मीडिया पहले कमजोर आदमी की आवाज उठाता था, आज मजबूत आदमी की आवाज बन चुका है

आज देश में जो अच्छे चैनल मौजूद हैं, उनके ऊपर भी लगातार खराब होने का दबाव बढ़ रहा है

नई दिल्ली। 30 जनवरी को हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा दो सत्रों में ‘प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता’ और ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया की विश्वसनीयता’ पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता का सवाल आज से 50 साल पहले भी था और आज भी है। दरअसल, विश्वसनीयता की यह बहस मीडिया को और विश्वस्त बनाती है। पाठकों और दर्शकों की मनोविज्ञान और दिलचस्पी से अलग जाकर विश्वसनीयता पर अलग से कोई बहस नहीं हो सकती, बल्कि यह सारी बहस इसके सापेक्ष ही होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार मीडिया से नैतिक और अति नैतिकता की उम्मीद की जाती है, जो वास्तविकताओं से बहुत परे है। गांव के स्तर पर भी पत्रकारिता को लेकर किये जा रहे प्रयोग उम्मीद जगाते हैं।

बीज वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षक प्रोफेसर आनंद प्रधान ने सवाल उठाया कि पिछले दशकों में पत्रकारिता का मुनाफा तो बढ़ा है, मगर क्या पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी बढ़ी है? जहां एक तरफ पश्चिमी देशों के मीडिया खासतौर पर प्रिंट मीडिया लगातार घाटे में जा रहा है, एशियाई देशों खासकर भारत, चीन में अखबारों का प्रसार और मुनाफा बढ़ रहा है। उन्होंने चिंता जाहिर की कि पीआर पत्रकारिता का लगातार विस्तार हो रहा है और खोजी तथा सही खबरों की पहुंच आमजन तक कम होती जा रही है।

वरिष्ठ महिला पत्रकार भाषा सिंह ने मीडिया में दलित और महिलाओं की स्थिति को लेकर सवाल उठाये और कहा कि इनसे जुड़े सरोकार मीडिया की चिंता का विषय नहीं बन पाते। उन्होंने मीडिया में महिलाओं की कम भागीदारी को इसका मुख्य कारण बताया।  जनसत्ता के विशेष संवाददाता राकेश तिवारी ने मीडिया में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि एक तरफ न्यूनतम मजदूरी पर काम करने वाले स्ट्रिंगर पत्रकार हैं तो दूसरी तरफ आठ अंकों में काम करने वाले धनवान पत्रकार भी। उनकी राय में मीडिया की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाने में सत्ता प्रतिष्ठानों की हमेशा से ही बड़ी भूमिका रही है।

वरिष्ठ महिला पत्रकार मनीषा के मुताबिक मीडिया में महिलाओं के मुद्दे हाशिए पर हैं। महिलाओं के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं में भी उनको खूबसूरत बनाने के नुस्खे ही ज्यादा दिखते हैं।  वरिष्ठ पत्रकार और संपादक यशवंत व्यास ने कहा कि मीडिया में विश्वसनीयता और उम्मीद दोनों बाकी है। पिछले कुछ वर्षों में मीडिया ने कई बड़े खुलासे किये हैं, जो उम्मीद जगाते हैं। पत्रकारिता में आने वालों के लिए हमें ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहिए जिससे वह पेशे को ही खौफनाक और निराशाजनक मानने लगें।

आभार प्रकट करते हुए हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि पत्रकारिता में महिलाओं का सच आना अभी भी बाकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी का एक उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि कैसे महिलाओं को मोहरा बनाकर मर्द राजनीतिक लाभ का खेल जारी रखे हुए हैं। कार्यक्रम के पहले सत्र का संचालन उद्घोषिका अलका सिन्हा ने किया।

दूसरे सत्र ‘इलैक्ट्रानिक मीडिया की विश्वसनीयता’ की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और संपादक उर्मिलेश ने की और वक्ता के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन, वरिष्ठ एंकर निधि कुलपति, पत्रकार अमरनाथ अमर, आरफा खानम और युवा पत्रकार नवीन कुमार ने अपनी बात रखी। उर्मिलेश ने कहा कि आज कारपोरेट मीडिया का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है। देश के 10 बड़े कारपोरेट घरानों के पास वर्चुअली विज्ञापन का 80 फीसदी है, तो ऐसे में विश्वसनीयता का सवाल उठना लाजिमी है। ऐसे दौर में गार्डियन या इकानोमिस्ट जैसे पत्रिका/अखबार या बीबीसी-अलजजीरा जेसे चैनलों की कल्पना कैसे कर सकते हैं। आज देश में जो अच्छे चैनल मौजूद हैं, उनके ऊपर भी लगातार खराब होने का दबाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार निधि कुलपति ने इस दौरान अपने रिपोर्टिंग के अनुभवों को सबके साथ साझा किया। वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन की राय में मीडिया पहले कमजोर आदमी की आवाज उठाता था, आज मजबूत आदमी की आवाज बन चुका है। कार्यक्रम में दर्जनों के संख्या में वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और पत्रकारिता के छात्र मौजूद थे।

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