भारत के मीडिया घराने अब पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथों में हैं!

योगी आदित्‍यनाथ ने बजरंग बली को लोकदेवता, वनवासी, गिरवासी, दलित और वंचित भी बताया, लेकिन मीडिया को बेचे जाने लायक ‘माल’ केवल ‘दलित’ शब्‍द में नजर आया…. इसके बाद शुरू हो गई पीसीआर से इस खबर और शब्‍द पर ‘खेलने’ की तैयारी… लखनऊ। क्‍या भारत का शीर्ष मीडिया पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथ में …

बड़े मीडिया हाउसों के पास है बड़े कारपोरेट घरानों का निवेश और सरकार का समर्थन : सिद्धार्थ वरदराजन

DUJ SEMINAR ON ‘DEMOCRACY IN DANGER : UNETHICAL REPORTING / ATTACKS ON INDEPENDENT JOURNALISM AND JOURNALISTS’

In a sharp counter to the BJP Sangh Parivar’s campaign, Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan said the state has been targeted as it champions the values of secularism, socialism and democracy. He was speaking at a function organized by the Delhi Union of Journalists in the national capital on ‘Democracy in Danger : Unethical Reporting/ Attacks on Independent Journalism and Journalists’ on 15 October at Kerala House. The Chief Minister said slogans like ‘Love Jehad’ have been used to disrupt the state’s centuries old communal harmony but the RSS will not succeed in its game plan. He slammed several media houses for ferociously targeting Kerala and congratulated those journalists who are standing up for the truth despite pressure from employers.

बाबा की गुफा से आ रहे पैसों से अब तक मीडिया की आंख पर पट्टी बंधी हुई थी!

..पत्रकार कर रहे दो जून की रोटी का संघर्ष… लेकिन उनका दर्द किसी को नहीं दिख रहा… अगर न्यूज चैनलों के नाम ‘आया राम‘ और ‘गया राम‘ हो जाये और इनकी टैग लाइन भ्रष्टाचार, अनियमितता, ‘ब्लैक मेलिंग के बादशाह‘ या फिर ‘लूटने के लिए ही बैठे हैं’…. हो जाये तो आश्चर्य मत कीजियेगा… क्योंकि न्यूज़ चैनल इस रूप में सामने आने भी लगे हैं.. वो भी बिल्कुल कम कपड़ों के साथ, जिसमें उसका काला तन साफ नजर आ रहा है… कोई चैनल बीजेपी समर्थित तो कोई कांग्रेस, तो कोई बाबाओं की चरणों की धूल खाकर जिंदा है। सभी चैनल लगभग अपने उद्योगपति आकावों की जी हुजरी में लगे हैं।

अगर कारपोरेट कंपनियों में काम करते हैं और खुद को गुलाम-स्लेव्स नहीं मानते तो इसे पढ़िए!

Narendra Nath : टेक महिंद्रा से जुड़े एक टेककर्मी को एचआर से फोन आता है। उसकी बात कुछ इस तरह होती है…

एचआर-हेलो, आप कल दस बजे तक रिजाइन कर दें।
स्टॉफ-क्या?? क्यों? इतनी जल्दी कैसे होगा। टूटे हुए व्यक्ति की आवाज साफ सुनी जा सकती है।

दो मीडिया हाउसों के एचआर की कहानी- ”किसी की पैरवी है आपके पास?”

Hi all,

Although I didn’t want to share with you but now I feel it is must to share that how people from Hr Department waste job seeker candidates time. I guess they believe that they are equal to God and all job seekers are beggars.

मीडिया से सावधान रहने का वक्त आ गया है!

Dinesh Choudhary : कथित पत्रकारों के साथ लालू यादव की क्या झड़प हुई है, मुझे नहीं मालूम। लालू बहुत डिप्लोमेटिक हैं और प्रेस से भागते भी नहीं। भागने वाले तो 3 साल से भाग रहे हैं। लालू मुलायम की तरह ढुलमुल भी नहीं रहे और उनका स्टैंड हमेशा बहुत साफ़ रहा। पर थोड़ी बात आज की पत्रकारिता पर करनी है, जो बहुत थोड़ी बची हुई है।

सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर हैं, सबके घर छापा पड़ना चाहिए!

Ramesh Chandra Rai : एनडीटीवी के मालिक के घर छापे पर हाय तौबा मची है। दरअसल सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर है। इसलिए सभी अखबार और चैनल मालिकों के घर छापा पड़ना चाहिए ताकि उनकी काली कमाई का पता चल सके। यह सभी पत्रकारों का उत्पीडन करते हैं। मोदी सरकार ने गलती यही की है कि एक ही घर पर छापा डलवाया है। यह पक्षपात है इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं। सभी के यहां छापा पड़ता तो निंदा नहीं करता। दूसरी बात जितने लोग एक चैनल मालिक के यहां छापे पर चिल्ला रहे हैं वे लोग पत्रकारों के उत्पीड़न पर आज तक नहीं बोले हैं। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी कई नौकरी से निकाल दिए गए औऱ उन्होंने आत्महत्या कर ली, उनका परिवार आज रोटी के लिए मारा मारा घूम रहा है लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। जहां तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात है तो पत्रकार नहीं बल्कि मालिक स्वतन्त्र हैं। आज पत्रकारों की औकात नही है कि मालिक की मर्जी के खिलाफ कुछ लिख सके।

मालिक के मरने पर सारे तनखइया पत्रकार मिलकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!

किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं… तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब… है तो कड़वा सच… मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती… अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है…..

पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

पत्रकार से लेकर संपादक तक अपने मालिकों के धंधों की रक्षा में लगे रहते हैं (संदर्भ : शरद यादव का रास में मीडिया पर भाषण)

Deshpal Singh Panwar : शरद यादव मीडिया को लेकर संसद में बोले और सच बोले। मीडिया मालिकों के हालात बेहतर से बेहतर और पत्रकारों की हालत बदतर। केवल 10 फीसदी ही बेहतर हालत में। आखिर मीडिया पूंजीपतियों का गुलाम कैसे हो गया.. इसका जवाब वही नेता दे सकते हैं जो इस समय सत्ता में हैं। याद करिए 2003 का दौर। मीडिया को गुलाम बनाने की नींव रखने वाले महाजन, जेटली और सुषमा ने विदेशी पूंजी निवेश के नाम पर मीडिया के दरवाजों पर कालिख पोत डाली थी।

पंडितों की फतवानुमा बातों पर चैनल वाले हांय हांय क्यों नहीं करते?

Mrinal Vallari : गाजियाबाद के जिस इलाके में मैं रहती हूं वहां बहुत से मंदिर हैं और बहुत से पंडी जी भी हैं। कभी-कभी इन पंडी जी की बातों को सुनने का मौका भी मिलता है। अगर लड़कियों और औरतों के बारे में इनकी बातों पर ध्यान देने लगें तब तो हो गया। जींस पहनीं मम्मियां भी मंदिर आती हैं पंडी जी की बात सुनती हैं, और जो मानना होता है उतना ही मानती हैं।

मीडिया दलाल है तो क्यों?

मीडिया दलाल है… मीडिया बिका हुआ है… आज इस तरह के आरोपों से मीडिया चौतरफा घिरा हुआ है। अब तो खबरिया चैनलों के एंकर भी बहस के दौरान इस बात का उलाहना देने लगे हैं कि “आप की निगाह में हम तो दलाल हैं ही”। ऐसा नहीं कि मीडिया (अखबारों) पर पहले कभी आरोप नहीं लगे। खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का ठीकरा आज भी मीडिया पर फोड़ा जाता है और मीडिया झेलता रहा है। आज अतीत का रोना रोने का समय नहीं है। मीडिया के दलाल होने के आरोप पर तो किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाना और फरमान सुना देना संभव नहीं है फिर भी इस पर मंथन जरूरी है कि समाज के हर कोने से दलाल होने के आरोप लग रहे हैं तो क्यों?

ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

सलमान खान पर सवाल पूछने वाले टीवी पत्रकार को जस्टिस काटजू ने जमकर हड़काया

जस्टिस मार्कंडेय काटजू इंदौर गए हुए थे. इंदौर इंस्टीट्यूट आफ लॉ में उनका कार्यक्रम था. वहां एक पत्रकार माइक कैमरा लेकर आया और उनसे पूछ बैठा कि सलमान खान ने ज्यादा शूटिंग करने के बाद रेप्ड वोमेन टाइप फील करने वाला जो बयान दिया है, उस पर आपका कहना है. इतना सुनते ही जस्टिस काटजू भड़क पड़े और कहा कि तुम्हें शर्म नहीं आती कि एक एक्टर को तुम लोग हाइलाइट कर रहे हो. देश में भुखमरी से लेकर किसान आत्महत्या और महंगाई जैसे ढेरों प्रमुख सवाल हैं जिन पर बात करनी चाहिए लेकिन ज्यादातर मीडिया वाले इन जेनुइन मु्ददों को साइडलाइन कर देते हैं.

पांच साल बाद हर पत्रकार अंबानी की मुट्ठी में… सुनिये सम्मानित पत्रकार पी. साइनाथ के आशंकित मन की आवाज़

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानी मीडिया के साथ एक समस्या यह है कि चारों स्तंभों के बीच यही इकलौता है जो मुनाफा खोजता है। भारत का समाज बहुत विविध, जटिल और विशिष्ट है लेकिन उसके बारे में जो मीडिया हमें खबरें दे रहा है, उस पर नियंत्रण और ज्यादा संकुचित होता जा रहा है। आपका समाज जितना विविध है, उतना ही ज्यादा एकरूप आपका मीडिया है। यह विरोधाभास खतरनाक है। बीते दो दशकों में हमने पत्रकारिता को कमाई के धंधे में बदल डाला है। यह सब मीडिया के निगमीकरण के चलते हुआ है। आज मीडिया पर जिनका भी नियंत्रण है, वे निगम पहले से ज्यादा विशाल और ताकतवर हो चुके हैं।

अमर उजाला और हिंदुस्तान ने रसूखदार चिकित्सक के आगे टेके घुटने

हिंदी दैनिक हिंदुस्तान की टैगलाइन है ‘तरक्की को चाहिए नया नजरिया’ और अमर उजाला कहता है- ‘ताकि सच जिन्दा रहे’। लेकिन उत्तर प्रदेश के जनपद चंदौली में दोनों ही अखबार अपने स्लोगन को ठेंगे पर रखकर कार्य कर रहे हैं। जिले में मुगलसराय स्थित पराहुपर में अर्बन हेल्थ केअर सेंटर में सोमवार को डाक्टर के खिलाफ शिकायतों की जांच करने पहुंची संयुक्त स्वास्थ्य निदेशक के सामने ही आरोपी प्रभारी चिकित्सा अधिकारी ने शिकायतकर्ता की पिटाई कर दी।

जेएनयू को बदनाम करने वाले ‘इंडिया न्यूज’ और ‘जी न्यूज’ का गेस्ट बनने से शीबा असलम फ़हमी का इनकार

Sheeba : आज सुबह से इंडिया न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ की तरफ से फ़ोन आते रहे पैनल में बैठने के लिए. दोनों किसी मुस्लिम-महिला केंद्रित घटना पर बहस में आमंत्रित कर रहे थे. मैंने विरोध जताते हुए मना कर दिया की जेएनयू को आपने जिस तरह षड्यंत्र कर के बदनाम किया उसके बाद हम आपके चैनल की टीआरपी की ग़ुलामी में सहयोग देने नहीं आएँगे.

जी न्यूज, इंडिया न्यूज और टाइम्स नाऊ की पीत पत्रकारिता के खिलाफ केजरीवाल ने कानूनी कार्रवाई के आदेश दिए

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पीत पत्रकारिता करने वाले तीन न्यूज चैनलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. ये चैनल हैं- जी न्यूज, इंडिया न्यूज और टाइम्स नाऊ. दिल्ली सरकार पहले इन चैनलों से पूछेगी कि बिना किसी जांच पड़ताल के आपने कैसे कन्हैया से जुड़े वो वीडियो चलाए जो फेक थे. साथ ही यह भी पूछा कि जांच के बाद जब यह बात साफ हो गई कि वीडियो फर्जी थे तो इस पीत पत्रकारिता पर आपने क्या सार्वजनिक रूप से माफी मांगी?

कन्हैया और जेएनयू प्रकरण के नकली टेप चलाने वाले न्यूज चैनलों पर कार्रवाई की हिम्मत छप्पन इंच सीने वाली मोदी सरकार में है?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानि जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को एक ऐसे वीडियो टेप के आधार पर फंसा दिया गया जिसे छेड़छाड़ कर तैयार किया गया. छेड़छाड़ किए गए टेप के बिना जांच पड़ताल के प्रसारण से कई न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इनमें से दो अंग्रेजी न्यूज चैनल हैं- टाइम्स नाऊ और न्यूज एक्स. हिंदी के कई न्यूज चैनल हैं- जी न्यूज, इंडिया न्यूज, इंडिया टीवी आदि. इन चैनलों पर प्रसारित टेप में कन्हैया को कश्मीर अलगाववाद के समर्थन में नारे लगाते दिखाया गया है जबकि एबीपी न्यूज ने सही माने जा रहे टेप को दिखाया जिसमें भारत विरोधी बातें नहीं बल्कि गरीबी, सामंतवाद आदि से आजादी संबंधी नारे लगाए जा रहे हैं.

यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

पैसा कमाने के चक्कर में हत्या जैसे अपराध में सहभागी बन रहे हैं अखबार मालिक : डा. नरेश त्रेहन

भोपाल। पैसा कमाने के चक्कर में हत्या जैसे अपराध में सहभागी बन रहे हैं अखबार मालिक। यह बात  मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के सीएमडी डॉ. नरेश त्रेहन ने भोपाल में आयोजित सेन्ट्रल प्रेस क्लब के प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में कही। इस अवसर पर डॉ. त्रेहन ने कहा कि अख़बार मालिक लुभावने विज्ञापन देते समय यह बात भूल जाते हैं कि उनके अख़बार में छपे विज्ञापन से प्रभावित होकर यदि कोई व्यक्ति अमुक अस्पताल में इलाज कराने जाता है और यदि उस व्यक्ति की सुविधाओं के आभाव में मृत्यु हो जाती है तो उसके लिए अख़बार मालिक भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितना लुभावना विज्ञापन देने वाला व्यक्ति या अस्पताल।

पैसे मांग कर इस न्यूज चैनल ने युवा पत्रकार का दिल तोड़ दिया (सुनें टेप)

सभी भाइयों को मेरा नमस्कार,

मैं एक छोटा सा पत्रकार (journalist) हूँ और 4 वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ। इस बदलते दौर में मुझे नहीं लगता कि मैं कभी अच्छा पत्रकार बन पाउँगा। मेरा सपना था कि मैं भी एक सच्चा पत्रकार बनूँगा पर अब तो पत्रकारिता का मतलब ही बदल चुका है। पहले पत्रकारिता एक मिशन था परन्तु अब ये करप्ट व कारपोरेट बन चुकी है। सभी जानते हैं कि मीडिया में काम करने के लिए अच्छी पहचान या बहुत पैसा होना चाहिए। आज पत्रकार बनना बहुत ही आसान हो गया है क्योंकि पत्रकार बनने के लिये चैनल को आप के तजुर्बे और आपकी योग्यता की जरूरत नहीं है। उन्हें तो जरूरत है आप से मिलने वाले मोटे पैसे की।

मीडिया पहले कमजोर आदमी की आवाज उठाता था, आज मजबूत आदमी की आवाज बन चुका है

आज देश में जो अच्छे चैनल मौजूद हैं, उनके ऊपर भी लगातार खराब होने का दबाव बढ़ रहा है

नई दिल्ली। 30 जनवरी को हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा दो सत्रों में ‘प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता’ और ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया की विश्वसनीयता’ पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता का सवाल आज से 50 साल पहले भी था और आज भी है। दरअसल, विश्वसनीयता की यह बहस मीडिया को और विश्वस्त बनाती है। पाठकों और दर्शकों की मनोविज्ञान और दिलचस्पी से अलग जाकर विश्वसनीयता पर अलग से कोई बहस नहीं हो सकती, बल्कि यह सारी बहस इसके सापेक्ष ही होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार मीडिया से नैतिक और अति नैतिकता की उम्मीद की जाती है, जो वास्तविकताओं से बहुत परे है। गांव के स्तर पर भी पत्रकारिता को लेकर किये जा रहे प्रयोग उम्मीद जगाते हैं।

मोदी‬ को साधुवाद जिन्होंने सेल्फी के लिए धक्कमपेल करते पत्रकारों का ढोंग उजागर किया

Rajender Singh Brar :  ‎प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी‬ को साधुवाद जिन्होंने इन सेल्फीचोर पत्रकारों का ढोंग उजागर किया क्योंकि पिछले एक दशक से ये लोग उनको पानी पी पी कर ‘कोस’ रहे थे और आज उसी ‘महामानव’ के साथ सेल्फी के लिये धक्कमपेल करते दिखाई दिये। घिन आती है यह सोच कर कि यही वो पत्रकार बिरादरी है जिसके कंधों पर सच लिखने और दिखाने की ज़िम्मेदारी है पर भड़वागिरी में लिप्त हैं। मेरा भाजपा के नेतृत्व से भी सवाल है कि ऐसे आयोजनों से क्या साबित करना चाहते हैं? प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के लिये तो यही अच्छा है कि प्रेस जनता के सवाल प्रधानमंत्री के सामने रखे और देश का प्रधानमंत्री उनके जबाव देकर उसे आश्वस्त करे। बड़े से बड़े देश का मुखिया भी मीडिया के सवालों के जबाव देने को बाध्य होता है। अपने देश में पता नहीं क्यों, देश का प्रधानमंत्री बनते ही ‘मौन’ हो जाता है। ऐसी चुप्पी से किसी का भला नहीं होने वाला, पब्लिक सब समझती है और उसे जबाव देना भी आता है, बस उपयुक्त समय की तलाश में रहती है।

मोदी संग अपनी सेल्फी फेसबुक पर अपलोड करने वाले पत्रकार को यशवंत ने अनफ्रेंड किया

Yashwant Singh : मेरे एफबी फ्रेंड लिस्ट में मौजूद पत्रकार निशांत राय ने पीएम के साथ सेल्फी की दो तस्वीरें अपने एफबी वॉल पर डाली हैं. मैंने उन्हें अनफ्रेंड किया और फिर ये कमेंट किया : ”मैं आपको अनफ्रेंड करता हूं. टीवी पर दिख रहा था कि सेल्फी के लिए लोग मरे जा रहे थे. शेम शेम. एक रचनात्मक दर्प व्यक्तित्व में नहीं हो तो फिर क्या कंटेंट और क्या मार्केटिंग. सब बराबर है. बाकी ये लिखा है आज के सेल्फीमार पत्रकारिता और प्रेस टी ट्यूट पत्रकारों पर. https://www.facebook.com/yashwantbhadas/posts/925675474184193

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ये तो फिल्म है पूरी की पूरी… ‘सेल्फी विद पीएम’… इस पर काम होना चाहिए

ये तो फिल्म है पूरी की पूरी। ‘सेल्फी विद पीएम।’ इस पर काम होना चाहिए। एक लाइट कॉमेडी फिल्म। पत्रकारों की आपस में तकरार। एडिटर और रिपोर्टर के बीच का फसाद। पहली सेल्फी किसकी? हो सके तो मारम मार। जमकर जूतम पैजार। एसपीजी और यहां तक कि एनएसए पर भी पत्रकारों के ‘सेल्फी जुनून’ का आतंक। एक रात पहले पीएमओ में आपात बैठक। मुद्दा ये कि पीएम को पत्रकारों से महफूज कैसे रखा जाए। पीएम इन डैंजर! इतनी सटकर सेल्फी ली जाएगी तो फिर तो ‘सिक्योरिटी ब्रीच’ हो गया न। आईबी और रॉ का भी इनपुट देना। फिर नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में इसी ‘सेल्फी’ का जलवा।

इंग्लैंड में मोदी : भारतीय मीडिया कुछ तो छुपा रहा है…

वैसे तो मोदी जी की विदेश यात्रायें आपका सुख चैन खबर बाखबर सब नियंत्रित कर लेती हैं, आप चाह कर भी मोदीमय होने से बच ही नहीं सकते। सारे चैनल उनका ही मुखड़ा दिखाते मिलते हैं और सारे अख़बार उन्हीं पर न्योछावर। सोशल मीडिया पर भी वही छाये रहते हैं पक्ष हो या विपक्ष! पर इस बार यह सब होते हुए भी कुछ और भी है जिसकी परदेदारी तो है पर वह परदे में समा नहीं रहा! इस बार लंदन में मोदी का भारी विरोध हुआ और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में और सोशल मीडिया में उसने खासी हलचल पैदा की।

बीते दो दशकों में मीडिया की दशा-दिशा में आए बदलावों का वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल द्वारा विस्तृत विश्लेषण

मीडिया के बदलते रुझान-1 : इन नवकुबेरों ने मिशन शब्द का अर्थ ही पागलपन कर दिया

 

अगर हम मीडिया के रुझान में आये बदलाव के लिए कोई विभाजन-रेखा खींचना चाहें तो वह विभाजन-रेखा है सन 1995. नरसिंह राव सरकार के वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के परिणामस्वरूप अख़बारी दुनिया में व्यापक परिवर्तन हुए. पहला बदलाव तो यह आया कि सम्पादक नाम की संस्था दिनोदिन कमज़ोर होती चली गयी, और अन्ततः आज सम्पादक की हैसियत महज एक मैनेजर की रह गयी है.

बिहार की जनता ने इस मीडिया को भी हरा दिया है

भरोसा खोने के एक समान क्रम में इस चुनाव में भाजपा के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भी हार हुई है। अपने एक मित्र ने हताशा में सुबह 9 बजे से पहले ही टीवी बंद कर दिया। मुझे ये कहने की छूट दें कि मैं जरा समझदार निकला और अन्य चैनलों की तुलना में राज्य सभा टीवी पर ज्यादा ध्यान रखा। ये खबर पहले ही आ चुकी थी कि एक चैनल ने एक सर्वे को इसलिए प्रसारित नहीं किया क्योंकि वह महागठबंधन को भारी बहुमत बता रहा था।

सीएनएन-आईबीएन ने बिहार पर अपना सर्वे अपने आकाओं अंबानी व मोदी की नाराजगी की आशंका के चलते नहीं दिखाया?

गुरुवार की शाम से देश के सभी न्यूज चैनल बिहार चुनाव में एक्जिट पोल दिखाने में जुटे हुए थे, लेकिन देश का एक नामी अंग्रेजी चैनल सीएनएन-आईबीएन दूसरों के सर्वे चला-दिखा कर काम चला रहा था। ऐसा नहीं था कि चैनल ने सर्वे नहीं कराया था। अंदर की खबर ये है कि सीएनएन-आईबीएन ने सर्वे एजेंसी एक्सिस से बिहार चुनाव में एक्जिट पोल का सर्वे करवाया था।