ब्लैकमनी पर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना कांग्रेसी चरित्र दिखा दिया

Mukesh Yadav : कौन करेगा इस न्यूज़ को ब्रेक? क्या कोई करेगा? ब्लैकमनी पर मोदी सरकार ने भी आज सुप्रीम कोर्ट में अपना कांग्रेसी चरित्र दिखा ही दिया!! सरकार कहती है कि काला धन रखने वालो के नाम उजागर नहीं कर सकते!! वही कांग्रेसी जवाब और वजह! हालांकि जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड में इन धनपशुओं के नाम उपलब्ध होंगे!..इतना ही काफी होता; अगर मीडिया स्वतंत्र होता!! इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म शायद इन नामों को जनता तक पहुँचाने की जुर्रत करता! लेकिन आज ऐसा मीडिया समूह खोजना मुश्किल है, जो मोदी के नाम से खौफ न खाता हो? रही बात पत्रकारों की तो उनकी सीमाएं जग जाहिर हैं। नौकरी से निकाल दिए जाओगे- वाले जुमले का खौफ ही उनके लिए काफी है, नहीं? ऐसे में कौन जोखिम उठाए?

फिर एनडीए की सरकारों को दादागिरी दिखाने में भी कोई हिचक नहीं होती। आपको याद ही होगा अटलजी की सरकार में किस तरह आउटलुक ग्रुप को निशाना बनाया गया था! और ब्रजेश मिश्रा साहब ने किस तरह आउटलुक के वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता की (क्लास) ली थी- (क्लोज एनकाउंटर्स)! रही बात कांग्रेसी सरकारों कि तो भ्रष्टाचार के कीड़े ने उनके दांत इस लायक छोड़े ही नहीं कि वें काट सकें। बताने की जरूरत नहीं पहले इन्होंने भी कसर नहीं छोड़ी। इमरजेंसी का काला अध्याय इन्हीं कांग्रेसियों की देन है।

मेरा मानना हैं कि सरकारों में लगा भ्रष्टाचार का घुन, मीडिया को मजबूत करता है! मीडिया को गुर्राने का मौका देता है। केंद्र और राज्यों में कांग्रेस की सरकारों, राज्यों में बीजेपी और क्षेत्रीय दलों की सरकारों के सन्दर्भ में हम इस प्रतिस्थापना को सच होते हुए देख चुके हैं या देख रहे हैं। मोदी सरकार अभी नई है। काजल की कोठरी में दाग कभी भी लग सकता है; और दाग हमेशा अच्छे ही साबित हों, यह जरूरी नहीं। अटल सरकार में भी भ्रष्टाचार मुद्दा बना था; वह भी जॉर्ज फ़र्नान्डिस जैसे ईमानदार नेता की नाक के नीचे- ताबूत घोटाला! एक खोजी पत्रकार तो यह मानकर ही चलता कि भ्रष्टाचार तो हो ही रहा है! बस सामने आने या लाने की देर है, नहीं? वक़्त बीतने के साथ-साथ मोदी सरकार की कमजोरियां भी मीडिया में ख़बरें बनेंगी ही। आप बहुत देर तक भय दिखाकर चीजों को नियंत्रित नहीं कर सकते। मीडिया के मामले में तो ये तथ्य और भी सटीक है।

दरअसल न्यूज़ मीडिया का चरित्र है ही ऐसा कि वह हमेशा-हमेशा के लिए सरकार का बगल-बच्चा नहीं बन सकता। निजी न्यूज़ चैनल दूरदर्शन बनकर सर्वाइव नहीं कर सकते! जनता के हित में न सही, अपने हित में तो बोलेंगे। अपने वजूद के लिए! सर्वाइव करने के लिए समाचार माध्यमों को- सरकार, चाहे वह मोदी सरकार ही क्यों न हो- के सामने ऑपोजिसन कि भूमिका में आना ही होगा। मोदी वोट तो दिला सकते हैं, लेकिन बहुत देर तक टीआरपी नहीं दिला सकते और वोट से चैनल नहीं चलते! इसलिए देर सबेर समाचार माध्यमों को अपने एजेंडा यानि न्यूज़ पर लौटना ही होगा? मोदी सरकार, जनता का पैसा हजम करने वाले जिन चोरों के नाम उजागर करने से बच रही हैं- इस न्यूज़ को ब्रेक कर कोई भी न्यूज़ मीडियम एक नई शुरुआत कर सकता है। लेकिन देखना होगा कौन करेगा इस न्यूज़ को ब्रेक? क्या कोई करेगा?

पत्रकार और स्प्रिचुवल एक्टिविस्ट मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

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