स्वतंत्रता दिवस पर जागी राष्ट्रभक्ति, विज्ञापन टारगेट पूरा करने के लिए साम दाम दंड भेद शुरू

स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ गया है और इसी के साथ समाचार पत्रों के मार्केटिंग विभाग में देशभक्ति का जज़्बा भी जाग उठा है। वे अब दिन रात अपने क्लाइंट्स को देशभक्ति का मतलब समझाने मे जुटे हुए है, जुटे भी क्यों ना? 

पिछले साल का टारगेट जो रिवाइज्ड हो गया है। अपने टारगेट पूर्ति के लिए ये लोग किसी भी घटना या दुर्घटना को एक अवसर की तरह देखते है। इसका ताजा उदाहरण कलाम साहब के निधन पर कमर्शियल सप्लीमेंट पब्लिश कर देश के बड़े अखबार दे चुके हैं। बात करते है आने वाले त्यौहार स्वतंत्रता दिवस की। मार्केटिंग टीम ने कमर कस ली है, ग्रामीण और शहरी रिपोर्टर्स को टारगेट दे दिए गए हैँ। 

टारगेट पूरा करने के लिए साम दाम दंड भेद चाहे जो करना पड़े करेंगे, आखिर पापी पेट का सवाल जो है। इनकी मज़बूरी तो आप समझ ही गए होंगे लेकिन मुझे विज्ञापनदाताओं की मज़बूरी आज तक समझ नहीं आयी। समाचार पत्र मे देशभक्ति का विज्ञापन प्रकाशित करवाने से देश का कुछ भला नहीं होने वाला है, यह बात एक छोटा बच्चा भी समझ सकता है। बेहतर तो यह होता की उस पैसे से किसी गरीब के बच्चे को स्कूल भेजा जाये ताकि देश का भविष्य शिक्षित हो सके। मगर ऐसा होगा नहीं क्योंकि इनमें से ज्यादातर लोग छपास रोग से ग्रस्त हैं तो किसी की दुःखती रग इन अखबारों के संवाददाताओ/संपादकों के हाथ मे है। 

मुझे तरस आता है ऐसे लोगों पर जिन्होंने आज तक कभी झंडारोहण मे भाग नहीं लिया लेकिन समाचार पत्रों मे बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित करवा अपनी देशभक्ति का सार्वजनिक रूप से ऐलान करते हैं। मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ, यह मुझे भी नहीं पता। लेकिन देशभक्ति के नाम पर होने वाला यह तमाशा अब बंद होना चाहिये। अगर मेरी बातों से किसी की देशभक्ति को ठेस पहुँची हो तो मुझे क्षमा करें ? लेकिन मैं भी इस आजाद देश का नागरिक हूँ और इस देश का संविधान मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। जय हिन्द !

कुलदीप सिद्धू के एफबी वाल से

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Carried live coverage of all major Yoga Day functions : RSTV

New Delhi : Rajya Sabha TV termed baseless a social media campaign that it blacked out International Yoga Day celebrations. 

CEO of the Rajya Sabha Television Gurdeep Singh Sappal said it carried live coverage of all major Yoga Day functions. It carried live two  functions attended by Prime minister Narendra Modi, from Rajpath and Vigyan Bhavan. The channel also aired the UN  function attended by  External Affairs Minister Sushma Swaraj. All these programs and special shows on yoga are available on you tube also . 

“The campaign against RSTV is motivated”,said channel CEO Gurdeep Singh  Sappal.

“Apart from live coverage of important functions, RSTV ‘s Yoga Day fare also had three documentaries on Yoga and a Special Report on Ayush”, said  shri  Sappal.

The channel website,  www.rajyasabhatv.com, carries links to all programmes aired on the occasion of International Yoga Day.  

The channel management said it is going to air several programmes tomorrow on Yoga.  It will have a RSTV Vishesh on Yoga Day  celebrations and some other programs.

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दलित एजेंडाः2050 की बात करें तो आने वाले 35 साल घनघोर असंतोष के – दिलीप मंडल

देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” का चौथा स्थापना दिवस समारोह 14 जून को वैशाली, गाजियाबाद में मनाया गया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायधीश जस्टिस खेमकरण और मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विवि, अमरकंटर, मप्र के कुलपति प्रो. टी.वी कट्टीमनी थे. जबकि विशिष्ट अतिथि बौद्ध चिंतक एवं साहित्यकार आनंद श्रीकृष्णा, प्रखर समाजशास्त्री एवं जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार एवं वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता जे.सी आदर्श ने की.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं दलित दस्तक परिवार के अहम सदस्य प्रो. विवेक कुमार ने कार्यक्रम के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दलित एजेंडाः 2050 राष्ट्रनिर्माण का आंदोलन है. उन्होंने कहा कि दलित दस्तक के माध्यम से हमने पचास बहुजन नायकों, उनसे जुड़े पचास स्थानों और 50 बौद्ध स्थलों को चिन्हित करने का लक्ष्य रखा है. दलित दस्तक को सामानांतर आंदलन की पहल बताते हुए उन्होंने कहा कि हम सामानांतर संस्कृति की बात करते हैं. 

इससे पूर्व कार्यक्रम के शुरूआत में संपादक अशोक दास ने पत्रिका के पाठकों एवं कोर ग्रुप के सदस्यों के सामने साल भर का लेखा-जोखा पेश किया. उन्होंने बताया कि पिछले साल के कार्यक्रम के दौरान ‘दलित दस्तक’ की पांच हजार प्रतियां प्रकाशित होती थी जो इस एक साल में बढ़कर अब 10 हजार से ज्यादा हो गई हैं, जबकि इसके एक लाख से ज्यादा पाठक हैं. उन्होंने बताया कि पत्रिका 21 राज्यों के 151 जिलों में जा रही है. जबकि देश के 44 रेलवे स्टेशनों पर स्थित ए.एच व्हीलर के बुक स्टॉल पर भी पत्रिका उपलब्ध है. उन्होंने देश भर में सौ से ज्यादा डिस्ट्रीब्यूटर के पत्रिका से जुड़े होने की बात कही. गैर हिन्दी क्षेत्रों मे पत्रिका के प्रसार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटका, केरला, ओडिसा, तेलंगाना और तामिलनाडु जैसे राज्यों में भी पाठक पत्रिका मंगवा रहे है. दलित दस्तक के लिए 2050 का एजेंडा निर्धारित करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रिका को दूसरी पीढ़ी के हाथों में देना ही उनका एजेंडा है.

 मुख्य वक्ता प्रो. टी.वी कट्टीमनी ने कहा कि आने वाले वक्त में हमें ज्यूडिशियरी और इंटरप्रेन्योरशिप के बारे में सोचना होगा. साथ ही हमें एजेंडे में छोटी-छोटी बातों को भी शामिल करना होगा क्योंकि हम पहले खुद को मजबूत करने के बाद ही समाज के काम आ सकते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि हमारे बच्चे हिन्दी और समाजशास्त्र में पी.एचडी करना चाहते हैं, गणित और अंग्रेजी साहित्य में नहीं. हमें इस बारे में भी सोचना होगा. मुख्य वक्ता ने दलित दस्तक में समाज के लोगों की उपलब्धियां (सक्सेस स्टोरी) भी प्रकाशित करने का सुझाव दिया. मुख्य अतिथि जस्टिस खेमकरण ने आरक्षण के मुद्दे पर चल रहे घमासान पर प्रकाश डाला.

 विशिष्ट अतिथि एवं दलित दस्तक परिवार के मुख्य सदस्य आनंद श्रीकृष्णा ने एजेंडे का जिक्र करते हुए कहा कि आने वाले वक्त में दलित-मुस्लिम एकता की बात होनी चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि धर्म परिवर्तन करने वाले ज्यादातर लोग दलित थे. अनुसूचित जातियों में 1162 जातियों के शामिल होने का जिक्र करते हुए उन्होंने आपस में रोटी-बेटी का संबंध बनाने की बात कही. उन्होंने कहा कि बौद्ध धम्म को अंगीकार करने से बात बनेगी. 

एक अन्य विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडिया टुडे के पूर्व मैनेजिंग एडिटर दिलीप मंडल ने कहा कि दलित एजेंडाः 2050 की बात करें तो आने वाले 35 साल घनघोर असंतोष का साल होना चाहिए. हमें बड़े सपने देखने होंगे. उन्होंने कहा कि मीडिया में हर रात देश की बात की जाती है लेकिन वहां देश नहीं होता. प्रो. विवेक को इंगित करते हुए उन्होंने कहा कि विवेक कुमार जी जैसे चंद लोग भी तब बुलाए जाते हैं जब जाति का प्रश्न आता है. आधुनिक समय में उन्होंने बहुजन मीडिया को आधुनिक टूल को भी अपनाने की सलाह दी. 26 नवंबर 1949 को बाबासाहेब द्वारा दिए भाषण का जिक्र करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उसे पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन ऊंची जगहों पर जाने का समय आ गया है, जहां अब तक हमारे लोग नहीं पहुंच पाए हैं.

 एक अन्य वक्ता एवं पत्रिका के कोर ग्रुप के सदस्य हुकुम सिंह ने कहा कि जब बाबासाहेब ने जाति को अवैज्ञानिक घोषित कर दिया तो हमें उसे छोड़ देना चाहिए. उन्होंने अपने होने का जश्न मनाने और एक समान पहचान बनाने पर जोर दिया. वरिष्ठ लेखक एवं कवि सूरजपाल चव्हाण ने अपनी चर्चित कविता ‘ये दलितों की बस्ती है’ सुनाई, जिसे सभागार में मौजूद लोगों ने खूब पसंद किया और ताली बजाई. कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं कोर ग्रुप के वरिष्ठ सदस्य जे.सी आदर्श (रिटा. पी.सी.एस) ने सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया और आयोजकों को कार्यक्रम के शानदार आयोजन के लिए बधाई दी. मुख्य अतिथि जस्टिस खेमकरण और मुख्य वक्ता प्रो. टी.वी कट्टीमनी को दलित दस्तक की पूरी टीम ने स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया. कार्यक्रम का शानदार और प्रभावी संचालन कोर ग्रुप के सदस्य देवमणि भारतीय ने किया. बुद्ध वंदना जे.पी. सिंह ने करवाई.

 कार्यक्रम में उपस्थित अन्य लोगों में मुख्य रूप से पत्रिका के कोर ग्रुप के सदस्य आर.के. देव (ग्रेटर नोएडा), ओमवीर सिंह व बी.बी. सिंह (गाजियाबाद), सुनीत कुमार (वसुंधरा, गाजियाबाद) के अलावा दलितमत फाउंडेशन के ट्रस्टी विनोद आर्या, पत्रिका के शुभचिंतक जे.पी. सिंह, वीरेन्द्र सिंह, वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार, महेन्द्र सिंह बड़गूजर, श्री कथेरिया, देहरादून से आए दलित दस्तक परिवार के सदस्य अनिल कुमार और हरिदास जी, जयपुर से आए डॉ. एम.एल परिहार, मेरठ से आए चौ.चरण सिंह विवि में असिस्टेंट प्रो. अनिल कुमार, ए.आर. सुमन (वसुंधरा), आनंद बाबू व नवीन रंगा (मदर डेयरी), अनिल कुमार, जे.पी. कांत, बहुजनशादी.कॉम के संचालक ललीत कुमार, डॉली कुमार आदि मौजूद रहे. जेएनयू के प्रो. रामचन्द्र, दिल्ली विवि को प्रो. राजकुमार, साहित्यकार सुदेश तनवर, भड़ास4मीडिया के संचालक सम्यक प्रकाशन के जरिए भारत में बौद्ध साहित्य को घर-घर पहुंचाने वाले बौद्ध चिंतक शांति स्वरूप बौद्ध भी मुख्य रुप से शामिल हुए.

लेखक एवं पत्रकार अशोक से संपर्क : tyagpath@gmail.com

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विश्व तम्बाकू निषेध दिवस आज : ऐसे पदार्थ तो विष से भी बदतर

तम्बाकू और इससे जनित पदार्थ इंसान के लिए विष से भी बदतर हैं ,पर न जाने क्यों इंसान इसको छोड़ने को तैयार नहीं है ? और फिर हमारी सरकार इस के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक क्यों नहीं लगाती है। साथ ही इसके उत्पादन को बढ़ावा क्यों देती है ?

सरकार की दुहरी नीति मेरी समझ से परे है । यह नीति ठीक उसी तरह है जैसे कोई शिक्षित अभिभावक अपने घर में बिजली के तारों को जगह-जगह नंगा छोड़ कर घर से बाहर काम पर निकल जाये और यह सोचे कि छोटे बच्चे खुद– खुद होशियार हैं और इन तारों को नहीं छुएंगे और शाम को आने पर पता लगे कि बच्चे तो उन तारों को छूकर अल्लाह के प्यारे हो चुके हैं।

आय के स्रोतों को बढ़ाने के लिए प्रजा की जान को इतना जोखिम में डालना क्या खिलवाड़ नहीं है ? सरकार को अपनी इस नीति पर एक बार जनहित को ध्यान में रखकर फिर से सुसंगत निर्णय लेना चाहिए।

महेश स्वरूप सक्सेना से संपर्क : 9412424524

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जिस दिन इस दुनिया में आया था, उसी दिन हादसे में चल बसा भास्कर कर्मी

दैनिक भास्कर के जालंधर कार्यालय में कार्यरत सुरेश ठाकुर की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। वह अपनी बहन, पिता और भांजी के साथ होशियारपुर से वापस जालंधर लौट रहा था। माहलपुर के पास पीछे से किसी वाहन ने सुरेश की कार में टक्कर मार दी। कार सामने से आ रही बस से टकरा गई। हादसा ऐसे समय हुआ जब, सुरेश को जन्मदिन पर बधाइयां मिल रही थीं। 

सुरेश मूलरूप से हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना का रहने वाला था। उसके पिता अदालत में नौकरी करते हैं। होशियारपुर पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। सोमवार सुबह पोस्टमार्टम होगा। सुरेश अपने मां-बाप का इकलौता बेटा था। 

रविवार को सुरेश का जन्मदिन था। उसकी बहन होशियारपुर में रहती है। वह पिता के साथ उन्हें लेने गया था। वापस लौटते समय हादसा हो गया। सुरेश को पहले सिविल अस्पताल, होशियारपुर और फिर जालंधर के आक्सफोर्ड अस्पताल ले जाया गया। आक्सफोर्ड में उसे डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। 

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ताक पर पत्रकारिता, तकनीकी दौर में रास्ता रेशमी कालीन पर

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष : साल 1826, माह मई की 30 तारीख को ‘उदंत मार्तंड’ समाचार पत्र के प्रकाशन के साथ हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था. पराधीन भारत को स्वराज्य दिलाने की गुरुत्तर जवाबदारी तब पत्रकारिता के कांधे पर थी. कहना न होगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल अपनी जवाबदारी पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण किया, अपितु भविष्य की हिन्दी पत्रकारिता के लिये एक नयी दुनिया रचने का कार्य किया. स्वाधीन भारत में लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखने तथा सर्तक करने की जवाबदारी हिन्दी पत्रकारिता के कांधे पर थी. 

1947 के बाद से हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी इस जवाबदारी को निभाने का भरसक यत्न किया किन्तु समय गुजरने के साथ साथ पत्रकारिता पहले मिशन से प्रोफेशन हो गई और बाद के समय में पत्रकारिता ने मीडिया का रूप ले लिया. इस बदलाव के दौर में हिन्दी पत्रकारिता की भाषा गुम हो गई और पत्रकारिता की टेक्नालॉजी के स्थान पर टेक्नालॉजी की पत्रकारिता की जाने लगी. अर्थात पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों को तज कर हम तकनीकी पत्रकारिता के दौर में पहुंच गये हैं. तकनीकी पत्रकारिता ने ही पत्रकारिता को मीडिया के स्वरूप में परिवर्तित कर दिया है और यही कारण है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर बार बार सवाल उठाये जाते हैं.

करीब करीब ढाई सौ साल पहले और 1947 के दौर की पत्रकारिता का इतिहास हिन्दी पत्रकारिता के लिये स्वर्णकाल था. इस कालखंड की पत्रकारिता का एकमात्र मिशन अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराना था और अपने प्रकाशनों के माध्यम से वे जनमत निर्माण का कार्य कर रहे थे. 1947 की स्वतंत्रता के बाद स्वाधीन भारत में पत्रकारिता ने एक नई करवट ली. पत्रकारिता, खासतौर पर हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष एक नये भारत की रचना की जवाबदारी थी. 

तब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाना कोई संवैधानिक विषय नहीं है बल्कि उसकी जवाबदारी के चलते माना गया कि पत्रकारिता का लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. देश के समग्र विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाओं का श्रीगणेश किया गया. इन योजनाओं के क्रियान्वयन पत्रकारिता ने पैनी नजर रखी और परिणामस्वरूप अनेक स्तर पर अनियमितताओं पर नियंत्रण पाया जा सका. साल 1947 के बाद से 1975 के पहले तक पत्रकारिता अपने स्वर्णकाल को खोकर रजतकाल में पहुंच चुका था. पत्रकारिता में गिरावट तो दिखने लगी थी लेकिन वह केवल छाया भर थी. साल 1975 में आपातकाल के समय से पत्रकारिता का वैभव गुम होता दिखा. हालांकि पत्रकारिता का वैभव गुमनाम नहीं हुआ था बल्कि अधिसंख्य पत्र मालिकों ने सरकार के समक्ष घुटने टेक दिये थे. पत्र मालिकों के गिरवी हो जाने से पत्र में काम करने वाले पत्रकारों की स्वतंत्रता पर भी नियंत्रण स्वाभाविक था. 

हालांकि हिन्दी पत्रकारिता इस बात के लिये गौरव का अनुभव कर सकती है कि इस बुरे समय में भी कुछ अखबारों ने अपने तेवर को बनाये रखा. यह भी सच है कि थोड़े ही सही, किन्तु इन अखबारों के तेवर से सरकार भीतर से भयभीत थी. दरअसल, यह पत्रकारिता के लिये संक्रमण काल था. एक तरफ बड़ी संख्या में पत्र मालिक सरकार के जीहुजूरी में लग गये थे तो कुछ अखबार विरोध में खड़े थे.

आपातकाल की समाप्ति के बाद भारत में पत्रकारिता का तेवर और तस्वीर एकदम से बदलने लगी. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशनों की संख्या में निरंतर वृद्धि होने लगी. पत्रकारिता में गुणवत्ता का लोप होने लगा और संख्या बल बढ़ जाने से आहिस्ता आहिस्ता पत्रकारिता मिशन के स्थान पर प्रोफेशन बन गयी. पत्रकार प्रोफेशनल होने लगे और प्रकाशक उद्योगपति. अखबारों का सामाजिक सरोकार नेपथ्य में चला गया और अखबार एक उत्पाद बन कर रह गया. यह वही समय है जब ‘पीत पत्रकारिता’ अपने शबाब पर थी. किसी को महिमामंडित करना अथवा किसी की मानहानि करना, इस नये उद्योग को सुहाने लगा था. बदले में उसे मनमाफिक लाभ भी मिलता था. 

पत्रकार अब प्रोफेशनल हो चले थे, सो लेखनी की वह धार भी कम होती महसूस हो रही थी. पत्रकारिता उनके लिये नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं था. सम्पादक नाम की संस्था को विलोपित किये जाने की साजिश भी इसी कालखंड में हुई थी. हिन्दी पत्रकारिता में न सम्पादक की कुर्सी बची और न पत्रकार. ऐसे दौर में ‘जनसत्ता’ का प्रकाशन एक शुभ संकेत था. मालवा की भूमि से आये पत्रकार प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ का सम्पादकीय दायित्व सम्हाला और हिन्दी पत्रकारिता को एक नये उजास से भर दिया. गुमनाम सम्पादक संस्था को प्रभाषजी ने एक नयी पहचान दी और साथ में पत्रकारों को खबर ठोंकने की पूरी स्वाधीनता. 

‘जनसत्ता’ वर्तमान में भी अपने तेवर के साथ पाठकों के बीच उपस्थित है किन्तु शताब्दि परिवर्तन के साथ साथ हिन्दी पत्रकारिता का समूचा चरित्र परिवर्तित हो गया. पत्रकारिता का स्वरूप मीडिया में बदल चुका है तो पत्रकारिता की टेक्नालॉजी के स्थान पर टेक्नालॉजी की पत्रकारिता ने स्थान बनाया. पत्रकारिता तकनीकी रूप से समृद्ध हो गई किन्तु सामाजिक सरोकार पीछे छूट गये. कॉर्पोरेट कल्चर की इस पत्रकारिता में साहब के कुत्ते पहले पन्ने की खबर बनने लगे और रामदीन अपनी गरीबी में ही मर गया. 

इस दौर में एक नयी परिभाषा गढ़ी गई- जो दिखता है, वह बिकता है. पत्रकारिता कभी बिकाऊ थी नहीं, सो उसने रास्ता बदल लिया और मीडिया ने इस रिक्त स्थान पर कब्जा पा लिया. वह दिखने और बिकने की पत्रकारिता कर रहा है. तकनीकी रूप से सक्षम हो जाने के बाद तथ्यों की पड़ताल करने का वक्त नहीं है और समझ भी. ‘कट एंड पेस्ट’ की इस पत्रकारिता ने समूचे पत्रकारिता की परिभाषा बदल दी है. ढाई सौ साल की पत्रकारिता शनै:शनै: किस तरह रसातल में जा रही है, इसका उदाहरण है पेडन्यृज. कल जिसे हम पीत पत्रकारिता कहते थे, आज वह पेडन्यूज की श्रेणी में गिना जाने लगा है. बीते एक दशक में पेडन्यूज का मामला बेहद गर्माया हुआ है. कुछ मामले सामने भी आये हैं किन्तु किसी एक अखबार, पत्रिका या पत्रकार को सजा मिली हो, ऐसी खबर सुनने में मुझसे चूक हो गई है. हालांकि दो-एक राज्य में पेडन्यूज के आरोप में राजनेताओं पर कड़ी कार्यवाही की गई है.  

तकनीकी पत्रकारिता के इस वृहद स्वरूप के लिये बहुत हद तक मीडिया शिक्षा जवाबदार है. देश में पिछले बीस वर्षों में अनेक विश्वविद्यालय आरंभ हो गये हैं जहां मीडिया शिक्षा दी जाती है, पत्रकारिता नहीं. इन विश्वद्यिालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा पत्रकारों की मंजिल अखबार के पन्ने नहीं होते हैं बल्कि टेलीविजन चैनल होते हैं. जिस चमक-धमक के फेर में वे टेलीविजन की नौकरी करने जाते हैं और जब सच का सामना होता है तो विश्वविद्यालय में पढ़े और पढ़ाये गये सारे अध्याय बेमानी लगते हैं. 

पत्रकारिता की जमीन कभी रेशम बिछी कालीन वाला रास्ता नहीं हो सकता है किन्तु मीडिया का रास्ता ही रेशमी कालीन से आरंभ होता है. इस रेशमी कालीन पर चलने के लिये अनेक किसम के उपाय करने होते हैं जिसे आप साम-दाम और दंड-भेद कह सकते हैं. ऐसा भी नहीं है कि इन विश्वविद्यालयों से निकले सभी विद्यार्थी नाकाम होते हैं. बहुत सारे ऐसे विद्यार्थी हैं जो रेशमी कालीन पर चलने लिये जो कुछ करना होता है, करते हैं और कामयाबी के शीर्ष पर बैठते हैं. थोड़ा तहकीकात करने की जरूरत होगी कि अल्पवय में ही वे करोड़ों के स्वामी बन गये हैं. इस तरह का  निर्लज्ज व्यवहार वाला पत्रकार कैसे हो सकता है? शायद यही कारण है कि इन एक नया शब्द इनके लिये गढ़ा गया है- ‘मीडिया कर्मी’. एक कर्मचारी से आप क्या उम्मीद करते हैं? उसका पूरा समय तो इसी गुणा-भाग में निकल जाता है कि वह अपना हित कैसे साधे? कैसे कामयाबी के शिखर तक पहुंचे? ऐसे में वह किसी रामदीन की पीड़ा को समझने की मुसीबत क्यों ले? वह उन खबरों को तव्वजो दे जो उसके संस्थान को अधिकाधिक लाभ दिला सके. मेरे पैंतीस वर्षों के पत्रकारिता जीवन में कभी मैंने ‘पत्रकार कर्मी’ शब्द नहीं सुना क्योंकि एक पत्रकार कभी कर्मचारी हो नहीं सकता. वह तो हमेशा से सामाजिक सरोकार, जनसरोकार से जुड़ा हुआ है. उसके लिये उसका निजी हित कुछ भी नहीं है. एक पत्रकार के लिये उसकी अपनी पीड़ा से किसी रामदीन की पीड़ा ज्यादा अहमियत वाली होती है. एक पत्रकार, किसान की तरह होता है. वह आरंभ से अंत तक कलम घिसते हुये मर जाता है. वह मालिक नहीं बन पाता है जो मालिक बन जाता है, वह पत्रकार नहीं होता है, इस बात पर कोई संशय नहीं होना चाहिये. 

इन दिनों इस बात को लेकर विलाप किया जा रहा है कि खबरों का कोई प्रभाव नहीं होता है. यह सच है कि खबरों का प्रभाव नहीं होता है और हो भी कैसे? जब आप खबर नहीं, सूचना दे रहे हैं. खबरों का अर्थ होता है किसी सूचना के तथ्यों तथा आंकड़ों का गहन परीक्षण एवं उसका विश£ेषण. आधी-अधूरी सूचना और पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर खबरों के प्रकाशन को समाज क्यों गंभीरता से ले? ‘स्टिंग ऑपरेशन’ के नाम पर जो गंदगी की जा रही है, उसे भारतीय समाज सहन नहीं कर पाता है. खोजी पत्रकारिता के नाम पर किसी को व्यक्तिगत रूप से लांछित करना पत्रकारिता की मर्यादा के खिलाफ है. खोजी पत्रकारिता ही करनी है तो पत्रकार अरूण शौरी की बोफोर्स रिपोर्ट को नजीर क्यों नहीं माना जाता? पत्रकार गिरिजाशंकर द्वारा  कैदी को दिये जाने वाली फांसी का आंखों देखा हाल कव्हर करने का विषय नयी पीढ़ी के लिये खोजी पत्रकारिता का विषय क्यों नहीं होता है? ‘ऑपरेशन चक्रव्यूह’ के तहत सांसदों का स्टिंग ऑपरेशन किया गया था. कुछ की सांसदी भी गयी थी. इस ऑपरेशन से कुछ सांसदों के स्टिंग कर उन्हें कटघरे में खड़ा किया गया, यह अनुचित नहीं है किन्तु क्या शेष सांसद एकदम पाक-साफ थे? सवाल के जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा हूं. यह पत्रकारिता की मर्यादा के प्रतिकूल है कि हम कुछ लोगों पर तो अंगुलियां उठायें और शेष को अनदेखा कर दें. सभी को कटघरे में खड़ा करने का साहस जब आयेगा तब पत्रकारिता दुबारा अपना वैभव प्राप्त कर सकेगी. (लेखक भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पदक है )

मनोज कुमार सम्पर्क : 9300469918

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मई में मौसम ही नहीं, मीडिया का इतिहास भी तपता है

मई का मौसम ही नहीं, इतिहास भी तपता रहा है। मानो ये जमाने से सुलगता आ रहा है। इसके चार अध्याय-विशेष, जिनमें दो पत्रकारिता के। एक है आज तीन मई को ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस। इसी महीने की 30 तारीख को हिंदी पत्रकारिता दिवस रहता है। बाकी दो में एक मई दिवस और 10 तारीख को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम दिवस। 1 मई 1886 को अमेरिका में काम के घंटे घटाने की मांग करते मजदूरों पर गोलीबारी के दुखद दिन को मई दिवस के रूप में याद किया जाता है। 

‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव और प्रेस की सेवा करते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने का दिन है। ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ मनाने का निर्णय वर्ष 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के ‘जन सूचना विभाग’ ने मिलकर किया था। इससे पहले नामीबिया में विन्डंहॉक में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था कि प्रेस की आज़ादी को मुख्य रूप से बहुवाद और जनसंचार की आज़ादी की जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। तब से हर साल ‘3 मई’ को ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

आज जबकि हिंदुस्तान के पत्रकार मजीठिया वेतनमान की लड़ाई लड़ रहे हों, ऐसे में इस दिन का महत्व और अधिक उल्लेखनीय हो जाता है। वह इसलिए कि, जब पत्रकार अपने घर में गुलामी के दिन बिता रहा हो, उसे घर मालिक ही मजदूर की तरह रपटाते हुए,उल्टे मजदूरी न देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तक उल्लंघन कर रहे हों, फिर काहे की स्वतंत्रता। जब पत्रकार गुलाम हो तो प्रेस स्वतंत्र कैसे हो सकता है। 

मीडिया की आज़ादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। इसका उल्लेख मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के ‘अनुच्छेद 19’ में किया गया है। भारत में संविधान के अनुच्‍छेद 19 (1 ए) में “भाषण और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार” का उल्‍लेख है, लेकिन उसमें शब्‍द ‘प्रेस’ का ज़िक्र नहीं है, किंतु उप-खंड (2) के अंतर्गत इस अधिकार पर पाबंदियां लगाई गई हैं। इसी क्रम में ‘भारतीय संसद’ द्वारा 2005 में पास किया गया ‘सूचना का अधिकार क़ानून’ भी गौरतलब हो जाता है। इस क़ानून में सरकारी सूचना के लिए नागरिक के अनुरोध का निश्चित समय के अंदर जवाब देना बहुत जरूरी है। संसद में 15 जून, 2005 को यह क़ानून पास कर दिया था, जो 13 अक्टूबर, 2005 से पूरी तरह लागू हो गया।

हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाया जाता है। सन 1826 ई. में इसी दिन पंडित युगुल किशोर शुक्ल ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन आरम्भ किया था। भारत में पत्रकारिता की शुरुआत पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने ही की थी। हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई थी, जिसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। आज हिंदी पत्रकारिता को कारपोरेट मीडिया ने जिस हालत में पहुंचा दिया है, जग जाहिर है। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के लिए गोरे शासकों से जैसा लोहा लेना पड़ा था, उसे तो ये पतित कारपोरेट मीडिया याद भी नहीं करना चाहता है। 

इसी महीने पड़ने वाले प्रथम स्वाधीनता संग्राम दिवस को 1857 के भारतीय विद्रोह के रूप में जाना जाता है। 10 मई 1857 को ही ब्रितानी शासन के विरुद्ध पहला सशस्त्र विद्रोह हुआ था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जारी रहा। इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था। बाद में उसने देशव्यापी आकार ले लिया था। इस विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ।

इस मई महीने में ही क्रांतिकारियों, साहित्यकारों, इतिहासकारों, कवियों, लेखकों की 18 जयंतियां पड़ती हैं और 17 स्मृति (निधन) दिवस।

इस माह के प्रमुख जयंती दिवस इस प्रकार हैं – 

5 मई 1929 – अब्दुल हमीद कैसर (भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक)।

7 मई 1861 – रबीन्द्रनाथ ठाकुर (नोबेल पुरस्कार प्राप्त बांग्ला कवि, कहानीकार, निबंधकार)।

7 मई 1889 – एन. एस. हार्डिकर (प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी)।

8 मई 1895 – गोपबन्धु चौधरी (उड़ीसा के प्रसिद्ध क्रांतिकारी तथा गाँधीवादी कार्यकर्ता)।

11 मई 1912 – सआदत हसन मंटो (कहानीकार, लेखक, पटकथा लेखक और पत्रकार)।

15 मई 1907 – महान क्रांतिकारी सुखदेव।

20 मई 1900 – सुमित्रानंदन पंत (प्रसिद्ध छायावादी कवि)

21 मई 1931 – शरद जोशी (प्रसिद्ध हिंदी व्यंग्यकार)।

22 मई 1774 – राजा राममोहन राय (अग्रणी धार्मिक-सामाजिक क्रांतिद्रष्टा)

23 मई 1923 – अन्नाराम सुदामा (प्रसिद्ध राजस्थानी साहित्यकार)।

27 मई 1894 – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (ख्यातिप्राप्त आलोचक तथा निबन्धकार)।

27 मई 1928 – बिपिन चन्द्रा (प्रसिद्ध इतिहासकार)।

27 मई 1954 – हेमन्त जोशी (कवि-पत्रकार-प्राध्यापक)।  

24 मई 1896 – करतार सिंह सराभा (प्रसिद्ध क्रान्तिकारी)। 

25 मई 1831 – दाग़ देहलवी (प्रसिद्ध उर्दू शायर)।

29 मई 1906 – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर (जाने-माने निबंधकार)।

31 मई 1725 – अहिल्याबाई होल्कर – (प्रसिद्ध वीरांगना)। 

31 मई 1843 – अण्णा साहेब किर्लोस्कर (मराठी रंगमंच के क्रांतिधर्मी नाटककार)।

इस माह में पड़ने वाले 17 स्मृति-दिवस (निधन) इस प्रकार हैं – 

2 मई 1985 -बनारसीदास चतुर्वेदी (प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार)। 

9 मई 1995 – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर (हिन्दी के जाने-माने निबंधकार)।

10 मई 2002 – कैफ़ी आज़मी (फ़िल्म जगत के मशहूर उर्दू शायर)।

12 मई 1993 – शमशेर बहादुर सिंह (हिन्दी कवि)। 

13 मई 2001 – आर. के. नारायण (भारत के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी लेखक)।

14 मई 1978 – प्रसिद्ध नाटककार जगदीशचन्द्र माथुर 

19 मई 1979 – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी (प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार)

20 मई 1932 – विपिन चन्द्र पाल (भारत में क्रान्तिकारी विचारों के जनक)

22 मई 1991 – श्रीपाद अमृत डांगे (भारत के प्रारम्भिक कम्युनिस्ट नेताओं में से एक)

23 मई 2010 – कानू सान्याल (नक्सली आंदोलन के जनक)। 

 23 मई 2011 – चन्द्रबली सिंह (प्रसिद्ध लेखक, आलोचक, अनुवादक)।

24 मई 2000 – मजरूह सुल्तानपुरी (प्रसिद्ध गीतकार) 

26 मई 1986 – श्रीकांत वर्मा (प्रसिद्ध कवि-कथाकार-समीक्षक)।

27 मई 1964 – जवाहरलाल नेहरू (भारत के प्रथम प्रधानमंत्री)।

28 मई 2005 – गोपाल प्रसाद व्यास (प्रसिद्ध कवि, लेखक)।

30 मई 2000 – रामविलास शर्मा (सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार एवं कवि)

31 मई 1988 – द्वारका प्रसाद मिश्रा (स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार)।

जयप्रकाश त्रिपाठी 

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यकूम मई : उम्मीद के मजदूर

एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें?

उम्मीद है कि टूटती नहीं और हकीकत में उम्मीद कभी बदलती नहीं. एक वह दौर था जब सरकार की ज्यादती के खिलाफ, अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने मजदूर सडक़ों पर चले आते थे. सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करते हुये लाठी और गोली खाकर भी पीछे नहीं हटते लेकिन दुर्भाग्य देखिये. कैलेंडर पर जैसे-जैसे तारीख आगे बढ़ती गयी, मजदूर आंदोलन वैसे वैसे पीछे होता गया. अब तो मजदूर संगठनों की स्थिति निराशाजनक है. यह निराशा मजदूर संगठनों की सक्रियता की कमी की वजह से नहीं बल्कि कार्पोरेट कल्चर ने निराशाजनक स्थिति उत्पन्न की है.  मजदूर एकता जिंदाबाद के नारे सुने मुझे तो मुद्दत हो गये हैं. आपने शायद कभी सुना हो तो मुझेे खबर नहीं. भारत सहित समूचे विश्व के परिदृश्य को निहारें तो सहज ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी कि मजदूर नाम का यह शख्स कहीं गुम हो गया है. 

कार्पोरेट सेक्टर के दौर में मजदूर यूनियन गुमशुदा हो गये हैं. एक के बाद एक संस्थानों का निजीकरण किया जा रहा है. निजी संस्थाओं को मजदूरों की जरूरत नहीं होती है. दस मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी है. कार्पोरेट सेक्टर को मजदूर नहीं गुलाम चाहिये. मजदूर कभी गुलाम नहीं हो सकता है. मशीन गुलाम होती है और गुलाम का कर्तव्य होता है आदेश का पालन करना. मशीन कभी आवाज नहीं उठाती है.  लगातार बढ़ती यंत्र व्यवस्था ने समूचे सामाजिक जीवन का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है. हमारी जरूरतों के उत्पादों के निर्माण में यंत्रों के उपयोग से समय की बचत हो रही है, गुणवत्ता भी शायद ज्यादा होगी लेकिन जीवंतता नदारद है. एक मजदूर के बुने गये कपड़ों में उसकी सांसों की गर्मी सहज रूप से महसूस की जा सकती है. उसके द्वारा बुने गये धागों में मजदूर की धडक़न को महसूस किया जा सकता है. एक मशीन के उत्पाद में कोई जीवंतता नहीं होती है. इन उत्पादों से मनुष्य की बाहरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो रही है किन्तु मन के भीतर संतोष का अभाव महसूस किया जा सकता है. 

इस यंत्र व्यवस्था ने न केवल मजदूरों का हक छीना बल्कि लघु उद्योगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है. हर तरफ यंत्र ने ऐसा कब्जा जमाया है कि आम आदमी स्वयं का गुलाम होकर रह गया है. रेल्वे स्टेशनों पर आपको कुलियों की फौज देखने को नहीं मिलेगी क्योंकि इस यांत्रिक व्यवस्था ने हर मुसाफिर को कुली बना दिया है. भारी-भरकम सूटकेस में लगे पहियों को खींचते हुये वह पैसा बचाने में लगा है. सूटकेस में लगे पहिये कुलियों को चिढ़ा रहे हैं और शायद कह रहे हैं ले, अब हो गई तेरी छुट्टी. छुट्टी कुली के रोजगार की ही नहीं हुई है बल्कि उसके चौके-चूल्हे की भी हो गई है. मजदूरी नहीं मिलेगी तो चूल्हा जलेगा कैसे? ऐसे कई काम-धंधे हैं जिन्होंने कामगारों के हाथों को बेकार और बेबस किया है.

सत्ता और शासकों की नींद उड़ा देने वाली आवाज आहिस्ता आहिस्ता मंद पडऩे लगी है. यंत्रों ने जैसे मजदूरों की शेर जैसी दहाड़ को अपने भीतर कैद कर लिया है. शायद यही कारण है कि मजदूर दिवस की ताप से अब समाज गर्माता नहीं है. सोशल मीडिया में भी मई दिवस की आवाज सुनाई नहीं देती है. अखबार के पन्नों पर कहीं कोई खबर बन जाये तो बड़ी बात, टेलीविजन के पर्दे पर भी मजदूर दिवस एक औपचारिक आयोजन की तरह होता है. हैरान नहीं होना चाहिये कि आपका बच्चा कहीं आपसे यह सवाल कभी कर बैठे-यह मजदूर क्या होता है? नयी पीढ़ी को तो यह भी नहीं पता कि एक मई क्या होता है?  इस विषम स्थिति के बावजूद मजदूर उम्मीद से है. उसे इस बात का इल्म है कि दुनिया बदल रही है. इस बदलती दुनिया में मजदूर की परिभाषा भी बदल गई है लेकिन मजदूर और किसान कभी नाउम्मीद नहीं होते. उनकी दुनिया बदल जाएगी, इस उम्मीद के साथ वे जीते हैं. वे मौका आने पर कह भी देते हैं कि – ‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे/इक गांव नहीं, इक खेत नहीं, सारी की सारी दुनिया मांगेंगे. उम्मीद से जीते मजदूर और मजदूर दिवस को मेरा लाल सलाम. 

लेखक मनोज कुमार ई-मेल संपर्क : k.manojnews@gmail.com

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