पत्रिकाएं भी नाटकों की तरह रेंत का घरौदाः लखनऊ से शुरू हुई ‘कला स्रोत’

लखनऊ : किसी भी नगर में एेसे अवसर कम ही होते हैं जब विभिन्न कला अभिव्यक्तियों के प्रसिद्ध व्यक्तित्व किसी एक समारोह में शरीक हों। यही कारण था कि लखनऊ से पत्रकार और कला समीक्षक आलोक पराड़कर के सम्पादन में संगीत, रंगमंच और कला पर आधारित त्रैमासिक पत्रिका ‘कला स्रोत’ के लोकार्पण के समारोह में जब कला, संगीत, रंगमंच और साहित्य की प्रतिभाएं एक सभागार में जुटीं तो एक-दूसरे से बातचीत में उन्हें यह कहते भी सुना गया कि आपका नाम और काम तो काफी सुना है लेकिन भेंट आज पहली बार हो रही है। यही कारण भी था कि पूरे समारोह में कलाओं के बीच संवाद और अन्तरसम्बन्ध की चर्चा होती रही और यह शिकायत भी खूब हुई कि कलाकार दूसरी कलाओं में रुचि नहीं लेते। 

समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध रंगकर्मी और फिल्मकार रंजीत कपूर ने कहा कि मुझे यह हमेशा शिकायत रही है कि एक कला अभिव्यक्ति से जुड़े लोग दूसरी कलाओं में रुचि नहीं लेते। पेण्टिंग के लोग नाटक में नहीं जाते, नाटक के लोग संगीत में नहीं जाते, यहां तक कि कथक से जुड़े लोग भरतनाट्यम देखने नहीं जाते, हिन्दी के लोग उर्दू की रचनाओं में रुचि नहीं लेते। उन्होंने कहा कि मेरी माता किराना घराना की गायिका थीं। मैं कथक देखने जाता था, कला प्रदर्शनियां देखता था, इन सारी बातों ने मेरे रंगकर्म को सींचा और संवारा। जाने भी दो यारों,  कभी हां कभी ना’, ‘लीजेण्ड आफ भगत सिंह’, ‘बैण्डिट क्वीन’ सहित कई लोकप्रिय फिल्मों के संवाद एवं पटकथा लेखक और ‘चिण्टू जी’ के बाद हाल में ही ‘जय हो डेमोक्रेसी’ फिल्म का निर्देशन करने वाले कपूर ने कला स्रोत पत्रिका की प्रशंसा करते हुए उम्मीद जतायी कि यह एक एेसा मंच होगा जहां विभिन्न कला अभिव्यक्तियों के बीच संवाद और अन्तरसम्बन्ध स्थापित हो सकेगा। उन्होने कहा कि इस बात से परेशान होने की जरूरत नहीं है कि पत्रिकाएं थोड़े अन्तराल के बाद बन्द हो जाती हैं। उन्होंंने कहा कि पत्रिकाएं हो या नाटक, हम तो रोज रेत की घरौंदे बनाते हैं। ये घरौंदे गिर भी जाय तो भी हम अपना काम कर चुके होते हैं। हमारा उद्देश्य है कि लोगों को जागरूक करें और अपने अल्प जीवन में पत्रिका और नाटक यह काम कर जाती हैं। वरिष्ठ रंग अध्येता कुंवर जी अग्रवाल ने भी अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि कलाएं एक दूसरे से प्रेरणा ग्रहण करती हैं। नाटकों में चित्रकला और संगीत का प्रभाव ग्रहण करती हैं। 
प्रसिद्ध साहित्यकार शिवमूर्ति ने अपने खास अन्दाज में कहा कि एेसी पत्रिकाएं होंगी तो उन कलाओं से परिचित होने का अवसर मिल सकेगा जिनके बारे में हमारी जानकारी कम है। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि कलाओं पर आधारित पत्रिकाएं काफी कम हैं तो ‘तद्भव’ के सम्पादक अखिलेश ने कहा कि कलाओं पर उस अधिकार के साथ नहीं लिखा जा पाता है जैस कभी दिनमान में लिखा जाता है। उर्दू के प्रसिद्ध कहानीकार एवं पत्रकार आबिद सुहैल ने कहा कि किसी पत्रिका को लम्बे समय तक निकाल पाना मुश्किल होता है। कला महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य एवं प्रसिद्ध चित्रकार जयकृष्ण अग्रवाल ने कहा कि कला समीक्षकों के साथ ही कलाकारों से भी लेखन कराने की कोशिश की जानी चाहिए। भारतेन्दु नाट्य अकादमी के पूर्व निदेशक एवं प्रसिद्ध रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने कहा कि आज पत्र-पत्रिकाओं में नाटकों की रिपोर्ट छपती है, समीक्षाएं नहीं। 
 पत्रिका का सम्पादन कर रहे पत्रकार एवं कला समीक्षक आलोक पराड़कर ने कहा कि बाजार की दखल के साथ कलाओं में भी एक छद्म वातावरण बन रहा है। चिन्तनपरक , गंभीर, शोधपूर्ण लेखन सार्थक और सरोकारपूर्ण कार्यों की कसौटी बन सकता है। समारोह में बड़ी संख्या में नगर के साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों की उपस्थिति रही। कुलश्रेष्ठ के अतिरिक्त  जुगुल किशोर, मृदुला भारद्वाज,  राजेश कुमार, विजय तिवारी, गोपाल सिन्हा, अंशु टण्डन जैसे रंगकर्मियों, जयकृष्ण अग्रवाल के अतिरिक्त योगेन्द्र नाथ योगी, शरद पाण्डेय, एन.खन्ना, पंकज गुप्ता,  शेफाली भटनागर जैसे चित्रकारों, प्रसिद्ध छायाकार अनिल रिसाल सिंह, रवि कपूर, आजेश जायसवाल, राज्य ललित कला अकादमी की पूर्व सचिव वीना विद्यार्थी, ‘लमही’ पत्रिका के सम्पादक विजय राय, लेखिका सुशीला पुरी, लखनऊविद् रवि भट्ट, गायक अग्निहोत्री बन्धु, कथक नृत्यांगना सुरभि सिंह सिंह, अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक वाई.पी.सिंह,. लखनऊ बुक क्लब के मस्तो, परमेश अग्रवाल, हिमांशु वाजपेयी, विनीता कुमारी शेखावत, कलम विचार मंच के दीपक कबीर, लखनऊ पुस्तक मेला के आयोजक देवराज अरोड़ा, सर्वोदय प्रकाशन के नीरज अरोड़ा, राज सिलवानों सहित कई प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों, कलाकारों ने समारोह में शिरकत की। पत्रिका का प्रकाशन करने वाले कला स्रोत कला केन्द्र  निदेशक अनुराग डिडवानिया और मानसी डिडवानिया ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस पत्रिका के साथ कला स्रोत की गतिविधियों को नया विस्तार मिल रहा है। कला अभिव्यक्तियों पर विचार विमर्श का दायरा इस पत्रिका के माध्यम से दूसरे नगरों तक फैलेगा। 
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