महाराष्ट्र सरकार के ‘मराठी फिल्म फरमान’ पर पत्रकार, फिल्मकार, लेखक नाराज

नई दिल्ली : ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एनके सिंह, फिल्म निर्माता मुकेश भट्ट, लेखिका शोभा डे, फिल्मकारों और कलाकारों ने मुंबई के सभी मल्टीप्लेक्स में शाम छह से नौ बजे के शो टाइम पर एक मराठी फिल्म दिखाने के महाराष्ट्र सरकार के फरमान को गैरकानूनी और संविधान के खिलाफ करार दिया है।

उल्लेखनीय है कि मंगलवार को महाराष्ट्र विधानसभा में बहस के दौरान सांस्कृतिक मंत्री विनोद तावड़े ने कहा कि मराठी फिल्मों के लिए महाराष्ट्र सरकार ने सभी मल्टीप्लेक्स को प्राइम टाइम में एक मराठी फिल्म दिखाने का निर्देश जारी किया है। फैसले को अमल में लाने के लिए जरूरी सरकारी आदेश जल्द ही जारी हो जाएंगे। इसका उल्लंघन करने वालों पर सरकार कड़ी कार्रवाई करेगी। इसकी नियमावली तैयार की जा रही है।

संस्कृति मंत्री ने कहा है कि मल्टिप्लेक्स और सिंगल थियेटर में फिल्म शुरू होने से पहले 1 से 1.30 मिनट की स्व. दादासाहेब फालके पर बनाई गई छोटी सी फिल्म (एवी) भी दिखानी होगी। फालके पर बनाई गई एवी कई भाषाओं में बनाई गई है। जिस तरह से फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगीत बजाने की तरह फालके की लघु फिल्म दिखाना भी जरूरी होगा।

तावडे ने सदन में बताया कि सीनियर कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण की याद में जेजे स्कूल ऑफ ऑर्ट्स में एक स्मारक बनाया जाएगा। वहां पर उनके महत्वपूर्ण कार्टून धरोहर के रूप में रखे जाएंगे। इसके अलावा शाहीर साबले के नाम पर नया पुरस्कार शुरू किया जाएगा। गोरेगांव स्थित स्व. दादासाहेब फालके फिल्मसिटी का मास्टर प्लान अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। पु.ल. देशपांडे कला अकादमी और कोल्हापुर फिल्मसिटी का गोरेगांव की फाल्के फिल्मसिटी में विलय किया जाएगा। राज्य के बुजुर्ग कलाकारों को सरकार की ओर से दिया जाने वाला मानधन दीवाली के बाद इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सिस्टम द्वारा दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि 199 कानूनों में इस्तेमाल किया गया बॉम्बे शब्द हटाकर इसकी जगह मुंबई शब्द का इस्तेमाल होगा।

मराठी फिल्म दिखाने के फैसले पर लेखिका शोभा डे ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र सरकार को मल्टीप्लेक्स के लिए फरमान जारी करने से पहले उनसे बात करनी चाहिए थी। क्या सरकार उन्हें सब्सिडी देने के लिए तैयार है? अभिनेता रितेश देशमुख ने कहा है कि मुंबई में लोगों की पहली पसंद हिंदी फिल्में हैं। फिल्म निर्माता मुकेश भट्ट ने कहा है कि इस तरह के निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए। हम एक लोकतांत्रिक समाज में रह रहे हैं। सरकार कैसे तानाशाहों के रूप में व्यवहार कर सकती है। फिल्मकार अशोक पंडित ने कहा है कि किसी भी तरह की जबरदस्ती लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। आग्रह किया जा सकता है लेकिन यह हमें समझना होगा कि यह एक व्यवसाय है।

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