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अब बिना मजीठिया वेतनमान के नहीं छप पाएंगे अखबार

सरकारी विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री की फोटो नहीं तो प्रधानमंत्री की फोटो क्‍यों—-जरा विचार कीजिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन करने के लिए अखबार मालिकों को कोई विशेषाधिकार मिला है क्‍या—- अखबार मालिक लगातार मजीठिया वेतनमान न देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर उसकी अवमानना कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को गिरा रहे हैं।- और हर ओर चुप्‍पी है—सन्‍नाटा है—-सिर्फ कर्मचारियों के जीवन में न ज्‍वार है न भाटा है।

सरकारी विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री की फोटो नहीं तो प्रधानमंत्री की फोटो क्‍यों—-जरा विचार कीजिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन करने के लिए अखबार मालिकों को कोई विशेषाधिकार मिला है क्‍या—- अखबार मालिक लगातार मजीठिया वेतनमान न देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर उसकी अवमानना कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को गिरा रहे हैं।- और हर ओर चुप्‍पी है—सन्‍नाटा है—-सिर्फ कर्मचारियों के जीवन में न ज्‍वार है न भाटा है।

इतिहास में कभी भी इस तरह से सुप्रीम कोर्ट का अपमान नहीं किया गया। अब तो हर लड़ाई खबर पालिका लड़ रही है। पुराना मीडिया और नया मीडिया आमने सामने है। दैनिक जागरण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सीना ठोक कर कह दिया है, हम मजीठिया वेतनमान इसलिए नहीं दे रहे हैं कि कर्मचारियों ने उस ड्राफ्ट पर साइन कर दिया है कि उन्‍हें मजीठिया वेतनमान नहीं चाहिए।

अब तो कर्मचारियों को ही बताना होगा कि उन्‍हें मजीठिया वेतनमान चाहिए या नहीं। किसे बताएंगें—-कौन सुनेगा उनकी बात—–जाहिर है कि अखबार मालिकों को ही बताना होगा। और ऐसे बताना होगा कि वे समझ जाएं कि वास्‍तव में कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान चाहिए ही चाहिए—–और बिना मजीठिया वेतनमान दिए वे अखबार नहीं छाप पाएंगे।

ऐसे अखबारों के छपने का क्‍या मतलब है, जो कर्मचारियों के शोषण की बुनियाद पर छप रहे हैं और छाप रहे हैं उपासना के गीत। कैसी विडंबना है—चापलूसी लिखोगे आप और मलाई खाएंगे वे।

एक किस्‍सा याद आता है-एक व्‍यक्ति ने वांट निकाली कि उसे एक ऐसा कर्मचारी चाहिए, जिसे सैलरी के रूप में सिर्फ भोजन मिलेगा। भुक्‍खड़ों की कमी तो है नहीं। आवेदकों की लाइन लग गई। सभी सेलेक्‍ट हो गए। अब उन्‍हें काम क्‍या मिला—-गुरुद्वारे में जाकर भोजन करना है और एक थाली भोजन मालिक के लिए लाना है। इस व्‍यवस्‍था से बैठे बिठाए मालिक का पूरा परिवार भोजन कर रहा है और कर्मचारियों में इस बात का भ्रम है कि वे नौकरी कर रहे हैं और उन्‍हें वेतन भी मिल रहा है।

यही हालत है अखबार मालिकों की। आप गुरुद्वारे से भोजन नहीं लाएंगे तो उनके परिवार को भोजन नहीं मिलेगा, लेकिन आपका तो अभ्‍यास हो गया है। आप गुरुद्वारे में जाकर भोजन तो कर ही सकते हैं। फिर क्‍यों व्‍यर्थ चिंता करते हो कि आपकी मेहनत से अखबार मालिकों का परिवार भोजन करे। भूखे मरने दो उन्‍हें। अब आप सिर्फ अपने भोजन की चिंता करो। वह कहीं न कहीं मिल ही जाएगा।

श्रीकांत सिंह के एफबी वॉल से

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4 Comments

4 Comments

  1. Sanjib

    May 16, 2015 at 9:27 pm

    SUpreme Court (Rev. Ranjan Gogoi) aur Bhadas ka Sadhuwad…
    Sathiyon, Film Sholey ka dialogue yad dila raha hoon… “Ab ayega Maza…..bahut beimani kiya re…” (Last sentence apni taraf se joda hoon..
    Sathiyon, Ekjut rahein aur Himmat na harein… Chatukaron ko office se bahar “Pakad-2 ker Peetein”.
    Tabhi aise Tuchchey Logon ko seekh milagi….
    Jai Hind…

  2. KASHINATH MATALE

    May 18, 2015 at 10:51 am

    MALIK KI NOKARI KARNA KI GURUDWARESE APNELIYE AUR MALIK KE PARIWAR KE LIYE BJOJAN LANA.

    WAH !! KYA MISAL HAI !!!

    MEHNAT KARE MURGA ANDA KHAYE FAKIR !!!!

    AB BARI HAI CHOR KE GHAR DAKA DALNE KI !!

  3. mukesh

    May 18, 2015 at 3:09 pm

    Her taraf chuppi hy…sannata hy.. presskarmio ky jivan my na juwar hy na bhata hy in jalimo ko y hi pasand aata hy

  4. mukesh

    May 18, 2015 at 3:20 pm

    sarkar pangu hy aajadi ky 6 dashak sy adhik ho gay lykin presskarmio ko nagar nigam ky 4thclass karmcario jitna bhi vatan nahi dila pai hy.sharm aani cahy cothy stambh ky lambardaro ko jo media ki khal my dallagiri kar rahy hy.

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