वरिष्ठ पत्रकार विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पीहू’ 28 सितंबर को होगी रिलीज, पहला आफिसियल पोस्टर जारी

वरिष्ठ पत्रकार विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पीहू’ 28 सितंबर को रिलीज हो रही है. इस फिल्म का पहला आफिसियल पोस्टर रिलीज कर दिया गया है. पत्रकार से फिल्मकार बने विनोद कापड़ी ने ये पोस्टर सोशल मीडिया पर जारी किया जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं. पीहू फिल्म रिलीज से पहले ही काफी चर्चा बटोर चुकीहै. यह फिल्म देसी-विदेशी कई एवार्ड भी पा चुकी है.

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छह अप्रैल को रिलीज हो रही ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह’ एक बहादुर सिपाही की गाथा है

परमवीर चक्र विजेता सूबेदार जोगिंदर सिंह एक सच्‍चे और बहादुर सिपाही की गाथा है, जिन्‍होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी।सूबेदार जोगिंदर सिंह सन 62 की चीन के साथ लड़ाई में अपनी वीरता और शौर्य दुश्‍मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उनकी इस बहादुरी का किस्‍सा आज देश के लोगों को प्रेरित करेगी। ऐसा कहना है फिल्‍म सूबेदार जोगिंदर सिंह के निर्देशक सिमरजीत सिंह का। वे कहते हैं कि सूबेदार जोगिंदर सिंह की बायोपिक अब 6 अप्रैल से देशभर के सिनेमाघरों में तीन भाषाओं; हिंदी, तमिल और तेलगु में रिलीज़ होगी।

सिमरजीत सिंह ने कहा कि आज कल युवाओं का रुझान काल्पनिक सिनेमा की तरफ अधिक है। हमारे देश में  चारों तरफ समृद्ध संस्कृति, विरासत, ऐतिहासिक घटनाएं और किस्से हैं। उस नज़रिये से देखें तो हमारे पास दर्शकों को दिखाने और उन्हें देने के लिए बहुत कुछ है। वर्तमान परिदृश्य में व्यावसायिक फिल्में बनाने का चलन है। इसके बीच लीक से हटकर एक फिल्म बनाई गई है – ‘सूबेदार जोगिन्दर सिंह’। यह एक वीर सैनिक की जिंदगी और घटनाओं पर आधारित है, जो अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए जुनून और दृढ़ संकल्प से प्रेरित था।

फिल्‍म की कास्टिंग के बारे में उन्‍होंने कहा कि इस फिल्‍म में ‘सूबेदार जोगिन्दर सिंह’ की भूमिका में पंजाब के सुपर स्‍टार गिप्‍पी ग्रेवाल सूबेदार जोगिंदर सिंह की भूमिका में हैं, जिन्‍होंने इस फिल्‍म के लिए काफी मेहनत किया। हमने फिल्‍म को कारगिल और द्रास, राजस्थान एवं असम के कई दुर्गम और कठिन लोकेसंस पर शू‍ट किया है। हमने भारत-चीन की लड़ाई को इस फिल्‍म में 14000 फ़ीट की ऊंचाई पर फिल्‍माया गया है, इस दौरान पहाड़ की दुर्गम चोटियों शूटिंग दौरान पहाड़ पर फिसलने से अभिनेमा गिप्‍पी ग्रेवाल घायल भी हो गये थे।

इसके अलावा भी इस फिल्‍म में उन्‍होंने ज़्यादातर स्टंट्स खुद ही किये। गिप्पी ग्रेवाल, गुग्गु गिल, कुलविंदर बिल्ला, अदिति शर्मा, राजवीर जवंदा, रोशन प्रिंस,करमजीत अनमोल, सरदार सोही, लवलीन कौर सैसन, जॉर्डन संधू मुख्‍य भूमिका में हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता राशीद रंगरेज़ द्वारा लिखित और सुमीत सिंह द्वारा तैयार की गई फिल्म ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह’ का ट्रेलर सागा म्यूज़िक एव म्यूनिसिस इन्फो सोल्युशंस के साथ सैवन कलर्स मोशन पिक्चर्स ने जारी किया है।

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भंसाली को स्वरा की चिट्ठी… आपकी फिल्म देखकर ख़ुद को मैंने महज एक योनि में सिमटता महसूस किया

प्रिय भंसाली साहब,

सबसे पहले आपको बधाई कि आप आखिरकार अपनी भव्य फिल्म ‘पद्मावत’- बिना ई की मात्रा और दीपिका पादुकोण की खूबसूरत कमर और संभवतः काटे गए 70 शॉटों के बगैर, रिलीज करने में कामयाब हो गए. आप इस बात के लिए भी बधाई के पात्र हैं कि आपकी फिल्म रिलीज भी हो गई और न किसी का सिर उसके धड़ से अलग हुआ, न किसी की नाक कटी. और आज के इस ‘सहिष्णु’ भारत में, जहां मीट को लेकर लोगों की हत्याएं हो जाती हैं और किसी आदिम मर्दाने गर्व की भावना का बदला लेने के लिए स्कूल जाते बच्चों को निशाना बनाया जाता है, उसके बीच आपकी फिल्म रिलीज हो सकी, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसलिए आपको एक बार फिर से बधाई.

आप इसलिए भी बधाई के हकदार हैं, क्योंकि आपके सभी कलाकारों- प्रमुख और सहायक, ने गजब का अभिनय किया है. और बेशक, यह फिल्म किसी अतिभव्य, आश्चर्यचकित करनेवाले नजारे की तरह थी. लेकिन बात यह भी है कि हर चीज पर अपनी छाप छोड़ देनेवाले आपके जैसे शानदार फिल्म निर्देशक से यही उम्मीद की ही जाती है. बहरहाल सर, हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं. मुझे नहीं पता कि आपको यह याद है या नहीं, लेकिन मैंने आपकी फिल्म गुजारिश  में एक छोटा सा किरदार निभाया था. ठीक-ठीक कहूं, तो उसमें मेरी भूमिका दो दृश्यों की थी. मुझे याद है कि मेरे संवादों को लेकर मेरी आपसे एक छोटी सी बातचीत हुई थी और आपने संवादों को लेकर मेरी राय पूछी थी.

मुझे याद है कि मैं एक महीने तक इस बात पर गर्व महसूस करती रही कि संजय लीला भंसाली ने मुझसे मेरी राय पूछी थी. मैंने एक दृश्य में आपको जूनियर कलाकारों को और दूसरे में जिमी जिब ऑपरेटर को शॉट की बारीकी के बारे में उत्तेजित होकर समझाते हुए देखा. और मुझे याद है, उस समय मेरे मन में ख्याल आया था- ‘वाह, यह आदमी अपनी फिल्म की छोटी सी छोटी बारीकी की वास्तव में परवाह करता है.’’ मैं आपसे काफी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी.

मैं आपकी फिल्मों के उत्साही दर्शकों में से हूं और जिस तरह से आप अपनी हर फिल्म से अपने ही बनाए गए मानकों को और ऊपर उठाते हैं और जिस तरह से आपके समर्थ निर्देशन में सितारे जानदार, गहरे अभिनेताओं में तब्दील हो जाते हैं, वह बात मुझे आश्चर्यचकित करती है. यादगार प्रेम कहानी कैसी होनी चाहिए, इसको लेकर मेरे विचारों को गढ़ने में आपकी भूमिका रही है. मैं उस दिन का सपना देखा करती थी जब आप मुझे किसी फिल्म के मुख्य किरदार के तौर पर निर्देशित करेंगे. मैं आपकी फैन थी और फैन हूं.

और मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि मैंने वास्तव में आपकी फिल्म के लिए लड़ाई लड़ी. उस समय जब इसे पद्मावती  से ही पुकारा जा रहा था. मैं बताना चाहूंगी कि मैंने लड़ाई के मैदान में तो नहीं लेकिन ट्विटर टाइमलाइन पर लड़ाई जरूर लड़ी, जहां ट्रॉल्स से मेरा झगड़ा हुआ, लेकिन फिर भी मै आपके लिए लड़ी. मैंने टीवी कैमरा के आगे वे बातें कहीं, जो मुझे लग रहा था कि आप 185 करोड़ रुपये फंसे होने के कारण नहीं कह पा रहे थे. यहां इसका प्रमाण हैः

और मैंने जो कहा, उस पर पूरी सच्चाई के साथ यकीन किया. मैंने पूरी सच्चाई के साथ यह यकीन किया कि और आज भी करती हूं कि इस देश के हर दूसरे व्यक्ति को वह कहानी कहने का हक है, जो वह कहना चाहता है और जिस तरह से कहना चाहता है. वह अपनी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़ कर दिखा सकता है और ऐसा करते उन्हें अपने सेटों को जलाए जाने का, मारपीट किए जाने, अंगों को काटे जाने, जान जाने का डर नहीं सताएगा.

साथ ही, साधारण शब्दों में कहें, तो लोगों के पास फिल्म बनाने और उसे रिलीज करने की क्षमता बची रहनी चाहिए और बच्चों के सुरक्षित तरीके से स्कूल जाने पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए. और मैं चाहती हूं कि आप यह जानें कि मैं सचमुच चाहती थी कि आपकी फिल्म को जबरदस्त कामयाबी मिले. यह बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दे. इस फिल्म की कमाई अपने आप में करणी सेना के आतंकवादियों और उससे सहानुभूति रखनेवालों के चेहरे पर किसी तमाचे की तरह होती. और इसलिए काफी उत्साह और काफी पूरी गर्मजोशी के साथ मैंने पद्मावत के पहले दिन के पहले शो का टिकट बुक कराया और अपने पूरे परिवार और कुक को साथ लेकर फिल्म को देखने गई.

शायद फिल्म के साथ इस जुड़ाव और इस सरोकार के कारण ही इसे देखने के बाद मैं सन्न रह गई. और शायद इसी कारण मैं आपको आजाद होकर लिखने का दुस्साहस कर रही हूं. मैं अपनी बात सीधे और संक्षेप में कहने की कोशिश करूंगी, वैसे तो कहने के लिए काफी कुछ है.

-सर, बलात्कार होने के बाद भी स्त्री के पास जिंदा रहने का अधिकार है.
-पतियों और उनकी यौनिकता के पुरुष रक्षकों, स्वामियों, नियंत्रकों… चाहे जिस रूप में आप पुरुष को देखना चाहें..की मृत्यु के बाद भी स्त्री को जीने का अधिकार है.
-पुरुष जीवित हों या न हों, स्त्रियों को इस तथ्य से स्वतंत्र होकर जीने का अधिकार है.
-स्त्री के पास जिंदा रहने और मासिक धर्म का अधिकार है.

यह वास्तव में काफी बुनियादी बात है. कुछ और बुनियादी बिंदु इस तरह हैं:

-स्त्रियां चलती-फिरती, बतियाती योनियां नहीं हैं.
-हां, स्त्रियां योनियां धारण करती हैं, मगर वे इससे कहीं ज्यादा हैं. इसलिए उनके पूरे जीवन को योनि से बाहर रखकर, उसे नियंत्रित करने, उसकी हिफाजत करने और उसका रख-रखाव करने से बाहर रखकर देखे जाने की जरूरत है. (हो सकता है कि 13वीं सदी में ऐसा होता रहा हो, लेकिन 21वीं सदी में ऐसे विचारों का अनुसरण करने की हमे कोई जरूरत नहीं है. और हमें इसका महिमामंडन तो निश्चित तौर पर नहीं करना चाहिए.)
-यह अच्छा होता अगर योनियों का सम्मान किया जाता, मगर अगर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से ऐसा न हो, तो भी स्त्रियां अपना जीवन जी सकती हैं. उन्हें सजा के तौर पर इस कारण मृत्यु देने की जरूरत नहीं है कि दूसरे व्यक्ति ने उसकी मर्जी के खिलाफ उसकी योनि का अपमान करने की जुर्रत की.
-योनि के बाहर भी जिंदगी है इसलिए बलात्कार के बाद भी एक जीवन हो सकता है. (मुझे मालूम है कि मैं यह दोहरा रही हूं, लेकिन इस पर जितना जोर दिया जाए, कम है.)
-सामान्य शब्दों में कहें, तो जीवन में योनि के अलावा भी काफी कुछ है.

आप यह सोच कर परेशान हो रहे होंगे कि आखिर मैं इस तरह से योनि में ही क्यों अटक गई हूं… क्योंकि सर, आपकी भव्य फिल्म को देखने के बाद मुझे योनि जैसा होने का एहसास हुआ. मुझे ऐसा लगा कि मैं महज एक योनि में सीमित कर दी गयी हूं. मुझे ऐसा लगा कि पिछले कई वर्षों में स्त्रियों और स्त्री आंदोलनों ने जो ‘छोटी-मोटी’ सफलताएं अर्जित की हैं, जैसे, वोट देने का अधिकार, संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार, मातृत्व अवकाश, विशाखा फैसला, बच्चे को गोद लेने का अधिकार, ये सारी सफलताएं निरर्थक थीं क्योंकि हम घूम फिर कर बुनियादी सवाल पर पहुंच गए हैं.

हम सब जीवन के अधिकार के बुनियादी सवाल पर पहुंच गए हैं. मुझे ऐसा लगा कि आपकी फिल्म ने हमें अंधकार युग के इस सवाल पर पहुंचा दिया है- क्या स्त्री- विधवा, बलत्कृत, युवा, बूढ़ी, गर्भवती, नाबालिग… को जिंदा रहने का अधिकार है? मैं यह समझती हूं कि जौहर और सती हमारे सामाजिक इतिहास का हिस्सा हैं. ये वास्तविकताएं हैं. मैं यह समझती हूं कि ये सनसनीखेज, डरावनी, नाटकीय घटनाएं हैं, जिन्हें भड़कीले और सम्मोहक दृश्यों में ढाला जा सकता है खासकर अगर इसे आपके जैसे सधे हुए फिल्मकार द्वारा परदे पर उतारा जाए. लेकिन, फिर 19वीं शताब्दी में हत्यारे श्वेत गिरोहों द्वारा अश्वेतों को पीट-पीटकर मार देने का दृश्य भी इसी तरह से सनसनीखेज, डरावनी और नाटकीय सामाजिक घटनाएं थीं. क्या इसका मतलब यह है कि किसी को नस्लवाद की कुरूप सच्चाई को ध्यान में रखे बगैर ही इस विषय पर फिल्म बना देनी चाहिए? या ऐसी फिल्म बना देनी चाहिए, जिसमें नस्लीय नफरत पर कोई टिप्पणी न हो? इससे भी खराब बात कि क्या किसी के गर्म खून, शुद्धता और शौर्य के प्रतीक के तौर पर पीट-पीटकर जान ले लेने को महिमामंडित करनेवाली कोई फिल्म बनानी चाहिए- मुझे नहीं पता है. मेरे लिए यह समझ से परे है कि आखिर कोईऐसे जघन्य अपराध को कैसे महिमामंडित कर सकता है?

सर, मेरा यह पक्का यकीन है कि आप इस बात से इत्तेफाक रखते होंगे कि सती और जौहर की प्रथा महिमामंडित किए जाने की चीजें नहीं हैं. यकीनन, आप इस बात से इत्तेफाक रखते होंगे कि प्रतिष्ठा, त्याग, शुद्धता के चाहे जिस आदिम विचार के कारण स्त्री और पुरुष ऐसी परंपराओं में शामिल होते हैं, मगर सती और जौहर- स्त्री खतने और आॅनर किलिंग की ही तरह गहरे तक पितृसत्तात्मक, स्त्री विरोधी और समस्या से भरे विचारों में डूबा हुआ है. यह वह मानसिकता है, जो यह मानती है कि किसी स्त्री का मूल्य उसके योनि में निहित है, जो यह मानती है कि अगर स्त्रियों पर किसी पुरुष मालिक का नियंत्रण नहीं है या उनके शरीरों को अगर किसी ऐसे पुरुष के स्पर्श या यहां तक कि नजरों से, जिसे समाज ने स्त्री पर स्वामित्व जताने या नियंत्रित करने का अधिकार नहीं दिया है, अपवित्र कर दिया गया हो, तो स्त्री जीवन मूल्यहीन है.

सती, जौहर, स्त्री खतना, ऑनर किलिंग आदि की प्रथाओं को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ये सिर्फ स्त्री से समानता का अधिकार नहीं छीनती हैं, बल्कि, ये किसी स्त्री से उसका व्यक्तित्व भी छीन लेती हैं. वे स्त्रियों को मानवता से रिक्त कर देती हैं. वे स्त्रियों से जीवन का अधिकार छीन लेती हैं. और यह गलत है. हम यह मानकर चल सकते थे कि 2018 में इन बातों पर बात करने की भी जरूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है, इसकी जरूरत बनी हुई है. यकीनन आप स्त्री खतना और ऑनर किलिंग का महिमामंडन करनेवाली फिल्म बनाने पर विचार नहीं करेंगे.

सर, आप कहेंगे कि मैं राई का पहाड़ बना रही हूं. आप कहना चाहेंगे कि मुझे फिल्म को इसके संदर्भ में देखना चाहिए. आप कहेंगे कि ये 13वीं सदी के लोगों के बारे में कहानी है. और 13वीं सदी में जीवन ऐसा ही था- बहुविवाह स्वीकृत था. मुसलमान जानवरों जैसे थे, जो मांस और स्त्री का भोग समान चाव से करते थे. और इज्जतदार महिलाएं खुशी-खुशी अपने पतियों की चिताओं में कूद जाया करती थीं और अगर वे पति के दाह-संस्कार में नहीं पहुंच पाती थीं, तो वे एक चिता तैयार करती थीं और इसमें छलांग लगा देती थीं. आप कहेंगे कि हकीकत में वे सामूहिक आत्महत्या के विचार को इतना पसंद करती थीं कि वे अपने दैनिक साज-श्रृंगार के दौरान इसके बारे में हंसते हुए बातें किया करती थीं. ऐसा संभव था, आप मुझसे कहेंगे.

नहीं सर, अपनी क्रूर प्रथाओं के साथ 13वीं सदी का राजस्थान बस उस महाकाव्य की ऐतिहासिक रंगमंच है, जिसका रूपांतरण आपने अपनी फिल्म पद्मावत में किया है. लेकिन, आपकी फिल्म का संदर्भ 21वीं सदी का भारत है; जहां देश की राजधानी में एक पांच साल की बच्ची का बच्ची के साथ चलती बस के भीतर सामूहिक दुष्कर्म किया गया. उसने अपने सम्मान के अपवित्र हो जाने के कारण खुदकुशी नहीं की. बल्कि सर वह अपने छह बलात्कारियों के साथ लड़ी. उसकी इस लड़ाई में इतनी ताकत थी, कि उनमें से एक दरिंदे ने एक लोहे की छड़ उसके गुप्तांग के भीतर घुसा दी. वह सड़क पर पड़ी मिली, जहां उसकी अंतड़ियां तक बाहर आ गई थीं. यह ब्यौरा देने के लिए मैं माफी चाहूंगी, लेकिन सर, आपकी फिल्म का वास्तविक ‘संदर्भ’ यही है.

आपकी फिल्म के रिलीज होने से एक सप्ताह पहले, एक 15 वर्षीय दलित लड़की के साथ हरियाणा के जींद में बर्बरतापूर्व सामूहिक दुष्कर्म किया गया. यह अपराध खौफनाक तरीके से निर्भया दुष्कर्म से मिलता-जुलता था. आपको यह भली-भंति पता है कि सती और स्त्री के साथ बलात्कार, एक ही मानसिकता के दो पहलू हैं. एक बलात्कारी, स्त्री को नियंत्रित करने के लिए, उस पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए या उसके अस्तित्व को मिटा देने के लिए उसके जननांगों पर हमला करने और उसका अनादर करने, उसे क्षत-विक्षत कर देने की कोशिश करता है.

सती-जौहर पर अगर-मगर करनेवाला या उसका कोई समर्थक स्त्री के अस्तिव को ही पूरी तरह मिटा देने की कोशिश करता है, अगर उसके जननांगों का अनादर किया गया हो, या फिर वे उसके ‘वैध’ पुरुष मालिक के नियंत्रण में नहीं रह जाते. दोनों ही स्थितियों में प्रयास और विचार यही होता है कि किसी स्त्री को उसके जननांगों में ही सीमित कर दिया जाए. किसी भी कला का संदर्भ वह समय और स्थान होता है, जहां/जब उसका निर्माण और उपभोग किया जाता है. यही कारण है कि सामूहिक दुष्कर्म से पीड़ित यह भारत, बलात्कारों की अनदेखी करनेवाली मानसिकता, पीड़ित पर ही दोष मढ़नेवाला समाज ही आपकी फिल्म का असली संदर्भ है. सर, निश्चित तौर पर अपनी फिल्म में सती और जौहर की कोई आलोचना पेश कर सकते थे.

आप यह कहेंगे कि आपने फिल्म की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर दिया था, जिसमें यह कहा गया था कि फिल्म सती या जौहर का समर्थन नही करती है. ये बात सही है, लेकिन आपने इसके बाद 2 घंटे 45 मिनट तक आप राजपूती आन-बान-शान, चिता में जल कर मर जाने का रास्ता चुननेवाली सम्माननीय राजपूत स्त्रियों के साहस का जयगीत सुनाते रहे. ये स्त्रियां अपने पतियों के अलावा किसी दुश्मन द्वारा छुए जाने, जो संयोग से मुस्लिम थे, की जगह चिता में जल कर मर जाने का रास्ता चुनती हैं. तीन बार से ज्यादा आपकी कहानी के अच्छे चरित्रों ने सती/जौहर को एक सम्मान के लायक विकल्प बताया.

आपकी नायिका, जो सुंदरता और बुद्धि का साक्षात उदाहरण है, अपने पति से जौहर करने की इजाजत मांगती है, क्योंकि वह उसकी इजाजत के बगैर यह भी नहीं कर सकती थी. इसके ठीक बाद, उसने सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच युद्ध को लेकर एक लंबा भाषण दिया और सामूहिक सती को सत्य और धर्म के रास्ते के तौर पर पेश किया. और उसके बाद क्लाइमेक्स में, जिसे बेहद भव्य तरीके से फिल्माया गया है, देवी दुर्गा की तरह लाल रंग के कपड़ों में सजी सैकड़ों स्त्रियां जौहर की आग में छलांग लगा देती हैं.

दूसरी तरफ एक उन्मादी मुस्लिम मनोरोगी खलनायक उनकी ओर देखता रहता है और पीछे से एक फड़कता हुआ संगीत बजता है, जिसमें किसी राष्ट्रगान जैसी शक्ति है- इस दृश्य में दर्शकों को अचंभित कर देने और इस खेल का प्रशंसक बना देने की क्षमता थी. सर, अगर यह सती और जौहर का महिमामंडन करना नहीं है, तो मुझे सचमुच नहीं पता कि आखिर किस चीज को ऐसा कहा जाएगा?

मुझे आपकी फिल्म का क्लाइमेक्स देखते हुए, गर्भवती महिलाओं और छोटी बच्ची को आग में कूदते हुए देख काफी असहजता का अनुभव हुआ. मुझे लगता कि मेरा पूरा अस्तित्व ही गैरकानूनी है, क्योंकि अगर भगवान न करे, मेरे साथ कुछ गलत हो जाता है, तो मैं उस आग के गड्ढे से बाहर निकल आने के लिए कुछ भी करूंगी- भले ही इसका मतलब खिलजी जैसे राक्षस की हमेशा के लिए गुलाम बन कर रहना ही क्यों न हो. लेकिन, उस समय मुझे ऐसा लगा कि मृत्यु के ऊपर जीवन को चुनना मेरी गलती थी. मुझे लगा कि जीवन की इच्छा रखना गलत है. सर, यही तो सिनेमा की ताकत है.

सर, आपक सिनेमा खासतौर पर प्रेरणादायक, भावनाएं जगानेवाला और ताकतवर है. यह दर्शकों को भावुकता के ज्वार-भाटे में धकेल सकता है. यह सोच को प्रभावित कर सकता है और सर, यही कारण है कि आपको इस बात को लेकर पूरी तरह जिम्मेदार रहना चाहिए कि आप फिल्म में क्या कर रहे हैं और क्या कह रहे हैं. 1829 से 1861 के बीच कुछ सुधारवादी सोच रखनेवाले भारतीयों के समूह और ब्रिटिश प्रांतीय सरकारों और रजवाड़ों ने कई फैसलों के द्वारा सती-प्रथा को समाप्त किया और इसे अपराध घोषित किया. आजाद भारत में इंडियन सती प्रिवेंशन एक्ट (1988) ने सती में किसी तरह की मदद पहुंचाने, उसके लिए उकसाने और सती का किसी तरह से महिमामंडन करने को अपराध की श्रेणी में लाया.

आपके द्वारा बिना सोचे-विचारे इस स्त्री विरोधी आपराधिक प्रथा का जिस तरह से महिमामंडन किया गया है, उसके लिए आपको जवाब देना चाहिए. सर, टिकट खरीद कर आपकी फिल्म देखनेवाले दर्शक के तौर पर मुझे आपसे यह पूछने का अधिकार है कि आपने ऐसा कैसे और क्यों किया?  आपको यह बात भली-भांति पता होगी कि आधुनिक भारत में भी जौहर जैसे कृत्यों के ज्यादा ताजा उदाहरण मिलते हैं. भारत और पाकिस्तान के रक्त-रंजित विभाजन के दौरान करीब 75,000 औरतों के साथ बलात्कार, अपहरण किया गया, उन्हें ‘दूसरे’ धर्म के पुरुष द्वारा बलपूर्वक गर्भवती बनाया गया. उस दौर में स्त्रियों द्वारा स्वैच्छिक तरीके से या मदद देकर करवाई गई आत्महत्याओं की कई घटनाएं मिलती हैं. कुछ मामलों में ‘दूसरे’ धर्म के लोग स्त्रियों को छू पाएं, इससे पहले पतियों और पिताओं ने खुद अपनी पत्नियों और बेटियों का सिर कलम कर दिया.

पंजाब के थोआ खालसा में दंगे के भुक्तभोगी बीर बहादुर सिंह ने आत्महत्या करने के लिए औरतों के गांव के कुएं में कूदने के दृश्य का वर्णन किया था. उन्होंने बताया था कि किस तरह से आधे धंटे में वह कुआं पूरा भर गया था. जो औरतें ऊपर थीं, वे बच गईं. उनकी मां भी बचनेवालों में से थीं. सिंह ने उर्वशी बुटालिया की 1998 में प्रकाशित किताब, द अदर साइड ऑफ साइलेंस  में याद करते हुए कहा कि वे अपनी मां के जिंदा रह जाने को लेकर लज्जित थे. यह भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है और इसे शर्म, डर, दुख, आत्मचिंतन, सहानुभूति, सतर्कता के साथ याद किए जाने की जरूरत है, बजाय इसका विचारहीन, सनसनीखेज महिमामंडन करने के.

विभाजन की ये दुखद कहानियां भी भले उतने प्रत्यक्ष रूप में न सही, लेकिन आपकी फिल्म पद्मावत का संदर्भ बनती हैं. भंसाली सर, मैं शांति से अपनी बात खत्म करना चाहूंगी; आपको आपकी इच्छा के अनुसार और फिल्में बनाने, उनकी शूटिंग करने और उन्हें रिलीज करने की शुभकामनाएं दूंगी. मैं चाहूंगी कि आप, आपके अभिनेता, प्रोड्यूसर, स्टूडियो और दर्शक धमकियों और उपद्रवों से महफूज रहें. मैं आपकी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए ट्रॉल्स और टीवी टिप्पणीकारों से लड़ने का वादा करती हूं. लेकिन, मैं आपसे यह भी वादा करती हूं कि आप जनता के लिए जो कला रचेंगे, उसके बाबत सवाल पूछने से मैं नहीं चूकूंगी. इसके साथ ही हमें यह उम्मीद भी करनी चाहिए कि करणी सेना या मरणी सेना के किसी उन्मादी सदस्य के मन में सती प्रथा को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग करने का विचार न आये!

आपकी

स्वरा भास्कर


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फिल्म ‘न्यूटन’ अपने दर्शकों के एक गाल को सहलाते हुए दूसरे पर चांटे जड़ती है!

Nirendra Nagar : अभी ‘न्यूटन’ देखी हॉल में। फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे प्रशासन, पुलिस और सशस्त्र बलों की मिलीभगत से चुनाव के नाम पर इस देश में कई जगह केवल छलावा होता आया है चाहे वह कश्मीर हो या छत्तीसगढ़। पहलाज़ निहलानी के रहते तो यह मूवी सेन्सर बोर्ड से पास ही नहीं होती। वैसे न्यूटन जो एक ईमानदार युवा सरकारी कर्मचारी है और जो इस बात पर डटा हुआ है कि वह अपने अधिकार वाले बूथ में असली मतदान करवाकर रहेगा, उसकी ज़िद्दी कोशिशों पर जब दर्शक हँसते हैं तो स्पष्ट होता है कि ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की वाक़ई इस देश में क्या क़ीमत है। एक दर्शक तो वास्तव में बोल भी पड़ा – ‘पागल है क्या!’ ऐसा लगा जैसे उसने न्यूटन और उसके जैसे सभी लोगों को गाली दी हो।

Nitin Thakur : बहुत लोग न्यूटन देख चुके होंगे. मैंने देखने के बावजूद काफी वक्त तक कुछ नहीं लिखा. ऐसी फिल्मों पर लिखने के लिए अच्छा खासा वक्त चाहिए. सबसे बढ़कर वो मानसिक परिस्थिति होनी चाहिए जिसमें आप फिल्म के सभी पहलुओं को सामने रख सकें. यहां वो पहलू भी शामिल हैं जो छिपे रह जाते हैं. फिल्म तो सब एक ही देखते हैं पर किसी से कुछ छूट जाता है तो किसी को कुछ दिख जाता है. रुझान और चीज़ों को ग्रहण करने पर है कि आपने कितना सीखा या देखा.

न्यूटन अपने काम को ईमानदारी से पूरा करने की सनक पर है. वो तंत्र के आपस में उलझते कर्मचारियों की उस “अंडरस्टैंडिंग” पर है जो कानूनी तो नहीं मगर व्यवस्था बनाए रखने के लिए डेवलप हुई और अब स्वीकृत है. फिल्म दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सीमाएं दिखाने पर है. ये बताती है कि हम अपने सीमित अधिकारों और ताकत के बूते किसी हद तक सही रास्ते चल भी सकते हैं. हां, गांधी दुनिया में स्वीकारे जाने से पहले कभी पागल लगे होंगे.. ऐसा ही आपको फिल्म वाले नूतन कुमार उर्फ न्यूटन के लिए लग सकता है. कुछ साल पहले आई “हैदर” दिखा कुछ रही थी मगर तल के नीचे बयां कुछ और ही करती थी. इसी तरह “न्यूटन” सिनेमाघर के दर्शकों को एक गाल पर सहलाते हुए दूसरे पर चांटे जड़ रही है.

जैसा कि मैंने कहा कि अपना अपना हिसाब है. कोई सहलाने को ज़्यादा महसूस करता है और कोई चोट को. इसे फिल्म का बहुअर्थी होना ही कहेंगे कि किसी दृश्य पर आपकी सीट के एक तरफ बैठा दर्शक हंस सकता है तो ठीक उसी वक्त वही दृश्य दूसरी तरफ बैठे दर्शक को रुला सकता है. मैं हिंदी फिल्मों से निराश होकर सालों पहले विदेशी फिल्में देखने लगा था. कुछ सालों बाद जब मैंने हिंदी फिल्म की गली में झांका तो पाया कि सूरत बदलने लगी है. कुछ लोग जो मोहल्ले का माहौल खराब कर रहे थे वो जा चुके हैं. उन मकानों में नए लोग आ गए हैं जो तुलनात्मक रूप से पुराने वालों से बहुत बेहतर हैं. समाज अब “नो मीन्स नो” पर फिल्म बनाकर आत्ममंथन और पछतावे की भावना के साथ जी रहा है.

खुद न्यूटन सत्तर साल पुरानी व्यवस्था को वैसे ही देख रही है जैसे आप काफी वक्त से एक ही जगह पड़ी ईंट उठाते हैं और उसके नीचे पल रहे कीड़े आपके सामने रेंगते हुए चले आते हैं. अब राजकुमार राव ऑस्कर में जा चुके हैं. कहा जा सकता है कि फिल्म को ऑस्कर के लिए चुनकर गलती नहीं की गई है. भले वो ना भी जीते तो भी बहुत फर्क नहीं पड़ता. हर फिल्म के साथ गुणवत्ता बढ़ ही रही है. आप भी इस क्वालिटी चेक के लिए न्यूटन देखें. ऐसी फिल्मों को पैसा कमाने का मौका मिलना चाहिए. अगर हो सके सिनेमाघर का रुख कीजिएगा. डीवीडी आने पर बच्चों को दिखाने के लिए खरीद लीजीएगा. आज के दौर में न्यूटन कमर्शियल ड्रामा कम एक डोक्यू ड्रामा ज़्यादा है.

वरिष्ठ पत्रकार नीरेंद्र नागर और नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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मीडिया केंद्रित फिल्म ‘JD’ में कई पत्रकारों ने किया काम, गिना रहे हैं डायरेक्टर शैलेंद्र पांडेय सबके नाम (देखें वीडियो)

मीडिया पर जोरदार फ़िल्म ‘जेडी’ बनाने वाले शैलेन्द्र पांडेय ने निकाली अपनी भड़ास। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को कठघरे में खड़ा किया। कई असली पत्रकारों ने फिल्म में पत्रकार का किरदार निभाया है। तो, फ़िल्म में किन-किन असली पत्रकारों ने रोल किया, उन सबके नामों का किया खुलासा किया। शैलेंद्र पांडेय से बातचीत की भड़ास के संपादक यशवंत सिंह ने।

शैलेंद्र कानपुर के बगल के जिले उन्नाव के रहने वाले हैं। फिलहाल राजस्थान पत्रिका समूह में नेशनल फोटो एडिटर हैं। उन्हें फोटो जर्नलिज्म के लिए रामनाथ गोयनका एवार्ड भी मिल चुका है। ‘जेडी’ शैलेंद्र की पहली फिल्म है। पूरा बातचीत के जरिए आप ‘जेडी’ फिल्म बनने की प्रक्रिया से लेकर शैलेंद्र पांडेय के जीवन-करियर आदि के बारे में भी जान सकते हैं। देखें वीडियो…

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JD फिल्म में मजीठिया वेज बोर्ड का मुद्दा भी है, पढ़िए यशवंत का रिव्यू (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : जबरदस्त है JD फ़िल्म। मीडिया का नंगापन देखना हो तो इसे ज़रूर देखें। Shailendra Pandey ने अपनी पहली ही फ़िल्म में कमाल कर दिया है। फिल्म की पब्लिसिटी न हो पाने से दर्शक कम आए पहले दिन लेकिन जो भी गया, पूरा देख कर ही निकला। फ़िल्म का डिजिटल पार्टनर भड़ास4मीडिया है। ऐसी पोलखोल वाली फिल्म से भड़ास का जुड़ना सबको अच्छा लगा। एनसीआर समेत कई शहरों में फ़िल्म को थियेटर में रिलीज करा ले जाना एक नए और कम बजट वाले फिल्मकार शैलेन्द्र के लिए उपलब्धि है। फिल्म में मजीठिया वेज बोर्ड का भी जिक्र है, जो एक साहस भरा काम है।

किस शहर में और किस टाइम पर देख सकते हैं फिल्म JD, उसका विववरण…

फ़िल्म कमाई भले न ठीकठाक कर पाए लेकिन पत्रकारिता के असली चेहरे को उजागर करने वाली सबसे जोरदार फिल्म के बतौर सिनेमा के इतिहास में याद रखी जाएगी। कैमरे का कमाल पूरी फिल्म में दिखता रहता है। लखनऊ प्रेस क्लब से लेकर दिल्ली, कानपुर, मुंबई के चिर परिचित लोकेशन्स हम जैसे भटकने वाले पत्रकारों को बरबस सारी पुरानी यादें ताज़ा कराते हैं। अगर आप मीडिया की दुनिया को समझना चाहते हैं तो ये फिल्म मस्ट वॉच की कैटगरी में आती है। गाने शानदार हैं। फ़िल्म को तहलका मैग्ज़ीन और तरुण तेजपाल कांड को ध्यान में रखकर देखेंगे तो बहुत कुछ समझ में आ जाएगा। एक बार फिर से शानदार फ़िल्म के लिए शैलेन्द्र पांडे और उनकी पूरी टीम को बधाई।

टाइम्स आफ इंडिया अखबार ने जेडी फिल्म को न देखने की सलाह दी है। ऐसा क्यों? इसका खुलासा कर रहे हैं यशवंत सिंह. नीचे दिए वीडियो को क्लिक करें :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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आज रिलीज हुई फिल्म ‘जेडी’ की कहानी तरुण तेजपाल की आपबीती है!

फोटो जर्नलिस्ट शैलेंद्र पांडेय की यह फिल्म मीडिया की एक कहानी पर आधारित है… अमर सिंह ने भी किया है अभिनय… भड़ास4मीडिया डॉट काम डिजिटल पार्टनर है….

Pankaj Shukla : बहुत ख़ास है ‘जेडी’… फोटो जर्नलिस्ट शैलेन्द्र पांडे की फिल्म ‘जेडी’ आज रिलीज़ हो रही है। शैलेन्द्र से मेरा नाता लगभग दो दशक पुराना है। दैनिक जागरण में कई वर्ष मेरे सहयोगी रहे। यह हमेशा से तय था कि शैलेन्द्र भीड़ का हिस्सा नहीं रहने वाले। कैमरे के पीछे से जो एंगल शैलेन्द्र को दिखता था वो साबित करता था कि उन्नाव के बीघापुर से निकला यह चेहरा किसी हादसे के तहत पत्रकारिता में नहीं आया है।

अपनी काबलियत के बूते शैलेन्द्र ने फोटो जर्नलिज़्म में उम्मीद के मुताबिक़ मुकाम हासिल भी किया। शैलेन्द्र एक पूरी कॉमर्शियल फिल्म बनाने की हिम्मत, एक सामान्य नौकरीपेशा पत्रकार के लिहाज से मैं तो इसे दुस्साहस कहूंगा, कर बैठेंगे इसकी उम्मीद वाकई नहीं थी। उन्होंने अपना यह प्रोजेक्ट कैसे पूरा किया, इसकी चर्चा फिर कभी। प्रसून जोशी जैसे कथित संवेदनशील गीतकार की अगुवाई वाले सेंसर बोर्ड में प्रोमो पास करवाने तक के लिए किस कदर जूझना पड़ा, यह थक-हार कर प्रसून को लिखी गयी शैलेन्द्र की खुली चिट्ठी से जाहिर हो चुका है। ना करोड़ों खर्च के प्रमोशन हैं और ना ही कोई नामी-गिरामी डिस्ट्रीब्यूटर। बस है तो हमारे- आपके जैसे एक सामान्य परिवार से जुड़े व्यक्ति का हौसला और क्रिएटिविटी। ‘जेडी’ की कहानी को तरुण तेजपाल की आपबीती से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, शैलेन्द्र ने हमेशा इससे इनकार किया है।

‘जेडी’ तमाम वजहों से ख़ास है। मीडिया में काम करने वालों के लिहाज से कहूं तो पूरी बिरादरी को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। इसलिए क्योंकि यह मीडिया की दुनिया पर मीडिया के आदमी ने बनाई है। दूसरी बड़ी वजह यह भी कि ‘जेडी’ हमारे एक साथी द्वारा सब-कुछ दांव पर लगा कर तैयार कृति है। रीढ़ की हड्डी निकालकर नौकरी चलाने के लिए नौकरी कर रहे मीडिया कर्मी तो जरूर देखें शायद कुछ नया करने की प्रेरणा मिल जाए। इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसके लिविंग कैरेक्टर्स हैं। शैलेन्द्र ने अपने कौशल से संजय दत्त को सजा सुनाने वाले जज पीडी कोड़े से फिल्म में जज का रोल करवा लिया।

यह भी इत्तेफाक है कि आज 22 सितम्बर को संजय दत्त फिल्म ‘भूमि’ के जरिये बॉलीवुड में वापसी कर रहे हैं। वहीँ उन्हें सलाखों पीछे पहुंचाने वाले जस्टिस कोड़े ‘जेडी’ के जरिये डेब्यू कर रहे हैं। इसके अलावा राजनेता अमर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान और रतनमणि लाल के अलावा आत्महत्या की कोशिश करके सुर्ख़ियों आयीं इंडिया टीवी की पूर्व एंकर तनु शर्मा समेत कई चेहरे आपको ‘जेडी’ में अपनी अभिनय प्रतिभा दिखाते मिलेंगे। www.bhadas4media.com के यशवंत सिंह ने ‘जेडी’ का डिजिटल मीडिया पार्टनर बनकर हमेशा की तरह अपना फर्ज निभाया है। हम सब फिल्म को सफल बनाकर अपने साथी शैलेन्द्र पांडे का हौसला बढ़ाएं ताकि शैलेन्द्र भविष्य में कुछ नया रच सकें और कुछ नया करने की सोच रहे मीडिया की दुनिया के कुछ और शैलेन्द्र आगे बढ़ने की हिम्मत जुटा सकें।

वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल की एफबी वॉल से.

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JD फिल्म का डिजिटल पार्टनर है भड़ास4मीडिया डॉट कॉम (देखें वीडियो)

22 सितंबर 2017 को रिलीज हो रही फिल्म JD का डिजिटल पार्टनर भड़ास4मीडिया डाट काम है. भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत बता रहे हैं वो तीन वजह जिसके चलते हम सभी को ये फिल्म देखने के लिए थिएटर जाना चाहिए. देखें संबंधित वीडियो…

https://www.youtube.com/watch?v=_izRF4GD-Hc

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प्रसून जोशी की हरकत से एक नया फिल्म निर्माता-निर्देशक रो पड़ा!

प्रसून जोशी के सेंसर कार्यकाल में पहला विवाद, जेडी के निर्माता-निर्देशक ने लिखी खुली चिट्ठी… शुक्रवार को रिलीज होने जा रही फिल्म जेडी के निर्माता-निर्देशक शैलेन्द्र पाण्डेय ने सेंसर बोर्ड के नवनियुक्त अध्यक्ष प्रसून जोशी को खुला पत्र लिख कर कहा है कि सीबीएफसी की कार्यपद्धति में सुधार करें। उसे नए निर्देशक-निर्माताओं के लिए आसान बनाएं। प्रसून को लिखे एक मार्मिक पत्र में पाण्डेय ने कहा कि बीती छह सितंबर को उन्होंने फिल्म के प्रोमो-ट्रेलर के सेंसर के लिए आवेदन भेजा था, मगर अभी तक यह काम नहीं हुआ है।

14 सितंबर को सेंसर की वेबसाइट पर लिख कर आ गया कि प्रोमो-ट्रेलर को चेयरमैन ने रिजेक्ट कर दिया है। इसकी कोई वजह भी नहीं बताई। 15 सितंबर को पाण्डेय ने सेंसर बोर्ड के अधिकारियों और प्रसून से मुलाकात की मगर कोई नतीजा नहीं निकला। अब फिल्म की रिलीज के मात्र दो दिन रह गए हैं और इसके ट्रेलर-प्रोमो टीवी पर नहीं चल सके हैं। शैलेंद्र का कहना है कि वह प्रसून जोशी की लालफीताशाही वाली कार्यशैली और असंवेदनशील हरकत के कारण रो पड़े। शैलेन्द्र पाण्डेय द्वारा प्रसून जोशी को लिखा गया मूल पत्र इस प्रकार है…

श्री प्रसून जोशी,
अध्यक्ष, सीबीएफसी
नमस्कार

आपको जानकर खुशी होगी कि मेरी फिल्म जेडी 22 सितंबर, शुक्रवार को सिनेमाघरों में लग रही है। यह मेरी पहली फिल्म है, जो मेहनत की गाढ़ी कमाई से बनाई है। लेकिन दुख की बात है कि फिल्म का ट्रेलर/प्रोमो किसी टीवी चैनल पर कोई नहीं देख पाया। इसकी वजह है कि सेंसर बोर्ड ने बिना कोई कारण बताए इसे पास नहीं किया। बीती 14 सितंबर को सेंसर बोर्ड की वेबसाइट पर दिखाया गया कि इसे चेयरमैन ने रिजेक्ट कर दिया है। मैंने आपके दफ्तर के चक्कर काटे तो एक अधिकारी दूसरे अधिकारी के पास भेजता रहा। फुटबॉल की तरह किक करता हुआ। अंततः आपसे मुलाकात हुई तो आपने कहा कि मैं दिखवाता हूं। आपने क्या दिखवाया, उसकी अभी तक कोई खबर नहीं।

मैं एक श्रमजीवी फोटो जर्नलिस्ट हूं। कैमरे की आंख से स्टिल फोटोग्राफी करते हुए फिल्म बनाने का सपना सच करने के लिए किस तरह अपना सब कुछ दांव लगा कर मैंने हिम्मत जुटाई, एसी दफ्तरों में बैठ कर प्रोफेशल जिंगल और तुक-बेतुक कविताएं लिखने वाले नहीं समझ सकेंगे। फिल्म जेडी पिछले साल श्री पहलाज निहलानी के अध्यक्षीय कार्यकाल में सेंसर हुई थी। आप जानते हैं कि फिल्म रिलीज करना कितना मुश्किल है। जीवन की आपाधापी में सैकड़ों बाधाएं पार करके अंततः 22 सितंबर रिलीज डेट फिक्स की। आगे की कहानी रोचक है।

ट्रेलर/प्रोमो सेंसर करवाने का नंबर आया तो पता चला कि अब सब ऑनलाइन है। लगा कि अच्छा है, फटाफट पारदर्शिता से काम हो जाएगा। मैं गलत साबित हुआ। एक महीने से ऊपर केवल रजिस्ट्रेशन कराने में लग गया वो भी बड़ी मुश्किल से हुआ। बड़े फोन करने पड़े, बड़े लोगों से मिलना पड़ा। सोचा अब ट्रेलर/प्रोमो सेंसर हो ही जाएंगे। अप्लाई करने में इतनी फॉर्मेलिटीज कि दिमाग ठिकाने आ गया। हारकर एक एजेंट लिया श्रीपति मिश्रा, उसने एक फीस के बदले सब कुछ ठीक करने का बोला। फिल्म सेंसर का अनुभव ठीक था इसलिए 30 अगस्त को उसके अकाउंट में पैसे भी ट्रांसफर कर दिए। उसने एक हफ्ते लगाए फॉर्मेलिटीज पूरी करने में और 6 सितंबर को अप्लाई किया, बोला 2 दिन में मिल जाएगा। लेकिन आज तक कुछ नही हुआ। अब भी ऑनलाइन दिख रहा है कि प्रोमोज रिजेक्टेड बाई चेयरमैन। 15 सितंबर को आपसे मिला, आपने भी आश्वासन दिया परंतु सब ढाक के तीन पात वाली कहावत साबित हुआ।22 सितंबर को फिल्म रिलीज होने को है, आप देखें कि आपकी और सेंसर बोर्ड की कार्यपद्धति फिल्म निर्माता-निर्देशकों के लिए कितनी दोस्ताना है।

ये बातें लिखते हुए मुझे अफसोस है कि सारा कुछ तब हो रहा है, जब फोटो जर्नलिस्ट के रूप में मेरे काम से आप वाकिफ हैं। मैं यह नहीं कहता कि मेरा-आपका कोई गाढ़ा परिचय है। फिर भी यह कहने में मुझे संकोच नहीं कि मेरे द्वारा शूट किए गए आपके फोटो शायद अब तक की आपकी सबसे बेहतरीन तस्वीरों में है। इसलिए आपने वो फोटो मुझसे लिए और उनका असीमित इस्तेमाल किया। गौर से देखें कि आपके व्हाट्सएप पर लगी डीपी मेरी ही खींची हुई है। आपके फैमिली फोटो भी मेरे द्वारा शूट किए गए शायद सबसे शानदार होंगे। आप जब भी मिले, मैंने दिल से आपको रिस्पेक्ट दी। फोन पर भी कभी बात हो जाया करती थी। तब मैं फोटो संपादक था और आप गीतकार-कहानीकार। आपके लिए वह सम्मान मेरे दिल में हमेशा बना रहेगा। जेडी 22 सितंबर को मुंबई के सिनेमाघरों में भी लगेगी। देख कर अपनी राय जरूर दीजिएगा। निवेदन है कि भविष्य है में कम से कम किसी नए फिल्मकार के साथ ऐसा मत कीजिएगा, जो मेरे साथ किया।

आपका

शैलेन्द्र पाण्डेय

निर्माता-निर्देशक, जेडी


Producer-Director of ‘JD’ writes an open letter to Joshi

Sri Prasoon Joshi

Chairman, CBFC

Namaskar.

You will be happy to know that my film ‘JD’ is releasing inn cinema halls across India on Friday, 22 September 2017. It is my first film in which I have put in my hard-earned money. But it is very unfortunate that no one could see the trailer/promo of the film on any television channel. The reason for this is that the Censor Board did not clear it, without mentioning any reason. On 14 September, it was mentioned on the CBFC’s Website that it had been rejected by the Chairman. I went to your office but I was sent to one officer and the other, like a football being kicked. At last I could meet you, and you had promised me that you would look into the matter. I don’t know what you have looked into.

I am a working photo-journalist. Having spent a long time doing still photography from a camera, I put all my efforts and earnings to realise my dream of making a film. This would be difficult to understand for someone who sits in air-conditioned rooms creating professional jingles and odd poems. The film ‘JD’ was censored last year during the tenure of the previous CBFC Chairman, Sri Pahlaj Nihalani. You must be aware that releasing the film is a tough task. After clearing various hurdles of life and work, I could finally fix the date of 22 September for its release. What happened next is very interesting.

When it came to getting the trailer/promo censored, I came to know that the procedure is now online, and I was happy that this work would be done quickly in a transparent manner. But I was wrong. It took over a month for getting the registration done, and that too with great difficulty. I had to make several phone calls, and met too many people. I thought now the trailer/promo would be censored. There were so many formalities in applying for the same that it made me crazy. Having no option, I hired an agent named Shripati Mishra, who promised to get everything done for a fee. Since I had a good experience in getting the film censored, therefore I transferred the money into his account on August 30. He took one week to complete the formalities, and applied on September 6. He told me that the clearance would be done in two days. But nothing has happened till today – September 19, nearly 13 days later. Even now the online message shows: ‘Rejected by Chairman.’

I met you on 15 September and you also promised to get it done, but to no avail. The film is now set to be released on 22 September. It is for you to see how friendly the working of the Censor Board is, towards film producers and directors.  I am very sorry to write these things, especially since you are aware of my work as a photojournalist. I don’t claim that I know very closely, but I have no hesitation in saying that your photographs taken by me are by far the best photographs of yours so far. That is why you took those photographs from me and used them without any constraints. You must note that your DP on your Whatsapp account is shot by me. Your family photographs taken by me must be the best ones. Whenever I met you, it was with heartfelt respect. I often talked to you on phone also. At that time I was a Photo Editor and you were a Lyricist-Story Writer. I shall always have that respect for you in my heart.

The film ‘JD’ will be released in the cinema halls of Mumbai on 22 September. I shall be grateful if you see the film and give me your opinion about it. My only request is that in future, please do not do that with any new film-maker which you did with me.

Yours,

Shailendra Pandey

Producer-Director, ‘JD’

Shailendra Pandey

Producer & Director

Shailendra Pandey films

shailendrapandeyfilms@gmail.com

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प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर गुजराती में बन रही है फिल्म ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’

बॉलीवुड निर्देशक अनिल अनिल नरयानी का कहना है कि प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर आधारित उनकी आने वाली गुजराती फिल्म ”हूं नरेन्द्र मोदी बनवा मांग छू” बच्चों के लिये बेहद प्रेरणाश्रोत होगी। अनिल नरयाणी इन दिनों फिल्म ”हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू” बना रहे हैं। अनिल नरयानी ने फिल्म की चर्चा करते हुये कहा, “‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन की कहानी पर आधारित है।

इसकी कहानी मोटिवेशनल है। इस कहानी को खास कर बच्‍चों और युवाओं को ध्‍यान में रखकर हमने तैयार किया है। हम इस फिल्‍म में उनकी कहानी को इस तर‍ह से पेश कर रहे हैं, जिससे फिल्‍म को देखने और समझने वाले दर्शक मोटिवेट हो। और उन्‍हें ये भी समझ में आये कि नरेंद्र मोदी देश की भलाई के लिए क्‍या चाहते हैं, क्‍यों चाहते हैं और कैसे चाहते हैं।

उन्‍होंने कहा कि मुझे लगता है कि आज देश का हर बच्‍चा नरेंद्र मोदी बनना चाहता है। वास्‍तव में जो रियल है, फिल्‍म में हमने वही दिखाने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी फिल्‍म के नहीं, पूरे देश के हीरो हैं। वे अभी देश के लिए बहुत अच्‍छा कर रहे हैं। क्‍योंकि वे मेरे भी हीरो हैं, इसलिए मुझे लगा कि उनके जीवन के संघर्ष को पर्दे पर लाना चाहिए। इसमें मुझे कोई परेशानी या डर जैसा कुछ नहीं लगा। मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी जी के व्‍यक्तिव से भारत की नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी।

इस फिल्‍म में मुख्‍य रूप से तीन गाने हैं, जो मोटिवेशनल हैं। फिल्‍मकार ने कहा,“ ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ फिलहाल गुजरात के दर्शकों के लिए बना रहा हूं। इसका किसी राजनीतिक दल से कोई वास्‍ता नहीं है। हम चाहते हैं नरेंद्र मोदी की इंस्‍पायरिंग कहानी देश भर में जाये। पहले तो इसे टारगेट के अनुसार 17 नंवबर को गुजरात में ही रिलीज करने की योजना है। बाद अन्‍य भाषाओं में डब करने की कोशिश होगी।

काव्‍या मूवीज और श्रीअर्थ प्रोडक्‍शन  के बनैर तले बन गुजराती फिल्‍म ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ बनी है। इस फिल्‍म की शूटिंग मुख्‍य रूप से गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत में हुई है, जहां पीएम नरेंद्र मोदी का बचपन बीता। अनिल नारायणी गुजराती भाषा में ही ‘बे यार धक्‍को मार’ बना चुके हैं, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया था। इसके अलावा वे 6-7 हिंदी फिल्में भी कर चुके हैं।

फिल्म की ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ प्रोड्यूसर तान्या शर्मा हैं जबकि को- प्रोड्यूसर राजीव अरोड़ा हैं। फिल्‍म में ओंकार दास, अनेशा सैयद, करण पटेल और हीराल मुख्‍य भूमिका में नजर आयेंगे। फिल्‍म के प्रचारक संजय भूषण पटियाला हैं। फिल्‍म में फरीद दाबरी और दिव्‍या कुमार ने गाने गाये हैं। लिरिक्‍स आर जे रौशन, म्‍यूजिक डायरेक्‍टर आर बी कमाल, एक्‍शन अब्‍बास सईद और डीओपी अद्दी भार्गव का है।

प्रेस रिलीज

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‘जेडी’ का पॉपकॉर्न कलेक्शन अमिताभ की ‘सरकार-3’ की कमाई से ज्यादा होगा : अमर सिंह

अमर सिंह ने फिर लिया अमिताभ बच्चन को निशाने पर, निर्देशक शैलेंद्र पांडे की फिल्म में पढ़ाएंगे राजनीति के पाठ

मुंबई। राजनेता अमर सिंह ने एक बार फिर अपने पुराने दोस्त अमिताभ बच्चन पर निशाना साधा है। वह मुंबई में पत्रकार-निर्देशक शैलेंद्र पांडे की फिल्म जेडी के म्यूजिक लॉन्च के मौके पर बोल रहे थे। अमर सिंह ने कहा कि आज कंटेंट किंग है, इसलिए अमिताभ बच्चन जैसे सुपर स्टार की सरकार-3 की कमाई से ज्यादा कलेक्शन जेडी की पॉपकॉर्न बिक्री का रहेगा। जेडी कंटेंट सिनेमा है, जिसमें पत्रकारों के जीवन की हकीकत और मीडिया दफ्तरों की सच्चाई दिखाई जाएगी।

पूर्व सांसद अमर सिंह फिल्म में ईमानदार राजनेता की भूमिका में हैं। 22 सितंबर को देश भर के सिनेमाघरों में रिलीज हो रही यह फिल्म प्रदर्शन से पहले दिल्ली, मुंबई, जयपुर, लखनऊ, कोलकाता और इंदौर में पत्रकारों को दिखाई जाएगी। देश के प्रसिद्ध फोटो जर्नलिस्ट, निर्माता-निर्देशक शैलेंद्र पांडे की फिल्म जेडी पर अमर सिंह ने कहा, ‘यह पत्रकारों के साथ राजनेताओं को भी देखनी चाहिए क्योंकि इसमें बताया गया है कि कैसे मीडिया घराने इन दिनों अपने किचन में खबरें पकाते हैं। मैं कई बार ऐसी किचन पत्रकारिता का शिकार बना हूं।’ अमर सिंह ने कहा कि यह कंटेंट सिनेमा का दौर है।

अमिताभ, शाहरुख और सलमान जैसे सितारों की फिल्में बॉक्सऑफिस पर फ्लॉप हो रही हैं। उन्होंने जेडी की सफलता का दावा करते हुए कहा कि इस फिल्म का पॉपकॉर्न कलेक्शन तक पिछले दिनों आई अमिताभ बच्चन की सरकार-3 की कुल कमाई से ज्यादा होगा। उन्होंने कहा कि शैलेंद्र पांडे की फिल्म से वह केवल कंटेंट की वजह से जुड़े। जबकि उनकी शैलेंद्र से पहले कोई मुलाकात या जान-पहचान नहीं थी। म्यूजिक रिलीज के मौके पर फिल्म की स्टारकास्ट मौजूद थी। जेडी में ललित बिष्ट और वेदिता प्रताप सिंह मुख्य भूमिकाओं में हैं। अमन वर्मा और गोविंद नामदेव अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म का संगीत गणेश पांडे और जांनिसार लोन ने तैयार किया है। ममता शर्मा, राजा हसन, अल्तमस फरीदी, आबिद जमाल और रानी हजारिका ने गीत गाए हैं।

Popcorn collection value of Film JD, will be more than Amitabh Bachchan’s Sarkar 3 : Amar Singh

JD Music launch in Mumbai in presence of Politician Amar Singh

Films that are heavy only in star value do not do well on box office if they are low on content. Today, content is king and ‘JD’ will create waves on the strength of its content. These views were expressed by politician Amar Singh at a glittering function on music launch of the film ‘JD’ here at the carnival Theatre.

Amar Singh, a big name in Indian politics, has played a major role in the film ‘JD’ produced and directed by Shailendra Pandey, a noted photo journalist. The film centres around the world of media and journalism and its trailer and music are making waves. Amar Singh is so confident of the success of ‘JD’ that he predicted: “The popcorn collection value of JD will be more that the Ram Gopal Verma film Sarkar that starred Amitabh Bachchan.”

The event was attended by the film’s cast including Vedita Pratap Singh, Aman Verma and Lalit Bist. The songs have been composed by Ganesh Pandey and Jaan Nissar Lone and sung by Mamata Sharma, Raja Hassan, Altamash Faridi,  Abid Jamal and Rani Hazarika.

Appreciating the effort of Shailendra Pandey, Amar Singh said all those viewers who preferred strong content must watch this film and every journalist can connect himself with the movie. Amar Singh plays the character of a politician in the movie. He said:  “So many films are released every Friday but they do not do well at the box office because of poor content and have only star face value. But now the audience is smart and is looking for strong content. I congratulate Shailendra Pandey who approached me for this movie and I was impressed with the content.

On the occasion, singers belted out several hit tracks of the film including the catchy fun number ‘Naya Safar’, and the romantic love ballads ‘Saavan’ and ‘Mit Gaya’ that have been hailed as the new love anthems of Bollywood and the most beautiful item song ‘Balamaa’.

The film is based on the life and hardships faced by journalists. It is an outright entertainer and heavy on concept. It is being released on September 22 across theatres in India.

प्रेस रिलीज

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वाहियात फिल्म ‘अनारकली आरा वाली’

कल अनारकली ऑफ आरा देखकर मेरा जबर्दस्त ज्ञानवर्द्धन हुआ है। सरसरी तौर पर कुछ दृश्यों ने दिमाग का दही कर दिया है जिसे आपसे शेयर करके अपना बोझ हल्का करना चाहता हूँ…

1. वीसी नामक प्राणी नशे में छेड़छाड़, जोर जबर्दस्ती और उसके बाद थप्पड़ खाकर सारी घटना भूल जाता है और सुबह उसे अपने सहयोगियों से पूछना पड़ता है कि रात में आखिर हुआ क्या था।

2. वीसी बहुत बड़ा दबंग है लेकिन एक अदना सी नचनिया द्वारा स्टेज पर थप्पड़ मारे जाने के बाद भी उसके चमचे नचनिया को बस गाली देकर छोड़ देते हैं।

3. बिहार का वीसी किसी सभ्य व्यक्ति की तरह नहीं, नई उम्र के लफंगों की जमात के साथ चलता है।

4. वीसी किसी औरत के साथ चूमाचाटी कर रहा हो तो भी अपना दरवाजा खुला रखता है ताकि  कोई भी आ सके।

5. कोई पत्रकार बिना किसी एप्वाइंटमेंट और पीए से मिले सीधे वीसी के टेबल तक पहुँच जाता है जिसे वह जलील करके भगा देता है।

6. नचनिया वीसी के घर में उसे सरेआम गाली देकर भी अपने घर न सिर्फ चली आती है बल्कि वीसी के गुंडों की पकड़ में आए बिना दिल्ली भी पहुँच जाती है।

7. वीसी हरदम विलेन की तरह चमचों से घिरा रहता है और सीएम को अपनी कविता सुनाने के नाम पर- सीएम जी तुम चंदन हम पानी….पैरोडी सुना कर भद्दी हँसी हँसता है।

8. दिल्ली में नचनिया का पता मालूम होने के बाद भी पुलिस उसे नहीं पकड़ती ,वह खुद आत्मसमर्पण करती है।

9. एक गीत के अंतरे में लिपिस्टिक पहनने की बात की गई है,गीतकार का इसके लिए विशेष अभिनंदन होना चाहिए।

10. अंतिम दृश्य में तो हद है….वीसी आँखों में आँसू लिए देर तक अपना एमएमएस पर्दे पर चुपचाप देख रहा है।पूरी यूनिवर्सिटी, पुलिस और वीसी के चमचे चुप हैं, कोई कुछ नहीं करता…नचनिया ताल ठोंककर वीसी को उसकी औकात बता रही है।

इसी सीन में बीस बाइ चालीस के बैनर पर बड़े बड़े शब्दों में लिखा है- बीर कुबेर सिंह विश्वविद्यालय,जबकि फिल्म में बार बार वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय का जिक्र है। ऐसी निहायत अविश्वसनीय कहानी और डबल मीनिंग संवादों के जरिए अविनाश दास हिंदी सिनेमा को नई ऊँचाई देना चाहते हैं। चूँकि मीडिया से जुड़े रहे हैं इसलिए उनके सभी मीडियाकर मित्रों ने इसकी जमकर तारीफ भी की है। हमारे पत्रकार दोस्त सिर्फ दोस्ती निभाने के लिए इतना बड़ा झूठ बोल सकते हैं तो सोच लीजिए पेड न्यूज के लिए क्या क्या नहीं करते होंगे।

Ras Bihari Pandey
anushkamagazine@gmail.com

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JD Trailer out, Film is going to release on 22nd September

The trailer of the upcoming Bollywood film “JD” #MediaकीBreakingNews produced by Shailendra Pandey Films has been released. Speaking on the occasion Producer & Director Shailendra Pandey said; “”I am very excited for my film JD. I feel honoured to have directed the big Politician Amar Singh  and the Rtd. Justice PD Kode who are in the special appearance in the movie. He said, “JD is an honest attempt of film-making and showing the ground realities of Media. I am sure that the audiences will appreciate this movie.”

JD is the ‘Breaking News’ from inside of the Media. The Media brings news every moment from all over the world, but what happens within the Media is not known to the world. The Journalists who fight for Truth and Values are very helpless in fighting for their own rights. The power of Media is captive in the hand of a few people and they wear different masks. Every powerful Establishment first tries to scare, then allures and finally crushes in a maze of defamatory conspiracies. The one who rises with a steely resolve from this fall becomes JD.

This is the story of Jai Dwivedi alias JD. He had started his journalism from Lucknow but Delhi was in his dreams. His pen had the power to shake the seat of power. Will he confront the powers of Media and Politics, or he will shake hands with them? The star cast of  movie Lalit Bisht, Vedita Pratap Singh, Govind Namdev and Aman Verma extended good wishes and congratulated the team for the successful trailer launch. The film is all set to release worldwide on 22nd Sept 2017. JD is produced by Shailendra Pandey and Anju Pandey and is distributed by Adamant Pictures.

https://youtu.be/_tHEvnB7wNs

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आज रिलीज ‘राग-देश’ और ‘इंदु सरकार’ क्यों हैं मस्ट वॉच फिल्में, बता रहे हैं यशवंत

Yashwant Singh : ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन दो अलग-अलग सच्ची घटनाओं पर आधारित, दो अलग-अलग ऐताहासिक कालखंडों पर केंद्रित फिल्में रिलीज हो जाएं. आज ऐसा हुआ है. ‘राग देश’ और ‘इंदु सरकार’ नामक दो फिल्में आज शुक्रवार के दिन रिलीज हुई हैं. दोनों सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और दोनों ही घटनाएं इतिहास के चर्चित अध्याय हैं.

‘राग देश’ सुभाष चंद्र बोष और उनकी सेना आईएनए के जवानों पर केंद्रित है. मेरे जैसे लोग जो गांधी जी के साथ-साथ भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस आदि के प्रति समान श्रद्धा और प्रेम रखते हैं, इस फिल्म को जरूर देखेंगे क्योंकि सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना के बारे में इतिहासकार कई एंगल से देखते लिखते बताते हैं. सुभाष चंद्र बोस की सेना आईएनए के जांबाज जवानों के द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ट्रायल को फिल्म का मुख्य सब्जेक्ट बनाया गया है. सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना पर पूरी तरह केंद्रित इस नई फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं.

फिल्म रागदेश के निर्माता गुरदीप सिंह सप्पल

इस फिल्म की खास बात यह भी है कि इसे अपने बड़े भाई और राज्यसभा टीवी के सीईओ व एडिटर इन चीफ Gurdeep Singh Sappal जी ने प्रोड्यूस किया है. जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने इसे डायरेक्ट किया है. यह फिल्म चुनिंदा फिल्म क्रिटिक्स को दिखाई जा चुकी है और उन सभी ने इसे मस्ट वाच कैटगरी की फिल्म करार दिया है. यानि रिव्यू के लेवल पर फिल्म को ढेर सारे स्टार मिल रहे हैं. फिल्म का ये स्लोगन काफी फेमस हो रहा- ”जो देश से करते हैं प्यार, वो राग-देश से कैसे करें इनकार!” तो बंधु, चलिए चला जाए देखने. अपने सभी मित्रों से अपील है कि वे ‘राग देश’ देखें और इसको लेकर रिव्यू प्रकाशित करें. मैं आज शाम का शो बुक कर चुका हूं.

इंदु सरकार फिल्म पहले ही विवादों के कारण चर्चा में आ चुकी है. इंदिरा गांधी, संजय गांधी और आपातकाल पर केंद्रित इस फिल्म के जरिए हम जैसे आपातकाल के समय या बाद पैदा हुए लोग जान सकेंगे कि उस दौर की क्या भयावहता थी, उस दौर के घटनाक्रम कैसे कैसे घटित हुए. इस फिल्म को मधुर भंडारकर ने बनाया है जो पेज थ्री, फैशन, कारपोरेट जैसी फिल्में बना चुके हैं. इंदु सरकार को को कल देखूंगा. फिर दोनों ही फिल्मों का रिव्यू परसों लिखूंगा, वादा है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Lipstick Under My Burkha : दैहिक मुक्ति को असली मुक्ति मान बैठीं ये संभोगरत स्त्रियां! (दो समीक्षाएं)

Mukesh Kumar : अलंकृता श्रीवास्तव को ढेर सारी बधाईयाँ। शायद एक स्त्री ही किसी स्त्री के अंदर पलने वाली हसरतों और चलने वाली कशमकश को इतनी बारीकी से फिल्मा सकती है। इतनी बेचैनी, इतनी छटपटाहट कि कुछ भी करने को तैयार। हर तरह की चौहददियों को लाँघने के लिए बेक़रार। और मर्द हैं कि हर जगह रास्ते रोकते हुए खड़े हैं। उन्हें मंज़ूर नहीं है कोई औरत उनके नियंत्रण से बाहर निकलकर अपनी इच्छाएं पूरी करे। कहीं वह सेक्स को हथियार बनाता है, कहीं धर्म को तो कहीं उसे छलकर दबाने की कोशिश करता है।

अलग-अलग उम्र की चार महिलाएं-दो हिंदू और दो मुसलमान। सभी निम्न मध्यवर्गीय समाज से। अपने सपनों के लिए लड़तीं और आगे बढ़ने के लिए रास्ते तलाशतीं। सबकी कहानी अलग-अलग हैं मगर मर्म एक ही है। एक ही सूत्र से चारों जुड़ी हुई हैं। मन की परतें खुलती जाती हैं और परदे पर पीड़ा उभरती जाती है। कसी हुई पटकथा एक क्षण को भी तनाव कम नहीं होने देती। सधा हुआ अभिनय और निर्देशन फिल्म को कई मील आगे ले जाकर खड़ा कर देता है।

किसी ने कहा, फिल्म में सेक्स बहुत ज़्यादा है। मुझे लगता है कि फिल्म में आए सेक्स दृश्यों को सही संदर्भों में समझने की ज़रूरत है। उसके अलग-अलग निहितार्थ हैं। कहीं वह मुक्ति की कामना को व्यक्त करता है तो कहीं आज़ादी को कुचलने के लिए। सेक्स यहाँ केवल सेक्स नहीं है, पूरी राजनीति है और दमन का हथियार भी। अगर आपने अभी तक Lipstick Under My Burkha नहीं देखी है तो ज़रूर देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

Abhishek Srivastava : टिकट कराते वक्‍त (Lipstick Under My Burkha के लिए) थोड़ा अचरज हुआ क्‍योंकि इतवार को दोपहर के शो में एनसीआर के महंगे सिनेमाहॉल फुल दिखे। तीन बजे के शो में जगह मिली, तो मेरा हॉल भी तकरीबन फुल निकला। आखिर क्‍या सोचकर इस महानगर की मध्‍यवर्गीय जनता यह फिल्‍म देखने के लिए आई थी? दो घंटे के दौरान फिल्‍म के अलावा लोगों की प्रतिक्रियाएं भी मैं देखता-सुनता रहा। अंत में निकलते वक्‍त भी लोगों को आपस में बात करते सुना। इसमें कोई शक़ नहीं कि दर्शकों का मनोरंजन ठीकठाक हुआ था। बस एक समस्‍या दिखी- फिल्‍मकार अलंकृता श्रीवास्‍तव जो दिखाना चाहती रही होंगी, लोगों तक उसका ठीक उलटा संदेश पहुंचा है। अगर मैं ठीक देख पा रहा हूं, तो यह समस्‍या गंभीर है।

दरअसल, सतह पर दो दिक्‍कतें हैं। एक महिला पति से ‘छुपाकर’ नौकरी करती है। दूसरी मां-बाप से ‘छुपाकर’ जींस पहनती है, पार्टी करती है, मोर्चा निकालती है और ‘झूठ’ बोलती है। तीसरी महिला लोगों से ‘छुपाकर’ स्विमिंग सीखने जाती है, ‘अश्‍लील’ किताब पढ़ती है और ‘नकली आइडेंटिटी’ बनाकर फोन पर बात करती है। चौथी महिला के जीवन में ‘झूठ’ की जगह दो पुरुषों के बीच का द्वंद्व है। इसका मोटा-सा संदेश इस देश के मोटी बुद्धि वाले महानगरीय सिने-दर्शक तक यह पहुंचता है कि 55 से लेकर 18 बरस तक की महिलाओं के जीवन में एक ‘छुपा’ हुआ पक्ष होता है। इस तरह पात्रों के निजी नैरेटिव एक सामान्‍य दर्शक के मन में म‍हिलाओं के प्रति हिकारत और संदेह पैदा करते हैं।

दूसरी दिक्‍कत फिल्‍म में संभोगरत/आत्‍मरत महिलाओं के कई स्‍तरों से पैदा होती है। एक पति अपनी पत्‍नी की नौकरी करने की सूचना पाकर आक्रोश में जो संभोग करता है, वह प्रेम में बेचैन दूसरी स्‍त्री के संभोग से या साहित्‍य पढ़कर आत्‍मरति में डूबी तीसरी स्‍त्री से बिलकुल अलहदा बात है। हमारा दर्शक इतना सूक्ष्‍म फ़र्क नहीं करता। वह हर संभोग पर मुंह छुपाकर हंसता है। आत्‍मरति में डूबी वृद्ध स्‍त्री का मज़ाक बनाता है। जब चारों स्त्रियां अपनी-अपनी किस्‍मत साथ लेकर अंतिम दृश्‍य में एक साथ कहानी के अंतिम पन्‍ने पलटती होती हैं, तो दर्शक कहता है- ”आगे क्‍या हुआ पता नहीं चला। लगता है दूसरा पार्ट भी आएगा।” दर्शक को निष्‍कर्ष चाहिए था, जो नहीं मिला। मुक्ति की प्रक्रिया को वह पचा नहीं सका क्‍योंकि यह प्रक्रिया चारों को कहीं ले नहीं गई।

इसकी एक वजह यह लगती है कि फिल्‍म का कथानक चारों स्त्रियों की दैहिक मुक्ति से आगे नहीं बढ़ सका। यह समकालीन स्‍त्री-विमर्श की ऐसी बीमारी है जिसे आप Parched में भी देख सकते थे। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि देह, देह तक ही ले जाती है। स्‍त्री-मुक्ति उससे बड़ी चीज़़ है। हमारे यहां का दिमागी पिछड़ापन ऐसा है कि सारे विमर्श को देह तक सीमित कर देता है। अगर आप इस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट के शुरुआती नैरेशन पर ध्‍यान दें तो शायद पकड़ में आवे। मसलन, यह वाक्‍य- ”उसके देह के फैलते बगीचे में उसकी जवानी का कांटा उसी को चुभ रहा था।” यह भाषा स्‍त्री की नहीं है। यह पुरुष की भाषा है। पुरुष की भाषा में रोज़ी को आप कैसे मुक्‍त कर पाएंगे? यह विपर्यय फिल्‍म के अंत तक कायम है।

नतीजा? एक कोठरी में सिमट कर सिगरेट फूंकने और रोज़ी की कहानी के अंतिम पन्‍ने पलटने के अलावा और क्‍या हो सकता था? वैसे, इस देश के औसत विवेक के नाते मुझे गंभीर संदेह है कि अब भी कई दर्शक एक-दूसरे से पूछ रहे होंगे कि इन चारों में रोज़ी कौन थी। कायदे से अगर तुलना करनी हो, तो मैं फिल्‍म में स्विमिंग ट्रेनर बने उस मांसल युवक को हिंदुस्‍तान का असली दर्शक मानूंगा जो अंत तक रोज़ी की कहानी में फंसा रहा और जब रोज़ी सामने आई, तो उसे बदनाम करते हुए पलट कर कह दिया- तुम रोज़ी नहीं हो सकती। रोज़ी का अपना एक सपना बेशक है, लेकिन रोज़ी भी किसी का सपना है। प्रॉब्‍लम यहां है।

मीडिया और फिल्म समीक्षक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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‘जेडी’ का पोस्टर रिलीज, मीडिया के भीतर के स्याह-सफेद से पर्दा हटाएगी ये फिल्म

हर पल दुनिया का हाल बताने वाले मीडिया के अंदर की खबरें आम लोगों तक नहीं पहुंचती। ‘जेडी’ मीडिया की चारदीवारी के भीतर की ब्रेकिंग न्यूज है। आदर्शों और सच के लिए लड़ने वाले पत्रकार खुद अपने हक की लड़ाई लड़ने में कितने बेबस होते हैं, इसे खुद मीडिया वाले भी महसूस करते हैं। मीडिया की ताकत चंद मुट्ठी भर लोगों की कैद में है और उनके चेहरों पर नकली मुखौटे हैं। हर ताकतवर सत्ता पहले डराती है, फिर ललचाती है और अंत में बदनाम करने वाले षड्यंत्रों के कुचक्रों में कुचल देती है।

इस सबके बावजूद जो फौलादी इरादों के साथ फिर उठ खड़ा होता है, वह ‘जेडी’ बनता है। यह कहानी है जय द्विवेदी उर्फ जेडी की। जेडी ने जर्नलिज्म की शुरुआत लखनऊ से की परंतु उसके सपनों में दिल्ली थी। उसकी कलम में सत्ता को हिलाने की ताकत थी। क्या वह मीडिया और सत्ता के आकाओं से टकराएगा या हाथ मिला लेगा…? फिल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर शैलेंद्र पांडेय हैं जो पहले खुद भी पत्रकार थे. फिल्म का पोस्टर रिलीज कर दिया गया है।

The Media brings news every moment from all over the world, but what happens within the Media is not known to the world. JD is the’Breaking News’ from inside the Media. The Journalists who fight for Truth and Values are very helpless in fighting for their own rights.

The power of Media is captive in the hand of a few people and they wear different masks. Every powerful Establishment first tries to scare, then allures and finally crushes in a maze of defamatory conspiracies. The one who rises with a steely resolve from this fall becomes JD.

This is the story of Jai Dwivedi alias JD. He had started his journalism from Lucknow but Delhi was in his dreams. His pen had the power to shake the seat of power. Will he confront the powers of Media and Politics, or he will shake hands with them?

प्रेस रिलीज

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‘मॉम’ फिल्म में मर्डर करने के नए तरीके का प्रशिक्षण!

Yashwant Singh :’मॉम’ फिल्म देखते हुए मर्डर करने के नए तरीके के बारे में अपन को जो जबरदस्त ट्रेनिंग मिली है, वह इस प्रकार है- दस किलो सेब खरीदें. इन्हें बीच से काट लें. फिर इनके भीतर से सारे बीज निकाल लें. इन बीजों को बारीक पीस लें. फिर इसे आटा या दलिया या किसी भी खाने के सामान में मिला कर परोस दें. काम तमाम हो जाएगा.

‘मॉम’ फिल्म ने बताया कि सेब के बीज से साइनाइड बनाने की रेसिपी गूगल-याहू पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है. जो भी चाहे, पढ़े, सीखे और मिशन पर लग जाए. आने वाले दिनों में जहर से मरने / मारने वालों संख्या में अचानक वृद्धि दिखने लग जाए तो ‘मॉम’ फिल्म के योगदान को जरूर याद कर लीजिएगा.

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी उर्फ आईएनए और इसके जांबाजों पर आधारित है फिल्म ‘रागदेश’

The much awaited Tigmanshu Dhulia film ‘Raagdesh’ is all set to release on July 28th, 2017. Expected to be a crossover film, the film marries the historical authenticity with entertaining cinema, a genre much missed in Bollywood. Set in the backdrop of the famous ‘Red Fort Trials’, the film recreates the era of last days of freedom struggle in India, where the battles were being fought on borders, on streets, in media and curiously enough, in the court room.

The film captures the courtroom drama of the trials conducted by the British government in 1945 against the top brass of the Indian National Army, established by Netaji Subhash Chandra Bose. The trials that were observed with great curiosity by the world forces who had won the World War II, as also by the nation who now witnessed another streak of patriotism which was valiant, violent, vociferous and quite different from non-violence practiced by the Congress.

The trials made India aware of the heroic deeds and struggles of the INA, which was till then suppressed by the British authorities through strong armed press censorship. As the trial progressed, the entire nation was galvanized into the final call for independence, leading to Mumbai Naval Mutiny and crumbling of British Empire. The film poignantly portrays the battle travails, border sacrifices and trial of three heroes of INA who changed the course of freedom struggle.

The film is produced by Rajya Sabha Television, who has joined hands with UFO Moviez as its strategic partner for a pan-India release. The film marks the debut of RSTV, which has started an ambitious programme of bringing the exciting events of contemporary history on to the cinema screens.

“India today is a leading nation of the world. There have been people, events and processes that have led to the success of India. RSTV feels that people must know their history in order to preserve their growth. It is the duty of the state and the governments to promote it. Being a public broadcaster, RSTV felt its duty to take history to the people in an entertaining format. We always felt that history has so many fascinating stories to tell and films have been the most powerful and entertaining medium to tell stories”, said Gurdeep Sappal, CEO and Editor-in-Chief of Rajya Sabha Television.

Commenting on the association director Tigmanshu Dhulia said, “This was a great opportunity to showcase a very important chapter of independence struggle. It’s a film about real life heroes, who fought armed war against the mighty British government. It captures the valour, the camaraderie and the heroic struggles of young men who fought and lost the battle, but won the war of independence for India.  It is a one of the most passionate films I have done because I really feel that the nation and the young generation must know about sacrifices of people achieve India’s independence. It’s a film which will certainly make every Indian proud of their legacy.”

Starring Kunal Kapoor, Amit Sadh and Mohit Marwah in the lead roles, Raag Desh is the story of three leading officers of the INA namely Colonel Prem Sehgal, Colonel Gurbaksh Singh Dhillon, and Major General Shah Nawaz Khan, who were captured and imprisoned in the Lal Quila (Red Fort). British wanted to sentence them and hang them in the Red Fort, precisely where Netaji Subhash Chandra Bose wanted to unfurl the Tricolour flag. A trial that the world watched and the nation prayed, eventually turned up as the last message to the British that they would now have to Quit India. The Tricolour flies on the Red Fort since then!

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राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल निर्मित फिल्म ‘रागदेश’ का पोस्टर जारी, रिलीज 28 जुलाई को

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल के नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है. उन्होंने फिल्म निर्माण जैसा बड़ा काम कर दिखाया है. बतौर प्रोड्यूसर सप्पल ने जो फिल्म ‘रागदेश’ बनाई है, उसका निर्देशन जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने किया. फिल्म का पोस्टर जारी कर दिया गया है. फिल्म सिनेमाघरों में 28 जुलाई को पहुंचेगी.

The film is on Lal Quila Trial of officers of INA.

फिल्म के पोस्टर को जीएस सप्पल ने अपने एफबी वॉल पर जारी करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है :

Gurdeep Singh Sappal : First look of the poster of our film RaagDesh, releasing all over India in cinema halls near you on July 28, 2017. Presented by: Rajya Sabha Television , Director: Tigmanshu Dhulia , Producer : Gurdeep Sappal, Cinematography: Rishi Punjabi, Featuring: Kunal Kapoor, Amit Sadh, Mohit Marwah, Kenneth Desai, Mridula Murali #raagdeshthefilm

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‘हिंदी मीडियम’ देखते हुए आप पॉपकार्न चबाना तक भूल जाते हैं

Uday Prakash : अभी ‘हिंदी Medium’ देख के लौटा। जो भूमिका पहले प्रतिबद्ध साहित्य निभाता था, वह अब ऐसी फिल्म निभा रही है. बाहुबली जैसी मध्यकालीन चित्रकथा फिल्म देखने की जगह, हिंदी मीडियम जैसी फ़िल्में देखने की आदत डालनी चाहिए। इवान इलिच की मशहूर किताब ‘डिस्कूलिंग सोसायटी’ बार-बार याद आती रही. लेकिन यह फिल्म शिक्षा के धंधे में बदलने के विषय से बाहर भी जाती हुई, बहुत बड़ा और ज़रूरी सन्देश इस तरीके से देती है कि आप पॉपकार्न चबाना तक भूल जाते हैं. पूरा हाल भरा हुआ था और ऑडियंस लगातार फिल्म के साथ बोलता, हँसता, सोचता, तालियां बजाता, भावुक होता देखता जा रहा था। आज का दिन ही नहीं यह पूरा महीना हिंदी मीडियम के नाम. (वह महीना जिसमें बाहुबली और Guardians of Galaxie जैसी ब्लॉक बस्टर फ़िल्में भी शामिल है.  🙂

Yashwant Singh : अपनी पहली ही फिल्म से छिछोरपन और सेक्सी सड़ांध की भयानक बदबू छोड़ने वाले अविनाश दास व उनके कट्टर भक्त टाइप चेलों-गुरुओं को ‘हिंदी मीडियम’ फिल्म जरूर देख लेनी चाहिए… क्या कमाल की फिल्म बनाने लगे हैं लोग.. मेरी तरफ से पांच में पांच स्टार. अमीरी-गरीबी, हिंदी-अंग्रेजी, एलीट-भदेस, अध्यात्म-भौतिकता, सिस्टम-करप्शन, जीवंतता-कृत्रिमता, स्वार्थ-त्याग… जाने कितने फ्रेम समेटे है ये फिल्म… जाने कितनी कहानियां कहती है ये फिल्म. मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि सपरिवार यानि बीवी बच्चों समेत ये फिल्म देख आइए. पूरा पैसा वसूल है. बहुत दिनों बाद दिल के करीब कोई फिल्म लगी.

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश और भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मुसहरों का दुख देखा न गया तो इस लड़की ने कैमरे को बनाया हथियार (देखें डाक्यूमेंट्री)

Abhishek Prakash : नागिन डांस करने वाली लड़की से मिले हैं आप! बोले तो ‘बाबा टाइप लड़की’! ऐसी एक लड़की मिली मुझे। बेपरवाह कान में ईयरफोन लगाए ,मन किया तो जोर-जोर से गाने वाली एक मस्तमौला फ़क़ीरी अंदाज़ वाली लड़की। सच कहूं तो खाप-पंचायत की खोज इन जैसों के भय से ही पूर्व में संस्कृति के ठेकेदारों ने की होगी! पर आप इससे बात करिए।

इसके काम को देखिए तो लगेगा कि बनावट से कोसों दूर बदलाव की कहानी लिखने वाली यह नन्ही ‘pursuit of happiness’ की हीरोइन है। अच्छे खासे घर की खाई पी अघाई इक्कीसवीं सदी की ये पौध केवल हिप-हॉप पर ही विश्वास नहीं करती बल्कि अर्थपूर्ण काम भी करती है।

इस साल की बात है जब यह गांव के एक स्कूल में विवेकानंद जयंती कार्यक्रम में भाग लेने गई तो नेताओं की तरह आगे बैठने की चाहत के विपरीत इसने पीछे जाकर ‘मुसहर’ समुदाय के बीच बैठना पसंद किया। मुसहर यानी वही मूस (चूहा) पकड़ने वाली जाति! फिर क्या था हो गया झोल! उनकी दयनीय स्थिति देख वह परेशान हो उठी और सोचने लगी कि उसे कुछ करना है। और, बिना किसी पूर्वानुभव के उनके जीवन संघर्षो पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री बना डाली।

शिवा त्रिपाठी

कोई ज्ञान नहीं, मोबाईल छोड़ कोई इक्विपमेंट भी नही। लेकिन कुछ करने की और वर्तमान में जीने की इस ज़िद ने और उसके अंदर की मानवता तथा संवेदनशीलता ने उससे ये सब करा डाला! मज़ा तो तब आया जब एडिटिंग के लिए उसने छोटे से कस्बे के एक शादी का वीडियो बनाने वाले लड़के को ढूढ़ निकाला वो भी उसके खेत से! रात भर साथ बैठ कर खुद ही लगी रही और अपने जेब से खर्च भी किया।

सोचता हूं लड़कियों के फ़ोन, जीन्स, पढ़ने-लिखने और अपनी मनमाफ़िक जीवनसाथी चुनने वालों को ये सब देखकर कभी शर्म भी नहीं आती होगी क्या? खैर संकीर्ण और प्रतिक्रियावादी लोगों को छोड़ इस प्रगतिशील, सृजनशील लड़की Shiva Tripathi के इस मेहनत को थोड़ा अपना समय दीजिए। डाक्यूमेंट्री देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=qdfOw6GhP0Q

यूपी पुलिस में डीएसपी अभिषेक प्रकाश की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण, भास्कर, अमर उजाला आदि के रैकेटियर फिल्म पत्रकारों की समीक्षाओं से रहें सावधान

…मुंबई के एक बड़े बुजुर्ग फिल्म पत्रकार के नेतृत्व में इन अखबारों के फिल्म पत्रकारों ने गैंग बनाकर अनारकली आफ आरा के फर्स्ट डे कलेक्शन को दस लाख रुपये की जगह न सिर्फ दस करोड़ छापा बल्कि फिल्म की तारीफ में झूठी समीक्षाएं छापी और ज्यादा से ज्यादा स्टार भी दिए…

Ashwini Kumar Srivastava : अनारकली ऑफ़ आरा अच्छी फिल्म है या सतही… इसका तो मुझे जरा भी अंदाज नहीं है क्योंकि मैंने यह फिल्म अभी देखी ही नहीं है। लेकिन इस फिल्म से मुझे फिल्म जगत और मीडिया जगत में गुटबाजी की एक नयी तसवीर जरूर पता चली है। ऐसी गुटबाजी, जिसमें फिल्म पत्रकार किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप कराने की सुपारी ही ले लेते हैं। अविनाश के लिए जिस तरह से दैनिक जागरण, नई दुनिया, भास्कर और अमर उजाला के फिल्म पत्रकारों ने एकदम खुलकर बेहतरीन समीक्षाओं, रिलीज के पहले ही दिन अनुष्का शर्मा की फिल्लौरी फिल्म से भी ज्यादा और अपनी लागत के तीन गुना बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की झूठी ख़बरें छापकर, फेसबुक पर बाकायदा ‘मुझे देखनी है अनारकली ऑफ़ आरा’ ग्रुप बनाकर, सोशल मीडिया पर अभियान छेड़कर और स्पेशल स्क्रीनिंग आदि में लोगों को अविनाश की तरफ से बुलाने की मुहिम चलाकर इस फिल्म और अविनाश को बॉलीवुड का चमकता सितारा बनाने की असफल कोशिश की है, उससे इन फिल्म पत्रकारों की कलई ही खुल गयी है।

अनारकली के जरिये आज हम सभी को यह पता चल गया कि ये फिल्म पत्रकार किस तरह अपना ईमान बेचकर झूठी समीक्षाएं या बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की रिपोर्ट तैयार करते हैं… अविनाश के मामले में भले ही ये पत्रकार यह दावा करें कि चूँकि अविनाश भी भास्कर जैसे अख़बारों में बड़े पद पर पत्रकार रह चुके हैं, इसलिए उन्होंने मित्रता निभाने के लिए यह लॉबिंग की तो भी हर कोई यह आसानी से समझ सकता है कि आपका ईमान तो ऐसे ही बिक जाता होगा, कभी दोस्ती के नाम पर, कभी गिफ्ट-पैसे, पार्टी, शराब या अन्य किसी लालच में।

अगर अविनाश आपके दोस्त हैं और आप उनकी फिल्म हिट कराने के लिए इस कदर अभियान छेड़े हुए हैं और फर्जी खबर तक लिख मार रहे हैं तो फिर आपकी किसी भी समीक्षा या रिपोर्ट पर यकीन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि आपके फेसबुक प्रोफाइल पर तो लगभग हर निर्माता-निर्देशक या बॉलीवुड हस्ती की तस्वीरों से आपकी दोस्ती की झलक मिल रही है।

यानी आपने कभी कोई समीक्षा या कोई खबर ईमानदारी से लिखी ही नहीं। आपकी हर खबर या समीक्षा पढ़ कर उस पर यकीन करने से पहले क्या यह पाठक की ही जिम्मेदारी है कि वह यह जानकारी हासिल करे कि इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक या हीरो से आपकी दोस्ती है या नहीं! मीडिया और सोशल मीडिया में झूठा-सच्चा यह अभियान छेड़कर आपने अविनाश से दोस्ती नहीं निभायी है बल्कि उनका नुकसान ही किया है। काश अविनाश को यह साधारण सी सच्चाई पता होती कि जिस तरह राजनीति पर लिखने वाले पत्रकार किसी नेता को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं बना सकते, उसी तरह अविनाश के पुराने फ़िल्मी पत्रकार मित्र न तो उन्हें बॉलीवुड में एक बड़े निर्देशक के रूप में स्थापित कर सकते हैं और न ही बेहतरीन समीक्षाएं लिख कर या बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की फर्जी रिपोर्ट तैयार करके उनकी फिल्म के लिए दर्शकों को हॉल तक बुला सकते हैं।

फ़िल्में हिट कराना या नामचीन निर्देशक बनाना इतना ही आसान होता तो बड़े बड़े बजट और भारी पब्लिसीटी, मीडिया कवरेज, बेहतरीन समीक्षाओं के बावजूद फ़िल्में यूँ फ्लॉप न हो जातीं। किसी को नहीं पता कि फिल्म हिट कराने का फार्मूला क्या है। हर बड़ा एक्टर या निर्देशक कभी न कभी सुपर फ्लॉप फिल्में दे चुका है। ये फिल्म पत्रकार अगर किसी काम के होते तो फ्लॉप फिल्मों से बर्बाद हो चुके निर्माता-निर्देशक आज इन्हीं के चरण धो धोकर पी रहे होते और नोटों में खेल भी रहे होते।

शायद अविनाश यह सोच रहे होंगे कि उन्होंने कोई मास्टरपीस बनायी है, जिसकी जानकारी कम बजट के कारण लोगों तक पहुंच नहीं पायी… वरना तो हॉल में अनारकली के दीवाने कुर्सियां भी तोड़ देते। 

मुझे आज भी याद है कि जब मैं इलाहाबाद में अपनी पढ़ाई के दिनों में अपने दोस्त के साथ घूमने निकला था। टाइम पास न हो पाने के कारण हम मज़बूरी में वहीँ एक हाल में पहुंचे। वहां रामगोपाल वर्मा की ‘सत्या’ फिल्म का पहला शो शुरू होने वाला था। उर्मिला का भी तब बहुत जाना माना नाम नहीं था और फिल्म के बाकी के कलाकारों को तो कोई पहचानता भी नहीं था। इसलिए हम दोनों के अलावा गिनती के 10-15 लोग और थे हॉल में। हम दोनों ने टिकट ले लिया और यह कहकर अंदर घुसे कि यार थोड़ी देर टांग फैलाकर सो लेंगे, फिर इंटरवल में हॉस्टल लौट चलेंगे।

…मगर हम दोनों ने फिल्म के पहले ही दृश्य के बाद आपस में एक शब्द बात तक नहीं की। बस टकटकी बांधे देखते रहे। इंटरवल में भी हम जल्दी से टॉयलेट होकर सीट पर आ गए कि कोई सीन न छूट जाए। फिल्म ख़त्म हुई तो कल्लू मामा, भीखू म्हात्रे भी हमारे साथ हमारे दिमाग में ही हॉस्टल लौटे। फिर हमने कई बार वह मूवी हाल में जाकर देखी। फिर हर बार हमें हाल हाउस फुल मिला। यानी दर्शक जान चुके थे, बिना किसी रैकेटियर पत्रकार के बताये हुए ही, कि फिल्म कैसी है।

अगर रैकेटियर पत्रकार ही फिल्म चलाते या फ्लॉप करवाते हैं तो फिर सत्या के अंजान सितारों की तुलना में उसी महान निर्माता- निर्देशक राम गोपाल वर्मा को अमिताभ जैसे महानायक के साथ ‘आग’ मूवी को महज एक हफ्ते में ही समेट कर शर्मिंदा क्यों होना पड़ा था? अविनाश जी मेरी सलाह आपको यह है कि मीडिया अगर आप छोड़ चुके हैं तो फर्जी खबरों के दम पर दिखने वाली उसकी फर्जी ताकत का भ्रम भी अपने दिमाग से निकाल दीजिये। आपके जैसे कई ऐसे नवोदित निर्माता-निर्देशक हैं फ़िल्मी दुनिया में, जिन्होंने बड़ी बड़ी कामयाबियां हासिल की हैं, बिना किसी रैकेट और बिना अथाह धन के। हाल ही में आयी मराठी फिल्म सैराट भी इसका एक अच्छा उदाहरण है, जो न सिर्फ सराही गई बल्कि कमाई में 100 करोड़ के आस पास भी पहुँच गयी।

यह मीडिया नहीं है अविनाश जी, जहाँ लोग क्षेत्र या जाति के नाम पर गुटबाजी करके संपादक या बड़े पत्रकार बन जाते हों। हाँ, बॉलीवुड में शहंशाह बनने के बाद जरूर बड़े लोग गुटबाजी करने लग जाते हैं। लेकिन यह ध्यान रखिए कि बॉलीवुड में गुटबाजी का यह मीडिया जैसा सुख भोगने के लिए यहाँ पहले कामयाब हो कर दुनिया को दिखाना बहुत जरूरी है… और वह भी अपनी प्रतिभा के दम पर… दोस्ती या क्षेत्र के दम पर नहीं।

Khushdeep Sehgal यशवंत भाई, फिल्म तो जो है सो है लेकिन इसकी कमाई को 10 लाख की जगह 10 करोड़ बताना (फिल्लौरी से ढाई गुणा) और इस गलती को अभी तक ठीक नहीं किए जाने को आप क्या कहेंगे…

सन्तोष लखनवी : फिल्म तो मुझे भी अच्छी नहीं लगी. अनारकली ऑफ़ आरा में कुछ भी नया नहीं है. कुछ चापलूस टाइप पत्रकारों ने अच्छी समीक्षा की थी. मुझे लगा रिव्यू बढ़िया है तो मूवी भी बढ़िया होगी, लेकिन देखने लगा तो बर्दाश्त नहीं हो रही थी.

Sanjay Bengani : ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ उन्ही अविनाश की फिल्म है शायद जिनके ब्लॉग पर ‘सविता भाभी’ के कोमिक किरदार को “नारी मुक्ति” का प्रतिक बताया था. यानी विशुद्ध वामा-मार्गी मुक्ति. फिल्म अनारकली ऑफ़ आरा का रिव्यु भड़ासी यशवंत सिंह की पोस्ट पर अभी पढ़ा तो विश्वास हो गया वही अविनाश दास हो सकते है. वामपंथ के सरोकार को सलाम.

Ashish Kumar Anshu : अनारकली की जो खबर सोशल मीडिया पर मिल रही थी, वह उत्सा​​​​हित करने वाला था। जिसे आप जानते हों, वह अच्छा करे तो अच्छा ही लगता है लेकिन इन दिनो दो अर्थों वाले संवाद जिन फिल्म में हो उसका सेटेलाइट राइट भी कोई नहीं लेता। मतलब टेलीविजन के लिए इस फिल्म के रास्ते पहले से ही बंद थे। अविनाश की फिल्म ने पहले दिन दस लाख रुपए की कमाई की। जिसे आप डिजास्टर कह सकते हैं। अब तक का कलेक्शन 30 लाख से उपर गया है। फिल्म अविनाश ने बड़ी मेहनत से बनाई है लेकिन महिला सशक्तिकरण को दिखाने के लिए फिल्म में द्विअर्थी संवाद डालना होगा और गाली—गलौच होना ही चाहिए, यह कहां लिखा है?

Rajan Dharmesh Jaiswal : कई दिनों से देख रहा हूँ फिल्म के द्विअर्थी संवाद को लेकर कई समीक्षक बचाव की मुद्रा में हैं। समझ न आ रहा था ऐसा क्यू? आज आपकी समीक्षा पढ़ समझ आया। वैसे कहानी को फूहड़पन के साथ ही दिखाना है तो बता दूँ की C-D-E ग्रेड के निर्माता कान्ति शाह अविनाश जी पर जरूर भारी पड़ेंगे। 😉

पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव, खुशदीप सहगल, संतोष लखनवी, संजय बेंगानी, आशीष कुमार अंंशू, राजन धर्मेश जायसवाल की एफबी वॉल से.

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अविनाश दास की ‘अनारकली’ यशवंत को नहीं आई पसंद, इंटरवल से पहले ही बाहर निकल आए

Yashwant Singh : अनारकली आफ आरा कल देख आया. नोएडा सिटी सेंटर के पास वाले मॉल के सिनेमा हॉल में. इंटरवल से पहले ही फिल्म छोड़कर निकल गया. मेरे साथ एक संपादक मित्र थे. फिल्म बहुत सतही थी. जैसे मीडिया वाले टीआरपी के लिए कुछ भी दिखा देते हैं, पढ़ा देते हैं, वैसे ही सिनेमा वाले बाक्स आफिस के चक्कर में कुछ भी बना देते हैं. याद करिए वो दौर, जब सेमी पोर्न सिनेमा रिक्शे वालों के लिए बना करती थी और वो अच्छी कमाई भी करती थी. इन सिनेमा के बीच बीच में रियल पोर्न क्लिप भी चला दिया जाता था ताकि काम कुंठित दर्शक पूरा पैसा वसूल वाला फील लेकर जाए.

अनारकली आफ आरा में कुछ भी नया नहीं है. एक फूहड़ गाना गाने वाली सिंगर जो ढेर सारे लोगों से रिश्ते बनाती फिरती है, उसका पंगा एक शराबी वीसी से पड़ गया जो उसे सरेआम नंगा कर रहा था. जाहिर है, फूहड़ गायिका उर्फ सेमी रंडी को इसका बुरा लगना था क्योंकि वह यह सब बंद कमरे में करती थी, आज काम कुंठित और प्रभावशाली वीसी ने उसके साथ सरेआम करने की कोशिश की. बस, वह वीसी को सबक सिखाने में लग गई और सिखा भी दिया. कहानी बस इतनी ही है. इंटरवल से पहले फिल्म छोड़ आया इसलिए मुझे बस इतना बताना है कि मैंने ऐसा क्या फील किया जिससे फिल्म छोड़ आया. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.

ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता. यौन अराजकता को परोसती यह फिल्म भले ही पुलिस और पावर से टक्कर का नौटंकी करती हो लेकिन इसकी आड़ में असल में केवल वासना और सेक्स परोसा गया है. बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म.

इस फिल्म के शुरू होने से पहले पहाड़ पर चढ़ने वाली एक बच्ची की आने वाली फिल्म का प्रोमो दिखाया गया. मैं सोचता रहा कि क्या अविनाश के दिमाग में ऐसे थीम नहीं आते जिसमें जीवन का मकसद और जिजीविषा की कहानी बयां हो जो प्रेरणा देती हो. हमारे हिंदी पट्टी के नए फिल्मकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे पहली बार हिट देने के चक्कर में ऐसे विषय उठा लेते हैं जो न सिर्फ फूहड़ और आउटडेटेड होते हैं बल्कि नए जमाने के दर्शकों को पचते भी नहीं. अविनाश की बड़ी सफलता इस बात की है कि उनने बिना खर्च ठीकठाक पीआर किया और ढेरों बढ़िया वाह वाह करती समीक्षाएं फेसबुक से लेकर अखबारों मैग्जीनों में छपवा लीं. वे फिल्में खर्चा निकाल लिया करती हैं, जो मॉल से लेकर सिनेमाघरों में रिलीज हो जाया करती हैं क्योंकि फिल्मों के ढेर सारे राइट मसलन म्यूजिक, टीवी रिलीज, फारेन रिलीज आदि अच्छे खासे पैसों में बिक जाया करते हैं.

हफ्ते भर में रो गा कर काफी लोगों ने फिल्म देखी है (हालांकि हाउसफुल कहीं नहीं रही यह फिल्म और आरा से लेकर भोपाल तक में एक शो में बस बीस लोगों तक के होने की खबर है) और देख रहे हैं. मेरे साथ सिनेमा हाल में कुल साठ लोग तक रहे होंगे. गोल्ड कैटगरी की सीटों पर ही लोग थे और वह भी पूरे नहीं. तब भी कहा जा सकता है कि जिनने इस फिल्म को बनाने में पैसा लगाया उनका पैसा निकल गया होगा. अविनाश को चाहिए कि वह माडर्न थीम सोचें और प्रगतिशील ढंग का सिनेमा बनाएं. मैंने बिना देखे अविनाश को दो बार फोन कर इतनी अच्छी समीक्षाओं और इतने ढेर सारे स्टार के लिए बधाई दी थी, अब उसे वापस लेता हूं. वो कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने होते हैं.

सिर्फ आलोचना के लिए यह आलोचना कतई न समझा जाए, यह जानते हुए भी कि लोगों को आजकल आलोचना का मतलब निंदा ही लगता है. मैं पूरी साफगोई से इसलिए लिख रहा ताकि प्रतिभावान अविनाश आगे कुछ अच्छी फिल्में बना सकें. और हां, यह भी जानता हूं कि ढेर सारे लोगों ने फिल्म देखकर जो वाह वाह लिख मारा है, उन्हें कतई यह मेरी समीक्षा पसंद न आएगी लेकिन उनसे फिर आग्रह करूंगा कि वह तटस्थ ढंग से सोचें और फिल्म के बारे में पुनर्विचार करें. मेरी तरफ से फिल्म को मात्र एक स्टार. मैं कम ही फिल्मों को इंटरवल से पहले छोड़कर निकलता हूं क्योंकि मेरा मानना है टिकट खरीद कर पैसा बेकार कर दिया है तो फिल्म लास्ट तक देख ही ली जाए, लेकिन लस्ट और भौंडेपन से सनी अनारकली आफ आरा को इंटरवल से पहले तक ही उबकाई के मारे छोड़ आया.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं है :

Ravi S Srivastava फेसबुको पर वीरो की बखानता के बाद सोच ही रहा था आप ने बचा लिया साधुवाद

   Yashwant Singh मैंने फिल्म देखी भी देर में ताकि मैं लिखूं तो इससे फिल्म का बिजनेस प्रभावित न हो. आखिर अविनाश अपने साथी हैं, अपने पेशे के रहे हैं और उनकी पहली फिल्म है, बहुत संघर्षों के बाद.

   Ravi S Srivastava बात आप की सही है पर प्रोफेसन मे इमोशनल का छौंका नहीं होना चाहिये

आशीष महर्षि sahi me?

   Yashwant Singh जाइए देख ही आइए. ताकि मेरे कहे के आलोक में आप भी रिव्यू लिख सकें. आप ज्यादा तटस्थ लिखेंगे क्योंकि दोनों पक्ष आपके सामने हैं. हां, देख आना इसलिए जरूरी है ताकि साथी अविनाश की पहली फिल्म होने के नाते एक थोड़ा-सा योगदान अपन लोग की तरफ से करना बनता है.

चैतन्य घनश्याम चन्दन मैंने भी अतिउत्साह में यह फिल्म पैसे खर्च कर देख डाली, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। दरअसल जिस फिल्मकार की जैसी मानसिकता होती है, वह वैसी ही चीजें दर्शकों को दिखाना चाहते हैं। इस फिल्मकार का इतिहास भी पलट कर देख लीजिये। कम लिखा, ज्यादा समझिये।

Prakash Govind मैं ये फ़िल्म फ़िल्म देखने को आतुर था,,, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गज बुद्धिजीवियों ने दिल खोलकर सराहा था। लेकिन आपने तो एक झटके में बैंड बजा डाली। मुझे आपकी साफगोई बढ़िया लगी। बिना लाग-लपेट के सटीक समीक्षा की है। अविनाश जी को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि अगली फ़िल्म सार्थक व बेहतर बना सकें।

   Yashwant Singh मजेदार ये है कि वो लोग ज्यादा ही तारीफ लिख रहे जिनने नंगई का जीवन भर विरोध किया. आज के दौर में हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है और पोर्न क्लिप सबको सहज उपलब्ध है. ऐसे में सिर्फ कामुकता परोसने के लिए फिल्म बनाना और कामुकता वासना सेक्स को जस्टीफाई करने के लिए एक सरोकारी एंगल गढ़ देना पचता नहीं बंधु.

    Prakash Govind मुझे लग रहा है कि अविनाश जी ने बाजार के बोझ तले दबकर ये फ़िल्म रची, इसीलिए कहानी और रचनात्मकता को नजरअंदाज कर दिया।

   Mantu Soni अब बुद्धिजीवी की क्या बुद्धि है जनता जान चुकी है।

Dev Nath इसको कहते हैं बिना किसी लाग लपेट की समीक्षा

सुभाष सिंह सुमन तमाम रिव्यूज पढ़कर सोच रहे थे कि टिकट बुक किया जाए। अब रहने देते हैं।

Nadim S. Akhter भाई Yashwant Singh, अब तक ये फिल्म नहीं देखी है पर अब देखनी पड़ेगी. जैजै

    Yashwant Singh जरूर. मैं तो सरेआम अपील कर चुका हूं रिलीज से पहले ही कि अपने साथी अविनाश की पहली फिल्म को सब लोग देखें और उन्हें सपोर्ट करें. फिल्म सभी को देखना चाहिए क्योंकि पहली फिल्म थोड़ी भी हिट हो गई, पैसा वसूल बन गई तो निर्देशक के लिए आगे का रास्ता खुल जाता है. जरूर देखिए मित्र और लिखिएगा.

    Nadim S. Akhter आप दोनों मेरे मित्र हैं. इसलिए जरूर देखूंगा और ईमानदारी से लिखूंगा. आपका एक अलग दृष्टिकोण मिला. ये भी जरूरी था. आलोचना और समालोचना जरूरी है. कोई चीज परफेक्ट नहीं होती.

Sandip Thakur कमाल कर दिया यशवंतजी…आपने। धाे डाला…पटक पटक कर। आरा आैर अनारकली….एक ताे करेला,दूजे चढ़ा नीम। अनारकली अपने आप में गजब थी आैर अनारकली यदि आरा की हो तो फिर क्या कहने..। मैंने फिल्म देखी नहीं है…लेकिन आपने जैसा लिखा है कि फिल्म में फूहड़ता का नंगा नाच है…उससे मैंने सहमत हाे सकता हूं। क्याेंकि भाेजपुरी संस्कृति जानी ही जाती है नंगई व दबंगई के लिए। फिल्म सेंसर बाेर्ड ने भी ए सर्टिफिकेट दिया है ताे जाहिर है कि फिल्म में वाे सबकुछ हाेगा जाे पैंट में हलचल पैदा कर दे। .

   Yashwant Singh मेरा दावा है कि अगर आप अपने बेटे या बेटी के साथ फिल्म देखेंगे तो आपको शर्म आएगी कि क्यों देखने चला आया. बेटा या बेटी सिर्फ यौन अराजकता की शिक्षा ही पा सकेंगे. इतने घटिया फूहड़ डायलाग और इतने भोंडे गाने कि आप उफ्फ कर लेंगे.

   Sami Ahmad यशवंत जी, मैं सिनेमा के मामले में जीरो हूँ या आम तौर पर इसके बारे में अच्छी राय नहीं। मैंने इस फ़िल्म का बहुत नाम सुनकर एक भाई से पूछा था कि इस फ़िल्म में और बाई जी के नाच में क्या अंतर है? अब लग रहा कि यह तो बाई जी के बीच बाई जी है। फिर आदमी जलेबी बाई को ही क्यों देखे। किसी शादी में चला जाय। नाच और स्टेज पर ही देख ले नाथुनिये पे गोली मारे और फिर चोली के पीछे क्या है। भाई लोग भी कमाल के हैं। सबको एकदम्मे बुड़बक समझते हैं।

Madan Tiwary निष्पक्ष आलोचना है न? व्यवसायिक प्रतिद्वन्दिता तो नहीं? शेयर करना है यह समीक्षा।

   Yashwant Singh अरे पहले आप देख आइए पंडीजी. देखने से ही आप समझ पाएंगे क्या सही समीक्षा है और क्या गलत. बाकी अविनाश और मेरा कहीं कोई होड़ या प्रतिद्वंद्विता नहीं है. न पहले थी. न अब है. हम लोग अच्छे मित्र हैं.

  Madan Tiwary नहीं आपकी बात पर विश्वास है। मित्र तो सब हैं, बुद्धिजीवियों वाली मित्रता भी है, प्रतिद्वन्दिता भी। हाहाहाहाहा

   Yashwant Singh आलोचना लिखना भी एक तरह की ब्रांडिंग ही होती है. इस बहाने फिल्म की चर्चा हुई. सिनेमा में तो वैसे भी निगेटिव पब्लिसिटी ब्रांडिंग कराई जाती है ताकि सिनेमा का नाम लोगों के दिमाग जुबान तक पहुंच जाए. इसलिए यह आरोप लगा सकते हैं Madan पंडी जी कि हम दोनों ने फिक्स करके यह आलोचना लिखी लिखवाई है 😀

   Madan Tiwary आरा की अनारकली यशवन्त की नजर में। वेब मीडिया के तीन मठाधीश हैं। यशवन्त आफ भड़ास, अविनाश आफ मोहल्ला लाईव, संजय तिवारी आफ विस्फोट। तीनों के बीच बुद्धिजीवी वाली मित्रता और प्रतिस्पर्धा भी रही है। यानी दोस्ती भी दुश्मनी भी। हाहाहाहाहा। लेकिन फेसबुकिया मठाधीशों वाला छिछलापन कभी नहीं रहा। खैर तीनों दोस्त है। दो के साथ जाम वाली मित्रता रही। संजय तिवारी बेचारे मजबूर है जाम नहीं छलका सकते। खैर समीक्षा पढ़े जरूर लेकिन फ़िल्म भी देखें। अविनाश के लिए, संघर्षशील एक्टिविस्ट के लिए।

  आशीष सागर Seedha likha

Aryan Kothiyal चलो अब हमारा पैसा तो बचेगा… सही समीक्षा करने के लिए धन्यवाद भईया

Ila Joshi ग़ज़ब समीक्षा उससे भी ग़ज़ब टिप्पणियां, हालांकि मेरी इस समीक्षा से भयंकर असहमतियां हैं लेकिन आपकी वॉल है सो जो चाहे लिखिए।

   Yashwant Singh आप मेरी समीक्षा और ग़ज़ब टिप्पणियों पर एक समीक्षा अपने वॉल पर लिख सकती हैं. बहस तो होनी चाहिए.

Vinay Oswal मैं तो फिल्म ही नही देखता तो टिपण्णी भी नहीं।

Siddharth Kalhans आपको धन्यवाद वरना आजकल में ही 1000-1200 की चपत लगने वाली थी। कई परिजन फिल्म दिखाने का आग्रह कर रहे थे। चेन्नई प्रवास में तो साथी उत्कर्ष सिन्हा आमादा ही हो गए थे फिल्म जाने को। अब इस बचे पैसे का कुछ सदुपयोग कर सकूंगा आपके लखनऊ आगमन पर द्रव्यपान कराने में (आपके साथियों को क्योंकि खबर है कि आपने द्रव्य से बेवफाई कर दी है)

Harsh Kumar एक ऐसी ही बकवास फिल्म पार्च्ड आई थी। जिसकी तथाकथित कम्युनिस्ट टाइप के लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

S.p. Singh Satyarthi देखने की चाह जाती रही। यशवंत जी की टिप्पणी अपनी अलग और निर्लिप्त पहचान रखती है। इतनी फूहड़ता है तो बाय बाय…

Singhasan Chauhan मैंने फिल्म देखी नहीं है मगर इसी फूहड़पन की वजह से मुझे खुद याद नहीं कब भोजपुरी फिल्म देखी थी

    Yashwant Singh इसका उल्टा होने की ज्यादा संभावना है. लोग अपना नजरिया कायम करने के लिए फिल्म देखने जाएंगे फिर लिखेंगे कि यशवंत ने सही कहा या दूसरों ने. आप जानते ही होंगे कि निगेटिव पब्लिसिटी और ब्रांडिंग सिनेमा का शगल है ताकि फिल्म जुबान दिमाग में चढ़ जाए. 😀

Deepak Pandey आपकी यह पोस्ट जितने लोग पढ़ेगे उतनी फिल्म को चपत लगेगी।

Vinay Shrikar मैंने भी बिना देखे ही यह मूवी देख ली! थैंक्यू यशवंत।

Tarun Kumar Tarun इस समीक्षा का असर यह हुआ कि मेरे १२० रुपये, तीन घंटे और पचास ग्राम खून बच गये!

डॉ. अजित मैं यही सोच रहा था सर सब वाह वाह कर रहे है क्या फिल्म का कोई कमजोर पक्ष नही है। आपकी दर्शकीय टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

Kamal Kumar Singh एक से पहले ही अप्रैल फूल बन गया भैया, हमकों पहिले से ही पता था कि कुंठित खेल होगा।

Ramji Mishra शानदार विश्लेषण

Rajesh Yadav सटीक समीक्षा करना सबके बात नहीं रही इस बिकाऊ मीडिया में। आपने आईना दिखाया है, लेकिन बहुतों को फिर भी धुंधला ही नजर आएगा।

Sheeba Aslam Fehmi Maine Arvind Shesh aur kisi ek aur mitr ki sameeksha padhi, ta’ajub hai ki dono ne hi kuchh aisa nahi likha jisse ye pahlu ujagar hotey. Baharhaal aapke mashvire me dum hai, aainda behtar filmen bhi banaenge Avinash.

Dilnawaz Pasha कई दिन से फिल्म देखने का सोच रहा हूं. मौका मिला तो देख भी लूंगा… बिना देखे क्या कहना!

Sandeep Kumar Yadav मैं आप की बात से सहमत नहीं हूँ। अनारकली लेती देती है या नहीं ये उसकी मर्ज़ी है कोई ज़बरदस्ती तो नहीं है कि BC रसूखदार हैं पैसे फेक रहे हैं तो वो BC के साथ सो जाए, ये उसकी मर्ज़ी है। शरीर उसका है मन उसका है मर्ज़ी उसकी है। आप ने जो ये लिखा है वो अपने दलाल को लेती देती है फिर BC से खुले आम कुछ भी करने में क्या दिक्कत है, मैं ये जानना चाहता हूँ उसके शरीर और उसके मन पर किसका हक़ है, कौन निर्णय कौन करेगा, किसको हक़ दिया गया है…. अगर आप ने फिल्म पूरी नहीं देखी तो कैसे पता की वो अंत में Bc से बदला लेती हैं और सबक सिखाती है ? जिस प्रकार आप ने लिखा है उससे ये पता चलता है कि जो नाचने गाने वाले लोग हैं उनकी अपनी स्वतंत्रता या अपनी नैतिकता कुछ नहीं होती । और जो उसका दलाल है उसने कहाँ कहाँ परोसा है फ़िल्म में अनारकली को ज़रा वो भी बताइये। खैर गीत संगीत में तो आप को फूहड़ता ही नज़र आई बाकी क्या कहें? खैर इसी कहानी में सनी लियोन होती या इमरान हाशमी होते तो शायद ये प्रतिक्रिया न होती आप की? कोई औरत क्या करेगी और किस हद तक करेगी ये BC टाइप्स वाली मानसिकता के लोग तय करते हैं? और सर कृपया अनुराग कश्यप मार्का का अर्थ ज़रा समझाइये?

    Yashwant Singh आपका अपना पक्ष है. स्वागत है. सबके विचार अलग हो सकते हैं. मैने भी लिखा है कि शरीर पर स्त्री का हक होता है, वह तय करती है. मेरा लब्बोलुआब ये है कि सरोकारी कहानी की आड़ में सिर्फ कामुकता, भोंडापन, वासना और नंगई परोसी गई है. जब आप कहते हैं कि पैंसे भी लूंगी, दूंगी भी नहीं तो ये वही नंगई है जिसमें एक पत्रकार कहता है कि रिश्वत भी लूंगा और बदनाम भी करूंगा, एक पुलिस वाला कहता है घूस भी लूंगा और चालान भी करूंगा, एक डाक्टर कहता है फीस भी लूंगा और मरीज को मार भी डालूंगा… क्या संदेश देना चाहते हैं ऐसे सीन / डायलाग से. फिल्म का अंत फिल्म की समीक्षाओं से पता है. अनुराग कश्यप मार्का समझने के लिए गैंग आफ वासेपुर देख लीजिए. दलाल कितने को दिलाता परोसता है यह कुछ दृश्य देखकर अंदाजा लग जाता है जिसमें वह खींच खांचकर हर जगह उसे ले जाता है, थाने से लेकर वीसी तक के घर में. बाकी नजरिया सबका अपना अपना. मैंने अपने जीवन में इतनी भोंडी फिल्म नहीं देखी है, इसलिए कह लिख रहा हूं. सरोकारी कहानी की चाशनी में नंगई परोसने का माडल बहुत पुराना है दोस्त. मुझे स्त्री के संघर्ष से कोई दिक्कत नहीं है. उसके संघर्ष की आड़ में क्या क्या परोसा सुनाया दिखाया गया है, उससे दिक्कत है.

Divakar Singh हम्म सही है सर. हम कल नहीं आ पाए तो एक टिकट का पैसा बर्बाद होने से बच गया. आपने बढ़िया समीक्षा लिखी है.

Sandip Naik कुछ पूर्वाग्रह लग रहे हैं यशवंत। पता नही Avinash ने ये सब पढा या नहीं। खैर, अविनाश खुले दिल दिमाग़ के शख्स हैं और जिंदादिल इंसान हैं। समय आने पर सबको और सबकी जिज्ञासाओं का माकूल जवाब भी देंगे, अभी सुस्ता तो लेने दो एक लंबी पारी खेलने के बाद।

    Yashwant Singh पूर्वाग्रह होता तो फिल्म का रिलीज से पहले ही प्रचार न कर रहा होता भड़ास के जरिेए और रिलीज पर सबको देखने का आह्वान न करता. पूर्वाग्रह अगर इसे कहते हैं कि जैसा आप फील करें, उसे लिख दें तो मान लीजिए पूर्वाग्रही हूं. रही अविनाश की बात तो उन्हें प्रशंसाओं के अंबार के बीच दो चार आलोचनाओं का भी स्वागत करना ही चाहिए मित्र.

Rj Shalini Singh आप जैसे आलोचक जो स्पष्ट एक बार में कह दें कम होते हैं भाई। हम तो ऐसे लोगो को पलकों पर नहीं उनके भीतर छुपा के रखने वाले हैं। ताकि कोई नज़र न लगा पाए।

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‘अनारकली ऑफ़ आरा’ की फर्स्ट डे कमाई थी दस लाख, इन अखबारों ने छाप दिया दस करोड़ रुपये!

Ashwini Kumar Srivastava : दैनिक भास्कर जैसे हिंदी अख़बार में बड़े पद पर पत्रकार रह चुके अविनाश दास की पहली फिल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप है या सुपर हिट, कुछ पता ही नहीं चल पा रहा है… पत्रकार से फ़िल्मकार बने अविनाश की फिल्म के बॉक्स ऑफिस आंकड़े न जाने कौन से सूत्रों से मीडिया को मिल रहे हैं कि दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला जैसे अखबारों ने जहाँ उसी दिन रिलीज़ हुई अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘फिल्लौरी’ को ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ के सामने फिसड्डी बता दिया, वहीँ बॉलीवुड में बॉक्स ऑफिस की विश्वसनीय रपट देने वाली वेबसाइट ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ को बॉक्स ऑफिस पर सुपर फ्लॉप और ‘फिल्लौरी’ को औसत करार दे भी चुकी हैं।

दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,  अमर उजाला में तो बाकायदा बॉक्स ऑफिस आंकड़े देते हुए ख़बरें चलाई गई हैं कि कुल 4 करोड़ में बनी अविनाश की फिल्म के पहले दिन की बॉक्स ऑफिस की कमाई 10 करोड़ है…इसी के साथ आज तक जैसी कुछ और वेबसाइट ने भी 10 करोड़ ही लिखा ….

हालाँकि फिर जब आईएमडीबी और बॉलीवुड हंगामा जैसी वेबसाइट ने फिल्म की पहले दिन की कमाई महज 10 लाख रुपये बताई तो आज तक ने भी इसे बदल कर अब 10 लाख ही कर दिया है… मीडिया में फैली इतनी भारी गफलत के बावजूद फिल्म के निर्माता की तरफ से फिल्म रिलीज़ होने के तीन दिन बाद भी बॉक्स ऑफिस आंकड़े नहीं मुहैया कराए जा रहे हैं जबकि अनारकली ऑफ़ आरा के साथ ही रिलीज हुई फिल्लौरी के बॉक्स ऑफिस आंकड़े बराबर आ रहे हैं…

अगर वाकई अनारकली ऑफ़ आरा ने अपने बजट की दोगुनी कमाई पहले दिन ही कर ली है तो यह बेहद बड़ी कामयाबी ही मानी जायेगी। इससे फिल्म के सुपरहिट होने की पूरी उम्मीद भी लगाई जा सकती है। लेकिन महज 10 लाख रुपये ही इस फिल्म ने पहले दिन कमाए हैं तो अनारकली ऑफ़ आरा को अपनी लागत तो दूर, एक करोड़ रुपया कमा पाना भी मुश्किल ही होगा।

यही नहीं, मीडिया से मिल रही चौतरफा वाहवाही और बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन 10 करोड़ कमा लेने की मीडिया की प्लांटेड ख़बरों से भी यह फ़िल्म सुपरहिट में नहीं बदल पाएगी। पत्रकार होने के नाते अविनाश दास की फिल्म की कामयाबी की कामना बाकी पत्रकारों की ही तरह मैंने भी की थी लेकिन लगता है कि भास्कर, जागरण और अमर उजाला के पत्रकारों ने पत्रकार धर्म को ताक पर रख कर मित्रता धर्म निभाते हुए अविनाश दास की कामयाबी के लिए फर्जी आंकड़ों से भरी खबर ही प्लांट करा दी।

वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट जिस फिल्म की पहले दिन की कमाई को महज 10 लाख रुपये और फिल्म को फ्लॉप बताये….वहीँ दूसरी तरफ हिंदी के अख़बार उसी फिल्म को फिल्लौरी की पहले दिन की कमाई 4 करोड़ के मुकाबले अनारकली की कमाई 10 लाख से सीधे 10 करोड़ पहुंचा कर फिल्म को सुपरहिट ही घोषित कर दें। जबकि बॉक्स ऑफिस के वास्तविक आंकड़े मिलने में इतनी बड़ी गलती होने की गुंजाईश न के बराबर ही है।

ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि फिल्म के निर्माता खुद ही बॉक्स ऑफिस के आंकड़ें जारी कर दें ताकि हम सभी को पता चल सके कि आखिर मीडिया में यह परस्पर विरोधाभासी ख़बरें चलने और बॉक्स ऑफिस आंकड़ों में इतना भारी अंतर आने की वजह क्या है? आखिर कौन सही जानकारी दे रहा है और कौन गलत?

हालाँकि मीडिया से बाहर बैठे लोगों को शायद यह गलती मामूली लगे लेकिन पत्रकार और बुद्धिजीवी अच्छी तरह से जान-समझ रहे हैं कि पत्रकारों द्वारा मित्रता और शत्रुता निभाने का यही खेल तो मीडिया और पत्रकारों को जनता की नजर में दलाल में बदल चुका है।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Satyendra PS ए भाई कहीं मोदिया 10 करोड़ आमदनी के मुताबिक कर वसूलने के लिए कारकुन न भेज दे अविनाश दास और प्रोड्यूसर के घर .

Ashwini Kumar Srivastava पहले अविनाश दास खुद तो कबूल करें कि उनको 10 लाख मिला है या 10 करोड़… उनके शुभचिंतक कह रहे हैं 10 करोड़… बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट आ रही है 10 लाख… दिमाग का दही कर दिया है शुभचिंतकों ने…

Satyendra PS सब पार्टी लेने के चक्कर में होंगे. वैसे यह सब टोटका करने से फिल्म हिट नहीं होती। फिल्म में स्टारडम के साथ आक्रामक शुरुआती प्रचार, जिससे लोग पगलाकर एक दो शो देख डालें, वो या माउथ पब्लिसिटी अहम है.

Ashwini Kumar Srivastava पार्टी लेने के चक्कर में पगला कर फर्जी ख़बरें ही प्लांट करने लगे ये पगलेठ… बताइये… ऐसी हरकतों से ही हम सभी पत्रकार और पूरा मीडिया ही बदनाम हो जाता है

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अविनाश दास की ‘अनारकली ऑफ आरा’ : पहले दिन गिनती के दर्शक पहुंचे

ये है भोपाल से पत्रकार अमित पाठे का रिव्यू….

रिलीज़ के पहले दिन स्क्रीन ऑडिटोरियम में दर्शक कोई 15-20 ही थे

Amit Pathe : “ये रंडी की ‘ना’ है भिसी (वीसी) साब.” ये वो महत्वपूर्ण डायलॉग है जिसपे फिल्म अनारकली ऑफ आरा पूरी होती है। ये वो ‘ना’ है जो हमने ‘पिंक’ मूवी में मेट्रो सिटी की वर्किंग गर्ल्स का ‘ना’ देखा था। अस्मिता और इज्जत बचाने के लिए नारी का मर्द को कहा जाने ‘ना’। आरा की अनारकली का ‘ना’ भी वैसा ही है। लेकिन बस वो बिहार के आरा की है, ऑर्केस्ट्रा में नाचती-गाती है।

फिल्म के डायरेक्टर-राइटर अविनाश दास का ये डेब्यू है। लेकिन उन्होंने मंझा हुआ काम किया है। फिल्म कसी हुई है और परत दर परत सलीके से खुलती जाती है। कहीं आपको बोरियत नहीं होती। न आप फिल्म के अंजाम का अंदाज़ा लगा लेते हैं। फिल्म की लोकेशन्स इत्ते रियलिस्टिक हैं कि स्वरा को उन गलियों से भी निकलते दिखाया गया है जहां गंदी नालियां हैं। डायरेक्टर खुद बिहार से हैं तो बिहार को और वहां की बोली, टोन, अंदाज़ को बारीकी से दिखा पाए हैं। रामकुमार सिंह के लिखे गानों के देसज व बिहारी बोल, फिल्म को और ज्यादा बिहारी बनाते हैं। पत्रकारिता से फिल्म लेखन में आकर तेजी से उभरते रामकुमार ने इस फिल्म से एक्टिंग में भी हाथ आजमाया है। उन्होंने ऑनस्क्रीन पत्रकार का छोटा सा रोल निभाया है।

वहीं, स्वरा भास्कर ने ‘डर्टी पिक्चर’ की विद्या बालन सा बोल्ड करैक्टर प्ले किया है। स्वरा ने ‘रांझणा’ में साइड रोल कर अपनी एक्टिंग टैलेंट का देसज पहलू दिखाया था। ‘अनारकली ऑफ आरा’ में उन्होंने अपनी इस तरह के एक्टिंग टैलेंट का एक्सटेंड और अपग्रटेड वर्ज़न दिखाया है। कॉस्ट्यूम और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म में बड़ा संतुलित है, कहीं अतिरेक कर अटपटा नहीं लगता। म्यूजिक के साथ भी ठीक ऐसा ही है। लिरिसिस्ट रामकुमार और डायरेक्टर अविनाश खुद भी पत्रकारिता से सिनेमा में आये हैं। इन्होंने इंडस्ट्री से बाहर के और नए होने के बावजूद अपनी मजबूत मजबूत एंट्री मारी है। इस फिल्म को ‘A’ ग्रेड जाने क्यों दिया गया है। जबकि फिल्म में न सेक्स है न मारपीट। बस बोल्ड संवाद है वो बिहार की भाषा-बोली से ही ली गई है। ‘A’ ग्रेड जैसा कुछ नहीं लगा, मैंने अपने से 10 साल छोटी बहन के साथ ये फिल्म देखने गया था।

हालांकि, रिलीज़ के पहले दिन स्क्रीन ऑडिटोरियम में दर्शक कोई 15-20 ही थे। उनमें ज़्यादातर भोजपुरी बैकग्राउंड के ही लग रहे थे। जो फिल्म के टाइटल और प्रोमो से जुड़ाव के कारण पहले दिन ही फिल्म देखने आये होंगे। हालांकि भोपाल में बिहार क्षेत्र के लोग भी कम हैं। और इस तरह की ऑफ बीट और देसी फिल्मों को ओपनिंग रेस्पॉन्स फीका ही मिलता है। जैसे-जैसे दर्शक और क्रिटीक उन्हें सराहते हैं, अच्छे और मीनिंगफुल सिनेमा के चाहने वाले फिल्म देखने जाते है। इस तरफ की अच्छी फिल्म अपने डेब्यू-डायरेक्शन, छोटे बैनर, लो-बजट, लो-प्रमोशन और लो-स्टारडम के बावजूद अच्छा बिज़नेस कर जाती है। उससे कहीं जरूरी… सराही जाती है।

अनारकली, बिहार में डबल मीनिंग भोजपुरी गानों पर होने वाले नचनिया डांस फॉर्मेट के स्टेज शो करती है। उसके इस पेशे, गाने-नाचने और पहनावे को उसके ढीले कैरेक्टर का सबूत माना जाता है। वहां की यूनिवर्सिटी का ठरकी वीसी उनमें सबसे ऊपर है, जो स्टेज पे ही अनारकली से छेड़छाड़ और जबरदस्ती करने लगता है। अस्मिता की पक्की अनारकली वीसी को स्टेज पे ही तमाचा जड़ देती है। ठरकी वीसी अपनी हवस और बेइज्जती का बदला लेने के लिए कई बार उसे घेरता व दबाव बनाता है। लेकिन अनारकली टूटती, झुकती नहीं है। हर बार उसे मजबूती से ‘ना’ कह देती है।

खिसियाये वीसी और पुलिस के तमाम दबावों के बाद भी अनारकली अपनी इज्जत बचाये रहती है और घुटने नहीं टेकती। फिल्म के आखिर में वो वीसी को सरेआम स्टेज पे ही बेनकाब कर अपना बदला लेती है। और स्टेज से उतरकर अनारकली कहती है- “ये रंडी की ‘ना’ है भिसी साब।”

ये हैं वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा…

आरा में अनारकली को देखने के लिए सिनेमा हाल में बमुश्किल बीस लोग थे…

Gunjan Sinha : सन्दर्भ आरा की अनारकली. देखा मैं किसी विशाल प्राचीन मंदिर में हूँ. उसमे तमाम पुजारी नंगे हैं उनके यौनांग स्थाई रूप से उत्तेजित हैं. ऐसे ढेर सारे गोरे चिट्टे विशालकाय, सर घुटाए पुजारी जहाँ तहाँ बैठे गपिया रहे हैं. किसी को कोई एहसास नही कि वे नंगे हैं. उनमे से एक मुझे बाहर निकलने से रोक रहा है. मैं किसी तरह भाग आता हूँ तो देखता हूँ, मंदिर के बाहर बहती नदी के किनारे सड़क पर एक लड़की हांफती हुई बेतहाशा भागी जा रही है. नंग धड़ंग पुजारियों की भीड़ उसे पकड़ने के लिए दौड़ रही है. मेरी नींद खुल गई. पसीने से तर, और कंठ सूखा हुआ.. घडी में दो बज रहे थे.

आखिर ऐसा दुःस्वप्न मैंने क्यों देखा. माजरा तुरंत समझ में आ गया यह असर था ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ का. मैंने कल शाम अविनाश दास की यह कृति देखी थी. मुक्त नही हो सका हूँ और शायद जीवन भर मुक्त नही हो सकूँगा – फिल्म से, अनारकली से, अनगिनत अनाम नर्तकियों के अस्मिता विहीन अस्तित्व के एहसास से, अस्मिता के लिए अनारकली के संघर्ष से, दीमक खाये खम्भों वाले प्राचीन परम्पराओं के मंदिर से, इस मंदिर के तमाम नंगे पुजारियों से, मुझे गिरफ्त में लेने की उनकी साजिशों से, बदहवास भागती लड़कियों के बेचैन कर देने वाले बिम्ब से – मैं मुक्त नहीं हो सका हूँ और जीवन भर मुक्त नही हो सकूँगा.

इस फिल्म के लिए अविनाश दास को और उनकी पूरी टीम को सलाम. फिल्म में सभी कलाकारों ने गजब का अभिनय किया है आखिरी दृष्यों में विद्रोही आक्रोश से भरा स्वरा का नृत्य, उसमे अभिरंजित अनारकली का दर्प अविस्मरणीय है. गीत के बोल और नृत्य-संगीत की गति में अनारकली की विद्रोही अस्मिता, उसकी भावनाओं का विस्फोट पूरी तरह व्यंजित हुआ है. मैं फिल्मों का शौकीन रहा हूँ. सोचता था कि अविनाश दास बक बक ज्यादा करते हैं, पता नहीं कैसी फिल्म बनाई है. लेकिन अब कह सकता हूँ, इतनी अच्छी फ़िल्में मैंने बहुत कम देखी हैं.

अक्सर ऐसा होता है, जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से जानते हैं उनकी क्षमता-प्रतिभा को महत्त्व तब तक नही देते जब तक उसे अमेरिका इंग्लैण्ड से सर्टिफेकट न मिले. मैं मानता हूँ, अविनाश के बारे में मैं ऐसी ही गलत फहमी का शिकार रहा हूँ. ये भी आशंका थी कि आरा में आरा की अनारकली का टिकट शायद पहले दिन ना मिले. लेकिन दुर्भाग्य ! ऐसी जिन्दा फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल में बमुश्किल बीस लोग थे. फिल्म को जितना प्रचार मिलना चाहिए, नही मिला है. हर लिहाज से बेहद मनोरंजक होने के साथ फिल्म में व्यंग्य है, असरदार सन्देश है. एक आग है, लेकिन अभागी जनता को न तो आग की जरुरत है, न सन्देश की. उसे जरूरत है उन नंगे पुजारियों की जिन्हें मैंने अपने दुःस्वप्न में देखा है.

फिल्म निर्देशक अविनाश दास से ‘भड़ास’ की बातचीत पढ़िए…

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अविनाश दास की फिल्म ‘आरा वाली अनारकली’ का प्रोमो / ट्रेलर रिलीज

Harsh Vardhan Tripathi : हम और अविनाश दास विचार के दो छोरों पर ज्यादातर खड़े रहे। वेबसाइट, ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में जब हम मुंबई में थे और अविनाश दिल्ली में, तब हमारी जान-पहचान-झूमाझटकी हुई थी। हम सीएनबीसी आवाज मुंबई में थे और अविनाश एनडीटीवी दिल्ली में। अब अविनाश मुंबई में हैं और हम दिल्ली में। मुंबई जाकर अविनाश फिल्म निर्देशक हो गए हैं। उनकी फिल्म आ रही है, ये आरा वाली अनारकली की कहानी है। प्रोमो भर देख लीजिए, फिल्म देखने खुद जाइएगा। पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने अविनाश की सफलता की ये शुरुआत है। प्रोमो देखते मुझे इस फिल्म पर कुछ-कुछ गैग्स ऑफ वासेपुर की छाप दिखी।

Riwa Singh : ट्रेलर में ही गर्दा उड़ा दिये हैं आपलोग! एक-एक डायलॉग ‘करेजवा’ के आर-पार हो गया। क्या लिखा है Avinash जी ने! मज़ा आ गया! रातभर पागल होती रही मैं! संजय मिश्रा नेगेटिव रोल में हैं, निर्देश दे रहे हैं – कांड बनाओ पर कमांड रखो। पंकज त्रिपाठी हैं अनारकली के हमदम, दोस्त और मंच संचालक भी। और स्वरा भास्कर! इन्होंने जिस अंदाज़ में डायलॉग्स की डिलीवरी की है, वो दीवाना कर देता है।

पिंक में लड़कियां चीखकर कहती हैं कि हमने पैसे नहीं लिए! आरा की अनारकली कहती है – “पैसा भी रखेंगे और देंगे भी नहीं।” मतलब अब पैसा देकर भी खरीदने का सपना मत देखिए। अबतक ये समझ आता था कि औरतें पैसे से खरीदी जा सकती हैं। जो पैसे नहीं लेती थीं वो शरीफ़ कहलाती थीं। अबकी औरत पैसे भी लेगी क्योंकि उसे आपके दिये हुए शराफ़त के तमगे का अचार नहीं डालना है। और आप उसके साथ कोई ज़बरदस्ती भी नहीं कर पाएंगे इसका भी दावा करती है। ये अभी तक की सिनेमायी औरतों से एक कदम आगे की बात है।

कितना आसान होता है एक रसूख़दार के लिए एक आम इंसान को कुचलना या बेबस कर देना! और ये काम और भी आसान हो जाता है जब वो एक औरत होती है। गानेवालियों की कौन-सी इज्ज़त होती है, उन्हें अपनी देह से कैसा लगाव! गानेवालियों का कबसे चरित्र होने लगा! अनारकली कहती है – सबको लगता है हम गानेवाले लोग हैं तो कोईओ आसानी से बजा भी देगा और फिर वो बताती है – पर अब अइसा नहीं होगा!

वो गानेवाली होकर भी बड़े लोगों के लिए ‘उपलब्ध’ नहीं होती इसलिए उसे देह का अवैध धंधा करने के झूठे इल्ज़ाम में गिरफ्तार करवा दिया जाता है और अख़बार की सुर्खियों के लिए वो वेश्या बन जाती है। तोड़ा उसे पहले ही जा चुका है, अब उसके पास सिर्फ़ उठने का विकल्प होता है। वो तब भी उपलब्ध नहीं थी और अब भी नहीं है, चाहे जितना ज़ोर लगा लो।  अनारकली कहती है – आज या तो आर-पार होगा, नहीं हम आरा की अनारकली नहीं, समझे! पहले से भी ज्यादा उत्सुक और बेसब्र हूं अनारकली ऑफ़ आरा के लिए। पूरी टीम को शुभकामनायें!

पत्रकार हर्षवर्द्धन त्रिपाठी और रीवा सिंह की एफबी वॉल से.

अविनाश की फिल्म का प्रोमो / ट्रेलर देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=jHFT_PdLh20

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पत्रकार अविनाश दास की फिल्म ‘अनारकली’ 24 मार्च को रिलीज होगी

Avinash Das : आज से पंद्रह साल पहले राजेंद्र यादव के आग्रह पर मैंने एक छोटा सा नाॅविल लिखा था। वह एक एेसे लड़के की कहानी थी, जो जीवन में बहुत कुछ बनना चाहता है – लेकिन एक कॉमन मैन में बदल जाता है। हम अपनी आकांक्षाओं के साथ लंबी यात्रा नहीं कर पाते। बहरहाल, मेरे मन की एक बात पूरी हो रही है। जब मेरी फिल्म अनारकली नहीं बनी थी, दोस्त पूछते थे – फिल्म कब बनाओगे? जब फिल्म बन गयी, तो पूछने लगे – रीलीज़ कब होगी?

तो मेरे बेसब्र दोस्तों के लिए खुशखबरी है कि अनारकली की रीलीज़ डेट तय हो गयी है। आज से ठीक दो महीने बाद, 24 मार्च को अनारकली रीलीज़ हो रही है।

सोचने से लेकर बनने तक की लंबी कहानी है अनारकली की। मगर जो भी, जैसा भी है – अब पर्दा उठ जाएगा और सब कुछ सामने होगा। गुज़ारिश है कि इस फिल्म की सूचना आप अपने तमाम मित्रों-अड़ोसियों-पड़ोसियों से शेयर करें। अब तक मैंने मेरी फिल्म के बारे में बहुत थोड़ी बात की है। अब अगले दो महीने में कई बार अनारकली का ज़िक्र करूंगा। उम्मीद है, आप अन्यथा नहीं लेंगे।

शूटिंग के वक्त की कुछ तस्वीरें यहां चिपका रहा हूं – अरुण कमल की इन मशहूर पंक्तियों के साथ… कि – क्या है अपना इस दुनिया में, सब कुछ लिया उधार; सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार!

Producer: Sandiip Kapur & Priya Ahuja Kapur
Director of Photography: Arvind Kannabiran
Editor: Jabeen Merchant
Music Director: Rohit Sharma
Art Director: Ashwini Shrivastav
Executive Producer: Mohammad Mubashshiir
Associate Director: Ravinder Randhawa
Star: Swara Bhaskar, Sanjai Mishra, Pankaj Tripathi, Ishteyak Khan
Written & Directed by Avinash Das

#Anarkali #24March2017 #ReleaseDate

एनडीटीवी, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके और इन दिनों फिल्म नगरी में सक्रिय अविनाश दास की एफबी वॉल से.

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धंधेबाज शाहरुख खान की मजबूरी समझिए….

Chandan Pandey : शाहरुख़ खान की शिकायत बेवजह हो रही है। मैं जिस गली में रहता हूँ उसमें अगर कोई गुंडा आ जाए और नए नियम बना दे तो शुरुआती विरोध के बाद मैं भी उसकी जी हुजूरी  में जाऊँगा ही जाऊँगा। गुंडों से डरना चाहिए। गुंडों के साथ सत्ता हमेशा रहती है। आप एक बार को गुंडे को हरा भी दें तो उसके साथ जो सत्ता है, जैसे भक्त पब्लिक, पुलिस, नेता-पनेता, वो आपको तड़पा देंगे, तड़पा तड़पा कर सजा देंगे। शाहरुख की गलती रत्ती भर भी नहीं है।

शाहरुख ने फिल्म कई वर्ष पहले शुरू की होगी। कितना पैसा खर्च किया होगा। पाकिस्तानी अदाकारा से फिल्म में काम कराया होगा। अब अचानक राज ठाकरे और अन्य गुंडे कहते हैं कि पाकिस्तानी लोगों द्वारा अभिनीत फ़िल्में वो प्रदर्शित ही नहीं होने देंगे। ऐसे में शाहरुख अगर विरोध करते हैं तो भक्त, फ्रॉड इंटरनेटिये, देशभक्ति के नाम पर उनकी फिल्मों का बहिष्कार करने लगेंगे। ऐसे में कोई शाहरुख करे भी तो क्या करे?

शाहरुख का जितना निवेश है उसका सहस्रान्स भी अगर साथियों का खर्चा हो तो ये लोग राज ठाकरे और अन्य गुंडों के पैर में गिर पड़ेंगे। साष्टांग। एक अकेले पड़ते जा रहे इंसान की मुसीबत समझिए। पिछली बार जब अक्लबंद भक्तों ने किसी मामूली बात पर शाहरुख की फिल्म का बहिष्कार किया था तब तो ये अक्लमंद यह नहीं सोचे कि जाएं, फिल्म देखें और बहिष्कार का बहिष्कार करें। नहीं। आज जब शाहरुख ने अपने बचाव का कदम उठाया है तो हर किसी को अपना स्वाभिमान दिख रहा है। वाह!

चंदन पांडेय की एफबी वॉल से.

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रजनीकांत की ‘कबाली’ और इरफान खान की ‘मदारी’ देखने लायक है या नहीं, दो पत्रकारों की ये राय पढ़िए

Om Thanvi : ‘कबाली’ देख कर आए हैं। मैं समीक्षा नहीं कर रहा। पर इतना कहूँगा कि निहायत बेतुकी, बेसिरपैर फ़िल्म है। हिंदी में यह चलेगी, मुझे शक़ है। रजनीकांत भले आदमी हैं। दक्षिण – ख़ासकर तमिलनाडु – के दर्शकों के लिए देवता हैं। लेकिन अभिनय की वजह से उतने नहीं, जितने अपनी स्टाइल-अदाओं के कारण। हिंदी में भी ऐसे बहुत-से सुपरस्टार स्टाइल-अदाओं से चले हैं। पर उन फ़िल्मों की सफलता में कथा-सम्वाद, गीत-संगीत, सहयोगी अभिनेता-अभिनेत्रियाँ साथ देते रहे।

रजनीकांत अपने सुपरमैन-मार्का करिश्मे में निपट अकेले चलते हैं। निश्चय ही फ़िल्म के मूल तमिल रूप में सम्वाद-संगीत भी बेहतर प्रभाव वाले होंगे। पर वहाँ भी उनके प्रशंसक उनके अलावा परदे पर शायद ही कुछ देखना चाहते हों। दिल्ली में ऐसे दर्शक हॉल में थे जो परदे पर उनके आते ही चीख़ने से अपने आप को रोक नहीं पाए। ऐसे समर्पित ‘फ़ैन’ किसी अभिनेता के न बॉलीवुड में मिलेंगे, न हॉलीवुड में। फिर भी मुझे लगता है अगर मनोरंजन मात्र के लिए हम फ़िल्म देखने जाते हों, तो ‘सुल्तान’ ‘कबाली’ से दस गुणा बेहतर साबित होगी! मित्रों, यह “समीक्षा” नहीं है। फ़ौरी राय है। यह बात ऊपर और स्पष्ट कर दी है। आप अपनी रुचि से देखें फ़िल्म।

Abhishek Srivastava : देख लिए Madaari लेकिन एक बात समझ में नहीं आई- मदारी कौन है। फिल्‍म की भावना का लिहाज रखते हुए कहा जा सकता है कि मदारी इसका नायक है जो हफ्ते भर तक सरकार को अपने इशारों पर नचाता रहता है। फिल्‍म जहां हमें छोड़ती है, वहां व्‍यापक फ़लक पर कह सकते हैं कि मदारी तो दरअसल सरकार ही है जो छोटे-मोटे मदारियों को इस व्‍यवस्‍था में रह-रह कर डुगडुगी बजाने का मौका भर देती है। बाकी, चलती उसी की है। अब आपके समझने का फेर है कि मदारी कौन है।

यह फिल्‍म दरअसल बंदर के बारे में है, मदारी के बारे में नहीं। बंदर जनता है, यह साफ़ है। जनता के बीच से निकले छोटे-मोटे मदा‍री भी जनता को ही नचाते हैं, संसदीय प्रणाली से निकले जनप्रतिनिधि भी। मीडिया भी जनता को नचाता है। जनता लगातार इनके इशारे पर नाचती है और उसके बीच से जब कोई छोटा-मोटा मदारी बड़े मदारी की नाक में दम करता है तो जनता खिखिया कर बंदर की तरह दांत चियार देती है। आयरनी यानी विडम्‍बना यह है कि बंदरों को उनकी औकात बताने वाला, आईना दिखाने वाला और कोई नहीं बल्कि सबसे बड़ा मदारी ही है- फिल्‍म का गृहमंत्री। मौके पर रघुवीर सहाय की कविता याद आती है- ”खतरा होगा/खतरे की घंटी होगी/उसे बादशाह बजाएगा, रमेश।”

बचे अपने इरफ़ान खान, तो उन्‍हें बाप-वाप का रोल नहीं करना चाहिए। उन्‍होंने अपने दर्शकों के भीतर खुद को इमोशनल शीशे में देखे जाने की आदत नहीं डाली है। इसलिए उनकी स्‍वीकार्यता एक दुखी बाप के रूप में बन नहीं पाती। उनके तीखे डायलॉग, सेंस ऑफ ह्यूमर और कटाक्ष भरी आवाज बाप के दर्द पर भारी पड़ जाते हैं। बीच-बीच में एक ”ओ री चिरैया” टाइप का फर्जी गाना माहौल को और नकली बना देता है। सबसे बड़ा जुलुम तो ये है कि इस नकली गाने के ठीक बाद इंटरवल रख दिया गया है। बाकी सबकी एक्टिंग ठीक है। हमारे समय के सबसे अंडररेटेड अभिेनेता जिमी शेरगिल को एक बार फिर पुलिसवाले के रूप में देखकर इस इंडस्‍ट्री की रवायत पर अफ़सोस होता है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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दंगे पर बनी फिल्म ‘शोरगुल’ में कास्टिंग डायरेक्टर ने आजम खान से हूबहू मिलता आलम खान खोज निकाला है!

Abhishek Srivastava : मुख्‍यधारा की एक लोकप्रिय फिल्‍म में अतीत में हुए किसी दंगे को लेकर जो कुछ भी मौजूदा माहौल में दिखाया जा सकता है, Shorgul उस सीमा के भीतर एक ठीकठाक व संतुलित फिल्‍म है। फिल्‍म का अंत बेशक नाटकीय है क्‍योंकि वास्‍तविक जि़ंदगी में ऐसा होता दिखता नहीं, लेकिन एक प्रेम कथा से उठाकर जलते हुए शहर तक आख्‍यान को ले जाना और उसमें निरंतरता बनाए रखना, यह निर्देशक की काबिलियत है।

शोरगुल देखते हुए मुझे पंकज कपूर वाली मौसम याद आ गई जिसमें एक प्रेम कथा को 1984 के दंगे से गुजरात के दंगे तक फैला हुआ दिखाया गया था। मौसम बड़े वितान की फिल्‍म थी, इसलिए उसका फोकस बिखर गया था। शोरगुल उसके उलट एक स्‍थानीय व अल्‍पकालिक प्‍लॉट पर बनाई गई है, इसलिए इसका कैनवास सीमित है। इंटरवल से पहले घुसाए गए कई बी-ग्रेड गानों ने इसे हलका कर दिया है।

फिल्‍म की एक उपलब्धि सलीम का किरदार निभाने वाले हितेन तेजवानी हैं, जिनकी बुलंद आवाज़ सुने जाने लायक है। कास्टिंग डायरेक्‍टर की दाद देनी होगी कि उसने वाकई आज़म खान से हूबहू मिलता आलम खान खोज निकाला, हालांकि आज़म खान के किरदार के साथ लेखक ने थोड़ी-सी बेवफाई ज़रूर की है। मुझे लगता है कि आज़म खान जैसे भी हों, वैसे नहीं हैं जैसा इस फिल्‍म में दिखाया गया है। मैं गलत भी हो सकता हूं। मेरी ओर से इस फिल्‍म को 10 में 5.5 अंक।

फिल्म समीक्षक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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