वाह रे लोकसभा टीवी के शेखचिल्ली, ‘डायरिया स्पेशल’ से उड़ाई कलाम की मर्यादा की खिल्ली

लोकसभा टीवी ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ कर एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि यहां काम करने वाले लोग बेहद अनप्रोफेशनल तो हैं ही, उसके साथ ही असंवेदनशील भी हैं। कलाम के अचानक हुए निधन के बाद लोकसभा टीवी ने जो लाइन ली है उससे सारा देश शर्मिंदा है। सोशल मीडिया पर लोकसभा टीवी के उन कार्यक्रमों की तस्वीरें वाइरल हो रही हैं, जो कार्यक्रम लोकसभा टीवी भारत रत्न और पीपुल्स प्रेजिडेंट कलाम के निधन के बाद दिखा रहा था। हद तो तब हो गयी जब देर रात तक लोकसभा टीवी पर कलाम के निधन की खबर तक नहीं चली। देश के तमाम बड़े सम्पादकों ने लोकसभा टीवी की इस बेशर्म हरकत पर हैरानी जताई है। फेसबुक पर इण्डिया टीवी के संपादक अजीत अंजुम सहित कईं अखबारों और न्यूज़ चैनलों के अन्य संपादकों ने भी कलाम के दिल्ली में अंतिम दर्शन के कार्यक्रम के दौरान लोकसभा टीवी के ‘डायरिया स्पेशल’ प्रोग्राम दिखाए जाने की तस्वीरें पोस्ट की हैं।

इण्डिया टीवी के संपादक अजीत अंजुम ने जब अपनी फेसबुक वाल पर लोकसभा टीवी की पोल खोलने वाली कुछ तस्वीरें पोस्ट की, तो लोकसभा टीवी के अफसर अचानक हरकत में आए और आनन फानन में डायरिया पर चल रहे रिकॉर्डेड प्रोग्राम को रोककर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के जीवन पर अंग्रेज़ी में एक सतही टॉक शो करवा दिया। इसके बाद लोकसभा टीवी फिर अपनी पुराने एफपीसी का अनुसरण करने लगा और ‘करियर कैफे’ नाम का रिकॉर्डेड शो लगा दिया। ऐसे वक्त में जब दूरदर्शन से लेकर राज्यसभा टीवी और देश के तमाम समाचार चैनल्स अपने रूटीन कार्यक्रम रोककर कलाम को सलाम कर रहे हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और पूरा मंत्री मंडल अपने सभी काम स्थगित कर दिल्ली में कलाम के अंतिम दर्शन के लिए मौजूद हैं। संसद भी दो दिन के लिए स्थगित कर सात दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है। उस समय लोकसभा टीवी को पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न कलाम की अंतिम यात्रा पर कार्यक्रमों के प्रसारण की जगह अपने स्तरहीन अंग्रेज़ी के रिकॉर्डेड शो का प्रसारण करना ज़रूरी लगा है। ये संसदीय चैनल एक दिन भी मौके की नज़ाकत के अनुरूप कार्यक्रमों को बनाकर उनका प्रसारण नहीं कर पाया। इससे चैनल के अधिकारियों और पत्रकारों की क्षमता और योग्यता का समझा जा सकता है।

संसदीय चैनल होने के बावजूद लोकसभा टीवी ने संसदीय गरिमा को तार-तार कर दिया है। यहाँ सवाल ये है कि लोकसभा टीवी का संपादकीय मंडल और वहां काम कर रहे पत्रकार आखिर ऐसा क्या कर रहे हैं कि उनके पास ऐसी नाज़ुक घड़ी में भी कार्यक्रम बनाने और उनका प्रसारण करने की फुरसत नहीं। क्या यहाँ काम करने वाला स्टाफ सिर्फ भारी भरकम वेतन लेने के लिए ही नियुक्त किया गया है? गौरतलाब है कि लोकसभा टीवी ने हाल ही में अपने 9 साल पूरे होने का जश्न मनाया है। यहाँ भारी भरकम वेतन वाला स्टाफ और संपादकीय मंडल है, जिन्हें तमाम तरह की सुविधाएं मिलती हैं, बावजूद इसके लोकसभा टीवी पूर्व राष्ट्रपति की अंतिम यात्रा के वक्त अपने रिकॉर्डेड शो और डायरिया स्पेशल प्रोग्राम दिखाता रहा।

लोकसभा टीवी के ऐसा करने के दो ही कारण हो सकते हैं, पहला तो ये कि इसके संपादकीय मंडल और स्टाफ के पास पत्रकारिता की बेसिक समझ भी नहीं है, हो सकता है अनुभवहीन स्टाफ की ट्रेनिंग पिछले 9 सालों में भी पूरी ना हुई हो। इसलिए देश को इनके परिपक्व होने तक थोडा और इंतज़ार करना चाहिए। दूसरा कारण राजनीतिक संरक्षण भी हो सकता है, हो सकता है कि अपनी ऊंची पहुँच के चलते यहाँ के संपादकीय मंडल और स्टाफ को किसी कार्यवाही या नौकरी खोने का भय ही ना हो। वैसे भी पिछले नौ सालों के अपने इतिहास में लोकसभा टीवी एक भी ऐसा स्तरीय कार्यक्रम नहीं बना पाया जो चैनल को पहचान दिला पाता। इस चैनल पर हमेशा से बेसिरपैर के कार्यक्रम नृत्य, संगीत, अजीबोगरीब डॉक्यूमेंट्री, और फ़िल्में ही दिखाई जाती रही हैं। इसपर चलने वाले कार्यक्रम एक संसदीय चैनल की गरिमा और स्तर के अनुरूप कभी नहीं रहे। यही कारण है कि ये संसदीय चैनल लोकप्रियता और टीआरपी में कहीं नहीं ठहरता। बहरहाल आप इस अजब चैनल के गजब कारनामों का मज़ा लीजिये। ये संसदीय चैनल आपकी गाढ़ी कमाई के बल पर चल रहा है, ये भूल जाइए तो ही बेहतर है। जो चैनल ऐसे ग़मगीन और नाज़ुक वक्त पर भी अपने रिकॉर्डेड प्रोग्राम और डायरिया स्पेशल चला कर चैन की बंसी बज सकता है, समझिये वो राम भरोसे ही चल रहा है, इसलिए उसकी चिंता में दुबला होने का कोई फायदा नहीं।

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Comments on “वाह रे लोकसभा टीवी के शेखचिल्ली, ‘डायरिया स्पेशल’ से उड़ाई कलाम की मर्यादा की खिल्ली

  • लोकसभा टीवी के हालात बहुत खराब हैं। यहां अनुभवहीन लोगों की पूरी फ़ौज भरी पडी है। केवल कुछ ही लोग ऐसे हैं जिन्हें काम करने का कुछ सलीका है। बहुत कम लोगों को ही काम आता है। इसका कारण ये है कि ज़्यादातर लगों ने यहीं से शुरुआत की इसके पहले उनका टीवी का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए यहाँ प्रोग्रामिंग की समझ डेवेलोप ही नहीं हो पाई। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिमकी इंट्री पिछले दरवाजे से ऊंची पहुँच के चलते हुई थी। इसलिए ऐसे लोगों की काम में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही। जिन्हें ठीक से टीपी पढ़ना भी नहीं आता था, और इसके पहले कहीं इंटर्न थे, वो रातोंरात एंकर बना दिए गए। यही कारण है कि यहां प्रोड्यूसर कम और एंकर ज़्यादा हैं, जो हफ्ते में एक दो टाक शो करके अपनी ड्यूटी निभा देते हैं। ऐसे में लोकसभा टीवी का भगवान् ही मालिक है। काम जानने और लगन के साथ काम करने वाले लीगों की सख्त कमीं है। ऊंची पहुँच और पॉलिटिक्स के बल पर काम ना करने के बावजूद लोग यहां 9 साल से जमे बैठे हैं।

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  • Agreed the mistake of not covering Dr. Kalam was a blunder but making comments like that they get tremendous salary and multiple benefits is truly a false statement. As a insider I know that LSTV employees are least paid with minimal benefits and even since everybody is contractual, the fear of loosing job is utmost. Better comment on the journalism part of shows rather than making false statements.

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  • indianmedia says:

    सही बात है कि चैनल ने डॉ कलाम को श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रमों की देरी से शुरुआत की। पता चला कि यह भी CEO की सक्रियता से ही संभव हुआ था। उसी रात वह कुछ शुरू करना चाहती थीं। अगकी सुबह उन्होंने इसे लेकर निर्देश दिए थे लेकिन उस पर किसी ने अमल नहीं किया। खबर है कि उसके बाद में उनके खुद घंटों खड़े रहकर प्रोग्राम बनवाने के बाद ही कुछ घंटों की प्रोग्रामिंग तैयार हो सकी थी और चैनल पर ग्राफ़िक प्लेट चलनी शुरू हो सकी थी। चैनल में बाकी अधिकारीयों और प्रोग्रामिंग टीम को तो मानों कोई फ़िक्र ही नहीं थी!

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  • lstv journalist says:

    लोकसभा टीवी में 80 से ज़्यादा पत्रकारों का स्टाफ है। 90 फीसदी स्टाफ की सैलरी 40 हज़ार से अधिक है। बावजूद इसके लोकसभा टीवी में रोग्रामिंग नाम की चीज़ नहीं है। आप कभी लोकसभा टीवी के ऑफिस जाएं तो, पाएंगे कि स्टाफ को काम की फ़िक्र नहीं है, पूरा वक्त आपको स्टाफ टहलता या बतियाता ही मिलेगा। भाई यहां लोग तफरी के लिए आते हैं और टहलकर चले जाते हैं। पूरे दिन चैनल में एक भी प्रोग्राम नहीं चलता, सिर्फ गेस्ट बैठाक टाक शो करवा डेदेतेहैं। आप ही बताइये कि क्या प्रोग्रामिंग का मतलब टाक शो होता है? प्रोग्रामिंग की इतनी बड़ी टीम किसलिए राखी गयी है अगर टाक शो ही करने हैं तो? सवाल ये भी है कि इतने सालों से प्रोग्रामिं की ये टीम आखिर क्या काम कर रही है? जो प्रोग्राम चल रहे हैं वो बेहद थक हुए से हैं, लोकमंच जैसे टाक शो में थकी हुई एंकरिंग और सतही डिबेट देखकर किसी को भी नींद आ जाए। तो know your mp आपको 80 के दशक के कृषि दर्शन की याद दिलाता है। जिसमें सांसदों को बुलाकर बेवजह का महिमामंडन और पीआर किया जाता है। सुर्ख़ियों से पर नाम का एक और बोझिल कार्यक्रम है लोकसभा टीवी का….ये ईटीवी के इसी नाम से कुछ साल पहले प्रसारित होने वाले एक कार्यक्रम की नक़ल है। हलक फुल्के लेवल के प्रोडक्शन हाउस में बनने वाले कार्यक्रमों से इसकी तुलना की जा सकती हैं, क्योंकि इन दिनों ट्रेनी जर्नलिस्ट भी निजी चैनलों में इससे अच्छे कार्यक्रम बना लेते हैं। यहाँ काम करते हुए कईं साल हो गए हैं, लेकिन ऐसा कोई नहीं जिसे कुछ आता हो या जिससे कुछ सीखने को मिला हो।

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  • abhishek lstv says:

    मीडिया में लोकसभा टीवी की नौकरी से बेहतर कोई नौकरी नहीं है। यहाँ आप कब आते हैं और कब जाते हैं कोई पूछने वाला नहीं है। कॉन्ट्रेक्ट की भी कोई फ़िक्र नहीं हर बार बड़ी आसानी से रीन्यू हो जाता है। आपने टीवी में कभी काम ना किया हो, ज़िन्दगी में एक भी प्रोग्राम ना बनाया हो, चाहे आपका अनुभव इंटर्न या ट्रेनी का ही क्यों ना रहा हो, आप पहले अखबार में काम करते थे या रेडियो में फ्रीलांसर थे, चाहे आप का अनुभव किसी एनजीओ का रहा हो, या फिर किसी गुमनाम से प्रोडक्शन हाउस का एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट हो, आपको प्रोग्रामिंग और टीवी की कोई समझ ना हो तब भी आप यहाँ नौकरी पा सकते हैं और जब तक चाहें नौकरी कर सकते हैं। यही कायदा है यहां का, क्योंकि सबके सर पर किसी ना किसी बड़ी हस्ती का हाथ है, अब आप समझ ही सकते हैं कि भारत रत्न और पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के मामले में इतनी बड़ी गलती करने के बाद भी लोकसभा टीवी ने किसी के भी खिलाफ कोई कार्यवाही क्यों नहीं की?

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  • indianmedia
    के नाम से जितनी भी चीजें पोस्ट की जातीं हैं वो पूरी तरह से सीमा गुप्ता (सीईओ- लोकसभा टीवी) का एेसा चमचा लगता है जो हर समय उनकी तरफदारी करने से बाज नहीं आता… अरे बेवकूफ जब कलाम साहब की खबर रात में ही आ गई थी तो सीमा जी को दूसरे दिन क्यो खयाल आया,,,,, अगर उन्हें लगा होता या खबरों की समझ होती तो वो जल्दी निर्देश दे सकती थी… जब इसकी चारो तरफ थू-थू होने लगी तब उन्हें याद आ गया… कुछ तो शर्म करो उल्लू के पिट्ठुओं… सही को सही और गलत को गलत कहने की भी हिम्मत कर लिया करो चमचो की फौज….थू.

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