कृपा शंकर सिंह और अरविंद केजरीवाल : एक ही देश में दो अलग-अलग नेताओं के लिए दो विधान क्यों?

Yashwant Singh : महाराष्ट्र में अरबों रुपये अवैध तरीके से उगाहने के आरोपी कांग्रेसी नेता कृपा शंकर सिंह के खिलाफ इसलिए मुकदमा नहीं चलता और वो कोर्ट से बरी हो जाते हैं कि उनके खिलाफ जांच कर रही एजेंसियों को आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति विधानसभा अध्यक्ष ने नहीं दी. Continue reading

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करोड़ों ‘कमाने’ वाले इस नेता पर यूं बरसी कोर्ट की ‘कृपा’!

विधानसभा अध्यक्ष ने जांच एजेंसियों को आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति नहीं दी इसलिए कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामलों से कृपा शंकर सिंह और उनके परिजनों को कर दिया बरी….

क्या आपको पता है कि मुम्बई के कांग्रेसी नेता और तत्कालीन एमएलए कृपा शंकर सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल करने के लिए जब कई केंद्रीय और राज्य एजेंसियों ने नियम पालन करते हुए विधानसभा अध्यक्ष से मंजूरी मांगी तो उन्होंने इनकार कर दिया। इसी के बाद कोर्ट ने कृपा शंकर समेत उनके सभी आरोपी परिजनों को बरी कर दिया। Continue reading

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दागी आईएएस सत्येंद्र सिंह पर मेहरबान योगी सरकार

यूपी की योगी सरकार दागी आईएएस सत्येंद्र सिंह पर मेहरबान है. यही कारण है कि इस भाजपा सरकार में इस घोटालेबाज अफसर के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई है. आईएएस सत्येंद्र सिंह एनआरएचएम घोटाले के भी आरोपी हैं. वे अब भी एक बड़े पद पर तैनात हैं.  सत्येंद्र सिंह जब एनआरएचएम में जीएम हुआ करते थे तो उन्होंने काफी खेल किए. इसी कारण उन्हें आरोपी बनाया गया. सीबीआई जांच के दौरान सत्येंद्र सरकारी गवाह बन गए. इसी कारण उनके खिलाफ चलने वाली सभी जांच ठंढे बस्ते में डाल दी गई. पर क्या सरकारी गवाह बनने से गुनाह माफ़ हो जाते हैं?

बताया जाता है कि सत्येंद्र सिंह के गोमती नगर विस्तार, विपुल खंड, फन मॉल के पास अरबों रुपये कीमत के आवास हैं. सत्येंद्र सिंह का किडजी नाम का एक स्कूल भी है. इसके अलावा नोएडा सहित देश भर के कई शहरों में आलीशान बंगले, फ्लैट्स और बेशकीमती ज़मीनें हैं. आयकर विभाग के पास भी इस दागी अफसर की पूरी डिटेल है लेकिन कोई अदृश्य ताकत इस अफसर पर हाथ डालने से रोकती है.

एक दफे सत्येन्द्र कुमार सिंह के छह शहरों में स्थित ठिकानों पर आईटी अफसरों ने छापा मारा था. तब लाखों रुपया कैश और अरबों की संपत्ति मिली थी. विभाग के पास सूचना थी कि सत्येंद्र के पास ठीकठाक काला धन है. आयकर अफसरों की 22 अलग-अलग टीमों ने लखनऊ, मेरठ, बागपत, मैनपुरी, ग्रेटर नोएडा, दिल्ली आदि में सत्येंद्र के सभी ठिकानों पर एक साथ छापे मारे थे. वैसे तो योगी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की बात करती है लेकिन सत्येंद्र के मामले में साफ दिख रहा है कि भ्रष्टाचारी को बचाया जा रहा है. आईएएस सत्येंद्र सिंह पशुधन विभाग में विशेष सचिव के पद पर जमे हुए है. देखना है कि योगी सरकार में भी इस अफसर का बाल बांका होता है या पहले जैसा जलवा कायम रहेगा.

लखनऊ से भड़ास संवाददाता सुजीत कुमार सिंह ‘प्रिंस’ की रिपोर्ट.

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योगी राज में युवा उद्यमी के संघर्ष को मिली जीत, करप्ट अफसरों का गिरोह हारा

Ashwini Kumar Srivastava : योगी राज में देर तो है….अंधेर नहीं! क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ मेरे जीवन का अब तक का सबसे बेहतरीन तोहफा लेकर आये हैं…और वह है, सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार में फंसकर ढाई बरस की भयंकर देरी से तकरीबन दम ही तोड़ चुके हमारे आवासीय प्रोजेक्ट की मंजूरी। ईश्वर की कॄपा से अब हमारे मार्ग की हर वह बाधा दूर हो चुकी है, जिनसे घिर कर हम न जाने कितनी मुश्किलों में आन फंसे थे। हालांकि शासन को भी सुनवाई आदि प्रक्रिया में लगभग ढाई महीने का समय जरूर लगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के शिकायत तंत्र ने अंतत: मुझे न्याय दिलवा ही दिया। ढाई बरस से जिस फ़ाइल को सरकारी तंत्र में बैठे एक भ्रष्ट अफसर ने बिना किसी की परवाह किये रोक रखा था, उसे आखिरकार मजबूर होकर, बेमन से और बिना एक भी दमड़ी की घूस लिए ही मंजूर करके मुझे देना ही पड़ गया।

मेरे द्वारा की गई इस अफसर की शिकायत को पीएमओ और चीफ मिनिस्टर आफिस ने सही पाते हुए मेरे हक में यह फैसला दिया है….और वह भी बिना किसी सोर्स सिफारिश के या बिना एक भी पैसे की घूस दिए हुए ही। इसलिए अब मैं अपनी ही कही हुई बात में सुधार करते हुए यह स्पष्ट कर रहा हूँ कि योगी राज में देर तो है, पर अंधेर नहीं….कम से कम मेरे लिए तो अब नहीं है। जिस तरह मैंने एक आम नागरिक की ही तरह अपने हक की यह लड़ाई लड़ी थी और केंद्र व राज्य सरकार के सुनवाई तंत्र ने उस पर मुझे न्याय दिलवाया है, उससे मुझे अब यह उम्मीद जग गयी है कि कोई भी व्यक्ति इस सरकार में भ्रष्टाचार या किसी भी अन्य अन्याय आदि के खिलाफ बिना किसी हिचक और भय के लड़ाई लड़ सकता है।

इस लड़ाई में खुल कर मेरा साथ देने वाले Bhadas4media के Yashwant Singh का तो मैं दिल से बहुत ज्यादा आभारी हूँ। जिस समाज में ज्यादातर लोग खुद के खिलाफ हुए अन्याय या भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं खड़े हो पाते, उस समाज में यशवंत जी जैसे लोग भी हैं, इस पर मुझे आज भी यकीन ही नहीं होता…लेकिन यह मैंने न सिर्फ अपने मामले में बल्कि हमेशा देखा है कि यशवंत जी मेरे जैसे न जाने कितने अंजान लोगों के साथ अन्याय के खिलाफ जंग में एक ऐसा बिगुल बनकर बनकर साथ खड़े हो जाते हैं, जिससे हर अन्यायी की रूह तक कांप जाती होगी।

इस कामयाबी तक पहुंचने में मेरे माता-पिता का आशीर्वाद तो हमेशा ही निस्वार्थ रूप से मेरे साथ रहा है लेकिन एक और शख्सियत ऐसी हैं, जिनके आशीर्वाद के बिना मेरा यहाँ तक पहुंच पाना नामुमकिन था। वह हैं डीएवी के पूर्व प्रॉक्टर और लखनऊ के बेहद सम्मानित व रसूखदार इंसान श्री राम शंकर तिवारी ‘दादा’। वैसे तो उनका सहयोग व आशीर्वाद बचपन से ही मुझे हमेशा ही मिलता आया है। लेकिन नौकरी छोड़कर रियल एस्टेट में उतरने के बाद अगर मैं कहीं कुछ भी हासिल कर पाया हूँ तो वह सिर्फ दादा की ही बदौलत है।
जापान में रह रहे मेरे बड़े भाई को उनकी बहुत छोटी सी उम्र से ही ‘दादा’, उनकी पत्नी, जिन्हें हम बुआ जी कहते हैं, और उनके समूचे परिवार ने हमेशा पुत्रवत स्नेह दिया है। भैया की ही वजह से दादा व उनके परिवार ने मुझे भी हमेशा अपने परिवार का ही एक अंग माना है। दादा का जिक्र मैंने इससे पहले कभी नहीं किया क्योंकि ऐसा करके मैं कभी भी यह एहसास नहीं दिलाना चाहता हूँ कि उन्होंने अब तक जो भी मेरे लिए किया, उसका ऋण मैं सिर्फ धन्यवाद कहकर या आभार जताकर ही चुका दूंगा।

दरअसल, माता-पिता और भाई-बहनों यानी अपने परिवार के बाद दादा के ही एहसानों का ही ऐसा ऋण मुझपर चढ़ गया है, जो मैं शायद कभी चुका ही न पाऊं। बहरहाल, मुझ पर अपनत्व की बारिश करने वाले और दिल से मेरा भला सोचने वाले हर उस शख्स का मैं शुक्रगुजार हूं, जो मुझसे दूर है या मेरे कहीं आस-पास ही है। मैं जानता हूँ कि खुशी की इस घड़ी में सबका नाम लेकर आभार व्यक्त कर पाना अभी संभव नहीं है लेकिन जुबां पर नाम भले ही न आ पाया हो लेकिन मेरा अजीज और खैरख्वाह हर इंसान हमेशा मेरे दिल में बसता है…और सबको पता है कि मैं दिल से जिसको मानता हूँ, उसका जिक्र सबके सामने करूँ न करूँ, उसे हमेशा सर माथे पर ही बिठाकर रखता हूँ। ईश्वर की अनुकंपा, परिजनों व मित्रों समेत आप सबका स्नेह और बड़ों का आशीर्वाद मुझ पर हमेशा यूँ ही बना रहे, बस यही कामना करता भी रहता हूँ।

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. अश्विनी दिल्ली में नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे बड़े अखबारों में लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद कई साल से यूपी की राजधानी लखनऊ में बतौर रीयल इस्टेट उद्यमी सक्रिय हैं.

पूरा प्रकरण है क्या… इसे विस्तार से जानने-समझने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें….

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करप्शन किस कदर हमारे खून में समाया है, समझा रहे हैं आजतक के पत्रकार विकास मिश्र

Vikas Mishra : मेरे एक मित्र अभी एक शहर में एसपी सिटी हैं। एक रात जब हम मिले, चर्चा छिड़ी तो उन्होंने कहा-‘भाई मैं तो बस ईमानदारी से काम कर रहा हूं, कोई तीन-पांच नहीं।’ मुझे लगा कि शायद मोदी के प्रभाव में ईमानदार हो गए हैं। बात बढ़ी तो वो बोले-‘किसी को सताकर नहीं कमाना है भाई, बिना पैसे दिए पोस्टिंग मिली है, मैं तो बाहर का पैसा छूता नहीं हूं, बस महीने के जो ढाई-तीन लाख बंधे हुए आते हैं, उसी से काम चलाता हूं।’

ये यूपी के पुलिस अफसर की वो ‘ईमानदारी’ की कमाई है, जब वो कुछ भी न करे, तो तनख्वाह के अलावा महीने का ढाई-तीन लाख रुपये बन जाता है। ये सिस्टम है। पिछले साल 8 नवंबर को जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो मेरे एक बेहद करीबी सज्जन बड़ी परेशानी में आ गए। दिक्कत ये थी कि उन्होंने अपने छोटे भाई की एक स्कूल में सरकारी नौकरी की बात कर रखी थी। अफसर को 7 लाख रुपये रिश्वत में देना था। नोटबंदी आ गई। खातों से निकासी की नसबंदी हो गई। अफसर न तो चेक लेने को तैयार और न ही ऑनलाइन पेमेंट। आखिरकार उसने पूरा पैसा नकद लिया।

हैरान मत होइए। ताजा हाल सुनिए। मेरे एक परिचित का बहुत बड़ा मेडिकल कॉलेज है। एमबीबीएस की 150 सीटें थीं, लेकिन पिछले दिनों मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने घटाकर 100 सीटें कर दीं। अब फिर से 50 सीटें बढ़ाने के लिए अफसरशाही ने कितनी रिश्वत की मांग की है, आप जानते हैं..? पूरे 6 करोड़ रुपये। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार बोलते-बोलते मुंह से चाहे जितना झाग फेंक लें, लेकिन इस सिस्टम का दीमक ऐसा है, जिसके लिए उनके पास कोई पेस्ट-कंट्रोल नहीं है।

भ्रष्टाचार देश की आत्मा में बस चुका है। भ्रष्टाचार कायदा है, भ्रष्टाचार कानून है। कुछ साल पहले नौगढ़ में मैंने जमीन का छोटा सा टुकड़ा खरीदा था। रजिस्ट्री करवाने वाले वकील मेरे एक मामा ही थे। उन्होंने रजिस्ट्री चार्ज के अलावा 4 हजार रुपये की और डिमांड की। बताया कि रजिस्ट्रार को देना पड़ता है। मैंने कहा-कौन सा सरकारी अफसर है जो मुझसे रिश्वत ले लेगा? मामा बोले-ये रिश्वत नहीं, बस यूं ही मिठाई खाने के लिए लोग दे देते हैं। मैंने कहा, चलिए रजिस्ट्रार से बात मैं करूंगा। मामा बोले-तुम तो नहीं दोगे, चले जाओगे, दुकानदारी हमारी खराब होगी। खैर, मैंने रिश्वत नहीं दी, काम भी हो गया, रजिस्ट्रार साहब दांत निपोरे देखते रहे।

मैं एक पत्रकार के अलावा एक मध्यमवर्गीय गृहस्थ भी हूं। मेरा पासपोर्ट मेरे पते पर पहुंचा, डाकिया मिठाई के नाम पर 100 रुपये ले गया। इसके बाद मेरी पत्नी, मेरे बेटे और मेरी भानजी का पासपोर्ट बनने की बारी आई। मेरा मामला तो तत्काल का था, क्योंकि विदेश यात्रा पहले फाइनल हुई, पासपोर्ट बाद में बना। खैर, इन्क्वायरी के लिए पुलिस वाले आए, फिर एलआईयू वाले और आखिर में पासपोर्ट लेकर डाकिया आया। पुलिस वाले अगर पेपर में कुछ भी दाएं-बाएं लिख दें तो पासपोर्ट नहीं बनेगा, बनकर आ भी गया तो डाकिया गायब भी कर सकता है। कौन सी उस पर कार्यवाही हो जाएगी। सबका ‘मिठाई’ का रेट बंधा है। तो बाकी के तीनों पासपोर्ट में हर चुंगी पर मिठाई के लिए पैसे पकड़ाए गए, क्योंकि डर था कि अगर इन्हें पैसे नहीं मिले तो पासपोर्ट नहीं मिलेगा।

भ्रष्टाचार का हाल तो ये है कि जब तक अफसर, थानेदार पैसे न पकड़ ले, लोगों को भरोसा ही नहीं होता कि उसका काम हो जाएगा। कभी थाने में जाइए रिपोर्ट लिखाने तो आपको अनुभव होगा कि आप फरियादी नहीं बल्कि मुल्जिम है। अक्सर पुलिस वाले फरियादी को क्लाइंट समझते हैं, फरियादी अपनी व्यथा सुनाता है, पुलिस वाला सोचता है कि इससे पैसे कैसे ऐंठें, क्योंकि अक्सर जालिम पैसे वाला होता है और पीड़ित गरीब। ऐसे में गरीब पैसे कहां से लाएगा, लिहाजा पुलिस पैसे वाले से मिल जाती है। पत्रकारीय जीवन में मैंने ऐसी कई घटनाएं देखी हैं, कई लोगों को इंसाफ भी दिलाया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक थाने में मेरे एक जानने वाले कुछ महीने पहले थानेदार बनकर आए हैं। पता नहीं किसकी कृपा से उन्हें वो थाना मिल गया, जहां से एक थानेदार ने तो 13 महीने में चार करोड़ रुपये कमा लिए थे। खैर, वो भाई साहब पुलिस में भी अनोखेलाल हैं, तनख्वाह से काम चलाना चाहते हैं। थाने से भाग निकलने की जुगत भिड़ा रहे हैं। उस थाने में होता ये था कि पहले एक पार्टी रिपोर्ट दर्ज करवाती थी, फिर दूसरी जबरन रिपोर्ट दर्ज करवाती थी। फिर थानेदार समझौता करवाता था, मोटी रकम पीटता था। वो इलाका है भी धन्नासेठों का। हमारे ये परिचित परेशान हैं, कहते हैं कि कमाई बहुत है यहां, लेकिन भाई साहब, मैं तो यहां से भागना चाहता हूं। कभी पॉलिटिकल प्रेशर बनाने वाले फोन आते हैं तो कभी पैसे लेकर गलत काम करने का ऑफर।

ये तो इस सिस्टम के चंद उदाहरण है, भ्रष्टाचार से तो हर किसी का रोजाना सामना होता रहता है। इस सड़े हुए सिस्टम को कौन कहां से सुधारेगा, डिजिटल क्रांति आई, ऐलान हुआ कि भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा, डिजिटल सिस्टम नया है, लेकिन सिस्टम में बैठे लोग तो वही हैं। इस सिस्टम का समाज से बड़ा पुराना याराना है। आज भी पिता अपनी बेटियों की शादी करने के लिए लाखों की सैलरी पीटने वाले प्राइवेट सेक्टर वालों पर सरकारी नौकरी वाले क्लर्क को तरजीह देते हैं।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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यूं महाभ्रष्ट बना दी गईं नीरा यादव!

Dayanand Pandey : कभी थीं नीरा यादव भी ईमानदार जब वह नीरा त्यागी हुआ करती थीं। उन की ईमानदारी के नाम पर चनाजोर गरम बिका करता था। उन दिनों जौनपुर में डी एम थीं। उन के पति त्यागी जी सेना में थे। 1971 के युद्ध में खबर आई कि वह वीरगति को प्राप्त हुए। नीरा यादव ने महेंद्र सिंह यादव से विवाह कर लिया। तब यादव जी डी आई जी थे। लेकिन बाद में त्यागी जी के वीरगति प्राप्त करने की खबर झूठी निकली। पता चला वह युद्ध बंदी थे। बाद के दिनों में वह शिमला समझौते के तहत छूट कर पाकिस्तान से भारत आ गए। नीरा यादव से मिलने गए तो वह उन से मिली ही नहीं। उन्हें पति मानने से भी इंकार कर दिया। त्यागी जी भी हार मानने वालों में से नहीं थे। डी एम आवास के सामने धरना दे दिया। कहां तो नीरा यादव के नाम से ईमानदारी का चनाजोर गरम बिकता था, अब उन के छिनरपन के किस्से आम हो गए। खबरें छपने लगीं। किसी तरह समझा बुझा कर त्यागी जी को धरने से उठाया गया। जाने अब वह त्यागी जी कहां हैं, कोई नहीं जानता।

पर महेंद्र सिंह यादव ने नीरा यादव को अपनी ही तरह भ्रष्ट अफसर बना दिया। बाद के दिनों में मुलायम सिंह यादव की भी वह ख़ास बन गईं। मुलायम ने उन के भ्रष्ट होने में पूरा निखार ला दिया। अब नीरा यादव को आई ए एस अफसर ही महाभ्रष्ट कहने लगे। दुनिया भर की जांच पड़ताल होने लगी। मेरी जानकारी में नीरा यादव अकेली ऐसी आईएएस अफसर हैं जिन के भ्र्रष्टाचार की जांच के लिए बाकायदा एक न्यायिक आयोग बना। जस्टिस मुर्तुजा हुसैन आयोग। मुर्तुजा साहब ने नीरा यादव को दोषी पाया। शासन को रिपोर्ट सौंप दी। लेकिन किसी भी सरकार ने उस जांच रिपोर्ट पर पड़ी धूल को झाड़ने की नहीं सोची। हर सरकार में नीरा यादव की सेटिंग थी। बाद के दिनों में तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपना मुख्य सचिव भी बना लिया था। अदालती हस्तक्षेप के बाद उन्हें हटाना पड़ा। अब वह बाकायदा सज़ायाफ्ता हैं। और सब कुछ सब के सामने है।

लेकिन दो बात लोग नहीं जानते। या बहुत कम लोग जानते हैं। एक यह कि नीरा यादव की दो बेटियां हैं। दोनों विदेश में हैं। नीरा यादव सारी काली कमाई बेटियों को भेज चुकी हैं । बेटियों की पढ़ाई लिखाई भी विदेश में हुई और दोनों बेटियां वहां की नागरिकता ले कर मौज से हैं। दूसरे , डासना जेल में वह वी आई पी ट्रीटमेंट के तहत हैं। बैरक में वह नहीं रहतीं, स्पेशल कमरा मिला हुआ है, उन्हें। तीसरे डासना जेल ट्रायल कैदियों के लिए है, सज़ायाफ्ता के लिए नहीं। बाकी सरकार जाने और नीरा यादव। वैसे नीरा यादव भजन सुनने की खासी शौक़ीन हैं, खास कर अनूप जलोटा की तो वह बहुत बड़ी फैन हैं। हां, व्यवहार में वह अतिशय विनम्र भी हैं। कम से कम मुझ से तो वह भाई साहब, प्रणाम कह कर ही बात करती रही हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर नीरा यादव के जीवन में महेंद्र सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव नहीं आए होते तो शायद हम नीरा यादव को एक ईमानदार आई ए एस अफसर के रूप में आज जान रहे होते। कह सकता हूं कि नीरा यादव अपने को चंदन बना कर नहीं रख पाईं, भुजंगों के प्रभाव में आ कर विषैली और भ्रष्ट बन कर रह गईं। अफ़सोस!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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मेधावी छात्रों का हक लूटने वाला भ्रष्टाचारी अनिल यादव अब अपने कुकर्मों की सजा भुगतेगा : शलभ

सक्रिय पत्रकारिता में रहते हुए यूं तो कई यादगार खबरें की, इन खबरों से तमाम पीड़ितों को इंसाफ भी मिला और गुनाहगारों को सजा भी. यकीन मानिए जब ऐसी खबरें अपने मुकाम तक पहुंचती है तो एक पत्रकार को भी वैसे ही सुख की अनुभूति होती है जैसे एक पीड़ित को इंसाफ मिलने पर. ऐसी ही थी यूपी लोकसेवा आयोग के भ्रष्टाचार की खबर. खुद भी प्रतियोगी छात्र रहा हूं. सिविल की तैयारियां की है. इसीलिए एक सामान्य परिवार के बेरोजगार का दर्द जानता हूं. उसकी आंखों में पलने वाले सपनों और माता-पिता, रिश्तेदारों की उम्मीदों का बोझ महसूस कर सकता हूं.

मैंने देखा है कि कैसे एक वक्त की रोटी का जुगाड़ ना कर पाने वाले मां बाप भी किस तरह बच्चों को अफसर बनाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देते हैं. ऐसे ही कुछ बच्चे आपको इलाहाबाद में सीढियों के नीचे बने छोटे छोटे कमरों में पढते हुए मिल जाएंगे. इन बच्चों की पीड़ा दिखती है मुझे. इसीलिए अंग्रेजों के जमाने में बनी ख्यातिलब्ध संस्था यूपी लोकसेवा आयोग को भ्रष्टाचार का कारखाना बनते देखा नहीं गया. सिलसिला शुरू हुआ आयोग के चेयरमैन अनिल यादव की नाकाबिलियत उजागर करने से और जा पहुंचा भर्तियों में साक्षात्कार के नाम पर होने वाले खेल के खुलासे तक.

इलाहाबाद में छात्र आंदोलनरत थे. जगह जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. इन सबके बीच भ्रष्टाचार के आरोपी अड़ियल चेयरमैन की अगुवाई में एक बार फिर पीसीएस प्री की परीक्षाएँ शुरू हो चुकी थीं. इसी दौरान एक दिन देर रात एक प्रतियोगी छात्र का फोन आया. उसने जो जानकारी दी वो हैरान करने वाली थी. उसके मुताबिक कल सुबह होने वाली पीसीएस की परीक्षा का पेपर बाजार में आ चुका था.  पैसे लेकर व्हाट्सऐप पर भेजा जा रहा था. हम और वो छात्र सक्रिय हुए तो कुछ ही देर में ये पेपर हम दोनों के व्हाट्सऐप पर भी था.

खबर चलाने में एक बड़ा संकट था. संकट इस बात का कि क्या गारंटी है कि पेपर सही है या गलत. खबर चला दी जाए और व्हाट्सऐप पर आया पेपर सही ना निकले तो अनावश्यक भ्रम फैलेगा. लिहाजा तय किया गया कि इम्तेहान शुरू होते ही पेपर की जांच कराई जाए. मैने रात भर जागते हुए सुबह होने का इंतजार किया. ये एक बड़ा मामला था लिहाजा आंखों से नींद गायब थी. सुबह होते ही मैने व्हाट्सऐप पर आया पेपर तत्कालीन डीजीपी श्री एके जैन और तत्कालीन एसटीएफ आईजी श्री सुजीत पाण्डेय को भेज दिया. इस अनुरोध के साथ कि कृपया इस पेपर की जांच अपने स्तर से कराएं.

परीक्षा शुरू हुई और पेपर मिलान के बाद थोड़ी ही देर में ये साफ हो गया कि पेपर लीक हो चुका है. प्रशासन से पुष्टि होते ही मैंने आईबीएन7 पर ये खबर ब्रेक कर दी. दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर, लखनऊ के अलीगंज और इलाहाबाद के तमाम हास्टलों से हमने इस खबर पर छात्रों के साथ लाइव शो किए. पर हद तो तब हुई जब ये सब करने के बावजूद चैयरमैन अनिल यादव ये मानने को तैयार नहीं थे कि पेपर लीक हुआ है. ये भी हो सकता है कि खुद इस खेल में शामिल होने का दंभ उनको ऐसा करने से रोक रहा था.

प्रशासन की रिपोर्ट और चौतरफा दबाव के बाद लोकसेवा आयोग को ये परीक्षा रद्द करनी पड़ी. बाद में अदालत ने अनिल यादव को बर्खास्त भी कर दिया. बाद में इस ख़बर के बदले अनिल यादव की तरफ से दर्जनों नोटिसें और कुछ मुकदमे मिले. पर इन बातों से तो कभी कोई दिक़्क़त रही ही नहीं. अब जबकि योगी जी अगुवाई में सरकार ने यूपी लोकसेवा आयोग की भर्तियों की सीबीआई जांच कराने का ऐलान किया है तब मैं बधाई देना चाहूंगा उन तमाम छात्रों को जो इंसाफ के लिए लड़ते रहे, पिटते रहे और कई तो जेल भी जाते रहे. अनिल यादव की अगुवाई में आयोग ने तमाम मेधावी बच्चों का हक लूटा है लेकिन अब वक्त आ गया है अनिल यादव को अपने कुकर्मों की सजा भुगतने का.

शलभ मणि त्रिपाठी
स्वतंत्र पत्रकार
प्रदेश प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी
लखनऊ

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एक सामान्य इंजीनियर यूपी में कैसे बन गया अरबपति… जानिए महाभ्रष्टाचारी अरुण मिश्र की कहानी

भ्रष्ट अफसरों की पोषक उत्तर-प्रदेश की कोख से उत्पन्न एक मुख्य अभियन्ता अपने पद का दुरुपयोग कर अरबों की परियोजनाओं से करोड़ों की हेरा-फेरी कर अपना घर भरता रहा। काली करतूतों से कमाई गयी दौलत से चन्द वर्षों में ही यूपी और दिल्ली जैसे शहरों में अनगिनत जमीन-जायदाद का मालिक भी बन गया। आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की तरफ से जांच हुई तो भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ। लगभग छह माह तक जेल की सलाखों के पीछे रहे फिर भी तत्कालीन अखिलेश सरकार की आंख का तारा बने रहे। उपहार स्वरूप दोबारा उसी जगह पर तैनाती भी दे दी गयी।  Continue reading

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मीडिया ने बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को चुनावी लड़ाई से बाहर कर दिया!

Ashwini Kumar Srivastava : अद्भुत है मीडिया और उसमें काम कर रहे तथाकथित पत्रकार। वरना बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को ही इस बार के चुनाव में लड़ाई से बाहर कैसे कर देता! वैसे मुझे तो इसका कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि एक दशक से भी ज्यादा वक्त तक दिल्ली और लखनऊ में देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार नौकरी करने के बाद मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ख़बरें और सर्वे कैसे बनाये-बिगाड़े जाते हैं। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण भी मैं अपने ही निजी अनुभव से आगे बताऊंगा। लेकिन सबसे पहले बात बसपा और मायावती की करते हैं।

मेरा ही नहीं, प्रदेश के तमाम ऐसे लोगों का मानना है कि इस बार चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष है और बसपा की सरकार आने की सम्भावना भी उतनी ही प्रबल है, जितनी मीडिया बाकियों की बता रहा है। मैंने खुद लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ढेरों लोगों से राजनीतिक चर्चा में इस बात को महसूस किया है। मीडिया तो अपने सर्वे और ख़बरों के जरिये ऐसी हवा बना रहा है, मानों लड़ाई सिर्फ सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा के बीच है। मायावती को तो मीडिया चर्चा के ही काबिल नहीं समझ रहा।
सचमुच बेहद शर्मनाक ही कही जायेगी ऐसी पत्रकारिता, जिसमें किसी पत्रकार या संपादक की निजी राय ही खबर या सर्वे बनाकर जनता को पेश किया जाता हो। पत्रकार और मीडिया का काम बिना किसी भेदभाव और लागलपेट के कड़ी से कड़ी आलोचना करना है और उतने ही मुक्त भाव से प्रशंसा भी करना है। सरकार बनाने के लिए पत्रकारों और संपादकों को भी हर भारतीय की तरह वोट की ताकत मिली ही है।

अगर मायावती या बसपा नहीं पसंद तो अपना वोट मत दीजिये उन्हें लेकिन यह क्या तरीका है कि आप अपने जमीर-पेशे को बेचकर फर्जी ख़बरों, फर्जी सर्वे और लेखों के जरिये अपनी राय ही जबरन थोप कर बाकी के वोटरों का भी मन बदलने का कुत्सित और घृणित प्रयास कर रहे हैं?

मैंने मीडिया में अपनी पूरी नौकरी के दौरान इस बात का हमेशा ख्याल रखा कि खबर और सर्वे गढ़ना मेरा काम नहीं है। मैं सिर्फ डाकिया हूँ, जो समाज और देश में घट रहे पल पल के घटनाक्रम को मीडिया के जरिये देश और दुनिया तक पहुंचाने की ड्यूटी कर रहा है। मेरी निजी राय कुछ भी रही हो और मैं किसी भी पार्टी या नेता को वोट देता रहा हूँ लेकिन मैंने अपना वह पक्षपात कभी मीडिया की नौकरी में नहीं घुसेड़ा।

अब मैं वह अनुभव बताता हूँ, जिसके बाद मीडिया आखिर है क्या, मुझे इस सच्चाई का अंदाजा बखूबी हो गया था। मैंने अपना पत्रकारीय करियर टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह में ट्रेनी पत्रकार के तौर पर 2002 में शुरू किया था। उस वक्त मीडिया में हर कहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी के ही मुरीद बैठे थे। फिर आया 2004 में चुनाव का वक्त और प्रमोद महाजन का इंडिया शाइनिंग लेकर मीडिया ने चापलूसी और पक्षपात के रोज नए अध्याय लिखने शुरू कर दिए।

उसी वक्त वाजपेयी जी लाहौर यात्रा पर गए तो साथ ही में हमारे संपादक भी (नाम नहीं लिखूंगा) लाहौर गए।

तब तक महज दो साल में मैं अपने अखबार में अपनी जगह अपने काम से बना चुका था और अखबार का पहला पन्ना तथा उसकी मुख्य खबर यानी लीड, फ्लायर, एंकर, टॉप बॉटम आदि ज्यादातर मुझसे ही एडिट करवाई या एजेंसी आदि की मदद से लिखवाई जाती थी। मैं खुद भी बराबर बिज़नेस आदि रिपोर्टिंग करके पेज वन पर एंकर या किसी न किसी रूप में बाइलाइन लेता रहता था।

बहरहाल, संपादक जी ने टाइम्स समूह के निर्देश पर लाहौर से ही एक स्टोरी की, जिसके लिए मुझे कार्यवाहक संपादक ने अपने केबिन में बुलाया। उन्होंने कहा कि अश्विनी यह स्टोरी बहुत ख़ास है और मालिक लोगों के निर्देश पर की गयी है। इसमें कुछ कटेगा या जुड़ेगा नहीं, इसे सिर्फ आप पढ़ लीजिये। पेज वन पर आज कोई और खबर जाए न जाए लेकिन यह जरूर जाएगा।

खैर, मैंने उसे पढ़ा और हतप्रभ रह गया। उसमें अटल जी की प्रशंसा के अलावा कुछ नहीं था। और, उसमें कई जगह यह लिखा गया था कि अटल जी का कद और लोकप्रियता अब दुनिया में इस कदर बढ़ चुकी है कि भारत में आने वाले लोकसभा चुनाव क्या, अटल जी अगर पाकिस्तान में भी किसी सीट से खड़े हो जाएंगे तो जीत जाएंगे। यह कोई मजाक नहीं था बल्कि बहुत गंभीरता से बाकायदा हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी नेताओं-जनता के कोट के साथ लिखा गया था।

अटल जी को गांधी जैसा विश्वव्यापी व्यक्तित्व बनाने के चक्कर में वह लेख पेज वन पर तो आधे से ज्यादा जगह पर काबिज हो गया बल्कि अंदर भी एक पेज पर उसके शेष भाग ने जगह घेर ली। मैं तो उस वक्त पद और अनुभव में किसी हैसियत में ही नहीं था कि उस लेख पर कोई टीका टिप्पणी भी कर पाता। इसी वजह से मैंने नौकरी धर्म का पालन करते हुए अटल जी की ही महानता पर आधारित एक शीर्षक लगाकर उसको अपने बॉस के पास भेज दिया।

अगले दिन जब लेख छपा तो हमारे ही अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार, जो अब कांग्रेस के बड़े नेता हैं और उन दिनों 10 जनपथ कवर करते थे, उन्होंने आकर बता दिया कि मैडम यानी सोनिया जी इस लेख से बहुत नाराज हैं। लेकिन अटल प्रेम में अंधे हो चुके टाइम्स समूह के मालिकों और पत्रकारों ने उनकी बात पर कान नहीं धरा।

उसके बाद चुनाव में जब नतीजे आने लगे और भाजपा का इंडिया शाइनिंग धूल फांकने लगा…. विश्वव्यापी नेता अटल विहारी वाजपेयी भारत में ही सर्वमान्य नेता नहीं रह गए तो अचानक टाइम्स समूह में हड़कंप मच गया। फिर जैसा कि मुझे वहां रहकर सुनने को मिला कि वही पत्रकार महोदय, जो सोनिया की नाराजगी की खबर लाये थे, उनकी लल्लो चप्पो होने लगी कि किसी तरह मैडम से क्षमा हासिल हो जाए। क्षमा कैसे मिली और कब मिली, ये तो मुझे नहीं पता चला लेकिन नतीजों के आने वाली रात ही उन्हीं सम्पादक ने उतना ही बड़ा-लंबा चौड़ा लेख लिखा, जिसमें राहुल को भारत ही नहीं, दुनिया को राह दिखाने वाला युवा नेता बताया गया। और मुझे ही बुलाकर उसे जब सौंपा गया, तो उस लेख में मैंने भी पूरे श्रद्धा भाव से शीर्षक लगाया ‘राह दिखाएँ राहुल’…

अब यह बात मत पूछियेगा कि राहुल जब 2004 में ही राह दिखा रहे थे तो आज खुद किसी मंजिल तक क्यों नहीं पहुँच पाये। आप तो बस यह देखिये कि मीडिया की खबर, लेख और सर्वे कैसे तैयार होते हैं।

जल्द ही मैं आपको अपनी अगली किसी पोस्ट में अपना एक ऐसा अनुभव भी बताऊंगा, जिससे पता चल जाएगा कि हर पार्टी या नेता के खिलाफ बिना किसी भेदभाव या लागलपेट के आलोचना या प्रशंसा करना कभी कभी कितना खतरनाक होता है।

आज जिन मायावती के समर्थन में मैंने मीडिया पर सवाल खड़े किये हैं, यही मायावती जी ने एक दिन मेरी वजह से हिंदुस्तान टाइम्स समूह के ऊपर 250 करोड़ की मानहानि का न सिर्फ मुकदमा ठोंक दिया था बल्कि मेरे समेत चार पत्रकारों को तुरंत बर्खास्त करने की मांग पर भी अड़ गयीं थीं। यह पूरा किस्सा भी मैं विस्तार से जल्द ही लिखूंगा।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए शरद पवार को पद्मविभूषण से सम्मानित किया!

Abhiranjan Kumar : एक तरफ़ कांग्रेसी थे, जिन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल इत्यादि को भी भारत रत्न दिये जाने लायक नहीं समझा, दूसरी तरफ़ भाजपाई हैं, जो कांग्रेस-कुल के भ्रष्ट लोगों का भी तुष्टीकरण करने में जुट गए। एक दिन वे उन्हें भ्रष्ट कहते हैं, दूसरे दिन पद्मविभूषण घोषित कर देते हैं। याद कीजिए, हालिया महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी के तमाम नेताओं ने किस तरह से एनसीपी को भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बताया था।

साफ़ तौर पर भ्रष्टाचार के ये पर्यायवाची शरद पवार, अजीत पवार और छगन भुजबल जैसे नेतागण ही थे। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने शरद पवार और एनसीपी के बारे में क्या-क्या कहा था, देखें-

बारामती में- “चाचा-भतीजे (शरद – अजीत) की लूट समाप्त करनी है।”

कोल्हापुर में- “ये राष्ट्रवादी नहीं, भ्रष्टाचारवादी हैं।”

पंडरपुर में- “एनसीपी मतलब नेचुरली करप्ट पार्टी।”

पंडरपुर में ही- “एनसीपी मूल रूप से भ्रष्ट है। पार्टी के गठन के बाद से कुछ भी नहीं बदला है। इसके नेता वही (शरद पवार) हैं। क्या आप जानते हैं कि उनकी घड़ी (चुनाव चिन्ह) का क्या मतलब है? उनकी घड़ी में 10 बजकर 10 मिनट दिखाया गया है, जिसका अर्थ यह है कि प्रत्येक 10 वर्ष बाद उनकी भ्रष्ट गतिविधियां 10 गुनी बढ़ जाती हैं।”

तो क्या यह समझा जाए कि मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ही शरद पवार को पद्मविभूषण से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है? और क्या अब काले धन और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई भ्रष्ट लोगों को सम्मानित करके लड़ी जाएगी?

फेसबुक पर पत्रकार अभिरंजन कुमार.

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आत्महत्या पर उतारू है BSNL

वैशाली, गाजियाबाद में मेरे पास बीएसएनएल के तीन लैंडलाइन नंबर थे। वैशाली में एयरटेल आने के बाद बीएसएनएल पर निर्भरता कम होती गई और बिल का भुगतान नहीं हुआ। टेलीफोन कटा रहा और कटा ही रह गया। कोई हिसाब नहीं, कोई सूचना नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। मैंने मान लिया कि जमा की गई सुरक्षा राशि बीएसएनएल ने रख लिया। सरकारी कंपनी खा गई। मैंने भी छोड़ दिया। वास्तविकता चाहे जो हो।

अभी नोटबंदी के बाद जब डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना शुरू हुआ तो मैंने बीएसएनएल के अपने आखिरी फोन का बिल भी चुका दिया। फोन उपयोग नहीं के बराबर होता था पर बकाया बताने वाला एसएमएस आता रहता था तो सोचा कौन कर्ज रखे। बिल चुकाने पर जब फोन चालू नहीं हुआ तो पता चला कि बिल तीन महीने से भुगतान नहीं हुआ था इसलिए कट गया है और अब चालू कराने के लिए फिर से फॉर्म भरना होगा। मैंने कहा कि फॉर्म भेज दिया जाए, भर दूंगा। पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बीएसएनएल के अधिकारियों को मेल भेजने और फोन करने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई।

बताया गया कि बीएसएनएल के ऑफिस जाकर ही फॉर्म भरना होगा। मैंने मना कर दिया। मेरा कहना है कि आज के जमाने में ये कैसे चलेगा? जब दूसरी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां घर बैठे फोन दे रही हैं तो बीएसएनएल के दफ्तर जाकर कौन और क्यों फोन कनेक्शन लेगा। आखिरकार एक सज्जन फॉर्म लेकर आए। उन्होंने बताया कि फॉर्म के साथ 500 रुपए भी देने होंगे। बात मेरी समझ में नहीं आई। उनका कहना था कि मेरा कनेक्शन बंद किया जा चुका है और मेरे पैसे (सुरक्षा राशि और जो बिल मैंने जमा कर दिया उसके समायोजन के बाद, टेलीफोन इंस्ट्रूमेंट के पैसे काटकर) वापस आ जाएंगे। अगर मुझे बीएसएनएल का फोन चाहिए (जो बंद हो चुका है) तो नए सिरे से आवेदन करना होगा और सुरक्षा राशि एडवांस देनी होगी। मैंने पूछा नहीं कि चेक चलेगा या नकद ही देना है। मैंने मना कर दिया कि जब बीएसएनएल को नंबर बंद करने की इतनी जल्दी है तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए और नंबर बंद रहे।

पर मुद्दा यह है कि पहले जो दो नंबर दो बंद हुए उनके हिसाब का क्या हुआ? जब टेलीफोन उपकरण के पैसे काटे जाने हैं तो वापस करने के लिए क्यों नहीं कहा गया (मेरे पास बीएसएनएल के तीनों घटिया उपकरण लगभग अनुपयुक्त सुरक्षित रखे हैं, लौटाने के लिए ही) और जब मेरे पैसे बीएसएनएल के पास हैं ही तो कनेक्शन बंद करने की इतनी जल्दी क्यों? इन सबके अलावा ये स्क्रीन शॉट देखिए – मेरे पास 23 नवंबर को संदेश आया कि 25 नवंबर तक पैसे जमा कराए जा सकते हैं।

जब बंद कर दिया था तो संदेश क्यों? मैंने 24 नवंबर को पैसे जमा करा दिए 25 नवंबर को मुझे संदेश भी मिला कि पैसे प्राप्त हो गए हैं। फिर फोन बंद क्यों हो गया? बंद ही था तो पैसे क्यों मांगे जा रहे थे और जब इंतजार ही नहीं करना था तो 25 नवंबर की तारीख किसलिए बताई जा रही थी? यह सरकारी कंपनी का भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? बीएसएनएल को बंद कराने की साजिश के अलावा क्या है?  देखता हूं, पैसे वापस आते हैं कि फोन चालू होता है। मुझे तो दोनों की उम्मीद नहीं है। 

लेखक Sanjaya Kumar Singh वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com या +91 98101 43426 के जरिए किया जा सकता है.

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन में प्रकाशित हुई मुलायम खानदान की अकूत संपत्ति पर कवर स्टोरी

लखनऊ से अनूप गुप्ता के संपादकत्व में निकलने वाली चर्चित मैग्जीन दृष्टांत में जो कवर स्टोरी है, वह पठनीय तो है ही, आंख खोल देने वाली भी है. जिस अखिलेश यादव के ढेर सारे लोग प्रशंसक हैं और उनमें जाने कौन कौन से गुण देखते हैं, उसी के शासनकाल में जो लूटराज अबाध निर्बाध गति से चला है, वह हैरतअंगेज है. अब जबकि चुनाव में चार दिन शेष रह गए हैं तो सब के सब पवित्र और पुण्यात्मा बन सत्ता व संगठन के लिए मार कर रहे हैं ताकि जनता मूल मुद्दों से भटक कर इनमें उनमें नायकत्व तलाशे. नीचे पूरी कवर स्टोरी है ताकि आप सबकी समझदानी में लगा झाला खत्म हो सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

उत्तर प्रदेश का लूटकाल

अनूप गुप्ता

लगभग ढाई दशकों से तथाकथित अंगूठा छाप नेता परियोजनाओं की आड़ में यूपी का खजाना लूटते रहे। जिन नौकरशाहों के हाथ में लूट को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे भी लूट की बहती गंगा में हाथ धोते रहे। परिणामस्वरूप जनता की गाढ़ी कमाई से भरा सरकारी खजाना खाली होता चला गया और नौकरशाहों से लेकर खादीधारियों के निजी खजाने लबालब होते चले गए। सूबे का विकास केन्द्रीय सरकारों की भीख पर निर्भर होने लगा तो दूसरी ओर नेताओं के पास अकूत धन-सम्पदा इकट्ठी होती चली गयी।

जिनकी हैसियत चार पहिया वाहन खरीदने तक की नहीं थी, अब उन्हीं के बेटे, नाती-पोते, बहू-बेटियों और पत्नी के पास लग्जरी कारों का काफिला है और वह भी चन्द वर्षों में। जो लखपति थे वे अरबपति हो गए और जो करोड़पति थे उनके पास इतनी दौलत इकट्ठा हो गयी कि उन्हें खुद ही नहीं मालूम कि वे कितनी दौलत के मालिक हैं। हैरत तो इस बात की है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव (अधिकतम पांच वर्ष) में चुनाव आयोग को सौंपे गए हलफनामे में उनकी सम्पत्ति आश्चर्यजनक तरीके से कई गुना बढ़ती रही और वह भी बिना किसी उद्योग धंधे के। जनता की गाढ़ी कमाई से भरे सरकारी खजाने लूटने वाले सफेदपोशों की लम्बी फेहरिस्त है। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अल्प समय में आश्चर्यजनक तरीके से दौलत इकट्ठा कर ली कि उनका कथित भ्रष्ट चेहरा आम जनता के सामने आ गया।

सरकार खजाने पर हाथ साफ कर अपना घर भरने वालों में एक चर्चित नाम मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार का है। व्यवसाय के रूप में सिर्फ खेती दर्शाने वाला मुलायम परिवार मौजूदा समय में अरबों की धन-सम्पदा के मालिक हैं। आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर उनके खिलाफ जनहित याचिका भी दायर की जा चुकी है। मामला सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई तक भी पहुंचा। जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित करने का दावा किया तो दूसरी ओर सीबीआई ने भी जांच के उपरांत रिपोर्ट तैयार कर लेने का दावा किया। रिपोर्ट तैयार हुए वर्षों बीत गए लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई रुचि दिखायी और न ही सीबीआई ने। हाल ही में दैनिक समाचार पत्रों में एक खबर प्रकाशित हुई कि, ’सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी‘। हैरत इस बात की है कि सीबीआई तो काफी पहले ही अपनी जांच पूरी कर चार्जशीट तैयार करके बैठा है। उसे इंतजार है तो सिफ केन्द्र सरकार की तरफ से इशारे का। जिस दिन केन्द्र सरकार ने सीबीआई को इजाजत दे दी उसी दिन मुलायम एवं उनके परिवार का भविष्य तय हो जायेगा।

पिछले दिनों प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में एक खबर प्रसारित-प्रकाशित हुई। अखबारों और खबरिया चैनलों ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम सिंह यादव एवं उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी। बाकायदा मुलायम की फोटो के साथ खबर को प्राथमिकता दी गयी। इस बात की जानकारी जब वर्ष 2005 से लेकर अब तक न्याय की लड़ाई लड़ रहे पीआईएल दाखिल करने वाले अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी को हुई तो उन्होंने आनन-फानन में सोशल साइट्स पर मीडिया के झूठ का खुलासा किया। बकायदा कोर्ट के नवीनतम आदेश की काॅपी भी सोशल साइट्स पर डाली ताकि तथाकथित समाजवादियों की छवि को फर्जी ढंग से सुधारने में लगे लोगों के चेहरों पर से नकाब उतारी जा सके। अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सोशल साइट्स पर जो लिखा, कुछ इस तरह से है- ‘‘कुछ भांड़-भड़ुए, दलाल मीडिया वालों द्वारा झूठी अफवाह फैलायी जा रही है कि सीबीआई जाँच की अर्जी खारिज कर दी गयी। कोर्ट आर्डर सहित प्रेषित कर रहा हूँ! मुलायम, अखिलेश, प्रतीक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चल रही जाँच जारी है। साथ ही कोर्ट ने दसूरी याचिका फाइल करने की अनुमति दी है। जल्द ही दूसरी याचिका फाइल करूंगा।’’

सोशल साइट् पर दस्तावेजों के साथ डाली गयी पोस्ट भी सभी मीडिया कर्मियों ने पढ़ी और देखी होगी। चर्चा भी हुई होगी। हैरत इस बात की है कि पीआईएल दाखिल करने वाले ने दस्तावेजों के साथ अफवाहों का खण्डन किया लेकिन किसी मीडियाकर्मी ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ सच्चाई लिखने की हिम्मत नहीं जुटायी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मीडिया की तीसरी आंख मुलायम की खिलाफत से सम्बन्धित दस्तावेजों को अनदेखा कर गयी? जानते सभी हैं लेकिन लिखने और दिखाने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है। सभी चुनाव के दौरान लाखों-करोड़ों के विज्ञापन बटोरने की आस लगाकर बैठे हैं।

पिछले दिनों आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी से ‘दृष्टांत’ की दूरभाष पर वार्ता हुई। श्री चतुर्वेदी की मानें तो वे कोर्ट के उस फैसले को भी चुनौती देंगे जिसमें वर्ष 2012 में वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को सीबीआई जांच से यह कहकर बाहर कर दिया था कि डिम्पल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं हैं लिहाजा वे जांच के दायरे में नहीं आतीं। विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि यह असंवैधानिक फैसला न्यायालय द्वारा दिया गया था। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में यदि परिवार के सदस्यों (बहू) को बाहर कर दिया जाएगा तो शायद देश में आय से अधिक सम्पत्ति का मामला किसी पर बनेगा ही नही। जब श्री चतुर्वेदी के वकील ने कोर्ट से यह जानकारी हासिल की कि सीबीआइ की जाँच अब तक कहाँ पहुँची? इस सवाल पर न्यायालय ने दूसरी याचिका फाइल करने को कहा है। यदि देखा जाए तो कानूनी रूप से किसी मुकदमे को कोर्ट ही बंद कर सकती है।

गौरतलब है कि लगभग एक दशक बाद तक सीबीआई ने कोर्ट को कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है। जब रिपोर्ट की काॅपी ही कोर्ट को नहीं सौंपी गयी है तो कोर्ट इस अधूरे मामले को अपने स्तर से कैसे बंद कर सकती है? यहां तक कि सीबीआई ने जांच रिपोर्ट की काॅपी याचिकाकर्ता को भी उलपब्ध नहीं करवायी है। अभी हाल ही में 19 सितम्बर 2016 को इस मामले की सुनवाई हुई है। हैरत की बात यह है कि सारी सच्चाई और दस्तावेजों के बावजूद मीडिया कर्मियों को यह खबर कहां से मिल गयी कि सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी। साफ जाहिर है कि पिछले ढाई दशकों से यूपी को बुरी तरह से लूट रहे सफेदपोशों को बचाने में मीडिया दलालों की भूमिका निभा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेशों के बावजूद पेड न्यूज का धंधा अपने चरम पर है। उसका जीता-जागता उदाहरण सबके सामने है।

लगभग एक दशक पूर्व वर्ष 2005 में विश्वनाथ चतुर्वेदी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके कुटुम्ब के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। याचिका में मुलायम की लूट का कच्चा चिट्ठा खोला गया था। दस्तावेजों के साथ याचिका में स्पष्ट लिखा गया था कि 1977 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने थे, तब से लेकर वर्ष 2005 तक तकरीबन 28 वर्षों में उनकी सम्पत्ति में 100 गुना वृद्धि हुई है। मुलायम और उनके परिजनों ने यह सम्पत्ति कहां से और कैसे इकट्ठा की है? इसकी जांच होनी चाहिए। उस वक्त समाजवादी पार्टी की तरफ से यह प्रचारित किया गया कि विश्वनाथ चतुर्वेदी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं। राजनैतिक द्वेष के कारण ही ऐसा किया जा रहा है। इस पर विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट में अर्जी देकर स्पष्ट किया था कि वह किसी राजनीतिक दल से सम्बन्ध नहीं रखते बल्कि वह पेशे से पत्रकार हैं। समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी बनती है कि आम जनता के धन को लूटे जाने का वह हर तरह से विरोध करें। मुलायम एवं परिवार के समक्ष कोई विकल्प निकलता न देखकर वर्ष 2005 में डाली गयी याचिका के जवाब में मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में 1 मार्च 2007 को आए सीबीआई जांच के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाली गयी थी। लगभग पांच वर्ष तक सुनवाई के बाद वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया था लेकिन मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल यादव को जांच के दायरे से यह कहकर बाहर कर दिया था, ‘जिस वक्त का यह मामला है उस वक्त वे सार्वजनिक पद पर नहीं थीं लिहाजा उनके खिलाफ सीबीआई जांच नहीं की जा सकती।’

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब डिंपल यादव किसी पद पर नहीं थीं तो उनके पास आय से अधिक धन कैसे जमा हो गया? आयकर विभाग ने इस मामले को संज्ञान में क्यों नहीं लिया? क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए कि जब डिंपल के पास आय का कोई स्रोत नहीं था फिर उनके पास करोड़ों की सम्पत्ति कैसे इकट्ठा हो गयी? इस सम्बन्ध में पीआईएल दायर करने वाले विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि यदि न्यायपालिका इसी तरह से तथाकथित भ्रष्ट लोगों की पत्नी को राहत देती रही तो ऐसे में किसी भी भ्रष्टाचारी को सजा नहीं मिल पायेगी। भविष्य में भी लोग अनाधिकृत रूप से कमाए गए धन को अपनी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर चैन की सांस लेंगे।

गौरतलब है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर ने मुलायम और उनके कुनबे के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले को वर्ष 2006 से 2012 तक सुना। विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर सवा साल में ही सुनवाई पूरी कर सीबीआई जांच के आदेश भी दे दिए गए थे। लगने लगा था कि जल्द ही मुलायम और उनका कुनबा सलाखों के पीछे नजर आयेगा लेकिन मुलायम कुनबे ने बचने की गरज से पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी। उस याचिका की ओपन कोर्ट में जो सुनवाई शुरू हुई वह 5 वर्षों तक अनवरत चलती रही। लगभग पांच वर्ष पूर्व ही 17 फरवरी 2011 को पुनर्विचार याचिका पर फैसला भी रिजर्व हो गया था। बस फैसला सुनाना भर शेष था। सपा विरोधी दलों में बेचैनी से फैसले का इंतजार हो रहा था। सभी को उम्मीद थी कि याचिका के साथ जो पुख्ता दस्तावेज लगाए हैं वे मुलायम और उनके कुनबे को सलाखों के पीछे ले जाने के लिए काफी हैं। सूबे की आम जनता से लेकर सपा विरोधी दल इंतजार करते रह गए इसी दौरान मुलायम सिंह यादव के वकील व समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रहे वीरेन्द्र स्वरूप भाटिया की बरसी में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के साथ मंच पर एक साथ विराजमान नजर आये। किसी को उम्मीद नहीं थी लेकिन घटना अप्रत्याशित थी।

वैसे तो न्यायाधीश अल्तमश कबीर को नैतिकता के आधार पर इस केस से अलग हो जाना चाहिये था लेकिन रिटायर होने से पहले ही उन्होंने 13 दिसम्बर 2012 को एक विरोधाभाषी व असंवैधानिक फैसला सुनाया। इस फैसले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिम्पल यादव को यह कहकर बाहर कर दिया कि वह किसी लाभ के पद पर नही थी इसलिए इनकी जांच नहीं होगी। उस वक्त सूबे में अखिलेश यादव की सरकार ने सांस लेनी शुरू ही की थी। इस विरोधाभाषी फैसले के बाद चर्चाएं तो बहुत हुईं लेकिन न्यायपालिका के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। गौरतलब है कि उस दौरान अल्तमश कबीर ने अपने फैसले में मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और प्रतीक यादव के खिलाफ जांच जारी रखने का निर्देश दिया था, जबकि उस वक्त प्रतीक यादव भी किसी लाभ के पद पर नहीं थे। यदि पूर्व न्यायाधीश ने लाभ के पद पर न होने का हवाला देकर डिंपल यादव को सीबीआई जांच से बरी कर दिया था तो उस स्थिति में प्रतीक यादव को भी सीबीआई जांच से बरी हो जाना चाहिए था। शायद सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में इस तरह का अदभुत फैसला आज तक नहीं हुआ होगा और वह भी एक जाने-माने न्यायाधीश की कलम से। सही मायने में कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून की धज्जियां उड़ाकर रख दी थीं। इस सम्बन्ध में अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि वे इस असंवैधानिक फैसले को चुनौती देंगे। वह निर्णय पूरी तरह से गैरकानूनी था।

अब यह भी जान लीजिए कि आखिरकार तमाम असंभावनाओं के बावजूद मीडिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्लीनचिट दिए जाने की खबर कैसे प्रकाशित-प्रसारित हो गयी? इस दुर्लभ काम को अंजाम देने की भूमिका निभायी है अमर सिंह ने। सभी जानते हैं कि अमर सिंह में न्यायपालिका से लेकर औद्योगिक घरानों, सीबीआई और मीडिया तक को मैनेज करने की क्षमता कूट-कूट कर भरी है। पेड न्यूज के इस खेल ने अपना काम कर दिखाया। अखबारों में झूठी खबर छपते ही अमर सिंह समाजवादी पार्टी में नायक की भूमिका में नजर आने लगे। मुलायम ने भी इन्हें उपकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमर सिंह को एक बार फिर से सपा में महासचिव पद का दर्जा दे दिया गया।

गौरतलब है कि ये वही अमर सिंह हैं जो एक बार फिर से समाजवादी पार्टी में वापसी से पहले करीब छह साल तक सक्रिय राजनीति में हाशिए पर रहे। इस दौरान वे गंभीर बीमारी से भी जूझते रहे। इस दौरान उन्होंने अपने लिए दूसरे राजनैतिक दरवाजे भी देखे। जब कहीं से उन्हें सम्मान मिलता नजर नहीं आया तो उन्होंने खुद की राष्ट्रीय लोकमंच के नाम से राजनीतिक पार्टी भी बनाई। वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव में उन्हांेने चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम के खिलाफ अमर्यादित भाषा तक का प्रयोग किया। खुले मंच से मुलामय की सत्ता को यूपी में जड़ से मिटाने की सौगंध तक खायी। अमर सिंह को अपनी राजनैतिक हैसियत का अंदाजा उस वक्त हुआ जब वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की जमानतें तक जब्त हो गईं।

अमर सिंह वर्ष 2014 में राष्ट्रीय लोक दल से लोकसभा का चुनाव लड़े। उम्मीद थी कि उन्हें सम्मानजनक वोट मिलेंगे लेकिन हुआ वही जिसकी उम्मीद थी। अमर सिंह को लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली। जब कहीं दाल नहीं गली तो दोबारा उसी पार्टी में आने के रास्ते तलाशने लगे जहां उनके विरोधियों की संख्या अनगिनत थी। इसके बावजूद अमर सिंह ने अपनी कला का परिचय दिया और सपा में शामिल हो गए। पार्टी में तमाम विरोध के बावजूद उसी सम्मानजनक स्थिति को पाने के लिए अमर सिंह ने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में मुलायम और कुनबे को राहत दिलवाने का वायदा किया। कोर्ट ने भले ही मुलायम को ठीक तरह से राहत न दी हो लेकिन अमर सिंह ने मीडिया को सेट करके राहत देने सम्बन्धित ऐसी फर्जी खबर प्रकाशित-प्रसारित करवा दी जिससे प्रभावित मुलायम कुनबा अमर सिंह का मुरीद हो गया। मुलायम ने भी अहसान का बदला चुकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमर सिंह को एक बार फिर से पार्टी में महासचिव का पद दे दिया गया।

अब यह भी जान लेना जरूरी है कि आखिरकार कोर्ट ने क्या कहा था और मीडिया को क्या बताया गया? मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में लंबित विश्वनाथ चतुर्वेदी की कुछ अर्जियों पर आदेश देने से सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर मना कर दिया है कि इन अर्जियों में उठे सवालों का जवाब 2013 में मुलायम परिवार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए सीबीआई जाँच के आदेश के समय ही दे दिया गया था। इस पर श्री चतुर्वेदी के सीनियर अधिवक्ता के टी एस तुलसी ने कहा, ‘आपके आदेश पर सीबीआई ने आज तक क्या जाँच की है? इसकी जानकारी याचिकाकर्ता को  प्राप्त नहीं हुई है।’ जाँच रिपोर्ट मँगाये जाने के सवाल पर कोर्ट ने कहा, ‘यह माँग आपकी इस याचिका में नही है।’ परिणामस्वरूप कोर्ट ने उक्त माँग के लिए अलग से याचिका दाखिल करने की अनुमति देते हुए कहा कि इसके लिए दूसरी याचिका दाखिल कर सकते हैं। श्री चतुर्वेदी के सीनियर वकील केटीएस तुलसी ने कहा, ‘सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मुकदमा दर्ज करने की इच्छा जताई थी लेकिन बाद में एफआईआर रजिस्टर की गयी अथवा नहीं, इसकी कोई जानकारी याचिकाकर्ता को नहीं दी गयी लिहाजा सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट मांगी जाए।’ इस पर कोर्ट ने कहा, ‘ये मांग मौजूदा अर्जी का हिस्सा नहीं है।’ इस पर कोर्ट याचिकाकर्ता के वकील को अनुमति दी है कि इस मांग के साथ अलग से याचिका दाखिल की जाए। याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मीडिया कर्मियों से साफ कहा है कि कोर्ट के इस आदेश में कहीं पर यह नहीं कहा गया है कि मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच की अर्जी खारिज की जाती है। साफ जाहिर है कि यह सारा खेल मुलायम के अमर-प्रेम का जीता-जागता उदाहरण है और अमर सिंह का मीडिया को हैण्डिल करने का नायाब तरीका।

आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एण्ड फैमिली को क्लीनचिट देने का गैरकानूनी तरीका पिछले लगभग चार वर्षों से जारी है। वर्ष 2012 में भी कुछ इसी तरह से मुलायम एण्ड फैमिली को क्लीनचिट देने की कोशिश हुई। उस वक्त केन्द्र में कांग्रेस के मनमोहन सिंह की सरकार थी। तत्कालीन केन्द्र सरकार को जब अपनी प्रतिष्ठा से जुडे़ ‘खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक’ को पास करवाने के लिए सांसदों की जरूरत हुई तो उस वक्त मुलायम सिंह यादव के साथ एक समझौता हुआ। समझौता यह था कि केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई से उनके आय से अधिक मामले पर क्लीनचिट दिलवा दे। कोशिश भी कुछ ऐसी ही हुई। गौरतलब है कि आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल में सीधे सुप्रीम कोर्ट से राहत दिलवा दी गयी थी। जब तक केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार (वर्ष 2009 से 2014 तक) रही, मुलायम सिंह यादव लगातार कांग्रेस की हर मुसीबत में उसका साथ देते रहे। मुलायम यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि उनकी नकेल केन्द्र सरकार के ही हाथों में है। यदि जरा सी आनाकानी की तो केन्द्र के इशारे सीबीआई अपना खेल दिखा देगी। हालांकि इस तरह के दबाव को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव शुरू से नकारते आए हैं लेकिन कांग्रेस को हर मुसीबत के दौर में आंख बंद करके समर्थन देना इस बात का प्रमाण है कि मुलायम किसी तरह से आय से अधिक सम्पत्ति के मामले से बाहर निकलने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। जब केन्द्र की तरफ से अहसान के बदले ज्यादा दबाव पड़ा तो दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उस केस से यह कहते हुए अपना पीछा छुड़ा लिया कि जो करना है सीबीआई करे और जो दिखाना सुनाना है सरकार को दिखाए सुनाए। ये वही सुप्रीम कोर्ट था जिसने बाद में इस बात को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया था कि सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन कानून मंत्री को क्यों सौंपी। तरीका तो यही कहता है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उस केस से अपना पीछा छुड़ा लिया था तो उसे सीबीआई की कार्यप्रणाली पर उंगली नहीं उठानी चाहिए थी।

खैर दिसम्बर 2012 में विश्वनाथ चतुर्वेदी बनाम यूनियन आफ इंडिया जनहित याचिका (क्रमांक 633, 2005) के मामले में दो साल से सुरक्षित रखे फैसले का पिटारा खोला गया। उम्मीद थी कि पिटारा खुलते ही मुलायम सलाखों के पीछे नजर आयेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उस दौरान भी अफवाह फैली थी कि मुलायम को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जल्द ही सीबीआई क्लीनचिट दे देगी। कहा तो यही जा रहा है कि सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट का चिट्ठा चार वर्ष पूर्व ही बनकर तैयार हो गया था। इसी दौरान लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गयीं। कांग्रेस की तरफ से आश्वासन दिया गया कि दोबारा सत्ता में आते ही उन्हें सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट का चिट्ठा थमा दिया जायेगा। दुर्भाग्यवश केन्द्र से कांग्रेस का सफाया हो गया और मोदी सरकार सत्ता में आ गयी। मुलायम सिंह यादव, विश्वनाथ चतुर्वेदी और कांग्रेस के बीच चली त्रिकोणीय जंग में शामिल एक मध्यस्थ ने उस वक्त अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए विश्वास के साथ कहा था, ‘सरकार सबसे बड़ी चीज होती है। वह जो चाहे कर सकती है। चतुर्वेदी जैसे लोगों को यह बात समझ नहीं आती है तो यह उनका प्राब्लम है।’ इस शख्स के दावों में दम था क्योंकि मैनेज करने का काम इसी शख्स ने किया था। यहां बात हो रही है अमर सिंह की। उस वक्त अमर सिंह का सपा में सिक्का बोलता था।

मुलायम को आय से अधिक सम्पत्ति में राहत देने की सभी तैयारियां हो चुकी थीं, अंततः हुआ वही जिसकी उम्मीद एक वर्ग विशेष को थी। सीबीआई का शिकंजा कानूनी पेंच में फंस गया। जब कहीं से बात नहीं बन सकी तो याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी पर चारों तरफ से दबाव बनाया गया। साम, दाम, दण्ड, भेद की तर्ज पर पूरी समाजवादी पार्टी विश्वनाथ चतुर्वेदी के पीछे पड़ गयी थी। तत्कालीन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने श्री चतुर्वेदी की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम कर रखा था। उस वक्त श्री चतुर्वेदी राजेन्द्र नगर, लखनऊ में रहते थे। उनके घर की तंग सीढ़ियों पर इतने पुलिसवाले भरे रहते थे कि एकबारगी लगता था कि इतना सुरक्षित आदमी इतनी असुरक्षित सी जगह पर आखिर क्यों रहता है? यहां पर विश्वनाथ चतुर्वेदी की मुश्किलों का जिक्र सिर्फ इसलिए किया गया ताकि इस मामले की गंभीरता को समझा जा सके। इतना सब कुछ होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव और उनके परिजनों को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत नहीं मिल सकी। अमर सिंह ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी लेकिन मुलायम को क्लीनचिट नहीं मिल पायी। लगभग एक दशक बाद एक बार फिर से मुलायम को क्लीनचिट दिलवाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। अमर का तंत्र पूरी शिद्दत के साथ उन रास्तों को तलाश रहा है जिन रास्तों से मुलायम को क्लीनचिट मिलने की संभावना है। हाल ही में मीडिया के सहारे मुलायम को क्लीनचिट दिए जाने की झूठी खबर प्रकाशित करवाकर खेल को और रोचक बना दिया गया है। इस खबर को याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने चैलेंज किया है। साथ ही कोर्ट आर्डर की कुछ काॅपियां सुबूत के तौर पर सोशल मीडिया पर डाली हैं ताकि भ्रामक खबर का और दलाल की भूमिका निभाने वाले कुछ मीडिया घरानों के चेहरों से नकाब उतारा जा सके।

वर्तमान सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को 1977 में जब पहली बार मंत्रीपद नसीब हुआ उस वक्त उन्होंने अपनी सम्पत्ति मात्र 77 हजार रुपए बतायी थी। 28 वर्षों के बाद 2005 में जब विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट में आय से अधिक सम्पत्ति से सम्बन्धित मुलायम के खिलाफ याचिका दायर की थी उस वक्त उनकी सम्पत्ति करोड़ों में पहुंच गयी थी। वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव ने जब मैनपुरी से चुनाव लड़ा तो उस वक्त उन्होंने अपनी सम्पत्ति 1 करोड़ 15 लाख 41 हजार 224 बतायी थी। पांच वर्ष बाद 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम ने जो हलफनामा दिया था उसमें उन्होंने अपनी सम्पत्ति 2 करोड़ 23 लाख 99 हजार 310 रुपए बतायी थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने अपनी सम्पत्ति 15 करोड़ 96 लाख 71 हजार 544 दर्ज करवायी। बिना किसी उद्योग धंधे के 77 हजार से लगभग 16 करोड़ की सम्पत्ति मुलायम ने कैसे जमा कर ली? यह प्रश्न हैरान कर देने वाला है।

गौरतलब है कि यह सम्पत्ति तो मुलायम सिंह यादव ने स्वयं अपने हलफनामें में दिखायी है जबकि हकीकत यह है कि मौजूदा समय में मुलायम और उनके परिजनों के पास अरबों की अकूत सम्पत्ति मौजूद है। यदि सीबीआई इस अकूत सम्पत्ति के बाबत आय का स्रोत मुलायम से पूछे तो निश्चित तौर पर यूपी के सरकारी खजाने को लूटे जाने का खुलासा हो सकता है। यह भी जान लीजिए, ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो आज भी जब चुनाव प्रचार के लिए गांव-देहातों में जाते हैं तो स्वयं को किसान का बेटा बताते हैं। हैरत की बात है कि यूपी के एक किसान का बेटा इतनी जल्द 77 हजार की सम्पत्ति से करो़ड़ांे की सम्पत्ति का मालिक कैसे बन बैठा? यूपी का आम किसान कर्ज और भुखमरी से आत्महत्या कर रहा है। सूबे के आम किसानों का परिवार दो जून की रोटी के लिए शहरों में मजदूरी करने पर विवश है और मुलायम सिंह यादव एक ऐसे किसान हैं जिन्होंने कृषि से न सिर्फ अपने भरे-पूरे परिवार को ऐश की जिन्दगी दी बल्कि परिजनों के नाम इतनी सम्पत्ति जुटा ली जिससे उनकी आगे आने वाली कई पीढ़ियां घर बैठे-बैठे ऐश का जीवन जी सकती हैं। सूबे का किसान जानना चाहता है कि उनके हाथों में ऐसा कौन सा अलादीन का चिराग हाथ लग गया जिससे उन्होंने उस यूपी में अरबों की सम्पत्ति सिर्फ खेती-किसानी से जुटा ली जिस यूपी का शेष किसान आजादी के लगभग 70 वर्षों बाद भी अपने परिवार को दो जून की रोटी नहीं दे पाया।

सिर्फ मुलायम के नाम से सैफई सहित अन्य गावों में 7 करोड़ 88 लाख 88 हजार रुपए की कृषि योग्य भूमि उनके हलफनामे में दर्ज है। इलाकाई लोगों का दावा है कि हकीकत में उपरोक्त जमीनों की कीमत अरबों में है। इटावा की फ्रेण्ड्स कालोनी में एक 5000 वर्ग फीट का आवासीय प्लाॅट है। हलफनामे में इस प्लाॅट की कीमत एक करोड़ 44 लाख 60 हजार दर्शायी गयी है जबकि इस प्लाॅट की वास्तविक कीमत पांच करोड़ के आस-पास है। इटावा के सिविल लाइन में आवासीय भवन संख्या 218 का क्षेत्रफल 16 हजार 10 वर्ग फीट है। इसकी कीमत हलफनामे में 3 करोड़ 16 लाख 28 हजार 339 दर्शायी गयी है। सच तो यह है कि इस आलीशान कोठी की कीमत लगभग 15 करोड़ के आस-पास है। ये वह अधूरी सम्पत्तियां हैं जो मुलायम ने खेती के धंधे से कमायी हैं। ये वह सम्पत्तियां हैं जो आजमगढ़ से सांसद मुलायम सिंह यादव ने अपने हलफनामे मे कुबूल की हैं। वास्तविकता में उनके नाम पर कितनी सम्पत्तियां हैं? शायद उम्र के इस पड़ाव में उन्हंे भी ठीक तरह से याद नहीं होंगी। इसके अतिरिक्त बेटे, बहू के नाम से अरबों की सम्पत्ति का मालिक है मुलायम परिवार और यह सारी सम्पत्ति बिना किसी उद्योग धंधे के खेती करके कमायी गयी है। आम जनता का हैरत होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर एक जनहित याचिका दायर की थी।

क्या कहते हैं विश्वनाथ चतुर्वेदी

दिसम्बर 2012 में वर्तमान सांसद डिंपल यादव को केस से बाहर किए जाने के सम्बन्ध में याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि उक्त फैसला मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर ने भले ही दिया हो लेकिन यह फैसला मैं उनका व्यक्तिगत फैसला मानता हूं। ऐसा विरोधाभाषी फैसला सुप्रीम कोर्ट का कतई नहीं हो सकता। एक तरफ तो डिंपल यादव को यह कहकर केस से बाहर कर दिया जाता है कि जिस वक्त केस दर्ज किया गया उस वक्त डिंपल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं थीं। गौरतलब है कि उस वक्त प्रतीक यादव भी किसी लाभ के पद पर नहीं थे। इन परिस्थितियों में प्रतीक यादव के खिलाफ भी केस खारिज हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सिर्फ डिंपल यादव को ही इस केस से बाहर किया गया क्योंकि डिंपल यादव वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी हैं। मुलायम ने इसे अपने परिवार के सम्मान से जोड़ लिया था। डिंपल यादव को अनैतिक तरीके से केस से बाहर निकालने के लिए सपा प्रमुख ने कौन सा तरीका अख्तियार किया? इस पर भी जांच होनी चाहिए। बात खुलकर सामने आनी चाहिए ताकि आम लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा न उठे। ज्ञात हो आय से अधिक सम्पत्ति मामले की सुनवाई माननीय जज अल्तमश कबीर ही सुन रहे थे।

अल्तमश कबीर को वर्ष 2011 में राजधानी लखनऊ में मुलायम के वकील व समाजवादी पार्टी सांसद रहे स्व0 वीरेन्द्र भाटिया की बरसी में मुलायम और अखिलेश के साथ मंच पर एक साथ देखा गया था। यदि मुलायम परिवार के साथ उनके इतने नजदीकी सम्बंध थे तो उन्हें इस मुकदमे से अपने आप को नैतिकता के आधार पर अलग कर लेना चाहिए था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप अखिलेश यादव की पत्नी सांसद डिम्पल यादव उन्होंने यह कहकर जांच के दायरे से बाहर कर किया दिया कि वे कोई पब्लिक पोस्ट होल्ड नहीं कर रही थीं जबकि उस वक्त पब्लिक पोस्ट होल्ड न करने वाले प्रतीक यादव भी थे।

संदेह के घेरे में ‘थिंक टैंक’

हालांकि मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में समाजवादी पार्टी के थिंक टैंक माने जाने वाले रामगोपाल यादव की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन उन्होंने जिस तरीके से पिछले 28 वर्षों के राजनैतिक कैरियर में धन सम्पदा इकट्ठा की है वह चर्चा करने लायक अवश्य है। राज्यसभा में निर्वाचन के लिए प्रो0 रामगोपाल यादव ने 3 नवम्बर 2014 को रिटर्निंग आफिसर के समक्ष शपथ पत्र प्रस्तुत किया था। शपथ पत्र के मुताबिक प्रो0 रामगोपाल ने चल-अचल सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग 10 करोड़ के आस-पास बतायी थी। हालांकि शपथ-पत्र में सम्पत्ति जुटाने के साधन का उल्लेख नहीं किया जाता है अन्यथा उनकी अकूत सम्पत्ति का खुलासा शपथ पत्र दाखिल करते ही हो जाता। यह काम विशेष तौर पर आयकर विभाग का होता है या फिर प्रवर्तन विभाग का। हैरत की बात है कि दोनों ही जिम्मेदार विभागों में से किसी ने भी प्रो0 रामगोपाल यादव से उनकी आय से अधिक सम्पत्ति के बाबत पूछताछ तक नहीं की।

गौरतलब है कि प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के चचेरे छोटे भाई हैं। पेशे से अध्यापक रहे श्री यादव वर्तमान में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। वह मुलायम सिंह यादव के थिंक टैंक भी कहे जाते हैं। प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। पार्टी में हैसियत मुलायम के बाद दूसरे नम्बर की मानी जाती है। यह दीगर बात है कि उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय मुलायम सिंह यादव को जाता है। रामगोपाल यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव के साथ 1988 में राजनीति में कदम रखा। वह इटावा के बसरेहर से ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं। जीत के इसी स्वाद ने उन्हें अपना राजनैतिक सफर जारी रखने पर विवश कर दिया। कहा जाता है कि इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। मुलायम का पूरा परिवार भले ही कई बार मुसीबतों में रहा हो लेकिन रामगोपाल यादव को मुसीबत छू तक नहीं सकी।

प्रो. रामगोपाल वर्ष 1989 में जिला परिषद का चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने। वर्ष 1992 में पहली बार राज्यसभा के सदस्ये बने। इसके बाद से प्रो0 रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंचते रहे। वर्तमान समय में भी वे राज्यसभा के सदस्य हैं। ये मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक सलाहकार भी रह चुके हैं। ये उस वक्त सुर्खियों में आए जब उन्होंने आईएएस अफसर दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में केंद्र सरकार द्वारा रिपोर्ट मांगने पर यहां तक कह दिया था कि यूपी को आईएएस अफसरों की जरूरत ही नहीं है। उनके बयान से साफ जाहिर था कि वे यूपी में आईएएस अफसरों को ही भ्रष्टाचार की जननी मानते हैं। इन्होंने डा0. लोहिया का सामाजिक और राजनीतिक दर्शन विषय पर शोध किया और पीएचडी उपाधि ली। समाजवादियों को लोहिया के विचारों से अवगत कराने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। बेहद गरीबी में पले-बढ़े प्रो. रामगोपाल यादव आज करोड़ों की हैसियत रखते हैं। शपथ पत्र में इन्होंने अपनी आर्थिक हैसियत 10 करोड़ से भी ऊपर बतायी है। ये वह सम्पत्ति है जिसका उन्होंने शपथ पत्र में खुलासा किया है। यानि ये तो सफेद धन है जबकि जानकारों का कहना है कि वर्तमान समय में प्रो0 रामगोपाल के पास अकूत संपत्ति है।

हैरत की बात है कि बेहद गरीबी से निकलकर आए प्रो0 रामगोपाल यादव वर्तमान में करोड़ों की हैसियत रखते हैं, वह भी बिना किसी उद्योग धंधे के! इसके बावजूद आयकर विभाग ओर प्रवर्तन विभाग इनकी जांच तक नहीं करता। हाल ही में इनका नाम महाभ्रष्ट यादव सिंह के साथ भी जोड़ा जाता रहा है। हालांकि प्रो0 रामगोपाल यादव ने यादव सिंह ने अपने सम्बन्धों को सिरे नकारा है लेकिन पार्टी के ही सदस्य यह बात दावे के साथ कहते हैं महाभ्रष्ट यादव सिंह को प्रो0 रामगोपाल यादव का संरक्षण था। चर्चा तो यहां तक है कि यादव सिंह की काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन्हें भी मिलता था। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है? यह जांच का विषय हो सकता है। दावा करने वाले यहां तक कहते हैं कि जिस दिन प्रो0 रामगोपाल यादव पर शिकंजा कसा गया उस दिन यूपी के गर्भ में दबे हजारों करोड़ के घोटालों पर से पर्दा उठ जायेगा। पार्टी के लोग तो यहां तक कहते हैं कि कोई बड़ा फैसला लेते समय मुलायम सिंह यादव प्रो. रामगोपाल यादव से सलाह लेना नहीं भूलते हैं।

मुलायम परिवार की पृष्ठभूमि

मुलायम सिंह यादव के किसान पिता सुधर सिंह मूल रूप से फिरोजाबाद की तहसील शिकोहाबाद के रहने वाले थे। बाद में वे इटावा के सैफई में जाकर बस गए। मुलायम पांच भाइयों में दूसरे नम्बर पर हैं। शिवपाल यादव को छोड़कर उनके सभी भाई खेतीबाड़ी करते रहे हैं। मुलायम के सबसे छोटे भाई राजपाल यादव लगभग एक दशक पूर्व यूपी वेयरहाउसिंग कापोर्रेशन में बाबू हुआ करते थे। मुलायम का राजनीति में कद बढ़ तो राजपाल यादव ने वर्ष 2006 में नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव वाया सांसद यूपी के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं। अखिलेश यादव का जन्म मुलायम की पहली पत्नी मालती देवी से हुआ था जिनकी 23 मई 2003 में मृत्यु हो गयी थी। उसके बाद मुलायम ने साधना गुप्ता से विवाह कर लिया। बताया जाता है कि साधना ने मुलायम के राजनैतिक कद का खूब फायदा उठाया। आज वह भी अरबों की सम्पत्ति की मालकिन बतायी जाती हैं। ये पैसा उनके पास कहां से आया? इस पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

बताया जाता है कि अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त एक मंत्री उन्हें प्रत्येक माह करोड़ों की वसूली का धन पहुंचाता है। इसके कितनी सच्चाई है? यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि साधना वर्तमान समय में करोड़ों की मालकिन हैं। मुलायम सिंह यादव पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव और पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास के कार्यकाल 1977 से लेकर 17 फरवरी 1980 तक मंत्री रहे। इसके बाद मुलायम सिंह यादव 1982 से 8 नवम्बर 1984 तक विधान परिषद में विपक्ष के नेता रहे। 17 मार्च 1985 से 10 फरवरी 1987 तक मुलायम सिंह यादव नेता विपक्ष विधानसभा रहे। 4 जुलाई 1995 में वे दोबारा नेता विपक्षी दल चुने गए लेकिन उन्होंने पद लेने से इंकार कर दिया। मुलायम सिंह यादव 5 दिसम्बर 1989 से 24 जून 1991, 4 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1995 और 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007 तक यूपी में मुख्यमंत्री के पद पर रहे। वर्ष 2005 में ही मुलायम सिंह के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति बटोरने से सम्बन्धित पीआईएल दायर की गयी थी। मुलायम सिंह यादव अब तक तीन बार सांसद बन चुके हैं। वर्तमान समय में वे आजमगढ़ से सांसद हैं।

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

विगत माह 19 सितम्बर 2016 को सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सुनवायी के दौरान माननीय न्यायाधीश ने जो कहा और मीडिया को जो सुनाया गया वह कुछ इस तरह से है। मामला कोर्ट नम्बर 6 में केस नम्बर 7 पर सूचीबद्ध था। कोर्ट ने कहा, ’इस मामले में हम सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को नहीं कह सकते। इस केस में कोर्ट 13 दिसम्बर 2012 को ही आदेश जारी कर चुका है। अब सीबीआई स्वयं इस मामले की जांच करे।‘ इस पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा, ’वर्ष 2007 में उनके आरोपों के आधार पर सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मामला बनने की बात कही थी, फिर भी अभी तक नियमित केस दर्ज नहीं किया गया। चार अलग-अलग अर्जियों पर 10 फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित रख लिया गया था लेकिन फैसला अब तक नहीं सुनाया गया है।‘

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुवेर्दी ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, वर्तमान यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, कन्नौज से लोकसभा सांसद डिंपल यादव और मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक यादव के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का आरोप लगाया था, साथ ही एक जनहित याचिका भी दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में डिंपल यादव को यह कहकर केस से अलग कर दिया था कि जिस वक्त जनहित याचिका दायर की गयी थी उस वक्त डिंपल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं थीं लिहाजा उन पर केस नहीं बनता। इस पर याचिकाकर्ता ने अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा है कि यदि इसी तरह से अन्य भ्रष्ट लोगों की पत्नियों की सम्पत्तियों पर भी यदि मामला ठुकराया जाता रहा तो भविष्य में किसी भ्रष्ट नेता अथवा अधिकारी पर शिकंजा कसा ही नहीं जा सकता। कोर्ट के इस आदेश पर मीडिया को क्या सुनाया गया? मीडिया ने क्या सुना और उसने क्या लिखा? मीडिया ने विधि संवाददाता अथवा विधि सलाहकार से सलाह-मशविरा किए बगैर अपने अखबार में सुर्खियां बना दी कि, मुलायम और उनके परिवार को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत। साफ जाहिर है कि दागी मुलायम और उनके परिवार वालों की छवि सुधारने की गरज से ही पेड न्यूज का सहारा लिया गया और मीडिया को मैनेज करने की भूमिका निभायी सपा में दूसरी पारी खेलने वाले मैनेजमेंट गुरु अमर सिंह ने। मुलायम ने भी उन्हें तोहफे के रूप में दोबारा महासचिव का पद दे दिया।

याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेद ने याचिका दाखिल कर मामले में नियमित एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा कि 2007 में उनके आरोपों पर सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मामला बनने की बात भी कही थी, फिर भी अभी तक नियमित केस दर्ज नहीं किया गया। चतुर्वेद ने कहा कि चार अलग-अलग अर्जियों पर 10 फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो आज तक सुरक्षित है।

मुलायम और उनके परिवार को क्लीनचिट देने सम्बन्धी खबर ने मुलायम के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले को एक बार फिर से ताजा कर दिया। सत्ता विरोधी दल एक बार फिर से इस मुद्दे को लेकर चर्चा कर रहे हैं जबकि आय से अधिक सम्पत्ति मामले का खुलासा करने वाला व्यक्ति मीडिया की भूमिका को लेकर खासा खफा है। उनकी नाराजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सोशल साइट पर मीडिया को आपत्तिजनक शब्दों से भी नवाजा है। साथ ही कहा है, ‘विधानसभा चुनाव में सपा की छवि सुधारने की गरज से पार्टी के तथाकथित मैनेजर अमर सिंह ने ही मीडिया के सहारे दुष्प्रचार किया है जबकि मामला जस का तस है।’

साभार- ‘दृष्टांत’ मैग्जीन

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खबर से भड़के डीएम ने जारी किया आदेश : ‘हिंदुस्तान’ अखबार के इस उगाहीबाज रिपोर्टर को आफिस में घुसने न दें!

Dinesh Singh : मैं नहीं जानता कि बाका के जिलाधिकारी के दावे में कितनी सच्चाई है। बिहार में हिन्दुस्तान की स्थापना के समय से जुड़े होने के चलते मैंने देखा है कि रिमोट एरिया में ईमानदारी के साथ काम करने वाले पत्रकार भी भ्रष्ट अधिकारियों के किस तरह भेंट चढ़ जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सारे पत्रकार ईमानदार हैं मगर मैं यह भी कदापि मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि सारे पत्रकार चोर और ब्लैकमेलर ही होते हैं।

सच यह है कि बिहार में मध्याह्न भोजन के नाम पर जहां भी हाथ डालिए और खास कर बाका, मुंगेर और जमुई जिले में, केवल लूट और बदबू ही मिलेगा। यदि किसी पत्रकार से शिकायत थी तो सबसे पहले संपादक से शिकायत करनी चाहिए थी। संपादक द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का रास्ता खुला था। मगर नहीं। डीएम ने सीधे तुगलकी फरमान जारी कर दी।

भागलपुर के संपादक बदले हैं और सुना है ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई भी करते हैं। किन्तु लगता है अनुभवहीन जिला अधिकारी ने भ्रष्ट अधिकारियों के प्रभाव में आकर कोई बड़ा बवंडर कर दिया हो। अखबार के संपादक से मैं निवेदन करना चाहता हूं कि वे इस मामले मे तत्काल कार्रवाई करें ताकि पत्रकारिता की मर्यादा बिहार में अक्षुण्ण बनी रहें।

हिंदुस्तान अखबार के विशेष संवाददाता रह चुके पत्रकार दिनेश सिंह की एफबी वॉल से.

नीचे वो खबर है जिससे भड़के बांका के जिलाधिकारी ने रिपोर्टर को उगाहीबाज करार देते हुए आफिसियल लेटर जारी कर दिया…. खबर को साफ-साफ पढ़ने के लिए नीचे दी गई न्यूज कटिंग के उपर ही क्लिक कर दें :

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Niraj Ranjan अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है. चौथे स्तंभ को हिलाना मुश्किल है.

Uday Murhan मीडिया संस्थानों और पत्रकारिता जगत पर भी सवाल है . दूसरे क्या करेंगे और करना चाहिये दूसरे जानें .मीडिया जगत सोचे .

Brajkishor Mishra सत्यप्रकाश जी को बधाई। एक जिला अधिकारी को आपके कारण इस ओछेपन पर आना पड़ा। डीएम द्वारा लिखे गए डिपार्टमेंटल लेटर के सेंटेंस से स्पष्ट है कि मामला मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग का नहीं है। कही न कही आपकी किसी और रिपोर्टिंग से डीएम की फटी पड़ी है। जिसका खुन्नस वो मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग के नाम पर निकल रहा है। यदि मामला उगाही का होता तो डीएम एफआईआर भी दर्ज करा सकता था। लेकिन शायद कोई सबूत नहीं। डीएम साहब मध्यान भोजन आप नहीं खाते। वो देश के भविष्य, बच्चो के विकास के लिए है। पत्रकार छोड़िये, यदि मध्यान भोजन के गुणवत्ता में किसी भी व्यक्ति को शक होता है तो रसोई देखना उसका अधिकार है। बांका के पत्रकार बंधुओ का आग्रह हैं की पता करें इस डीएम को मंथली उगाही कौन-कौन से विभाग से कितनी पहुँचती है। अखबार में खबर नहीं लग पाती तो इनकी ईमानदारी की सबूत सोशल मीडिया पर डालिये।

Jayram Viplav डीएम के लिखने का अंदाज दाल में काला है ।

Dinesh Singh उदय जी, सवालो के घेरे मे आज कौन नही है। कस्बाई पत्रकारिता की स्थिति जानिए । दस रुपये प्रति खबर पर काम करता है और महीने मे दस खबर नही छपती है। मिलता है एक खबर पर दस रुपये मगर खर्चा पड़ता है 50 रु। अखबार को उसी के माध्यम से विज्ञापन भी चाहिए । वह भ्रष्ट और चोरी नेताओ की चाकरी मे लगा रहता है कि कुछ ऐड मिलेगा । उसे परिवार भी चलाना है। कठिनाई तब हो जाती है जब ओहदा और सैलरी मिल जाने के बाद भी गंदगी फैलाते हैं। धुआं वही से उठता है जब कही आग लगा होता है । विशेश्वर प्रसाद के समय मे हिन्दुस्तान भागलपुर मे कंट्रोवर्सी मे रहा और खबर छापने के लिए पैसे मांगने के खिलाफ बहुत सारे होल्डिंग्स भी टंगे । मै नही जानता की उस आरोप मे कितनी सच्चाई थी मगर चुने हुए बदनाम पत्रकारो को मिला संरक्षण और शहर के धंधेवाजो से उनके रिश्ते उनकी बदनामी को हवा देता रहा। मगर आप ही बताइए विशेश्वर प्रसाद और अक्कु श्रीवास्तव जैसे लीग जो कभी -कभी संपादक बन जाते है वही पत्रकारिता के चेहरे बनेगे या ईमानदार संपादको की भी चर्चा होगी? मैं दावे के साथ कहा सकता हू की आज भी पत्रकारिता मे ईमानदारी अन्य सभी क्षेत्रो की तुलना मे ज्यादा बची हुई है।

Uday Murhan एकदम सहमत . मेरा आशय आप से भिन्न नहीं है .

Brajkishor Mishra दिनेश सर, पत्रकारिता में सबसे बड़ी दिक्कत है की एक पत्रकार ही दूसरे पत्रकार की लेने में लगा हुआ है … अपने गिरेबाँ देखना किसी को पसंद नहीं।
Jayram Viplav पत्रकारिता और राजनीति “सेवा” के क्षेत्र है यहाँ कदम कदम पर नैतिकता और मूल्यों का तकाजा है लेकिन जब लोग इसे पैशन की जगह प्रोफेशन बना लेंगे तो क्या होगा? और हां यदि जिला ब्यूरो से नीचे प्रखंडों में काम करना हो तो आर्थिक रूप से मजबूत हो।

Dinesh Singh जिला अधिकारी के खिलाफ सत्यप्रकाश मानहानि का मुकदमा करें । मैं हर तरह से मदद के लिए तैयार हूं ।

Brajkishor Mishra विशेश्वर कुमार सर के साथ 12 साल पहले मुझे 2 साल काम करने का मौका मिला था, बड़े ही खड़ूस संपादक थे। जर्नलिज्म को छोड़ कर अपनापन नाम की कोई चीज ही नहीं। बड़े ही सेल्फिश संपादक हैं। सिर्फ खबर से मतलब रखते हैं। एक बार तो दूसरे संस्थान में किसी कारण परेशान हो उनसे नौकरी मांगा था सीधे ना कर बैठे। भविष्य में भी उनसे किसी फेवर की उम्मीद नहीं। लेकिन ये दावे के साथ कह सकता हूँ उनके जैसे पत्रकार और संपादक होना आसान नहीं। अकेले वो दस पत्रकार पर भाड़ी हैं। पत्रकार के सम्मान की सुरक्षा के लिए हमेशा सबसे आगे रहे है। वो कभी-कभी नहीं मेरे सामने बीते डेढ़ दशक में तीन जगहों पर स्थानीय संपादक के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किये हैं। मैंने बोल्ड जर्नलिज्म उनसे ही सीखा है।

Dinesh Singh पत्रकारिता केवल खबरों का लेखन नहीं है। यह एक आन्दोलन भी है । भारत मे पत्रकारिता का जन्म ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से हुआ है। शहर का एक बड़ा व्यापारी शहर मे होर्डिन्ग लगाकर पैसा माँगने का आरोप लगाए और संपादक खामोश रहे यह कैसा वोल्डनेस है? काम करना और स्वाभिमान के लिए चट्टान से टकरा जाना अलग -अलग बात है। पत्रकारिता मे ईमानदारी और निर्भिकता बाहर से भी दिखनी चाहिए। यह मानहानि का मुकदमा बनता था। कुछ नही होने से पूरी टीम का सर शर्म से झुका रहा। मै मानता हूं कि आरोप गलत थे जैसे सत्यप्रकाश पर लगे आरोप गलत हैं। मगर चुप रह जाओगे तो लोग तरह -तरह के मतलब निकालेगे ही।
अजय झा ऐसे पत्रकार को सलाम जिसके लेखन से प्रशाशन की….

Sanjay Kumar Singh मैं भी एक पत्रकार हूँ। दो दशक से अधिक समय से इससे जुड़ा हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पत्रकारिता कभी चाटुकारिता में बदलेगी लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दे तो यह अब इससे भी नीचे दलाली में बदल गई है। हर कोई अपना एजेंडा लेकर चल रहा है। जिसमे पत्रकारिता मुखौटा बना हुआ है। सिवान, छपरा, बांका से लेकर पटना तक ऐसे मुखौटाधारि बैठे हुए हैं। ऐसे लोगों को कौन बेनकाब करेगा, शायद कोई नहीं, क्योंकि ये लोग अब सिस्टम में शामिल हो चुके हैं। दिनेश जी को बधाई… सिवान की ईमानदारी भी सीबीआई जरूर सामने लाएगी

Hari Prakash Latta आँख मूँदकर किसी को समर्थन देना या झुटला देना गलत है। बिना सत्यता जाने किसी एक व्यक्ति , घटना को केंद्रित कर सैद्धान्तिक बहस का कोई अर्थ नहीं होता है। हिंदुस्तान के सम्पादक को इन्क्वारी कर उचित निर्णय लेना चाहिए

Kumar Rudra Pratap मैंने देवरे को जाना है गया कार्यकाल के दौरान, ईमानदार और निडर अब तक।

Omprakash Yadav दिनेश जी जिलाधिकारी बाँका का तुगलकी भी कह सकते है और महाराष्ट्रीय फरमान भी कह सकते है आज के दौर का।जिस तरह महाराष्ट् में उत्तर भारत के लोगो को घुसने पर पावंदी हो गया है, चुकी बाँका के जिलाधिकारी महाराष्ट्रा के हैं और बाँका में उसी तर्ज पर काम कर रहे हैं। दिनेश जी आपने सही अनुमान लगाया की मध्यान भोजन बाला मामला बहाना है। एक समाचार पर जिलाधिकारी भड़के हैं।

Neel Sagar यदि सत्यप्रकाश जी पर आरोप गलत लगा है जो सत्य से परे है तो तत्काल उन्हे राय दिजिए कि डी0एम0 के खिलाफ भा0द0सं0 की धारा 499 के आधार पर मान-प्रतिष्ठा के साथ खेलने के लिए 25 लाख रूपया का मानहानि दायर करें।-सम्पादक-नील सागर दैनिक पटना -9835482126

Dinesh Singh अब तुगलकी फरमान जारी करने वाले बाका के जिला अधिकारी का असलियत सामने आ चुका है। —खबर पढ़कर बौखलाए जिला अधिकारी और कुछ नहीं बल्कि अहंकार का नाजायज पैदाइस है। –बिहार मे रहकर बिहारी को गाली देने वाले को तत्काल प्रभाव से सरकार निलम्बित करे। — पूरा बिहार सत्यप्रकाश के साथ है। अब बात साफ हो गई है कि माजरा क्या है । हमारी पत्रकार विरादरी कुछ आदत से लाचार है। ईमानदारी का सार्टिफिकेट हम मुफ्त मे बाटते है। यार पहले अपनी विरादरी पर गर्व करना सीखो। मै पहले ही कह चुका हूं कि पत्रकार विरादरी मे आज भी ईमानदारी बहुत हद तक कायम है। तुम बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई पर पलते हो और बिहारी को ही गाली बकते हो। यहा का आदमी जब महाराष्ट्र काम की तलाश मे जाता है तो नपुंसको की परवरिश बनकर हमला करते हो और बिहार आकर बिहारी पर ही रोब गाठते हो। कम से कम सत्यप्रकाश जैसे पत्रकार के रहते यह नही चलने वाला है । सत्यप्रकाश की रिपोर्टिंग यह साबित करता है कि वह पत्रकारिता का हीरो है। सत्यप्रकाश को तुम सरकारी कार्यालय जाने से नही रोक सकते । तुम अपना देखो की तुम कैसे जाओगे । वक्त आ गया है पत्रकार विरादरी अपनी एकजुटता दिखाए।

Amit Roy सत्यप्रकाश जी दुर्गापूजा के बाद इस दिशा में कोई ठोस निर्णय ले।हमलोग आपके हर कदम पर साथ है।

Guddu Rayeen मेरा एक ही हिसाब है ऐसे कलकटर को बिहार से उठा कर बाहर फेक देना चाहिऐ

Himanshu Shekhar Hahaha sir ne article 19 Ni padhe Kya.??? Kabhi bihari word use krte hai kabhi Kuch ? Bhagwan bharose hai Banka zila soch samjhdar kr cmnt kijye sir PTA Ni it act me jail daal Diya jaye

Ashish Deepak इस प्रकार का फरमान पुर्वाग्रह से प्रेरित लगता है। कहीं पत्रकार महोदय ने कड़वा सत्य तो नही लिख डाला ।

Nabendu Jha इस बात को रखने का यह तरीका सही नहीं। बल्कि ,इसके लिए एक जिम्मेदार अधिकारी को बात रखने की सही जगह की जानकारी होनी चाहिए । इसे वापस ले।

Pushpraj Shanta Shastri जिलाधीश ने किसी साक्ष्य के बिना जो निर्देश जारी किया है, यह आश्चर्यजनक नहीं है। हमारी पत्रकारिता ने डीएम से लेकर सीएम की आलोचना की आदत छोड़ दी है। जिलाधीश के पास अगर संवाददाता के द्वारा रिश्वत मांगने के साक्ष्य थे तो उन्हें किसने प्राथमिकी दर्ज कराने से रोका था? मुझे इस फरमान की भाषा में जिलाधीश प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत हो रहे हैं। बिहार के वरिष्ठ पत्रकारों को इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए। मैं इस मसले के तथ्यान्वेषण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हूँ, शर्त यह है कि अपने कुछ बंधु साथ शरीक हों। पत्रकारिता कथ्य के बावजूद तथ्य की मांग करता है। जिलाधीश के पक्ष-विपक्ष में तत्काल कोई राय प्रकट करना अनुचित है। महाराष्ट्र-बिहार के प्रदेशवाद की चर्चा फूहड़ता है। जिलाधीश का पत्र तथ्य के बिना कथ्य पर आधारित है इसलिए कथ्य के भीतर की हकीकत के पड़ताल की जरुरत है।

Dinesh Singh जिला अधिकारी किसी वजह से इस तुगलकी हरकत पर उतरे वह प्रकाशित खबर तथ्य बनकर सामने है।

Awadhesh Kumar arajak bihar ka namuna. Jab rajneeti fail karte hi to yehi hota hi.ek dm bihar mei…

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महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में पीएचडी और एमफिल प्रवेश परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली!

संपादक
भड़ास4मीडिया

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में इन दिनों भ्रष्टाचार, धाधली, जातिवाद, क्षेत्रवाद का बोल बाला जोरों पर है. अकादमिक, प्रशासनिक और आर्थिक भ्रष्टाचार का भंडा फोड़ होना ही चाहिए, इसके लिए आपका सक्रिय पत्रकारीय सहयोग अपेक्षित है.

बहरहाल, यह मेल विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी, एमफिल प्रवेश परीक्षा में किए जा रहे बड़े पैमाने पर धाधली के सन्दर्भ में है. बार बार प्रतिवेदन देने, एमएचआरडी तक शिकायक पहुँचाने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों के हित को ठेंगे पर रखकर मनमानी करने पर उतारू है.

कृपया संलग्न सामग्री का संज्ञान लेकर विद्यार्थियों के हित में हमारी आवाज़ बुलंद करिए.

सधन्यवाद,
बिमलेश कुमार
मंत्री  
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, 
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय इकाई, वर्धा

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भास्कर का संपादक निकला 100 करोड़ के फर्जी नक्शे का मास्टरमाइंड, एफआईआर दर्ज

जांच के बाद इंदौर के थाना एमजीरोड़ में दर्ज हुई 420 की एफआईआर, इंदौर यूनिट के बड़े पदों पर बैठे लोग बचाने में लगे

लगातार कई सालों से इंदौर दैनिक भास्कर के डीबी स्टार में कार्यरत मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ का संपादक मनोज बिनवाल इंदौर के 100 करोड़ रुपए के तुलसी नगर प्लाट घोटाले का मास्टर माइंड निकला। यह वही शख्स है जिसकी इस मामले में करीब आठ माह पहले मैनेजमेंट को शिकायत हुई और जांच बैठी। मगर खास बात यह है सारे सबूत होने के बाद भी इंदौर में बैठे इसके आकाओं (कल्पेश याग्निक और हेमंत शर्मा) ने तमाम प्रयास कर इसे बचा लिया। बचाने के लिए मैनेजमेंट को गलत जानकारी दी गई, क्योंकि कई मामलों में तीनों की पार्टनशिप जगजाहिर है।

मनोज बिनवाल का तुलसी नगर प्लाट घोटाले में फर्जीवाड़ा करने पर करीब एक साल पहले ही नाम सामने आया था। अफसरों ने फाइलों पर इसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने तक का लिखा था मगर इंदौर के आकाओं ने एक-एक कर इंदौर-भोपाल के सभी अफसरों को मैनेज कर लिया और फाइल पूरी तरह से दबा दी। इस मामले में मनोज बिनवाल का पार्टनर कॉलोनाईजर शिव अग्रवाल इसी घोटाले में तीन माह से जेल की हवा खा रहा है। लाख सबूत होने के बाद भी बिनवाल अफसरों की कोख में छिपकर बैठ गया था।

इस घोटाले से परेशान कुछ लोग पूरी फाइल को आरटीआई में निकलवाकर कोर्ट पहुंचे। जहां कोर्ट में करीब 6 माह चली लंबी जांच के बाद दिए आदेश से मनोज बिनवाल और उसकी पत्नी भावना बिनवाल के खिलाफ धारा 420 व अन्य धाराओं में एमजी रोड़ थाने में शुक्रवार शाम चार बजे एफआईआर दर्ज की गई। नैतिकता की दुहाई देने वाला भास्कर प्रबंधन शुक्रवार शाम से ही अफसरों पर इस मामले में कार्रवाई नहीं करने और दबाने के लिए सक्रिय हो गया। टॉप पर बैठे सभी जिम्मेदारों अब इसे बचाने में लगे हुए हैं। यह इंदौर के इतिहास में पहला मामला है जब अखबार के किसी प्रतिष्ठित पद पर बैठे संपादक के नाम 420 की एफआईआर दर्ज हुई हो।

कई शिकायतें हुए मगर आकाओं ने दबा दी

मनोज बिनवाल के इंदौर यूनिट में ज्वाइंन करने के बाद उन्होंने वहां के स्टॉफ को अपनी निजी दुकान-दारी में लगा दिया। इस पर जिसने इसके खिलाफ आवाज उठाई उसे धीरे-धीरे षड्यंत्रों का शिकार बनाकर भगा दिया गया गया। कुछ शिकायत सीधे भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल तक भी पहुंची और अपनी ईमानदारी छवि के लिए जाने जाने वाले श्री अग्रवाल ने इसकी जांच भी बैठाई मगर इंदौर में बैठे बिनवाल के आकाओं ने इसे दबा दिया। और बिनवाल को ईमानदार साबित करने में जी-जान लगा दी ओर वे अपने मकसद में कामयाब रहे। दूसरी तरफ नगर निगम, संभागायुक्त कार्यालय, कलेक्टोरेट जैसे विभाग के अफसरों को मैनेज करने में रिपोर्टर संजय गुप्ता के नेतृत्त्व में एक टीम तैनात की गई, जिसे बखूबी अपना काम किया। मामला दब गया था मगर कोर्ट के आदेश के बाद सब पर पानी फिर गया।

क्या है मामला

मनोज बिनवाल ने इंदौर में 2013 में तुलसी नगर कॉलोनी के फर्जीवाड़े की खबरें छपवाईं। इसके बाद कॉलोनाईजर से 50 लाख रुपए के प्लाट में सौदा तय हुआ। इसके साथ कॉलोनी का एक फर्जी नक्शा कॉलोनाईजर शिव अग्रवाल ने नगर निगम में चलाने के लिए 25 लाख रुपए अतरिक्त में बिनवाल से सौदा किया। जिसमें बिनवाल को अफसरों को सांठ-गांठ कर इसे चलाना था। हुआ भी यही। यहां तक की जो प्लाट कॉलोनाईजर से हड़पा गया था वह भी केवल फर्जी नक्शे में ही था। बिनवाल ने संबंधित फर्जी नक्शा निगम में पहले अपने रसूख की वजह से चलाने का प्रयास किया जिसमें वह पकड़ा गया। निगम की जांच में सब कुछ सामने आ गया। यहां तक की निगम के अफसरों ने इस फर्जीवाड़े पर एफआईआर दर्ज करवाने के लिए भी कॉलोनी सेल को लिख दिया। मामला खुलता देख कॉलोनाईजर से एक मोटी रकम लेकर बिनवाल ने तत्काल अफसरों की खाली जैबें भर दीं। इसके बाद सारे कायदों और कागजों को एक तरफ रख फर्जी नक्शे के आधार पर अपने प्लाट की अनुमति ली और उसी फर्जी नक्शे पर अन्य करीब 200 प्लाट की अनुमति का रास्ता भी खुल गया। यह प्लाट भास्कर इंदौर के कुछ लोगों को भी इस कृत्य में शामिल होने के लिए दिए गए।

अखबारों में भी हो गया खुलासा

शुक्रवार को एफआईआर दर्ज होने के नई दुनिया और पत्रिका में बिनवाल के कारनामों का खुलासा हो गया। इसके पहले दबंग दुनिया, इंदौर समाचार सहित कई अखबारों में पहले भी बिनवाल के कारनामें सबूतों के साथ छप चुके हैं मगर अपनी तगड़ी सेटिंग के चलते बिनवाल का बाल भी बांका नहीं हो पाया। अब देखना यह है कि भास्कर की नैतिकता क्या केवल छोटे स्टॉफ तक के लिए है या फिर सभी के लिए समान हैं। दूसरी ओर अब तक बिनवाल के मामले में सुधीरजी की आंखों में धूल झोंकने वालों का क्या होगा? यह देखना भी आगे रुचिकर होगा। मनोज बिनवाल दैनिक भास्कर के अखबार डीबी स्टार के सभी संस्करणों के संपादक है और समूह संपादक कल्पेश याज्ञनिक का संरक्षण इन्हें प्राप्त है। इसके पहले भी कई घपलों में शामिल बिनवाल को कल्पेश ने बचाया है।

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“LOOT” by private school authorities

Mrs. Smriti Irani

Hon’ble Education Minister

India.

Respected Madam,

I would like to bring to your kind notice the following activities which are going on regularly in Adharsheela Global School, Sector-3, Vasundhara, Ghaziabad:-

1. All parents are forced to buy books, stationery & uniform from school only (audio clip 29th March enclosed in which teacher of this school is confirming to me that it’s mandatory to buy books & stationery from school only and there is no other choice for parents).

2. In audio clip of 30th March (1st) there is a long conversation between me and school principal where she is saying whatever she do is correct and whatever she says is right. She is not ready to accept this that all parents are being forced by the school to buy books and stationery from the school only whereas I am saying that it is not correct whatever she is saying as I have a proof that I am being told by your staff that “ALL THE PARENTS HAVE TO BUY BOOKS & STATIONERY FROM SCHOOL ONLY”.

She is also agreeing that there is no “Parent Teacher Association” which is mandatory for every CBSE affiliated school.

3. In Audio clip of 30th March (2nd) you can listen the conversation between me and school principal in which she is saying that the NCERT books are of very low level and also accepting that the books of private publishers are being used by the schools just because of the COMMISSION goes to school management.

4.  In audio clip of 23rd April you can listen that principal is again saying that NCERT books are of very low level and also not able to satisfy me why school is charging – Activity Fee, Examination Fee & Sports Fee on monthly basis when they have already charged Rs.9500/- towards annual fee. In reply to my monthly fee question she said that this is the only school who is giving breakup of monthly fee and also said there are lot of expanses on printing and examination sheets which is also wrong statement of the principal because school uploads the assignments & holiday homework and asks students to download on their own and complete.

School is also charging Rs.100/- for syllabus which I believe is also not correct. School is also “LURED” students by saying that “IF THEY WILL TAKE SUBSCRIPTION OF TIME N/E MAGAZINE THEY WILL TAKE THEM TO CINEMA HALL TO WATCH “JUNGLE BOOK” MOVIE. School offered the same subscription last year also and made it mandatory but rolled back the mandatory and made it optional when school authorities were questioned by the parents.

In reply to my question regarding annual charges, she said that Rs.9500/- is towards development charges because school is expanding and also making Labs and moreover school has not generated any profit so far. My question is that if Rs.9500/- is towards development than for what they are charging Rs.1500/- (FEE RECEIPTS ENCLOSED OF DIFFERENT SCHOOL).

Madam, I am not able to understand that is the school now a “EDUCATION SHOP” from where management wants to generate profit instead of giving education?

Madam, I request you to kindly look into it and take appropriate action against the school to stop the “LOOT” and save hard earned money of the parents.

Best Regards

Ashish Goel

ashish.goel73@gmail.com

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एक भूतपूर्व सांसद व प्रसिद्व पत्रकार ने विजय माल्या के लिए दलाली करते हुए उनके साथ उत्तराखंड में नेताओं की बैठकें करवाई…

मालामाल माल्या की कंगाली कथा

-निरंजन परिहार-

अब आप इसे ख्याति कहें या कुख्याति, कि संसार में शराब के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक भारत में कभी अमीरों की जमात के सरदार रहे विजय माल्या कंगाली की कगार पर देश छोड़ कर फुर्र हो गए हैं। यह जगविख्यात तत्य है कि है कि ज्ञान, चरित्र और एकता का दुनिया को पाठ पढ़ाने वाले संघ परिवार की दत्तक पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने ही संसार में शराब के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक माल्या को कर्नाटक से राज्यसभा में फिर से पहुंचाया था। और माल्या कभी देश की जिस संसद में बैठकर भारत के भाग्य विधाता बने हुए थे, वह संसद भी सन्न है। क्योंकि लुकआउट नोटिस के बावजूद वे गायब हो गए। पर, इस बात का क्या किया जाए कि जिस लाल रंग से माल्या को बहुत प्यार है, सरकार उस लाल रंग की झंडी किंगफिशर के कंगाल को दिखाए, उससे पहले ही विजय माल्या बचा – खुचा माल बटोरकर सर्र से सरक गए।

मालामाल होने के बावजूद माल्या कोई पांच साल से अपने कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं दे पा रहे थे।  क्यूंकि कड़की कुछ ज्यादा ही बता रहे थे और यह भी बता रहे थे कि जेब पूरी तरह से खाली हो गई है। लेकिन पांच साल की की कंगाली के बावजूद माल्या के ठसक और ठाट भारत छोड़ने के दिन तक वही थे। वैसे कहावत है कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख को होता है, लेकिन उनकी किंगफिशर एयरलाइन अब पूरी तरह से फिस्स है। विजय माल्या संकट में कोई आज से नहीं थे। चार साल पहले ही यह तय हो गया था कि वे कंगाल हो गए है। दुनिया के सबसे सैक्सी कलेंडर छापने वाले विजय माल्या को सन 2012 में ही फोर्ब्स ने अपनी अमीरों वाली सूची से बाहर का दरवाजा दिखा दिया था। बीजेपी के सहयोग से माल्या राज्यसभा में पहुंचे थे और बाद में बीजेपी को ही भुला दिया। लेकिन अब बीजेपी के राज में देश से भागकर बीजेपी की सरकार को एक और बदनुमा दाग भी दे गए हैं। 

विजय माल्या अपने काम निकालने के लिए किस तरह के फंडे अपनाते रहे हैं, इसका अंदाज लगाने के लिए यह उदाहरण देश लीजिए। बात उन दिनों की है, जब उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार हुआ करती थी। एक भूतपूर्व सांसद और प्रसिद्व पत्रकार विजय माल्या के दलाल बने और उनके साथ उत्तराखंड के नेताओं की बैठकें भी करवाई। माल्या के वहां के बंगले पर लगा 27 करोड़ रुपए टैक्स फट से माफ हुआ। और जैसा कि होना था, माल्या ने तत्काल बाद में वह बंगला बेच दिया और मोटा मुनाफा कमाया। मोटा इसलिए, क्योंकि जब 50 साल पहले विजय माल्या की मां ने यह बंगला खरीदा था, तब देहरादून में प्रॉपर्टी के दामों में आज की तरह कदर आग लगी हुई नहीं थी। मतलब यही है कि विजय माल्या को कितनी कमाई, किसके जरिए, कैसे निकालनी है, और जिन रास्तों से निकालनी है, उन रास्तों की रपटीली राहों तक के अंदाज का पता है। राज्यसभा में जाने के लिए बीजेपी का सहयोग तो एक बहाना था। बाद में तो खैर बीजेपी को भी समझ में आ गया कि माल्या ने जो सौदा किया, वह सिर्फ राज्यसभा मे आने के लिए नहीं था।

बहुत सारे हवाई जहाजों और दो बहुत भव्य किस्म के आलीशान जल के जहाजों के मालिक होने के साथ साथ अरबों रुपए के शराब का कारोबार करनेवाले विजय माल्या की हालत इन दिनों सचमुच बहुत पतली हैं। यहां तक कि उनकी किंगफिशर विमान सेवा के सारे के सारे विमान तीन साल से जमीन पर खड़े हैं। और जैसा कि अब तक कोई उनकी मदद को नहीं आया, इसलिए सारे ही विमान जो बेचारे आकाश में उड़ने के लिए बने थे, वो स्थायी रूप से जमीन पर खड़े रहने को बंधक हो गए है। क्योंकि कोई विमान जब बहुत दिनों तक उड़ान पर नहीं जाता, जमीन पर ही खड़ा रहता है, तो जैसा कि आपके और हमारे शरीर में भी पड़े पड़े अकड़न – जकड़न आ जाती है, विमानों में भी उड्डयन की क्षमता क्षीण हो जाती है। फिर से उड़ने के लिए तैयार होने का खर्चा बहुत आता है। पैसा लगता है। और कंगाल माल्या व उनकी किंगफिशर पर तो अपार उधारी है। बेचारे विमान।

संपत्तियों के आधार पर माल्या की कुल निजी हैसियत आज भी भले ही अरबों डॉलर में आंकी जाती रही हो। और उनकी एयरलाइंस के कर्मचारियों की दुर्दशा के बाद कइयों के आत्महत्या के हालात से माल्या की असलियत को भले ही कोई कुछ भी समझे। लेकिन असल में ऐसा है नहीं। अपन पहले भी कहते रहे हैं कि उंट अगर जमीन पर बैठ भी जाए, तो भी वह कुत्ते से तो कई गुना ऊंचा ही होता है। माल्या को शराब का कारोबार और पूरा का पूरा यूबी ग्रुप अपने पिता विट्ठल माल्या से विरासत में मिला। मगर स्काटलैंड की मशहूर शराब फैक्टरी वाइट एंड मेके को एक अरब सवा करोड़ रुपए में खरीदने के बाद माल्या का यूबी ग्रुप दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा शराब निर्माता ग्रुप बन गया। जीवन में माल्या की हर पल कोशिश रही है कि वे अपने कारोबार का दायरा बढ़ा कर अलग अलग व्यवसायों को इसमें शामिल करें, ताकि उन्हें महज़ शराब उद्योग के दिग्गज के तौर पर ही नहीं, एक बड़े उद्योगपति के रूप में उन्हें देखा जाए। इसी कारण उन्होंने एयरलाइंस शुरू की।

और बाद में तो राजा – महाराजाओं की शान को भी मात देने वाले माल्या ने अपने किंगफिशर ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए नंगी – अधनंगी लड़कियों को इकट्ठा करके दुनिया के सबसे सैक्सी कैलेंडर भी बनवाए और उनमें छपनेवाली कन्याओं को मशहूर मॉडल होने के खिताब भी बांटे। कुछ को तो हीरोइन तक बनवाने में मदद की। एयरलाइन भी शुरू की। जो नखरे- लटके – झटके दिखाने थे, वे सारे ही दिखाए और उनसे बाकी एयरलाइंसों को खूब डराया भी। और माल्या के खुद को बड़ा बनाने के शौक की उस घटना ने तो कॉर्पोरेट जगत में सबको चौंका दिया था जब किंगफ़िशर एयरलाइन को अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी बनाने के लिए माल्या ने समुद्र के बीच सफर कर रहे अपने यॉट से कैप्टेन गोपीनाथ को फ़ोन किया कि वो एयर डेकन ख़रीदना चाहते हैं। गोपीनाथ ने कहा,  कीमत एक हज़ार करोड़ रुपए। और माल्या ने एयर डेकन की बैलेंस शीट तक नहीं देखी और गोपीनाथ को डिमांड ड्राफ़्ट भिजवा दिया था।

कंगाल के रूप में बहुप्रचारित माल्या के बारे में ताजा तथ्य यह है कि वे अपनी अरबों रुपए की संपत्ति बचाने की कोशिश में कंगाली का नाटक करते हुए भारत में ज्यादा दिन जी नहीं सकते थे, इसी कारण भारत छोड़कर गायब हो गए हैं। लेकिन, मालामाल माल्या, दरअसल दुर्लभ किस्म के शौकीन आदमी हैं। वे जहां भी रहेंगे, अपने शौक पूरे करते रहेंगे। नंगीपुंगी बालाओं के बीच जीने के अपने सपने को स्थायी बनाने के शौक की खातिर ही, कामुक कैलेंडर निकाले। आलीशान क्रूज पर जिंदगी गुजारने और हवाई में उड़ने के शौक को स्थायी बनाने के लिए हवाई सेवा किंगफिशर भी शुरू की। बाद में तो खैर, कामुक कैलेंडरों की बालाओं की जिंदगी की असलियत नापने की कोशिश में मधुर भंडारकर ने कैलेंडर गर्ल्स शीर्षक से एक फिल्म भी बनाई और बरबाद बिजनेसमैन के क्रूज पर दुनिया की सैर करने को लेकर भी एक फिल्म बनी। लेकिन सच्चाई यह है कि शौक के लिए खड़े किए गए कारोबारों का अंत अकसर शोक पर हुआ करता है। माल्या के विभिन्न शौक के शोकगीत और उनकी किंगफिशर की शोकांतिका का कथानक भी कुछ कुछ ऐसा ही है। शौकीन माल्या ने भारत की सत्रह बैंकों से बहुत सारा माल लिया, मगर धेला भी वापस नहीं किया। नौ हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा लिखने में कितने शून्य लगते हैं, यह देश के सामान्य आदमी को समझने मैं बी बहुत वक्त लग जाता है। लेकिन अपनी इतनी बड़ी धनराशि को डूबते हुए सारी बैंकें देखती रही और माल्या शौक पूरे करने लंदन की फ्लाइट लपक कर निकल गए। शौक कभी मरते नहीं। सो, अब साठ साल की ऊम्र में माल्या वहां अपने सारे शौक फिर से जागृत करेंगे। लेकिन कोर्ट, कचहरी और कानून का शिकंजा जिस तरह से कसता जा रहा है, ऐसे में    उनके शौक का क्या हश्र होगा, अंदाज लगाचया जा सकता है। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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जेलों के भीतर किस किस्म का भ्रष्टाचार होता है, जानिए इस पत्र से

Dear Mr. Director general Ajeet Singh ji

Rajasthan prisons

jaipur

Subject : input media reports about various irregularities and corruption at Bikaner central jail

Dear sir

We have strong media inputs and reports with evidences etc concerning with below mentioned points. .. ..

३ मार्च को आप (डीजी जेल) वहां बीकानेर पहुंचे ..जेल देखा भी होगा… वहां की वस्तुस्थिति आप की जानकारी के लिये कुछ इस तरह से है… गौर फरमाया जाये व जांच कराई जावे…

जेल में भ्रष्टाचार :-

लंगर का ठेका किसी बंदी ओम चौटाला को ७००००/- मासिक में अघोषित उगाही. ये चाय सब्जी मसाले इत्यादि अन्य बंदियों को बेचते हैं.

कैंटीन का मासिक उगाही ठेका ७००००/- जहां बाजार मूल्य से ज्यादा दर पर सामान बिकता है. मसलन हर चीज २०-५०% अधिक दर पर जिसे बंदी मजबूरन खरीदता है जैसे दूध ३६/- की जगह ४२/- चीनी ३४/- की जगह ४५/-

हास्पिटल का मासिक उगाही ठेका ५००००/- जहां सरकारी दूध चीनी फल अंडे इत्यादि बंदियों को बेची जाती है, मसलन १००/- में मात्र ३ अंडे. 

इसी तरह एक बंदी अमन जाट को ५००००/- मासिक में एक सेपरेट बैरक दी हुई है, वार्ड नं एक में, जहां कोई जेल अधिकारी नहीं जाता, शायद आज आप भी नहीं गये होंगे.. वीआईपी बैरक है ये.

इसी तरह जेल में चरस गांजा लाने बेचने की भी काफी सुविधा है. कई डीलर हैं जेल में, जिनका माल जेल अफसर लाते हैं व बिकता है. लगभग ५ लाख मासिक का धंधा है.

नशीली दवा.. नींद वाली… इनकी बिक्री का ठेका एक बंदी (कैमिस्ट) का है लगभग ५ लाख मासिक.

बाकी सिपाहियों का २००-५००/- में बंदियों का छुटपुट काम करते रहना.. मदद करना आम बात है.. अमूमन एक सिपाही डेली ५००-१०००/- कमाता ही है.

अब आईये जेल में परची बनवाने के खेल पर…अन्य शहर में चालान पेशी पर जाने का शुल्क..बैरक बदलने का शुल्क इत्यादि भी है.

डीजी महोदय से निवेदन है कि उक्त जांच करें. वर्तमान जेल अफसर कैलाश त्रिवेदी, पूनिया व पारस की जुगलबंदी करीबन ६-७ लाख प्रतिमाह की है.. हमारे विश्ववस्त सूत्र हिसाबनुसार… बिना बंदियों को तंग परेशान किये जांच करें. सत्य सामने आयेगा.

अन्य कई बाते हैं.. क्रिकेट बालीबाल खेलने की परची.. अखबार १२०/- मासिक में खरीदो..

उपरोक्त सभी खबर पुष्टि करने के बाद ही आपको लिखी गई हैं आवश्यक कार्यवाही जांच हेतु.. एक जागरूक पत्रकार मीडियापर्सन होने के नाते जो हम कर सकते हैं खबर लिखना भेजना वो अपना कर्तव्य पूरा किया, बिना किसी राग द्वेष भेदभाव किये.. Now ball is in your court.

Regards
Naveen Kumar
Editor
Indiamirrors news
Delhi

navneetc2010@gmail.com

CC :- home ministry new delhi & central jail Bikaner

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कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर कर पत्रकारिता न ही करें तो अच्छा

बस्ती। कुछ पत्रकार साथी कुछ रुपए के लिए अपना ईमान बेचने से पीछे नहीं हटते हैं। मैं मानता हूँ कि कोई भी मीडिया संस्थान इतना रुपया नहीं देता कि पेट्रोल तक का खर्च निकल सके। पैसा लेना गलत नहीं है। आज कल बिना पैसे का कुछ नहीं होने वाला है। लेकिन कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर जाना शोभनीय नहीं है, कुछ पत्रकार साथी तो ऐसे है की 100 रु भी मांग लेते है, क्या करे वो भी मज़बूरी है परिवार और बाल – बच्चे का खर्च भी इसी पत्रकारिता से चलाना पड़ता होगा।

बृजकिशोर सिंह डिम्पल के राज्यमंत्री बनने के बाद उनका जनपद में प्रथम आगमन आज हुआ। इसका इन्तजार सपा कार्यकर्ता कम हमारे कुछ पत्रकार साथी बहुत बेसब्री से कर रहे थे। जैसे ही बृजकिशोर सिंह का काफिला उनके आवास के लिए निकला, पत्रकार साथी उनको बधाई देने उनके चगेरवा (महसों) स्थित आवास तक पहुँच गए। बधाई तो दे दिया लेकिन डटे रहे की सलामी तो ठोक दिया, अब कुछ इनाम (रुपया) भी मिल जाए तो अच्छा होता। जैसे ही हमारे पत्रकार भाइयों को इनाम मिला, वहां से चलते बने।

पत्रकार की एक गरिमा और एक लक्ष्मण रेखा होती है, जिसे उसे पार नहीं करना चाहिए। मैं सभी की बात नहीं कर रहा हूँ। कुछ ही साथी ऐसे हैं जिनकी ऐसी हरकतों की वजह से हम सबकी छवि खराब होती है। मैं भी ईमानदार नहीं हूँ और होना भी नहीं चाहिए नहीं तो भूखे मर जाएंगे। बस अनुरोध है कि तय कर लें कि कितना नीचे गिरना है। इतना नीचे गिरकर तो पत्रकारिता न ही करें।

ये मेरी अपनी सोच है. किसी को बुरा लगा हो तो हमे क्षमा करें.

विवेक पाल
बस्ती यूपी
9670291001
vivek.pal843@gmail.com

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पैसे मांग कर इस न्यूज चैनल ने युवा पत्रकार का दिल तोड़ दिया (सुनें टेप)

सभी भाइयों को मेरा नमस्कार,

मैं एक छोटा सा पत्रकार (journalist) हूँ और 4 वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ। इस बदलते दौर में मुझे नहीं लगता कि मैं कभी अच्छा पत्रकार बन पाउँगा। मेरा सपना था कि मैं भी एक सच्चा पत्रकार बनूँगा पर अब तो पत्रकारिता का मतलब ही बदल चुका है। पहले पत्रकारिता एक मिशन था परन्तु अब ये करप्ट व कारपोरेट बन चुकी है। सभी जानते हैं कि मीडिया में काम करने के लिए अच्छी पहचान या बहुत पैसा होना चाहिए। आज पत्रकार बनना बहुत ही आसान हो गया है क्योंकि पत्रकार बनने के लिये चैनल को आप के तजुर्बे और आपकी योग्यता की जरूरत नहीं है। उन्हें तो जरूरत है आप से मिलने वाले मोटे पैसे की।

कुछ बड़े और अच्छे चैनल भी हैं जो पढ़े-लिखे व अनुभवी पत्रकारों को मौका देते हैं, काम का पैसा भी देते हैं, परन्तु ना के बराबर। ज्यादातर चैनल की खुली लिस्ट है जो कि सिक्योरिटी अमाउंट के रूप में जमा करनी पड़ती है। पी.सी.आई. (Press Council of India) के अनुसार पत्रकार बनने के लिए आपकी योग्यता पत्रकारिता में 12+ डिग्री/डिप्लोमा या तजुर्बा होना चाहिए, परन्तु कुछ बड़े चैनल तो ऐसे भी हैं जिन्होंने 10वीं पास भी पत्रकार नियुक्त कर रखे हैं।

और तो और, मोटा पैसा लेने के बाद भी काम करने का पैसा (salary) भी नहीं देते हैं। अगर मेरी बात गलत है तो सभी पत्रकारों के सैलरी अकॉउंट की जांच करवा लीजिये। हाँ, मेरी बात सही है। मैं जो कुछ बता रहा हूँ, वो एक कड़वा सत्य है। अब सवाल ये है कि जो पत्रकार मोटा पैसा चैनल को देकर नियुक्त होते हैं, बदले में काम के पैसे (salary) भी नहीं लेते हैं तो फिर उनके घर कैसे चलते हैं? कौन उठाता है इनके खर्च और फिर कहाँ से खरीदते है बड़ी-बड़ी लक्जरी गाड़ियाँ?

ऐसा भी नहीं है कि बड़े चैनलों में काम करने वाले सभी पत्रकार अमीर घर से ताल्लुक रखते हैं या फिर शौकिया पत्रकारिता कर रहे हैं। ज्यादातर का  उद्देश्य नाम के साथ-साथ पैसा कमाना होता है। फिर क्या है इसका कारण….?

-आज बिक रहे हैं पत्रकार और बिक रही है उनकी पत्रकारिता
-आज पत्रकार समाज को सत्य दिखाने की जगह सत्य छुपाने में जुटे हुए हैं
-क्या यही है संविधान के चौथे स्तम्भ का काम.
-समाज में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ही समाज में बड़े-बड़े गलत काम कर रहे हैं.
-अपने संविधान का चौथा स्तम्भ (PRESS) आँखे बंद करके बैठा हुआ है.

सभी को पता है, अगर कोई संविधान के चौथे स्तम्भ का हिस्सा बनना चाहता है या फिर प्रेस में काम करना चाहता है तो ज्यादातर चैनल की रेट लिस्ट ये होती है…

1) अगर नेशनल चैनल तो 5,00,000 से 2,00,000
2) अगर रीजनल चैनल तो 2,00,000 से 50,000

और लोकल चैनल या न्यूज़ पेपर/मैगजीन की तो बात ही क्या करें, इनकी तो पत्रकार बनाने की पूरी दुकान है। जो आये सो पाये। पैसा दे जाओ और संविधान के चौथे स्तम्भ का हिस्सा बन जाओ। अब सवाल ये है कि पैसा देकर और बिना सेलरी के पत्रकार क्यों काम करने को तैयार हो जाते हैं? क्योंकि चैनलों की शर्तें, सिक्यूरिटी अमाउंट के रूप में मोटा पैसा देने को जो लोग तैयार होते हैं वो ज्यादातर खनन माफिया, शिक्षा माफिया, भूमाफिया, सट्टा चलाने वाले, जुआ खिलाने वाले, अवैध शराब ठेका चालक, चरस विक्रेता, अन्य गलत धंधे करने वालों के आदमी होते हैं। ये लोग ही पैसा देकर चैनल लाते हैं और अपने नीचे किसी को रख लेते हैं जो उनके लिए मीडिया का काम करता रहता है और उनके गलत काम में प्रशासन के द्वारा सहयोग करता है।

जो मैंने लिखा है वह एक कड़वा सत्य है। मैने 4 वर्षों में ही समझ लिया भारत के संविधान के चौथे स्तम्भ (press) का सच। परन्तु मेरा सवाल है उनसे जो पत्रकारिता में वरिष्ठ हैं। मेरा सवाल है उन बड़े चैनलो अथवा समाचारपत्र के संपादकों से जो समाज को सुधारने का जिम्मा लेते हैं, जो समाज को सत्य दिखाते हैं। क्या वे कभी अपने घर में चल रही इस बुराई को बदल पाएंगे? जिससे किसी का सपना अधूरा ना रह पाए और समाज का सत्य जनता के सामने आ पाए। अगर कोई भाई मेरे विचारो से सहमत हो तो मुझे कॉल भी कर सकता है। इसी post को मैंने Agra के local वाट्सअप ग्रुप में डाला था तो कई पत्रकारों ने गालियाँ दी और मेरा अपमान भी किया।

सुनिए वो टेप जिसमें एक बड़े चैनल के पदाधिकारी से मेरी बातचीत है जो नौकरी देने के बदले पैसे मांग रहे हैं… नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=8pdyx-w-a08

अजय कुमार

शिकोहाबाद

उत्तर प्रदेश

संपर्क : फोन 7078004666 मेल ajay.bnanews@gmail.com

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जेटली जी, डीएवीपी के बेईमान अधिकारियों के खिलाफ कब होगी कार्रवाई

हमारे केन्द्रीय मंत्री अरून जेटली जी खुद को बार बार पाक साफ व भ्रष्टाचार विरोधी शासक बताते हैं। आये दिन चैनलों में बयान देते नजर आते हैं कि मैं और मेरी सरकार भ्रष्टाचार विरोधी सरकार है। देश में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को कभी बख्शा नही जाएगा। किंतु आज आपको ये जानकर सबसे अधिक हैरानी होगी कि जेटलीजी के ही विभाग में सबसे बडे़ बागड़बिल्ले और बेईमान अधिकारी सेवारत हैं। 

हम बात कर रहे हैं डीएवीपी की। राजधानी के लोधीरोड सीजीओ कॉम्पलेक्ष स्थित सूचना भवन की जो कि बेईमान अधिकारियों को अड्डा बनता जा रहा है। मोदीराज में तो स्थिति और बुरी हो गई है। डीएवीपी में शाम होते ही दलालों की मंडी गुलजार हो जाती है। डीएवीपी के अधिकारियों से विज्ञापन जारी कराने हेतु दलाल हर कीमत अदा करने को तैयार रहते हैं। कोई दलाल विज्ञापन जारी करने वाले बाबू को नोटों के बंडल की पेशगी करता है तो कोई दलाल शराब की बोतल। 

कई दलाल तो बेशर्मी की सारी हदें पार कर देते हैं और संबंधित अधिकारी से विज्ञापन जारी करने हेतु अधिकारी के समक्ष अधनंगी लड़की को प्रस्तुत करते हैं। अधिकारी भी बडे़ उजड़ हैं। जब तक विज्ञापन का 30 प्रतिशत कमीशन अधिकारियों को एडवांस नहीं मिल जाता तब तक अखबार मालिकों को आश्वासन के अलावा और कुछ हासिल होना नामुमकिन है। मोदीजी का सफाई अभियान, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया का नारा यहां नहीं काम आता है।   

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार डीएवीपी में अपर महानिदेशक से लेकर करीब आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधित जांच चल रही है। डीएवीपी के अपर महानिदेशक एनवी रेड्डी सहित रवि रामाकृष्णा, एस के मोहंती, बीपी मीणा का भी नाम इस जांच सूची में शामिल है। अपर महानिदेशक एनवी रेड्डी सहित करीब आधा दर्जन से अधिक लोगों पर अखबार मालिकों से रूपए ऐंठ कर विज्ञापन जारी करने का आरोप है।

गत चार साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। किंतु आज की तारीख तक न तो इनके खिलाफ कोई जांच हुई है और न ही इनके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है। आरटीआई से मिली जानकारी के तहत जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच चल रही है, उनकी सूची साथ में संलग्न है। आशा करता हूं इस खबर पर जेटलीजी कुछ संज्ञान लेंगे व अपने विभाग में बेईमानी का किला मजबूत करने वाले बेईमान अधिकारियों के खिलाफ सही मायने में कोई कार्रवाई करेंगे।

नरेन्द्र गुप्ता
पत्रकार
अहमदाबाद
मोबाइल 8690599834

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कैंसर हो गया तो ये रुपया ही काम आएगा, कोई सगा संबंधी नहीं, इसलिए खूब भ्रष्टाचार करो, रुपया कमाओ!

Kanwal Bharti : अभी बरेली से मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी पत्नी को कैन्सर है और दिल्ली में राजीव नाम के एक अस्पताल में वे इलाज करा रहे हैं। अब तक 11 लाख रूपये खर्च हो चुके हैं और इलाज अभी जारी है। मुझे याद आया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि के इलाज में कोई 22 लाख रूपये खर्चे में आये थे। फिर भी वे बच नहीं सके थे। Continue reading

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन ने यूपी सरकार के माननीय महबूब अली को क्यों बताया भ्रष्ट, पढ़ें पूरा विवरण

जिसे सलाखों के पीछे होना चाहिए था वह अपनी आपराधिक छवि के चलते यूपी विधानसभा की गरिमा को चोट पहुंचा रहा है। जिसके खिलाफ हत्या का प्रयास, डकैती, अपहरण, मारपीट, गाली-गलौच, जान से मारने की धमकी, दंगे करवाना, मकान-जमीनों पर अवैध तरीके से कब्जा करवाना और धोखाधड़ी से सम्बन्धित दर्जनों की संख्या में आपराधिक मुकदमें दर्ज हों, उसे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे रखा है। जिसकी शिक्षा महज 12वीं तक है, वह माध्यमिक शिक्षा विभाग का कैबिनेट मंत्री बना बैठा है। यहां बात हो रही है माध्यमिक शिक्षा कैबिनेट मंत्री महबूब अली की।

अपनी उम्र के छह दशक पार कर चुके महबूब अली अपने विधानसभा क्षेत्र अमरोहा (ज्योतिबा फूले नगर) में आज भी आपराधिक छवि के नेता के रूप में जाने जाते हैं। इनके खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच लोकायुक्त को समस्त दस्तावेजों के साथ सौंपी गयी थी। ताज्जुब की बात है कि लोकायुक्त ने महज एक माह में ही जांच पूरी करके महबूब अली को क्लीनचिट भी दे दी। बताया जाता है कि लोकायुक्त से जांच करवाने वाले शख्स को इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उसने पूरे मामले से पल्ला झाड़ लेने में ही भलाई समझी।

महबूब अली पर मुरादाबाद में पीस पार्टी के उम्मीदवार नौशाद अली और उनके पोलिंग एजेंट पर जानलेवा हमले के आरोप में मुकदमा पंजीकृत किया गया था। महबूब अली के साथ ही अन्य दर्जन भर उन लोगों के खिलाफ भी मुकदमा पंजीकृत किया गया था जो महबूब अली के साथ मौजूद थे। पुलिस ने अपनी जीडी में साफ लिखा था कि महबूब अली ने अपने सहयोगियों की मदद से नौशाद और उसके साथी खुर्शीद पर धारदार हथियार से जानलेवा हमला किया था। यह हमला उस वक्त किया गया था जब भुक्तभोगी अपने साथी के साथ वोट देने के बाद कुंदन कॉलेज से बाहर निकल रहा था।

खुर्शीद और नौशाद किसी तरह से अपनी जान बचाकर भागने में सफल हो गए थे। इन दोनो ने भागकर अमरोहा कोतवाली में जानलेवा हमले से सम्बन्धित रिपोर्ट दर्ज करवायी थी। हमले में गंभीर रूप से घायल खुर्शीद को पहले अमरोहा के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, बाद में एक निजी अस्पताल में उसका इलाज चलता रहा। महबूब अली के राजनैतिक प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरेआम हमला करने और प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद न तो उन्हें गिरफ्तार किया गया और न ही उनके किसी साथी को।

सूबे में सपा की सरकार बनने के लगभग एक वर्ष बाद ही महबूब अली एक बार फिर से सुर्खियों में छा गए। फरवरी 2013 में तत्कालीन राज्यमंत्री महबूब अली  पर समाजवादी पार्टी के एक विधायक (नौगांव, सादात) अशफाक खां ने दमन करने और उनके विधानसभा क्षेत्र नौगांव सादात में घुसपैठ करने का आरोप लगाया। अशफाक का कहना था कि महबूब अली उनके विधानसभा क्षेत्र में सरकारी योजनाओं के चेक स्वयं बांटकर जनता के बीच वाह-वाही लूट रहे हैं। जिससे उनकी राजनैतिक छवि खराब हो रही है। अशफाक ने महबूब अली की दबंगई से सम्बन्धित घटना को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी बताया। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि सपा के ये दोनों नेता एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते। इन दोनों नेताओं के बीच बैर के बारे में कहा जाता है कि महबूब अली ने सपा के अशफाक को हराने की गरज से अपने छोटे भाई महमूद उर्फ भूरे को अशफाक के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार दिया था लेकिन इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी थी। 

पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के शासनकाल सितम्बर 2011 में महबूब अली और उनके भाई समेत उनके दो बेटों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था। महबूब अली के परिवार सहित दर्जन भर अन्य साथियों के खिलाफ भी मुकदमा पंजीकृत किया गया था। महबूब अली को उम्मीद थी कि सपा नेतृत्व उनके बचाव में आगे आयेगा लेकिन सपा के किसी भी जिम्मेदार नेता ने महबूब अली की वकालत नहीं की।

गौरतलब है कि मायाराज में अपराधों को अंजाम देने वाले जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जमकर अभियान चलाया गया था। हत्या की वारदात से जुड़ा यह मामला ज्योतिबाफूले नगर के रजबपुर इलाके के शंकरपुर गांव निवासी 55 वर्षीय केवल सिंह से सम्बन्धित था। केवल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। केवल के परिवार वालों ने सपा विधायक महबूब अली और उनके परिवार के सदस्यों सहित उनके गुर्गों को नामजद किया था। इस मामले में महबूब अली पर तो कोई आंच नहीं आयी अलबत्ता उनके भाई महमूद अली उर्फ भूरे को पुलिस ने जेल भेज दिया था। उस वक्त महबूब अली ने अपने व अपने परिजनों के बचाव में मायावती सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्हें बदनाम करने की गरज से ऐसा किया गया था। गौरतलब है कि जिस वक्त महमूद अली को गिरफ्तार किया गया था उस वक्त वे नोगांव विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे और वह भी सपा के ही खिलाफ।

महबूब अली की दबंगई और राजनीतिक गलियारों में उनकी पहुंच का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मायावती सरकार के कार्यकाल में भी उनकी हैसियत से सभी परिचित थे। मायावती सरकार के कार्यकाल में अमरोहा में करोड़ों की जमीन महबूब अली के बेटे शाहनवाज को कौड़ियों के भाव दे दी गयी। दिसम्बर 2011 में बसपा नेता और नगर पालिका अध्यक्ष हाजी इकरार ने समाजवादी पार्टी के दबंग विधायक महबूब अली के बेटे को बीस बीघा जमीन (खसरा नम्बर 5826) 25 रूपए महीने पर दे दी। वैसे तो सपा और बसपा के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है लेकिन महबूब अली के मामले में बसपा नेता की रहमदिली विधासनभा चुनाव 2012 तक चर्चा में रही। कहा जाता है कि बसपा का कर्ज उतारने की गरज से ही उन्होंने अपने बेटे को सपा नेता के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा था। यह दीगर बात है कि सपा की आंधी में महबूब अली की भी एक नही चली।

नगरपालिका की इस बीस बीघा जमीन के सम्बन्ध में सरकार के राजस्व रिकार्ड में साफ लिखा था कि इस जमीन पर शहर का कूड़ा और खाद डाली जाएगी और ये सरकारी सार्वजनिक सम्पत्ति है। यूं तो जमीन का लैंड यूज बदले बगैर ये किसी को दी नहीं जा सकती, इसके बावजूद करोड़ों की जमीन कौड़ियों के भाव दे दी गयी। गौरतलब है कि लैंड यूज बदलने का अधिकार सिर्फ सरकार को होता है। वो भी तब जब शहर के विकास या अन्य आवश्यक आपूर्ति के लिए किसी जमीन के इस्तेमाल की जरूरत पड़े। जिले से प्रस्ताव पारित होकर सरकार को भेजा जाता है। प्रस्ताव पास होने के बाद ही जमीन हस्तांतरित की जाती है। लेकिन अमरोहा में ये सब नहीं किया गया। इस खेल का पता तब चला जब इस जमीन पर पेट्रोल पंप का निर्माण कार्य शुरू हुआ।

नगर पालिका कर्मचारियों ने इसे रजिस्ट्री कार्यालय में सत्यापति भी कर दिया। जब इस मामले को मीडिया ने उठाया तो विधायक महबूब अली खासे खफा हुए। वे मीडिया का नाम सुनते ही भड़क जाते थे। गौरतलब है कि सीएनएन आईबीएन के एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद मुलायम सरकार में उनकी मंत्री पद से छुट्टी कर दी थी। बाद में सपा में मौजूद अपने आकाओं की मदद से वे दोबारा सपा प्रमुख के आंख का तारा बन गए। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में वे पहले राज्यमंत्री बनाए गए, बाद में इन्हे कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दे दिया गया। और विभाग भी वह दिया गया जो इनकी शैक्षिक योग्यता से कतई मेल नहीं खाता।

हाल ही में महबूब अली लोकायुक्त जांच के घेरे में भी आ चुके हैं। माध्यमिक शिक्षा मंत्री महबूब अली के खिलाफ स्कूलों को फर्जी तरीके से मान्यता देने के भी आरोप लग चुके हैं। उन पर एक ऐसे अधिकारी को हरदोई का डीआइओएस नियुक्त करने का आरोप था जिस पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगे थे। इस आरोप पर लोकायुक्त की तरफ से उन्हें नोटिस भेजा गया था। यह आरोप हरदोई निवासी बाबा भगत तेज गिरि ने मार्च के महीने में लोकायुक्त के यहां एक शिकायत दाखिल कर लगाया था। उस वक्त लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने भी माना था कि माध्यमिक शिक्षा मंत्री पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिस पर सफाई के लिए उन्हें नोटिस भेजा गया है। ताज्जुब की बात है कि एक महीने बाद ही आरोपों की जांच के बाद महबूब अली को क्लीनचिट भी दे दी गयी थी।  गौरतलब है कि स्कूलों की मान्यता में गड़बड़ी से सम्बन्धित साक्ष्य भी सौंपे गए थे। गौरतलब है कि डीआईओएस जेपी मिश्र के खिलाफ जांच अभी भी चल रही है।

‘दृष्टांत’ मैग्जीन का प्रकाशन लखनऊ से किया जाता है और इसके प्रधान संपादक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता है. अनूप ने दृष्टांत मैग्जीन के जरिए पत्रकारिता और राजनीति के कई भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब किया है और यह सिलसिला जारी है.

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यादवगेट में फंस रहे कुछ बड़े टीवी चैनल और पत्रकार, पीएमओ को रिपोर्ट भेजी गई

दलाली करते थे नोयडा-लखनऊ के कई मीडियाकर्मी

नई दिल्ली:  नोयडा के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह ने ठेकेदारी में कमीशनखोरी और कालेधन को सफेद करने के लिए कागज़ी कंपनियों का संजाल बिछाकर उसमें मीडिया को भी शामिल कर लिया था। इस राज का पर्दाफाश कर रही है, यादव सिंह से बरामद डायरी। यादव सिंह से तीन चैनलों के नाम सीधे जुड़ रहे हैं। एक में तो उनकी पत्नी निदेशक भी है। डायरी में मिले सफेदपोशों, नौकरशाहों और पत्रकारों के नामों को लेकर सीबीआई काफी संजीदा है और उसकी रिपोर्ट सीधे पीएमओ को भेजी जा रही है। इस सिलसिले में यादव सिंह और उसके परिवार से कई परिवार से कई बार पूछताछ हो चुकी है। समाज को सच का आईना दिखाने का दम भरने वाले ये पत्रकार अपने लिए मकान-दुकान लेने के अलावा ठेका दिलाने को भी काम करते थे और उसके लिए मोटी करम वसूलते थे।

पत्रकारिता की आड़ में दलाली और भवन भूखंड लेने की बात कोई नई नहीं है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहते हुए नकदी व भवन-भूखंड देकर पत्रकारों को उपकृत करते थे। मुलायम की दरियादिली तब सुर्खियां बनी थी। सांसद रिश्वतकांड से लेकर टू जी तक नामचीन पत्रकारों की कारस्तानी किसी से छिपी नहीं है। मौजूदा दौर में शायद ही ऐसा कोई घपला घोटाला हो जिसमें पत्रकारों की प्रत्यक्ष भूमिका निकलकर न आती हो। यादवगेट में भी कई बड़े चैनलों और नोयडा व लखनऊ के पत्रकारों के नाम आ रहे हैं। नबंर वन चैनल का दावा करने वाले चैनल से जुड़ी कंपनी पर भूखंड की कीमत कम दिखाकर राजस्व चोरी करने का आरोप है। दूसरे एक बड़े चैनल के पत्रकार चर्चा में है। इस चैनल पर ब्लैकमेलिंग को लेकर पहले से मामला चल रहा है। इसके एक स्टेट हेड पर अपने रसूख का इस्तेमाल कर यादव सिंह से लाभ लेने की बात सामने आई है।

इनका नाम बाक़ायदा यादव सिंह की डायरी में दर्ज है। इनकी लखनऊ में अच्छी धमक है और वहां से राजनेताओं और नौकरशाहों से फोन कराकर प्राधिकरण के अधिकारियों से लाभ लेते रहते हैं। इससे संबंधित दस्तावेज सन स्टार के पास मौजूद हैं और दस्तावेज कभी झूठ नहीं बोलते। इसका खुलासा आगे के अंकों में करेंगे। इनके अलावा यादव की डायरी में नोयडा के ऐसे कई पत्रकारों के नाम हैं, जिनकी पत्रकारिता प्राधिकरण के इर्द-गिर्द चलती है। इसमें एक परिवार से दो लोग भी हैं। इन लोगों ने प्राधिकरण से भवन भूखंड के अलावा शेड लिया और प्राधिकरण की बदौलत करोड़पति बन गये। कुछ पत्रकार तो ऐसे हैं जो ग्रुप बनाकर दबाव डालते थे। प्राधिकरण से ठेका दिलवाते थे और बाद में कमीशन में मिले पैसे को बांट लेते थे। कुछ की नजदीकी पूर्व मुख्यमंत्री के भाई से थी, जिनकी एक ज़माने में तूती बोलती थी। ये जनाब आजकल गुमनामी में आनंद ले रहे हैं। जांच एजेंसियां यादव सिंह और उसकी डायरी से मिली जानकारी को अपने तरीके से सत्यापित करने में जुटी हैं, इस वजह से कई पत्रकारों के चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई हैं।

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक सन स्टार में प्रकाशित विद्याशंकर तिवारी की रिपोर्ट.

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राजस्थान पत्रिका के रिपोर्टर ने चारागाह की जमीन को पत्नी के नाम आवंटित करा लिया

अजमेर (राजस्थान) : जिले के सावर क्षेत्र में राजस्थान पत्रिका के रिपोर्टर सत्यनारायण कहार पर लाखों रूपयों की बेशकीमती चारागाह भूमि को अपने नाम आवंटित करवाने का आरोप लगा है। सत्यनारायण पूर्व में ग्राम पंचायत सदारा का उपसरपंच रह चुका है। तब भी यह पत्रिका का ही रिपोर्टर था।

सत्यनारायण पर आरोप हैं कि इसने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए मिलिभगत कर ग्राम सदारी में देवनारायण मंदिर के रास्ते पर स्थित जमीन को अपनी पत्नी के नाम आवंटित करवा लिया। इसके विरोध में सोमवार को ग्राम सदारी व भोपों का झोपड़ा के ग्रामीणों ने उपखण्ड मुख्यालय केकड़ी पर प्रदर्शन किया और एसडीएम को कलक्टर के नाम का ज्ञापन भी सौंपा। ग्रामीणों का आरोप है कि उक्त जमीन पर उनके मवेशी चारा चरते हैं और यह देवनारायण भगवान के मंदिर की जमीन है। ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि यह आवंटन निरस्त नहीं किया गया तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे।

एक पत्रकार द्वारा भेजे पत्र पर आधारित खब

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भड़ास की खबर ने फिर दिखाया असर, भर्ती में भ्रष्टाचार पर घिरे राज्य सभा टीवी अफसर

भड़ास फॉर मीडिया की खबर ने एक बार फिर अपना असर दिखाया है. राज्य सभा टीवी में हुई भर्ती में भ्रष्टाचार की खबर भड़ास पर प्रसारित होने के तत्काल बाद राज्य सभा टीवी के कर्ता-धर्ता  पूरे मामले पर लीपा-पोती की कोशिश में जुट गए हैं. 

गौरतलब कि 24 मई को राज्य सभा टीवी में पत्रकारों की भर्ती में भ्रष्टाचार की  खबर भड़ास पर  प्रमुखता से प्रसारित होने के ठीक दूसरे दिन, यानी 25  मई को राज्य सभा टीवी ने परिणाम घोषित करने की औपचारिकता पूरी करते हुए, उन लोगों के नाम सार्वजनिक कर दिए जिन्हें चोरी-चोरी अपॉइंटमेंट लेटर थमाए गए थे. जिन लोगों को अपॉइंटमेंट लेटर दिए गए हैं उनके नाम सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई  है. गौरतलब है कि एक साथ चयन का विज्ञापन जारी करने के बावजूद राज्य सभा टीवी ने अभी तक  सभी पदों के परिणाम घोषित नहीं किये हैं. सूत्रों के मुताबिक़  जिन लोगों को अपॉइंटमेंट लेटर दिए जा चुके हैं, उनके परिणाम भड़ास में खबर आने के बाद  राज्य सभा की वेबसाइट पर लगा दिए  हैं. 

शेष पदों लिए  अंदरखाने  रस्साकशी और जोड़-तोड़ का खेल अभी भी जारी है. राज्य सभा टीवी के सूत्रों की माने तो इन पदों के लिए भी तगड़ी लॉबिंग चल रही है. यहां भी ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक़ जिन लोगों को अपॉइंटमेंट लेटर दिए गए हैं उनमें से अधिकाँश राज्य सभा टीवी के एक आला अधिकारी के करीबी और पूर्व परिचित बताए जा रहे हैं. एंकर सहित घोषित तमाम पदों पर चयन में जिन लोगों को प्राथमिकता दी गई है, उनकी योग्यता और अनुभव पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिसे कवर करने की कवायद शुरू हो गई है. मीडिया हलकों में चर्चा है कि  देश के सबसे प्रतिष्ठित संसदीय चैनल में हिन्दी  एंकर के एकमात्र पद के लिए पूर्वानुमान के मुताबिक़ भोजपुरी चैनल की एक पूर्व एंकर को बड़े न्यूज़ चैनलों के तमाम वरिष्ठ एंकरों के अनुभव पर प्राथमिकता देते हुए अपॉइंटमेंट लेटर दे दिया गया है. 

वहीं दूसरे पद पर राज्य सभा टीवी ने अपनी पूर्व एंकर को ही बहाल कर दिया है. इस तरह केवल एक ही पद पर बाहर से नियुक्ति की  गई है. और इंटरव्यू में शामिल तमाम वरिष्ठ एंकरों को अयोग्य घोषित कर दिया गया है.  राज्य सभा की वेबसाइट पर घोषित ये परिणाम विश्लेषण के नज़रिये से बेहद  दिलचस्प हैं. क्योंकि राज्य सभा टीवी के इस परिणाम ने टॉप न्यूज़ चैनलों में काम कर रहे एंकरों की योग्यता पर सवालिया निशान लगा दिया है. 80 फीसदी वरिष्ठ एंकरों को इस चयन में पासिंग मार्क्स भी नहीं मिले हैं. जबकि चयनित एंकरों को लेकर चयनकर्ता पूरी तरह आश्वस्त दिखाई दिए और उन्हें  फर्स्ट क्लास यानी साठ से अधिक अंकों से उत्तीर्ण घोषित किया गया है. 

ऐसा  अन्य पदों के परिणामों में भी देखा जा सकता है. जिन्हें अपॉइंटमेंट लेटर दिए गए हैं, अन्य कोई भी उम्मीदवार उनके  करीबी अंकों को छू  भी नहीं पाया है. चयनकर्ताओं को चयन में किसी तरह की कोई दुविधा पेश नहीं आई. इतना ही नहीं कुछ पदों के लिए तो चयनकर्ताओं को योग्य उम्मीदवार ही नहीं मिले, इसे भी परिणामों में दर्शाया गया है. राज्य सभा टीवी के चयनकर्ताओं ने तमाम पत्रकारों को उनके अंक तो बता दिए लकिन ये नहीं बताया कि चयन का आधार क्या था? अनुभव के लिए कितने अंक निर्धारित थे? और प्रोफाइल और पोर्टफोलियो के  लिए कितने अंक दिये गए? गौरतलब है कि टीवी पत्रकारिता में अनुभव और पोर्टफोलियो का ही सबसे ज़्यादा महत्त्व होता है. लेकिन घोषित परिणामों में इसे ज़्यादा महत्त्व नहीं दिया गया.  

ऐसे में चयन प्रक्रिया में शामिल हुए तमाम वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं. अब इंतज़ार है शेष पदों के  परिणामों की घोषणा का. जिनमें  प्रोड्यूसर और सीनियर प्रोड्यूसर जैसे वरिष्ठ पद शामिल हैं.  देखने वाली बात ये होगी कि क्या इन पदों में भी अनुभवहीन और अयोग्य उम्मीदवार जोड़-तोड़े के गणित और ऊंची पहुँच के बल पर योग्य और अनुभवी उम्मीदवारों पर भारी पड़ने वाले  हैं?  

गुंजन सिन्हा से संपर्क : gunjan.sharma84@yahoo.in

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भ्रष्ट प्रधान के सपोर्ट में जागरण ने छापी उल्टी खबर, पीड़ित ने दी चेतावनी

गोंडा (उ.प्र.) : सेमराजमालखानी तरबगंज निवासी कौशल पाण्डेय ने मीडिया को लिखे पत्र में अवगत कराया है कि उनकी पत्नी प्रतिभा पाण्डेय सेमरा जमालखानी की ग्राम रोजगार सेवक हैं। उनके गांव के प्रधान लादूराम हैं, जिन्होंने बड़े पैमाने पर घोटाले किये हैं। उन्होंने इसकी शिकायत सीडीओ औा डीपीआरओ से कर रखी है। इसकी जांच लम्बित है, जिससे बचने के लिए प्रधान लादूराम ने दैनिक जागरण में स्वयं को जिले का बड़ा पत्रकार बताने वाले वरुण यादव से सांठगांठ कर प्रतिभा पाण्डेय के विरुद्ध खबर छपवाई है।

कौशल पाण्डेय का कहना है कि जागरण संवाददाता ने उनका पक्ष भी नहीं जानना चाहा। उनका कहना है कि वरुण यादव ग्राम रेतादल सिंह के कोटेदार भी हैं। यह विकास भवन की खबर छापते हैं और अधिकारियों से प्रधानों की सेटिंग करा कर कमीशन वसूलते हैं। क्षेत्र के कई गांवों में शौचालय के लिए प्रधानों से इन्होंने सेटिंग कराई है। अधिकारियों का फोटो छापकर यह लोगों पर रोब गालिब करते हैं। मैंने 18 मई को मामले की शिकायत प्रभारी गोंडा से की तो उन्होंने मुझसे साक्ष्य मांगा, जिसे मैंने उनके वाहट्स अप पर भेज दिया है।

कौशल पाण्डेय ने दैनिक जागरण प्रबंधन को अवगत कराया है कि वह सम्मानित व्यक्ति हैं, भ्रामक खबरें प्रकाशित करने से जागरण की थू थू हो रही है। रिपोर्टर वरुण यादव पहले से कोटेदार है। कोटेदारों से ईमानदार पत्रकारिता की उम्मीद बेमानी है। मेरे खिलाफ खबर छपने से मेरी मानहानि हुई है। अगर जागरण प्रबंधन ने वरुण यादव के विरुद्ध कार्रवाई नही की तो वह मजबूरन न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर देंगे।

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यूपी के दो परम भ्रष्टाचारियों यादव और प्रजापति को गुस्सा क्यों आता है?

Amitabh Thakur : मेरी पत्नी नूतन ठाकुर ने पिछले दिनों कई गलत काम किये हैं लेकिन उनमे सबसे गलत काम निश्चित रूप से नॉएडा के भले शेर अभियंता और देश के पूर्व युवराज के जिले के खनन बाबा के खिलाफ शिकायतें हैं. ये दोनों ऐसे लोग हैं जिनके सम्बन्ध में बच्चा-बच्चा यह मानता है कि उन पर साक्षात् लक्ष्मी की कृपा है, साथ ही यह भी मान्यता है कि इन दोनों ने तंत्र का मन्त्र पूरी तरह समझ लिया है और ऊपर से नीचे तक सभी जगह इनके पत्ते फिट हैं, और जो व्यवस्था में फिट है, जाहिर है वह हिट है. इसीलिए यादव प्रजापति बंधू पूरी तरह और बुरी तरह हिट हैं, सुपरहिट. इस तरह हिट कि इनके लिए स्वयं व्यवस्था खड़ी हो जाती है यह कहते हुए कि ये भोले हैं और भले भी.

गलती इंसान से एक बार होती है, यदि कोई बार-बार वाही काम दुहराए तो उसे गलती नहीं कहते वह जानबूझ कर किया गया कुकृत्य है और नूतन ठाकुर यही कर रही हैं. तभी तो जैसे ही उन्होंने खनन बाबा के खिलाफ शिकायत दर्ज की, खनन बाबा ने चिल्लाते हुए कहा था कि नूतन ठाकुर को अपील करने की आदत हो गयी है, वे सस्ती लोकप्रियता के लिए इसी प्रकार से अपील करती रहती हैं. इस पर भी वे नहीं मानीं तो पहले एक खबरी बाबू से धमकी और उतने पर बात नहीं बनी तो रेप का गेम, अर्थात खलास करने का शानदार उपाय- वह भी अकेले नहीं पति-पत्नी को एक साथ निबटने का अचूक नुस्खा. यह अलग बात है कि रेप का खेल फ्लॉप हो गया और अब ये पति-पत्नी कहाँ बलात्कार-कहाँ बलात्कार कह कर चिल्लाते घूम रहे हैं पर व्यवस्था है कि इस कथित बलात्कार की घटना को उसी तरह भूल चुकी है जैसे गदहे के सिर से सिंह. 

नूतन की हरकतों से खफा खनन बाबा इतने पर नहीं माने थे और उन्होंने और उनके सभी मुंहबोले गदाधारियों ने एक-एक कर अपनी सत्यनिष्ठ और ईमानदारी की कहानी गाते हुए नूतन के खिलाफ एक के बाद एक मानहानि की नोटिस देनी शुरू की और फिर कोर्ट में मुकदमे. इस बीच पूरी दुनिया (और पूरी मीडिया) चिल्लाती रही, परत दर परत खोलती रही पर कहते हैं न कि मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी, या फिर सैयां भये कोतवाल तो अब डर काहे का. ऐसे में नूतन और तमाम खबरी नक्कारखाने में तूती की आवाज़ से अधिक कुछ नहीं साबित हुए, यह जरुर है कि इनकी दशा राणा सांगा की हो गयी कि अस्सी घाव लगे हैं तन पर. 

लगभग खनन बाबा के साथ-साथ ही जनमानस में एक और नायक का उदय हुआ- शेर अभियंता, नॉएडा वाले. सोना निकला, चांदी निकले, निकले कई-कई तार, पर जब ऊपर वाले का साया बाकी सब बेकार.  और, आज जब नूतन ने बताया कि शेर अभियंता डंके की चोट पर गीता की कसम खा कर कह रहे हैं कि उन्होंने कभी किसी मामले में भ्रष्टाचार नहीं किया और अपना सरकारी दायित्व पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया, तो मुझे पक्का विश्वास हो गया कि पक्का खलीफा सबसे पहले गीता की झूठी कसम खाना सीखता है, तभी उसे बाकी गलत कामों की शिक्षा दी जाती है. 

मुझे यह भी अच्छा लगा कि शेर अभियंता ने कहा है कि उनके बारे में सभी सूचनाएँ निर्मूल हैं और मीडिया ने इस मुद्दे को बिना तथ्यों के तोड़मरोड़ कर सनसनी फैलाई, क्योंकि यही बात लगभग हूबहू खनन बाबा ने भी कही थी. इसमें भी कोई शक नहीं कि यदि खनन बाबा और शेर अभियंता के कोई वाकई गुनाहगार हैं तो यह मीडिया ही है क्योंकि यदि नूतन जैसे चार-छह सिरफिरे इन मुद्दों को उठाते भी तो जिस प्रकार तंत्र के रखवाले पूरी बात समझ कर क्षीरसागर में अविचलित अवस्था में बने रहे, यदि ये मीडिया वाले भी वैसी ही शांति और निर्लिप्तता का प्रदर्शन करते तो ये मामले कत्तई नहीं फैलते. 

शेर अभियंता ने कहा है कि नूतन और मीडिया के लोगों ने उन पर अत्यंत आपत्तिजनक और मानहानिपरक आरोप लगाए हैं जिनपर वे कानूनी कार्यवाही करेंगे. इस रूप में भी वे खनन बाबा के ही सच्चे शिष्य जान पड़ते हैं. लब्बोलबाब यह कि देश-समाज को यादव प्रजापति राज की बहुत जरुरत है और सभी सच्चे देशभक्तों को इन लोगों के सहयोग में खड़े होना चाहिए और इनमे येन-केन-प्रकारेण खोट निकाले की अपनी बुरी आदत तो त्याग देना चाहिए. इसी में देश का सुख है, समाज का उत्थान है और स्वयं का भला भी. 

यूपी कैडर के वरिष्ठ और बेबाक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के एफबी वॉल से


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हाई कोर्ट में यादव सिंह कहिन- कभी भ्रष्टाचार नहीं किया, मीडिया की बनाई सनसनी है सब कुछ

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हाई कोर्ट में यादव सिंह कहिन- कभी भ्रष्टाचार नहीं किया, मीडिया की बनाई सनसनी है सब कुछ

Yadav Singh to HC : Never involved in corruption, media scandalized issue

Suspended Noida engineer Yadav Singh says that he has never been involved in any corruption whatsoever and has performed his official duty with utmost honesty and dedication. He said this in his counter-affidavit presented before Allahabad High Court in reply to the PIL filed by social activist Dr Nutan Thakur. As per the reply, he has no association with any of the company alleged in the PIL. He said he got his promotions as per rules and regulations. He said the previous FIR against him was filed by Noida engineer R P Singh due to his personal grudge against Ramendra which CBCID closed as being incorrect.

Yadav Singh said he never left the country nor did he ever divorce his wife Kusumlata as claimed in the petition. His wife owns Kusum Garments since 1997 which is presently worth Rs. 10.74 crores and none of his family members have any concern with any other company like Mamta, Meenu creations etc. He said only Rs. 11.5 lakh cash and 2.86 Kilo gold was found at his residence. He owes only one plot of 115 sq meter at Noida and all other properties attributed to him are incorrect. He said they do not have any business or political association with Mayawati’s brother Anand Kumar. He said the media has publicized and scandalized the issue without any facts and figure. He said the allegations made by Dr Thakur are highly derogatory and defamatory and he reserves his right to take legal recourse against her. The next date of hearing has been fixed on 20 April.

निलंबित नॉएडा अभियंता यादव सिंह ने कहा है कि उन्होंने कभी किसी मामले में भ्रष्टाचार नहीं किया और अपना सरकारी दायित्व पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया. उन्होंने यह बात सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर पीआईएल के हलफनामे में कही. हलफनामे के अनुसार उनका पीआईएल में दिए गए किसी कंपनी से कोई सम्बन्ध नहीं है. उन्होंने कहा कि उन पर पुराना एफआईआर नॉएडा के अभियंता आर पी सिंह और रामेन्द्र के परस्पर लड़ाई का नतीजा था जिसे सीबी-सीआईडी ने गलत पाते हुए अंतिम रिपोर्ट लगा दिया.

वे कभी देश छोड़ कर नहीं गए और न ही अपनी पत्नी कुसुमलता से कभी तलाक लिया, जैसा पीआईएल में लिखा है. उनकी पत्नी कुसुमलता 1997 से कुसुम गारमेंट्स चलती हैं जिसकी मौजूदा कीमत 10.74 करोड़ है. इसके अलावा उनके परिवारवालों का किसी अन्य कंपनी से कोई सम्बन्ध नहीं है. उनके घर से रेड में मात्र 11.5 लाख रुपये और 2.86 किलो सोना निकला था और उनके पास केवल 115 वर्गमी का एक प्लाट है, इसके अलावा उनके परिवार की बतायी जा रही सारी संपत्ति की सूचना गलत है. उन्होंने कहा कि उनका मायावती के भाई आनंद कुमार से कोई राजनैतिक या व्यावसायिक सम्बन्ध नहीं है. हलफनामे के अनुसार मीडिया ने इस मुद्दे को बिना तथ्यों के तोड़मरोड़ कर सनसनी फैलाई. उन्होंने कहा कि डॉ ठाकुर ने अत्यंत आपत्तिजनक और मानहानिपरक आरोप लगाए हैं जिनपर आवश्यकतानुसार कानूनी कार्यवाही करने की बात कही. मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होगी.


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पलटीमार मोदी सरकार : करप्शन घपले घोटाले की गुमनाम शिकायतों की जांच नहीं की जाएगी

ये लीजिए…. मोदी सरकार की एक और पलटी. दरअसल, पलटी तो महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने मारी है, लेकिन अगर तकनीकी तौर पर मुखिया यानी मुख्यमंत्री को साइड कर दें तो सरकार एक तरह से मोदी की ही है और उन्हीं के नाम पर चुन कर आई है. उन्हीं का चेहरा देखकर राज्य के लोगों ने भाजपा को वोट दिया था. इसलिए इस पलटी को मोदी की पलटी कहना गलत नहीं होगा. मोदी ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान चीख-चीख कर कहा था कि उनकी सरकार आई, तो भ्रष्टाचार की गुमनाम शिकायतों पर भी कार्रवाई की जाएगी.

सरकार की कार्यप्रणाली बदलने को लेकर मोदी का यह वादा सिर्फ केंद्र सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारों के भी था. लेकिन अब मोदी की गोदी में बैठकर महाराष्ट्र की सरकार चला रहे फडणवीस ने नया फरमान जारी कर काले कारनामों को उजागर करनेवालों को मंसूबों पर ढक्कन लगा दिया है. पढ़िए इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर….

Maharashtra govt won’t probe anonymous graft complaints

Express News Service | Mumbai |

In a severe blow to whistleblowers in Maharashtra, the BJP-led state government has made it clear that anonymous complaints, irrespective of how serious allegations are levelled in them, won’t be probed. The General Administration Department, headed by Chief Minister Devendra Fadnavis, has issued directives to all state departments stating that complaints not carrying the name and the address of the complainant must be closed without any action. It further states that the same rule should be followed in complaints that carry the name of the complainant, but the allegations levelled in them are “vague” in nature.

Even in cases where the complainant chooses to identify himself/herself and the allegations are “verifiable”, the approval of the competent authority should be taken for taking cognisance of such a complaint. After which, it must first be referred back to the complainant to ascertain if he/she owns up to filing the complaint. If nothing is heard from the complainant within a month, such complaints must be treated as “pseudonymous” in nature and discarded without any probe, the directive adds.

Sources in the government said the move was to arrest policy paralysis in the bureaucracy. But anti-corruption activists said that it would discourage people from becoming whistleblowers and exposing corruption. The government, on the other hand, has argued that whistleblowers who desire to protect their identity were already protected under the Public Interest Disclosure and Protection of Informers Resolution, 2004, where the identify of a complainant is kept a secret.

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