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थाने में पत्रकार के मारे जाने के मुद्दे पर लखनवी मीडिया ने चुप्पी साध कर समाजवादी सरकार का हित साधना किया!

Kashyap Kishor Mishra :  पत्रकारिता दलाली की सनद का दूसरा नाम है… एक मुल्क जिसके पत्रकारों का मुख्य मुद्दा, एक पूरे दिन बस यह रहता हो, कि एक महिला पत्रकार से भीड़ नें बदसलूकी की, क्योंकि उस महिला पत्रकार नें एक वृद्ध दंपति से बेहूदा सवाल पूछे, तो यह सहज ही अनुभव किया जा सकता है, कि पत्रकारिता के नाम पर हम किस तरह के कीचड़ में सन और सना रहें हैं।

Kashyap Kishor Mishra :  पत्रकारिता दलाली की सनद का दूसरा नाम है… एक मुल्क जिसके पत्रकारों का मुख्य मुद्दा, एक पूरे दिन बस यह रहता हो, कि एक महिला पत्रकार से भीड़ नें बदसलूकी की, क्योंकि उस महिला पत्रकार नें एक वृद्ध दंपति से बेहूदा सवाल पूछे, तो यह सहज ही अनुभव किया जा सकता है, कि पत्रकारिता के नाम पर हम किस तरह के कीचड़ में सन और सना रहें हैं।

आज के दौर की पत्रकारिता, एक उत्पाद है, जिसकी जरूरत बिकना है, खबर नाम के उत्पाद को बेचनें के लिए, यह जरूरी है कि किसी भी तरह उसके ग्राहक पैदा किए जाएँ, अपनी खबर का बाजारू सौदा किया जाए। तो खबरों के इस बाजार का, बस एक उद्देश्य रह गया है और वह है, पैसा पैदा करना। यह पैसा पैदा करना इतना महत्वपूर्ण है कि एक खबर परोसने वाली महिला अपने नोट्स सहेजे या न सहेजे, पर अपनी लिपस्टिक और आई-लाईनर सहेजना कत्तई नहीं भूलती।

तो एक ऐसे दौर में, जब विरोध या समर्थन हर बात की शर्त बस पैसा हो, पत्रकारिता और पत्रकारिय सरोकारों की बात करना निरी मूर्खता की बात है। आज के दौर की पत्रकारिता, आधी अधूरी जानकारी के साथ, मूर्खतापूर्ण हरकतें करते हुए, अपनी वासनाओं को सहेजते युवा-युवतियों की एक ऐसी अंधी-दौड़ है, जहाँ मेढ़कों की तरह कूदते फाँदते ये युवा कभी रवीश कुमार तो कभी अजित चौधरी जैसे अधकचरे लोगों में न सिर्फ अपना भविष्य ढ़ूढ़ते हैं, बल्कि उन्हें ही अपना आदर्श मान पत्रकारिता जगत में पैर रखते हैं।

लिहाजा, आज के दौर की पत्रकारिता को लखनऊ के पत्रकार राजीव चतुर्वेदी की मौत ऐसा मुद्दा नहीं लगती जो बिक सके, लिहाजा इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं होती, जबकि लखनऊ के सरोजिनी नगर थाने में, संदिग्ध परिस्थिति में मौत के शिकार हुए राजीव चतुर्वेदी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट, उनके सर पर आघात की बात कह रही होती है।

इस खबर में, कोई दो पक्ष नहीं कि पत्रकार अपनी सुविधा से किसी एक पक्ष में बैठ अपना हित साधन कर सकें, राजीव चतुर्वेदी न किसी वाद से जुड़े थे, न किसी दल से, लिहाजा लखनऊ के पत्रकारीय जगत को खामोशी से इस खबर को दफन कर, समाजवादी सरकार का हित साधना बेहतर विकल्प लगता है, लिहाजा लखनऊ के पत्रकारों में राजीव चतुर्वेदी की मौत पर कोई हलचल नहीं।

यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है, क्योंकि एक ऐसे वक्त में, जब खबरों के मोलभाव होते हों, एक आदमी की मौत की खबर भी तभी बिकती है, जब वो किसी का विरोधी हो तो किसी का समर्थक भी हो, एक दल वाद झंडे गुट से इतर आदमी की मौत, पत्रकारिता जगत के दलालों के बाजार में फायदे का सौदा नहीं, लिहाजा तीन कालम की खबर के साथ, बीतते दिन के साथ, यह खबर और इसकी चर्चा दोनों दफन कर दी जाती है।

…अवध की आँखों में उतरा सूर्ख लहू, शाम से चढ़ता मय का प्याला है, जो सुबह की सुर्खियों में उतरता है, अवध में सब सुख-चैन से हैं।

बजाज हिंदुस्तान लिमिटेड लखनऊ में कार्यरत कश्यप किशोर मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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