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लोगों को समझ में आ गया है कि पीएम असल में गोडसे समर्थक हैं!

जे सुशील

Jey Sushil : नैरेटिव कैसे बदलते हैं या सेट किए जाते हैं. पहले गोडसे का मामला. आज से दो तीन साल पहले तक गोडसे को लोग हत्यारा ही मानते थे. लेकिन बीजेपी ने धीरे धीरे ये नैरेटिव बदल दिया. पहले संघ के लोग दबे स्वर में गोडसे के बारे में बात करते थे और आम जनता उन्हें भाव नहीं देती थी. प्रज्ञा ठाकुर वाले मसले में पहली बार खुल कर एक सांसद उम्मीदवार ने अपनी बात कही जिसके बाद उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. पीएम ने कहा दिल से माफ नहीं करूंगा लेकिन सांसद बनने दिया.

लोगों को समझ में आ गया है कि पीएम असल में गोडसे समर्थक हैं. यही कारण था कि प्रज्ञा ठाकुर ने दोबारा वही काम किया. तब भी पार्टी ने उसे निकाला नही….कहा बयान की भर्त्सना करते हैं और डिफेंस कमिटी से निकाल रहे हैं. प्रज्ञा अभी भी सांसद है. उसके बाद से सोशल मीडिया पर देखिए. जो संघ समर्थक या राइट विंग हैं वो लगातार गोडसे के बारे में लिख रहे हैं कि वो हत्यारा नहीं बल्कि गांधी के खिलाफ थे उनके विचार. यानी कि गोडसे को एक वैचारिक व्यक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश.

प्रोफेसरों बौद्धिकों ने गांधी वध जैसे शब्दों का प्रयोग किया है. उन्हें पता है इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी. आज मैंने देखा कि दो तीन प्रोग्रेसिव लोग भी ये गोडसे विचार है और गांधी का विरोधी विचार है जैसे पोस्ट लिखे हैं.

इसे ही नैरेटिव सेट होना कहते हैं. भारत के मिडिल क्लास ने न तो किताबें पढ़ी हैं और न ही राजनीति समझते हैं (हालांकि सबका दावा है कि वो सबसे अधिक राजनीति के माहिर हैं). असल में उन्हें भी सरकार के साथ चुपके चुपके मेनस्ट्रीम के साथ रहने की इच्छा होती है. विरोध करते हुए जब पाते हैं कि कुछ हो नहीं रहा तो हल्के से मेनस्ट्रीम में शामिल होने की इच्छा यही सब कराती है.

गोडसे को विचार कहने वाले ज़रा लादेन के बारे में क्यों नहीं लिखते कि वो भी एक विचार है. नहीं लिखेंगे क्योंकि वो मुसलमान है. हिेदू देश में हिंदू हत्यारे को विचार कहने से राइट विंग सरकार खुश ही होगी. असल नैरेटिव ये है. मेरे लिए लादेन और गोडसे दोनों हत्यारे थे और हत्यारे रहेंगे. अब ये न समझ में आ या हो तो शिक्षा के निजीकरण पर आते हैं. राइट विंग ने लगातार जेएनयू और बाकी सरकारी संस्थानों को गाली दी. हाल में इतनी गालियां दी गई कि पढ़े लिखे कथित प्रोग्रेसिव लोगों को जो खुद गरीब नहीं रहे और न ही सरकारी कॉलेजों में पढ़े उनको भी अपने स्टैंड पर शंका हुई.

अब चूंकि खुलकर जेएनयू का विरोध कर नहीं सकते तो नया टर्म आया…..सस्टेनेबल मॉडल ऑफ एजुकेशन. ऐसे दो तीन पोस्ट पढ़े. इनको कौन समझाए कि नैरेटिव ऐसे ही बदला जाता है. मिडिल क्लास मेनस्ट्रीम में ऐसे ही जुड़ता है. अपनी भाषा की टर्मिनॉलॉजी बदल कर. अब लगभग लगभग स्वीकार्य होने लगा है कि शिक्षा में निजीकरण होना चाहिए.वैसे ही जैसे मिडिल क्लास ने गोडसे को विचार मानना शुरु कर दिया है.

इसके लिए गरीब और अमीर दोषी नहीं है. इसके लिए कनफ्यूज़ मिडिल क्लास दोषी है जिसे दूसरों से अलग दिखने के लिए भाषा की चतुराई दिखानी है. ऐसे जोकर एक दो नहीं हज़ारों की संख्या में हैं जिनके बारे में पहले पता नहीं चलता था लेकिन सोशल मीडिया पर हर कहीं दिख जाते हैं.

जे. सुशील की एफबी वॉल से.

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