मोहम्मद साहब को खुलेआम अपमानित करने वाले लखनऊ के अखबार पर सपा सरकार मेहरबान

अखिलेश सरकार मुसलमानों के प्रति कितना उदार भाव रखती है, यह ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ अखबार को देख कर समझा जा सकता है. यह वही अखबार है जिसने लखनऊ में सबसे पहले हिन्दू महासभा के अध्यक्ष कमलेश तिवारी का मोहम्मद साहब को लेकर दिया गया बयान छापा था जिसके बाद पूरे देश में हंगामा मच गया था. सैकड़ों मुस्लिम उलेमाओं ने कल सूचना विभाग में इस अखबार का घोषणा पत्र रद्द करने और इसके मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की.

अपनी इन्ही हरकतों के चलते पहले भी इस अखबार का घोषणापत्र रद्द किया जा चुका है. इस अखबार के मालिक जगदीश नारायण शुक्ल हैं जो कांग्रेस के नेता भी हैं और सीतापुर से चुनाव लड़ चुके हैं. मजे की बात यह है कि इनके जिस अखबार ने मोहम्मद साहब के खिलाफ बेहद शर्मनाक बयान को प्रकाशित किया है, उस अखबार को सूचना विभाग ने एक साल में करोड़ों का विज्ञापन दे दिया. कल सूचना विभाग पहुंचे लखनऊ के जाने माने उलेमाओं ने सूचना विभाग के अफसरों से जब सवाल किया कि इस कांग्रेसी नेता को क्या करोड़ों रुपया इसलिए दिए गए थे कि वो हजरत साहब की शान में गुस्ताख़ी करने की हिम्मत कर सकें, तो इस सवाल का जवाब किसी को देते नहीं बना और सबको सांप सूंघ गया. बहरहाल अब यह मामला बहुत तूल पकड़ गया है.

 

ज्ञात हो कि जगदीश नारायण जनहित याचिकाओं का खेल जमकर खेलते हैं. उनका कई तरह का कारोबार है. अफसर लोग शुक्ल जी की कलाबाजी से डलते कांपते हैं. इसी कारण उनका अखबार दिनोंदिन लाभ कमाने वाला होता गया. मुसलमानों की हितैषी कहे जाने वाली सपा सरकार अखबार के मुस्लिम विरोधी रवैये पर घनघोर चुप्पी साधे है. हजरत साहब के खिलाफ आपत्तिजनक बात लिखने के कारण जगदीश नारायण शुक्ल और उनके अखबार निष्पक्ष प्रतिदिन के खिलाफ भले ही अभी लोगों में गुस्सा है लेकिन क्या यह गुस्सा कोई निर्णायक मुकाम हासिल कर सकेगा, इसमें संदेह है. वजह है सरकार का शुक्ल को संरक्षण. 

हालांकि अखबार के खिलाफ जिस तरह से प्रदेश भर के मुस्लिम सड़कों पर उत्तर रहे हैं उसने पूरी सरकार को कंपकपी लग चुकी है. सपा को अगले चुनाव में मुस्लिम वोटों का सहारा है. मगर अब इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि ऐसा अखबार जो पूरे मुस्लिम समाज की भावनायें आहत कर रहा हो, उसको करोड़ों का विज्ञापन क्यों दिया गया और अब जब एक खबर के कारण पूरे प्रदेश का माहौल बिगड़ रहा है तो उसको बख्शा क्यों जा रहा है?

अखबार में प्रकाशित मोहम्मद साहब को लेकर आपत्तिजनक बयान और उलेमाओं के प्रदर्शन की तस्वीर देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

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प्रांशु मिश्र ने हसीब सिद्दीकी को लेटर लिखकर किन किन सवालों का जवाब पूछा… पढ़ें पूरा पत्र

प्रिय मित्र,

उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के अध्यक्ष श्री हसीब सिद्दीकी को मैने एक पत्र लिखा है। दरअसल लंबे समय से मन में कई सवाल थे। शायद ये सवाल आप में से बहुतों के मन में भी हों। चूंकि हसीब भाई प्रदेश में संगठन के शीर्ष पद पर हैं, मुझे लगता है कि तमाम सवालों-आशंकाओं का जवाब वही दे सकते हैं।

मैं पत्र को आप तमाम साथियों को इसलिए प्रेषित कर रहा हूं क्योंकि जो सवाल मेरे मन में हैं, वो शायद आपके मन में भी हों। अगर वो आपके मन में भी हों तो संबंधित लोगों से सवाल करने में संकोच न करें। मुझे पूरी उम्मीद है कि हमें जवाब मिलेगा। पत्र नीचे संलग्न है।

आपका
प्रांशु मिश्र
अध्यक्ष
उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति


ये रहा पत्र…

दिनांक 10-12-15

सेवा में

कामरेड हसीब सिद्दीकी

अध्यक्ष

उ.प्र श्रमजीवी पत्रकार यूनियन

प्रिय हसीब जी
संगठन की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के दौरान आप से मथुरा में मुलाकात हुई थी। सर्वप्रथम एक सफल आयोजन कराने के लिए आपको और आपकी पूरी टीम को बहुत बधाई। कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों के आचरण विषय पर परिचर्चा में आपने मुझे अपनी बात रखने का मौका दिया। राष्ट्रीय कार्यसमिति की अति महत्वपूर्ण बैठक में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल होने का अवसर भी मुझे मिला। परिचर्चा और कार्यसमिति की बैठक, और देश के विभिन्न राज्यों से आए संगठन के तमाम वरिष्ठ साथियों से संवाद का जो अवसर मिला,उसने मुझे संगठन के कामकाज, उसके समक्ष चुनौतियों, विस्तार की योजनाओं आदि को समझने का एक मौका दिया। कार्यसमिति की बैठक में तमाम अहम मुद्दों पर खुली स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस अच्छी लगी।

पर लोकतंत्र की यह झलक शायद प्रदेश में संगठन के कामकाज में नहीं दिखती। आप को शायद याद हो कि इसी वर्ष सितंबर में मैं आपसे और यूपी प्रेस क्लब के सचिव श्री जोखू प्रसाद तिवारी जी से प्रेस क्लब में ही मिला था। उस वक्त भी मैने यह सवाल उठाया था कि क्लब की मेंबरशिप आम पत्रकारों के लिए क्यों नहीं खोली जाती। अगर इसके पीछे वजह प्रेस क्लब का आईएफडब्लूजे के आधीन होना है तो भी संगठन के प्रदेश में तकरीबन 3000 सदस्यों में से महज 150 लोगों को ही प्रेस क्लब की सदस्यता क्यों दी गई है। चर्चा है कि अकेले लखनऊ में संगठन के तकरीबन 400 सदस्य हैं। इसमें से कितनों को प्रेस क्लब की सदस्यता दी गई। वैसे प्रदेश में संगठन के तीन हजार सदस्य और लखनऊ में चार सौ सदस्य होने वाली बात भी मुझे चर्चाओं में ही पता चली है। हो सकता है यह संख्या गलत हो…क्योंकि कम से कम मैने सदस्यों की कोई सूची जिले या प्रदेश स्तर पर आज तक नहीं देखी है। जिन तमाम साथियों से मैने यह सूचना पुख्ता करने की कोशिश की वो भी आज तलक अंधेरे में हैं।

मुझे याद है कि प्रेस क्लब में हुई मुलाकात में आपने कहा था कि संगठन इतने कार्यक्रम कराता है, लोग उसमें नहीं आते..जुड़ना नहीं चाहते तो आप क्या करें। दरअसल लोगों को संगठन से जोड़ने का यह नजरिया ही शायद त्रुटिपूर्ण है। श्रोता के रूप में भी लोग आएंगे, लेकिन पहले कहीं न कहीं बुनियादी स्तर पर ही सही उन्हें संगठन की लोकतांत्रिक निर्णय लेने वाली प्रक्रिया का हिस्सा बनाना पड़ेगा। किसी भी संगठन के कामकाज में लोकतांत्रिक तौर तरीके और उनमें एक आम सदस्य की भागीदारी के जरिए होते हैं…जिला व राज्य सम्मेलन, जनरल बाडी मीटिंग आदि। संगठन की लखनऊ जिला इकाई का सम्मेलन आखिरी बार कब हुआ याद नहीं।

यही हाल यूपी प्रेस क्लब का है। सदस्यता पर अघोषित रोक तो है ही, न कोई जनरल बाडी मीटिंग बीते कई वर्षों में हुई है। एक सजग पत्रकार के तौर पर जो थोड़ा बहुत पता चला उससे तो यही लगता है कि जनरल बाडी मीटिंग तो दूर की बात है..अरसा हो गया प्रेस क्लब की गर्वनिंग काउंसिल की बैठक हुए। प्रेस क्लब के चुनाव को भी पांच साल हो गए हैं।

मथुरा बैठक के दौरान मुझे याद है कि संगठन के मुख्य चुनाव अधिकारी देवाशीष बोस जी ने खुले मंच से कहा था कि सभी राज्यों को 31 दिसंबर 2015 तक नेशनल काउंसिलर्स का चुनाव कर नाम केंद्रीय चुनाव अधिकारी को भेज देने हैं। प्रदेश से नेशनल काउंसिलर्स के चुनाव के लिए श्री टीबी सिंह को मुख्य चुनाव अधिकारी व श्री विनय कृष्ण रस्तोगी जी को सहायक चुनाव अधिकारी नियुक्त करने का निर्णय आपकी अध्यक्षता में हुई बैठक में ही लिया गया था।

जहां तक मेरी जानकारी है अभी तक चुनाव अधिकारियों की तरफ से नेशनल काउंसिलर्स के चुनाव के लिए कोई कार्यक्रम ही जारी नहीं किया गया। नामंकन पत्र कब मिलेंगे, नामंकन कब तक भरा जा सकता है…मतदान कब होगा। इस मार्फत कोई भी सूचना सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में निश्चय ही संगठन के कुछ पदाधिकारियों  की कार्यशैली पर सवाल उठता है। मथुरा बैठक के विजन और प्रदेश में संगठन के एक्शन प्लान में दूर दूर तक कोई साम्य नहीं दिखता।

मैने आपको यह पत्र इसलिए लिखा..क्योंकि प्रदेश में संगठन के सर्वेसर्वा आप हैं। ट्रेड यूनियन का दशकों पुराना अनुभव आपके पास है। मेरा मानना है कि तमाम अनुभवी,युवा पत्रकार-छायाकार संगठन के प्रति आदर का भाव रखते हैं। उन्हें मौका दिए जाने की जरूरत है। प्रेस क्लब से लेकर संगठन के स्तर पर थोड़ा सा दरवाजा खोलने की जरूरत है। लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने की शुरुआत लखनऊ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन और प्रेस क्लब से होनी चाहिए। और अगर इस शुरुआत में मेरी कहीं भी जरूरत पड़े..मैं एक आम सदस्य के तौर पर पूरी मजबूती से तैयार मिलूंगा।

सादर
प्रांशु मिश्र
अध्यक्ष
उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
9415141305

प्रतिलिपि —  
श्री रवींद्र सिंह
अध्यक्ष (यूपी प्रेस क्लब)
श्री जोखू प्रसाद तिवारी
सचिव (यूपी प्रेस क्लब)

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पत्रकार समिति का चुनाव : घोषणा पर कुकुरझौं-झौं, भड़की हेमंत एंड कम्‍पनी का शिगूफा – सजनी हम भी राजकुमार

लखनऊ : उप्र मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति की नयी कार्यकारिणी का चुनाव कार्यक्रम घोषित हो गया है। पूरी प्रक्रिया 21 दिनों में सम्‍पन्‍न होने वाली है। इस चुनाव कार्यक्रम की शुरूआत 17 अगस्‍त 15 को होगी। इस दिन समिति के विभिन्‍न पदों के लिए नामांकन की शुरू हो जाएगा, जो 22 अगस्‍त तक चलेगा। इस समिति के लिए मतदान छह सितम्‍बर को होगा, जो मतगणना तक जारी रहेगा। चुनाव परिणामों की घोषणा उसी दिन कर दी जाएगी।

उप्र मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति की चयन समिति के चयन को लेकर जैसे ही कार्यक्रम घोषित किया गया, पिछले तीन साल से इस काबिज पर काबिज पुरानी कमेटी के लोग भड़क गये। नये चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होते ही हेमंत-कलहंस गुट ने एक बयान जारी करके कहा कि यह बेईमानी है। इस गुट ने कहा कि अब यह चुनाव कराने के लिए तेज कार्रवाई की जाएगी। इस समिति का कहना है कि उस गुट के लोग अब 21 अगस्‍त को बैठक करेंगे। 

उधर हेमंत-कलहंस कम्‍पनी के विरोधी गुट का कहना है कि हेमंत-कलहंस का यह पैंतरा दरअसल बेईमानी, भ्रष्‍टाचार, कदाचार और असंवैधानिकता पर पिछले तीन साल से कुर्सी पर जबरियन कब्‍जाई अपनी पुरानी रणनीति का ही एक अंग हैं। उनका कहना है कि चुनाव तो अब तयशुदा वक्‍त पर होंगे।

इस नये निर्वाचन के लिए निर्धारित निर्वाचन समिति के सदस्‍य शिवशंकर गोस्‍वामी, विजय शंकर पंकज, किशोर निगम, संजय राजन और मनोज छाबडा का कहना है कि ताजा चुनाव के तहत 23 को नामांकन पत्रों की जांच होगी। 24 को नामांकन वापसी हो सकेगी। नामांकन सूची का प्रकाशन 25 को और सदस्‍यता शुल्‍क जमा करने की आखिरी तारीख 28 को है। मतदाता सूची का प्रकाशन 30 अगस्‍त को होगा, जबकि मतदान 6 सितम्‍बर को होने के बाद मतगणना के बाद परिणामों की घोषणा कर दी जाएगी। 

उधर, पिछले तीन साल से समिति की कुर्सियों से बर्खास्‍तशुदा कमेटी के लोगों ने नये चुनाव की कार्रवाई पर अपनी अंगड़ाई तोड़ी है और कहा है कि यह अवैध है। ये बर्खास्‍तशुदा लोग हैं। इसमें पत्रकारों को बांटनेकी साजिश है और मान्यता प्राप्त पत्रकारों को भ्रमित करने की साजिश है। बर्खास्‍तशुदा समिति के लोगों ने कहा कि क्रियाकलापों, उपलब्धियों, आगामी चुनाव, उसकी प्रक्रिया, तारीख व समस्त कार्यक्रम पर चर्चा के लिए आम सभा की अधिकृत बैठक शुक्रवार 21 अगस्त को आहूत की है। 

बर्खास्‍तशुदा लोगों का दावा है कि समिति की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष सत्यवीर सिंह, सचिव सिद्धार्थ कलहंस, संयुक्त सचिव देवकी नंदन मिश्रा, सदस्य टीबी सिंह, दिलीप सिन्हा, अरुण त्रिपाठी, जितेश अवस्थी, नायला किदवई, प्रदीप शाह कुमांया, श्रीधर अग्निहोत्री व अन्य वरिष्ठ जनों से चर्चा हो चुकी है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वाल से

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चुनाव को लेकर हेमंत-कलहंस का नया पैंतरा, नई समिति को किया ख़ारिज

लखनऊ : उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने संगठन के क्रिया-कलापों, उपलब्धियों, आगामी चुनाव, उसकी प्रक्रिया, तारीख व समस्त कार्यक्रम पर चर्चा के लिए आम सभा की बैठक शुक्रवार 21 अगस्त को आहूत की है।

मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी के मुताबिक आम सभा की बैठक की सूचना सभी 600 से ज्यादा मान्यता प्राप्त सदस्यों को प्रेषित की जा रही है। आम सभा की बैठक बुलाने व इसका कार्यवृत्त तय करने के लिए समिति की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष सत्यवीर सिंह, सचिव सिद्धार्थ कलहंस, संयुक्त सचिव देवकी नंदन मिश्रा, राजेश शुक्ला, सदस्य टीबी सिंह, दिलीप सिन्हा, अरुण त्रिपाठी, जितेश अवस्थी, नायला किदवई, प्रदीप शाह कुमांया, श्रीधर अज्निहोत्री व अन्य वरिषठ जनों से चर्चा की गयी।

आम सभा की बैठक में ही मतदाताओं के लिए अंतिम कट ऑफ डेट, शुल्क, नामांकन, मतदान की तारीख व अन्य प्रक्रियाओं पर विचार होगा। समिति अध्यक्ष हेमंत तिवारी व सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने कहा कि आम सभा के 10 फीसदी से भी कम सदस्यों के साथ मिलकर कोई भी मनमरजी से न तो चुनाव समिति बना सकता है और नही कोई कार्यक्रम जारी कर सकता है। आम सभा की चुनी गयी समिति को ही बैठक बुलाने और चुनाव कार्यक्रम तय करने का अधिकार है।

समिति के पदाधिकारियों ने साफ किया है कि चुनाव के संदर्भ में आधिकारिक ऐलान 21 अगस्त को होने वाली बैठक के बाद होगा। हेमंत तिवारी ने कहा कि आम सभा की बैठक में भाग लेने के लिए अब तक 300 सदस्यों की सहमति मिल चुकी है। 

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आलोचना की संस्कृति खतरे में है : प्रो.मैनेजर पाण्डेय

लखनऊ : आज के भारत में लोकतंत्र और आलोचना की संस्कृति – यह विषय था लखनऊ में जन संस्कृति मंच के तत्वाधान में आयोजित संगोष्ठी का। अध्यक्षता की वरिष्ठ लेखक रवींद्र वर्मा ने। मुख्य वक्ता थे -वरिष्ठ आलोचक प्रो.मैनेजर पाण्डेय। प्रो.पाण्डेय ने इंगित किया कि पश्चिम में डेमोस अर्थात जनसाधारण शब्द का प्रयोग होता है। अब्राहम लिंकन ने कहा था जनता का शासन, जनता द्वारा और जनता के लिए। हमारे देश में केंद्र में सरकार है और अनेक राज्यों की सरकारें हैं। मालूम नहीं चलता कि कौन सी सरकार है जनता के लिए और जनता द्वारा? यहां पूंजीतंत्र है – अंबानी और अडानी का तंत्र है। दबंगों का राज्य है। वही नेता हैं, वही विधायक हैं। वही कानून बनाते हैं और खुद को कानून से ऊपर रखते हैं। 

लखनऊ में जनसंस्कृति मंच की संगोष्ठी को सम्बोधित करते प्रो.मैनेजर पांडेय

उन्होंने कहा कि यहां लोकतंत्र का एक ही लक्षण दिखता है – चुनाव। सुबह से शाम इसी की चर्चा होती है। विडंबना है कि दस साल तक एक ऐसा प्रधानमंत्री रहा जिसने कभी पंचायत का चुनाव तक नहीं लड़ा। तमाम एमपी-एमएलए पूंजीपति हैं। नीति वही बनाते हैं। अमेरिका और इंग्लैंड में बैठ कर उपदेश दिए जाते हैं। 80% कानून ब्रिटिेश पीरियड के हैं। लोकतंत्र एक मानसिकता है, वैचारिक चेतना है। नैतिक, राजनैतिक और सामाजिक चेतना है। जहां असहमति और विरोध का सम्मान न हो वो लोकतंत्र हो ही नहीं सकता। लोकतंत्र की मांग यही है कि विरोधी विचारों को दबायें नहीं। बहस करें। अभी एक समाज सुधारक अंधविश्वास के प्रति चेतना पैदा कर रहे थे, उनकी हत्या हो गयी। एक लेखक ने लिखा – हम लोकतांत्रिक हैं क्या? उन पर दो पुलिस केस हो गए। एक लेखक ने कई बरस पहले लेख लिखा था। आज पता चला कि किसी छोटे से समुदाय की भावनायें आहत हो गयीं। उन्हें लेख वापस लेते हुए कहना पड़ा – लेखक के रूप में आज मैं मर गया। 

उन्होंने कहा कि राजनैतिक दल और सरकारें भी लोकतंत्र की हत्या करती हैं। सरकार ने कुछ नहीं किया। पुलिस शिकारी को नहीं शिकार को पकड़ती है। इस देश के लोग इतने संवेदनशील हैं कि बात बात पर उनकी भावनायें आहत होने लगी हैं। जहां विचार की कद्र नहीं, जहां व्यंग्य बर्दाश्त नहीं, वहां लोकतंत्र कैसा? शंकर वीकली में जवाहरलाल नेहरू पर कार्टून छपा। पैर बड़े और सर छोटा दिखाया गया। भक्त ने कहा कि नेहरू का अपमान हुआ। लेकिन नेहरू ने कहा – नहीं। ठीक है यह व्यंग्य। मैं चलता ज्यादा हूं और सोचता कम हूं।  डॉ लोहिया का भी कार्टून बना। लेकिन सर बड़ा और पैर छोटे। भक्तों को गुस्सा आया। लोहिया ने डांटा – ठीक बनाया। सर बड़ा, सोच बड़ी। 

जीने की स्वतंत्रता पर वेस्ट यूपी और हरयाणा में खाप पंचायतों ने अंकुश लगा रखा है। खाप ने परंपरा की रक्षा का ठेका लिया है। प्रेम की स्वतंत्रता नहीं है। सभ्य कहना भी संकोच का मुद्दा बन जाता है। अजंता-ऐलोरा की गुफाओं में बने भित्तिचित्र देखें। खुजराओ के मंदिर में दीवारों पर बनी मूर्तियां देखें। शर्म आ जाएगी। लेकिन कलाकार प्रजापति कहलाता है, ईश्वर के सबसे करीब। असहनशीलता लोकतंत्र की परम दुश्मन है। आलोचना की संस्कृति को बर्दाश्त न करने के कारण ही सोवियत संघ का विघटन हुआ। अमेरिका जीवित इसलिए है कि वहां असहमति को बर्दाश्त किया जाता है। सरकारी नीतियों की जम कर धज्जियां उड़ाई जाती हैं। 

भारत में सिविल सोसाइटी विभाजित है। जातिवाद का बोलबाला है। लेफ्ट ने भी कोई सुसंकृतज्ञ नीति नहीं अपनायी। जब तक समाज में जातिवाद का अंत नहीं होगा, साम्यवाद नहीं लाया जा सकता। अब तक तो गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है। यह सवाल तब भी था और आज भी है। प्रेमचंद इसी वयवस्था से लड़ते रहे।  इस देश में स्त्रियों की पूजा होती है। लेकिन सत्ता देवताओं के हाथ में है। पितृ सत्ता स्थापित है। संस्कृत के नाटकों में स्त्रियां दास की भाषा बोलती थीं।  स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक न रहने से इनका अस्तित्व नहीं। यह लोकतंत्र के लिए अनिवार्य नारा है।  यह अतुल्य भारत है। प्रकृति का क्या होगा? पूंजीपति को इसकी चिंता नहीं है। 

उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में बौद्धिकता और विवेकवाद दिखता है। यहां आलोचना को स्थान है। देखी तुम्हारी काशी। काशी की आलोचना है। निराला में आलोचनात्मक चेतना थी। रघुवीर सहाय ने ‘जन गण मन.…पर ज़बरदस्त व्यंग्य लिखा। लेकिन आज आलोचना गंभीर खतरे में है। आज कविता सर्वनाशी माहौल में खड़ी है। बहुत दूर तक जाना है। जो कविता मनुष्य के पक्ष में खड़ी होगी, वही मनुष्य की कविता होगी। 

लेखक और जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय ने प्रश्न उठाया कि आलोचना और विचार की संस्कृति आज खतरे में है, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता क्या है? प्रो.पांडे ने इस पर कहा – राम के सामने भी यह संकट था। सत्य की भौतिक कल्पना करो। मार्क्स ने कहा था कि मानव समाज कोई ऐसी समस्या पैदा नहीं करता जिसका समाधान वो स्वयं न खोज सके। संकट देशव्यापी है तो समाधान भी देशव्यापी होना चाहिए। जनता को जगाने के ज़रूरत है। जो साहसी और कर्तव्यनिष्ठ है, उससे विरोध को सामने लाईये। इष्टमित्रों को खोजना होगा। मनुष्य विरोधी माहौल से तभी मुक्ति मिलेगी। नेहरू ने कहा था कि सबसे बड़ा पाप भय है। इस भय से मुक्त होने पर ही आलोचना की संस्कृति के विरोधी को जवाब देने की क्षमता बढ़ेगी। डॉ अंबेडकर आलोचना की संस्कृति के सबसे बड़े सबूत थे। और हम हैं कि अंदर के झगड़ों और अंतर्विरोधों से नहीं निपट पा रहे हैं। 

वरिष्ठ लेखक रवींद्र वर्मा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि जिस माहौल से हम गुज़र रहे हैं ऐसे माहौल से हम गुज़र चुके हैं। लोकतंत्र की प्रक्रिया को गहरा किया जाए। हमें धर्म के प्रति दृष्टि को साफ़ करने के ज़रूरत है। अगर हम अपने आस-पास देखें तो लोकतंत्र सबसे कम ख़राब व्यवस्था है। फासीवाद से समझौता न करें। अन्य भाषाओँ का अपने समाज से गहरा रिश्ता है। हिंदी वालों में यह कमी है कि समाज से नहीं जुड़ पाये। 

इस संगोष्ठी का संचालन कौशल किशोर और डॉ रविकांत ने किया। संगोष्ठी में नरेश सक्सेना, वीरेंद्र यादव, राकेश, जुगल किशोर, रूप रेखा वर्मा, केके चतुर्वेदी, नलिन रंजन सिंह, विजयराज बली माथुर आदि अनेक गणमान्य लेखक, कवि, रंगकर्मी और समाजसेवी उपस्थित थे। 

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उत्तर प्रदेश के भ्रष्ट नेताओं और अफसरशाहों के तलवे मत चाटो मीडिया के दलालों : अनूप गुप्ता

लखनऊ : वरिष्ठ पत्रकार अनूप गुप्ता ने पिछले दिनो दलाल पत्रकारों को ललकारते हुए एक धरना-प्रदर्शन के दौरान कहा कि जब पत्रकार की हत्या होती है, हमारे बीच से ही भाड़ और दलाल तत्व सत्ता प्रतिष्ठान के तलवे धोने पहुंच जाते हैं। ऐसा नहीं होता तो किसी माई के लाल में नहीं थी कि जगेंद्र सिंह चौहान की इस तरह हत्या हो जाती। पत्रकार नवनीत सहगल जैसे भ्रष्ट अधिकारी से दोस्ती कर मेरी हत्या के षडयंत्र में शामिल हो रहे हैं। पत्रकारों के उत्पीड़न, नौकरशाहों और नेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ मैं लगातार बगावत करूंगा, लगातार लड़ूंगा, जिसको मुझे मारना है मार दे, चुप नहीं बैठूंगा। 

वरिष्ठ पत्रकार अनूप गुप्ता ने कहा कि किसी माई के लाल में हिम्मत नहीं थी कि वो किसी पत्रकार की हत्या कर देता, मगर दुख है कि हमारे पत्रकार दलाल हो गए। पत्रकार राजनेताओं के तलवे चाट रहे हैं। हमारी जवाबदेही किसी नौकरशाह, किसी राजनेता के प्रति होनी चाहिए कि जनता के प्रति। क्या लखनऊ के पत्रकार भाड़ हो गए कि अधिकारियों के तलवे चाट रहे हैं। इतने गिर गए हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान में छिपे बलात्कारियों और लुटेरों के पनाहगाह में जाकर दुबक दुबक रहे हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया के नाम पर दलाली कर रहे पत्रकारिता के ठेकेदारों अब भ्रष्ट नेताओं और अफसरशाहों के तलवे चाटना बंद करो। 

धरना-प्रदर्शन के वीडियो लिंक – 

https://youtu.be/AJPmgJZxwNo?list=PLi2T5qJCMX1r-Sv_QFCYNhpZ_IQoL2vIg

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मुद्राराक्षस ने सत्ताओं, शक्ति केंद्रों को ठेंगे पर रखा

बेबाक, बेलौस शख्सियत, तीखी असहमतियों, आलोचनाओं को भी पचा कर मुस्कराते रहने वाले, अपने आलोचक को सर्वाधिक प्रिय मानने वाले, अपनी उपस्थिति से ही सबको ऊर्जस्वित करने की क्षमता से संपन्न मुद्राराक्षस लखनऊ  में  अपनों से रुबरू थे। उनके जन्मदिन की पूर्वसंध्या पर लखनऊ  के जयशंकर सभागार में २०  जून  दिन शनिवार को उन्हें सुनने, उनसे मिलने, उनके बारे में अपनी यादें बांटने तमाम लोग जुटे थे।  वे 82 साल के हो गये। सबने अपने-अपने ढंग से अपनी बातें कहीं। 

वक्ताओं ने कहा कि साहित्य और समाज में जो मजबूत उपस्थिति मुद्राराक्षस ने बनायी है, वह उनकी दृढ़ता, उनके स्वाभिमान और उनके व्यापक अध्ययन के कारण ही संभव हो सकी है। वे अनप्रेडिक्टेबल जरूर रहते हैं लेकिन यही उनके व्यक्तित्व की एक विशिष्टता बन जाती है, क्योंकि यह चौंकाती भी है और मुग्ध भी करती है। कोई भी आसानी से यह अनुमान नहीं लगा सकता कि वे कब कैसा व्यवहार करेंगे। जब आप उनसे कठोरता की उम्मीद करते हैं, वे अत्यंत सरल होकर पेश होते हैं और जब आप अनसे प्रशंसा की उम्मीद करते हैं, वे बरस पड़ते हैं। यह उनकी शख्सियत का अप्रत्याशित व्यवहार ही उन्हें बार-बार विवादों में भी ढकेलता है लेकिन वे इससे कभी डरते नहीं, वे हर परिस्थिति का मुकाबला करते हैं। वे केवल लिखते ही नहीं, लड़ते भी हैं। यहींं उनका व्यक्तित्व प्रथम श्रेणी के मनुष्य का व्यक्तित्व होता है, यही उन्हें अपने समकालीनों से अलग भी करता है। 

मुद्राराक्षस  पर ढेर सारी बातें हुईं, और जब उन्हें कुछ कहने को कहा गया तो वे फिर सबकी प्रत्याशा को ठेंगा दिखाते हुए कुछ ऐसा बोल गये जो वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति ने नहीं सोचा होगा। मैं क्या बोलूं, बड़ा अजब लग रहा हैं, बहुत कुछ इस तरह कहा गया जो मुझ पर केंद्रित था, अब मैं क्या कहूं। हम कोशिश करके भी अपनेपन से दूर नहीं जा पाते। मैं अरसे से अपने को दुहरा रहा हूं, यह कष्टकर भी है और सुखद भी है, मजे ही मजे हैं। आप सोच रहे होंगे एक विचित्र असत्य बोल रहा है। मैं एक असत्य बहुत मुश्किल से बोल पाऊंगा कि मैं कहां हूं। ये पहला मौका है जब मैं बिल्कुल बोल नहीं पा रहा हूं। अजब लग रहा है। अब मुझसे न बुलवाइये। ये चीजें वहां ले जाकर खड़ा करेंगी, जहां मैं हूं, मैं नहीं भी हूं। 

वे बोले और भी बहुत कुछ और मुस्कराते हुए खामोश हो गये। किसी ने समझा, थकान में होंगे, किसी ने समझा ये ढाई घंटे डटकर बैठे रहना क्या कम है, किसी ने आगे भी मार्गदर्शन की उत्कंठा जतायी। घर जाते समय  रास्ते में मैंने पूछा कि क्या आप सचमुच बोल नहीं पा रहे थे या आप की स्मृति पर कुछ उम्र का असर है। उन्होंने कहा, हो सकता है लेकिन सब कुछ बड़ा ओवरह्वेल्मिंग था। मैंने प्रतिप्रश्न किया तो क्या आप भावुक हो गये थे? वे बोले हो सकता है। मैंने कहा, ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि आप भावुकता में कुछ न बोल पायें, जिसके पास तर्क की लाठी हो, भावुकता से उसको क्या लेना-देना? वे बोले, हो सकता है। कुछ देर चुप रहे, फिर अचानक बोले, यार कार्यक्रम में एक कमी रह गयी। क्या? मैं उत्सुक था। मेरा जन्म दिन और बिना ह्विस्की के? मैंने तुरंत त्रुटि सुधारी और उन्हें घर छोड़ आया। 

उनकी एक पेंटिंग मशहूर चित्रकार राजीव मिश्र ने बनायी थी। उन्होंने ही उन्हें भेंट की। मशहूर आलोचक वीरेंद्र यादव ने याद किये मुद्राजी के साथ के लंबे दिन। आपातकाल के एक उत्पीड़ित के रूप में वे लखनऊ आये। शांतिभंग उपन्यास लिखा। वह आपातकाल की भयावहता पर हिंदी में लिखी गयी अनूठी और प्रभावित करने वाली रचना है। उन्होंने मुद्राजी को लिखे नामवर के पत्रों का संदर्भ देते हुए और अपने ही एक लेख, जो मुद्राजी के खिलाफ था, उनके व्यक्तित्व का विध्वंसक था,  का जिक्र करते हुए उन पर मुद्रा की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया का उल्लेख किया और कहा कि किस तरह मुद्राजी अपनी तीखी से तीखी आलोचना के प्रति सहिष्णु बने रहते हैं, यह अद्भुत है।

रंगमंच से जुड़े रहे लेखक उर्मिल कुमार थपलियाल ने कहा कि मुद्राजी से आप असहमत हो सकते हैं, उनकी उपेक्षा कर सकते हैं, पर उन्हें नजरंदाज नहीं कर सकते। प्रसिद्ध चिंतक रमेश दीक्षित ने कहा कि मुद्रा जी ने हमेशा सत्ताओं को ठेंगे पर रखा। उन्होंने कविताएं भी लिखीं हैं, शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ है, ये चीजें भी सामने आनी चाहिए। तद्भव के संपादक और कथाकार अखिलेश ने उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं की बारीक पड़ताल करते हुए कहा कि वे जब बोलते हैं तब उनके विचारों में,उनकी भाषा में गहरी ऊर्जा, गहरा ताप दिखायी पड़ता है। शक्ति केंद्रों से टकराने का जैसा हौसला मुद्राजी में है, वह उनके जैसे इंसान में ही हो सकता है। सामाजिक कार्यकर्ता डा. राकेश ने उन्हें बुद्ध, कबीर और गालिब का समुच्चय बताया और उनके विचार की ऊर्जा एवं उनके स्वाभिमान की शक्ति से सबको परिचित कराया। वरिष्ठ उपन्यासकार रवींद्र वर्मा ने कहा कि सतत जागरूकता है तो शरीर भले दुर्बल हो जाय लेकिन मस्तिष्क  की प्रखरता बरकरार रहती है। हमें या लखनऊ को ज्यां पाल सार्त्र नहीं चाहिए, हम चाहते हैं कि हमारे लिए मुद्राजी, मुद्राजी ही रहें।

कथाकार और कथाक्रम के संपादक शैलेंद्र सागर ने मुद्राजी के लेखन में विविधता को अप्रतिम बताया। उन्होंने मुद्राजी द्वारा संपादित कथाक्रम के दलित विमर्श अंक का जिक्र करते हुए कहा कि आज भी उसकी मांग आती रहती है। कथाकार शकील सिद्दीकी ने कहा कि असहमति के विवेक को बनाये रखना उनके व्यक्तित्व की बड़ी विशेषता है। सामाजिक कार्यकर्ता वंदना मिश्र ने बताया कि यहां भले ही मुद्राजी पर किसी पत्रिका का विशेषांक न निकला हो लेकिन पाकिस्तान में एक पत्रिका के दो अंक उन पर निकले हैं। मुद्राजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अशोक मिश्र, अजय सिंह, नीरज सिंह, दयानंद पांडेय, आतमजीत सिहं, के के चतुर्वेदी व  सुभाष  राय  ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में  जुगुल किशोर  जी, शिवमूर्ति जी, विजय राय, किरन सिंह, सुभाष कुशवाहा, केके वत्स, राजेश कुमार , बी  एन  गौर , राम किशोर, श्यामांकुरम, महेंद्र भीष्म, संध्या  सिंह,  निर्मला  सिंह , विमल  किशोर ,  कल्पना  पाण्डेय ,  आदियोग , अरुण  सिंह,  सतीश  चित्रबंशी ,  विजय  माथुर ,  वीर  विनोद  छाबरा ,दयानाथ निगम और अन्य तमाम गणमान्य लोग मौजूद थे। संचालन किया लेखक और कवि कौशल किशोर ने। मुद्राजी पर अपनी टिप्पणियों से सबको बांधे रखा । कहा कि मुद्राजी का लेखन नेहरू माडल से मोदी माडल तक सबका क्रीटीक रचता है। धन्यवाद ज्ञापन किया लेखक, कवि भगवान स्वरुप कटियार ने। 

सुभाष राय से संपर्क : 9455081894 

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सवाल और आह्वान : जगेन्द्र तो मर गए, क्या आप जिंदा हैं !

लखनऊ : पत्रकार दोस्तों, जगेन्द्र सिंह के जिंदा जलाकर मार दिए जाने के बाद उनका परिवार अब बिखर चुका है। बीबी-बच्चे सड़क पर आ गए हैं और अचानक जिंदगी की छोटी-मोटी जरूरतों तक के लिए भी वे दूसरों पर मोहताज हो गए हैं। आप सभी जानते हैं कि इस स्थिति में आपका अपना परिवार भी कभी भी पहुंच सकता है, यदि आप ईमानदारी से अपनी पेशेगत जिम्मेदारी निभा रहे हैं तो। हालांकि वो लोग जरूर सुरक्षित हैं जिनमें पेशेवाराना ईमानदारी नहीं है और जो छोटी-छोटी खबरों पर भी समझौते कर लेते हैं।

 

खैर, हम उनकी बात भी नहीं कर रहे हैं। हम आपकी बात कर रहे हैं जो खबरों को सिर्फ इसलिए नहीं दबा देते हैं उससे कोई गुंडा-माफिया या सरकारी दबंग नाराज हो जाएगा। आप ही की बदौलत आज भी लोग करोड़ो की तादाद में खबरें पढ़ते या देखते हैं क्योंकि लोगों को मालूम है कि तमाम बुराईयों, कमजोरियों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आप सच्चाई को बयान करते हैं। इसीलिए आप सब लोगों ने महसूस किया होगा कि जब आप के बीच के ही एक साथी को जलाकर मार दिया जाता है तो किस तरह पूरे देश और दुनिया की संवेदनाएं दिवंगत पत्रकार के परिवार के साथ जुड़ जाती हैं और लोग जगह-जगह विरोध-प्रर्दशनों में स्वतः स्फूर्त शामिल होते हैं।

ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि जनता की इन भावनाओं के साथ आपको भी मुखर होकर एकाकार होना चाहिए। पत्रकारिता के वसूलों को जिंदा रखने, लोगों के भरोसे को कायम रखने और खुद अपने मां-बाप, बीवी-बच्चों को किसी और के सामने मोहताज होने से बचाने के लिए।

हमें उम्मीद है कि आप जगेन्द्र सिंह में अपनी और उसके बर्बाद हो चुके परिवार में अपने परिवार का अक्स जरूर देखते होंगे। इसलिए जगेन्द्र के इंसाफ की लड़ाई आप की अपनी लड़ाई है। अपने बीवी-बच्चों और परिजनों के साथ आप आपातकाल की पूर्व संध्या पर 25 जून 2015, गुरूवार शाम 4 बजे गांधी प्रतिमा, हजरतगंज लखनऊ में हम सभी के साथ संघर्ष में शामिल हों।

शाहनवाज आलम

25 जून 2015, गुरुवार, शाम 4 बजे

गांधी प्रतिमा के सामने, जीपीओ हजरतगंज, लखनऊ

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कातिलों और बेशर्मों के खिलाफ लखनऊ में शुरू हो गई जगेंद्र के परिजनों को इंसाफ दिलाने की जंग

गज़ब हो गया। पहले यही बड़ी बिरादरी कस्बाई बिरादरी को दलाल के तौर पर पुकारती थी, आज वही लखनऊ-राजधानी वाली की बड़ी बिरादरी के लोगों ने छोटी बिरादरी के पहले कहे गए अदने से ‘दलाल’ पत्रकार शहीद जगेंद्र सिंह को गांधी प्रतिमा पर एक बड़े सम्मलेन में अपनी श्रद्धालियां अर्पित कर दिया। हज़रतगंज के जीपीओ चौराहे स्थित गांधी प्रतिमा पार्क पर खूब भीड़ जुटी। सभी के चेहरों पर आक्रोश था, व्यथा थी, गुस्सा था। यकीन मानिये कि आज मैं बेहद खुश हूँ। आज मुझे अहसास हो गया है कि हम बहुत जल्द ही जगेंद्र सिंह और उसके प्रियजन और मित्रों की जीत हासिल कर सकेंगे। बहुत दिनों बाद आज लग रहा है कि शायद मेरा ब्लड प्रेशर अब संभल जाए। जी भर कर रोने का भी मन कर रहा है।

हत्यारोपियों की गिरफ्तारी न होने से क्षुब्ध प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आये एवं राजधानी के तमाम मीडियाकार्मियों ने गांधी प्रतिमा पर जोरदार प्रदर्शन कर आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की। पत्रकारों ने मांग करते हुए कहा स्व.जगेन्द्र सिंह हत्याकाण्ड की सीबीआई जांच के लिए प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री को राजभवन से सीधे पत्र लिखकर मृतक परिजनों को न्याय प्रदान किया जाय। प्रदेश सरकार, शासन और प्रशासन की मानसिकता पत्रकार विरोधी है। जगेन्द्र के परिजनों को प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री कोष से 10-10 लाख रूपये मुआवजा दिलाया जाय और मृतक पत्रकार की पत्नी एवं पुत्र को सरकारी नौकरी प्रदान की जाए। परिवार को सुरक्षा दी जाये।

मुख्य आरोपी राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा को बर्खास्त कर सभी को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाय। शाहजहांपुर के डीएम और कप्तान को तुरन्त हटाया जाए एवं हरदोई जनपद में सपा के राज्यसभा सांसद नरेन्द्र अग्रवाल के कार्यकर्ता द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकार विजय पाण्डेय पर दर्ज किया गया फर्जी 307 का मुकदमा व मल्लावां कोतावाली में राकेश कुमार राठौर पत्रकार के विरूद्ध दर्ज फर्जी मुकदमा में भेजी गयी चार्जशीट जो सी.ओ.बिलग्राम के यहां अवलोकनार्थ है,

उसे पुनः मल्लावा कोतवाली भेजकर घटना की एसआईएस से विवेचना करायी जाये। हरदोई जनपद में बढ़ रही पत्रकारों की उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए एसपी हरदोई का स्थानान्तरण किया जाए। 

इसके अलावा उ.प्र.के 75 जिलों में पत्रकारों के ऊपर हो रहे चौरतरफा हमले उत्पीड़न व शोषण व हत्याओं को रोकने के लिए उप्र सरकार को निर्देश देकर जब तक उप्र सरकार राज्य प्रेस आयोग का गठन नहीं करती है, तब तक डीजीपी मुख्यालय पर अतिरिक्त पत्रकार सुरक्षा सेल का गठन कर अपर पुलिस महानिदेशक स्तर का अधिकारी तैनात कर पत्रकारों का उत्पीड़न व शोषण रोका जाए।

शाहजहांपुर के जांबाज और बेबाक पत्रकार जागेन्‍द्र सिंह को जिन्‍दा फूंक डालने के मामले में पत्रकारों में से कई गुट बन गये थे। सबके अलग-अलग तर्क थे। शुरूआत में तो लखनऊ के ज्‍यादातर पत्रकारों ने जागेन्‍द्र सिंह को पत्रकार कहलाने से ही मुंह बिचका दिया था, लेकिन सोशल साइट्स में जब हंगामा मचा, जब जागेन्‍द्र की मौत हुई, जब मैंने शाहजहांपुर जाकर इस मामले की सघन जांच की, जब प्रमाण दिये कि पत्रकार किस तरह सच्‍चा पत्रकार था, कैसे पूरी पुलिस, प्रशासन, नेता, पत्रकार और अपराधी मिल कर उसका तियां-पांचा कर देने पर आमादा था, जब पुलिस और सरकार ने इस मामले में कोई भी कार्रवाई न करने का ऐलान किया, जब भारतीय प्रेस काउंसिल ने अपने तीन सदस्‍यों की एक टीम को शाहजहांपुर जांच करने के लिये भेजा—तब कहीं जाकर लखनऊ में जमे हमारे पत्रकारों की नींद टूटी और उन्‍होंने जागेन्‍द्र सिंह को पत्रकार के तौर पर आनन-फानन उसके मुत्‍युपरान्‍त उसे पत्रकार की उपाधि अदा कर दिया।

लेकिन पत्रकार बिरादरी के तीन बड़े आकाओं की हरकतों को अगर आप देखेंगे तो घृणा और शर्म आ जाएगी।इन तीन पत्रकार-मठाधीश हैं के-विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस। के-विक्रम ने तो अपनी दूकान वही पुरानी ही रखी है, मतलब एनयूजे। लेकिन हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस फिलहाल उप्र मान्‍यताप्राप्‍त समिति की कुर्सियों पर आम पत्रकारों के हितों पर लगातार कुल्‍हाड़ा चला रहे हैं। इतना ही नहीं, चूंकि उप्र प्रेस क्‍लब पर भी इन लोगों का खासा दबदबा है, इसलिए वहां भी उनकी दूकान की दूसरी शाखा खुली ही रहती है। सरकारी फुटपाथ पर शराब और मांसाहार की दूकानों से होने वाली भारी-भरकम वसूली का एक बड़ा हिस्‍सा इन लोगों के जेब में भी आता है।

खैर, हमारी असल बात तो जागेन्‍द्र सिंह की मौत पर है। जागेन्‍द्र पत्रकार था, यह सब जानते थे, के विक्रम राव से लेकर हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस भी खूब जानते थे कि शाहजहांपुर का एक मजबूत पत्रकार था जागेन्‍द्र। लेकिन उसकी जिन्‍दा फूंक डालने वाली जघन्‍य हौलनाक सूचना पाकर भी यह तीनों पत्रकारों की तिकड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। 

हालांकि जब से मैंने इस मामले का खुलासा किया है कि इन पत्रकारों के हाथ जागेन्‍द्र के खून से सने हुए हैं, के-विक्रम राव और हेमन्‍त अपने बिल में छिप गये लगते हैं। लेकिन सिद्धार्थ कलहंस जरूर दो-चार बार अपने पक्ष रखने के लिए उपस्थित हो जाते हैं। 

तो पहली बात तो के-विक्रम राव पर। 15 जून को के-विक्रम राव ने बयान दिया कि वे जागेन्‍द्र हत्‍याकाण्‍ड के लिए खुद को गुनेहगार मान रहे हैं। क्योंकि मै “जगेन्द्र सिंह” की समय पर सहायता नहीं कर पाया। यह बात अलग है कि मैं लखनऊ के बाहर था, पर वह कोई उचित तर्क नहीं हो सकता। सात दिनों तक लखनऊ के अस्पताल में शाहजहाँपुर का एक खोजी पत्रकार जगेन्द्र सिंह ज़िन्दगी से जूझता रहा, उसके घर में घुस कर जलाने वाले आज़ाद हैं। सिर्फ इसलिए की एक राज्यमंत्री की दबंगई थी। जगेन्द्र सिंह घोटोलो का भंडाफोड़ करता रहा। राव ने कहा है कि लखनऊ के पत्रकार भी कलंक निकले जो ऐसे हादसे पर खामोश ही रहे।

अरे किसको बेवकूफ बना रहे हैं आप राव साहब। आपने इतना तो कह दिया कि आप जिम्‍मेदार और गुनहगार हैं। लेकिन आप यह नहीं कुबूल रहे हैं कि यह सारा कुछ आपका ही किया धरा है। पत्रकारिता की जो शुचिता आज 30 साल पहले हुआ करती थी, आपने उसे शराबियों-कबाबियों के हाथों बेच दिया। आपके ही दिखाये रास्‍ते में जिम्‍मेदार पत्रकारों का कलंकित किया गया और हेमन्‍त तिवारी जैसे जन्‍मना बेईमान-दलालों को पत्रकार यूनियन, प्रेसक्‍लब और मान्‍यताप्राप्‍त समिति में घुसपैठ करायी। आपके ही चेलों ने आपके दिखाये रास्‍ते पर चल कर प्रेस क्‍लब को भडवा-घर और शराबखाने मे तब्‍दील कर दिया। और अब आप अपनी नाक कटवा कर लखनऊ के पत्रकारों को लांछित कर रहे हैं। शर्म तो आपको आनी ही चाहिए के-विक्रम राव। आपको शर्म आती होती तो आप घटना की खबर आते ही दिल्‍ली से लखनऊ आते, शाहजहां पुर जाते और पूरी सरकार और प्रशासन की नाक में दम करने का पलीता लगाते। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं किया आपने, क्‍योंकि ऐसा करने से आपके छिपे एजेण्‍डे तितर-बितर हो जाते। है कि नहीं राव जी, अब जवाब दीजिए ना राव जी

अब दूसरा नाम है हेमन्‍त तिवारी का। मात्र तीन महीना तक जन संदेश टाइम्‍स में नौकरी के बाद जबरिया बाहर किये गये हेमंन्‍त पिछले पांच साल से बेरोजगार हैं। जन-सामान्‍य से कोसों से दूर, इनके रिश्‍ते केवल आला अफसरों और बड़े नेताओं तक ही फलते हैं। अपनी हनक में कभी वे आज डीजीपी बने अरविन्‍द जैन से कह कर किसी सीओ का तबादला करवा देते हैं, जिसका मूल्‍य वे जागेन्‍द्र की मौत पर अपनी जुबान बंद करने के तौर पर अदा करते हैं। सरकारी प्रेस कांफ्रेंस में भी उनकी भूमिका सजग पत्रकार की नहीं, बल्कि अफसरों-नेताओं की तेल-मक्‍खन लगाने की होती है।

इन्‍होंने एक न्‍यूज पोर्टल शुरू किया है, ताकि लोग उन्‍हें पत्रकार मानते रहें। 

हेमंत तिवारी के फेसबुक वाल पर तो छोडि़ये, उनके वेब पोर्टल तहलका डॉट कॉम में भी जागेन्‍द्र की हत्‍या की एक भी रिपोर्ट नहीं है। और अगर जब छापी भी, तो तब ही जब पुलिस या डीजीपी ने बयान दिया। अरविंद जैन से हेमंत की खूब छनती है। एक बार शराब में धुत्‍त हेमंत तिवारी ने अपने घर जमकर हंगामा किया था, एक दारोगा का बिल्‍ला नोंचा था और एक सीओ का कालर पकड़ा था, इस पर अरविंद ने उल्‍टे उसे सस्‍पेेंड कर दिया।

खैर, हेमंत की वाल पर उसके स्‍तर, उसकी खबरें और जागेन्‍द्र की मौत की खबरों पर एक नजर डाल लीजिए। कई स्‍क्रीनशॉट्स भेज चेंप रहा हूं। जिसमें स्‍त्री सौंदर्य, हेमामालिनी, वेश्‍याओं की खबरें, आम और डियोडिरेंट को लेकर बेहद खोजी और नोबल प्राइज दिला सकने वाली देश-विदेश खबरों का लिंक दिया गया है।

सिद्धार्थ कलहंस भी अब अगले अध्‍यक्ष के दावेदार भले हों, लेकिन सामने तो वे खुद को हेमंत के पिछलग्‍गू ही साबित करते हैं। उनकी वाल को देखिये ना, इनमें केवल हेमंत की मूर्खतापूर्ण वेब पोर्टल का ही लिंक पोस्‍ट किया जाता है। बहुत हुआ तो नवनीत सहगल और मुख्‍यमंत्री को धन्‍यवाद वगैरह देना ही। जागेन्‍द्र सिंह की घटना पर एक भी खबर सिद्धार्थ कलहंस ने नहीं लिखी। 

उसी तरह के-विक्रम राव ने इस बारे में केवल एक ही पोस्‍ट अपनी वाल पर की है, वह भी तब जब उन्‍हें फोटो खिंचवानी थी। वरना बाकी तो वे ढाका की राजनीति पर ही लिखते रहे।

तो यह है इन महानतम पत्रकारों की करतूतें। लानत है इन लोगों पर, जिन्‍होंने पत्रकारिता की आबरू को चिन्‍दी-चिन्‍दी बिखेरते हुए उसे बाकायदा सरेआम नीलाम कर दिया। 

अब तो आप लाेगों को ही देखना है और करना है कि आखिरकार इन लोगों के लिए हम अब भविष्‍य में क्‍या रणनीति अपना सकते हैं। 

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जगेन्द्र हत्याकांड पर लखनऊ में पत्रकार संगठन ऐसे खामोश क्यों?

पूरे उत्तर प्रदेश में, लगभग हर जनपद में पत्रकार संगठन मौत के घाट उतारे गए पत्रकार जगेन्द्र सिंह के परिवार का साथ दे रहे हैं तथा आन्दोलनरत हैं, परन्तु लखनऊ के कई पत्रकार संगठन बिलकुल मौन हैं। सहायता करना तो दूर, यहां तक कि जगेन्द्र सिंह में ही कमियां गिनाते फिर रहे हैं। उन्हें याद रखना चाहिए कि पति/पिता की मृत्यु का दर्द उसकी निर्बल विधवा तथा अनाथ हुए बच्चे ही जान सकते हैं और आज उत्तर प्रदेश के माहौल में यह दिन किसी अन्य का भी आ सकता है। पिछले दस दिनों में तीन पत्रकारों पर हमले हुए हैं, यह अच्छा संकेत नहीं है।

लखनऊ में जी हजूरी का माहौल तथा विज्ञापन पाने की होड़, भला किससे छुपी है। लोग कहते हैं कि बड़े अखबार तो पूंजीपतियों के नियंत्रण में हैं तथा छोटे अखबार तथा पत्रिकाएं सरकारी विज्ञापनों पर ही जिन्दा रहने को मजबूर हैं। फिर भी अधिकांश राष्ट्रीय/स्थानीय चैनल व अखबार/पत्रिकाएं अकेले- अकेले जगेन्द्र सिंह की हत्या में असली पापी दोषियों को सजा दिलाने का अभियान चलाये हुए हैं, परन्तु लखनऊ के विभिन्न पत्रकार संगठन क्यों मौन है ? 

कुछ लोग तो शासन/सत्ता के काफी नजदीक बताये जाते हैं व लाभ भी पाते हैं। उन्हें आगे आना चाहिए । क्या जगेन्द्र की पत्नी व परिवार को आगे आने वाली और जटिल परिस्थियों की प्रतीक्षा है ? पत्नी अब स्वयं भूख हड़ताल पर है। बेहोश तक हो चुकी है। बच्चे अनाथ हैं। बिलख रहे हैं। जगेन्द्र का पिता न्याय के लिए गिड़गिड़ा रहा है। क्यों मौन हो दोस्तों। एक कैंडल मार्च ही निकालो। गाँधी प्रतिमा पर जाओ। यदि ऐसा हुआ भी होगा तो किसी को ज्यादा पता नहीं चला। जंगल में मोर नाचा, किसने देखा। दबाव बनाना होगा। यदि मेरी बात बुरी लगी हो तो माफ़ कर देना!

सूर्य प्रताप सिंह के एफबी वाल से

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जगेंद्र सिंह की वक्त पर मदद न कर पाने के लिए मैं गुनहगार, लखनऊ के पत्रकार शर्मसार : के. विक्रम राव

मैं खुद को गुनेहगार मान रहा हूँ, क्योंकि मै “जगेन्द्र सिंह” की समय पर सहायता नहीं कर पाया। यह बात अलग है कि मैं लखनऊ के बाहर था, पर वह कोई उचित तर्क नहीं हो सकता। सात दिनों तक लखनऊ के अस्पताल में शाहजहाँपुर का एक खोजी पत्रकार जगेन्द्र सिंह ज़िन्दगी से जूझता रहा, उसके घर में घुस कर जलाने वाले आज़ाद हैं। सिर्फ इसलिए की एक राज्यमंत्री की दबंगई थी। जगेन्द्र सिंह घोटोलो का भंडाफोड़ करता रहा।

अचरज तो यह रहा कि दुनिया भर की हर छोटी मोटी घटना पर जीपीओ के गाँधी पार्क में तख्ती ले कर फोटो खिंचाने वाले प्रबुद्ध लोगों में कोई हरकत नहीं हुई। शर्मसार तो लखनऊ के पत्रकारों ने किया, जो 8 दिन तक आंदोलित नहीं हुए। सड़क नहीं रोकी। सत्तासीन लोगों का घेराव नहीं किया। शायद इसलिए कि वह जिला स्तरीय पत्रकार था। चुल्लू भर पानी वाली कहावत सार्थक कर दी।

वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव के एफबी वाल से

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राजेंद्र द्विवेदी और सलाम खान ने ज्वॉइन किया ‘वॉयस ऑफ लखनऊ’

लखनऊ : राष्ट्रीय सहारा लखनऊ के प्रबंधक रहे राजेंद्र द्विवेदी ने अखिलेश दास के अखबार ‘वॉयस ऑफ लखनऊ’ को ग्रुप हेड के रूप में ज्वॉइन कर लिया है. वह ‘वॉयस ऑफ लखनऊ’ के हिंदी और उर्दू दोनों संस्करणों का दायित्व संभालेंगे. इसके साथ सहारा के उर्दू अखबार में कार्यरत रहे सलाम खान ने ‘वॉयस ऑफ लखनऊ’ के उर्दू एडिशन का संपादक पद संभाल लिया है.

गौरतलब है कि चार माह पूर्व जब द्विवेदी राष्ट्रीय सहारा लखनऊ के प्रबंधक थे, उन्हें जयव्रत रॉय का कोई व्यक्तिगत काम न करवा पाने का खामियाजा नौकरी देकर चुकाना पड़ा था. उन्होंने लिखित इस्तीफा भी बाद में दे दिया था, लेकिन प्रबंधन उससे अनभिज्ञ बना रहा. पिछले दिनो ‘वॉयस ऑफ लखनऊ’ के मालिक अखिलेश दास से मुलाकात के बाद द्विवेदी ने नया अखबार ज्वाइन कर लिया.

इसी तरह तीन माह पूर्व सहारा उर्दू के एडिटोरियल हेड सलाम खान की प्रबंधन से शिकायत की गई थी कि वह अपनी पत्नी के नाम से किसी उर्दू अखबार को रजिस्टर्ड कराए हैं, जिसका नाम सहारा से मिलता जुलता है. इसके बाद सलाम खान को हटा दिया गया था. अब वह’वॉयस ऑफ लखनऊ’ का उर्दू संस्करण संभालेंगे.

रेखा सिन्हा और रामेंद्र सिंह के बाद राजेंद्र द्विवेदी भी सहारा छोड़ चले!

सहारा समूह की स्थिति दिन पर दिन खराब होने से यहां से लोगों का जाना लगातार जारी है. एक कहावत है जहाज जब डूबने को होता है तो सबसे पहले चूहे भागते हैं लेकिन सहारा मीडिया के साथ कुछ उल्टा ही हो रहा है. यहां कैप्टन टाइप के लोग ही जहाज को मझधार में छोड़ कर भागने लगे हैं. ताजा मामला राजेंद्र द्विवेदी का है. सहारा की आज हर यूनिट में भगदड़ मची है. लखनऊ यूनिट से हाल ही में रेखा सिन्हा उसके बाद रामेन्द्र सिंह ने सहारा छोड़ा.

देहरादून जैसी छोटी-सी यूनिट में भी भगदड़ मची है. एक साल में दर्जनों लोगों ने सहारा का दामन छोड़ दिया. वाराणसी में भी स्थिति विस्फोटक रही. लगभग आठ दस संवादसूत्र लंबी छुट्टी पर रहे. कानपुर में भी एक कर्मचारी की संपादक से गरमा गरमी हो गई. नतीजा उसको नौकरी से हाथ धोना पड़ा. मजीठिया वेज बोर्ड के कारण किसी अखबार में भर्ती नहीं हो रही है. कहा जा रहा है कि सहारा में अब वही पड़ा है जिसको कहीं नौकरी नहीं मिल रही है.

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खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ लोकायुक्त रिपोर्ट पर कैवियट दायर

लखनऊ : खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर परिवाद में लोकायुक्त जस्टिस एन के मल्होत्रा की मंत्री को क्लीन चीट देने वाली रिपोर्ट के तुरंत बाद मंत्री के नजदीकी कहे जाने वाले विकास वर्मा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में कैवियट दायर कर दिया.

विकास वर्मा लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट के खिलाफ डॉ ठाकुर द्वारा हाई कोर्ट में दायर किये जाने वाले किसी भी संभावित याचिका के खिलाफ कैवियट ले कर गए हैं जबकि उन्होंने लोकायुक्त के सामने बयान दिया है कि उनका मंत्री से कोई सम्बन्ध नहीं है.

डॉ ठाकुर ने कहा है कि विकास वर्मा का इतनी तेजी से हाई कोर्ट जाना स्वतः उनके द्वारा अपनी शिकायत में लगाए गए श्री वर्मा और श्री प्रजापति के नजदीकी संबंधों को स्पष्ट कर देता है क्योंकि जब जांच श्री प्रजापति के खिलाफ थी और वह भी गलत बतायी गयी तो श्री वर्मा को कैवियट दायर करने की क्या जरुरत थी. 

 समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

A caveat has been filed by Vikas Verma, a close associate of minister Gayatri Prajapati, in Lucknow bench of Allahabad High Court against the Lokayukta clean chit report to the minister in complaint filed by social activist Dr Nutan Thakur, which had called the allegations unsubstantiated.

Immediately after this Vikas Verma has gone to the High Court against any proposed petition to be filed by Dr Thakur in the High Court against the Lokayukta report, while he has made a statement before the Lokayukta that he is not associated to the minister in any manner.

Dr Thakur has said that the swiftness of Sri Verma moving to Court in a case which is not concerned with him but with the minister itself proves the close relation between him and Sri Prajapati, as has been alleged by her in her complaint.

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर से संपर्क : 94155-34525

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पुस्तक चर्चा : अंबेडकर और मार्क्स एक-दूसरे के पूरक

लखनऊ : जन संस्कृति मंच की ओर से कवि व लेखक भगवान स्वरूप कटियार की हाल में प्रकाशित ‘अन्याय की परम्परा के विरुद्ध’ पुस्तक पर यहां जयशंकर प्रसाद सभागार में सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि यह किताब हमारे समाज में व्याप्त अन्याय की विचारधारा और उसकी परम्परा से मुठभेड़ करती है। इस मायने में यह किताब मौजूदा समय में एक वैचारिक हस्तक्षेप है। 

‘अन्याय की परम्परा के विरुद्ध’ पुस्तक पर विचार व्यक्त करते विद्वान 

उन्होंने कहा कि डॉ. अम्बेडकर के बारे में इस पुस्तक में जो मूल्यांकन है, वह दलितों या गैर दलितों के द्वारा किये जा रहे मूल्यांकन से भिन्न है। तथ्यों के आधार पर यह बात सामने आती है कि डॉ. अम्बेडकर और कार्ल मार्क्स एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए ये दोनों सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में हमारे लिए जरूरी हैं। अगर अन्याय की परंपरा की बात करें तो आजादी के बाद की सत्ता ने अन्याय की परंपरा को आगे बढ़ाया है और इंसाफ का दमन किया है। तेलंगाना से बंगाल और फिर गुजरात की कहानी हमारे सामने है। वह चाहे नेहरू की सत्ता रही हो या फिर इंदिरा की। इसके बाद की सरकारें यहां तक कि मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सत्ता भी अन्याय की परंपरा को आगे बढ़ाती है। इन सभी के नेतृत्व में बनी सरकारों में कत्लेआम हुए।

सेमिनार को संबोधित करते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि भगवान स्वरूप कटियार की पुस्तक योजनाबद्ध तरीके से लिखे गए लेखों का संग्रह है। इतिहास की बहुत सारी पुस्तकों, यहां तक कि अयोध्या सिंह जैसे वामपंथी विचारक की पुस्तक को भी देखें तो ज्यादातर में अंबेडकर अनुपस्थित हैं। नेहरू जैसे लोगों को ही जगह मिली है। आज अंबेडकर का अधिग्रहण करने की दौड़ सी लगी हुई है। इसलिए कि अंबेडकर आज भारतीय संघर्षशील समाज के प्रतीक के रूप में हैं। अंबेडकर के अनुयायियों ने उनके साथ क्या सुलूक किया, यह जग जाहिर है। राजनीतिक लाभ लेने के लिए उनका अधिग्रहण तो किया, लेकिन उन्हें ही नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। आज दलित अंदोलन जिस मोड़ पर है और हिन्दुत्ववादी हमले जिस तरह हो रहे हैं, ऐसे में इस तरह के लेख और पुस्तक का आना अच्छी बात है। जिन्हें संदर्भों से अलग कर दिया गया है, उन्हें छोटी-छोटी पुस्तकों से सामने लाया जाना चाहिए। भारत में दो तरह की परंपरा रही है। एक बौद्धिक परंपरा और दूसरी सामाजिक हलचल के बीच से निकलने वाली परंपरा। पुस्तक के लेखों की धुरी के एक तरफ माक्र्स हैं तो दूसरी तरफ अंबेडकर। लेखक ने मार्क्स और अंबेडकर को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना है। इसके ढेर सारे उदाहरण भी दिए हैं, जिसमें अंबेडकर और मार्क्स एक जगह खड़े नजर आते हैं।

राजनीतिक चिंतक प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, जिसमें बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने कभी भी संघ परिवार के किसी नेता के साथ कोई प्लेटफार्म शेयर किया हो। वह कभी भी ऐसे लोगों के साथ खड़े नजर नहीं आए। दूसरी तरफ अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी ने तीन बार भाजपा के साथ मिलकर सत्ता पर कब्जा किया। बाबा साहेब ने संघर्षों की शुरुआत ट्रेड यूनियनों के साथ ही और लगातार ट्रेड यूनियनों से संवाद बनाए रखा। भगवान स्वरूप कटियार की पुस्तक बड़े उद्देश्य को लेकर लिखी गई है। इसके दर्शन खंड में कटियार ने अपनी मूल बात रख दी है। कटियार की प्राथमिकता तर्क और वैज्ञानिकता के पक्ष में है। वैज्ञानिक समझ के साथ पाठक को तैयार करने का काम यह पुस्तक करती है। यदि तीनों खंडों की अलग-अलग पुस्तकें बनाई जाती तो इससे और भी अधिक लाभ मिलता। अन्याय की परंपरा की बात करें तो भारतीय वर्णाश्रम अपने आप में अन्याय की परंपरा रही है। अन्याय की परंपरा को चुनौती देने वाले संगठित और असंगठित लोग भी हुए हैं। अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले नायकों का जिक्र इस पुस्तक में किया गया है। हमें उन नायको को याद करना याहिए। स्पार्टकस जैसे अदि विद्रोही पर हार्वड फास्ट ने लिखा। अगर 1930 के दशक की बात करें तो यह अन्याय और शोषण के विरुद्ध केंद्रीय दौर के रूप में रहा है। 

दलित चिंतक लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि परिवर्तनों के पक्ष में लेखन हो रहा है। यह इतिहास के पुनर्लेखन की शुरुआत है, जो स्वागत योग्य है। दलितों और दलित आंदोलन में भटकाव आया है। भारतीय परिवेश में जब भी चिंतन होगा, जाति को अलग नहीं रखा जा सकता। लोहिया के उन विचारों को भी लिपिबद्ध करना चाहिए था, जिसमें उन्होंने जाति की श्रेष्ठता के चलते देश के गुलाम बनने की बात कही थी। बाबा साहेब चाहते थे कि अंग्रेजों के रहते जाति के सवाल पर कोई फैसला ले लिया जाय, नहीं तो आजादी के बाद अछूतों के साथ न्याय नहीं हो पाएगा। पूना पैक्ट अगर नहीं होता तो आज की स्थिति में ऐसा संभव नहीं था। जाति आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है और अपना रौद्र रूप प्रदर्शित कर रही है। इसके खिलाफ लेखन नहीं हो रहा है। जाति विनाश के उपाय नहीं खोजे जा रहे हैं। 

एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व स्त्री अधिकार आंदोलन की कार्यकर्ता ताहिरा हसन ने महिलाओं के संदर्भों में कहा कि अन्याय की सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं रही हैं। समाज में ही नहीं वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं है। घरों में उनके साथ दुव्र्यवहार होता रहा है। उन्होंने इसका प्रतिकार भी किया है। अन्याय की परंपरा के विरुद्ध महिलाएं भी आंदोलन कर रही हैं। एक तरफ 33 प्रतिशत आरक्षण की बात तो हो रही है, लेकिन ज्यादातर दलों की इच्छा इसके विपरीत है। अंबेडकर पहले नेता थे जिन्होंने जाति और धर्म के आधार पर होने वाले शोषण को पकड़ा था। अंबेडकर और माक्र्स में बड़ी समानता है। दोनों पूंजीवाद के खिलाफ थे। इस समानता को कटियार जी अपनी किताब में तर्कों और तथ्यों के साथ लाते हैं।

कार्यक्रम के आरंभ में जसम के प्रदेश अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर ने कटियार की पुस्तक का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कवि के रूप में श्री कटियार के चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और पांचवें की तैयारी चल रही है। अब यह पुस्तक आने से उनके एक नए नजरिये के बारे में पता चला। उनकी यह पुस्तक अन्याय की परंपरा के विरुद्ध कटियार की विचार यात्रा है। इसका नजरिया वैज्ञानिक है। इस यात्रा के मूल में अन्याय को मिटाना और नई दुनिया का निर्माण करना है। वर्ग और वर्ण पर आधारित व्यवस्था के साथ ही ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद भी अन्याय का हिस्सा रहा। पुस्तक में अन्याय और शोषण से परिचित कराने के साथ ही इसे बदलने का मकसद भी नजर आता है। यह पुस्तक हमारी समझ को नया आयाम और दिशा देती है। परिवर्तन की चेतना को मजबूत करती है। यह पुस्तक सवालों के जवाब तलाशने में भी सहायक होगी। इस पुस्तक में तीन खंड पहला दार्शनिक विमर्श, दूसरा सामाजिक अन्याय की परंपरा और तीसरा विकल्प है। अगर एक तरफ अन्याय है तो दूसरी तरफ उसके बरक्स न्याय के लिए संघर्ष है। अन्याय के प्रतिकार में न्याय की शक्तियों को मजबूत करना इस पुस्तक की मूल चिंता है। इसके मूल में इस धरती से अन्याय की व्यवस्था को समाप्त कर समता व न्याय पर आधारित व्यवस्था का निर्माण है। न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने में यह पुस्तक हस्तक्षेप करती नजर आती है, क्योंकि न्याय आज सबसे दुर्लभ है।

इस मौके पर पुस्तक के लेखक भगवान स्वरूप कटियार ने अपनी किताब के हवाले से कहा कि जब से समाज बना, तब से हम बेहतर व मानवीय समाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विडम्बना है कि सभ्यता व विकास के दावे के इस दौर में जो समाज मिला, वह आज सबसे ज्यादा विकृत रूप में है। मार्क्स व अंबेडकर का मकसद बदलाव का था। अंबेडकर के हस्तक्षेप से ही सामाजिक न्याय का मुद्दा राजनीतिक मुद्दा बना। जन के बिना इतिहास तो क्या कोई भी रचना पूरी नहीं हो सकती। महान रोम हो या चीन की दीवार, ताजमहल हो या खजुराहो, इसे बनाने वाले कारीगर व मजदूर क्या इतिहास के हिस्से नहीं हैं ? वास्तव में इतिहास बनाने वाली ताकत जनता है। जो लोग इतिहास व विचार के अन्त तथा आधुनिक पूंजीवाद को विकल्पहीन बता रहे हैं, वे जनता के विरुद्ध साजिश रचते हैं। जबकि सच्चाई है कि विषम परिस्थितियों में संघर्ष करके जनता आगे बढ़ी है। उसका यह संघर्ष आज भी जारी है। इसी संघर्ष ने हमें लिखने के लिए प्रेरित किया है।  हमारी किताब या हमारा लेखन अन्याय की परम्परा के विरुद्ध एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।

कार्यक्रम का संचालन जसम लखनऊ के संयोजक श्याम अंकुरम ने किया। इस मौके पर सुभाष राय, नसीम साकेती, दयानंद पांडेय, नलिन रंजन सिंह, राजेश कुमार, प्रदीप घोष, आदियोग, कल्पना, अलका पांडेय, किरन सिंह, ऊषा राय, जुगुल किशोर, केके वत्स, रविकांत, बी एन गौड़, अशोक चन्द्र, उमेश चन्द्र, ओ पी सिन्हा, धर्मेन्द्र कुमार, के के शुक्ला, सत्येन्द्र कुमार आदि उपस्थित रहे।

श्याम अंकुर से संपर्क : 9454514250 

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दलितों और महिलाओं पर अत्याचार के खिलाफ लखनऊ में विरोध प्रदर्शन

लखनऊ : राजस्थान के नागौर जिले के गांव डंगवासा में 14 मई को दबंगों  द्वारा चार  दलितों की निर्मम हत्या व कई  लोगों को गंभीर रूप से घायल करने, उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के गांव बड़े हरेवा में 16 मई को पांच दलित महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने के विरोध में भारतीय समन्वय संगठन (लक्ष्य) के कार्यकर्ताओं ने गत दिनो प्रदर्शन किया।  

लखनऊ में दलित अत्याचार के खिलाफ प्रदर्शन मार्च करते लक्ष्य के कार्यकर्ता

लखनऊ में जानकीपुरम के मुलायम तिराहे से चलकर इंजीनियरिंग कॉलेज तक पैदल मार्च कर प्रदर्शनकारियों ने घटनाओं का विरोध किया। चिलचिलाती धूप के बावजूद इस विरोध प्रदर्शन रैली में महिलाओं ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इंजीनियरिंग कॉलेज पर राष्ट्पति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राजस्थान के राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया गया। मांग की गई कि दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिले और इस प्रकार की घटनो पर रोक लगे।

लक्ष्य की कमांडर रजनी सोलंकी ने कहा कि देश में आये दिन दलितों व महिलाओं  पर इस तरह के हमले  हो रहे हैं और दोषी सरेआम घूम रहे हैं। आज भी देश में दलित व महिलाएं अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही हैं । लक्ष्य की कमांडर रेखा आर्या ने कहा कि आजादी के 68 वर्ष बाद भी दलित समाज गुलामी जीवन जीने के लिए विवश है। कमलेश सिंह ने कहा कि लक्ष्य के कार्यकर्त्ता दलित समाज पर किसी भी प्रकार के शोषण को बर्दाश नहीं करेंगे !  देश के किसी भी कोने में अगर महिलाओं के साथ घटना होती है तो लक्ष्य की कमांडर शांत नहीं बैठेंगी ! विरोध प्रदर्शन  रैली में संघमित्रा गौतम, मंजूलता आर्या, सुषमा बाबू , धम्मप्रिया गौतम,अंजू सिंह, राजकुमारी कौशल आदि ने भी हिसा लिया |

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छत और दीवारों में छेद कर अश्लील वीडियो बनाने वाला सैनिक गिरफ्तार

लखनऊ (उत्तरप्रदेश) : एक फौजी के कारनामों ने तो सबको दंग कर दिया। वह फौजियों के आवास की दीवारों और छतों में छेद कर अपने सीनियर्स की पत्नियों के अश्लील वीडियो बनाने के बाद ब्लैकमेल करता था। उसने गत दिनो एक हवलदार की पत्नी का अश्लील वीडियो बना कर उसके घर ब्लैकमेलिंग के लिए चिट्ठी भेज दी। शिकायत पर सैन्य खुफिया तंत्र ने जांच की। मामला सही पाए जाने पर एसटीएफ ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

कैण्ट कोतवाली में दर्ज मामले के मुताबिक तोपखाना की निकटवर्ती कालोनी निवासी फौजी के घर दो दिन पहले एक चिट्ठी पहुंची। इस चिठ्ठी के साथ एक वीडियो भी थी। पत्र में लिखा था कि सीडी को देखने के बाद अगर चार लाख रुपये नहीं भिजवाए तो यह सीडी में जो कुछ भी है, वह इंटरनेट पर डाल दिया जाएगा। फौजी ने तुरन्त ही इस बारे में सेना की खुफिया इकाई को सूचना दी। खुफिया इकाई ने जांच में मामले को सही पाया। इसके बाद ही एसटीएफ को इस बारे में सूचना दी गई। एसटीएफ ने जांच में पाया कि आरोपी सिपाही ने पीडि़त के मकान की छत पर छेद कर मोबाइल के कैमरे की मदद से यह क्लिपिंग बनाई है।

सेना की 25 वायरलेस यूनिट के हवलदार नवीन सिंह बिष्ट ने सिर्फ अपने दोस्त को ही नहीं छला, बल्कि एक अफसर की पत्नी की भी मोबाइल कैमरे से छिपकर तस्वीरें उतारी थीं। उसने शनिवार को पूछताछ के दौरान फिर यही कुबूला और कहा कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसों की आवश्यकता थी। इस कारण ही वह कई लोगों के घरों में कैमरे छिपाकर अश्लील वीडियो बना चुका है। सेना के अधिकारी इस मामले में कुछ भी स्पष्टीकरण देने से दिन भर बचते रहे। एक दिन पहले मिलेट्री इंटेलिजेंस ने नवीन सिंह को पकड़ कर एसटीएफ के हवाले किया था। नवीन ने अपने एक साथी सैनिक के घर की छत में सुराख कर कैमरे से उसकी पत्नी की नहाते हुए वीडियो बना ली थी। इसके बाद एक चिट्ठी के साथ मैमोरी कार्ड में वीडियो कॉपी कर भेजा था और चार लाख रुपए की मांग की थी।

साथ ही धमकी दी थी कि पैसे नहीं मिले तो वीडियो इंटरनेट पर डाल देगा। पूछताछ में नवीन ने बताया कि अपने दोस्त के अलावा एक अफसर के घर में भी सेंध लगा कर उसने वैसी ही वीडियो बनाई थी। आरोपी नवीन सिंह इसके पहले कई स्थानों पर तैनात रहा है।

मिलेट्री इंटेलिजेंस और पुलिस के अधिकारी अब छानबीन कर रहे हैं कि कहीं इसने इसके पहले कुछ और सैनिकों या अफसरों के परिवारों को तो अपना शिकार नहीं बनाया। सूत्रों की मानें तो नवीन सिंह की अपराध शैली से ऐसा कतई नहीं लगता कि उसने पहली बार ऐसा काम किया। उसने छत में सुराख करने से लेकर वीडियो बनाने में शातिर अपराधियों की तरह बड़ी चालाकी दिखाई है।

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श्री टाइम्स, श्री न्यूज चैनल की तीसरी वर्षगांठ 18 को, यशवंत सिंह सहित कई विशिष्ट जनों का राज्यपाल के हाथों सम्मान एवं संगोष्ठी

{jcomments off}लखनऊ में श्री मीडिया वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड परिवार आगामी 18 मई 2015 को हिंदी दैनिक ‘श्री टाइम्स’ एवं ‘श्री न्यूज’ चैनल की तृतीय वर्षगांठ को संकल्प दिवस के रूप में मना रहा है। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव विशिष्ट अतिथि होंगे। हिंदी संस्थान के अध्यक्ष उदयप्रताप सिंह कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। 

श्री मीडिया वेंचर्स प्रा.लि. के चेयरमैन एवं प्रबंध संपादक मनोज द्विवेदी और संपादक राजेंद्र बहादुर सिंह ने बताया कि 18 मई 2015 को शाम पांच बजे विभूतिखंड, गोमतीनगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के मरकरी ऑडिटोरियम में आयोजित इस समारोह में ‘समाज में पत्रकारिता का योगदान’ विषयक संगोष्ठी में विभिन्न विद्वान एवं वरिष्ठ पत्रकार शिरकत करेंगे। गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित भड़ास4मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह सहित कई विशिष्ट जनों का प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक सम्मान करेंगे। इस अवसर पर सांस्कृतिक संध्या एवं रात्रिभोज का भी आयोजन है।

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कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट और सलमान खान जमानत का विरोध

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर के नेतृत्व में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर, देवेन्द्र दीक्षित, त्रिपुरेश त्रिपाठी, शरद मिश्रा, राकेश शर्मा, हयात कादरी, संदीप सिंह आदि गाँधी प्रतिमा, हजरतगंज पर क्रिमिनल कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के विरोध में एकत्र हुए.

इस एक्ट को ब्रिटिशकालीन और अनुपयोगी बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका अधिकतर दुरुपयोग होते हुए ही देखा गया है। जब किसी व्यक्ति या मीडिया को किसी जज के खिलाफ वाजिब और सच्ची टिप्पणी करनी होती है. उन्होंने कहा कि इस एक्ट के भय से न्यायपालिका की तमाम सच्चाइयां सामने नहीं आ रही हैं और अंदरखाने के कई गलत आचरण लोग डर के कारण नहीं कह पा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि हाल में सलमान खान के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा दी गयी जमानत के बाद तमाम लोग बहुत खुल कर बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं पर इसी क़ानून के डर के कारण नहीं कह पा रहे हैं. ठाकुर ने कहा कि न्यायपालिका की सच्चाई को सामने ला कर उसमें आवश्यक सुधार के लिए नितांत जरुरी है कि कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट समाप्त किया जाए. साथ ही इन लोगों ने सलमान खान मामले में दी गयी जमानत के प्रति अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट को इसे रद्द करने के लिए प्रत्यावेदन भेजा.  

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

social activists Dr Nutan Thakur, Devendra Dixit, Tripuresh Tripathi, Sharad Mishra, Rakesh Sharma, Hayat Kadri, Sandeep Singh and others, led by IPS officer Amitabh Thakur protested against the provisions of Criminal Contempt of Court.

Calling the Act colonial and outdated, they said it is being mostly misused when a person or Media tries to bring any valid or truthful fact against a Judge.  They said that many irregularities in judiciary are not coming in open because of the fear of this archaic act.

They said that many people want to show their open resentment and state many facts about the recent grant of bail to Salman Khan by Bombay High Court but are not being able to express themselves merely because of fear of this Act.

Sri Thakur said it is imperative to repeal this Act in the interest of judiciary so as to help get true feedback out judicial functioning. These people also sent a representation to the Supreme Court showing their displeasure with Salman Khan bail, praying to get the bail quashed. 

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लखनऊ सहारा में तुगलकी फरमान पर मचा बवाल, हालात विस्फोटक

लखनऊ : राष्ट्रीय सहारा की लखनऊ यूनिट में इन दिनो एक तुगलकी फरमान को लेकर माहौल काफी तनावपूर्ण है। स्थिति विस्फोटक होने का अंदेशा जताया गया है। सारा बवाल यूनिट हेड मुनीश सक्सेना के उस नोटिस पर मचा हुआ है, जिसमें उन्होंने समस्त स्टॉफ को आदेश दिया है कि अब एक बार इंटर करने के बाद कोई भी व्यक्ति चाय पीने अथवा अन्य किसी काम से बाहर निकला तो उसे रजिस्टर में उल्लेख करने के साथ ही आदेश की स्लिप लेनी होगी और लौटने के बाद वह स्लिप विभागाध्यक्ष को देकर अवगत कराना पड़ेगा कि वह ड्यूटी पर आ गया है। 

बताते हैं कि इसे पूरे वाकये के पीछे देवकीनंदन मिश्रा को नीचा दिखाने की रणनीति है। गौरतलब है कि वह हाल ही में बनारस सहारा के संपादक पद से यहां स्थानांतरित किए गए हैं। मिश्रा बनारस से पहले पटना यूनिट के भी हेड रह चुके हैं। योग्यता और अनुभव में वह सक्सेना से काफी सीनियर हैं। सक्सेना उन्हें नीचा दिखाने के अंदाज में पेश आ रहे हैं, वह विज्ञापन हेड से प्रमोटी प्रभारी बने हैं। पहले वह सहारा का विज्ञापन प्रभार देखते थे। अपने तबादले से पूर्व देवकी नंदन मिश्रा का प्रबंधन से अनुरोध रहा था कि बनारस सहारा में संपादक और प्रबंधक एक ही व्यक्ति रहे। इससे कंपनी का अनावश्यक खर्चा बचेगा। ऐसी ही अन्य दैनिक जागरण आदि में भी व्यवस्था है। मिश्रा अब अपने चैंबर में दो एक घंटे बैठ रहे हैं। काम कोई है नहीं। उनको लेकर खामख्वाह मुनीश सक्सेना कुंठाग्रस्त हैं। वरीयता क्लैस है।

पूरा घटनाक्रम कुछ इस तरह का पता चला है। गुरुवार की शाम स्थानीय संपादक मनोज तोमर, प्रबंधक आदि की सहमति से लखनऊ सहारा यूनिट प्रभारी मुनीश सक्सेना द्वारा एक नोटिस जारी किया गया। तुगलकी नोटिस का फरमान रहा कि लखनऊ सहारा कार्यालय में अब जो भी कर्मी एक बार कार्ड पंच कर अंदर आ जाएगा, फिर काम की समयावधि में वह चाय पीने भी बाहर जाना चाहे तो संपादक या प्रबंधक से स्लिप पर अनुमति लेकर ही जाना होगा। लौटने पर फिर वह स्लिप संबंधित विभागाध्यक्ष के पास जमा करना अनिवार्य होगा। आदेश शुक्रवार से लागू हो गाय। इसके पीछे चाल ये बताई गई है कि आदेश के अनुपालन में अब देवकीनंदन मिश्रा को भी पूरे समय ड्यूटी पर उपस्थित रहना होगा। उनके जाने पर रोक लगेगी। यदि जाते भी हैं तो रिकार्ड बनेगा। अन्य मीडियाकर्मी भी इससे दबाव में रहेंगे।

शुक्रवार को इस तुगलकी आदेश से क्षुब्ध डिप्टी ब्यूरो चीफ मनमोहन सहकर्मियों कमल दुबे, कमल तिवारी, किशोर निगम, के. बख्श सिंह आदि के साथ मुनीश सक्सेना से मिले। उन्होंने ताजा फरमान पर गंभीर ऐतराज जताया। पूछा कि क्या चाय पीने के लिए भी स्लिप पर आदेश लेना पड़ेगा? बार बार रजिस्टर भरना पड़ेगा। एसी शाम छह बजे के बाद बंद रहता है तो क्या अब सफोकेशन से बचने के लिए बाहर जाने पर भी स्टॉफ के लोगों को स्लिप लेनी पड़ेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि इस फरमान को तुरंत वापस लिया जाए वरना वह सहाराश्री सुव्रत राय से इसकी शिकायत करेंगे। इस पर मुनीश सक्सेना से उनकी काफी गर्मागर्मी हुई। काफी देर तक दफ्तर में हंगामा हुआ। 

मनमोहन ने कहा कि यदि फरमान जारी हुआ है तो संपादक-प्रबंधक पर भी ये नियम लागू होना चाहिए। इतना ही नहीं, समान रूप से ये आदेश लखनऊ यूनिट ही क्यों, सभी यूनिटों में लागू किया जाए। संपादक खुद कभी समय से आते नहीं हैं। काम के समय एसी नहीं चलता और पंखे हैं नहीं, वॉटर कूलर खराब। ऑफिस प्रबंधन को ये सब जरूरी व्यवस्थाएं ठीक करनी चाहिए या ऊलजुलूस फरमान जारी कर ऑफिस में काम का माहौल बिगाड़ने के लिए वह प्रबंधक और संपादक बनाए गए हैं। 

मुनीश सक्सेना ने फरमान लौटाने से असमर्थता जताते हुए कहा कि ये आदेश ग्रुप हेड ओपी श्रीवास्तव के स्तर से जारी हुआ है। संपादक मनोज तोमर की भी आपत्ति है कि पीक ऑवर में लोग चाय पीने निकल जाते हैं। मैंने तो फरमान पर केवल हस्ताक्षर किया है। इसे वापस नहीं किया जा सकता है। इससे पिछले तीन दिन से ऑफिस का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। हालात नहीं सुधरे तो अंदेशा है कि आने वाले दिनों में स्थिति विस्फोटक हो सकती है। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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मीडिया पर हमले के खिलाफ लखनऊ में पत्रकारों का प्रदर्शन, एसएसपी हटाए गए

उत्तर प्रदेश के खननं मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ  मीडिया पर हमला किये जाने की घटना को लेकर आज लखनऊ के सैकड़ो पत्रकारों ने हजरत गंज स्थित गांधी प्रतिमा पर एकत्र होकर अपनी एकजुटता का परिचय दिया। पत्रकारों ने साधना न्यूज़ चैनल के रिपोर्टरों और छायाकारों से मारपीट, उनका कैमरा तोड़े जाने के विरोध में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम अपना ज्ञापन  सिटी मजिस्ट्रेट को सौपते हुए प्रजापति की  बरखास्तगी की मांग की। इस बीच पता चला है कि हमलावरों पर तुरंत एफआईआर दर्ज न करने पर लखनऊ के एसएसपी को हटा दिया गया है।  
 
लखनऊ में मीडिया पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन करते पत्रकार
विरोध प्रदर्शनकारियों की मांग  है कि कैबिनेट मंत्री के  गुर्गो  विकास वर्मा और पिंटू सिंह पर मारपीट और जान से मरने की धमकी की धाराओ में मुकदमा पंजीकृत कर जल्द गिरफ्तारी की जाए। इस दौरान साधना न्यूज़ के चैनल हेड बृजमोहन सिंह  और उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी भी मौजूद रहे। हेमंत तिवारी ने कहा की प्रदेश में इस तरह के मंत्री सूबे की समाजवादी पार्टी की छवि को बिगाड़ने में लगातार लगे हैं। मुख्यमंत्री को ऐसे मंत्रियों को हटा देना चाहिए। 
 
बृजमोहन सिंह ने कहा कि अब तो सच कहना और लिखना बहुत ही मुश्किल हो गया है। ये कोई पहली घटना नहीं जिसमे रसूखदारों ने मीडिया को अपना निशाना बनाया हो। पिछले माह गोमतीनगर में मधुरिमा स्वीटस में कवरेज करने गए पत्रकारों से मारपीट और उनके खिलाफ मुकदमा, कुछ दिन पहले सच को दिखाने गए एक पत्रकार को क्लार्क  होटल में पिटाई के मामले के बाद अब पत्रकार अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अब न्यूज चैनल्स के पत्रकारों पर मारपीट कर फर्जी मुकदमे में फंसाये जाने की घटना इन रसूकदारो के लिए आम हो गयी है। हम सभी मीडिया कर्मी सूबे के इस मंत्री को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हटाये जाने की मांग करते हैं ताकि ये अन्य लोगो के लिए सीख रहे और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की गरिमा भी बनी रहे। 
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पत्रिकाएं भी नाटकों की तरह रेंत का घरौदाः लखनऊ से शुरू हुई ‘कला स्रोत’

लखनऊ : किसी भी नगर में एेसे अवसर कम ही होते हैं जब विभिन्न कला अभिव्यक्तियों के प्रसिद्ध व्यक्तित्व किसी एक समारोह में शरीक हों। यही कारण था कि लखनऊ से पत्रकार और कला समीक्षक आलोक पराड़कर के सम्पादन में संगीत, रंगमंच और कला पर आधारित त्रैमासिक पत्रिका ‘कला स्रोत’ के लोकार्पण के समारोह में जब कला, संगीत, रंगमंच और साहित्य की प्रतिभाएं एक सभागार में जुटीं तो एक-दूसरे से बातचीत में उन्हें यह कहते भी सुना गया कि आपका नाम और काम तो काफी सुना है लेकिन भेंट आज पहली बार हो रही है। यही कारण भी था कि पूरे समारोह में कलाओं के बीच संवाद और अन्तरसम्बन्ध की चर्चा होती रही और यह शिकायत भी खूब हुई कि कलाकार दूसरी कलाओं में रुचि नहीं लेते। 

समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध रंगकर्मी और फिल्मकार रंजीत कपूर ने कहा कि मुझे यह हमेशा शिकायत रही है कि एक कला अभिव्यक्ति से जुड़े लोग दूसरी कलाओं में रुचि नहीं लेते। पेण्टिंग के लोग नाटक में नहीं जाते, नाटक के लोग संगीत में नहीं जाते, यहां तक कि कथक से जुड़े लोग भरतनाट्यम देखने नहीं जाते, हिन्दी के लोग उर्दू की रचनाओं में रुचि नहीं लेते। उन्होंने कहा कि मेरी माता किराना घराना की गायिका थीं। मैं कथक देखने जाता था, कला प्रदर्शनियां देखता था, इन सारी बातों ने मेरे रंगकर्म को सींचा और संवारा। जाने भी दो यारों,  कभी हां कभी ना’, ‘लीजेण्ड आफ भगत सिंह’, ‘बैण्डिट क्वीन’ सहित कई लोकप्रिय फिल्मों के संवाद एवं पटकथा लेखक और ‘चिण्टू जी’ के बाद हाल में ही ‘जय हो डेमोक्रेसी’ फिल्म का निर्देशन करने वाले कपूर ने कला स्रोत पत्रिका की प्रशंसा करते हुए उम्मीद जतायी कि यह एक एेसा मंच होगा जहां विभिन्न कला अभिव्यक्तियों के बीच संवाद और अन्तरसम्बन्ध स्थापित हो सकेगा। उन्होने कहा कि इस बात से परेशान होने की जरूरत नहीं है कि पत्रिकाएं थोड़े अन्तराल के बाद बन्द हो जाती हैं। उन्होंंने कहा कि पत्रिकाएं हो या नाटक, हम तो रोज रेत की घरौंदे बनाते हैं। ये घरौंदे गिर भी जाय तो भी हम अपना काम कर चुके होते हैं। हमारा उद्देश्य है कि लोगों को जागरूक करें और अपने अल्प जीवन में पत्रिका और नाटक यह काम कर जाती हैं। वरिष्ठ रंग अध्येता कुंवर जी अग्रवाल ने भी अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि कलाएं एक दूसरे से प्रेरणा ग्रहण करती हैं। नाटकों में चित्रकला और संगीत का प्रभाव ग्रहण करती हैं। 
प्रसिद्ध साहित्यकार शिवमूर्ति ने अपने खास अन्दाज में कहा कि एेसी पत्रिकाएं होंगी तो उन कलाओं से परिचित होने का अवसर मिल सकेगा जिनके बारे में हमारी जानकारी कम है। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि कलाओं पर आधारित पत्रिकाएं काफी कम हैं तो ‘तद्भव’ के सम्पादक अखिलेश ने कहा कि कलाओं पर उस अधिकार के साथ नहीं लिखा जा पाता है जैस कभी दिनमान में लिखा जाता है। उर्दू के प्रसिद्ध कहानीकार एवं पत्रकार आबिद सुहैल ने कहा कि किसी पत्रिका को लम्बे समय तक निकाल पाना मुश्किल होता है। कला महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य एवं प्रसिद्ध चित्रकार जयकृष्ण अग्रवाल ने कहा कि कला समीक्षकों के साथ ही कलाकारों से भी लेखन कराने की कोशिश की जानी चाहिए। भारतेन्दु नाट्य अकादमी के पूर्व निदेशक एवं प्रसिद्ध रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने कहा कि आज पत्र-पत्रिकाओं में नाटकों की रिपोर्ट छपती है, समीक्षाएं नहीं। 
 पत्रिका का सम्पादन कर रहे पत्रकार एवं कला समीक्षक आलोक पराड़कर ने कहा कि बाजार की दखल के साथ कलाओं में भी एक छद्म वातावरण बन रहा है। चिन्तनपरक , गंभीर, शोधपूर्ण लेखन सार्थक और सरोकारपूर्ण कार्यों की कसौटी बन सकता है। समारोह में बड़ी संख्या में नगर के साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों की उपस्थिति रही। कुलश्रेष्ठ के अतिरिक्त  जुगुल किशोर, मृदुला भारद्वाज,  राजेश कुमार, विजय तिवारी, गोपाल सिन्हा, अंशु टण्डन जैसे रंगकर्मियों, जयकृष्ण अग्रवाल के अतिरिक्त योगेन्द्र नाथ योगी, शरद पाण्डेय, एन.खन्ना, पंकज गुप्ता,  शेफाली भटनागर जैसे चित्रकारों, प्रसिद्ध छायाकार अनिल रिसाल सिंह, रवि कपूर, आजेश जायसवाल, राज्य ललित कला अकादमी की पूर्व सचिव वीना विद्यार्थी, ‘लमही’ पत्रिका के सम्पादक विजय राय, लेखिका सुशीला पुरी, लखनऊविद् रवि भट्ट, गायक अग्निहोत्री बन्धु, कथक नृत्यांगना सुरभि सिंह सिंह, अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक वाई.पी.सिंह,. लखनऊ बुक क्लब के मस्तो, परमेश अग्रवाल, हिमांशु वाजपेयी, विनीता कुमारी शेखावत, कलम विचार मंच के दीपक कबीर, लखनऊ पुस्तक मेला के आयोजक देवराज अरोड़ा, सर्वोदय प्रकाशन के नीरज अरोड़ा, राज सिलवानों सहित कई प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों, कलाकारों ने समारोह में शिरकत की। पत्रिका का प्रकाशन करने वाले कला स्रोत कला केन्द्र  निदेशक अनुराग डिडवानिया और मानसी डिडवानिया ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस पत्रिका के साथ कला स्रोत की गतिविधियों को नया विस्तार मिल रहा है। कला अभिव्यक्तियों पर विचार विमर्श का दायरा इस पत्रिका के माध्यम से दूसरे नगरों तक फैलेगा। 
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पुलिस से झड़प, रिहाई मंच ने सड़क पर किया यूपी सरकार के खिलाफ सम्मेलन

लखनऊ : रिहाई मंच ने प्रदेश सरकार द्वारा रोके जाने के बावजूद भारी पुलिस बल की मौजूदगी व उससे झड़प के बाद हाशिमपुरा जनसंहार पर सरकार विरोधी सम्मेलन गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल अमीनाबाद, लखनऊ के सामने सड़क पर किया। 

लखनऊ में सड़क पर रिहाई मंच का सम्मेलन

मंच ने कहा कि इंसाफ किसी की अनुमति का मोहताज नहीं होता और हम उस प्रदेश सरकार जिसने हाशिमपुरा, मलियाना, मुरादाबाद समेत तारिक कासमी मामले में नाइंसाफी किया है उसके खिलाफ यह सम्मेलन कर सरकार को आगाह कर रहे हैं कि इंसाफ की आवाज अब सड़कों पर बुलंद होगी। पुलिस द्वारा गिरफ्तारी कर मुकदमा दर्ज करने की धमकी देने पर मंच ने कहा कि हम इंसाफ के सवाल पर मुकदमा झेलने को तैयार हैं। बाद में प्रशासन पीछे हटा और मजिस्ट्रेट ने खुद आकर रिहाई मंच का मुख्यमंत्री को संबोधित 18 सूत्रीय मांगपत्र लिया। ईद के दिन 1980 में मुरादाबाद के ईदगाह में 284 लोगों के कत्लेआम की घटना के पीडि़त लोग व हकीम तारिक कासमी के परिजन मोहम्मद असलम भी सम्मेलन में शामिल हुए।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि सपा सरकार के रोकने की कोशिशों के बाद भी आज हाशिमपुरा जनसंहार पर सड़क पर सम्मेलन कर हमने जनआंदोलनों की प्रतिरोध की संस्कृति को बरकरार रखते हुए देश में लोकतंत्र को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से आज 28-35 साल बाद हाशिमपुरा, मलियाना और मुरादाबाद के वो लोग जिन्हें इन सरकारों ने न्याय नहीं दिया को अपनी बात रखने से रोकने की कोशिश की है उससे साफ हो जाता है कि अखिलेश सरकार इंसाफ तो नहीं देना चाहती बल्कि हत्यारों को बचाने का हर संभव प्रयास भी कर रही है। उन्होंने कहा कि हाशिमपुरा, मलियाना, मुरादाबाद से लेकर तारिक कासमी तक के साथ हुए नाइंसाफी के खिलाफ रिहाई मंच प्रदेश व्यापी इंसाफ यात्रा करेगा।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि रिहाई मंच के इस सम्मेलन को रोककर सपा सरकार ने साबित कर दिया है कि वह संघ परिवार के एजेंण्डे पर काम कर रही है। वह किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों का सवाल नहीं उठने देना चाहती। वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि यहां मौजूद लोगों ने साबित कर दिया है कि जम्हूरियत और इंसाफ को बचाने के लिए लोग सड़क पर उतरने को तैयार हैं। यह सरकार के लिए चेतावनी है कि अगर उसने हाशिमपुरा, मलियाना, मुरादाबाद और तारिक कासमी को इंसाफ नहीं दिया तो यह जन सैलाब बढ़ता ही जाएगा। सम्मेलन में बाधा पहुंचाने वाले पुलिस प्रशासन को चेतावनी देते हुए सामाजिक न्याय मंच के अध्यक्ष राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि सरकार इस भ्रम में न रहे कि वह इंसाफ के इस अभियान को पुलिस-पीएसी लगाकर रोक देगी।

झारखंड से आए मानवाधिकार नेता मुन्ना झा ने कहा कि रिहाई मंच मुल्क में नाइंसाफियों के खिलाफ एक आजाद खयाल लोकतंत्र को स्थापित करने की मुहिम है। उन्होंने कहा कि ठीक इसी तरह रिहाई मंच को मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीडि़तों की जनसुनवाई से रोका गया था, उस वक्त भी मंच ने सरकार के मंसूबे को ध्वस्त किया था और आज भी किया है। जन सम्मेलन में मुरादाबाद में 1980 में हुए कत्लेआम जिसमें पुलिस ने 284 लोगों को कत्ल कर दिया और एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ के पीडि़त मुफ्ती मोहम्मद रईस अशरफ ने कहा कि 35 साल बीत जाने के बाद भी इस घटना की जांच के लिए गठित डीके सक्सेना जांच आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने जारी नहीं किया जिससे साफ हो जाता है कि सरकार इस मामले में इंसाफ नहीं करना चाहती और इस सवाल पर कोई बात करने देना चाहती है। कानपुर से आए एखलाक चिश्ती और मो0 यूसूफ ने कहा कि सपा सरकार ने कानपुर दंगों पर जांच के लिए गठित माथुर आयोग की रिपोर्ट को भी दोषी पुलिस अधिकारियों को बचाकर रखी है।

उन्होंने कहा कि इस इंसाफ की लड़ाई में वे सब रिहाई मंच के साथ हैं। जनसम्मेलन को अतहर हुसैन, बृजबिहारी, ऊषा राय, हाजी फहीम सिद्दीकी, किरन सिंह, सैयद वसी, आईएनएल की पुष्पा बालमीकि, शिवनारायण कुशवाहा, मो0 अहमद हुसैन, मो0 आफाक, अंबेडकर कांग्रेस के फरीद खान, रामकृष्ण, ओपी सिन्हा, जनचेतना से कात्यायनी, सत्यम वर्मा, मो0 मसूद, मो0 शमी, एसआईओ के साकिब, कल्पना पाण्डे, अनिल यादव, लक्ष्मण प्रसाद, शाहनवाज आलम ने संबोधित किया। जनसम्मेलन मे प्रमुख रुप से शकील कुरैशी, रफीक सुल्तान, अब्दुल हलीम सिद्दीकी, भगवान स्वरुप कटियार, सुमन गुप्ता, कौशल किशोर, अजय शर्मा, तारिक शफीक, इनायतउल्लाह खान, जैद अहमद फारुकी, सैफ बाबर, जियाउद्दीन, रवि चैधरी, शाहआलम, एहसानुल हक मलिक, इरफान सिद्दीकी, आदियोग, धर्मेन्द्र कुमार, मुरादाबाद से आए सलीम बेग, हाफिज शाहिद, मौलाना इमदाद हुसैन, मौलाना मो0 शफीक, फैजान मुसन्ना शामिल हुए। संचालन राजीव यादव ने किया। 

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मंजुनाथ फैसले का स्वागत, पद्म विभूषण की मांग

लखनऊ : आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने आईआईएम लखनऊ के पूर्व छात्र और पारदर्शिता से काम करने वाले व्यक्ति के रूप में मंजुनाथ मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हार्दिक स्वागत किया है। साथ ही उन्होंने पारदर्शिता के क्षेत्र में उनके द्वारा स्थापित उच्चतम आदर्शों के मद्देनज़र मंजुनाथ और सत्येन्द्र दुबे के लिए द्वितीय सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण की मांग की है। 

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गायत्री प्रजापति धमकी के एफआईआर में लखनऊ पुलिस ने किया खेल

मुझे और मेरे पति पति आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को एक कथित टीवी पत्रकार द्वारा दी गयी धमकी में दी गयी शिकायत पर गोमतीनगर थाने में पूरी तरह गलत तरीके से एफआईआर दर्ज की गयी है. मेरे प्रार्थनापत्र के अनुसार मामला 506 आईपीसी तथा 66ए आईटी एक्ट 2000 का संज्ञेय अपराध बनता है लेकिन थानाध्यक्ष ने इसे सिर्फ धारा 507 आईपीसी के असंज्ञेय अपराध में दर्ज किया. आम तौर पर धमकी देने पर 506 आईपीसी का अपराध होता है जबकि 507 आईपीसी तब होता है जब कोई आदमी अपना नाम और पहचान छिपाने की सावधानी रख कर धमकी देता है.

एक निश्चित मोबाइल नंबर से दी गयी धमकी कभी भी अनाम नहीं मानी जा सकती क्योंकि इसे आसानी से ट्रेस किया जा सकता है. संज्ञेय अपराध में पुलिस स्वयं विवेचना और गिरफ़्तारी करती है जबकि असंज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही विवेचना या गिरफ़्तारी होती है. अतः मैंने पुलिस द्वारा जानबूझ कर मामले को ठन्डे बस्ते में डालने का आरोप लगाते एसएसपी लखनऊ को मुकदमे को सही धाराओं में दर्ज कर उसकी विवेचना कराने के लिए प्रार्थनापत्र दिया है ताकि प्रदेश के एक मंत्री से जुड़े इस मामले में सच्चाई सामने आ सके.

डॉ नूतन ठाकुर
# 094155-34525

सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
लखनऊ
विषय- एनसीआर संख्या 0001/2015 धारा 507 आईपीसी विषयक
महोदय,

निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या-NT/Complaint/40 दिनांक- 04/01/2015 के माध्यम से थानाध्यक्ष, थाना गोमतीनगर को दिनांक 03/01/2014 को मेरे पति आईपीएस अफसर श्री अमिताभ ठाकुर तथा मेरे मोबाइल पर फोन नंबर 093890-25750 द्वारा अपने आप को किसी टीवी चैनेल का पत्रकार कोई श्री मिश्रा बताते हुए मुझे श्री गायत्री प्रजापति मामले से अलग हो जाने की धमकी के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज करने को एक प्रार्थनापत्र दिया था.

कल दिनांक 05/01/2015 को समय लगभग 21.10 बजे रात्रि थाने जाने पर मुझे इस एफआईआर की प्रति प्राप्त हुई. अभिलेखों के अनुसार यह एफआईआर दिनांक 04/01/2015 को समय 21.45 धारा 155 सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत मु०अ०स० 0001/2015 धारा 507 आईपीसी में दर्ज हुआ. (एफआईआर की प्रति संलग्न) निवेदन करुँगी कि धारा 507 आईपीसी एक असंज्ञेय अपराध है जिसमे पुलिस धारा 155(2) सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश के विवेचना नहीं कर सकती और धारा 2(घ) सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती.

उपरोक्त से स्पष्ट है कि मेरी शिकायत पर जो अभियोग पंजीकृत हुआ है उसकी विवेचना अब तभी होगी जब मैं अथवा पुलिसवाले इसके लिए मा० न्यायालय से अनुमति लें. यह भी लगभग स्पष्ट है कि पुलिसवाले इसके लिए अनुमति लेने से रहे, ऐसे में यह मुझसे ही अपेक्षित हुआ कि मैं मा० न्यायालय जाऊं और अनुमति प्राप्त करूँ.  इसके विपरीत सत्यता यह है कि मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र असंज्ञेय अपराध धारा 507 आईपीसी की श्रेणी में आता ही नहीं है बल्कि यह धारा 506 आईपीसी के अधीन आता है. मैं इसके लिए इन दोनों धारा को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ.

धारा 507- Criminal intimidation by an anonymous communication.—Whoev­er commits the offence of criminal intimidation by an anonymous communication, or having taken precaution to conceal the name or abode of the person from whom the threat comes, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, in addition to the punishment provided for the offence by the last preceding section.

धारा 506- Punishment for criminal intimidation.—Whoever commits, the offence of criminal intimidation shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both; If threat be to cause death or grievous hurt, etc.—And if the threat be to cause death or grievous hurt, or to cause the destruction of any property by fire, or to cause an offence punishable with death or 1[imprisonment for life], or with imprisonment for a term which may extend to seven years, or to impute, unchastity to a woman, shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to seven years, or with fine, or with both.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि धारा 507 आईपीसी अनाम संसूचना अथवा धमकी देने वाले व्यक्ति द्वारा अपना नाम या निवास छिपाने की पूर्व सावधानी बरतने पर लगाया जाता है. इसका अर्थ हुआ कि यह धारा तब लगेगी जब आपराधिक अभित्रास करने वाला व्यक्ति अपना नाम, पता, अपनी पहचान छिपाने का उपक्रम करे. जिस मामले में व्यक्ति ने एक ज्ञात फोन नंबर (जिसे शिकायत में लिखा गया है) से फोन किया वह किसी भी स्थिति में अनाम या पहचान छिपाने का मामला नहीं हो सकता क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि आज के टेक्नोलॉजी युग में तत्काल ही किसी भी नंबर से उसके धारक, धारक के सिम नंबर, आईएमई नंबर, उसके पता आदि की तत्काल जानकारी हो जाती है और यह बात आज के समय हर कोई जानता है. ऐसे में ज्ञात फोन नंबर से किये गए फोन को अनाम व्यक्ति अथवा पता, नाम छिपाने के साथ किया गया अपराध किसी भी सूरत में नहीं माना जा सकता. यह बात इतना सर्वज्ञात है कि यह किसी भी स्थिति में नहीं माना जा सकता कि थानाध्यक्ष गोमतीनगर को यह नहीं मालूम है. अतः प्रथमद्रष्टया ही लगाई गयी धारा पूरी तरह गलत है जो बात कोई भी समझ सकता है. इतना ही नहीं, तहरीर के अनुसार उस व्यक्ति ने अपना एक नाम भी बताया था जो मिश्रा जी लिखा हुआ है. साथ ही उसमे यह भी लिखा है कि उस व्यक्ति ने खुद को टीवी पत्रकार बताया. जब एक व्यक्ति अपना मोबाइल नंबर दे रहा है, अपना नाम बता रहा है, अपनी आइडेंटिटी बता रहा है तो वह धारा 507 आईपीसी में कैसे हुआ? जाहिर है कि थानाध्यक्ष द्वारा यह धारा गलत लगाई गयी है और मेरा यह खुला आरोप है कि उनके द्वारा यह जानबूझ कर आरोपी को बचाने के लिए किया गया है.

ऐसा इसीलिए क्योंकि दोनों धारा में दंड सामान है- 2 वर्ष, पर इन दोनों में एक बहुत बड़ा अंतर है. वह यह कि धारा 507 आईपीसी असंज्ञेय अपराध है और दिनांक 02/08/1989 को उत्तर प्रदेश गज़ट में प्रकाशित शासनादेश संख्या 777/VIII-9-4(2-(87) दिनांक 31/07/1989 के अनुसार धारा 506 आईपीसी उत्तर प्रदेश में संज्ञेय अपराध घोषित किया जा चुका है. थानाध्यक्ष को ज्ञात है कि इस धारा में विवेचना नहीं होगी और कोई पूछताछ नहीं होने के कारण यह मामला यहीं रुक जाएगा और ठप्प हो जाएगा. मैं यह आरोप इसीलिए भी लगा रही हूँ कि मेरी जानकारी के अनुसार यह धारा शायद ही किसी मामले में लगाई जाती हो पर यहाँ यह मात्र मामले को असंज्ञेय बनाए के लिए लगाई गयी. मैं यह बात इस आधार पर भी कह रही हूँ कि कल रात जब मैंने थानाध्यक्ष से फोन पर पूछा था कि दिए गए नंबर पर कॉल कर देखा गया है कि किसका फोन है तो उन्होंने बहुत रूखेपन से कहा था कि यह उनका काम नहीं है.

स्पष्ट है कि एफआईआर में मोबाइल नंबर, एक नाम और एक आइडेंटिटी होने के बाद भी बिना उस पर फोन किये, बिना उसकी कोई जानकारी लिए, बिना कोई प्रयास किये  अपने स्तर से ही उसे अनाम या अपनी पहचान छिपाने के लिए किया गया अपराध बताना सीधे-सीधे दोषियों को बचाना और यह जानते हुए कि असंज्ञेय अपराध की विवेचना नहीं होती मामले को जस का तस दफ़न करने का प्रयास है.

निवेदन करुँगी कि यह मामला मात्र धारा 506 आईपीसी का अपराध ही नहीं है बल्कि धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 का भी अपराध है. मैं यह धारा आपके सम्मुख रखना चाहूंगी “Punishment for sending offensive messages through communication service, etc- Any person who sends, by means of a computer resource or a communication device,—(a) any information that is grossly offensive or has menacing character; or (b) any information which he knows to be false, but for the purpose of causing annoyance, inconvenience, danger, obstruction, insult, injury, criminal intimidation, enmity, hatred or ill will, persistently by making use of such computer resource or a communication device,(c) any electronic mail or electronic mail message for the purpose of causing annoyance or inconvenience or to deceive or to mislead the addressee or recipient about the origin of such messages,shall be punishable with imprisonment for a term which may extend to three years and with fine. Explanation.— For the purpose of this section, terms “electronic mail” and “electronic mail message” means a message or information created or transmitted or received on a computer, computer system, computer resource or communication device including attachments in text, images, audio, video and any other electronic record, which may be transmitted with the message”
आईटी एक्ट की धारा 2 (1) (ha) के अनुसार “Communication Device” means Cell Phones, Personal Digital Assistance or combination of both or any other device used to communicate, send or transmit any text, video, audio, or image.

उपरोक्त तथ्यों से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि मोबाइल फ़ोन के मामले में criminal intimidation (आपराधिक अभित्रास) धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के तहत अपराध है, जो पुनः संज्ञेय अपराध है. लेकिन थानाध्यक्ष ने इस धारा को भी इस मामले में नहीं लगाया है जो इनकी जानबूझ कर की गयी गलती प्रतीत होती है.

उपरोक्त तथ्यों के दृष्टिगत न्याय के हित में आपसे निवेदन है कि आप तत्काल मामले को सही धाराओं धारा 506 आईपीसी तथा धारा 66ए, आईटी एक्ट  2000 में तरमीम कराते हुए इस मामले की निष्पक्ष विवेचना कराने की कृपा करें. निवेदन करुँगी कि यह प्रकरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से श्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के नाम से जुड़ा है जो वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं और यह मामला मेरे और मेरे पति की सुरक्षा के भी जुड़ा है अतः इस पर यथेष्ट गंभीरता से ध्यान देने की कृपा करें ताकि यह सन्देश न जाए कि विवेचना से बचने का कोई प्रयास हो रहा है और जानबूझ कर मामले को दबाया जा रहा है.

पत्र संख्या-NT/Complaint/40                               
दिनांक- 06/01/2015
भवदीया,                                                     
(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है, अब आप आसानी से गिन सकते हैं

Abhishek Srivastava : मुझे इस बात की खुशी है कि रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरोध से शुरू हुई फेसबुकिया बहस, बनारस के ‘संस्‍कृति’ नामक आयोजन के विरोध से होते हुए आज Vineet Kumar के सौजन्‍य से Samvadi- A Festival of Expressions in Lucknow तक पहुंच गई, जो दैनिक जागरण का आयोजन था। आज ‘जनसत्‍ता’ में ‘खूब परदा है’ शीर्षक से विनीत ने Virendra Yadav के 21 दिसंबर को यहीं छपे लेख को काउंटर किया है जो सवाल के जवाब में दरअसल खुद एक सवाल है। विनीत दैनिक जागरण के बारे में ठीक कहते हैं, ”… यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।”

अच्‍छा होता यदि विनीत अपनी बात को वीरेंद्र यादव (और कहानीकार अखिलेश भी) तक सीमित न रखकर उन सब ”लोगों” के नाम गिनवाते जो ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन में होकर आए हैं। हो सकता है विनीत को सारे नाम न पता हों या वे भूल गए हों, लेकिन इस छोटी सी भूल के चलते उनके लेख का मंतव्‍य बहुत ”निजी” हो जा रहा है और ऐसा आभास दे रहा है मानो वे बाकी लोगों को बचा ले जाना चाह रहे हों। बहरहाल, उनकी बात बिलकुल दुरुस्‍त है और आज का उनका लेख ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन के क्रिएटिव कंसल्‍टेंट Satyanand Nirupam को तो सीधे कठघरे में खड़ा करता ही है। उसके अलावा Piyush Mishra, Swara Bhaskar, Prakash K Ray, Rahat Indori, Waseem Bareillvy, Munawwar Rana, malini awasthi, बजरंग बिहारी तिवारी, शिवमूर्ति समेत ढेर सारे लोगों को विनीत कुमार फासीवाद का साझीदार करार देते हैं जो लखनऊ के ‘संवादी’ में गए थे या जिन्‍होंने जाने की सहमति दी थी।

अब आप आसानी से गिन सकते हैं कि रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है। सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि इस आपसदारी में कहीं कोई खेद नहीं है, क्षमा नहीं है, अपराधबोध नहीं है और छटांक भर शर्म भी नहीं है। ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर जवाब दिए जा रहे हैं। अपनी-अपनी सुविधा से खुद को और अपने-अपने लोगों को बख्‍श दिया जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसके हाथ में खेल रहा है। सच कहूं, मुझे तो कांग्रेस फॉर कल्‍चरल फ्रीडम के पढ़े-सुने किस्‍से अब याद आने शुरू हो गए हैं। इस नाम को गूगल पर खोजिएगा, मज़ा आएगा।

मीडिया विश्लेषक और सरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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वाह रे लखनऊ पुलिस! : जो लड़की को बचा रहा था उसे एएसपी पर फायरिंग का आरोपी बना दिया

हमने हजरतगंज, लखनऊ में एएसपी दुर्गेश कुमार पर हुए कथित फायरिंग मामले में अपने स्तर पर जांच की. हमने आरोपी पुलकित के घर जाकर उसके पिता राम सुमिरन शुक्ला, माँ सावित्री शुक्ला, भाई पीयूष शुक्ला तथा अन्य परिचितों से मुलाकात की. इन लोगों ने बताया कि घटना प्रोवोग शॉप के पास हुई जिसमें परिचित लड़की को छेड़े जाते देख पुलकित और साथियों ने बीच-बचाव किया.

तभी पुलिस आ गयी और आपाधापी में बिना समझे पुलकित का एएसपी पर हाथ चल गया. फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया और थाने पर काफी मारा-पीटा गया. यह भी बताया कि गिरफ्तारी की सूचना अगले दिन 11.00 बजे दी गयी. उस रात भी वह लड़की थाना गयी थी पर पुलिस ने उसे भगा दिया था. उन्होंने कहा कि यदि प्रोवोग शॉप के पास के सीसीटीवी फुटेज ले लिए जाएँ तो पूरी बात खुदबखुद साफ़ हो जायेगी. पुलकित के पिता ने स्थानीय पुलिस पर कोई विश्वास नहीं रहने के कारण इसकी विवेचना सीबी-सीआईडी से करवाने की मांग की.

हमने एफआईआर तहरीर और गिरफ़्तारी प्रमाणपत्र देखा. इसमें फायरिंग का उल्लेख है जबकि ना कोई हथियार नहीं मिला और ना खोखा आदि. अतः हमने प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को पत्र लिख कर मामले की सीबी-सीआईडी जांच कराने और दस दिनों में मामले की प्रशासनिक जांच किसी सचिव स्तर के अधिकारी से कराने की मांग की है.

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- थाना हजरतगंज पर एएसपी और पुलिस पर हुए कथित फायरिंग मामले में श्री पुलकित की गिरफ़्तारी विषयक

महोदय,

पिछले कुछ दिनों से थाना हजरतगंज, जनपद लखनऊ में 23/11/2014 एएसपी श्री दुर्गेश कुमार पर श्री पुलकित शुक्ला तथा तीन अन्य द्वारा फायरिंग करने की घटना के विषय में कई प्रकार की बातें लिखी जा रही थीं. हम अमिताभ और नूतन ठाकुर ने इस सम्बन्ध में दिन भर गहराई से मामले की अपने स्तर पर जांच की. हमने इसके लिए पुलकित के 5/25, 5ई, वृन्दावन कॉलोनी स्थित निवास स्थान भी गए जहां हमें उनके पिता श्री राम सुमिरन शुक्ला (फोन नंबर 098385-78971), माँ सुश्री सावित्री शुक्ला, भाई श्री पियूष शुक्ला (फोन नंबर 098391-30012), मामा बद्री प्रसाद शुक्ला पुत्र श्री महेश नारायण,  719, सीतापुर रोड महायोजना, निकट महादेव रोड, (फोन नंबर #098391-72505) तथा परिचित श्री ए के मिश्रा पुत्र श्री एस पी मिश्रा, 2ए/287, वृन्दावन कॉलोनी (फोन नंबर # 097951-67623 ), श्री आशुतोष ओझा पुत्र श्री गया प्रसाद ओझा, 5 ई, 3/24, वृन्दावन कॉलोनी तथा श्री राजेश कुमार पुत्र श्री दुर्गा प्रसाद, 5ई, 1/225, वृन्दावन कॉलोनी (फोन नंबर # 074088-10980) मिले.

इनमे श्री पुलकित के पिता श्री राम सुमिरन, भाई श्री पियूष, माँ सुश्री सावित्री श्री पुलकित से उनकी गिरफ़्तारी के बाद मिल चुके थे. उन्होंने हमें यह बताया कि श्री पुलकित का कहना है कि यह पूरी घटना हज़रातगंज से थोड़ी दूर पर स्थित Provogue शॉप के पास हुआ. घटना मूल रूप से यह हुई कि एक लड़की, जो उनकी परिचित थी, को कुछ अज्ञात लड़के छेड़ रहे थे, जिस पर इन लोगों ने बीच-बचाव किया जिसके बाद इनमे आपसी कहासुनी शुरू हो गयी. इतने में पुलिस आ गयी और उनमे एक ने श्री पुलकित पर हाथ चलाया. श्री पुलकित यह समझ नहीं पाए कि ऐसा किसने किया और उनका हाथ भी अकस्मात उठ गया. उसने कत्तई जानबूझ कर पुलिस पर हाथ नहीं उठाया था. जैसे ही उसे मालूम हुआ कि उन्होंने गलती से एएसपी साहब पर हाथ चला दिया है, वह एकदम से घबरा गया. फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. उसने यह भी बताया कि उसे थाने पर काफी मारा-पीटा गया. उसने यह भी कहा कि यदि Provogue शॉप के पास के सीसीटीवी कैमरों के फूटेज ले लिए जाएँ तो पूरी बात खुदबखुद साफ़ हो जायेगी.

श्री राम सुमिरन से बताया कि उन्हें अपने बेटे की गिरफ़्तारी की सूचना दिनांक 24/11/2014 को लगभग 11.00 बजे हजरतगंज थाने के किसी तिवारी जी ने उनके मोबाइल पर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि श्री पुलकित ने कहा कि उसे थाने में बहुत मारा गया. इन लोगों ने यह भी बताया कि उस रात भी वह लड़की स्वयं थाना हजरतगंज गयी थी पर पुलिस ने उसे थाने से भगा दिया था.

हमने इस सम्बन्ध में लड़की से भी उसके मोबाइल नंबर पर बात की और उससे मिलना चाहा पर लड़की ने शायद घबराहट के कारण हमसे मिलने में हिचक दिखाई. लेकिन हमें उस लड़की द्वारा प्रमुख सचिव गृह को दिया प्रार्थनापत्र मिला जिसमे उन्होंने दिनांक 23/11/2014  को शाम की पूरी घटना स्वयं बतायी. उसने बताया कि गिरफ्तार श्री पुलकित आदि उसकी मदद कर रहे थे, ना कि उससे छेड़छाड़. उसने यह भी लिखा है कि पुलिस के अफसर सादे में थे जिनसे श्री पुलकित से झड़प हो गयी. हमने कल हजरतगंज थाने पर आ कर बयान देने वाले श्री विशाल तिवारी से उनके फोन नंबर 097944-15703 पर कई बार फोन किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया.

हमने गोपनीय स्तर पर इस मामले के जानकार कई लोगों से बात की. हमने इस मामले में पंजीकृत एफआईआर संख्या 592/2014 धारा 307/354/ख/354घ आईपीसी का तहरीर और गिरफ़्तारी प्रमाणपत्र देखा. इनके अनुसार दिनांक 23/11/2014 को समय 19.40 शाम गिरफ़्तारी हुई है. एफआईआर में फायरिंग का उल्लेख हुआ जबकि अन्य किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार के फायरिंग की कोई बात सामने नहीं आई है. गिरफ़्तारी के फर्द से भी स्पष्ट है कि गिरफ्तार व्यक्ति के पास से कोई हथियार नहीं मिला. यह भी स्पष्ट है कि हथियार के अलावा कोई खोखा आदि भी मौके पर नहीं मिला. गिरफ़्तारी के फर्द में मा० उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार तत्काल गिरफ़्तारी की सूचना परिजनों को देने की बात कही गयी.

श्री पुलकित के पिता श्री राम सुमिरन ने हमें लिखित रूप से एक प्रार्थनापत्र दे कर सभी बातें लिखते हुए बताया कि उन्हें अब स्थानीय पुलिस पर कोई विश्वास नहीं रह गया है और उन्होंने हमें मामले की विवेचना सीबी-सीआईडी से करवाने में मदद करने की प्रार्थना की. उपरोक्त के दृष्टिगत निम्न तथ्य आवश्यक प्रतीत होते हैं-

1. चूँकि मामला लखनऊ पुलिस के एएसपी से सम्बंधित है, अतः इसमें स्थानीय पुलिस की जगह निश्चित रूप से सीबी-सीआईडी से विवेचना कराया जाना प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से अनिवार्य प्रतीत होता है

2. विवेचना तत्काल/अविलम्ब सीबी-सीआईडी को दिया जाना न्याय की दृष्टि से अपरिहार्य प्रतीत होता है

3. इस पूरे मामले की प्रशासनिक जांच दस दिन के निश्चित समयावधि में शासन के किसी प्रमुख सचिव/सचिव स्तर के अधिकारी से अलग से करवाने की आवश्यकता प्रतीत होती है

अतः आपसे निवेदन है कि उपरोक्त बिंदु संख्या एक से तीन पर प्रस्तुत तीनों अनुरोधों को स्वीकार करते हुए तदनुसार आदेश निर्गत करने की कृपा करें

डॉ नूतन ठाकुर                          
अमिताभ ठाकुर
मोबाइल: 094155-34525 और 94155-34526
पता: 5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
प्रतिलिपि- पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

 

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हिन्दी दैनिक जन माध्यम के मुख्य सम्पादक और पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद का फर्जीवाड़ा

: जन माध्यम के तीन संस्करण चलाते हैं मंजूर अहमद : दूसरे की जमीन को अपने गुर्गे के जरिए बेचा, खुद बने गवाह : ताला तोड़कर अपने पुत्र के मकान पर भी कराया कब्जा, पुलिस नहीं कर रही मुकदमा दर्ज : लखनऊ, पटना व मेरठ से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जन माध्यम मुख्य सम्पादक, 1967 बैच के सेवानिवृत्त आई0पी0एस0 अधिकारी एवं लखनऊ के पूर्व मेयर एवं विधायक प्रत्याशी प्रो0 मंजूर अहमद पर अपने गुर्गे के जरिए दूसरे की जमीन को बेचने व खुद गवाह बनने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। प्रो0 मंजूर अहमद के इस फर्जीवाड़े का खुलासा खुद उनके पुत्र जमाल अहमद ने किया।

जमाल अहमद ने बताया कि अपनी नौकरी के दौरान मंजूर अहमद ने अरबों रूपयों की नामी-बेनामी सम्पत्ति बनाई है। लखनऊ के नजदीक जनपद बाराबंकी, कुर्सी रोड के ग्राम गुग्गौर में मंजूर अहमद ने अपने सगे भांजे मों0 निजामुद्दीन पुत्र एनुलहक निवासी खालिसपुर जिला सीवान बिहार, जो ड्रग्स बेचने का धंधा करते थे, कई साल तिहाड़ जेल में बंद रहे, के नाम ग्राम गुग्गौर में गाटा सं0 385 क्षेत्रफल 1.481 हेक्टेयर भूमि खरीदी। मों0 निजामुद्दीन का लोकल पता सी-189, इन्दिरानगर लखनऊ यानि मंजूर अहमद के अपने घर का पता लिखाया। इसी बेशकीमती करोड़ों-अरबों  की जमीन पर अब प्लाटिंग की जा रही है। इस जमीन को दिनांक 27.08.2013 को बही सं0 1, जिल्द सं0 3099, पृष्ठ सं0 347 से 400 क्रमांक 5881 पर रजिस्टर्ड किया गया है।

श्री मंजूर अहमद ने इस जमीन को धोखे से बेचा है एवं जालसाजी की है, जिस व्यक्ति को मंजूर अहमद ने मों0 निजामुद्दीन निवासी बिहार बताया है, वह कोई बहुरूपीया है एवं मंजूर अहमद का गुर्गा है, क्योंकि रजिस्ट्री में गवाह मंजूर अहमद स्वयं हैं। मों0 निजामुद्दीन ने स्वयं रजिस्ट्री नहीं की है, बल्कि उनके नाम से किसी फर्जी आदमी को खड़ा करके रजिस्ट्री की गई है। उप निबंधक कार्यालय में इस फर्जी निजामुद्दीन की डिजिटल फोटो व डिजिटल अंगूठे के निशान मौजूद हैं।  जमाल अहमद ने बताया कि उनके पिता ने तीन शादियां की एवं तीनों पत्नियां जीवित हैं, वह उनकी पहली पत्नी के पुत्र हैं। जमाल ने बताया कि उनके सगे नाना स्व0 खुर्शीद मुस्तफा जुबैरी बिहार कैडर के 1953 बैच के आई0ए0एस0 अधिकारी थे, उनकी मौत एक किराए के मकान में हुई थी, आज भी उनकी नानी, मां एवं उनकी अविवाहित बहन किराए के मकान (गौतम कालोनी, आशियाना नगर फेस-2, पटना) में ही रहते हैं।

जमाल ने बताया कि मंजूर अहमद अपनी हवस के चलते गैंग बनाकर आदतन अपराध करते हैं। दूसरे की सम्पत्ति पर कब्जा करना, व्यवधान डालना इनकी आदत है। जमाल ने बताया कि उनके मकान 1/140 विश्वास खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ पर भी मंजूर अहमद की नीयत खराब है। मकान का ताला तोड़कर श्री मंजूर अहमद, श्री यूसुफ अयूब व अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया, जिसके खिलाफ वह लगातार दिनांक 14.05.2014 से एफ़0आई0आर0 दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है।

इसी क्रम में उन्होंने दिनांक 28.10.2014 को महामहिम राज्यपाल महोदय, से मिलकर न्याय की गुहार लगाई थी। महामहिम जी ने अपने ए0डी0सी0 श्री गौरव सिंह, आई0पी0एस0 के माध्यम से एस0एस0पी0 लखनऊ को फोन कराकर जमाल के साथ न्याय करने के लिए कहा था। एस0एस0पी0 लखनऊ ने दिनांक 31.10.2014 को थानाध्यक्ष गोमती नगर, जहीर खान को फोन पर निर्देश दिए कि प्रकरण में एफ़0आई0आर0 दर्ज की जाए। थानाध्यक्ष गोमतीनगर ने उनके प्रार्थना पत्र को देखते ही कहा कि मंजूर साहब तो अच्छे अधिकारी रहे हैं, एफ़0आई0आर0 दर्ज होने से साहब की बड़ी बदनामी हो जाएगी। थानाध्यक्ष ने कहा कि वह एस0एस0पी0 साहब से बात कर लेंगे। एफ़0आई0आर0 दर्ज नहीं होने पर ही जमाल ने दिनांक 03.11.2014 को मुख्य सचिव उ0प्र0 से मुलाकात की, जिस पर उन्होंने प्रमुख सचिव गृह को कार्यवाही के निर्देश दिए। प्रकरण पर प्रमुख सचिव गृह ने स्वयं दिनांक 03.11.2014 को ही एस0एस0पी0 लखनऊ से वार्ता कर उनको न्याय देने की बात कही।

जमाल ने बताया कि अभी तक एफ0आई0आर0 इसलिए दर्ज नहीं हो सकी क्योंकि  उनके पिता मंजूर अहमद, आई0पी0एस0, ए0डी0जी0 उ0प्र0 के पद से रिटायर अधिकारी हैं, मंजूर अहमद लखनऊ से मेयर एवं विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं, कई विश्व विद्यालयों के कुलपति रह चुके हैं एवं वर्तमान में शुभार्ती वि0वि0 मेरठ के कुलपति हैं। उनके पिता के खास गुर्गे यूसुफ थाना क्षेत्र गोमतीनगर लखनऊ में ही जीरो डिग्री बार, रेस्टोरेन्ट व डिस्कोथेक चलाते है। इनकी दबंग छवि व बार आदि के चलते स्थानीय पुलिस से उनके अच्छे संबंध जगजाहिर हैं।

मंजूर अहमद किस हद तक सम्पत्ति के भूखे हैं, इसका अंदाजा इसी से होता है कि इन्होंने अपनी एक कोठी शेरवानी नगर, मडि़यांव, लखनऊ से ठीक सटे एक प्लाट दस हजार वर्ग फीट पर लिखा दिया कि प्लाट बिकाऊ नहीं है, ताकि लोग विवादित समझकर प्लाट न खरीदें। इनके पास एक मकान बी-102, वसुन्धरा इन्क्लेव दिल्ली में है। सी-189, इन्दिरा नगर, लखनऊ में मकान है, इसके अलावा कई सम्पत्तियां हैं। मंजूर अहमद के खास गुर्गे यूसुफ के पास लखनऊ में ही करोड़ों रुपये की अपनी सम्पत्ति है। यूसुफ का लखनऊ में ही नाका क्षेत्र में जस्ट 9 इन नाम का होटल, गोमतीनगर, लखनऊ में जीरो डिग्री बार व रेस्टोरेन्ट है, अपना स्वयं का मकान 107 गुरू गोविन्द सिंह मार्ग, लालकुआं, लखनऊ के साथ ही और भी कई सम्पत्तियां हैं। साथ ही यूसुफ लगभग पांच कम्पनियों के मालिक भी हैं।   जमाल ने बताया कि वह पुनः दिनांक 08.11.2014 को एस0एस0पी0 से मिले तो एस0एस0पी0 ने पूरे मामले को समझने के बावजूद कहा कि प्रकरण सिविल नेचर का है, वह जांच करवा लेंगे, जबकि सबको पता है कि ताला तोड़कर जबरन कब्जा किया गया है।  जमाल के अधिवक्ता विनोद कुमार ने एस0एस0पी0 से मांग की है कि तत्काल एफ0आई0आर0 दर्ज करके जमाल के साथ न्यायोचित कार्यवाही की जाए।

दिनांक 15.11.2014

(जमाल अहमद)
पुत्र श्री मंजूर अहमद
निवासी- 1/140, विश्वास खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ
09654871990 (मो0)

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