संजय कुमार सिंह
द हिन्दू की आज की लीड का शीर्षक है, कांग्रेस ने अदाणी समूह में एलआईसी के निवेश की जांच की मांग की है। विपक्ष ने इसे जनता के पैसों का दुरुपयोग कहा है और मोडानी मेगा स्कैम की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग दोहराई है। खबर के अनुसार, अदाणी समूह ने इसपर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी है। अदाणी समूह के खिलाफ पुराने मामले भी हैं और उसपर जेपीसी की जांच का क्या हुआ – हम देख चुके हैं। असल में कल दिन में वाशिंगटन पोस्ट में इस आशय की खबर सार्वजनिक हुई। इसके बाद कांग्रेस ने आरोप लगाये। देशबन्धु में यह खबर लीड है और इसके अनुसार जयराम रमेश ने कहा कि मोदाणी मेगा घोटाला बेहद व्यापक है और इसमें जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके अन्य निजी कंपनियों पर दबाव डालना ताकि वे अपनी संपत्तियां अदाणी समूह को बेच दें (शामिल है)। देशबन्धु के अनुसार, तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा है, “जब अदाणी कर्ज में डूबे थे तब (एलआईसी ने) किया निवेश।” इसका कारण यह बताया जाता है कि अदाणी समूह बैकों से अधिकतम निवेश, सहायता और कर्ज प्राप्त कर चुका है। वैसे भी, फ्रेंड होने का विशेष लाभ एलआईसी के निवेश में है और इसी का खंडन करने की कोशिश टाइम्स ऑफ इंडिया ने की है। लीड का शीर्षक है, एलआईसी ने अमेरिकी मीडिया की इस रिपोर्ट से इनकार किया कि सरकार 3.9 बिलियन डॉलर की मदद से अदाणी समूह को मुश्किल से निकालना चाहती है। द हिन्दू ने आज पहले पन्ने पर एक और खबर छापी है जो बताती है कि लोकपाल के पास आने वाली शिकायतों की संख्या में भारी कमी आई है। खबर के अनुसार 2022-23 में इसकी संख्या अधिकतम 2469 थी जो इस साल 233 हो गई है। खबर की शुरुआत इस बात से होती है कि सात लक्जरी कारों के लिए टेंडर जारी करने के लोकपाल के निर्णय से जनता में नाराजगी है और रिश्वत विरोधी संस्था का प्रदर्शन रिकार्ड बताता है कि जनता से उसका जुड़ाव काफी कम हो गया है।
लोकपाल कार्यालय में भाजपा के मुंहफट सासद निशिकांत दुबे का मामला हाल में सामने आया था। हुआ यह कि सुप्रिया श्रीनेत ने दुबे के चुनावी शपथपत्र के आधार पर उनकी आय में वृद्धि का मामला उजागर किया था। बचाव में भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय कूद पड़े और दस्तावेज पेश करके जो दावा किया वह लगभग यही था इस मामले में शिकायतकर्ता ही दिलचस्पी नहीं ले रहा है तो सुप्रिया श्रीनेत को क्या जल्दी है या क्या परेशानी है। यह सवाल और सुप्रिया श्रीनेत से मामला उजागर नहीं करने की अपेक्षा करना भी कम अनुचित नहीं है। दूसरी ओर, पार्टी नेता के भ्रष्टाचार की आशंका वाले मामले में आईटी सेल बचाव कर रहा था, आरोप की गंभीरता से अलग उसे शिकायत यह थी कि जब मूल शिकायतकर्ता को जल्दी नहीं है तो सुप्रिया श्रीनेत को क्यों है। बेशक, यह बेतुका सवाल था और शिकायतकर्ता को जल्दी नहीं है का मतलब यह नहीं होता है कि शिकायत कमजोर है। फिर भी इस मामले में कुछ होना नहीं था और भाजपा के इको सिस्टम का कांफिडेंस ही था कि दस्तावेजों से साबित करने की कोशिश की गई कि शिकायतकर्ता गंभीर नहीं है। लेकिन मुद्दा शिकायतकर्ता के गंभीर होने का होना भी नहीं चाहिए और शिकायत आ गई तो कार्रवाई (या जांच) होनी ही चाहिए। दस्तावेजों से लग रहा था कि शिकायतकर्ता को परेशान या हतोत्साहित करने की कोशिश हो रही होगी। दस्तावेज को सार्वजनिक करना उसका भाग हो सकता है। तथ्य यह है कि मामला शपथपूर्वक दी गई सूचना का है, शिकायतकर्ता ने शपथ दे रखी है फिर भी ऐसा दावा किया गया और सुप्रिया श्रीनेत से सवाल किया गया। जो भी हो, बाद में बीएमडब्ल्यू खरीदने के टेंडर की खबर से भी साफ हो गया कि सरकार लोकपाल को कितना दुलार रही है। इसका कोई फॉलोअप अभी तक मुझे नहीं दिखा था। आज यह पहला है।
कहने की जरूरत नहीं है कि फॉलोअप अमर उजाला भी कर सकता था, पर वह सब तो नहीं ही हुआ आज एलआईसी वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं छपी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी ऐसा ही है। यहां तो अमित शाह का यह दावा भी है कि वे घुसपैठियों की पहचान करेंगे और मतदाता सूची से उनका नाम हटाएंगे। यह सब उन्होंने तब कहा है जब चुनाव आयोग ने हाल में बिहार में एसआईआर पूरा किया है, देश भर में करने की तैयार चल रही है और बिहार में कितने घुसपैठिये मिले – यह बताया नहीं गया है या संख्या इतनी नहीं है कि बताया जाए। इसके बावजूद 65 लाख नाम हटाने, तमाम नाम जोड़ने और मुसलमानों के नाम हटाने की कोशिशों पर कोई स्पष्टीकरण तो छोड़िए खबर भी नहीं है। यह सब तब जब कर्नाटक में नाम हटाने की कोशिश की जांच करने वाली सीआईडी को 18 महीने में 18 चिट्ठियों का जबाव नहीं दिए जाने पर भी अब जांच कर रही एसआईटी ने ऐसा करने वालों का पता लगा लिया है, उनके फोन, लैपटॉप जब्त किए हैं और यह पता लगा लिया है कि 80 रुपए प्रति वोट के हिसाब से सौदा हुआ था, भुगतान हुआ है। अब यह पता लगाया जाना है कि भुगतान किसने किसे कैसे किया था ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके। अमर उजाला में ये सारी खबरें तो नहीं ही छपीं (कम से कम पहले पन्ने पर) आज अमित शाह के इस दावे की खबर जरूर है कि, जिनका सिर्फ भ्रष्टाचार का रिकार्ड वह विकास नहीं कर सकते। कहने कि जरूरत नहीं है कि अमित शाह जो विकास कर सकते थे या किया है उसकी बात नहीं कर रहे हैं और उस पार्टी या परिवार की बात कर रहे हैं जो बीस साल से सत्ता में नहीं है। अमर उजाला के लिए यह पहले पन्ने की लीड है। शायद इसलिए कि यह पूर्व तड़ीपार, गृहमंत्री का दावा है। और उसे (यानी संपादक मालिक को) पता है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर लोकपाल और चुनाव आयोग की हालत क्या। भले खबर नहीं की है। जब मुझे पता है तो मैं क्यों मानू की सक्रिय पत्रकारिता कर रहे किसी व्यक्ति को पता नहीं होगा या डर नहीं होगा। मेरा मकसद इसी डर को रेखांकित करना है।
एलआईसी से अदाणी को मदद दिलाने का यह कोई पहला मामला नहीं है। मूल खबर के अनुसार, “आंतरिक दस्तावेज़ बताते हैं कि भारतीय वित्त मंत्रालय ने जीवन बीमा निगम और एनआईटीआई (यह हिन्दी की नीति नहीं है) के समन्वय से निवेशकों का भरोसा बहाल करने और अदाणी के व्यवसाय को स्थिर करने के लिए सहायता योजना तैयार की।” यह भी कि, “अदाणी समूह ने विशेष लाभ प्राप्त करने से इनकार किया है। दूसरी संबंधित सरकारी संस्थाओं ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।” ऐसे में एलआईसी के अब इनकार करने का मतलब नहीं है या यही है कि उससे कहा गया है कि इनकार करो। अगर उसे करना होता तो वह पहले ही कर सकता था जब उसे मौका दिया गया था। पर सरकारी व्यवस्था या नीति आयोग के आदेश (सलाह पढ़ सकते हैं) में नहीं रहा होगा कि पूछा जाए तो क्या कहना है। बाद में जो कहा गया वह सोशल मीडिया पर बिना नाम दस्तखत के जारी हो गया। हालांकि उसका जवाब भी आ गया। इसके अलावा, मेरा मानना है कि अगर एलआईसी का अदाणी में निवेश नियमानुसार ही था और उसमें कुछ गलत नहीं है तो पहले के आरोपों और विवादों के मद्देनजर इस बार अगर उसने खुद ही घोषणा कर दी होती कि वह इन कारणों से अदाणी में निवेश कर रहा है और यह नियमानुसार है तो खबर बनती ही नहीं। वैसे ही जैसे बीएमडब्ल्यू खरीदने की नहीं बनी। किसी ने खबर नहीं की कि ‘भ्रष्ट’ घोषित सरकार जब चुने हुए रिटायर अफसरों को साधारण कारें ही देती थे तो अब विदेशी कारों की जरूरत क्यों पड़ी। क्या आत्मनिर्भर और स्वदेशी होने का काम बलेनो से नहीं हो जाता? अमर उजाला में कर्नाटक में पैसे देकर वोट कटवाने वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं थी लेकिन देशव्यापी एसआईआर का पहला चरण अगले सप्ताह से होगा- यह जरूर है।
आप जानते हैं कि जनगणना का काम रुका पड़ा है, आधार कार्ड से मतदाता सूची अपेक्षाकृत आसानी से, कम खर्च में बेहतर बन सकती है और अगर विदेशियों के आधार कार्ड भी जारी हो गये हैं तो उनकी पहचान भी जरूरी है लेकिन यह सब छोड़कर सरकार अगर एसआईआर करवा रही है और चुनाव आयोग कर रहा है तो मकसद समझना मुश्किल नहीं है। यह परम ईमानदारी की ही बात हो तो यह कोई नामुमकिन नहीं है कि मोदी सरकार में मुमकिन करके दिखा जाए। सरकार चाहेगी तो हो ही जाएगी पर मुद्दा यह है कि सरकार क्यों चाहती है और चुनाव आयोग सेवा करने को क्यों तैयार है। आज इस खबर को मेरे नौ में से दो ही अखबारों ने लीड बनाया है। शीर्षक कांग्रेस की मांग ही है। उपशीर्षक में बताया गया है कि इस मामले में अदाणी समूह की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। सोशल मीडिया पर एलआईसी का जवाब जरूर था। उसने इस आरोप को आधारहीन कहा है। खबर मूल रूप से वाशिंगटन पोस्ट में छपी है। खबर के साथ दस्तावेज या सबूत नहीं है लेकिन एलआईसी के खंडन के बाद सबूत भी सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं। मेरा मानना है कि इस मामले में कुछ होना जाना नहीं है। सरकार समर्थकों को मोदी जी का बचाव करने का एक और मौका मिल गया है। कुल मिलाकर, 33,000 करोड़ रुपए के निवेश की वाशिंगटन पोस्ट की खबर ने भक्तों को अपने भगवान का बचाव करने का एक और मौका दिया। ऐसे हर आरोप से भगवान मजबूत होते रहे हैं। जजों को रिटायरमेंट के बाद पुरस्कार का मामला पुराना हो गया। अब तो बीएमडब्ल्यू भी दी जा रहे हैं लेकिन सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है तो यह प्रचारकों का कमाल है।
सरकारी विभाग, उनका जनसंपर्क विभाग और प्रचारक बाद में सक्रिय होते हैं, ‘फैक्टचेक’ करते हैं। पहले नहीं बताते कि हमने ऐसा कर दिया या करने जा रहे हैं। पारदर्शिता है ही नहीं। आरटीआई कानून का बाजा बज गया है और काम की बात दूर-दूर तक नहीं है। मन की बात करके कान पकाए जा रहे हैं। रिपोर्ट तो हिन्डनबर्ग की भी गलत थी। लेकिन मुकदमा नहीं किया। जॉन जो ऑर्डर और फिर सरकारी आदेश भी याद है। इसलिए रिपोर्ट तो गलत ही होनी थी। पर खबर के साथ जो अत्याचार हुआ है वह भी याद करने लायक है। अव्वल तो खबर वाशिंगटन पोस्ट में छपी है और देश के तमाम अखबार अमर उजाला, हिन्दस्तान टाइम्स या टाइम्स ऑफ इंडिया नहीं बनाए जा सकते हैं तो संभव है अदाणी अपने फ्रेंड के फ्रेंड के जरिए वाशिंगटन पोस्ट को भी खरीद लें। हालांकि, दि एशियन एज में वाशिंगटन पोस्ट की खबर नहीं है। कांग्रेस के विरोध और मांग के बाद यह वाशिंगटन पोस्ट की खबर नहीं रह गई। वैसे भी, कांग्रेस सरकार के जमाने में ऐसी खबरें देसी पाठकों को बताने के लिए भी उद्धृत की जाती थीं अब राम राज चल रहा है। इसमें राजा का बाजा ही बजाया जाता है। इसलिए दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – अमित शाह ने कहा, बिहार में घुसपैठियों के लिए कोई जगह नहीं हैं यह दिलचस्प है कि देश के गृहमंत्री अभी सिर्फ बिहार की बात कर रहे हैं और पहले बंगाल की बात करते रहे हैं। दूसरी ओर, मुंबई में सैफ अली खान के घर में चोरी के इरादे से घुसकर पकड़े जाने पर हमला करने वाले को बांग्लादेशी बताया गया था और अब इस शीर्षक से लग रहा है कि बिहार के बाहर घुसपैठिये रह सकते हैं। द टेलीग्राफ में एलआईसी द्वारा अदाणी को 33,000 करोड़ दिए जाने की खबर चार कॉलम में है। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। ऊपर कांग्रेस का आरोप, नीचे एलआईसी का जवाब है। इंडियन एक्सप्रेस में यह पहले पन्ने पर दो कॉलम में है चार लाइन का शीर्षक है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


