अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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सच के बजाय झूठ परोसने लगे अखबार!

डॉ. सुभाष गुप्ता

कल शाम न्यूज 24 चैनल पर घूमर पर डांस करते बच्चों पर करणी सेना के लोगों के हमले की खबर देख रहा था। खबर पूरी होते- होते मन खिन्न हो उठा। कल कुछ अखबार पढ़कर भी ऐसा ही हुआ। न्यूज चैनल और अखबार दरअसल हमारी नया जानने की मानसिक जरूरत पूरी करने का एक अहम जरिया हैं। इन्हीं के जरिये हमें ताजातरीन सूचनाएं मिलती हैं, लेकिन अब अखबार से लेकर न्यूज चैनल तक बहुत से ऐसे लोग पहुंच गए हैं, जो या तो काम के इतने दबाव में हैं कि सही और गलत का फैसला करने की स्थिति में ही नहीं बचे हैं। या फिर सही और गलत को निर्णय करना उनकी क्षमता से बाहर है। खबर को सच माना जाता है, लेकिन अब कई बार पूरी खबर पढ़ने या देखने के बाद लगता है कि ये खबर तो सच हो ही नहीं सकती। ये आंशिक सच हो सकती है या फिर निरा झूठ।

सबसे पहले बात न्यूज 24 चैनल की। आज शाम इस चैनल पर प्रसारित घूमर डांस से नाराज करणी सेना के लोगों के हमले की खबर की बात करता हूं। इस खबर के इंट्रो में बताया गया है कि करणी सेना के लोगों के स्कूल पर हमले में पांच बच्चे घायल हो गये। ये कुछ अटपटा लगा क्योंकि आज सुबह अखबारों में यह खबर आ चुकी थी। अखबारों में छपा था कि स्कूल में एक बच्ची के घूमर पर डांस करने के कुछ देर बाद इन लोगों ने वहां पहुंच कर तोड़फोड़ की। चैनल पर इस खबर के बीच उसी स्कूल के प्रिंसीपल की बाइट भी चल रही थी।

प्रिंसीपल बता रहे थे कि एक बच्चे के चोट आई है। स्कूल में तोड़फोड़ के लिए नाम लेकर करणी सेना को जिम्मेदार ठहराने वाले प्रधानाचार्य ने घायलों की संख्या गलत बताई है या चैनल के रिपोर्टर ने गलत रिपोर्ट कर दिया?  ये सवाल बहुत पीछे छूटता हुआ सा लगता है क्योंकि ये खबर जिस बाइट पर आधारित है, वही बाइट,  खबर के सच से टकरा रही है।

देहरादून में दो कारों की मामूली सी टक्कर के बाद एक युवा इंजीनियर भूपेश की सीने में पेंचकस घोंसकर हत्या कर दी जाती है। 15 जनवरी के अखबारों में यह खबर सुर्खियों में छपी है। अमर उजाला में खबर पढ़कर पता चलता है कि जिस युवक की हत्या हुई है, वह अपने दो दोस्तों के साथ कार से जा रहा था। मामूली टक्कर के बाद झगड़ा हुआ और ट्रांसपोर्टर ने पेंचकस से भूपेश के दिल के पास वार कर दिया गया। इसके बाद भूपेश के साथी उसे तड़पता छोड़कर घटनास्थल से भाग गए।

इसी दिन दैनिक जागरण में इस खबर को दूसरे ढंग से प्रकाशित किया गया है। जागरण में छपा है कि भूपेश के शरीर में कोई हरकत न होते देखकर आरोपी भागने लगा, तो भूपेश के दोस्तों ने उसे पकड़ लिया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर हमलावर को हिरासत में लिया और भूपेश को अस्पताल पहुंचाया।

जागरण के दूसरे अखबार आईनेक्स्ट में इस खबर के तथ्य कुछ और अलग हैं। आई नेक्स्ट ने छापा है कि अचेत अवस्था में भूपेश को उसके दोस्त रात ही अस्पताल ले गए। फरार होने का प्रयास कर रहे आरोपी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। आई नेक्सट ने लिखा है कि भूपेश ने देहरादून के एक विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की थी, जबकि अमर उजाला, हिंदुस्तान और जागरण ने लिखा है कि भूपेश ने पिथौरागढ़ से इंजीनियरिंग की थी।

एक ही घटना के ये एक दूसरे से विपरीत तथ्य किसी भी तरह सही नहीं हो सकते। प्रमुख अखबारों के दफ्तरों से एक किलोमीटर से भी कम फासले पर यह हत्या हुई है। पाठकों को किस अखबार ने सच परोसा है और किस अखबार ने झूठी और काल्पनिक बातों को सच के मुलम्मे में लपेट का खबर के रूप में परोस दिया ? यह एक ऐसा सवाल है जो दरअसल आज के अखबारों और उनके पत्रकारों की कार्य शैली और कार्य के प्रति ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

अखबारों के शब्द और शैलियां अलग-अगल हो सकती हैं। खबरों का प्रस्तुतिकरण भी अलग हो सकता है। हैडिंग, इंट्रो और न्यूज की बॉडी अलग हो सकती हैं। तथ्य कम या ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन तथ्य एक दूसरे के विपरीत नहीं हो सकते।

आजकल जिस तरह तथ्य एक दूसरे के उलट नजर आ रहे हैं, यह स्थिति अखबारों पर पाठकों के उस विश्वास के लिए खतरनाक हो सकती है, जिस पर अखबारों का अस्तित्व टिका हुआ है। लोग अखबारों पर भरोसा करना ही छोड़ देंगे, तो पोस्टरों और अखबारों में अन्तर ही कहां बचेगा?

लेखक डॉ. सुभाष गुप्ता 26 वर्ष तक प्रमुख अखबारों और न्यूज चैनलों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद अब एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर हैं.

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रवीश कुमार को क्यों कहना पड़ा- ‘हिन्दी अख़बार सरकारों का पांव पोछना बन चुके हैं, आप सतर्क रहें’

Ravish Kumar : क्या जीएसटी ने नए नए चोर पैदा किए हैं? फाइनेंशियल एक्सप्रेस के सुमित झा ने लिखा है कि जुलाई से सितंबर के बीच कंपोज़िशन स्कीम के तहत रजिस्टर्ड कंपनियों का टैक्स रिटर्न बताता है कि छोटी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर कर चोरी की है। कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। अखबार लिखता है कि छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है। आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है। जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है।

क्या आप जानते हैं कि 6 लाख छोटी कंपनियों से कितना टैक्स आया है? मात्र 250 करोड़। सुमित झा ने इन कंपनियों के चेन से जुड़े और कंपनियों के टर्नओवर से एक अनुमान निकाला है। इसका मतलब यह हुआ कि इन कंपनियों का औसत टर्नओवर 2 लाख है। अगर आप पूरे साल का इनका डेटा देखें तो मात्र 8 लाख है। समस्या यह है कि जिन कंपनियों का या फर्म का सालाना 20 लाख से कम का टर्नओवर हो उन्हें जीएसटी रिटर्न भरने की ज़रूरत भी नहीं है। इसका मतलब है कि छोटी कंपनियां अपना टर्नओवर कम बता रही हैं।
आप जानते ही हैं कि दस लाख कंपनियों का आडिट करने में ज़माना गुज़र जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने पर कर चोरी की छूट दी जा रही है। बस हो यह रहा है कि कोई आंख बंद कर ले रहा है क्योंकि उसका काम स्लोगन से तो चल ही जा रहा है। आखिर जीएसटी के आने से कर चोरी कहां बंद हुई है? क्या 20 लाख से कम के टर्नओवर पर रिटर्न नहीं भरने की छूट इसलिए दी गई ताकि कंपनियां इसका लाभ उठाकर चोरी कर सकें और उधर नेता जनता के बीच ढोल पीटते रहें कि हमने जीएसटी लाकर चोरी रोक दी है।

क्या आपने किसी हिन्दी अखबार में ऐसी ख़बर पढ़ी? नहीं क्योंकि आपका हिन्दी अख़बार आपको मूर्ख बना रहा है। वह सरकारों का पांव पोछना बन चुका है। आप सतर्क रहें। बहुत जोखिम उठाकर यह बात कह रहा हूं। सुमित झा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जीएसटी फाइल करने को आसान बनाने के नाम पर राजनेता से लेकर जानकार तक यह सुझाव दे रहे हैं कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत कंपोज़िशन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाए। यह ज़रूर कुछ ऐसा खेल है जिसे हम आम पाठक नहीं समझते हैं मगर ध्यान से देखेंगे तो इस खेल को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है।

सुमित के अनुसार डेटा के विश्लेषण से साफ होता है कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत 20 लाख टर्नओवर की सीमा को बढ़ा कर डेढ़ करोड़ करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि टैक्स चोरी रोकने के लिए ज़रूरी है कि 20 लाख से भी कम कर दिया जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड में श्रीमि चौधरी की रिपोर्ट पर ग़ौर कीजिए। CBDT ( central board of direct taxex) को दिसंबर की तिमाही का अग्रिम कर वसूली का के आंकड़ो को जुटाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। दिसंबर 15 तक करदाताओं को अग्रिम कर देना होता है। सूत्रों के हवाले से श्रीमि ने लिखा है कि चोटी की 100 कंपनियों ने जो अग्रिम कर जमा किया है और जो टैक्स विभाग ने अनुमान लगाया था, उसमें काफी अंतर है। मिलान करने में देरी के कारण अभी तक यह आंकड़ा सामने नहीं आया है।

राम जाने यह भी कोई बहाना न हो। इस वक्त नवंबर की जीएसटी वसूली काफी घटी है। वित्तीय घाटा बढ़ गया है। सरकार ने 50,000 करोड़ का कर्ज़ लिया है। ऐसे में अग्रिम कर वसूली का आंकड़ा भी कम आएगा तो विज्ञापनबाज़ी का मज़ा ख़राब हो जाएगा। बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुए कर अधिकारियों ने कहा है कि हर तिमाही में हमारे आंकलन और वास्तविक अग्रिम कर जमा में 5 से 7 फीसदी का अंतर आ ही जाता है मगर इस बार यह अंतर 15 और 20 फीसदी तक दिख रहा है। इसका कारण क्या है और इस ख़बर का मतलब क्या निकलता है, इसकी बात ख़बर में नहीं थी। कई बार ख़बरें इसी तरह हमें अधर में छोड़ देताी हैं।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत सरकार ने 60 शहरों के लिए 9,860 करोड़ रुपये जारी किए थे। इसका मात्र 7 प्रतिशत ख़र्च हुआ है। करीब 645 करोड़ ही। रांची ने तो मात्र 35 लाख ही ख़र्च किए हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री अखबारों में तो ऐसे विज्ञापन दे रहे हैं जैसे हकीकत किसी को मालूम ही न हो। स्मार्ट सिटी के तहत 90 शहरों का चयन किया गया है। हर शहर को स्मार्ट होने के लिए 500 करोड़ दिए गए हैं। आप थोड़ा सा दिमाग़ लगाएंगे तो समझ सकते हैं कि इस पैसे से क्या हो सकता है। फर्ज़ी दिखावे के लिए दो चार काम हो जाएंगे, कहीं दस पांच डस्टबिन और फ्री वाई फाई लगा दिया जाएगा बस हो गया स्मार्ट सिटी। इसके नाम पर शहरों में रैलियां निकलती हैं, लोग रोते हैं कि हमारे शहर का नाम स्मार्ट सिटी में नहीं आया, नाम आ जाता है, मिठाई बंट जाती है और काम उसी रफ्तार से जिस रफ्तार से होता रहा है।

स्मार्ट सिटी के एलान वाली ख़बर तो पहले पन्ने पर छपती है क्योंकि इससे आपको सपना दिखाया जाता है। सात प्रतिशत ख़र्च का मतलब है कि स्मार्ट सिटी फेल है। इसकी ख़बर पहले पन्ने पर क्यों नहीं छपती है, आखिरी पन्ने पर क्यों छपती है। आप अपने अपने अखबारों में चेक कीजिए कि स्मार्ट सिटी वाली ये ख़बर किस पन्ने पर छपी है। पीटीआई की है तो सबको मिली ही होगी। बाकी सारा काम नारों में हो रहा है। आई टी सेल की धमकियों से हो रहा है और झूठ तंत्र के सहारे हो रहा है। जय हिन्द। यही सबकी बात है। यही मन की बात है।

नोट: अख़बार ख़रीदना अख़बार पढ़ना नहीं होता है। पढ़ने के लिए अख़बार में ख़बर खोजनी पड़ती है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन सबसे पहले इस बात से कीजिए कि उसके राज में मीडिया कितना स्वतंत्र था। सूचना ही सही नहीं है तो आपकी समझ कैसे सही हो सकती है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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तीन बड़े अखबार लाखों-करोड़ों की स्कीम चलाकर पेपर बेचने की होड़ में जुटे

अखबारों से जनहित गायब, स्कीम से लुभा रहे पाठकों को… अखबारों की गिरती साख ने अखबारों तथा पत्रकारों को किस हद तक पहुंचा दिया है इसकी बानगी है अखबारों में पाठकों के लिए चलाई जा रही लाखों की स्कीम। खुद के नंबर वन होने का दावा करने वाले तीन प्रमुख अखबारों से जनहित के मुद्दे नदारद हैं। इससे प्रमुख बड़े अखबार लगातार जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए तीनों ही अखबारों में लाखों-करोड़ों की योजनाएं चलाकर अखबार बेचने की होड़ मची हुई है।

सबसे पहले दैनिक जागरण ने स्कीम लांच की तथा पाठकों को कूपन चिपकाकर लकी ड्रा में षामिल होने का निमंत्रण दिया। दैनिक जागरण ने अपनी स्कीम लांच करने में षहरों में ढोल नगाड़ों के साथ रैली तक निकाली। इस कार्य में जागरण के प्रसार सहित संपादकीय व विज्ञापन के प्रतिनिधियों को बाजार में झोंका गया। अमर उजाला तथा हिंदुस्तान अखबार ने भी पाठकों के लिए स्कीम चलाकर अखबार बेचने का नायाब तरीका खोजा है।

दरअसल यह मीडिया तथा अखबारों के गिरावट का दौर है। कारपोरेट का दबाव अखबारों तथा इलेंक्ट्रानिक मीडिया पर साफ दिख रहा है। जनहित के मुद्दे जब मीडिया से गायब होंगे तो लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए इसी तरह की योजनाओं को बाजार में झोंकना पड़ेगा। दरअसल अखबार एक प्रोडक्ट हो गया है तथा पाठक महज एक ग्राहक बनकर रह गया है। जिसे अखबार के मालिकान अपना प्रोडक्ट बेच रहे हैं। इस बेरहम बाजार में पाठक को कंटेंट से आकर्शित करने अथवा जोड़े रखने की बजाय लाखों करोड़ों की योजनाओं से लुभाया जा रहा है। इन आकर्षक योजनाओं के बीच पाठक की हालत यह है कि वह कंटेंट की तुलना करने की बजाय तीनों अखबारों की योजनाओं की आपस में तुलना करते हुए बड़े ईनाम का इंतजार कर रहा है।

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प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

जुलाई-दिसंबर, 2016 के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया की 31,84,727 कॉपियां बिकीं। एबीसी ने छोटे शहरों में होने वाली वृद्धि के चलते प्रिंट मीडिया का भविष्य सुरक्षित बताया लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाइश की संभावना से भी इनकार नहीं किया। 2006 से 2016 के बीच हिंदी मीडिया सबसे तेजी से बढ़ा। यह 8.76 प्रतिशत सीएजीआर (कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर) की दर से सबसे आगे रहा। तेलुगू मीडिया दूसरे नंबर पर रहा। अंग्रेजी मीडिया 2.87 सीएजीआर की दर से बढ़ा।

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री 2021 तक 7.3 प्रतिशत सीएजीआर की दर से वृद्धि के साथ 431 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। तब तक पूरी मीडिया इंडस्ट्री के 2,419 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। विज्ञापन रेवेन्यू भी 2021 तक बढ़कर 296 बिलियन का हो जाएगा, जो पूरे मीडिया के 1096 बिलियन के संभावित रेवेन्यू का 27 प्रतिशत हिस्सा होगा। प्रिंट मीडिया की पिछले कुछ साल में भारत में हुई वृद्धि विश्व के किसी भी अन्य मार्केट की तुलना में अधिक है। 2015 में भारतीय बाजार सर्कुलेशन के लिहाज से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वहीं यूके, यूएसए समेत अन्य विदेशी बाजारों में गिरावट देखने को मिली।

दैनिक भास्कर की प्रतियों में 150% का इजाफा

इन दस सालों में दैनिक भास्कर की प्रतियां 150 फीसदी बढ़ी हैं। 2006 में इसका आंकड़ा 15 लाख 27 हजार 551 था, जो 2016 में बढ़कर 38 लाख 13 हजार 271 हो गया। यह जानकारी ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन्स (एबीसी) की रिपोर्ट में सामने आई है। एबीसी एक स्वतंत्र संस्था है जो प्रकाशनों की प्रसार संख्या का हर छह महीने में ऑडिट कर उन्हें प्रमाणित करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेड न्यूजपेपर्स की प्रसार संख्या में 2 से 12 फीसदी तक गिरावट का रुख है। अकेले भारत में पेड न्यूजपेपर्स की संख्या 12% की रफ्तार से बढ़ रही है। जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में जहां पेड न्यूजपेपर्स की संख्या तीन साल से जस की तस बनी हुई है। वहीं भारत में यह लगातार दो अंक में बढ़ रही है। 2013 में यह 5,767 थी जो 2014 में 16.70% बढ़कर 6,730 हो गई। वहीं 2015 में इनकी संख्या में 16.95% का इजाफा हुआ और इनकी संख्या बढ़कर 7,871 हो गई।

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में दर्ज किया गया है। यह 7.83 फीसद है। जबकि सबसे कम 2.63 फीसद की बढ़त पूर्वी क्षेत्र में देखी गई है। पूरे देश में यह वृद्धि दर 4.87 प्रतिशत की रही। जाहिर है, उत्तर भारत में हिंदी समाचारपत्रों व पत्रिकाओं का ही बोल-बाला है। इसलिए 8.76 फीसद के साथ सर्वाधिक बढ़त भी हिंदी में ही दर्ज की गई है। इसमें भी प्रसार संख्या के अनुसार शीर्ष 10 समाचार पत्रों में चार हिंदी के ही हैं। लंबे समय से तीसरे स्थान पर चल रहे एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को हटा दिया जाए तो शीर्ष पांच में से चार समाचारपत्र हिंदी के हैं, जिनमें दैनिक जागरण शीर्ष पर है।

डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है

एबीसी मानती है कि डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है। समाचारपत्रों के इंटरनेट संस्करण भी लोकप्रिय हो रहे हैं। एबीसी के अनुसार, सुबह समाचारपत्रों के जरिये एक बार खबरें परोसने के बाद दिन में ताजी खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मीडिया एक अच्छा माध्यम बनकर उभरा है। लेकिन इससे प्रिंट मीडिया के लिए निकट भविष्य में कोई खतरा नजर नहीं आता। एबीसी का मानना है कि डिजिटल मीडिया के क्षेत्रों में काम कर रहे बड़े मीडिया घरानों के साथ-साथ अन्य माध्यमों को नियंत्रित करने के लिए एबीसी की तर्ज पर एक संस्था की जरूरत है। इस बारे में सरकार भी विचार कर रही है और एबीसी भी। दो-तीन माह में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं।

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अपने कसबे फलोदी पहुंचे ओम थानवी ने अखबारों की बदलती तासीर पर की यह टिप्पणी

अपने क़सबे फलोदी (राजस्थान) आया हुआ हूँ। 47 डिग्री की रेगिस्तान की गरमी मुझे यहाँ उतना नहीं झुलसाती जितना अख़बारों की बदलती तासीर। अजीबोग़रीब हिंदूकरण हो रहा है। जैसे देश में बाक़ी समाज हों ही नहीं। एक बड़े इलाक़े की ख़बरों के लिए तय पन्ने पर (आजकल पन्ने इसी तरह बँटे होते हैं) आज एक अख़बार में हर एक “ख़बर” किसी-न-किसी हिंदू मंदिर की गतिविधि – मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा, कलश की स्थापना, दान-पुण्य – या संतों के प्रवचनों से  लकदक है। वह पूरा का पूरा पन्ना (पृष्ठ नौ) एक ही धर्म की श्रद्धा में/से अँटा पड़ा है।

देश का ‘पाकिस्तानीकरण’ (अख़बार के आज के ही अंक में मित्रवर जयप्रकाश चौकसे की टिप्पणी में प्रयुक्त आशंका) किए जाने में मीडिया की यह नई ‘ग्रासरूट’ सक्रियता भी क्या कम भूमिका निभा रही है? धर्म (और उनके लिए धर्म का मतलब हिंदू धर्म है या कथित ‘राष्ट्रधर्म’) को जगह देना हिंदी अख़बारों जाने कैसी मजबूरी बन गया है। पहले भी देते थे। अब तो बाढ़ आ जाती है। अठारह साल पहले जब दिल्ली में जनसत्ता का काम सम्भाला, सबसे पहले “धर्म-संस्कृति” पन्ना बंद किया था। मुट्ठीभर पन्नों में संस्कृति के नाम पर सिर्फ़ हिंदू धर्म का पन्ना किस काम का। पर आज दुनिया के इतना आगे निकल आने पर भी हमारे यहाँ, जहाँ/तहाँ, अख़बारों में अलग-अलग पन्नों पर संस्कृति की कुछ वैसी ही संकीर्ण समझ फैली है – फैलाई जा रही है।

लेखक ओम थानवी देश के जाने माने पत्रकार हैं और जनसत्ता अखबार के संपादक रहे हैं.

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…जब हॉकर के हाथों नहीं, ई-मेल के जरिए आएगा अखबार…!

किशोर कुमार

संचार क्रांति के इस दौर में समाचार माध्यम भी तेजी से बदल रहे हैं। अभी तक घर पर छपा हुआ अखबार आता रहा है। जहां इंटरनेट की बेहतर सुविधा है, वहां ई-पेपर या न्यूज पोर्टल का जमाना आ गया है। युवा तो और भी एक कदम आगे हैं। वे सोशल मीडिया के इस दौर में न्यूज पोर्टलों पर भी जाना पसंद नहीं करतें, बल्कि ट्वीटर या फेसबुक पर लिंक के जरिए अनेक पोर्टलों या ई-पेपरों की पसंदीदा सामग्रियां पढ़ लेते हैं।

इस स्थिति को देखते हुए अब न्यूज पोर्टल वाले अपने को सीधे-सीधे पाठकों से जोड़ने की नई रणनीति को कार्यान्वित करने में जुटे हुए हैं। इसके तहत ई-मेल के जरिए न्यूजलेटर भेजा जाएगा। तकनीकी तौर पर वह ई-पेपर जैसा ही होगा। उसके जरिए सोशल मीडिया पर भी संबंधित आर्टिकल को शेयर किया जा सकेगा। अमेरिका और कुछ विकसित देशों में यह प्रयोग बेहद सफल है। वाशिंगटन पोस्ट ने “द डेली 202” नाम से ई-न्यूजलेटर निकालना शुरू किया है। ई-न्यूजलेटर का प्रचलन भारत में भी हैँ। पर उनका “द डेली 202” जैसा यूजर फ्रेंडली और विस्तृत स्वरूप नहीं होता।

देखिए, समय कैस बदलता है। पहले डाकिया चिट्ठियां पहुंचाते थे। अब बहुत हद तक उनकी जगह ई-मेल ने ले ली है। उसी तरह अभी हॉकर न्यूजपेपर लाते हैं। आने वाला समय न्यूज पोर्टल या ई-पेपर से इतर ई-न्यूजलेटर का भी होगा, जो हमें ई-मेल के जरिए मिला करेगा। मेल खोलिए और अखबार हाजिर है। सुबह, दोपह, शाम, रात हर समय का ई-न्यूजलेटर।

Kishore Kumar
ekknet@yahoo.com

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आज छपी इन तीन खबरों के जरिए जानिए भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा

Anil Singh : तीन खबरों में चाल-चरित्र और चेहरा! आज छपी तीन खबरें जो सरकार के चाल-चरित्र व चेहरे को समझने के लिए काफी हैं। एक, उत्तर प्रदेश के शामली कस्बे में एक मुस्लिम युवक का चेहरा कालिख से पोतकर सड़क पर जमकर पीटनेवाले बजरंग दल के जेल में बंद नेता विवेक प्रेमी पर लगा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश पर हटा लिया गया।

दो, महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में प्रशिक्षण के लिए किसानों से स्वैच्छिक अनुदान में मिले धन को राज्य की भाजपा सरकार ने किसानों पर न खर्च करके अपने कर्मचारियों के वेतन में लगा डाला।

तीन, प्रवर्तन निदेशालय ने सुषमा स्वराज के पारिवारिक मित्र और अरुण जेटली के सह-क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी की जांच के लिए सिंगापुर की सरकार को कानूनी रूप से इतना अस्पष्ट और लचर पत्र लिखा था कि सिंगापुर सरकार को कहना पड़ा कि आप नियम तोड़ने के मामले साफ-साफ बताएं, तभी तो हम कुछ मदद कर सकते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस के 7 जनवरी के मुंबई संस्करण में ये खबरें प्रमुखता से छपी हैं.

मुंबई में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डॉट कॉम पोर्टल के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार… पढ़िए एक युवा ने क्यों कर लिया सुसाइड

Vinod Sirohi : जरूर शेयर करें —मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार — आप पर कोई बंदिश नहीं है आप इस मैसेज को बिना पढ़े डिलीट कर सकते हैं। अगर आप पढ़ना चाहें तो पूरा पढ़ें और पढ़ने के बाद 5 लोगों को जरूर भेजें।

मेरा नाम राहुल है। मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के गोहाना का रहने वाला हूँ। आप भी मेरी तरह इंसान हैं लेकिन आप में और मुझमें फर्क ये है कि आप जिन्दा हैं और मैंने 19 अगस्त, 2015 को रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

चौकिये मत, नीचे पढ़िये।

मेरा परिवार गरीबी से जूझ रहा था। एक दिन मैंने एक हिन्दी के अख़बार में (अपने आप को हिन्दी जगत का प्रमुख अखबार बताने वाला ) मोबाईल टावर लगाने सम्बन्धी विज्ञापन पढ़ा। इसमें 45 लाख एडवांस, 50 हजार रूपये महीना किराया तथा 20 हजार रूपये प्रतिमाह की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी देने की बात कही थी। मैनें दिये गये नम्बर पर फोन किया तो उन्होंने हमारे प्लाट का पता ले लिया जहाँ मैं टावर लगवाना चाहता था। अगले दिन उन्होंने मुझे फोन करके मुबारकबाद दी और कहा कि मेरा प्लाट टावर लगने के लिए पास हो गया है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्रेशन फ़ीस के तौर पर 1550 रूपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाता 20266209852 ब्रांच लाजपत नगर नई दिल्ली में डालने के लिए कहा। मैंने 1550 रूपये डाल दिये तो उन्होंने मुझे रिलायंस कम्पनी का ऑफर लेटर तथा एक लेटर सूचना और प्रोद्द्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार का मेरी ईमेल पर भेजा जिसमें 27510 रूपये सरकारी टैक्स जमा करवाने की बात कही गई थी।

मैंने 27510 रूपये भी जमा करवा दिये तो उन्होंने मुझसे 13500 रूपये डिमांड ड्राफ्ट चार्जेज के तौर पर जमा करवाने के लिए कहा। मैंने ये रूपये भी जमा करवा दिए तो उन्होंने मेरे फोन उठाने बंद कर दिये। जो पैसे मैंने इस खाते में जमा करवाये वह पैसे मेरी बहन की शादी के लिए रखे थे। मैं अपने परिवार को 45 लाख रूपये का सरप्राइज देना चाहता था, लेकिन जब मुझे ठगी का एहसास हुआ तो मैं अपने परिवार को मुहँ दिखाने के लायक नहीं बचा और मैंने रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

मेरी असमय मौत के बाद मेरी रूह धरती पर ही भटक रही है और लोगों को ठगी के इस जंजाल के प्रति जागरूक कर रही है। मेरे दावे की सत्यता के लिये आप ऊपर दिये गये बैंक खाते की 11 अगस्त से 18 अगस्त की स्टेटमेंट देख सकते हैं। ऐसे लगभग 300 फ्रॉड ग्रुप अख़बारों में फर्जी विज्ञापन देकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनके झांसे में ना आयें। आप 5 लोगों को 2 मिनट में ये सन्देश जरूर भेजें और पार्क, बैठक, घर और दफ्तर के लोगों को मौखिक तौर पर इस ठगी के खेल के बारे में जरूर बतायें। मेरी रूह को शान्ति मिलेगी और आपको आत्मसंतुष्टि।

यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर विनोद सिरोही के फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया : छोटे अखबारों के कर्मी आरटीआई के माध्यम से ब्योरा जुटाएं और केस करें

मजीठिया वेतनमान के लिए भले ही 20 हजार पत्रकार संघर्षरत हों लेकिन एक बड़ा वर्ग इस लड़ाई से दूरी बनाए हुए है. कारण उनके पास कोई सबूत नहीं कि वे अमुक प्रेस में कार्यरत हैं. जब कर्मचारी ही नहीं तो किस मुंह से हक की बात करें. ये वर्ग ऐसा है, जो भविष्य में बड़े प्रेस में बड़ी जिम्मेदारी निभाता है और शोषण की नीतियां बनाता है, इस चलन का खात्मा जरूरी है.

छोटे व मझोले प्रेस के कर्मचारियों को श्रम विभाग के माध्यम से कार्यरत कर्मचारी की सूची मांगनी चाहिए. ध्यान रहे, आरटीआई के माध्यम से यह जानकारी मांगें और कार्यरत कर्मचारी के नाम से आरटीआई न लगाए. यह जानकारी मिलने के बाद गुमनाम पते से शिकायत कर उक्त कर्मचारियों के लिए पीएफ व ईएसआई की मांग करें. 

अब आप नियमित कर्मचारियों की सूची आरटीआई के माध्यम से मांगें. फिर कंपनी के आय-व्यय की जानकारी मांगें. आरटीआई के माध्यम से ही कर्मचारियों का पदनाम और वेतन पूछे. अब आपके पास सारी जानकारी उपलब्ध है जिससे कंपनी मुकर नहीं सकती. इसके बाद दो रास्ते हैं। लेबर कोर्ट में किसी के माध्यम से जनहित याचिका लगवा दें या गुमनाम रहकर श्रम विभाग में उक्त दस्तावेजों को लगाकर मजीठिया वेतनमान न देने की शिकायत करें तो नौकरी भी सुरक्षित काम भी हो गया.

कुछ समाचार पत्रों के मालिक चालाक होते हैं और अपने कर्मचारी को ठेका कर्मी बता देते हैं. ऐसे में ठेकेदार का नाम; ठेका अवधि; ठेका देने की प्रक्रिया आदि की जानकारी मांगनी चाहिए और मजीठिया वेतनमान ठेकेदार द्वारा न देने की शिकायत श्रम विभाग को करनी चाहिए, वो भी गुमनाम. दरअसल ऐसी प्रक्रिया हर ऐसे संस्थान के लिए अपनानी चाहिए, जो श्रम कानूनों का पालन न करें.

कुछ मालिक जानकारी मांगने पर कहते हैं, हमारे यहां कोई कर्मचारी नहीं. इसलिए रह-रह कर आरटीआई लगाएं, जिससे संस्थान को शक न हो. एक साथ जानकारी मांगने से बचें. एक जानकारी आने के बाद दूसरी आरटीआई लगाएं. संस्थान में जरूरी कर्मचारियों की क्षमता और मौजूदा कर्मचारियों की संख्या पूछनी चाहिए. 

लेखक एवं पत्रकार माहेश्वरी मिश्रा से संपर्क : maheshwari_mishra@yahoo.com

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‘नेशनल दुनिया’ के कर्मचारियों का पैसा खा गए शैलेंद्र भदौरिया

दोस्तों, इस सूचना के माध्यम से हम आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहते हैं कि अगर आप या आपका कोई मित्र, रिश्तेदार, जानकार ‘महाराणा प्रताप ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स यानी ‘एमपीजीआई’ के किसी संस्थाीन में प्रवेश लेना चाहता है, नौकरी करने वाला है या किसी अन्य तरह से जुड़ने जा रहा है तो इस बात से सचेत रहे कि यह ग्रुप अपने यहां काम करने वालों के पैसे नहीं देता। 

इस संस्थान का ‘नेशनल दुनिया’ के नाम से अखबार भी निकलता है। उसमें काम करने वालों को कई-कई महीने से पैसा नहीं दिया जा रहा है। अब चूंकि महीनों की मेहनत की कमाई फंसी हुई होती है, इसलिए बेचारे कर्मचारी नौकरी छोड़कर भी नहीं जा पाते हैं। यानी एक तरह से वे बंधुआ मजदूरी कर रहे हैं। इसके अलावा जिन लोगों ने नौकरी छोड़ने का साहस जुटा भी लिया, उनके बकाया पैसे भी कई सालों से नहीं दिए गए हैं। 

यहां तक कि ‘पीएफ’ के नाम पर काटे गए पैसे भी हड़प कर लिए गए हैं। इसलिए इस ग्रुप से जुड़ने से पहले अच्छी तरह से सोच-विचार कर लें और पुरानी लोगों से भी बात करके सचाई जान लें। यह ग्रुप बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए बच्चों को आकर्षित करता है, सब्जबाग दिखाता है, मोटा पैसा खर्च करके विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करता है और उनमें देश के नामी-गिरामी लोगों को बुलाकर अपनी अच्छी छवि दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन आपको सावधान किया जाता है कि इस छवि के पीछे की सचाई भी जान लें।

(जनहित में जारी – कृपया फेसबुक, ट्वीटर, ईमेल आदि के जरिए इस सूचना को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा दें। इसे टैग करें, लाइक करें और शेयर करें।)

पत्रकार सुमन गौतम से संपर्क : suman.gautam462@gmail.com

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मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भ्रम फैला रहा मीडिया

नई दिल्ली : भारत के स्वतंत्र मीडिया की बेईमानी की हद हो गई है। खबरों को तोड़ना मरोड़ना तो इनका आए दिन का काम है। अब हालात ये है कि ये सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी भ्रम फैलने से बाज नहीं आ रहे हैं। पिछले साल भर से सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को न लागू करने के लिए लगभग सभी बड़े अखबारों के मालिकों के खिलाफ अवमानना का मामला चल रहा है लेकिन आज तक इस सुनवई की किसी मीडिया ने सुध लेने की जरूरत नहीं महसूस की क्योंकि माननीय सुप्रीम कोर्ट इनके दिग्गज वकीलों के तर्क नकारता रहा। 

अब जब कोर्ट की एक बेंच ने 06 जुलाई को 14 मामलों की नए सिरे से सुनवाई करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि इस मामले पर पहले ही कोर्ट ने याचिका संख्या 411/2014 और 50 मामलों की सुनवाई के दौरान सभी राज्य सरकारों को जांच कर रिपोर्ट देने को कहा है। साथ ही माननीय कोर्ट ने यह भी कहा इन नए मामलों की सुनवाई से मामले में विलंब होगा। माननीय अदालत ने अपने आदेश में इस कारण से इन याचिकाओं को खरिज कर दिया।

लेकिन देखिए मीडिया ने कैसे बिना इस खबर का बैकग्राउंड दिए कितनी भ्रामक खबरें प्रसारित की। इन खबरों से लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया से संबंधित सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जबकि हकीकत यह है कि कोर्ट ने सिर्फ इन 14 याचिकाओं को इसलिए खारिज कर दिया कि इस तरह के मामले पर पहले ही आदेश दिया जा चुका है और कोर्ट इस जरूरी मामले में और विलंब नहीं करना चाहता। 

गौरतलब है कि इन 14 याचिकाओं में 12 याचिकाएं टाइम्स ऑफ इंडिया की मालकिन इंदु जैन और दो याचिकाएं हिन्दुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतिया के खिलाफ दायर की गईं थीं। 

फैसले की कॉपी – 

Date : 06/07/2015 These petitions were called on for hearing today.

CORAM : 

HON’BLE MR. JUSTICE RANJAN GOGOI

HON’BLE MR. JUSTICE M.Y. EQBAL

For Parties Mr. K.V. Vishwanathan,Sr.Adv.

Mr. K. Datta,Adv.

Mr. Rahul Mahlotra,adv.

Mr. Ashish Verma,Adv.

Ms. Tatini Basu,Adv.

Ms. Niti Arora,Adv.

Mr. P. George Giri,Adv.

Mr. Shekhar Kumar,Adv.

Mr. Upma Shrivastava,Adv.

Mr. Surya Kant,Adv.

UPON hearing the counsel the Court made the following

O R D E R

Disobedience of Court’s order as alleged in these

contempt petitions is being looked into in connected

matters and an order has been passed by this Court dated

28.04.2015 appointing inspectors under Section 17(b) of

the Working Journalists and Other Newspaper Employees

(Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Act,

1955 to make enquiry and submit reports to this Court. In

the above circumstances and also having regard to the

delay that has occurred, we are not inclined to entertain

these contempt petitions as we consider the same be

redundant.

(MADHU BALA) (ASHA SONI)

COURT MASTER COURT MASTER

मजीठिया मंच एफबी वाल से साभार

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Majithia : We want to assure the court order of july 6 thus clearly enquiry on the alleged non-implementation & the report from inspectors is awaited for action : NUJ

New Delhi : National union of Journalists (NUJ) said ; members are assured by the Hon’ble Supreme Court order of July 6, that the contempt proceedings in the court against newspaper managements are on and would be heard in due course and that the court’s order of July 6  rejects only the second batch of contempt petitions recd after due date.  

 

General Secretary of the Confederation MS Yadav has issued the following statement. Understand that the INS has pressurized all its members to publish a truncated version of the court order to mislead public that the contempt issue has been dismissed.  Beware against this conspiracy and insist that your newspaper publishes the correct version and not the INS? HT inspired tainted version.  Also tell all members the fact. Please take urgent action and inform us about it.

Confederation of Newspaper and News Agency Employees’ Organisations in our press release said; SC order of July 6 on contempt petitions regarding Majithia wage board recommendation implementation: ” It is regrettable that some newspaper reports on the order of the Hon’ble Supreme Court on the batch of contempt of court petitions submitted after the due date, have sought to carry the impression that the court has rejected the entire issue of contempt of court against newspaper/agency managements. 

The Confederation assures our members and all unions in the newspaper industry that the set of petitions numbering 51 alleging contempt of court for not implementing the court’s order of 7 Feb 2014 validating the Central Govt notification on the Majithia wage board recommendation and asking the managements to implement the provisions of the notification from April 1, 2014, STLL STAND and will be considered by the court in due course. 

The SC bench of Justice Ranjan Gogoi and Justice M.Y. Eqbal on July 6, 2015 that the issue raised that is “disobedience of court’s order as alleged in these petitions” (that is the more recent petitions) “IS BEING LOOKED INTO in connected matters” ( court order dated 28-4-2015) “appointing inspectors to make enquiry and submit reports to this court”. in view of this earlier order and ongoing enquiry into implementation as per the earlier order the court said ” we consider the same’ ( that is the fresh set of petitions) “to be redundant”.

The legislation governing the contempt action in section 20 lays down the time limit for raising the contempt issue on a court order as one year. The second batch of petitions by various workers and unions were received after the time limit was over. Hence they were time barred. The apex court order specifically points out that the core issue of alleged contempt is under investigation and therefore is alive. In some reports an attempt has been made to obfuscate this distinction and mislead the public in our view. A copy of the court’s order is attached for your perusal.

WE WANT TO ASSURE ALL OUR MEMBERS THAT THE COURT ORDER OF JULY 6 THUS CLEARLY CONTINUES THE ENQUIRY ON THE ALLEGED NON-IMPLEMENTATION AND THE REPORT FROM INSPECTORS IS AWAITED FOR FURTHER ACTION. 

ALL MEMBERS MUST BE AWARE THAT AT THE CENTRAL GOVERNMENT’S INSTRUCTIONS FOLLOWING THE COURT ORDER OF 28-4-15, ALL STATE GOVERNMENTS ARE CONDUCTING ENQUIRIES INTO THE STATUS OF IMPLEMENTATION OF MAJITHIA WAGE BOARD RECOMMENDATIONS THROUGH INSPECTORS AND HIGHEST OFFICIALS OF THEIR RESPECTIVE DEPARTMENTS OF LABOUR. THEREFORE THE EARLIER SET OF PETITONS ALLEGING CONTEMPT OF COURT AGAINST SPECIFIC MANAGEMENTS ARE HANGING OVER THE HEAD OF THESE MANAGEMENTS LIKE A DEMOCLES’ SWORD. THOSE WHO HAVE NOT IMPLEMENTED OR CONTINUE TO DEFY THE COURT’S ORDER OF 7 FEBRUARY 2015 WILL THEREFORE FACE THE COURT’S VERDICT.

The Confederation will consider whether we should notify appropriate forum for action regarding the tendentious reports as appeared in some newspapers to cleverly give the impression that the contempt issue has been rejected by the court even though the central issue still is before the apex court.

Let us first take the major claim that the mass of labour laws and rigidity they impose of the flexibility of using labour in tandem with the volatility in demand in the economy is the major reason why new investments are not taking place, thus restricting job growth in the country.  Nowadays to give this a new edge, the claim is that the country has a narrow demographic window and if millions who need jobs are denied the opportunity, the window will soon vanish and widespread distress will be the result.  It is some economists who stress this argument.

 The labour laws have been in existence in the country ever since independence and many of these even before. To those who hold up Inspector Raj as the deterrent to new investments, we would advise them to live in Singapore or US and watch what happens if they fail to pay their maid the minimum prescribed wage.  In the last 60 years and more the country has moved forward investing in a whole range of enterprises from steel to ships, from salt to software.  The public sector alone has expanded from machine tools to tourism.  In the private sector,  a large number of business families apart from the old ones like the Tatas,  Birlas, Bajajs and Bajorias to Ambanis, Essars, Mittals, etc. have emerged and they are in new areas like oil to pharmaceuticals.  Almost every second week the pink papers are telling us that the race for the richest Indian is between Reliance’s Ambanis and Sun Pharma’s Shanghis.  The Indian pharma industry has entered the American market.

None of these developments has been constrained by the labour laws of the country. Their growth is a tribute to the spirit of enterprise of the promoters and to organized labour that has partnered them. There are 97billionaires in India, the rise mainly between 1991 and 2013 all set to grow to 119 by 2023, an increase of 98 per cent. Foreign based Indian billionaires like Laxmi Mittal and Anil Agarwal have invested in India and are looking for even more investments.  If there have been setbacks in these laudable enterprises labour is the least roadblock.  This applies to foreign investments in India also.  Government policies, environment 

problems etc are the main hurdles for new investments.  A single “clarification” on Minimum Alternate Tax the other day from the Finance Ministry made the FIIs take the first plane back from India leading to a stock market crisis.

Take for instance NRI owned Vedanta group’s proposal for a huge bauxite mining and processing enterprise in poorest district of Odessa or South Korean giant Pasco’s 12 million ton steel plant in that state.  The bauxite project was driven out by local tribal opposition and the Pasco project is limping because local farmers don’t want to lose their land.  When Tata’s were forced to scrap their car factory at a new site in West Bengal and looked for a secure place elsewhere it was not labour trouble but the dispute with local farmers.  West Bengal is often cited as the worst example of labour trouble but surprisingly, tobacco to hospitality giant ITC operates in headquarters from Kolkata even though it has establishments across the country.  Out of the over 363 stalled projects in the country as per Economic Times dated 4June 2015, almost every one is having problems with government policies on exit, on investment norms, on environmental and other clearances. None has been stalled because some trade union hotheads have put their foot down on the machines.

What has happened to the automobile industry is a very good illustration that  the contention that labour laws are the constraint on new investments, local or foreign,  is a big myth propagated by the lobby that has resources to hire economists and others to perpetuate this myth much against facts.  Trade unions find it often difficult to get their views across in some detail and have to be content with a para or two in newspapers.  Till about middle of the 80s, it was government policy that restricted investment in passenger cars to only two private companies and that too to a limited production number of a few thousand pieces.  The moment this policy changed, investments began to flow in from all sides, more particularly from foreign MNCs.  Now there are passenger car makers from Japan, South Korea, US, Germany, France and others.  These new investors must have studied Indian labour laws (all 44 of those devilish laws according to the 

reforms lobby) and yet decided to set up their factories here in so many states, Haryana, Tamil Nadu, Maharashtra, Gujarat, for instance.  

The violent experience of the Japanese company Suzuki in the investment in Maruti car manufacture is cited as a telling instance of how the 44 devils of labour laws are killing investments in India.  Interestingly, the full story of the transformation in Maruti after it was fully taken over by the Japanese management has been told by some analysts.  For almost a decade from its start Maruti was held up as an example of good labour relations.  The rot started when the Japanese management took the short cut of getting contract workers to beat the demand of labour for better wages.  After the same management realized the danger of having two differently paid worker groups in the same factory, Maruti has now decided to end the practice of hiring contract labour. Yet another auto factory, Honda, again in Haryana tried similar tactics to get labour at cheaper rates than prevailing in other two wheeler makers.  Disaster struck it in the face.  It was thus a management mistake, rather than trade union militancy. 

Interestingly also all these 44 devils of labour laws have not prevented the Tata Steel in Jamshedpur from functioning all these  100 or so years without a single strike in their factory even as they complied with all the so called “complicated”, “confusing”, laws and the so called inspector raj.  If Tatas can do that with a full scale trade union functioning within the organization, why not others, is a question the labour law reforms lobby has to answer.

There are no set rules for division of proceeds from an enterprise between capital and labour.  There is also substitution of capital with labour and vice versa.  All these depend upon several circumstances, economic, political, global, and financial. Leading economists of the world like Nobel Laureate Joseph Stiglitz now speak of inequality more than return on capital as an important consideration in stabilizing political economy. The argument that it is labour that is preventing new 

investments from coming, and that free market economy will do labour good and therefore it must accept a set of reforms that gives all freedoms to the investor in dealing with labour including hire and fire freedom has been blown sky high by the works of Stiglitz and others.  

Lately a French economist Thomas Piketty has joined this group.  His most recent book “Capital in the 21st Century” has set the sharp eyed cat among the free market pigeons. Stiglitz in his April 2015 book “The Great Divide: Unequal societies and what we can do about them” also has come out with yet another analysis of inequality and how it could really be slowing the American recovery from the recent Great Depression. But it is not merely a question of labour getting a better deal.

Thomas Piketty has virtually demolished the claims of several other economists that free market economy has done wonders for the world around. With data analysis of three centuries in several advanced countries, he has shown that it is knowledge and skills and investment in education, health and housing that have made all the difference.  He has questioned the claims of meritocracy for returns that touch the sky and widen inequalities. The fundamental finding that in the 21st century there is the danger of the rate of return on the capital exceeding the growth of national income and thus increasing the accumulation of capital in fewer hands to the detriment of the democratic process is this economist’s great and shattering contribution against the free marketers.   With the distressing widening of the gap between rate of return on capital and growth of the national economies in most countries returning in the 21st century, Piketty writes:” capitalism automatically generates arbitrary unsustainable inequalities that radically undermine the meritorious values on which democratic societies are based.”  With this question mark hanging over rich economies Piketty says the experience in emerging economies may not be different.  

Two great economists have given Governments that get carried away by free market rhetoric something to chew about before they take the labour law reform plunge.  “The wealth is so concentrated that a large segment of society is virtually unaware of is existence so that some people imagine that it belongs to surreal, mysterious entities.  That is why it is so essential to study capital and its distribution in a methodical, systematic way.”, warns Piketty.

This is not a virus that affects the rich societies alone. In this country it is fashionable to decry trade union excesses—something that we must admit is self-defeating for worker interests.  But were not our great analysts taken for a ride when the market leaders feted and crowned an information technology company promoter for his great entrepreneurial skills?  Just about two years back he was exposed for fudging the corporate books, fooling thousands of Indian and American investors into believing his growth story?  He has now been jailed for massive fraud.  Then there is another entrepreneur who was only a few weeks back exposed for his forward market operations with stocks that were nothing more than figures in his imagination. Piketty is right when he says that “a large segment of society is virtually unaware” of the existence of concentration of wealth in all its ramifications. 

In Ramalinga Raju’s multiple award winning corporation as in many IT companies, as also in Jignesh Shah’s operations there were no trade unions.   Strong trade unions help proper distribution of wealth created by business and industry by forcing even much stronger employers to come to terms on its distribution between labour and capital and by implication between capital and society, including governments. The reforms we need are the ones that make them stronger and the workers more drawn into a triangular partnership between capital, society and labour in creating and distributing wealth. 

मीडिया मालिकों के संगठन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को दुष्प्रचारित कर रहे –

The Supreme Court has dismissed as “redundant” a clutch of contempt petitions filed by some individuals alleging non-implementation of the recommendations of the Wage Boards for journalists and non-journalists by certain media organisations. 

A bench of Justice Ranjan Gogoi and Justice M Y Eqbalpronounced the order last week on 14 contempt petitions filed by various people against the alleged non-implementation of the Majithia Wage Boards, whose recommendations were upheld by the apex court in February last year. 

“Disobedience of court’s order as alleged in these contempt petitions is being looked into in connected matters and an order has been passed by this court dated April 28, 2015 appointing inspectors under section 17 (b) of the Working Journalists and Other Newspaper Employees (Condition of Services) and Miscellaneous Provisions Act, to make enquiry and submit reports to this court. 

“In the above circumstances and also having regard to the delay that has occurred, we are not inclined to entertain these contempt petitions as we consider the same (to) be redundant,” the court said.

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रणवीर सेना और बिहार के अखबार

रणवीर सेना के संस्थापक बरमेश्वर नाथ सिंह (ब्रह्मेश्वर सिंह) ऊर्फ मुखिया की तीसरी बरसी पर पटना में 1 जून, 2015 को आयोजित कार्यक्रम के संबंध में बिहार के मीडिया में प्रसारित समाचारों का विश्लेषण करने से पूर्व समाचार की रचना प्रक्रिया और समाचार बनाने वालों की सामाजिक पृष्ठभूमि से उसके अंतर्संबंध से संबंधित कुछ मूलभूत बातों को ध्यान में रख लेना चाहिए।

 

कोई भी समाचार न तो तटस्थ होता है और न ही महज किसी घटनाक्रम का आंखों देखा हाल। किसी भी समाचार के कथ्य और रूप का निर्माण इस पर निर्भर करता है कि समाचार बनाने की प्रक्रिया से जुड़े लोगों ने वास्तविक घटना में से किन तथ्यों का चयन किया तथा उन्हें किस प्रकार की भाषा और रूप में प्रसारित करने का फैसला किया। किसी समाचार के निर्माण में जितनी भूमिका तथ्य की होती है, उससे कहीं अधिक भूमिका तत्कालीन समाज पर प्रभावी वैचारिक शक्तियों की होती है। यही वैचारिक शक्तियां परोक्ष रूप से तय करती हैं कि क्या समाचार है और क्या नहीं। इस निर्धारण के बाद समाचार बनाने वाले लोगों का दृष्टिकोण यह तय करता है कि वास्तविकता का कौन सा हिस्सा समाचार है और कौन सा नहीं। समाचार की भाषा, उसका रूप आदि इन्हीं लोगों की पक्षधरता पर निर्भर करता है। हालांकि आदर्श स्थिति तो यह है कि एक पेशेवर पत्रकार को अधिकतम तटस्थता प्रदर्शित करनी चाहिए लेकिन वास्तव में किसी भी समाचार से पूर्ण तटस्थता की उम्मीद करना एक काल्पनिक स्थिति ही है। असली चीज है पक्षधरता। किसी समाचार का विश्लेाषण कर हम यह जान सकते हैं कि समाचार तैयार करने वाले की पक्षधरता क्या है। वह कमजोरों के पक्ष में है या शक्तिशालियों के। वह नैतिकता और न्याय के पक्ष में है या अपने क्षुद्र व्यक्तिगत अथवा सामाजिक हितों के पक्ष में।

‘फैसला लेने वाले’ 100 फीसदी पदों पर द्विज 

हिंदी क्षेत्र के मीडिया पर उच्चवर्ण के लोग काबिज हैं। दुर्भाग्यवश इनमें से अधिकांश की पक्षधरता प्राय: जाति के आधार पर तय होती रही है। यद्यपि बिहार निचले तबकों के सामाजिक आंदोलनों की भूमि रहा है लेकिन यहाँ के मीडिया संस्थानों की सामाजिक पृष्ठभूमि उच्चवर्णीय ही बनी हुई है। वर्ष 2009 में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के मीडिया संस्थानों में ‘फैसला लेने वाले’ 100 फीसदी पदों पर द्विज समुदाय का कब्जा था। यानी सभी बड़े पद इन्हीं के कब्जे में थे। संवाददाता, उप संपादक आदि कनिष्‍ठ पदों पर भी वंचित तबकों के लोग बहुत कम थे। इन कनिष्ठ पदों पर पिछड़ी (अति पिछडी जाति को मिलाकर) के पत्रकार 10 फीसदी थे। पसमांदा मुसलमान (उर्दू अखबारों समेत) 4 फीसदी और दलित महज 1 फीसदी।

बिहार के मीडिया में कनिष्‍ठ पदों पर सामाजिक प्रतिनिधित्‍व : उच्‍च जाति हिंदू 73 प्रतिशत, पिछडी व अति पिछडी जाति 10 प्रतिशत, दलित 1 प्रतिशत, अशराफ मुसलमान 12 प्रतिशत, पसमांदा मुसलमान 4 प्रतिशत। (स्रोत : प्रमोद रंजन, ‘मीडिया में हिस्‍सेदारी’, प्रज्ञा सामाजिक शोध संस्‍थान, पटना, 2009)

बिहार के पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि का असर ‘समाचारों’ की पक्षधरता पर स्पष्ट रूप से दिखलाई देता है। बिहार के अखाबार और समाचार चैनल प्राय: हर उस शक्ति के विरुद्ध खड़े होते हैं, जो इन तबकों की आवाज को कमजोर करने में भूमिका निभाती हैं। उनकी पक्षधरता हर उस विचार, सामाजिक-राजनैतिक शक्ति के साथ रहती है, जो उच्चावर्णीय वर्चस्व को बनाये रखने में मददगार हो सकती है।

1990 के दशक में बिहार की कुख्यात रणवीर सेना का जन्म भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) द्वारा वंचितों के पक्ष में चलाए गए आर्थिक न्याय और सामाजिक सम्मान के आंदोलन को कुचलने के लिए हुआ था। इसका सरगना था आरा जिला के खोपिरा गांव का मुखिया रह चुका भूमिहार जाति का बरमेश्वर नाथ सिंह। अलग-अलग गांवों में किए गए नरसंहारों व हत्याकांडों में करीब 300 से अधिक दलितों-पिछड़ों की हत्या का आरोप इस सेना पर है। (देखें तालिका -2) इन नरसंहारों की नृशंसता का वर्णन कठिन है। इन लोगों ने बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों की हत्या की क्योंकि इनका मानना था कि दलितों-पिछड़ों की महिलाएं नक्सलवादियों को जन्म देती हैं तथा बच्चे बड़े होकर नक्सलवादी बन सकते हैं। 

1 जून, 2012 को इसी बरमेश्वर नाथ सिंह ऊर्फ मुखिया, जिसे प्राय: ‘ब्रह्मेश्वर सिंह’ ऊर्फ मुखिया कहा जाता रहा है, की रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गयी (देखें, फारवर्ड प्रेस की कवर स्टोरी, ‘किसकी जादुई गोलियों ने ली बिहार के कसाई की जान’, जुलाई 2012)। हत्या के बाद मुखिया के समर्थकों ने तो बिहार की सडकों पर उत्पात मचाया ही, उसके बाद कई दिनों तक बिहार के अखबारों और न्यूज चैनलों ने मुखिया के महिमामंडन और प्रशस्ति का ऐसा अश्लील दृश्य किया, जिसे देखकर नैतिकता और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता रखने वाला हर व्यक्ति विचलित हुआ होगा।

यहीं हम पक्षधरता का अंतर देख सकते हैं। मुखिया की हत्या के बाद दलित लेखक कंवल भारती ने लिखा, ‘मुखिया दलितों का हत्यारा था और हत्यारे की हत्या पर दलितों को कोई दुख नहीं है। जिस व्यक्ति ने दलित मजदूरों के दमन के लिए रणवीर सेना बनायी हो, उनकी बस्ती पर धावा बोलकर उन्हें गोलियों से भून दिया हो, दुधमुंही बच्ची को हवा में उछाल कर उसे बंदूक से उड़ा दिया हो और गर्भवती स्त्री का पेट फाड़कर भ्रूण को तलवार से काट डाला हो, उस दरिन्दे की हत्या पर कोई दरिन्दा ही शोक मना सकता है।’ (फारवर्ड प्रेस, जुलाई, 2012)

उसी मुखिया की हत्या का तीसरा ‘शहादत दिवस’ पटना में उसके पुत्र इंद्रभूषण सिंह ने गत 1 जून को मानाया, जिसमें मुखिया की जाति के अनेक राजनेता शामिल हुए। मौजूदा मानकों के अनुसार जिस कार्यक्रम में राजनेता शरीक होते हैं, वह समाचार बनने के योग्य मान लिया जाता है। यह स्वभाविक था कि इस कार्यक्रम को कवर किया जाए। लेकिन इसे सिर्फ कवर ही नहीं किया गया, बिहार के मीडिया ने इसे मुखिया के महिमामंडन के एक और मौके के रूप में लिया। ‘दैनिक जागरण’ को छोड़कर सभी हिंदी अखबारों ने इस आयोजन को ‘ब्रह्मेश्वर मुखिया जी’ का ‘शहादत दिवस’ दिवस कहा। अगर आयोजनकर्ताओं ने इस कार्यक्रम को ‘शहादत दिवस’ का नाम दिया भी था तो भी क्या समाचारपत्रों को सैकड़ों गरीब लोगों की हत्याओं के आरोपी को ‘शहीद’ कहना चाहिए? क्या इसे ‘मुखिया की बरसी’ अथवा उसकी ‘हत्या के तीन साल पर आयोजित कार्यक्रम/समारोह’ नहीं कहा जाना चाहिए? महज इस शब्दावली के अंतर से आप समझ सकते हैं कि बिहार में खबर बनाने वाले लोगों की पक्षधरता क्या है।

आइए, अखबारों द्वारा ‘कथ्य के चयन’ पर नजर डालने से पहले हम देखें कि इस समाचार को उन्होंने ने किस तरह ‘प्रस्तुत’ किया। विभिन्‍न समाचारपत्रों के पटना संस्करणों में 2 जून, 2015 में समाचार की प्रस्तुति : प्रभात खबर – ब्रहमेश्‍वर मुखिया का शहादत दिवस मना, दैनिक भास्‍कर- सीपी ठाकुर सीएम प्रत्‍याशी तभी भाजपा को देंगे समर्थन, ब्रह्मेश्‍वर मुखिया के शहादत दिवस पर नेताओं ने दिखाए सियासी तेवर, मुखिया जी व्‍यक्ति नहीं, अंजुमन थे।

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अखबार के विज्ञापन पर बांग्लादेश में मचा बवाल, खेद जताना पड़ा

बांग्लादेश के प्रमुख अखबार ‘प्रोथोम आलो’ में छपे विज्ञापन पर बांग्लादेश में बवाल मच गया। अखबार को खेद जताना पड़ा। विज्ञापन में दिखाया गया था कि मुस्तफिजुर ने कप्तान एमएस धोनी, विराट कोहली, रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे, शिखर धवन, आर. अश्विन और रविंद्र जडेजा जैसे खिलाड़ियों को आधा गंजा कर दिया है। 

इस विज्ञापन की बांग्लादेश में भी खूब आलोचना हुई। लोगों ने विज्ञापन को बांग्लादेश की संस्कृति के खिलाफ बताया । बांग्लादेश के अनेक प्रशंसकों ने तो इस बांग्ला भाषा के अखबार से सवाल किया था कि क्या आप ऐसा ही तब भी करेंगे जब हमारी टीम हारेगी। बांग्लादेश में जिस तरह से टीम इंडिया के सितारों का मजाक उड़ाया गया वैसा विश्व में किसी भी खेल में किसी भी देश ने अपने प्रतिद्वंदी टीम या खिलाड़ियों के खिलाफ कभी नहीं किया है।

बांग्लादेश टीम के प्रमुख खिलाड़ी शाकिब अल हसन व मशरफे मुर्तजा ने कहा कि टीम इंडिया से हमारे मीठे रिश्ते हैं। ऐसी हरकतों से उसे खराब नहीं करना चाहिए। हमारी दुश्मनी सिर्फ मैदानी है। दोनों ही टीमें जीतने के लिए खेलती हैं। अखबार को मर्यादा का पालन करना चाहिए। मजाक का भी एक स्तर होना चाहिए।

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मजीठिया की राह के दुश्मनों को हर मोर्चे पर शिकस्त दो, अखबार मालिकों की करतूतें उजागर करो

साथियों, हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं है। हम सभी इस शक्तिशाली तंत्र से लड़ रहे हैं। हमारे मन में अन्याय के प्रति आक्रोश तो हो लेकिन ऐसे कोई विचार लिखित रूप में व्यक्त न करें जो उनके लिए हमारे खिलाफ सबूत बने। हम सब फ़िलहाल कानूनी जंग लड़ रहे हैं सशस्त्र लड़ाई नहीं। आप सभी से अनुरोध है कि मजीठिया की राह के दुश्मनों को हर उस मोर्चे पर शिकस्त दें जो उनकी ताकत है।

आप सब अख़बार मालिकों के शुभचिंतकों को यह सन्देश पहुंचाएं कि जो अपने परिवाररूपी कर्मचारियों को कुचल रहे हैं, क्या उन्हें खुद को बुद्धिजीवी कहलाने का हक़ है? राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी का बयान है कि उन्होंने मई माह में अपने कर्मचरियों को 16 करोड़ रुपये बांटे। क्या कर्मचारियों में 16 करोड़ रुपये बांटने वाले अपने हर कर्मचारी को इस राशि का औसत 32 हज़ार रुपया मिलना अपने बैंक अकाउंट में दिखा सकते हैं? सवाल यह भी है कि अख़बार के नाम पर कौड़ियों में ली गई जमीन पर व्यावसायिक कॉम्लेक्स क्यों बनाये गए?

पत्रकारों को मिलने वाली सुविधा पर  अख़बार मालिकों के पेट में दर्द हो जाता है जबकि ये खुद सस्ता अखबारी कागज़, मशीनरी के आयत पर कस्टम आदि शुल्क में रियायत, सरकारी विज्ञापनों के लिए तयशुदा दर से अधिक राशि की मांग आदि सरकारी रियायतों का इस्तेमाल क्यों करते हैं। साथियों, इनके काले कारनामे खोद-खोद कर लाओ, उनके पेम्फलेट, पोस्टर आदि छपवाकर इन्हें नंगा करो। इस लड़ाई में किसी एक अख़बार नहीं बल्कि हर उस अख़बार को लपेटो जो मजीठिया का दुश्मन बना हुआ है। पाठकों सहित आम लोगों को बताएं कि मजीठिया आयोग की सिफारिशें क्या है? सुप्रीम कोर्ट में लड़ी जा रही हमारी जंग का मकसद क्या है? मात्र 500 रुपए की उधार पूंजी से शुरू हुआ राजस्थान पत्रिका कैसे करोड़ों का मालिक बना? समूचे तंत्र को भ्रष्ट करने में इन अख़बार मालिकों का क्या योगदान है?

मेरा सभी साथियों से अनुरोध है कि वे मानसिक जुगाली बंद कर इस लड़ाई को निर्णायक मुकाम पर ले जाएँ, सिर्फ अख़बार मालिकों को उनके अन्याय में लिए कोसना काफी नहीं है। लड़ाई लंबी है और दुश्मन क्रूर। ऐसे में ठंडी सोच रखकर उनके हर हथियार को भोंटा करने की सोचो। याद रखें सारे अख़बार सुप्रीम कोर्ट को खिलौना बनाने के लिए एक हो गए हैं। उनसे निपटने के लिए सोच उनसे एक कदम आगे हो। कड़वे शब्द कहने के लिए क्षमा मांगता हूँ। साहस के साथ आपके बुद्धि कौशल के परीक्षण का समय आ गया है। चाणक्य की चन्द्रगुप्त को दी गई सीख याद करें कि गर्मागर्म खिचड़ी को किनारे-किनारे से फूंक मारते हुए ही खाया जा सकता है। बीच में से खाई गई खिचड़ी सिर्फ मुंह जलायेगी। इस सीख पर चलते हुए ही चन्द्रगुप्त चाणक्य की सरपरस्ती में अपना राज्य स्थापित कर पाया।

लेखक राजेंद्र गुप्ता से संपर्क : rajendraastrologer@gmail.com

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बोकारो में लुटेरों ने दो अखबार विक्रेताओं को पीटा

बोकारो : शहर में अखबार विक्रेता गणोश कुमार व इनके भाई भागीरथ गोराई को लुटेरों ने तमंचे के बट से पीटकर घायल कर दिया। बताया गया कि गणोश व उनके भाई भागीरथ चास मुफस्सिल थाना इलाके के नावाडीह स्थित अपने गांव से नया मोड़ सेंटर आ रहे थे। साइकिल से दोनों भाई जैसे ही गांधी गोलंबर पार कर एडीएम की ओर बढ़े, तभी झाड़ियों से दो बदमाश निकले। 

बदमाशों ने अखबार विक्रेताओं को तमंचा सटा दिया। रुपये व मोबाइल की मांग बदमाश करने लगे। रुपये और मोबाइल नहीं रहने पर बदमाश इन पर बिफर पड़े और पीटने लगे। तमंचे के बट से मारकर अखबार विक्रेता गणोश को घायल कर दिया। 

हालांकि इस पूरी घटना की जानकारी पुलिस को नहीं दी गई है। बताया जा रहा है कि इस घटना के पहले सेक्टर नौ से नया मोड़ अखबार सेंटर आ रहे राम प्रसाद गुप्ता व विकास कुमार से बदमाशों ने बीजीएच के पास मारपीट की। दोनों से बदमाशों ने मोबाइल व चार हजार रुपये भी छीन लिया था।

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अखबार के प्रतिनिधि को अगवा करने की कोशिश

दहगवां क्षेत्र में एक अखबार के प्रतिनिधि को बदमाशों ने घेर लिया। उसको अगवा करने की कोशिश भी की, लेकिन वह किसी तरह बच निकला। उसने इस मामले में एसओ पर भी आरोप लगाए हैं। मामले की जांच के लिए एसएसपी को पत्र भी सौंपा है।

जरीफनगर के दहगवां निवासी उमाकांत वर्मा ने बताया कि वह बरेली से प्रकाशित एक अखबार के क्षेत्रीय प्रतिनिधि हैं। सोमवार को हॉकर न आने के कारण वह खुद सुबह साढ़े छह बजे अखबार बांटने निकले। उदयपुर मजरा के पास लिंक रोड पर तीन बदमाशों ने उन्हें घेर लिया। खतरा भांपकर बाइक की रेस तेज कर दी। बदमाश पीछे लग गए, लेकिन आगे लोगों के आ जाने पर वह भाग गए। उमाकांत ने इस मामले में जरीफनगर एसओ पर आरोप लगाए हैं। कप्तान से जांच कराकर कार्रवाई का अनुरोध किया है।

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जनसंदेश के जीएम ने 15 कर्मचारियों को निकाला, अखबार बंद होने के कगार पर

मध्यप्रदेश जनसंदेश में मनमानी का आलम यह है कि बिना बताए 15 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया। अब अखबार बंदी की कगार पर है। सेलरी लेने के लिए लोगों को चक्कर काटने पड़ रहे हैं। जीएम की मनमानी चल रही है, जिसे चाहे सेलरी दे या नहीं। कई पूर्व कर्मचारियों को सेलरी नहीं दी गई। पीड़ित कर्मियों का कहना है कि जीएम अजय सिंह से जब सेलरी की बात की जाए तो उनका जवाब होता है, आप को तो नोटिस नहीं दिया। जिन 15 लोगों को नौकरी से निकाला गया है, क्या उन्हें नोटिस दिया गया है, नहीं, ये मनमानी ही है। 

अखबार के कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए कंपनी के पास पैसा नहीं है लेकिन मजेदार बात है कि अधिकारियों को  घूमने के लिए कई तरह के फंड मालिकों ने दे रखे हैं। एचआर हेड रहे रवि तिवारी भी किनारे लगाए जा चुके हैं। ताजा हालात ये हैं कि लोगों को कम सैलरी पर काम करने को मजबूर किया गया है। जिन्होंने कम सैलरी पर काम करने से मना कर दिया उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुछ लोग हैं, जिन्हें कहीं नौकरी नहीं मिल रही, वे वहीं पड़े हैं। 

कहने को तो जीएम बहुत अनुभवी है लेकिन वो कार्यालय के चपरासी से भी उलझ जाता है। उसका सारा दिमाग संपादकीय में लगा रहता है। बाकी कंपनी जाए भाड़ में। अपनी नौकरी बचाने के लिए वह कास्ट कटिंग के बहाने सबको किनारे लगाये चला जा रहा है।  

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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अखबार मालिकों को सीएम और पीएम से बांस की आशंका थी तो जाकर लोट गए उनके चरणों में

जो हमें बांस करता है, हम उसी को नमस्‍कार करते हैं। इस समय सूर्य ने बांस कर रखा है तो सारी दुनिया उसे नमस्‍कार कर रही है। यही नहीं, जहां से हमें बांस होने की आशंका होती है, हम वहां भी नमस्‍कार करने से नहीं चूकते हैं। अखबार मालिकों को सीएम और पीएम से बांस की आशंका थी, तो लोट गए चरणों में। छाप दिया बड़ा-बड़ा इंटरव्‍यू। कर्मचारियों को जब अखबार मालिकों के बिचौलियों से बांस होने की आशंका थी तो घेर-घेर कर नमस्‍कार करते थे। …और जब दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने बांस किया तो प्रबंधन ने सूर्य नमस्‍कार करना शुरू कर दिया और चार लोगों को वापस ले लिया। जिन लोगों ने बांस नहीं किया, उनको बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। हमें बांस की आदत सी पड़ गई है।

बिना बांस के कोई काम ही नहीं होता इस देश में। दैनिक जागरण प्रबंधन के लोगों को फिर बांस किया जाने वाला है। जब तक उन्‍हें बांस नहीं किया जाएगा, वो मानेंगे ही नहीं। इंतजार कर रहे हैं कोई बांस तो करे। इस बार बड़ा मोटा बांस है। अभी शांत बैठे हैं। बांस होगा तो चिल्‍लाएंगे। अरे भैया क्‍यों इंतजार कर रहे हो बांस का। बांस कोई बांसुरी तो है नहीं कि कृष्‍ण जी आकर बजाएंगे और गोपियां मोहित हो जाएंगी। भारतीय संस्‍कृति को बांस संस्‍कृति कहा जाए तो ज्‍यादा स्‍पष्‍ट बात होगी।

तो बांस को आप संभाल कर रखिए। बांस के महत्‍व को तो संघ वालों ने गहराई से समझा है। बिना बांस के तो वे चलते ही नहीं। वे तो बात बे बात सरकार को भी बांस करते रहते हैं। गीता में भी श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को यही समझाया था-ये तुम्‍हारे परिजन भले ही हैं, लेकिन हैं तो बांस संस्‍कृति वाले ही। तुम इन्‍हें बांस नहीं करोगे, तो ये तुम्‍हें बांस कर देंगे। लेकिन अर्जुन कहां समझने वाले थे। बिना बांस किए किसी को बात समझ में आई है आज तक। भगवान कृष्‍ण ने जब विश्‍वरूप दिखाकर बांस किया तो क्षण भर में समझ आ गई सारी गीता।

आपको बताया गया था कि भाजपा को वोट दो, अच्‍छे दिन आएंगे। चुनाव जीतने पर भूल गए अच्‍छे दिन की बात। भूलना ही था। बांस का संस्‍कार लेकर जो पैदा हुए हैं। इंतजार कर रहे हैं कि कोई बांस तो करे। फिर लाएंगे अच्‍छे दिन। नीतीश और लालू ने मिल कर बांस करने का प्रोग्राम बनाया है। अब जीतन राम मांझी से बाप-बाप कर रहे हैं।

भइया, हम आपको कितना समझाएं। योग से देश सुधरने वाला नहीं है। इसे चाहिए एक बांस और एक बांस करने वाला। रहीम दास जी पता नहीं क्‍यों बांस को भूल गए। उन्‍हें भी लिखना चाहिए था। रहिमन बांस उठाइए, बिना बांस सब सून। तो आप सब लोग मजीठिया वेतनमान के लिए बांस उठा लीजिए। यकीन मानिए, यदि मजीठिया के लिए कोई बांस कर सकता है तो सिर्फ आप। शर्मिंदा मत होइए। आप सबको भरपूर बांस कर दिया गया है। अब आप की बारी है कि आप भी बांस करें। भगवान सबको बांस करने और बांस कराने का मौका जरूर देता है। आप बांस करने से चूक गए तो दैनिक जागरण प्रबंधन निरंतर आपको बांस करता रहेगा। यह जो मैं कर रहा हूं, अर्थात जो लिख रहा हूं, वह भी अपनी प्रजाति का बांस है। जय हिंद, जय भारत। जय बांस।

श्रीकांत सिंह के एफबी वाल से 

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राज बड़े गहरे हैं : राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह के साथ ‘नेशनल दुनिया’ के मालिक की जोड़ीदारी

इस तस्वीर में आप पंकज सिंह को नेशनल दुनिया अखबार के मालिक शैलेंद्र भदौरिया के साथ देख सकते है। पंकज सिंह भाजपा के महासचिव हैं और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के सुपुत्र हैं। पंकज सिंह के चलते राजनाथ सिंह सवालों के घेरे में भी आ चुके हैं।

अब जो नेशनल दुनिया के मालिक हैं, वो भाजपा में अपने रौब का काफी इस्तेमाल करते हैं। कानपुर और जयपुर में न जाने कागजों में कितने कॉलेज हैं इनके। महाराणा प्रताप ग्रुप के मालिक भी हैं ये जनाब। इन्होंने लगभग तीन वर्ष पूर्व नेशनल दुनिया का बीड़ा उठाया। साथ ही शुरू किया टैक्स चोरी और कर्मचारियों का शोषण। वेतन न देना, देरी से देना इनके संस्थान का फीचर है। साथ ही प्रोविडेंट फण्ड की चोरी और टैक्स की चोरी की भी इन्क्वायरी चल रही हैं इनपर। लेकिन अपने राजनीतिक रसूख के दम पर ये बढ़े जा रहे हैं। किसी भी जांच को आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा। यह तस्वीर उस राजनीतिक घनिष्ठा को दर्शाती है जिससे क्रोनी कैपिटलिज्म कहा जाता है। क्या आम आदमी को इन्साफ की उम्मीद करनी चाहिये?

(शरद त्रिपाठी की इस पोस्ट पर नेशनल दुनिया के पीड़ित पत्रकार अनिरुद्ध चौहान टिप्पणी करते हैं – ‘मुझे तो पीएफ मांगने पर राजनाथ सिंह और कानपुर से इनके विधायक ससुर सलिल विश्नोई के नाम से धमकाया भी गया है……कोई सुनने वाला नहीं है…. अब तो बस मोदी जी ही कुछ कर सकते हैं…. मेरा मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है। अगस्त में मेरा तबादला मेरठ से नोएडा किया गया और नवंबर में ही जयपुर के लिए कर दिया गया… अब वहां वेतन नहीं दिया जा रहा… लिहाजा घर बैठा हूं। टिफिन वाले और रूम का पैसा देना है।’

शरद त्रिपाठी के एफबी वाल से

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सुबह अखबार बांटनेवाला सूरज लाया 9.2 सीजीपीए

रांची : अखबार बिक्री कर पढ़ाई करने वाले सूरज कुमार ने 10वीं  बोर्ड की परीक्षा में 9.2 सीजीपीए हासिल किया है. गोविंद सीनियर सेकेंड्री स्कूल, रामगढ़ के छात्र सूरज के पिता अनिल कुमार साहु सेल्समैन व मां शकुंतला देवी गृहिणी हैं. सूरज प्रति दिन सुबह चार बजे घर से निकल कर इलाके में अखबार बांटता है. 

उसके बाद तैयार होकर स्कूल जाता है. सूरज की इच्छा है कि वह आगे पढ़ाई कर इंजीनियर बने. उसकी इच्छा है कि उसका नामांकन डीएवी ग्रुप के स्कूल में हो जाये, ताकि अच्छे ढंग से पढ़ाई कर सके. सूरज को सोशल साइंस में 10 जीपी मिला. उसे अंग्रेजी, हिंदी, गणित, साइंस में 09 जीपी मिला है.

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इजरायल में चापलूस अखबारों का आतंक बढ़ा, मीडिया का गला घोंटने की तैयारी

इजरायल में मीडिया के बुरे दिन शुरू हो गए हैं . मौजूदा प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतान्याहू ने उन मीडिया संस्थानों को दुरुस्त करने का काम शुरू कर दिया है जो उनकी जयजयकार नहीं कर रहे हैं. सरकार और उनके चापलूस अखबारों का आतंक इतना बढ़ गया है कि आम तौर पर इजरायल के शासकों का पक्ष लेने वाली विश्वविख्यात पत्रिका इकानामिस्ट ने भी इस गड़बड़ी को प्रमुखता देते हुए एक आइटम छापा है .

बताया गया है कि डेमोक्रेसी की जो परम्परा इज़रायल में है उसको सही तो नहीं माना जाता लेकिन जो भी है उसको बचाये रखने में इजरायली मीडिया बिलकुल स्वतंत्र है . इजरायल में आम तौर पर शासक पार्टी का समर्थन करने वाले पत्रकारों की इज्ज़त नहीं होती. शायद इसीलिये इजरायली मीडिया की विश्वसनीयता अमरीका और यूरोप के प्रबुद्ध वर्गों में बहुत ज़्यादा है .

इजरायली मीडिया ने कई बार भ्रष्ट और बेईमान सरकारों को गिराने में इजरायली अवाम की मदद की है .कई बार बदतमीज़ और बेईमान जनरलों को भी मीडिया में बताई जा रही सच्चाई के सामने हटने को मजबूर होना पडा है .१९७७ में प्रधानमंत्री यित्जाक रबीन की पत्नी के गैरकानूनी बैंक खातों की जानकारी जब मीडिया में उजागर हुयी तो प्रधानमंत्री महोदय को पैदल होना पडा था.

लेकिन लगता है कि अब इजरायली मीडिया की आत्म सम्मान की परम्परा ख़त्म होने वाली है .जब सरकार बनाने के लिए साथियों की तलाश शुरू हुई तो प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतान्याहू गठबंधन सरकार में ऐसे ही लोगों को रख रहे थे जो मीडिया में बहुत बड़े सुधारों की उनकी लाइन का समर्थन करें . बिन्यामिन नेतान्याहू मीडिया से इतने आतंकित हैं कि उन्होंने मीडिया को सुधार देने वाली अपनी नीति को सभी राजनेताओं के साथ चर्चा का विषय बनाया और गठबंधन के समझौते में इसको लिखवाया .

यह भी जोर दिया कि जब संचार मंत्री इस तरह के सुधार लागू करने लगेगें तो गठबंधन को कोई भी साथी इसका विरोध नहीं करेगा . नेतान्याहू इतने से ही संतुष्ट नहीं हुए . उन्होंने संचार मंत्री का पोर्टफोलियो भी अपने पास ही रख लिया. एक जुएखाने का मालिक एक मुफ्त का अखबार छापता है और आजकल श्री नेतान्याहू उसकी हर बात को मान रहे हैं . आगे आगे देखिये होता है क्या ?

शेष नारायण सिंह के एफबी वाल से

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संपादकीय सामग्री अब दैनिक अखबारों तक सीमित नहीं

ब्रिटेन के प्रमुख अखबार द गार्डियन के मशहूर संपादक एलन रसब्रिजर ने दो दशक बाद इस 29 मई को पाठकों को जो विदाई चिट्ठी लिखी, उसकी शुरुआत थी : ‘यदि आप (आज का छपा हुआ) अखबार पढ़ रहे हैं, जो कि आप निश्चित ही नहीं पढ़ रहे होंगे, तो यह संपादक के रूप में मेरा अंतिम संस्करण है।’ ये पंक्तियां आज मीडिया बन चुके प्रेस में आए एक बड़े बदलाव की प्रतीक हैं। भारत और पूरे विश्व में समाचारपत्र अब भी उसी तत्परता और सत्यता से समाचार और विविध विचार-अभिमत देते हैं। पर हर पल संवर्धित होने वाली संपादकीय सामग्री दैनिक अखबार तक सीमित नहीं है। 

यह प्रौद्योगिकी के हर उस माध्यम पर है, जिसे ऑडियंस यानी पाठक, दर्शक और श्रोता जानकारी, विचार-अभिमत जानने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह कुछ भी हो सकता है-चलन से बाहर होता डेस्कटॉप, लैपटॉप, नोटबुक, पैड या सबसे अधिक प्रचलित स्मार्टफोन, और ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग साइटें, फोटो या वीडियो शेयर करने वाली साइटें, ट्वीटर जैसे माइक्रोब्लॉगिंग के डिजिटल मंच-वह सब, जिससे एक मीडिया समूह अपने ऑडियंस तक और ऑडियंस मीडिया तक पहुंच सकता है।

सामग्री सभी रूपों में हैं-शब्द, ऑडियो-वीडियो, ग्राफिक, आंकड़े, और इस सबकी खिचड़ी के बतौर। अहम कि यह वन वे ट्रैफिक नहीं है। पाठक पत्र-पत्रिका से और दूसरे पाठकों से संवाद कर सकते हैं, घटित हो रही घटना पर तत्काल टिप्पणी कर सकते हैं, अपनी ओर से नई जानकारी या विचार दे सकते हैं। अब समाचार-विचार देने का एकाधिकार किसी का नहीं। समाचारों और विचारों के लिए पसंद के स्रोत मिलने से समाचार जगत का कायाकल्प हुआ है। इन सबके बावजूद समाचारपत्र हर रोज छप रहे हैं और चैनल चल रहे हैं।

हम जैसे पुरानी पीढ़ी के कई पत्रकारों-संपादकों ने 25-26 वर्ष पहले इस स्थिति की कल्पना भी न की थी! पर वर्ल्ड वाइड वेब 26 साल पहले ही तो आया। और यह जिस इंटरनेट की सवारी करता है, वह भारत के कई राजनेताओं के ‘युवा’ होने के मापदंड से अभी जवान ही है, महज 46 बरस का! वर्ल्ड वाइड वेब के आगमन के बाद से सदियों से समाचार-जानकारी-विचार देने वाला प्रेस पूरी तरह मीडिया में तब्दील हो गया। पर घर-घर तक तीव्रता से पहुंच बनाने वाले इंटरनेट ने समाचार-विचार देने की परंपरागत पद्धतियों (नियतकालीन-अनियतकालीन पत्र-पत्रिकाएं) और माध्यमों (छपी हुई सामग्री, ऑडियो-वीडियो) के सामने ऐसी चुनौती खड़ी कर दी कि अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान जैसे देशों में 35 वर्ष तक का ऑडियंस इंटरनेट की तरफ मुड़ गया। अनुमान है कि पिछले दो-ढाई दशक में विकसित विश्व के 8,000 से अधिक पत्रों ने या तो दम तोड़ दिया या गुमनामी में खो गए। पर भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में अखबार और पाठक निरंतर बढ़ रहे हैं।

इंटरनेट के सामाजिक-आर्थिक असर की पड़ताल करने और नेट तथा परंपरागत मीडिया के संबंधों पर 90 के दशक से लेखन करने वाले न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रो. क्ले शिर्की ने 2009 के अपने चर्चित ब्लॉग न्यूजपेपर्स ऐंड थिंकिंग अनथिकेंबल में परंपरागत मीडिया की इस चुनौती को ‘अकल्पनीय’ माना और कहा कि प्रेस का परंपरागत न्यूज स्ट्रक्चर, सांगठनिक ढांचा तथा आर्थिक मॉडल जिस तेजी से टूट रहा है, उस तेजी, विश्वसनीयता और साख के साथ नया ढांचा खड़ा नहीं हो रहा। उन्होंने इस नेट ‘क्रांति’ की तुलना 15वीं सदी में प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार से की, जब छपे हुए शब्दों पर समाज का भरोसा जमने तक लगभग अराजकता की स्थिति रही। जब शब्द छपे रूप में सामने आने लगे, तो उनके जरिये मात्र पुस्तकें या सूचनाएं ही नहीं मिलीं, अपितु परस्पर विरोधी मान्यताएं और स्थापित सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाने वाले विचार भी सामने आए। लंबी जद्दोजहद के बाद प्रकाशन जगत दुनिया का विश्वास जीतने में सफल हो सका।

आज की चुनौती सिर्फ प्रौद्योगिकी की नहीं है, ऑडियंस को समाचार-विचार का अपना स्रोत और माध्यम चुनने की एकाएक और लगभग मुफ्त में मिली आजादी की है। डिजिटल क्रांति ने समाचार-जगत का लोकतांत्रीकरण कर दिया है और यह लोकतंत्र राजनीतिक लोकतंत्र की तरह अराजकता तथा विचलन से बरी नहीं है। अच्छी बात यह है कि परंपरागत मीडिया इस नए लोकतंत्र में एक मजबूत हिस्सेदार बन रहा है। इससे भी बेहतर यह एहसास, कि जिस तरह ऑडियंस बगैर मीडिया के अपनी जानकारियां या विचार दूसरों से शेयर नहीं कर सकता, उसी तरह मीडिया भी ऑडियंस के बगैर अपने समाचार-विचार प्रसारित नहीं कर सकता। मीडिया के हर तरह के आर्थिक मॉडल का मुख्य आधार भी उसका ऑडियंस है। यह मीडिया की पुनर्परिभाषा और समाज के संग उसके संबंधों का पुनराविष्कार है। 2043 तक अमेरिका में अखबारों का प्रकाशन बंद हो जाने की भविष्यवाणी करने वाले फिलिप मेयर यह जानकर अचंभे में होंगे कि उनके अपने देश में 3.50 करोड़ तक प्रसार वाले तीन प्रमुख अखबारों के अलावा कम-से-कम 50 ऐसे हैं, जो लाखों में बिकते हैं, और न्यूयॉर्क टाइम्स तथा वॉल स्ट्रीट जर्नल के वेब पोर्टलों पर सर्वाधिक हिट्स भी हैं।

द इकॉनॉमिस्ट का अनुमान था कि भारत में दैनिक अखबारों की 11 करोड़ प्रतियां रोज खरीदकर पढ़ी जाती हैं। भारत के समाचारपत्रों के महापंजीयक की ताजा रिपोर्ट में 2013-14 में हिंदी प्रकाशनों की 22.64 करोड़ प्रतियां बिकने का अंदाज है। नेट के साथ बढ़ता प्रेस का तालमेल और मीडिया के हर उपलब्ध प्लेटफॉर्म पर लाइव और रियल टाइम उपस्थिति जताने की कोशिश महज अस्तित्व का संघर्ष नहीं है, यह एक नए मीडिया-विश्व के निर्माण में हिस्सेदारी है। प्रिंट में ही वह साख, ताकत, संसाधन और इच्छाशक्ति है, जो उसे ज्ञान-आधारित इस प्रौद्योगिकी की ड्राइविंग फोर्स बना सकती है। आखिर अखबारों के बगैर दुनिया की क्या कल्पना की जा सकती है?

अमर उजाला से साभार

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कानपुर में जिलाधिकारी के तंबाकू विरोधी अभियान का धुंआ निकाल रहे विज्ञापन के भूखे अखबार वाले

कानपुर : डीएम डा. रौशन जैकब का शहर को तम्बाकू मुक्त करने के लिये चलाया जा रहा अभियान पूरे जोरों पर है, दूसरी तरफ इस अभियान को यहां पैसे का भूखा प्रिंट मीडिया खूब पलीता लगा रहा है। शहर के आलाधिकारियो के प्रयासो पर अखबारों में छप रहे विज्ञापन पानी फेरने में लगे हुए हैं।

ये कोई नई बात नहीं है। इस अभियान के दौरान ही अपने 18 मई के अंक में हिन्दुस्तान ने पान मसाले का विज्ञापन छाप डाला और वो भी मुख्य पृष्ठ पर। इन अखबार वालों को शहर में चलाये जा रहे अभियानों से कोई सरोकार नहीं है। ये बड़े मीडिया हाउस दोधारी छुरी होते हैं। ये शहर को तंबाकू फ्री बनाने वाली खबरें भी छापते हैं और तंबाकू उत्पादों का विज्ञापन भी छापते हैं।

ये मामला एक शहर का नहीं है। मीडिया चाहे प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रानिक, सभी में धूम्रपान करने वाले विज्ञापनों की धूम है। इलेक्ट्रानिक मीडिया तो इनसे भी दो कदम आगे है। नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले चैनलों में शराब उत्पादों के विज्ञापन बेरोकटोक चलाये जा रहे हैं। जैसे बेगवाइपर, रायल स्टेग, रायल चैलेंजर आदि ब्रांड म्यूजिक सीडी के नाम से प्रमोशन कर रहे हैं। अब जनता भी जानती है ये ब्रांड म्यूजिक सीडी बनाती हैं या फिर कुछ और।

ये बड़े मीडिया हाउस सिर्फ पैसों की भाषा समझते हैं। जिस तरह खुलेआम शराब का सेवन समाज अच्छा नहीं मानता है उसी तरह इन विज्ञापनों के प्रसारण को भी जुर्म की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। अखबारों का ये दोगलापन अब बंद होना चाहिए।

लेखक एवं भारतन्यूज24 के प्रधान संपादक नितिन कुमार से संपर्क : 9793939399 

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मजीठिया वेतनमान पर अखबारों के रवैये से नरेंद्र मोदी अनजान तो नहीं, फिर खामोश क्यों?

आप प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी जी की विदेश यात्राओं के चुंबकत्‍व से बाहर आ गए होंगे। उनकी मीठी-मीठी, चिकनी-चुपड़ी और गोल-मोल बातों से अपना दु:ख-दर्द भूल गए होंगे। अब जरा तंद्रा तोड़ें और सोचें कि मोदी की वजह से हमने क्‍या खोया और क्‍या पाया। खोने की जहां तक बात है तो हम अपना अधिकार खोते जा रहे हैं। जीने का अधिकार, अपनी भूमि पर खेती करने का अधिकार और शोषण के खिलाफ लड़ने का अधिकार। पाने की जहां तक बात है तो हमें मिली है महंगाई, बेरोजगारी और शोषण की अंतहीन विरासत। 

हमारे कुछ मित्र ऐसे हैं जो मोदी के जादू से मुक्‍त ही नहीं हो पा रहे हैं। वे बार-बार यही कहते हैं कि देश में बड़ी-बड़ी कंपनियां आएंगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ये कंपनियां एक झटके में सैकड़ों-हजारों लोगों को बेरोजगार कर देती हैं और उनके बच्‍चे अनाथ हो जाते हैं। यह तो अनाथ हो जाना ही हुआ। जिस बच्‍चे के पिता की नौकरी छिन जाती है, वह तो आर्थिक रूप से अनाथ ही हो जाता है। 

इस फेसबुक एकाउंट पर ज्‍यादारतर मित्र पत्रकारिता से जुड़े होंगे और उनको यह अच्‍छी तरह मालूम होगा कि किस प्रकार दैनिक जागरण जैसे कुछ अखबार मालिक अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान देने से कतरा रहे हैं और कानून का मजाक उड़ाते हुए अपने कर्मचारियों को बेरोजगार कर रहे हैं। क्‍या मोदी जी को इस अत्‍याचार की भनक नहीं है—-यदि नहीं है तो उनका प्रधानमंत्री पद पर बने रहना देश के लिए सर्वाधिक दुर्भाग्‍यपूर्ण है। उन्‍होंने एक बार भी ऐसा कोई बयान नहीं दिया कि अखबार मालिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मजाक न बनाएं। अपने कर्मचारियों के बच्‍चों को आर्थिक रूप से अनाथ करने से बाज आएं। लेकिन मोदी जी ऐसा कभी नहीं करेंगे, क्‍योंकि दैनिक जागरण उनके साथ खड़ा है-पत्रकारों की जुबान पर लगाम लगाने के लिए, मोदी का जादू पूरे देश को दिखाने के लिए और जनता का भ्रम बनाए रखने के लिए। तभी तो दैनिक जागरण ने अपने कर्मचारियों को फरमान जारी किया है-हम भूमि अधिग्रहण बिल के साथ हैं। 

यहां दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल की चर्चा जरूरी है, जो शायद पहले ऐसे नेता हैं, जिन्‍होंने अखबार मालिकों के अत्‍याचार का खुल कर विरोध किया है। उन्‍होंने अखबार कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान दिलाने के लिए एक अधिकारी की भी नियुक्ति कर दी है। अब हालत यह है कि उन्‍हें अपने अनुसार अधिकारी भी नियुक्‍त नहीं करने दिया जा रहा है। यह है केंद्र सरकार की साम्राज्‍यवादी नीति, जो जनता को गुलाम बनाने वाली लग रही है। अगर सबकुछ केंद्र सरकार के ही इशारे पर होना था तो दिल्‍ली की जनता के जनादेश का क्‍या मतलब हुआ। 

जाहिर है कि केंद्र सरकार जनादेश से पंगा ले रही है। और जनादेश से पंगा लेने वालों का क्‍या हश्र हुआ, इसे आप बार-बार देख चुके हैं। मोदी जी के मंत्रियों को खरी-खोटी बाबा रामदेव भी सुना चुके हैं। हो सकता है कि मोदी जी बेईमान न हों, लेकिन सुपर बेईमान, मजीठिया चोर और छेड़छाड़ के आरोपियों के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाना मोदी जी को कतई शोभा नहीं देता। उन्‍हें अच्‍छे और बुरे में भेद तो करना ही होगा। जब तक वह अत्‍याचारी अखबार मालिकों को रोकने के लिए बयान जारी नहीं करेंगे और उनके साथ गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाते रहेंगे, तब तक उनकी नीयत पर सवाल उठते ही रहेंगे। मोदी जी उन बच्‍चों की हाय मत लीजिए, जिनके पिता बिना किसी गलती के बेरोजगार कर दिए गए हैं। दैनिक जागरण जैसे अखबार मालिक तो कह ही रहे हैं-मोदी जी का है साथ, तुम्‍हारे बच्‍चों को कर देंगे अनाथ।

फोर्थपिलर एफबी वॉल से

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मजीठिया मामले पर अखबार मालिकों ने हरकत से बाज न आने की ठानी, नोटिस लेने से इंकार

दिल्‍ली सरकार द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के प्रयास को अखबार मालिक असफल करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। पहले ही दिन टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने केजरीवाल सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। आइएनएस के हवाले से इस निर्णय पर ही सवाल खड़ा कर दिया।

आईएनएस और अचाबार के प्रबंधकों को पता नहीं है कि मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट का है। केंद्र सरकार और राज्‍य सरकार तो बस क्रियान्‍वयन एजेंसियां हैं। यही बात घूमा- फिरा के दैनिक जागरण के वकील और पूर्व केंद्रीय कानून तथा मानव विकास संसाधन मंत्री कपिल सिब्‍बल सुप्रीम कोर्ट को भी बता रहे हैं लेकिन मालिकों को ये बात समझ में नहीं आ रही है। 

दिल्‍ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मजीठिया वेज बोर्ड इम्पिलिमेंटेशन संघर्ष समिति की मांग पर दिल्‍ली के सभी अखबारों से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की रिपोर्ट तलब की है। इससे बचने के लिए इंडियन एक्‍सप्रेस ने दिल्‍ली सरकार का यह नोटिस लेने से यह कह कर मना कर दिया कि उनका कार्यालय अब दिल्‍ली में नहीं है। 

क्‍या तर्क है, जनसत्‍ता के नाम पर ली गई जमीन और कार्यालय वहीं बहादुरशाह मार्ग पर मौजूद है लेकिन कर्मचारी कहीं और चले गए। दिल्‍ली सरकार भी हार मानने वाली नहीं थी। नोटिस तामिल कराने गए अधिकारी ने ऊपर से आदेश ले सरकार का नोटिस इंडियन एक्‍सप्रेस के भवन की दीवार पर ही चस्‍पा कर दिया।   

मजीठिया मंच एफबी वॉल से

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सेक्स रैकेट्स के पालनहार बने अखबार, वर्गीकृत विज्ञापनों से गंदी सूचनाओं की तिजारत

आज तकरीबन हर बड़ा अखबार जो वर्गीकृत विज्ञापन छापता है, उसमें मनोरंजन या फिर पार्ट टाइम जॉब को लेकर इस्तिहार दिए जाते हैं। उनमें अमूमन मसाज पार्लर या फिर फ्रेन्डशिप क्लब के बारे में भी बताया जाता है। असलियत में ये सभी जिस्म के सौदागरों के विज्ञापन होते हैं, जिसका मीडिया के माध्य से प्रचार कर सैक्स रैकट्स को खुलेआम चलाया जा रहा है।

ये बेशर्मी कोई नई भी नहीं, लेकिन ये सवाल अखबार पढ़ने वाले आम पाठकों के मन में हमेशा उठता रहता है कि क्या हमारे देश में अब कानून व्यवस्था नाम की, सेंसर नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। प्रेस परिषद, न्याय पालिका, संसद, क्या किसी को ये मालूम नहीं कि अखबार क्या कर रहे हैं। क्यों ऐसे घिनौने विज्ञापन रोज छाप रहे हैं। मीडिया तो खैर प्रेस्टीट्यूट कहा ही जाने लगा है। 

दैनिक जागरण ,अमर उजाला, हिन्दुस्तान राष्ट्रीय सहारा आदि सभी बड़े पेपरो में इन जैसे विज्ञापनों की भरमार है। नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बड़े बड़े मीडिया हाउस चंद कागज के टुकडों के लिये अपना ईमान तक बेच देते हैं। बस पैसा आना चाहिए, चाहे विज्ञापन जैसा भी हो।

इन्ही विज्ञापनों के जरिये ही लगभग हर शहर में सैक्स का धंधा जोरों से पनप रहा है। विज्ञापन देने वाला शख्स हर शहर में अपनी शाखा खोल कर सैक्स रैकट का संचालन कर रहा है। कोई भी अखबारों में प्रकाशित वर्गीकृत विज्ञापनों के पन्ने पर नजर दौड़ाने के बाद अखबारो की नैतिकता का सहज ही अंदाजा लगा सकता है। 

नितिन कुमार ई-मेल संपर्क nitinmba4@gmail.com

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Newspaper employees of Madhya Pradesh pledge to fight for Majithia Award

Prophets of doom have been proved wrong. They have been spreading rumours that there was no enthusiasm for the Wage Board Award among the newspaper employees. But on the contrary, hundreds of newspaper employees assembled to listen and interact with Advocates Parmanand Pandey and Colin Gonsalves on 16th May 2015 at Bhopal regarding the state of Majithia Wage Award.

 

They wanted to know as to how to put across their grievances before the labour inspectors to be appointed by the state government on the direction of the Supreme Court. There is terrible mistrust among the employees towards the labour inspectors. They think, and rightly so, that the state officials behave as the handmaid of the newspaper proprietors and even the political leaders are afraid of taking the side of the employees.

Shri Pandey, who is also the Secretary General of the Indian Federation of Working Journalists, exhorted the employees to unionise to get their rights. It is the disunity of workers and their fear factor that is depriving them from their legitimate rights. He told them, at length, how the battle for the Award was fought and won. There was no need for them to be panicky. In any case, the State Governments would have to appoint the Labour Inspectors as per the direction of the Supreme Court.

They have only to inform the Labour Inspectors about the total number of employees- regular and contractual both, wages which they have been getting before and after the judgment. They must ask the labour inspectors to make a surprise visit to the offices of the newspapers to procure their balance sheets and advertisement tariffs. If there is any harassment like suspension, transfer or termination or change of service conditions, they must immediately bring it to the notice of inspectors and prevail upon them to make it the part the report. Labour Inspectors should be told, in no uncertain terms, that if any false report is submitted by them, it would put them in soup and therefore they should be doubly cautious about the factual position. No newspaper owner or the political bandicoot would come to their rescue if they fudge with factual position in their reports.

Shri Pandey promised them to send a detail advisory to them in a fortnight, which will help them in making the representations to the inspectors. This has to be done assiduously to make a foolproof case. A team of dedicated comrades has to work hard. Cheap publicity has to be avoided. Agents of managements, operating in different garbs and disguises, will spread misleading canards to distract the employees from their path. Therefore, they must guard against them.

Senior Supreme Court lawyer and noted Human Rights Activist Collin Gonsalves told he employees that in the past no Award was implemented by the owners because the governments have been sleeping over them but this time because of the intervention of the Supreme Court, it was going to be a reality. Employees must have to remain united and alert otherwise a battle that had been won might turn into a disaster. He was lavish in his praise to MS Yadav of the PTI Federation, who pulled all socks during the struggle for the Award and told the employees to show the similar grit and determination to achieve the benefits of the Award in their organisations. He wondered over the lack of unionisation in the newspaper industry.

There are dozens of registered unions of newspaper employees or journalists in Madhya Pradesh but they have never approached the Labour department of the state for any of the demands of the newspaper employees or media persons, bemoans an official of the State Labour Commissioner while talking to us in Bhopal. It sounds strange and shocking that many criminals and thugs are running the unions of journalists in Madhya Pradesh for their own protection and livelihood. They will talk of fourth estate but have not even heard of Wage Boards. They will flatter the officials for advertisements for their rags and behave like pimps of politicians to bluff their proximity with them. There is one senior journalist, who said that he would not share his grievance with some union leaders because they would pass it on to the proprietor of his newspaper to make some money.

There may be exaggeration in what he alleged but this perception about unions is certainly very painful and the unions will have to take initiative, in all seriousness, to purge such traders. Regrettably, the Patrakar Bhavan of Bhopal has been usurped by hoodlums and frauds. Successive governments have failed to restore it the rightful owners, the Bhopal Shramjeevi Patrakar Sangh, an affiliate of the IFWJ because it suits the governments to have goondas on their sides to browbeat the genuine journalists. Be that as it may, the Majithia Award has come as a boon for the real working journalists to unite and throw out the dishonest and selfish wolves roaming in the garb of sheep. 

It was pleasure to see a large number of women newspaper employees enthusiastically taking part in the meeting. Employees of Nayee Duniya, Nav Duniya, Dainik Bhaskar, Rajasthan Patrika are now up in the arms to achieve the Award. Salman Khan of the Bhopal Shramjivi Patrakar Sangh and the old and infirm Rajendra Kashyap was present all along in the meeting to keep the spirit of youngsters high. The undersigned vowed the employees that IFWJ would not leave any stone unturned to redeem their rights.

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असमिया अखबार के खिलाफ 10 करोड़ की मानहानि का दावा

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने ‘असमिया प्रतिदिन’ को असम प्रदेश भाजपा के नेता जीतू गोस्वामी के खिलाफ कुछ भी लिखने पर रोक लगा दी है।

पिछले 4 मई से अखबार में लगातार भाजपा नेता के खिलाफ खबरें छप रहीं थीं। उन्हें सीबीआई द्‌वारा गिरफ्तार होने के साथ फरार भी बताया दिया गया था। साथ ही बैंक का बकाया न देने सहित कई अन्य आरोप संबंधी खबरें अखबार में छपती रहीं। इससे पहले गोस्वामी ने अखबार को कानूनी नोटिस भेजने के बाद प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था कि राजनीतिक द्वेष के कारण उन्हें मीडिया के सहारे निशाना बनाया जा रहा है।

गौरतल है कि गोस्वामी ने पिछले दिनों गुवाहाटी हाईकोर्ट में अखबार के खिलाफ 10 करोड़ रुपए की मानहानी का मुकदमा दायर किया था, जिस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सीबी गोगोई की अदालत ने अखबार को गोस्वामी के खिलाफ कुछ भी लिखने से मना करते हुए निर्देश दिया है कि प्रथम दृष्ट्या ऐसा लग रहा है कि अखबार जानबूझ कर आवेदक की छवि को खराब करने के लिए मनगढ़ंत कहानी बनाई है

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