई पत्रकारों की यह धारणा है कि अखिलेश तो काम करना चाहते हैं (कुछ मोदी सरकार के hightech culture का भी असर है) … लेकिन चाचा और भतीजा से परेशान हैं। लेकिन एक दूसरा पहलू भी है कि चाचे नहीं होते हैं तो ……IAS और दीगर अफसर लॉबी उनको टोपी भी बहुत पहनाती है.

Neetu Singh Mai kumar alok ki choti bahan nitu jo KAL merai Bhai kea sath ko hadsa Hua dus din pehalai merai sath wahi chain snatching Hua police aay ram aur gaie ram

Satrumardan Singh Pulak भाई दुखद है।कार्यवाही हुई ठीक है परन्तु किस -2बात की शिकायत मुख्यमंत्री से करे।

Salman Faheem अखिलेश यादव चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु हैं भइय्या, युवाओं में उनकी छवि अच्छी है पर तब भी सपा जीतेगी नहीं।

Ambuj Pandey सटीक उपमा दिया आपने।यदि अभिमन्यु हैं तो परिणति बड़ी दुःखद होने वाली है।कोई महारथी बचा नहीं पाया था अभिमन्यु को।

Kapil Sharma ब्राह्मण है तो जीने का हक़ कहाँ है लोकतंत्र मे……2000 सालों के गुनाहगार जो ठहरे…….मैंने भी प्रशासनिक जातिवाद झेला है

Prashant Krishen क्या यह घटना 10 तारिख के रात की हैं क्या ?

Shreesh Chandra Singh उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की त्रासद स्थिति।

संजय कुमार झा ‘रिक्थ’ ध्यान रखिये…हमेशा चुनाव सर पर नहीं होता….फिर भी धन्यवाद तो बनता है

Amit Ganguly जन धन के बाद अब गांव वालों का ट्विटर खाता भी खुल जाना चाहिए. वैसे गाजियाबाद दिल्ली के पास है. जितना अंदर घुसेंगे उतना ही दलदल है.

Vishal Bhasin बहुत बुरा हुआ। आलोक जी भी लपेटे में आ गए….ये उत्तरप्रदेश ज़मीन का अन्याय है एक पत्रकार के साथ

Shachindra Trivedi mere sath Patna High Court ke pas 3 ladkon ne pistol dikha kat lootpat ki. par 3 din tak daudne par bhi FIR nahi kiya. 2003 ki ghatna hai.

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यूपी का शिशु सीएम हर एग्जाम में फेल… जानिए, जनता क्यों नहीं करेगी इन्हें रिपीट…

Yashwant Singh : अखिलेश यादव जैसा बेचारा और धूर्त मुख्यमंत्री खोजे नहीं मिलेगा… बेचारा इसलिए कि खुद कोई फैसला नहीं ले सकते… धूर्त इसलिए कि चोरों और भ्रष्टाचारियों का नेता बन शासन चला रहे लेकिन खुद के बोल ऐसे होते हैं जैसे उनके जैसा इन्नोसेंट कोई दूसरा नेता नहीं. यह धूर्तता ही तो है कि जो आप हो, उसे छुपा कर एक नई लेकिन झूठी छवि निर्मित करने की कोशिश कर रहे हो जिससे जनता भ्रमित होकर बहकावे में आकर वोट दे जाए… सबको पता है कि अगली बार भी सीएम बने तो यही सब चोर उचक्के लुटेरे मंत्री बनेंगे और यही सब काकस घेरे रहेगा… ऐसे में सिवाय एप्प लांच करने और खुद की मार्केटिंग-ब्रांडिंग करने के, दूसरा कोई काम नहीं होगा… हां, जंगलराज इससे भी भयानक रूप में बदस्तूर जारी रहेगा… सारी विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए एंड्रायड स्मार्ट फोन देने का जो नारा अखिलेश ने दिया है, वह एक तरह से वोट पाने के लिए रिश्वत देने जैसा है जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल किया जाना चाहिए. आप पांच साल के जंगलराज को एक स्मार्टफोन देकर नहीं ढंक सकते.

अपने भ्रष्टतम और दागी मंत्री गायत्री प्रजापति को बस कुछ दिन के लिए हटा पाया…फिर से उस चोर को अपनी टीम में ले लिया.. काहे भाई… चलो छोड़ो.. अब ये बताओ कि अपने लिए तो छह सात सौ करोड़ का नया सीएम आफिस बना लिए हो… हमारे गाजीपुर जिले के लोगों के लिए ठीकठाक सड़क भी मयस्सर नहीं कराए… देखिए, क्या हाल है गाजीपुर की सड़कों का.. कहने को ये बौद्ध परिपथ की सड़क है लेकिन यहां रोजना एक्सीडेंट में दर्जनों लोग घायल होते हैं… शुक्रिया भाई Braj Bhushan Dubey जी जिन्होंने इन खराब सड़कों के मुद्दे को जोर शोर से उठाया और इस पर अभियान चला रहे हैं… दुबे जी लगातार गाजीपुर जिले की मूलभूत समस्याओं को लेकर सक्रिय रहते हैं और शासन-सत्ताधारियों की नींद हराम किए रहते हैं…

दुबे जी के ताजा अभियान के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : यूपी के जंगलराज में बौध परिपथ पर रोज गिरता है खून…. गाजीपुर में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शुरू किया ‘आपरेशन एनएच’

इसी गाजीपुर से महान पत्रकार अच्युतानंद मिश्रा के भतीजे विजय मिश्रा भी मंत्री हैं… ओम प्रकाश सिंह मंत्री हैं… ऐसे लाल बत्ती वालों की संख्या चार से ज्यादा बताई जाती है है.. लेकिन ये सब के सब आंख के अंधे हो चुके हैं… इन्हें कुछ दिखाई नहीं देता… ये सभी अपने आकाओं के नक्शेकदम पर चलते हुए सारी की सारी कोशिश ज्यादा से ज्यादा उगाही के लिए करते रहते हैं…

अखिलेश यादव से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन यह आदमी चूं चूं का मुरब्बा बन चुका है.. न छवि साफ सुथरी रही और न ही कोई विकास कार्य किया… जैसा जंगलराज कायम है, उसे ही चलते देने का नाम अखिलेश यादव है. सोचिए, किसी करप्ट अफसर के यहां कोई छापा डलवा पाया अखिलेश यादव? कोई चोर अफसर कभी अरेस्ट हुआ? इसलिए क्योंकि सारे चोर और करप्ट तो अखिलेश यादव के राज में इनके खानदानियों से संरक्षण पाए हुए हैं… सो, लूटकांड का जो महान दौर यूपी में रचा गया है, उसके सिरमौर अखिलेश बाबू ही कहे जाएंगे… लाख ये किंतु परंतु लेकिन इफ बट आदि लगाएं… लेकिन जनता बस एक बात जानती है कि अखिलेश राज में जन जन का जीवन ज्यादा दूभर हो गया है और चोरों लुटेरों भ्रष्टाचारियों की जय जयकार मची हुई पड़ी है…

शासन सत्ता में उपर से नीचे तक चोर ही चोर भरे हुए हैं… ढेर सारे पैसे देकर अच्छी पोस्टिंग पाओ और जमकर कमाओ… इस पूरे लूट प्रदेश में अजीब किस्म के दानव राज की दुर्गंध फैली हुई है जिसमें किसके साथ क्या कब कहां घटित हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता… पत्रकार दिनदाहड़े जला फूंक दिए जाते हैं, हत्यारे मंत्री बने रहते हैं… जो सच बोलने की कोशिश करेगा, वह मारा जाएगा या जेल जाएगा… जो झूठ चापलूसी भ्रष्टाचार के साथ खड़ा होकर यसमैन बना रहेगा, उसकी तरक्की दिन दूनी रात चौगुनी होती जाएगी. नौकरशाही का आलम ये है कि प्रदेश में सारे कामधाम ठप है. किसी को किसी से कोई डर भय नहीं. कोई उत्तरदायित्व-जवाबदेही नहीं. बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स ठप पड़ चुके हैं. बस केवल ब्रांडिंग और मार्केटिंग का खेल जारी है. चेहरा चमकाने की कोशिशों में सब व्यस्त हैं. अब तो पता ही नहीं चलता कि यूपी में कोई मुख्य सचिव भी है… कोई डीजीपी भी है… तो क्या अखिलेश ऐसे ही यसमैन चाहते हैं ताकि न कोई काम हो और न उन पर उंगली उठे? यानि नो वर्क, नो क्वेश्चनमार्क… किंकर्तव्यविमूढ़ता की हद है…

इस यादव खानदान को मुगालता हो चुका है कि वे चाहें जो करें, सत्ता में तो उन्हें आना ही है… देखते हैं यूपी की जनता क्या तय करती है… लेकिन फिलहाल तो अपन का यही कहना है कि भई, अखिलेश के चेहरे मोहरे पर मत जाओ… यह रीढ़विहीन युवा न कोई कड़ा फैसला ले सकता है और न ही दागियों-भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक्शन कर सकता है. यह शिशु सीएम सिर्फ अच्छी अच्छी बकलोली कर सकता है जिस पर उसके चमचे वाह वाह भर कर कह लिख बोल सकते हैं… ऐसा कोई भी नहीं जो अखिलेश यादव को बता सके कि वह एक ऐतिहासिक मौका खो चुके हैं… वह चाहते तो उत्तर प्रदेश को भ्रष्टाचारियों से मुक्त कर खुद को जबरदस्त लोकप्रिय नेता बना सकते थे लेकिन अखिलेश की हालत यूं हो गई है कि न खुदा मिला न बिसाले सनम.

भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

यूपी में जंगलराज की दर्जनों कहानियां पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : अखिलेश राज कुछ और नहीं, बस एक भयंकर जंगला राज का उन्नत नाम…

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एक हरामखोर दरोगा की करतूत (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : एक हरामखोर दरोगा की हरकत देखना चाहेंगे? देखेंगे तो आप भी कहेंगे कि ये सच में हरामखोर है. आधी रात के बाद नशे में झूमता दरोगा अपनी सिपाही मंडली के साथ एक मकान के बाहर पहुंचता है और बंधे हुए कुत्ते की टांग पर डंडा डंडा मारता है. कुत्ते की चीख चिल्लाहट पर घर की महिलाएं बाहर निकलती हैं तो वह जमकर गाली गलौज करता है और घर के एक पुरुष सदस्य की गिरफ्तारी की बात कहते हुए घर में घुस जाता है. उसके पहले घर के बाहर भोंक रहे एक कुत्ते पर अपने सर्विस रिवाल्वर से फायर झोंक देता है. घर में घुसकर यह दोरगा महिलाओं को गंदी गंदी गालियां देता है.

बिना महिला सिपाही लिए आधी रात को पुरुष विहान एक घर में घुसना और महिलाओं को गंदी गंदी गाली देना, कुत्ते पर फायर झोंकना… ये किसी हरामखोर दरोगा की ही हरकत हो सकती है. फिलहाल वीडियो देखें और सोचें. आज इसे यूं ही छोड़ दिया गया तो कल को हमारे आपके घर की महिलाओं के साथ ये हरामखोर ऐसी हरकत कर सकता है. इसलिए इसको सबक सिखाना जरूरी है. इस वीडियो को यूपी के सीएम से लेकर डीजीपी, मुख्य सचिव, आगरा के आईजी, डीआईजी, एसएसपी तक पहुंचाने में मदद करिए. पहली तस्वीर में ‘डकैत’ टाइप पुलिस दल को देखिए और दूसरी तस्वीर में कुत्ते पर फायर झोंकने का दृश्य है.

सब कुछ सीसीटीवी में कैद हो चुका है जिसे देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : https://youtu.be/2SRVS-VxmSg

पीड़ित परिवार की महिलााओं का बयान सुनने के लिए इस लिंक https://www.youtube.com/bhadas4media पर क्लिक करें और शुरुआती चार वीडियो देख जाएं.

आगरा से राजकुमार मीना और फरहान खान ने पूरे मामले की जो डिटेल भेजी है, वह इस प्रकार है…. ताजनगरी आगरा में दबिश देने गए एक दारोगा की दबंगई सामने आई है। दरोगा ने न सिर्फ सर्विस रिवाल्वर से फायरिंग की बल्कि घर में घुसकर गर्भवती महिला के कमरे का दरवाजा तोड़कर उसके साथ बदतमीजी भी की। दरोगा द्वारा की गयी फायरिंग सीसीटीवी कैमरे में कैद है। पीड़ित परिवार दबंग दरोगा और उसके साथ आये पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की बात कह रहा है। घटना थाना सिकन्दरा के शास्त्रीपुरम स्तिथ कॉलोनी की है। कॉलोनी में रहने वाले दौलत सिंह के बेटे भूपेंद्र सिंह के खिलाफ प्रशांत ने न्यायालय में धारा 420 के तहत एक मुकदमा दर्ज कराया था। इसी मामले में शनिवार आधी रात के बाद इंडस्ट्रीयल एरिया के चौकी इंचार्ज राजेश पाल सिंह पुलिस बल के साथ दौलत सिंह के घर भूपेंद्र को पकड़ने के लिए दबिश देने के नाम पर पुलिस दल के साथ पहुंचे थे।

दबिश के दौरान दारोगा की दबंगई सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गयी। दारोगा ने पहले घर के बाहर बंधे पालतू कुत्ते को लाठी से पीटता रहा। इस शोरगुल से घर में लोग जाग गए। घर की महिला जब बाहर आती है तो महिला से गाली गलौज शुरू कर देता है। बार बार सर्विस रिवाल्वर को निकालने का प्रयास करता है। दरोगा ने रिवाल्वर से कुत्ते पर फायरिंग कर दी। कुत्ता अपनी तेजी और सक्रियता से बाल बाल बच गया। इसके बाद दरोगा और सिपाही घर के अंदर घुस आते हैं। भूपेंद्र के मुताबिक़ जब घर में कोई आदमी नहीं था तब रात करीब एक बजे के आसपास दरोगा घर में घुसकर महिलाओं को गन्दी गन्दी गाली देता है और बदतमीजी करता है। घर में घुसकर दरवाजा तोड़ने का आरोप भी दरोगा पर है। महिलाओं ने खुद के साथ मारपीट किए जाने का भी आरोप लगाया।

भूपेंद्र ने बताया कि दरोगा पैसे की मांग कर रहा था। उसका कहना था कि पैसे दो या फिर यहां से घर छोड़कर भाग जाओ। घर की पीड़ित महिला पल्लवी ने कहा कि दरोगा मेरे कमरे में आया और सभी पुलिसवाले बहुत नशे में थे और बहुत ज्यादा माँ बहन की गाली दे रहे थे। हद तो तभ हो गयी जब घर के एक कमरे में सो रही गर्भवती वंदना को भी दरोगा ने नहीं बक्शा। दरोगा ने वंदना का दरवाजा तोड़कर उसके कमरे में घुस गया और वंदना के साथ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया कि वह खुद नहीं बता सकती है। पीड़ित परिवार का कहना है कि जब कोर्ट से अरेस्ट स्टे ले रखा है तो फिर इस तरह की हरकत दरोगा ने क्यों की। फिलहाल अब पीड़ित परिवार दबंग दरोगा राजेश पाल सिंह और उसके साथ आये पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की बात कह रहा है। 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

राहुल गुप्ता यह मामला हर कीमत पर पुत्तर प्रदेश का होगा।
Yashwant Singh आगरा का प्रकरण है
Sanjeev Kumar BaBa पुलिस का दूसरा नाम तो आप जानते है यसवंत भैया क्या है
DrDigvijay Singh Rathore कुत्ते के अलावा किसको मार सकते है
Arun Khare जिस प्रदेश का मुख्यमंत्री एक कमजोर छोटा सा बच्चा बना दिया जाता है वहां इससे बेहतर की उम्मीद की भी नहीं जानी चाहिए ।
Virender Yadav तो जिसके मुंह मे दांत व पेट मे ऑत ना हो उसे बनाते
Arun Khare दोस्त बुरा मान गए । जिस मुख्यमंत्री को फैसले लेने का हक न दिया जाए और बाप और चाचा की आज्ञा ही ब्रह्म वाक्य हो उसे आप क्या कहेंगे । ।आप ने एक पुरानी कहावत जरूर सुनी होगी न सुनी हो तो बताना चाहूंगा । इसके बाद आपका फैसला शिरोधार्य होगा । कहावत है — लीकहि लीक तीन चलें , कायर , श्रृग’ कपूत / लीक छांडि तीन चलें शायर, सिंह सपूत । अब फैसला आपके हाथ है ।
प्रयाग पाण्डे शर्मनाक ।
राजू मिश्रा दादा यूपी में यह आम बात है।
Shamshad Elahee Shams पुलिस नहीं ये आदमखोरो का सरकारी गिरोह है.
Pradumn Rai सही बात है
Hemant Jaiman सारा कसूर जनता का है। जो इस दरोगा की हिम्मत इतनी हो गयी। यदि जनता जुल्मो सितम के सामने एकजुट होकर खड़ी हो जाये तो ऐसे “दरोगा की दरगाह” 10 मिनट में तैयार हो सकती है। माँ की आँख इनकी देश में गुंडागर्दी मर्जी जो करे। पाला नहीं पड़ा किसी ” सटके हुए दिमाग से”
Vikaas S Kapil इसका सीसीटीवी फुटेज हो तो दे दीजिये दादा 8273001992 vkapilsre@gmail.com
Arun Gangwar Send me CCTV footage on WhatsApp 9958934626
Shah Alam सार बहुते हरामी है
Mohammed Rais haram khor
Ramsurat Bind हरामी दरोगा नहीं, सरकार चलाने वाले हरामखोर हैं ।
Manis Kishn Sharma इस सूअर को तो मैं कुत्ते का बच्चा भी नहीं कहना चाहता
Virender Grewal Kaisey bhala hoga desh ka

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यूपी में जंगलराज : एसडीएम अतुल प्रकाश श्रीवास्तव ने रिटायर सैनिक को गिरा कर पीटा (सुनें टेप)

रामजी मिश्र ‘मित्र’, सीतापुर

यूपी में जंगलराज का आलम ये है कि अफसर खुद को भगवान समझने लगे हैं. उनकी आंखों पर सत्ता और पद का नशा चढ़ा हुआ है. एक एसडीएम ने सेना से रिटायर सूबेदार को गिरा गिरा कर पीटा. बाद में खुद यह बात एसडीएम बड़े गर्व से बताता रहा कि उसने गिरा गिरा कर बहुत पीटा. अठारह साल तक भारतीय सेना में कार्य करने वाले और ग्लेशियर में भी तैनात रहे सच्चिदानंद (सूबेदार) ने को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की महोली तहसील के एसडीएम ने जमकर पीटा.

सच्चिदानंद कांगो देश में भारत की तरफ से शांति सेना में तैनात रहे हैं. ऐसा बहादुर सैनिक जो कभी दुश्मनों से न डरा उसे यूपी के जंगलराज ने न सिर्फ बेइज्जत किया बल्कि मार खाने को मजबूर कर दिया. वर्तमान में सच्चिदानंद महोली क्षेत्र में बतौर लेखपाल नियुक्त हैं. सेना में कार्य करने वाला यह जांबाज पूरी ईमानदारी से काम कर रहा था. दूसरी ओर महोली के एसडीएम अतुल कुमार लगातार अपनी कार्यशैली के कारण बदनाम होते चले जा रहे हैं. एसडीएम जाने क्यों, लेखपाल की ईमानदार कार्यशैली से बौखला चुके थे. सच्चिदानंद पीसीएस की परीक्षा देने हेतु अवकाश मांगने उनके केबिन में गए. सच्चिदानन्द के अनुसार एसडीएम अतुल ने ‘अब फंसे’ हो कहकर सीधे गिरेबान पकड़ कर हाथापाई की.

सच्चिदानंद को कुछ समझ में नहीं आया कि यह सब क्यों हो रहा है. भारत की तरफ से लड़ाई की ट्रेंनिग पाए इस जवान ने संविधान का सम्मान करते हुए कोई मारपीट नहीं की. जब इस बाबत एसडीएम अतुल से पूछा गया तो उन्होंने खुल कर कहा “मारा है, बहुत मारा है और गिरा गिरा कर मारा है”. पिटाई का कारण पूछने पर दबंग एसडीएम अतुल ने कहा कारण न पूछो. एसडीएम के इस प्रकार के बयान ने मामले को तूल दे दिया है. इधर इस संबंध में आहत रिटायर सैनिक से बात की गई तो उनका कहना था कि जहाँ देश सेवा का ऐसा इनाम मिलता हो, वहां नौकरी से इस्तीफा देना ही ठीक रहेगा. सच्चिदानंद ने बताया कि वह खुद को काफी आहत और बेइज्जत महसूस कर रहे हैं. उनका पूरा परिवार अस्थिर और परेशान है.

मारपीट का आरोपी एसडीएम पहले भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे हैं. इन्हीं के कार्यकाल में झिनकू नामक किसान ने भी आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद शासन ने उसके परिवार आर्थिक सहायता दी थी लेकिन वह मरने से पहले एसडीएम से सहायता पाने में असफल रहा था. सुनिए यह टेप जिसमें एसडीएम खुद अपनी करतूत का बखान कर रहा है…. इस लिंक पर क्लिक करें : https://youtu.be/p7hyvr5hwWw

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