आधी रात में आधी आबादी सड़क पर निकल कर बोली- मेरी रातें, मेरी सड़कें

महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर जताया गुस्सा, पित्रसत्तात्मकता को बढाने वाले भेदभावपूर्ण समाज व्यवस्था के विरूद्ध नायाब प्रदर्शन, विभिन्न समुदायों की महिलाओं ने किया आधी रात को पैदल मार्च, पीड़िता को दोषी ठहराने की कुत्सित मानसिकता का शहर की महिलाओं ने किया विरोध…

दिनांक 12 अगस्त 2017 को ”मेरी राते मेरी सड़के” अभियान के तहत वाराणसी शहर के विभिन्न समुदायों की महिलाओं और लड़कियों ने लंका से अस्सी तक मार्च निकाला. रात 11  बजे से शुरू हुआ यह मार्च मार्च रात एक बजे लंका पहुंचा. इस मार्च के दौरान शामिल विभ्भिन समुदायों की महिलावो और लड़कियों ने  आजादी और बराबरी के गीत गाये, और  इस अभियान को आगे बढाने के लिए आगे की रणनीति बनाई. रात पर अधिकार को  लेकर शुरू की गयी इस चर्चा में में मूल रूप से महिलाओं के विरुद्ध बढ़ाते अपराधो और बदले में अपराधियों के बजाये पीडित महिलाओं को ही कटघरे में खड़े किये जाने की प्रवृत्ति पर केन्द्रित रही.

उपस्थित महिलाओं ने रात एक बजे लंका पहुच कर चाय पीने के क्रम में दरअसल इस पित्रसत्तात्मक सोच को चुनौती दी जो महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर घरों में कैद करने पर अमादा हैं. उपस्थित महिलाओं ने एक स्वर से यह तय किया की आज की यह आदी रात की यात्रा केवल आगाज है और इन्ही तरीकों से आगे समाज में बराबरी और सुरक्षा की लड़ाई लड़ी जायेगी. वहा सभी महिलावो ने मिलकर ये तय किया की हम आगे इन सरे मुद्दों पर सरकार  से जवाब मांगेंगे और अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, इस कार्यक्रम में शामिल महिलाये और लड़किया हर जाति धर्म और संगठन से परे सिर्फ अपने हक़ के लिए आज इकठ्ठा  हुई, और एक दूसरे से ये वादा किया कि हम सभी मिलकर समाज की इन रूढ़ियों को तोड़ेंगे.

महिलाओं के विरूद्ध होने वाली प्रत्येक घटनाओं के बाद मंत्रियों, नेताओं, और समाज में पित्रसत्ता के अन्य प्रतिनिधियों द्वारा लड़कियों को ही जिम्मेदार बताने वालों को आड़े हाथों लिया गया. मार्च को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज से तीन दिन बाद पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा होगा। कही परेड, कही झांकियां, कही आजादी की वीर गाथाएं, कहीं भाषण और इन सबके बीच कही एक निर्भया, वर्णिका, रागिनी जैसी तमाम लड़कियां घर से बाहर आजादी तलाशती हुए खतरों का सामना करते हुए भयानक ज़िन्दगी जीने को मजबूर है।

कभी महसूस किया है आपने कैसा लगता होगा जब आप कुछ बनने का सपना ले कर घर से बाहर कदम रखें और बाहर निकलते ही किसी की हैवानियत भरी नजर आपकी छाती पर तो कभी शरीर के दुसरे अंगों पर होती है. आप उनसे बचते बचाते फिर आगे बढ़ते है और फिर वही नज़र अब आपका पीछा करती रहती है. आपके विरोध के बावजूद भी तब आप  को छूने की कोशिश की जाती है और फिर, फिर तो कहानी अख़बारों में एक स्थान भी बना पाती है. यकीन मानिये देश में आधी आबादी इसी डर के साये में जी रही है, इसी डर के साथ वो स्कूल/कॉलेज, कार्यस्थल और यहाँ तक की कई बार घर में भी रहती है।

वक्ताओं नें आंकड़ों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि हर 6 सेकंड में देश में एक रेप की घटना होती है. महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा और भी कई रूपों में हो रही है। आंकड़ो में अगर इन सभी घटनाओं को शामिल किया जाए तो आप देश से पलायन की योजना कर लेंगें। इस तरह की घटनाये सिर्फ हमारे देश में नहीं हो रही यह मानते हुए सरकार, प्रशासन और समाज की जोजवाबदेही होनी चाहियें वो उसे तत्परता से निभाया जाए. यह दुःखद है कि केंद्रीय स्तर पर एक अभियान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जोर शोर से चल रहा है और एक तरफ महिलाओं के प्रति होती घटनाओं पर उन्हें ही रात में निकलने का दोषी मानते हुए एक लम्बी सलाह की लिस्ट और धमकी दे दी जाती है. जरा हम इन् घटनाओ की लिस्टिंग करें तो जान पाएंगे की ज्यादातर घटनाएं दिन के उजाले  में हो रही है.  मार्च में महिलाओं के समर्थन में उनके पुरुष साथी भी मौजूदा थे. मुक्य रूप से मुनिज खान, जागृति राही, नीता चौबे, शीला तिवारी, श्रुती नागवंशी, नीलम पटेल, पूजा, शानिया, अनिता सिंह, सुजाता भट्टाचार्य, नम्रता, राजेश्वरी, और तमाम गृहणियों ने भी भारी संख्या में भागीदारी की।

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