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सुख-दुख

कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर कर पत्रकारिता न ही करें तो अच्छा

बस्ती। कुछ पत्रकार साथी कुछ रुपए के लिए अपना ईमान बेचने से पीछे नहीं हटते हैं। मैं मानता हूँ कि कोई भी मीडिया संस्थान इतना रुपया नहीं देता कि पेट्रोल तक का खर्च निकल सके। पैसा लेना गलत नहीं है। आज कल बिना पैसे का कुछ नहीं होने वाला है। लेकिन कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर जाना शोभनीय नहीं है, कुछ पत्रकार साथी तो ऐसे है की 100 रु भी मांग लेते है, क्या करे वो भी मज़बूरी है परिवार और बाल – बच्चे का खर्च भी इसी पत्रकारिता से चलाना पड़ता होगा।

<p>बस्ती। कुछ पत्रकार साथी कुछ रुपए के लिए अपना ईमान बेचने से पीछे नहीं हटते हैं। मैं मानता हूँ कि कोई भी मीडिया संस्थान इतना रुपया नहीं देता कि पेट्रोल तक का खर्च निकल सके। पैसा लेना गलत नहीं है। आज कल बिना पैसे का कुछ नहीं होने वाला है। लेकिन कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर जाना शोभनीय नहीं है, कुछ पत्रकार साथी तो ऐसे है की 100 रु भी मांग लेते है, क्या करे वो भी मज़बूरी है परिवार और बाल - बच्चे का खर्च भी इसी पत्रकारिता से चलाना पड़ता होगा।</p>

बस्ती। कुछ पत्रकार साथी कुछ रुपए के लिए अपना ईमान बेचने से पीछे नहीं हटते हैं। मैं मानता हूँ कि कोई भी मीडिया संस्थान इतना रुपया नहीं देता कि पेट्रोल तक का खर्च निकल सके। पैसा लेना गलत नहीं है। आज कल बिना पैसे का कुछ नहीं होने वाला है। लेकिन कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर जाना शोभनीय नहीं है, कुछ पत्रकार साथी तो ऐसे है की 100 रु भी मांग लेते है, क्या करे वो भी मज़बूरी है परिवार और बाल – बच्चे का खर्च भी इसी पत्रकारिता से चलाना पड़ता होगा।

बृजकिशोर सिंह डिम्पल के राज्यमंत्री बनने के बाद उनका जनपद में प्रथम आगमन आज हुआ। इसका इन्तजार सपा कार्यकर्ता कम हमारे कुछ पत्रकार साथी बहुत बेसब्री से कर रहे थे। जैसे ही बृजकिशोर सिंह का काफिला उनके आवास के लिए निकला, पत्रकार साथी उनको बधाई देने उनके चगेरवा (महसों) स्थित आवास तक पहुँच गए। बधाई तो दे दिया लेकिन डटे रहे की सलामी तो ठोक दिया, अब कुछ इनाम (रुपया) भी मिल जाए तो अच्छा होता। जैसे ही हमारे पत्रकार भाइयों को इनाम मिला, वहां से चलते बने।

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पत्रकार की एक गरिमा और एक लक्ष्मण रेखा होती है, जिसे उसे पार नहीं करना चाहिए। मैं सभी की बात नहीं कर रहा हूँ। कुछ ही साथी ऐसे हैं जिनकी ऐसी हरकतों की वजह से हम सबकी छवि खराब होती है। मैं भी ईमानदार नहीं हूँ और होना भी नहीं चाहिए नहीं तो भूखे मर जाएंगे। बस अनुरोध है कि तय कर लें कि कितना नीचे गिरना है। इतना नीचे गिरकर तो पत्रकारिता न ही करें।

ये मेरी अपनी सोच है. किसी को बुरा लगा हो तो हमे क्षमा करें.

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विवेक पाल
बस्ती यूपी
9670291001
[email protected]

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