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दलित एजेंडाः2050 की बात करें तो आने वाले 35 साल घनघोर असंतोष के – दिलीप मंडल

देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” का चौथा स्थापना दिवस समारोह 14 जून को वैशाली, गाजियाबाद में मनाया गया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायधीश जस्टिस खेमकरण और मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विवि, अमरकंटर, मप्र के कुलपति प्रो. टी.वी कट्टीमनी थे. जबकि विशिष्ट अतिथि बौद्ध चिंतक एवं साहित्यकार आनंद श्रीकृष्णा, प्रखर समाजशास्त्री एवं जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार एवं वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता जे.सी आदर्श ने की.

देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” का चौथा स्थापना दिवस समारोह 14 जून को वैशाली, गाजियाबाद में मनाया गया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायधीश जस्टिस खेमकरण और मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विवि, अमरकंटर, मप्र के कुलपति प्रो. टी.वी कट्टीमनी थे. जबकि विशिष्ट अतिथि बौद्ध चिंतक एवं साहित्यकार आनंद श्रीकृष्णा, प्रखर समाजशास्त्री एवं जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार एवं वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता जे.सी आदर्श ने की.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं दलित दस्तक परिवार के अहम सदस्य प्रो. विवेक कुमार ने कार्यक्रम के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दलित एजेंडाः 2050 राष्ट्रनिर्माण का आंदोलन है. उन्होंने कहा कि दलित दस्तक के माध्यम से हमने पचास बहुजन नायकों, उनसे जुड़े पचास स्थानों और 50 बौद्ध स्थलों को चिन्हित करने का लक्ष्य रखा है. दलित दस्तक को सामानांतर आंदलन की पहल बताते हुए उन्होंने कहा कि हम सामानांतर संस्कृति की बात करते हैं. 

इससे पूर्व कार्यक्रम के शुरूआत में संपादक अशोक दास ने पत्रिका के पाठकों एवं कोर ग्रुप के सदस्यों के सामने साल भर का लेखा-जोखा पेश किया. उन्होंने बताया कि पिछले साल के कार्यक्रम के दौरान ‘दलित दस्तक’ की पांच हजार प्रतियां प्रकाशित होती थी जो इस एक साल में बढ़कर अब 10 हजार से ज्यादा हो गई हैं, जबकि इसके एक लाख से ज्यादा पाठक हैं. उन्होंने बताया कि पत्रिका 21 राज्यों के 151 जिलों में जा रही है. जबकि देश के 44 रेलवे स्टेशनों पर स्थित ए.एच व्हीलर के बुक स्टॉल पर भी पत्रिका उपलब्ध है. उन्होंने देश भर में सौ से ज्यादा डिस्ट्रीब्यूटर के पत्रिका से जुड़े होने की बात कही. गैर हिन्दी क्षेत्रों मे पत्रिका के प्रसार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटका, केरला, ओडिसा, तेलंगाना और तामिलनाडु जैसे राज्यों में भी पाठक पत्रिका मंगवा रहे है. दलित दस्तक के लिए 2050 का एजेंडा निर्धारित करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रिका को दूसरी पीढ़ी के हाथों में देना ही उनका एजेंडा है.

 मुख्य वक्ता प्रो. टी.वी कट्टीमनी ने कहा कि आने वाले वक्त में हमें ज्यूडिशियरी और इंटरप्रेन्योरशिप के बारे में सोचना होगा. साथ ही हमें एजेंडे में छोटी-छोटी बातों को भी शामिल करना होगा क्योंकि हम पहले खुद को मजबूत करने के बाद ही समाज के काम आ सकते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि हमारे बच्चे हिन्दी और समाजशास्त्र में पी.एचडी करना चाहते हैं, गणित और अंग्रेजी साहित्य में नहीं. हमें इस बारे में भी सोचना होगा. मुख्य वक्ता ने दलित दस्तक में समाज के लोगों की उपलब्धियां (सक्सेस स्टोरी) भी प्रकाशित करने का सुझाव दिया. मुख्य अतिथि जस्टिस खेमकरण ने आरक्षण के मुद्दे पर चल रहे घमासान पर प्रकाश डाला.

 विशिष्ट अतिथि एवं दलित दस्तक परिवार के मुख्य सदस्य आनंद श्रीकृष्णा ने एजेंडे का जिक्र करते हुए कहा कि आने वाले वक्त में दलित-मुस्लिम एकता की बात होनी चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि धर्म परिवर्तन करने वाले ज्यादातर लोग दलित थे. अनुसूचित जातियों में 1162 जातियों के शामिल होने का जिक्र करते हुए उन्होंने आपस में रोटी-बेटी का संबंध बनाने की बात कही. उन्होंने कहा कि बौद्ध धम्म को अंगीकार करने से बात बनेगी. 

एक अन्य विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडिया टुडे के पूर्व मैनेजिंग एडिटर दिलीप मंडल ने कहा कि दलित एजेंडाः 2050 की बात करें तो आने वाले 35 साल घनघोर असंतोष का साल होना चाहिए. हमें बड़े सपने देखने होंगे. उन्होंने कहा कि मीडिया में हर रात देश की बात की जाती है लेकिन वहां देश नहीं होता. प्रो. विवेक को इंगित करते हुए उन्होंने कहा कि विवेक कुमार जी जैसे चंद लोग भी तब बुलाए जाते हैं जब जाति का प्रश्न आता है. आधुनिक समय में उन्होंने बहुजन मीडिया को आधुनिक टूल को भी अपनाने की सलाह दी. 26 नवंबर 1949 को बाबासाहेब द्वारा दिए भाषण का जिक्र करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उसे पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन ऊंची जगहों पर जाने का समय आ गया है, जहां अब तक हमारे लोग नहीं पहुंच पाए हैं.

 एक अन्य वक्ता एवं पत्रिका के कोर ग्रुप के सदस्य हुकुम सिंह ने कहा कि जब बाबासाहेब ने जाति को अवैज्ञानिक घोषित कर दिया तो हमें उसे छोड़ देना चाहिए. उन्होंने अपने होने का जश्न मनाने और एक समान पहचान बनाने पर जोर दिया. वरिष्ठ लेखक एवं कवि सूरजपाल चव्हाण ने अपनी चर्चित कविता ‘ये दलितों की बस्ती है’ सुनाई, जिसे सभागार में मौजूद लोगों ने खूब पसंद किया और ताली बजाई. कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं कोर ग्रुप के वरिष्ठ सदस्य जे.सी आदर्श (रिटा. पी.सी.एस) ने सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया और आयोजकों को कार्यक्रम के शानदार आयोजन के लिए बधाई दी. मुख्य अतिथि जस्टिस खेमकरण और मुख्य वक्ता प्रो. टी.वी कट्टीमनी को दलित दस्तक की पूरी टीम ने स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया. कार्यक्रम का शानदार और प्रभावी संचालन कोर ग्रुप के सदस्य देवमणि भारतीय ने किया. बुद्ध वंदना जे.पी. सिंह ने करवाई.

 कार्यक्रम में उपस्थित अन्य लोगों में मुख्य रूप से पत्रिका के कोर ग्रुप के सदस्य आर.के. देव (ग्रेटर नोएडा), ओमवीर सिंह व बी.बी. सिंह (गाजियाबाद), सुनीत कुमार (वसुंधरा, गाजियाबाद) के अलावा दलितमत फाउंडेशन के ट्रस्टी विनोद आर्या, पत्रिका के शुभचिंतक जे.पी. सिंह, वीरेन्द्र सिंह, वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार, महेन्द्र सिंह बड़गूजर, श्री कथेरिया, देहरादून से आए दलित दस्तक परिवार के सदस्य अनिल कुमार और हरिदास जी, जयपुर से आए डॉ. एम.एल परिहार, मेरठ से आए चौ.चरण सिंह विवि में असिस्टेंट प्रो. अनिल कुमार, ए.आर. सुमन (वसुंधरा), आनंद बाबू व नवीन रंगा (मदर डेयरी), अनिल कुमार, जे.पी. कांत, बहुजनशादी.कॉम के संचालक ललीत कुमार, डॉली कुमार आदि मौजूद रहे. जेएनयू के प्रो. रामचन्द्र, दिल्ली विवि को प्रो. राजकुमार, साहित्यकार सुदेश तनवर, भड़ास4मीडिया के संचालक सम्यक प्रकाशन के जरिए भारत में बौद्ध साहित्य को घर-घर पहुंचाने वाले बौद्ध चिंतक शांति स्वरूप बौद्ध भी मुख्य रुप से शामिल हुए.

लेखक एवं पत्रकार अशोक से संपर्क : [email protected]

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