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बैंक-एटीएम की क़तार में मरने वाले भारतीयों में से 91 वरिष्ठ नागरिक थे

Uday Prakash : अभी जानकारी मिली कि नोटबंदी के बाद एटीएम और बैंकों के सामने क़तार में खड़े लोगों में से जो १२०-१५० की मौत हुई है, उनमें से ९१ वरिष्ठ नागरिक थे। यानी वे नागरिक जिनकी उम्र ६० वर्ष से ऊपर थी। मैं और मेरी पत्नी, दोनों, वरिष्ठ नागरिक हैं। क्या प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री वग़ैरह और उनकी पार्टी कभी इस देश के वृद्धजनों के लिए भी कभी सोचती है?

Uday Prakash : अभी जानकारी मिली कि नोटबंदी के बाद एटीएम और बैंकों के सामने क़तार में खड़े लोगों में से जो १२०-१५० की मौत हुई है, उनमें से ९१ वरिष्ठ नागरिक थे। यानी वे नागरिक जिनकी उम्र ६० वर्ष से ऊपर थी। मैं और मेरी पत्नी, दोनों, वरिष्ठ नागरिक हैं। क्या प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री वग़ैरह और उनकी पार्टी कभी इस देश के वृद्धजनों के लिए भी कभी सोचती है?

वे तो ख़ुद भी ६० के पार, सत्ता के लोभ में सठियाये लोग ही हैं। वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं के लिए कम से कम एक लाइन तो अलग लगवाने की व्यवस्था करो उसके बाद इस महादेश के भविष्य का फ़ैसला करो। हद है। हो सकता है कोई ट्रोलर या ‘भक्त’ यहाँ आये और कहे कि हर बूढ़ा आदमी राष्ट्रविरोधी है। मैं इस देश का एक नागरिक और लेखक, खुद पाँच बार लाइन में लगा। एक बार छठें नंबर तक पहुँचा था, कैश ख़त्म हो गया। यह समय है जब देशभक्त और पार्टी कार्यकर्ता के बीच फ़र्क़ करने का विवेक समस्त देशवासियों को करना होगा।

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बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में बने राजनीतिक संगठन अब सवालों से घिरे ही नहीं हैं बल्कि वे देश, मनुष्यता और समूची प्रकृति के लिए ख़तरनाक हो चुके हैं। कुछ साल पहले मैं अपने फुफेरे भाई की मृत्यु के बाद उनकी बरखी के पारिवारिक अनुष्ठान में गोरखपुर गया। वे भाई विश्व हिंदू परिषद के समर्थक और एक महाविद्यालय के प्रिंसिपल थे। उस समारोह में गोरखपुर के सांसद और वि.वि. के गवर्निंग बॉडी के प्रमुख तथा पारिवारिक मित्र या सदस्य योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित थे। इसकी जानकारी पहले मुझे नहीं थी। आदित्यनाथ ने मेरे भाई का एक स्मृतिचिह्न मुझे समर्पित की।

न मेरा मेरे भाई की विचारधारा और न योगी आदित्यनाथ की राजनीति से कोई संबंध है न कोई लेना-देना। न अतीत में न भविष्य में। लेकिन स्वयं को वामपंथी कहने वाले हिंदी के ६७ लेखकों ने मेरे विरुद्ध भर्त्सना प्रस्ताव पारित किया और लगातार अभियान चलाया। आज भी वही हालात हैं। अब वामपंथी उच्च सवर्णों की जगह दक्षिणपंथी उच्च सवर्ण हैं। कोई भी सच्चा साहित्यकार किसी जातिवादी, राजनीतिक, सांप्रदायिक संगठन का प्रोपोगेंडेडिस्ट या प्रचारक नहीं होता। वह मनुष्यता का प्रतिनिधि होता है। एक अनिर्वाचित प्रतिनिधि, जिसे बाद में भविष्य की मनुष्यता चुनती है। वही वंचित मनुष्यता, जिसे महात्मा गांधी अंतिम मनुष्य कहते थे। कैशलेस एकॉनमी के दौर में मैं मनुष्यता की बात कर रहा हूँ। हम इस देश के नागरिक और धरती पर रहने वाले नैसर्गिक इंसान, दोनों पंथियों को विदा करेंगे। वे सारे वामपंथी अब आपके भाजपाई सरकार के द्वारा संपोषित लेखक हैं।

जाने-माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.

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