पत्रकार करन थापर ने सुनाई मोदी जी के पानी मांगने वाली पूरी कहानी

मशहूर एंकर और लेखक करन थापर ने एक बार नरेंद्र मोदी का इतना तगड़ा इंटरव्यू लिया कि मोदी जी पानी मांगने लगे थे। उस वाले किस्से के बारे में करन थापर ने बीबीसी से विस्तार से चर्चा की। नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्मंत्री हुआ करते थे. बात वर्ष 2007 की है। करन थापर ने मोदी जी का इंटरव्यू शुरू किया। Continue reading

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तो राहुल गांधी ने ये तय कर लिया है कि अंबानियों की और उनके मीडिया की परवाह नहीं करनी है!

Prashant Tandon : बढ़िया धुलाई के बाद प्रेस भी – पूरा काम किया आज राहुल गांधी ने… राहुल गांधी ने मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर बेहतरीन भाषण दिया. राहुल ने आज वही बोला जो लोग सुनना चाहते थे. देश की तमाम समस्याओं, घटनाओं और सरकार की विफलताओं पर सरकार को जवाबदेह ठहराया और मोदी और अमित शाह को बड़ी होशियारी से बाकी बीजेपी से अलग खाने में भी डाल दिया. भाषण के बाद मोदी की सीट पर जाकर उन्हे गले लगा कर एक स्वस्थ्य संसदीय परंपरा भी निभाई. Continue reading

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राहुल गांधी मोदी के गले मिले या गले पड़े! देखें तस्वीरें

शंभूनाथ शुक्ल : राहुल ने मोदी को गले लगाया अथवा धोबीघाट दाँव का इस्तेमाल किया। पप्पू ने बता दिया कि साठ साल का अनुभव सिखा गया है कि बीजेपी चाहे जितनी फुला जाए, पर रहेगी नीचे ही। राजनीति ऐसे की जाती है प्रधानमंत्री जी! सरकार आपकी, संसद आपकी और स्पीकर भी आपकी पार्टी की ही। लेकिन बैठे ही बैठे आप चित हो गए। अविश्वास प्रस्ताव लाना भी किसे था, संसद में सबके सामने आपको हैसियत जतानी थी, सो जता दी।

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राहुल गांधी ने सच में भूकंप ला दिया, मोदी के लिए कहा- ये चौकीदार नहीं, भागीदार

Sanjaya Kumar Singh : चौकीदार नहीं, भागीदार… राहुल गांधी ने संसद में प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोला। नोटबंदी और जीएसटी से लेकर बिना एजंडा के चीन जाने और उसे चीन का एजंडा बताने से लेकर रक्षा मंत्री पर भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि फ्रांस के साथ राफेल विमान की कीमत नहीं बताने संबंधी कोई करार नहीं है।

संसद में भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक भाषण देने के बाद मोदी के गले मिलते राहुल गांधी.

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चंदा कोचर के घोटाले से तीन ‘नीरव मोदी’ तैयार हो रहे हैं

दीपक कोचर, चंदा कोचर और वेणुगोपाल धूत चल दिए नीरव मोदी की राह पर

उन्मेष गुजराथी, दबंग दुनिया

मुंबई। आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर के घोटाले से तीन ‘नीरव मोदी’ तैयार हो रहे हैं। चंदा कोचर पर आरोप है कि उन्होंने बैंकों के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपने पति के दोस्त वीडियोकॉन के वेणुगोपाल धूत को लोन दिया था। लोन के एवज में धूत ने दीपक कोचर की कंपनी में करोड़ों का निवेश किया। आरोप है कि इससे चंदा कोचर और उनके परिवार को बड़ा मुनाफा हुआ। सरकार इस मुद्दे पर यदि गंभीरता से ध्यान नहीं देती है, तो चंदा कोचर, उनके पति दीपक मोदी और धूत फरार हो सकते हैं। कई बड़े मामलों का खुलासा होने की आशंका को देखते हुए तो यह कहा जा सकता है कि अभी कई ‘नीरव मोदी’ भागने की कतार में हैं। Continue reading

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नाकामी छुपाने के लिए 2019 चुनाव में राम मंदिर कार्ड खेलेगी भाजपा

राम मंदिर मुद्दे पर मोदी की गंभीरता को समझने में भारी भूल कर रहा मीडिया!  2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से मीडिया में राम मंदिर पर चर्चा होती रही है। यूपी में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये चर्चा आम हो गई है। अक्सर टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर, पत्रकार, मुस्लिम धर्मगुरू, बुद्धिजीवी जब खुले तौर पर  मंदिर कब बनेगा या निर्माण की तारीख बताने जैसे असहज सवालों पर सरकार के प्रवक्ताओ को घेरने की कोशिश करते हैं तो शायद इन सभी महानुभावों को ये समझ मे नहीं आता कि अगर वाकई में इन्हें तारीख बता दी गयी तो इन्हें न्यूज़रूम से सीधे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ेगा।

जो नेता  नोटबन्दी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे दुस्साहसी निर्णय लेने की हिम्मत रखता है और उसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर सकता हो तो उसे  मंदिर बनाने में क्या दिक्कत हो सकती है। नोटबन्दी के नकारात्मक परिणामों को लेकर विपक्ष 8 नवम्बर से  आज तक मोदी को कभी घेर नहीं पाया क्योंकि देश की जनता मोदी के लिए ढाल बनकर खड़ी थी। मोदी को इस बात का आकलन जरूर था कि नोटबन्दी जैसे फैसले अपनी लोकप्रियता के चरम पर ही लिए जा सकते हैं अन्यथा इसके परिणाम वेनेजुएला या इमरजेंसी जैसे हो सकते थे।
वर्तमान परिस्थितियों में इस मुद्दे पर मोदी बहुत सावधानी से एक-एक कदम बढ़ा रहे है।

केंद्र राज्य दोनों में ही उनकी सरकार होने से उन पर मंदिर निर्माण के वादे का भारी दबाव है इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार है। एक ठोस आधार के जरिये वे 2019 चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे कि अगर उन्हें अगला कार्यकाल मिलता है तो मंदिर निर्माण के वादे को वो अंजाम तक पहुचाएंगे। सभी को विदित है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले को भी एक पक्ष या दोनों ही पक्ष कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यानी इस मुद्दे को लंबे समय तक लटकाने की कवायद आगे भी जारी करने का भरपूर प्रयास होगा। लेकिन अगर सरकार मुखर एवं प्रतिबद्ध हो तो इस मामले को लटकाना बिल्कुल आसान नहीं होगा।

देश का मीडिया मोदी के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी उनके निर्णयों को समझने में नाकाम रहा है। उनके निर्णय लगातार मीडिया के आकलन के बिल्कुल उलट साबित होते रहते हैं। शायद 2019 चुनाव तक मीडिया का सिर चकरा जाए। मोदी का योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उनके गूढ़ निहितार्थ है। वे गुजरात की तरह यूपी को भी हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना  चाहते हैं। उनके कार्यकाल में अगर अनेक बाधाओं के बाद भी अगर राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रशस्त होता  है तो वे सीधे-सीधे देश के 80% हिन्दू जनमानस के दिलों पर स्थायी तौर पर राज करेंगे। बंगाल, केरल जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में जहाँ लम्बे समय से बीजेपी सत्ता पाने का ख्वाब देख रही है, वहाँ उसका आधार बनाना  बेहद आसान होगा। बेरोजगारी, महंगाई, गिरती विकास दर जैसे अनेक मुद्दों पर घिरी सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए 2019 चुनाव में 2014 की तरह ध्रुवीकरण के लिए  हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने के लिए राम मंदिर का मुद्दा सबसे  उपयुक्त मानती है।

अभय सिंह
abhays170@gmail.com

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जयंत सिन्हा, ईबे, पियरे ओमिडयार, नरेंद्र मोदी और बाहरी पूंजी का भारतीय चुनाव में खुला खेल!

ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह के सौजन्य से पढ़ें…

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद pando.com पर Mark Ames ने 26 मई 2014 को लिखा था- “भारत में चुनाव के बाद एक कट्टरपंथी हिन्दू सुपरमैसिस्ट (हिन्दुत्व की सर्वोच्चता चाहने वाले) जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है, को सत्ता मिल गई है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जय कारने (यहां भी जय) ने कहा है कि ओबामा प्रशासन एक ऐसे व्यक्ति के साथ “मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है” जो अल्पसंख्यक मुसलमानों (और अल्पसंख्यक ईसाइयों) के घिनौने जनसंहार में भूमिका के लिए 2005 से अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) के वीजा ब्लैकलिस्ट में है।

इस शुरुआती पैरा ग्राफ से आपको लेखक, पांडो डॉट कॉम के तेवर और लेख का अंदाजा हो जाएगा। इसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के बारे में लिखा था, पांडो के पाठक जानते हैं कि ओमिडयार (Omidyar Network) नेटवर्क ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार की लोकोपकारी शाखा है। 2009 से ओमिडयार नेटवर्क ने भारत में अपने पोर्टफोलियो के किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से जयंत सिन्हा की बदौलत हैं जो मैकिन्जी के पूर्व साझेदार और हावर्ड के एमबीए हैं जिसे अक्तूबर 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स को चलाने के लिए नौकरी पर रखा गया था।

सिन्हा के कार्यकाल में ओमिडयार नेटवर्क ने अपने निवेश का बड़ा हिस्सा भारत की ओर घुमा दिया। इस तरह 2013 तक भारत में निवेश ओमिडयार नेटवर्क के प्रतिबद्ध कोष का 18 प्रतिशत जो 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा था हो चुका था। इसमें इसके पोर्टफोलियो की कुल कंपनियों का 36 प्रतिशत शामिल था। इस साल श्री सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की नौकरी छोड़ दी ताकि मोदी के चुनाव अभियान में सलाह दे सकें और भाजपा के टिकट पर एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ सकें। सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने 1998 से 2002 तक पिछली भाजपा सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया था जब उनकी सरकार ने परमाणु बम का परीक्षण किया था। इस साल सिन्हा के पिता ने अपनी संसदीय सीट छोड़ दी और बेटे जयंत सिन्हा को अपनी जगह लेने दी।

चुनाव प्रचार के दौरान जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने गुजरात दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा माफी मांगने से मना किए जाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। तब उन्होंने कहा था, “मोदी सही हैं … वे माफी क्यों मांगें?”  ओमिडयार के पूर्व कर्मचारी उनके बेटे जयंत सिन्हा ने (जब लेख लिखा गया था उससे कुछ सप्ताह पहले) दावा किया कि उनके पिता की भाजपा सरकार ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय नाराजगी को नजरअंदाज कर परमाणु बम का परीक्षण किया जिसे पोखरण के नाम से जाना जाता है। मोदी को चुनाव जीतने में सहायता करने के लिए जयंत सिन्हा के ओमिडयार नेटवर्क छोड़ने के कुछ ही समय बाद मोदी ने एक भाषण दिया जिसमें भारत के ई कामर्स बाजार को ई-बे जैसी विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की मांग की। ईबे के सबसे बड़े शेयरधारक पियरे ओमिडयार हैं।

संदेश स्पष्ट था- मोदी हाईटेक इंडिया के उम्मीदवार हैं, हिंसक अतिराष्ट्रवाद के बावजूद। इसी समय सिन्हा ने मोदी और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों जैसे जेपी मोरगन, मोरगन स्टैनली और नोमुरा बैंक के बीच एक समिट मीटिंग का आयोजन करने में सहायता की। संभवत: इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है कि मोदी के अति राष्ट्रवादी प्रयासों की सवारी करके पिछले सप्ताहांत (लेख पुराना है, उसके हिसाब से) जब जयंत सिन्हा चुनाव जीत गए तो ओमिडयार नेटवर्क ने उन्हें बधाई दी।  इसके कुछ ही समय बाद ओमिडयार के पूर्व कर्मी (पुराने आदमी भी कह सकते हैं) ने जोर देकर कहा कि, “श्री मोदी एक महान लोकतांत्रिक (हस्ती) हैं।”

इसके बाद pando.com पर Mark Ames ने ही 9 नवंबर  2014 को (नोटबंदी के बाद) एक और दिलचस्प पीस लिखा था। इसका शीर्षक था, भारत में पियरे ओमिडयार का आदमी मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दूसरा शीर्षक था, ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार के ग्लोबल इंपैक्ट फंड में लंबे समय तक सीनियर एक्जीक्यूटिव रहे जयंत सिन्हा को भारतीय अतिराष्ट्रवादी नेता नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।  बोल्ड अक्षर में अपडेट के साथ शुरू होने वाली कहानी इस प्रकार थी – सिन्हा (जयंत) का नया पद स्पष्ट बता दिया गया है – वो अब भारत के जूनियर वित्त मंत्री हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के तहत काम कर रहे हैं। लंबे समय तक ओमिडयार का आदमी रहा व्यक्ति अब इस स्थिति में है कि 2015 का बजट तैयार करने में सहायता करेगा जिसके बारे में (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी ने (हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक) संकेत दिया है कि “बदलाव लाने वाला” होगा। 

जयंत सिन्हा ने 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की स्थापना की थी और फर्स्ट लुक मीडिया पब्लिशर्स इंपैक्ट फंड में साझेदार और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की पांच सदस्यों वाली ग्लोबल एक्जीक्यूटिव कमेटी में भी काम किया था तथा ओमिडयार नेटवर्क के 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा के फंड को भारत की ओर मोड़ दिया था। इस तरह इसे दुनिया के सबसे बड़े, 700 मिलिय़न डॉलर के इंपैक्ट फंड के लिए सबसे सक्रिय अकेले देश का निवेश बनाया था।  इस साल के शुरू में ओमिडयार नेटवर्क के साझेदार और प्रबंध निदेशक का पद छोड़ दिया था ताकि धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपने पिता की संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकें।

अब मोदी मंत्रिमंडल में सिन्हा की नियुक्ति ने उन्हें पिछले दो सप्ताह में किसी दक्षिण पंथी, कारोबार समर्थक सरकार में सत्ता तक पहुंचने वाली दूसरी ओमिडयार हस्ती बना दिया है।  
पांडो डॉट कॉम ने आगे लिखा है, जैसा पांडो डेली पूरे साल सूचित करता रहा है, जयंत सिन्हा और उनके बॉस, ओमिडयार भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक अस्वाभाविक दोहरी भूमिका निभाते रहे हैं और लोकोपकारी दिखने वाले काम सोच-समझ कर राजनीतिक निवेश के रूप में किए गए हैं जो सिन्हा के राजनैतिक अभियान का हिस्सा रहा है।

ओमिडयार के ऐसे ग्रांट में से कुछ लाभ के लिए किए गए निवेश थे। जैसे एसकेएस माइक्रोफाइनेंस जैसी माइक्रोफाइनेंस फर्म में ओमिडयार निवेश जिसका समापन बहुत ही घातक ढंग से हुआ जब एसकेएस के कर्ज वसूलने वालों ने जोर लगाया और उनपर सैकड़ों गरीब ग्रामीणों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। इन लोगों ने कीटनाशक पीकर, डूबकर और अन्य तरीकों से आत्महत्या कर ली थी। ओमिडयार सिन्हा का एक और निवेश गैर सरकारी संगठनों में गया जिसने धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अच्छी तरह काम किया जब वह विपक्ष में थी और यह काम खासतौर से पिछली (सेंटर-लेफ्ट) सरकार के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करने का था  जो 2007 से इस साल तक लगातार सत्ता में बनी रही।

भाजपा ने इस साल का चुनाव भ्रष्टाचार के विरोध के दम पर जीता और ओमिडयार सरकार ने भारत के सबसे प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी गैर सरकारी संगठनों के अभियान, “आई पेड अ ब्राइब” के लिए धन मुहैया कराया।  2010 में सिन्हा और ओंमिडयार नेटवर्क ने एक भारतीय गैरसरकारी संगठन, जनाग्रह को तीन मिलियन डॉलर दिए ताकि वह  “आई पेड अ ब्राइब” अभियान चला सके। इस खबर में भी जयंत सिन्हा ओमिडयार नेटवर्क की मिलीभगत का जिक्र है तथा गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सहायता तथा उसकी शैली का विवरण है। इसमें अजीत डोभाल के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाना शामिल है। 

इसी खबर में आगे बताया गया है कि सिन्हा और ओमिडयार से धन पाने वाला एक और गैर सरकारी संगठन 2012 में सांसदों को देश के सख्त ई कामर्स कानून के संबंध में अवैध रूप से प्रभावित करता पकड़ा गया था। उस समय भारत की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी ने इस एनजीओ की निन्दा की थी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक कहा था तथा विदेशी खुफिया एजेंसी को छिपकर काम करने और भारत सरकार में घुसपैठ करने में सहायता करने का आरोप लगाया था और इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था (इस एनजीओ का नाम नहीं है)।

इस मामले के पकड़े जाने के बाद संबंधित एनजीओ के सह-संस्थापक सीवी मधुकर को ओमिडयार ने नौकरी पर रख लिया। अब वे “सरकारी पारदर्शिता” में  ओमिडयार नेटवर्क इंडिया के डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टमेंट हैं। इस बीच सिन्हा अपना काम करते रहे हैं … जिससे ओमिडयार को प्रत्यक्ष लाभ होता है जो अभी भी ईबे के चेयरमैन हैं। … जून (2014 में) के शुरू में मोदी और सिन्हा के चुनाव जीतने के बाद, मोदी की नई सरकार ने ईबे साथ-साथ अमैजन और गूगल के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था ताकि भारत के ई कामर्स कानून लिखने में सहायता की जा सके।

अनुवादक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय लंबे समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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2019 के अंत तक बंद होंगे 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे!

आज़ादी के 70 साल बाद अभी वर्तमान का यह समय छोटे और मध्यम अखबारो के लिए सबसे कठिन है। यदि सरकार के DAVP पॉलिसी को देखा जाय तो लघु समचार पत्रों को न्यूनतम १५ प्रतिशत रुपये के रूप में तथा मध्यम समाचार पत्रों को न्यूनतम ३५ प्रतिशत रुपये के रूप में विज्ञापन देने का निर्देश है। गौरतलब है कि भारत विविधताओं का देश है यहां विभिन्न भाषाएं हैं। ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। बड़े अखबार समूह की पहुंच वहां तक नहीं है। यदि विज्ञापन के आवंटन में भाषा और मूल्य वर्ग का ध्यान नहीं रखा गया तो निश्चित ही उस विज्ञापन की पहुंच विस्तृत तथा व्यापक नहीं होगी और विज्ञापन में वर्णित संदेश का प्रसार पूरे देश के समस्त क्षेत्रों तक नहीं हो पायेगा। पूर्व मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक प्रश्र के उत्तर में नीति के पालन की बात कही गयी थी। परन्तु आज वह बयान झूठ साबित हो रहा है।

गांव का सरपंच यदि मजदूरी का भुगतान नहीं करता। पटवारी खसरे की नकल देने में रिश्वत मांगता है। दफ्तर का बाबू हर काम के लिए गरीब को दौड़ाता है। शुद्ध पानी नहीं मिल रहा। बिजली नहीं है। ठेकेदार ने मजदूरी हड़प ली। सड़के टूटी हैं। गन्दगी है। तो ऐसे सवालों के लिए आम जनता बड़े अखबारों के दफ्तर में नहीं पहुंचती है। वह जिंदगी की जद्दोजहद से परेशान अपने गांवों तथा कस्बों से छपने वाले अखबारों के दफ्तरों में पहुंचता है। लेकिन मोदी सरकार तो पूंजीपतियों के इशारे पर चल रही है। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक बार फिर इमरजेन्सी की तलवार लटक रही है। कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो रही है। आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अखबारों को जगह जगह जमीनें दिया था। अखबारी कागज पर सब्सिडी मिलती थी ताकि चौथा खम्भा जीवित रहे। परन्तु वर्तमान सरकार को ना जाने कौन सलाह दे रहा है कि सिर्फ बड़े मीडिया हाउस पर मेहरबान है यह।

सरकार की डीएवीपी पालिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने के कगार पर हैं, या फिर बंद हो रहे हैं। इसका दूसरा बड़ा कारण कारण है बड़े अखबारों का लागत से 90% कम पर अखबार बेचना या कहें कि एक तरह से फ्री में देना। आज अखबार के सिर्फ एक पेज के कागज का दाम 30 पैसे पड़ता है। इस तरह 12 पेज के अखबार के कागज की कीमत 3.60 रुपये होती है। इसके बाद प्रिंटिंग, सैलरी तथा अन्य खर्च कम से कम प्रति अखबार रु 2.40 आता है। कुल मिलाकर 6 रुपये होता है। इसके बाद हॉकर तथा एजेंट कमीशन, टांसपोर्टशन 50%, यानी 3 रुपये। टोटल 9 रुपये खर्च पर एक पेज की लागत 75 पैसे आती है। इस प्रकार 20 पेज का अखबार का 15 रुपये होता है। जितना ज्यादा पेज उतना ज्यादा दाम होने चाहिए। तब छोटे औऱ मध्यम अखबार बिक सकते हैं और तभी प्रसार बढ़ेगा, नहीं तो असम्भव है।

जैसे छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की पॉलिसी है, एन्टी डंपिंग डयूटी, विदेशी कंपनियों से यहां के उद्योग धंधों को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी लगाया जाता है, उसी तरह लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, मोनोपोली कमीशन भी इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। जबतक ये नहीं होता है, तबतक कभी भी छोटे और मध्यम अखबार नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि इन्हें प्राइवेट विज्ञापन नहीं मिलता है। इसलिए लागत से कम बेचना सम्भव नहीं है। बड़े अखबारों का फर्जी प्रसार सबसे ज्यादा है। अखबार फ्री देकर प्रसार बढ़ाते हैं। सिर्फ इतना ही दाम रखते हैं कि हॉकर रद्दी में बेचे तो उसे नुकसान हो। बड़े अखबारों का ज्यादातर प्रसार बुकिंग के द्वारा होता है। घर की महिलाएं बुकिंग से मिलने वाले गिफ्ट के लिए स्कीम वाले अखबार खरीदती हैं। बुकिंग के बाद हर महीने हॉकर को जो कुछ राशि देनी पड़ती है वो भी अखबार का रद्दी बेचकर निकल जाता है। इस तरह अखबार फ्री में मिलता है। सभी बड़े अखबारों के मालिक बड़े उद्योगपति हैं या बड़े उद्योगपतियों ने इनके शेयर खरीद रखे हैं। उनके प्राइवेट विज्ञापन एक तरह से उनके ही अखबारो में आते हैं। एक तरह से एक जेब से अपना पैसा दूसरे जेब में डालते हैं।

सभी बड़े अखबार एक होकर छोटे और मध्यम अखबार को सरकार की नीतियों में बदलाव करवा कर निबटाने में लगे हैं। इसी का नतीजा है नई डीएवीपी पालिसी और जीएसटी। जो हालात दिख रहा है, उसके मुताबिक 2019 तक 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे। उसके बाद सिर्फ बड़े अखबार रहेंगे और सरकार के गुणगान में लगे रहेंगे। सभी सरकारी विज्ञापन भी उनकी झोली में जायेंगे और उसके मालिक लोग अपने उद्योगों की दलाली करते रहेंगे।

अखबार को विज्ञापन लेने का हक है क्योंकि सिर्फ अखबार ही ऐसा माध्यम है जिससे रोजाना 2 से 4 पेज सिर्फ सरकार और उसके सभी अंगों की खबरें, चाहे प्यून से PM या चपरासी से CM, मुखिया से लेकर सभी नेताओं तक, की छपती है। यह किसी अन्य माध्यम में नहीं होता है। फिर भी आज इस चौथे खंभा की आज़ादी पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं। अखबार को विज्ञापन लेने का हक है। कम से कम दो पेज रोजाना। जितना एरिया न्यूज का, उतना कम से कम विज्ञापन का होना चाहिए। पहले सरकार अखबार को प्राइम जगहों पर जमीन देती थी, सब्सिडी पर कागज, अब GST लगाकर वसूली के साथ-साथ इंस्पेक्टर राज। कोई भी आकर लेखा जोखा चेक करने लगेगा।

सरकारें कहती हैं कि सरकार के फेवर में लिखो, विरोध में लिखोगे तो विज्ञापन बंद। जज का वेतन सरकार देती है लेकिन क्या सरकार कहती है कि सरकार के विरोध में जजमेंट दोगे तो वेतन और सुविधा बंद कर दिया जाएगा? यही नहीं, समय समय पर इनके वेतन इत्यादि में वृद्धि होती है। परन्तु आज अखबार के विज्ञापन में कमी की गई और अब इसे खत्म करने की साजिश हो रही है। आज देश में एक दूसरे तरह का संकटकाल है।  बड़े बड़े उद्योगों के मालिक मीडिया के शेयर खरीद रहे हैं और मीडिया उनका गुलाम बनता जा रहा है। अमेरिका की तरह भारत में भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति एक व्यापारी बन सकता है या फिर पाकिस्तान की तरह सेना का कठपुतली प्रधानमंत्री बन सकता है। पाकिस्तान में पहले सेना तख्ता पलट कर देती थी। अब कठपुतली प्रधानमंत्री और सरकार के सभी बड़े पदों के लोग सेना के कठपुतली हैं।

छोटे और मध्यम अखबार से जुड़े लोग सड़क पर आ जायेंगे और बड़े मीडिया हाउस के जुड़े पत्रकार भी परेशान होंगे क्योंकि जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार बेरोजगार होंगे तो वो TV ईत्यादि हर जगह नौकरी की लाइन में लगेगा। ऊपर से सरकार पेनाल्टी का केस डाल कर वसूली करने की तैयारी में है। हमें मिलकर सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, इसके लिए दबाव बनाना होगा। अमेरिका में 1 डॉलर (70रु) ब्रिटेन में 1 पौंड (80रु) और पड़ोसी पाकिस्तान में 20 रुपये में अखबार बिक सकता है तो भारत में क्यों नहीं? पाकिस्तान के लोग ज्यादा अमीर हैं? ज्यादा पढ़े लिखे हैं? करांची की आबादी 2 करोड़ है पर उस शहर में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार की प्रसार संख्या कितनी है? पाकिस्तान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार ‘जंग’ है जिसका पूरे पाकिस्तान में प्रसार 8.5 लाख है। हमारे यहां तो Metro Cities के कुछ अखबार 10 लाख से ज्यादा ABC सर्कुलेशन दिखाते हैं। जब 15-20 या ज्यादा पेज के कारण ज्यादा दाम होगा तब दस लाख सर्कुलेशन दिखाने वाला अखबार एक लाख भी नहीं बिक पायेगा।

दूसरी बात अगर सरकार सचमुच में छोटे और मध्यम अखबार को बचाना चाहती है तो 5000 कॉपी सर्कुलेशन तक के लिए कम से कम 25 रुपये डीएवीपी दर दे और इससे ज्यादा सर्कुलेशन के लिए आरएनआई चेकिंग का नियम बना दे। हर 5000 सर्कुलेशन बढ़ने पर 10% दर बढ़े। साथ ही बिग कैटेगरी के स्लैब की दर में कोई बदलाव नहीं हो, क्योंकि बड़े अखबारो को प्राइवेट विज्ञापन बहुत मिलते हैं।

सरकार ये नियम भी बनाये कि जो भी व्यक्ति अखबार या कोई मीडिया हाऊस चलाता हो, वो कोई धंधा नहीं करे या दूसरा बड़ा काम नहीं करे या छोटे-छोटे धंधे जो पूर्व से संचालित है, उसे 75 लाख टर्नओवर की लिमिट कर दे क्योंकि इससे कोई अखबार किसी का सपोर्ट या विरोध नहीं करेगा, उसका हित प्रभावित नहीं होगा। जज जिस कोर्ट से रिटायर होता है उसे उस कोर्ट में वकील के रुप मे प्रैक्टिस करने की मनाही होती है। समाचार पत्र अब जीएसटी के चलते बन्द हो जायेंगे। पं. दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के कथनी करनी में अन्तर स्पष्ट दिख रहा है।

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मोदी पर मिमिक्री दिखाने में क्यों फटती है टीवी चैनलों की?

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने प्रेस क्लब आफ इंडिया में पत्रकार विनोद वर्मा की छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा की गई अवैधानिक गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते हुए खुलासा किया कि टीवी चैनलों पर मोदी की मिमिक्री दिखाने पर पाबंदी है. इस वीडियो को सुनिए विस्तार से, जानिए पूरा प्रकरण क्या है…

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चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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मोदी को भगवान न बनाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की घोषणा क्रांति की जमीन मेरठ में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने की है। सिचाई विभाग से रिटायर इंजीनियर जेपी सिंह की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में उनके नाम का मंदिर बनना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इस ऐलान के पीछे किसी की व्यक्तिगत इच्छा और भावना ही दिखाई देती है। पर रिटायर इंजीनियर की घोषणा एक लोकतांत्रिक देश में किसी नेता को भगवान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घोषणा कोई पहली दफा देश में हुई है। प्रायः दक्षिण भारत से नेताओं और फिल्मी सितारों के मंदिर बनाने और पूजा करने की खबरे आती रही हैं। देश के कई राज्यों में कई लोगों ने अपने पंसदीदा नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बनाये हैं। वहीं अपने पंसदीदा सितारों और नेताओं की तस्वीर की पूजा करने वाले भी बढ़ी संख्या में है।

समर्थकों की ओर से अपने नेताओं के प्रति प्रेम दर्शाने के कइ्र्र मामले प्रकाश में आये हैं। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी नेता हैं जिन्होंने खुद ही अपनी मूर्तियां लगवाई हैं। यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के पार्कों, स्मारकों में दलित नेताओं, चिंतकों, और सुधारकों के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं भी लगवाई हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर यूपी की सियासत भी कई बार गर्मा चुकी है। लेकिन मूर्तियां वहीं की वहीं हैं। मायावती की शान में ‘माया पुराण’ की रचना भी की गई है। जिसमें मायावती को समता मूलक समाज की आराध्य देवी कहा गया है।

मोदी संघर्ष के नेता हैं। स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली पद तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। एक गरीब परिवार का लड़का आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ध्वजवाहक है। मोदी का जीवन चरित्र और संघर्ष देश के लाखों-लाख देशवासियों के लिये प्रेरणादायी है। उनका जीवन अभाव और गरीबी में बीता। ऐसे में समाज का वंचित, पिछड़ा, गरीब, मजदूर, किसान और अभाव में जीवन यापन करने वाला हिस्सा मोदी को अपना रोल माडल मानता है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा मोदी केे जीवन से किसी न किसी तरीके से प्रेरणा पाता है। विधार्थी और युवा विशेषकर बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को अपना रोल माडल मानते हैं।

भारत में फिल्मी सितारों के नाम पर मंदिर बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। पहले इस तरह की खबरें केवल दक्षिण भारत से ही आती थीं। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सुनने में आती हैं। अभिनेत्री खुशबू के नाम का मंदिर तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली में मौजूद है और वो इस पर आश्चर्य व्यक्त कर चुकी हैं। खुशबू के अलावा ममता कुलकर्णी, नमीता, पूजा उमाशंकर के नाम पर भी मंदिर बातें की जाती हैं लेकिन अब तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। अमिताभ को पसंद करने वालों ने कुछ समय पहले कोलकाता में उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था जहां उनकी पूजा होती है। शिवसेवा के संस्थापक बाल ठाकरे का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। चंद्रपुर जिले के भद्रावती में इस मंदिर के निर्माण के लिए भद्रावती नगर परिषद ने करीब पांच एकड़ जमीन दी है।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का मंदिर राज्य के वैलूर जिले में उनके समर्थको ने स्थापित किया है। डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वे आंध्र प्रदेश के एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की इकाई ने विशाखापटनम में उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजगोपालापुरम गांव में बने इस मंदिर को राजशेखरा रेड्डी अलायम नाम दिया गया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 15 साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी का मंदिर बनवाया गया था। सत्यनारायण टेकरी नाम की पहाड़ी पर बने इस मंदिर में बाकायदा एक पुजारी भी रखा गया हैै। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के एक गांव में मोदी की मूर्ति की रोज पूजा-अर्चना की जाती है। आरएसएस के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रह चुके बृजेंद्र मिश्र ने भगवानपुर गांव के शिव मंदिर में मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद मंदिर को नाम दिया गया था ‘नमो नमो मंदिर’। इस मंदिर में रोज सुबह और शाम मोदी की आरती और पूजा की जाती है. जिसमें गांव के लोग भी भाग लेते हैं।

आंध्र प्रदेश के महबूब नगर में एक कांग्रेसी नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बड़ी मूर्ति बनवाई। नौ फीट की इस मूर्ति को तेलंगाना टाल्ली नाम दिया गया। जिसका अर्थ होता है तेलंगाना की माता। इस काम को अंजाम दिया कांग्रेस नेता पी. शंकर राव ने. अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी की यह मूर्ति स्थापित की गई। इसके अलावा कई बार सोनिया के देवी रूप वाले पोस्टर भी चर्चाओं में रहे हैं। बिहार के भभुआ जिले में भोजपुरी फिल्मों अभिनेता मनोज तिवारी ने पूजा-पाठ के साथ साल 2013 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की मूर्ति का अनावरण किया था। उनका मंदिर कैमूर जिले में बनवाया गया है। राजस्थान में बीजपी नेता और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पूजा करने वाले भी बहुत हैं। जोधपुर जिले में एक भाजपा नेता ने शहर के एक मंदिर में राजे का बड़ा सा पोस्टर लगाकर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। उस पोस्टर में वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाया गया है।

गुजरात के राजकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर एक स्थानीय संगठन ओम युवा समूह ने बनवाया है। करीब 300 लोगों के इस संगठन ने आपस में चंदा एकत्र कर मंदिर बनाने का सारा खर्च उठाया। मंदिर बनाने में 4-5 लाख रुपये का खर्च आया है। मंदिर का उद्घाटन एक केंद्रीय मंत्री को करना था लेकिन मोदी की नाराजगी के बाद कार्यक्रम रद्द हो गया।
मीडिया खबरों के मुताबिक यह मंदिर मेरठ के सरधना क्षेत्र में मेरठ-करनाल हाईवे पर बनेगा। इसके लिए पांच 5 एकड़ की जमीन भी तय कर ली गई है। इसमें मोदी की 100 फीट ऊंची मूर्ति लगेगी। मंदिर निर्माण में दस करोड़ का खर्च आएगा। मंदिर बनाने में आने वाली लागत मोदी भक्तों से चंदे के रूप में लिया जाएगा। मंदिर का भूमि पूजन 23 अक्टूबर को होगा। इसको बनने में करीब 2 वर्ष का समय लगेगा। इस मंदिर के उद्घाटन के लिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी पुष्पराज सिंह यादव नाम के एक व्यक्ति ने जलालपुर में मोदी का मंदिर बनाने का काम शुरू किया था। करुणानिधि का भक्त कहने वाले एक व्यक्ति ने वेल्लूर में उनका मंदिर बनाया है।

किसी की पसंद-नापंसद और भावनाओं को रोका नहीं जा सकता। पर सवाल यह है कि इस सबसे क्या होगा, क्या देश का कुछ भला होगा? मोदी समर्थकों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि मोदी खुद कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। जिस देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं, करोड़ों लोगों को सिर ढकने के लिए एक अदद छत का सहारा नसीब नहीं है, न जाने कितने ही लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां ऐसे मंदिरों की क्यों जरूरत पड़ने लगी।

इससे पूर्व भी गुजरात के राजकोट में 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाने की कोशिश की गई थी। ये कोशिश प्रधानमंत्री के समर्थकों की ओर से की गई थी। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाखुशी जताते हुए खबर को ‘स्तब्धकारी’ और ‘भारत की महान परंपराओं’ के खिलाफ बताया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है, मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है। मैं लोगों से ऐसा नहीं करने का आग्रह करता हूं।’ प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद राजकोट प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वहां से मोदी की मूर्ति को हटवा दिया था। लेकिन उस प्रकरण से भी कोई सीख ना लेते हुए अब उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य मंदिर बनाने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक मेरठ में मंदिर बनाए जाने के ऐलान पर पीएम मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि प्रधानमंत्री जल्द ही इस पर पिछली बार की तरह कोई ठोस कदम उठाएंगे।

लोकतंत्र में किसी नेता को भगवान का दर्जा देना उसका सम्मान बढ़ाना कतई नहीं हो सकता। जनप्रिय नेता तो प्रत्येक देशवासी के दिल में बसता है। उसके लिये किसी मंदिर या पूजा स्थल की जरूरत नहीं होती है। जब जनता अपने प्रिय नेता के कंधे से कंधा मिलाकर देश विकास के कार्यों में जुटती है तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम हासिल होते हैं। पीएम मोदी का मंदिर बनाने वाला रिटायर अधिकारी अगर उनका मंदिर बनाने की बजाय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के लिये विधालय, भूखों के लिये अन्न सेवा, पर्यावरण बचाने की मुहिम, नदियों की सफाई, स्वच्छता अभियान या विभिन्न सामाजिक कुरीतियों की दिशा में काम करे तो देशवासियों व प्रधानमंत्री को ज्यादा खुशी होगी।

मोदी पहले से ही 15 लाख वाले कोट के कारण काफी आलोचना झेल चुके हैं और अब यह मंदिर। ऐसे शगूफे वे नेता, समर्थक या प्रशंसक छोड़ते हैं जो जनता की सेवा करने में तो विफल रहते हैं, लेकिन अपने आकाओं की सेवा करना और चापलूसी का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते हैं। मोदी को भगवान बनाने से बेहतर है कि उन्हें सुशासन देने में ये नेता मदद करें। स्वयं प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक बता चुके हैं। इससे पूर्व जिन नेताओं या अभिनेताओं की मूर्तियां लगी या मंदिर उनके चाहने वालों न बनाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किसी गलत परिपाटी को लगातार आगे बढ़ाया जाए। समाज में इस चेतना का संचार भी जरूरी है। ऐसी प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए, किसी लोकतांत्रिक देश में किसी नेता का मंदिर बनना शुभ लक्ष्ण नहीं है। क्योंकि इससे नेता या लोकतंत्र दोनों में से किसी एक का नुकसान होना लाजिमी है।

डॉ. आशीष वशिष्ठ
स्वतंत्र  पत्रकार
लखनऊ, उ0प्र0, (भारत)
मोबाइल: (+91) 94 5100 5200  
E-mail : avjournalist@gmail.com

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

रवीश कुमार का उपरोक्त पत्र फेसबुक पर लाखों की संख्या में शेयर, लाइक और कमेंट हासिल कर चुका है..

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क्या वाकई नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है?

Dilip Khan : हार्ड वर्क वाले अर्थशास्त्री मोदी जी जब सत्ता में आए तो इन्होंने आर्थिक सलाह परिषद को ख़त्म कर दिया। जब अर्थव्यवस्था की बैंड बजने लगी तो दो दिन पहले यूटर्न लेते हुए परिषद को फिर से बहाल कर दिया। अर्थशास्त्री नरेन्द्र मोदी ने आंकड़ों को ‘खुशनुमा’ बनाने के लिए GDP गणना के पुराने नियम ही ख़त्म कर दिए। लेकिन गणना के नए नियमों के मुताबिक़ भी GDP दर तीन साल के न्यूनतम पर आ गई है। पुराना नियम लागू करे तो 3% का आंकड़ा रह जाता है।

अनुपम खेर समेत कई सहिष्णु अर्थशास्त्रियों ने जब नोटबंदी का समर्थन किया तो मोदी-जेटली फूलकर कुप्पा हो गए। अब ख़ुद सरकारी एजेंसियां दावा कर रही है कि इससे अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है। अमित शाह भले ही ‘तकनीकी कारण’ का जुमला फेंके, देश का सबसे बड़ा बैंक SBI परेशान है। खुलेआम अपना दयनीय हाल बता रहा है। निर्यात गिर गया, विनिर्माण क्षेत्र बैठ गया, रोज़गार पांच साल के निचले स्तर पर है। लघु-मध्यम उद्योग वाले रो रहे हैं। छोटे कारोबारी खस्ताहाल हैं। जो नोटबंदी से रह गई थी, वो कसर जीएसटी ने पूरी कर दी।

RBI में लगभग 100% नोट जमा हो गए। इसका क्या मतलब निकाला जाएगा? अनुमान के मुताबिक़ देश में क़रीब 6% कालाधन कैश में था। ज़्यादातर बड़े नोटों में। अब, जब क़रीब-क़रीब सारा पैसा जमा होकर एक्सचेंज हो गया है तो ज़ाहिर है कि ये कालाधन वैध धन बन गया। यानी नोटबंदी ने बाक़ी नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा काम ये किया कि कालेधन को वैध बना दिया। जो चालाक थे, उन्होंने सेटिंग कर कई खातों में पैसे जमा करवाए, कई लोगों के मार्फ़त पैसे बदले। जो कच्चे थे, उन्होंने अपने खाते में पैसे डाल लिए। पैसे से यहां मेरा मतलब कालाधन से है। अब क्या हो रहा है? ऐसे कई लोग आयकर विभाग की निगरानी में हैं। आयकर इंस्पेक्टर इनसे मिलकर घूस खाकर ओके कर दे रहा है। यानी कालाधन तो सफ़ेद हुआ ही, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया। और मोदी जी ने जो इंस्पेक्टर राज ख़त्म करने की बात कही थी, वो वादा अरब सागर में डूब गया।

इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद आयकर इंस्पेक्टरों को सांढ़ बना दिया है। जिसके खाते में हेर-फेर है, सब आयकर अधिकारियों से सेटिंग कर रहे हैं। नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने की बात कही गई थी, देख लीजिए बढ़ गया है। काला धन ख़त्म करने की बात कही गई थी। लगभग 100% पुराने नोट बैंक पहुंचकर अब वैध करेंसी बन गए हैं। मोदी जी, और डुबोइए देश को। काम पूरा नहीं हुआ है।

Chandan Srivastava : इंडियन एक्सप्रेस में आज यशवंत सिन्हा का जो आर्टिकल छपा है, वह पढ़ा जाना चाहिए। रोहिंग्या, बीएचयू, जेएनयू आदि तो ठीक है लेकिन अर्थव्यवस्था ही दम तोड़ देगी तो क्या बचेगा? अरूण जेटली को लेकर भाजपा का कोर वोटर कभी कम्फर्टेबल नहीं रहा। लेकिन उन्होंने मोदी को भाजपा का चेहरा बनने में सहयोग किया था, यही वजह है कि उनका हर पाप मोदी जी गले लगाने को तैयार हैं। लेकिन पापी को किसी भी प्रकार का समर्थन करने वाला और यहां तक कि उसके कृत्यों से नजरें फेर लेने वाला भी बराबर का पापी होता है। कुछ ऐसा ही कृष्ण ने गीता में भी कहा था जब अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि के प्रति आसक्त हो रहे थे।

यशवंत सिन्हा से कांग्रेस जैसी पार्टियों को सीखना चाहिए कि आलोचना कैसे की जाती है। रोहिंग्या और भारत तेरे टुकड़े होंगे का समर्थन करके वे कभी मोदी से पार नहीं पा सकते। इतनी साधारण सी बात न जाने क्यों कांग्रेस के पल्ले नहीं पड़ रही। बहरहाल बात यशवंत सिन्हा के लेख की। पूर्व वित्त मंत्री लिखते हैं कि निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई। औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी संकट में है। नोटबंदी फेल रही है, गलत तरीके से GST लागू किए जाने से आज कारोबारियों के बीच खौफ का माहौल है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

वह आगे लिखते हैं, पहली तिमाही में विकास दर गिरकर 5.7 पर पहुंच गई जो तीन साल में सबसे कम है। सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से मंदी नहीं आई, वो सही हैं क्योंकि इस मंदी की शुरुआत पहले हो गई थी। नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया। आर्टिकल के अंत में वह एक पंच लाइन देते हैं, ‘pm claims dat he has seen poverty from close quarters. His fm is working over time to make sure dat all indians also see itfrom equally close quarters.’ माने- ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है। अब उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी करीब से गरीबी देखे।’

Vikas Mishra : 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था- ”मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी। घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था। फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी। जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है।
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे। देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए। एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया। पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है।

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा। हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया। दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा। देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा। कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा। ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया।

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे। तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा। मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी। उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा। मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया। राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था।

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’। वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे। तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी। देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी। महंगाई चरम सीमा पर थी। मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा। विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे। मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था। जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे। देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी। 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई। उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी।

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली। कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची। मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई। लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था। लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए। बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए।

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया। घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी। पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए। चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया। मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई। तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे। ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे। जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली।

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए। मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है। इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा। उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी। वैसे बता दें कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है।

तीन पत्रकारों दिलीप खान, चंदन श्रीवास्तव और विकास मिश्र की एफबी वॉल से. दिलीप खान राज्यसभा टीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. चंदन श्रीवास्तव लखनऊ में पहले पत्रकार थे और अब वकालत कर रहे हैं. विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं.

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मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

मंहगाई नियंत्रण करने की नाकामी मोदी सरकार पर भारी पड़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि अब तो जनता ने भी यह मान लिया हैकि कम से कम मंहगाई के मोर्चे पर मोदी और मनमोहन सरकार में ज्यादा अंतर नहीं हैं। बस, फर्क है तो इतना भर कि मनमोहन सरकार की नाकामी का ढ़िढोरा बीजेपी वालों ने ढोल-नगाड़े के साथ पीटा था, जबकि कांग्रेस और विपक्ष मंहगाई को मुद्दा ही नहीं बना पा रहा है।

शायद यही वजह है, जनता के बीच अब मंहगाई पर चर्चा कम हो रही है। एक समय था जब प्याज या टमाटर के दाम में जरा सी भी वृद्धि होती थी तो बीजेपी वाले पूरे देश में हाहाकार मचा देते थे, लेकिन आज हमारे नेतागण और तमाम बुद्धिजीवी मोदी सरकार को घेरने के लिये मंहगाई को मुद्दा बनाने की बजाये साम्प्रदायिकता, विचारधारा की लड़ाई, राष्ट्रवाद की बहस में ही उलझे हुए हैं।

हाल ही में टमाटर सौ रूपये किलो तक बिक गया, मगर यह सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन पाया। इसी प्रकार आजकल प्याज भी गृहणियों को रूला रहा है। पिछले वर्ष दाल के भाव आसमान छूने लगे थे, उरद सहित कुछ अन्य दालें तो 200 रूपये किलो तक बिक गई। गरीब की थाली से दाल गायब हुई, मगर विपक्ष गरीबों का दर्द नहीं बांट सका।
इन दिनों सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि पर एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस के समय जब रसोई गैस के दाम बढ़ते थे तो किस तरह से बीजेपी के नेता अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज आदि धरने पर बैठ जातै थें।

अभी, रसोई गैस के दाम बढ़ते ही स्‍मृति ईरानी की पुरानी तस्वीर और ट्विट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी थी,जिसमें वह मनमोहन सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने पर सिलेंडर को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं,लेकिन कांग्रेस की तरफ से ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है।

बीते अगस्त महीने की बात है केंद्र की मोदी सरकार ने बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम में 86 रुपये की बढ़ोतरी कर दी थी। सरकार ने इसके पीछे अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में एलपीजी के दाम बढ़ना वजह बताया। जो बिना-सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 466.50 रुपए का था। उसके बाद से छह किस्तों में यह 271 रुपए यानी 58 प्रतिशत महंगा हो चुका है। तेल कंपनियों ने सब्सिडीशुदा रसोई गैस सिलेंडर का दाम भी मामूली 13 पैसे बढ़ाकर 434.93 रुपए प्रति सिलेंडर कर दिया। इससे पहले इसमें 9 पैसे की वृद्धि की गई। दो मामूली वृद्धि से पहले सब्सिडीशुदा गैस के दाम आठ बार बढ़े हैं और हर बार करीब दो रुपए की इसमें वृद्धि की गई। मगर कहीं कोई हाय-तौबा नहीे हुई।

बात 2014 से आज तक बढ़ती मंहगाई की कि जाये तो 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। अरहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है. बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी। 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है। दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है. यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है।

हालांकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा मनमोहन सरकार के मुकाबले राहत भरा है। मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी तो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत रहा। इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 पर आ गई। दिल्ली में सब्सिडी वाला रसोई गैस का सिलिंडर मई 2014 के 414 रुपये के मुकाबले अब 442.77 रुपये में मिल रहा है। जबकि डीजल और पेट्रोल के दामों में अंतर नहीं आया है, लेकिन विरोधियों की दलील है कि दुनिया के बाजार में तेल-डीजल बनाने का कच्चा माल पहले की अपेक्षा जितना सस्ता हुआ है मोदी सरकार उस अनुपात में पेट्रोल डीजल सस्ता नहीं कर रही है।

अगस्त में खुदरा महंगाई दर भी थोक महंगाई दर की तरह चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई। अगस्त में थोक महंगाई की दर जुलाई के 1.88 फीसद से बढ़कर 3.24 फीसदी के स्तर पर पहुंच गयी। अगस्त 2016 में थोक महंगाई सूचकांक में 1.09 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। अगस्त में थोक महंगाई में आई इस तेजी की वजह खाद्य पदार्थो और ईंधन की कीमतों में आई तेजी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई में और इजाफा हो सकता है, ऐसे में ब्याज दरों में कटौती के लिए अभी इंतजार करना पड़ सकता है। थोक महंगाई सूचकांक में आई तेजी की सबसे बड़ी वजह सब्जियों के दामों में हुई बढ़ोतरी रही है। जुलाई में सब्जियों की महंगाई दर्शाने वाले सूचकांक में 21.95 फीसद की वृद्धि हुई थी। लेकिन अगस्त में यह वृद्धि 44.91 फीसद के स्तर पर पहुंच गयी। इसके पीछे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी रही।

प्याज की कीमत अगस्त महीने में 88.46 फीसद की दर से बढ़ी जो जुलाई में 9.50 फीसद के स्तर पर थी। इसके अलावा फल, सब्जियों, मीट, मछली की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईधन जनित महंगाई भी अगस्त में दोगुनी हो गई। जुलाई में फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में महंगाई दर 9.99 फीसद रही जो जुलाई 1016 में 4.37 फीसद पर थी। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ रहीं कीमतें और पावर टैरिफ में की गई बढ़ोतरी ही फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में आई तेजी का असली कारण है।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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रिजर्व बैंक के आंकड़े दे रहे गवाही, कालाधन रखना अब ज्यादा आसान हुआ!

Anil Singh : 2000 के नोट 1000 पर भारी, कालाधन रखना आसान! आम धारणा है कि बड़े नोटों में कालाधन रखा जाता है। मोदी सरकार ने इसी तर्क के दम पर 1000 और 500 के पुराने नोट खत्म किए थे। अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा कहता है कि मार्च 2017 तक सिस्टम में 2000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा 6,57,100 करोड़ रुपए है, जबकि नोटबंदी से पहले 1000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा इससे 24,500 करोड़ रुपए कम 6,32,600 करोड़ रुपए थी।

यानि, रिजर्व बैंक ने सालाना रिपोर्ट के आंकड़े पेश किए हैं इससे साफ पता चलता है कि पहले सिस्टम में 1000 के नोट में जितना धन था, वह अब 2000 के नोट में रखे धन से 24,500 करोड़ रुपए कम है। तो, कालाधन खत्म हुआ या कालाधन रखने की सहूलियत बढ़ गई?

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नोटबंदी के ज़रिए कालेधन को खत्म करने का नहीं, बल्कि अपनों के कालेधन को सफेद करने का सरंजाम-इंतजाम किया गया था। सच एक दिन सामने आ ही जाएगा। ठीक जीएसटी लागू के 48 घंटे पहले जिन एक लाख शेल कंपनियों का रजिस्ट्रेशन खत्म किया गया है, उनके ज़रिए नोटबंदी के दौरान कई लाख करोड़ सफेद कराए गए हैं। मुश्किल यह है कि डी-रजिस्टर हो जाने के बाद इन एक लाख कंपनियों का कोई ट्रेस नहीं छोड़ा है मोदी एंड जेटली कंपनी ने। लेकिन सच एक न एक दिन सामने आ ही जाएगा। हो सकता है सुप्रीम कोर्ट के जरिए या सीएजी की किसी रिपोर्ट में।

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आईटीआर रिटर्न पर किसको उल्लू बना रहे हैं जेटली जी! वित्त मंत्री अरुण जेटली का दावा है कि नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि देश में वित्त वर्ष 2016-17 के लिए भरे गए इनकम टैक्स ई-रिटर्न की संख्या 25% बढ़ गई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 के लिए कुल दाखिल आईटीआर 2.83 करोड़ रहे हैं। यह संख्या ठीक पिछले वित्त वर्ष 2015-16 के लिए 2.27 करोड़ थी। इस तरह यह 24.7% की वृद्धि है। अच्छी बात है। लेकिन गौर करने की बात है कि इससे पहले वित्त वर्ष 2014-15 के लिए यह संख्या 2.07 करोड़ थी। अगले साल 2015-16 में यह 9.7% बढ़कर 2.27 करोड़ हो गई। वहीं, पिछले साल 2013-14 से 8.7% कम (2.25 करोड़ से घटकर 2.07 करोड़) थी। आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या वित्त वर्ष 2010-11 के लिए 90.50 लाख, 2011-12 के लिए 1.64 करोड़ और 2012-13 के लिए 2.15 करोड़ रही थी। इस तरह वित्त वर्ष 2010-11 से लेकर वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या क्रमशः 82.22%, 31.10% और 4.65% बढ़ी थी। अतः जेटली महाशय! वित्त मंत्री के रूप में आप किसी कॉरपोरेट घराने की वकालत नहीं कर रहे, बल्कि देश का गुरुतर दायित्व संभाल रहे हैं। इसलिए झूठ बोलने की कला यहां काम नहीं आएगी। जवाब दीजिए कि वित्त वर्ष 2010-11 और 2011-12 में कोई नोटबंदी नहीं हुई थी, फिर भी क्यों आईटीआर भरनेवालों की संख्या 82 और 31 प्रतिशत बढ़ गई? इसलिए नो उल्लू बनाइंग…

कुल दाखिल आईटीआर रिटर्न की संख्या

वित्त वर्ष  : संख्या (लाख में) : पिछले साल से अंतर (%)

2016-17 : 283 : +24.67

2015-16 : 227 : +9.66

2014-15 : 207 : (-)8.69

2013-14 : 225 : +4.65

2012-13 : 215 : +31.10

2011-12 : 164 : +82.22

2010-11 : 90.5 : +78.39

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वित्त मंत्रालय = भारत = भारतीय नागरिक! गुरुवार को इकनॉमिस्ट इंडिया समिट में एक पत्रकार ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूछा कि क्या ऐसा नहीं है कि नोटबंदी वित्त मंत्रालय के लिए अच्छी थी, लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए नहीं, जिन्हें जान से लेकर नौकरी तक से हाथ घोना पड़ा और मुश्किलें झेलनी पड़ीं। इस पर जेटली का जवाब था, “मैं मानता हूं कि जो भारत के लिए अच्छा है, वही भारतीय नागरिकों के लिए अच्छा है।” धन्य हैं जेटली जी, जो आपने ज्ञान दिया कि सरकार और देश एक ही होता है। यही तर्क अंग्रेज बहादुर भी दिया करते थे। अच्छा है कि आम भारतीय अब भी सरकार को सरकार और अपने को प्रजा मानता है। वरना, जिस दिन वो इस मुल्क से सचमुच खुद को जोड़कर देखने लगेगा, उस दिन से आप जैसी सरकारों का तंबू-कनात उखड़ जाएगा, जिस तरह अंग्रेज़ों की सरकार का उखड़ा था। तब तक अंग्रेज़ों के बनाए औपनिवेशिक शासन तंत्र और कानून की सुरक्षा में बैठकर मौज करते रहिए, वित्त मंत्रालय के हित को भारत का हित बताते रहिए और विदेशी व बड़ी पूंजी का हित साधते रहिए।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार अनिल सिंह की एफबी वॉल से. अनिल सिंह अर्थकाम डाट काम नामक चर्चित आर्थिक पोर्टल के संस्थापक और संपादक भी हैं.

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मोदी और जेटली के ‘कुशल’ नेतृत्व के कारण विनिर्माण क्षेत्र भयंकर मंदी का शिकार!

Ashwini Kumar Srivastava : आठ साल पहले…यानी जब दुनियाभर में मंदी के कारण आर्थिक तबाही मची थी और भारत भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में वैश्विक मंदी से जूझ रहा था… हालांकि उस मंदी में कई देश रसातल में पहुंच गए थे लेकिन भारत बड़ी मजबूती से न सिर्फ बाहर आया था बल्कि दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका और चीन से लोहा लेने लगा….

मगर आज यह विनिर्माण क्षेत्र वापस उस वैश्विक मंदी वाले रसातल में कैसे पहुंच गया? आज तो दुनिया में कहीं मंदी भी नहीं है…फिर मोदी जी के कुशल नेतृत्व और अरुण जेटली जैसे मेधावी वित्त मंत्री के निर्देशन में भारत की अर्थव्यवस्था तो अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर रही है।

हो न हो, ये आंकड़े ही गलत हैं। सब साले मोदी के दुश्मन, मुस्लिमपरस्त और राष्ट्रद्रोही हैं। इन फर्जी आंकड़ों को आज के अखबार में छाप कर वे यह समझ रहे हैं कि मैं मोदी या जेटली पर संदेह करूँगा? मूर्ख हैं ऐसे लोग।

खुद मोदी के सबसे बड़े आर्थिक सूरमा पनगढ़िया भले ही मोदी और जेटली के डूबते हुए आर्थिक जहाज से भाग खड़े हुए हों लेकिन मैं किसी भी हालत में मोदी का समर्थन करना नहीं छोडूंगा। कभी सपने में भी मोदी के किसी फैसले पर उंगली नहीं उठाऊंगा।

दुनिया भले ही इस तरह के आंकड़े देकर हमें भारत की आर्थिक बदहाली का डर दिखाती रहे, मैं तो वही देखूंगा, सुनूंगा और मानूँगा, जो मोदी चाहते हैं।

हटा दो इस तरह की सारी नकारात्मक खबरें मेरे सामने से। मुझे तो वह खबर दिखाओ, जिसमें लिखा हुआ है कि महाराणा प्रताप ने अकबर को हरा दिया था, डोभाल ने पाकिस्तान को घुटने टिकवा दिए थे और चीन हमारी ताकत से थर थर कांप रहा है…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी जी! कब सुनोगे ‘बेरोजगारों’ के मन की बात

बेरोजगारों को रोजगार का सपना दिखाकर भारी बहुमत से सत्ता में आये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अच्छे दिन के वादे शिक्षित बेरोजगारों के लिये शेखचिल्ली के ख्वाब साबित हुए हैं। चपरासी की 5 पास नौकरी के लिये जहां एमबीए, बीटेक, एमटेक, ग्रेजुएट युवा लाइनों में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट में मोदी सरकार को तो कटघरे में खड़ा ही किया गया है बल्कि भारत में बढ़ती बेरोजगारों की संख्या ने भी भयावह कहानी बयां की है। जो आने वाले दिनों में बड़े विवादों का कारण बन सकती है।

पिछले दिनों मोदी की बीजेपी सरकार को आए तीन साल पूरे हो गए हैं, लेकिन मोदी के वादे अभी भी अधूरे पड़े हैं। मोदी ने सरकार बनने से पहले युवाओं से वादा किया था कि जैसे ही उनकी सरकार आती है, वे सबसे पहले देश के 1 करोड़ युवाओं को नौकरी देने का काम करेंगे, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद अभी भी देश में करोड़ों की संख्या में युवा बेरोजगार बैठे है। बेरोजगारों का सपना था कि अगर मोदी जी की सरकार बनी तो उनके अच्छे दिन आ जायेंगे और उन्होंने मोदी जी की रैलियांे में तो जय-जयकार की ही बल्कि गांव की गलियों से लेकर महानगरों तक घूम-घूमकर मोदी के पक्ष में जमकर वोटिंग भी कराई। उस समय युवाओं में मोदी के प्रति जो जोश और जुनून था वह सरकार बनने के बाद ठण्डा होता नजर आ रहा है। बल्कि सरकार के प्रति आक्रोश की झलक भी दिखाई दे रही है, जो कभी भी लावा के रूप में उभर सकती है। आखिर हो भी क्यों ना, जब आज तीन साल बाद भी ना तो बेरोजगारों के चेहरों पर चमक दिखाई दे रही है और न ही उनके सपने साकार होते नजर आ रहे हैं।

कहने को तो आजादी के बाद ही रोजगार की गंभीर समस्या रही है लेकिन 1991 से 2013 के बीच भारत में करीब 30 करोड़ लोगों को नौकरी की जरूरत थी. इस दौरान केवल 14 करोड़ लोगों को रोजगार मिल सका। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और उनके आक्रोश को देखते हुए मोदी जी ने अच्छे दिनों का सपना दिखाकर उनका दिल तो जीता ही बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी भी हासिल कर ली। मोदी सरकार ने युवाओं के सपनों को साकार करने के लिये स्किल इंडिया के तहत 2 अक्टूबर 2016 को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक और दो शुरू की। जिसके माध्यम से 2016 से लेकर 2020 तक यानी चार साल में 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी है, का पूरे देश में संचालन किया जा रहा है। लेकिन यह योजना जमीन पर कम कागजों पर ज्यादा दौड़ रही है। जिसमें एक तरफ सरकार ने हर साल 5 लाख युवाओं को ट्रेनिंग देने का दावा कर रही है वहीं पिछले दिनों आयी एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि 29 जून 2017 तक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना दो के तहत एक लाख 70,000 लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। जबकि इस योजना के तहत हर साल पांच लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी थी यानी इस साल यह योजना काफी पीछे चल रही है।

छः जून की प्रेस काॅन्फ्रेंस में कौशल विकास मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कहा था कि जुलाई 2015 में लॉन्च हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक के तहत साढ़े छब्बीस लाख लोगों को ट्रेनिंग दी चुकी है, जबकि कौशल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर लिखा है कि इस योजना के तहत करीब-करीब 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। लेकिन इस रिपोर्ट में मंत्री और मंत्रालय के बयान में साढ़े छह लाख काअंतर साफ नजर आता है। कौशल विकास योजना से जुड़े प्रशिक्षिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता दीपक गोस्वामी कहते हैं कि भारत सरकार प्रशिक्षण के नाम पर एनजीओ को 16 हजार रुपये का भुगतान कर रही है। जिसमें सांसद द्वारा सर्टिफिकेट के माध्यम से बेरोजगारों को शिक्षित करने का दावा किया जा रहा है। जबकि जमीनी धरातल पर इस योजना में बड़े पैमाने पर घोटाला और भ्रष्टाचार हो रहा है। जिससे बेरोजगारों के लिए यह योजना मात्र छलावा साबित हो रही है और एनजीओ मालामाल हो रहे हैं। जबकि भारतीय मजदूर संघ के मुताबिक नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं।

एक ओर प्रधानमंत्री मोदी देश और युवाओं की तकदीर बदलने का दावा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट उनके दावांे और भाषणों को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में इजाफा होने के पूरे आसार हैं। नया रोजगार भी पैदा होने में कई अड़चनें आ सकती है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बेरोजगारी दर और स्तर अल्पकालिक तौर पर उच्च बने रह सकते हैं क्योंकि वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। विशेषकर वैश्विक बेरोजगारी दर में 2016 के 5.7 प्रतिशत की तुलना में 2017 में 5.8 प्रतिशत की मामूली बढ़त की संभावना है।

आईएलओ के महानिदेशक गाइ राइडर के मुताबिक इस वक्त हमलोग वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण उत्पन्न क्षति एवं सामाजिक संकट में सुधार लाने और हर साल श्रम बाजार में आने वाले लाखों नवआगंतुकों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के निर्माण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। आईएलओ के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रिपोर्ट के मुख्य लेखक स्टीवेन टॉबिन ने कहा कि उभरते देशों में हर दो कामगारों में से एक जबकि विकासशील देशों में हर पांच में से चार कामगारों को रोजगार की बेहतर स्थितियों की आवश्यकता है।
मोदी सरकार के तीन साल से अधिक के कार्यकाल में तमाम योजनाओं की घोषणाएं की गईं लेकिन जमीनी धरातल पर कोई भी एक योजना साकार रूप लेती नजर नहीं आ रही है। जिसमें उच्च शिक्षित बेरोजगार सफाई कर्मचारी, चपरासी, होमगार्ड, चैकीदार, सिपाही, कांस्टेबल जैसे पदों के लिये आवेदन कर बेरोजगारी का खौफनाक सच उजागर कर रहे हैं।

लेखक मफतलाल अग्रवाल मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संपर्क : 08865808521 , mafatlalmathura@gmail.com

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2019 में मोदी के लिए असली सिरदर्द केजरीवाल बनेंगे!

Vikram Singh Chauhan : अरविंद केजरीवाल बहुत बहादुर है, शेर हैं। वे मोदी के सामने झुके नहीं। दिल्ली में रहकर मोदी के 56 इंच के सीने पर मूंग दल रहे हैं। मोदी जहाँ गए वहां जाकर चुनाव लड़ने की चुनौती दी और बिना पहले के जनाधार और संगठन के चुनाव लड़कर मोदी का होश उड़ा दिया, हिंदुत्व ने उसे हरा दिया। वे भारत के एक अकेले ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिसके साथ वर्तमान ने अन्याय किया पर इतिहास न्याय करेगा। मीडिया पहले दिन से उनकी सुपारी ली हुई है।

एक आम आदमी को देश का मीडिया और केंद्र सरकार किस हद तक परेशान कर सकता है पूरे देश ने देखा। आज मीडिया पर जो सवाल उठाया जा रहा है इसकी शुरुआत केजरीवाल ने ही की। उनके ऊपर कीचड़, स्याही उछाला गया लोगों ने लात और घूंसे मारे। कोर्ट ने भी उनके खिलाफ मानहानि के सभी मामले स्वीकार किया ,अमूमन कोर्ट सभी नेताओं के मामले स्वीकार नहीं करती। आज केजरीवाल चुपचाप अपना काम कर रहे हैं, वे मीडिया को मसाला भी नहीं देते हैं। केजरीवाल मोदी के सामने बिके नहीं और डरे नहीं, बावजूद आज इज्जत से मुख्यमंत्री के पद पर बैठे हैं। नीतीश जैसे लोग दो कौड़ी के होते हैं। इनकी विचारधारा और सिद्धांत कभी भी ख़रीदा बेचा जा सकता है। 2019 में केजरीवाल फिर मोदी का सिरदर्द बनेंगे। दो साल में गंगा में बहुत पानी बहना बाकी है।

यूएनडीपी से जुड़े और रायपुर के निवासी विक्रम सिंह चौहान की एफबी वॉल से.

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रामबहादुर राय ने मोदी पर जो कटाक्ष किया है वह विपक्ष आलोचना के 10 संस्करण लिख कर भी नहीं कर सकता!

मैंने राम बहादुर राय के साथ काफी लंबा वक्त बिताया है। वे जनसत्ता में हमारे वरिष्ठ थे और ब्यूरो चीफ भी थे। कुछ लोग कहते थे कि उनके तार संघ के साथ जुड़े हुए हैं। वे आपातकाल की घोषणा होने के बाद मीसा के तहत गिरफ्तार होने वाले पहले व्यक्ति बताए जाते हैं। संघ के लिए उन्होंने उत्तर पूर्व में काफी काम किया और पत्रकारिता में काफी देर से संभवतः 1980 के दशक में आए। इसके बावजूद उनका समाजवादियों के साथ घनिष्ठ संबंध रहा।

वे अनेक समाजवादी नेताओं के करीबी रहे। इनमें चंद्रशेखर भी शामिल थे। सच कहे तो दिवंगत प्रभाष जोशी व चंद्रशेखर के संबंधों में आई कटुता को दूर करने में राय साहब का काफी योगदान रहा। वैसे वे गांधीवादियों के भी काफी करीब थे व गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनकी काफी पैठ थी। जब प्रभाष जी नहीं रहे तो उनके अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर गांधी शांति प्रतिष्ठान में ही रखा गया था। राय साहब की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्पष्टवाहिता रही है। वे किसी के सामने कुछ भी कह सकते हैं। जैसे कि अगर कोई व्यक्ति दिल्ली के बाहर से उनसे मिलने आता और जनसत्ता के दफ्तर में घंटों बैठ कर उनका इंतजार करता तो राय साहब दफ्तर पहुंचने पर उसकी नमस्ते का जवाब देने के बाद सीधे पूछते कहिए कैसे आना हुआ है? वह जवाब देता कि दर्शन करने आया था। इस पर अगर राय साहब का मूड ठीक नहीं होता अथवा उन्हें काम करना होता तो उससे कहते ‘दर्शन कर लिए क्या’अब चलिए मुझे काम करना है।

एक बार जब इंडियन एक्सप्रेस के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर जाने की बात सोच रहे थे तो जनरल मैनेजर के साथ हम लोगों की बैठक हुई जिसमें राय साहब भी मौजूद थे। उन्होंने चर्चा के बीच में कह दिया कि हड़ताल जरूर करनी चाहिए इससे लोकतंत्र मजबूत होता है। सशक्त लोकतंत्र के लिए हड़ताल जरूरी होती है। वे अपने मन से काम करते थे। उनकी व प्रभाष जोशी की जोड़ी गजब की थी। दोनों ही काफी मस्त मौला थे।

अक्सर वे दोनों कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए एक साथ जाते थे व आपसी बातचीत में इतने मशगूल हो जाते कि ट्रेन या हवाई जहाज छूट जाता। प्रभाषजी कट्टर गांधीवादी व संघ भाजपा विरोधी थे जबकि रायसाहब संघी थे उसके बावजूद दोनों के बीच का लगाव काबिले तारीफ था। फक्कड़बाजी ही दोनों के व्यक्तित्व का ऐसा हिस्सा रही जो कि उन्हें आपस में जोड़ती थी। राय साहब की फक्कड़बाजी देखने काबिल थी।

जब अपने कैबिन में आते तो पहले कागज से अपना चश्मा साफ करते और फिर अपनी मेज खुद साफ करते। उसके बाद उनका दरबार लगता। हम लोग उन्हें घेर कर बैठ जाते और वो अपनी अलमारी से डब्बा निकालते जिसमें लइचा-चना, मूंगफली का मिश्रण भरा होता। हम सब उसे खाते। दुनिया भर की चर्चा होती व ब्यूरो की मीटिंग समाप्त हो जाती।
उनकी दो खूबियां रही। पहली यह कि उन्होंने कभी किसी संवाददाता पर दबाव डाल कर उससे कुछ करने को नहीं कहा। दूसरी यह कि कभी किसी को यह जताने की कोशिश नहीं कि वे बॉस है। जैसे कि जब जनसत्ता ब्यूरो बना तो उसकी पहली बैठक उनके घर पर हुई। मैं तो सोच रहा कि उसमें रिपोर्टिंग पर चर्चा होगी। मगर आनंद ने मुझे सुबह अपनी वैन ले कर आने का हुक्म दिया ताकि हम लोग दरियागंज स्थित सब्जी मंडी जाकर सब्जियां खरीद लाए। हम सभी साथी राय साहब के घर पर एकत्र हुए वहां खाना व नाश्ता बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। आनंदजी ने राजेश जोशी को कुछ मसाले आदि लाने की जिम्मेदारी सौंपी। उसमें कुछ इस प्रकार लिखा था कि गाय छाप पोला रंग- केसर दो रत्ती, हींग-पांच माशा।

बाद में राजेश जोशी ने हमें बताया कि जब वह पंसारी की दुकान पर पहुंचा और उसने यह सामान मांगा तो दुकानदार ने पूछा कि यह सामान किसने मंगवाया है? उसने कहा कि हमारे ब्यूरो चीफ है। जवाब में आंखें फैलाते हुए आश्चर्य के साथ कहा कि यह ब्यूरो चीफ है या पंसारी? राय साहब के भतीजे का अगले दिन इम्तहान था इसके बावजूद उसे भी पढ़ाई छोड़ कर आलू छीलने के काम में लगना पड़ा। दोपहर चार बजे हम लोगों ने खाना खाया और ब्यूरो की पहली बैठक अचार, चटनी, भरवा टमाटर पर चर्चा करने के साथ समाप्त हो गई। पत्रकारिता की कमी में एक भी शब्द नहीं बोला गया।

राहुल देव संपादक बने। वे काफी अनुशासनप्रिय थे व रोज ब्यूरो की बैठक करने में विश्वास रखते थे। उनकी तुलना में राय साहब तो समाजवादी थे। वे अपने पीए मनोहर को अपनी कुर्सी पर बैठा देते और खूद स्टूल या उसकी कुर्सी पर बैठकर उससे अपना लेख टाइप करवाते। एक बार हम लोग रायसाहब के कमरे में बैठे हुए, राहुलदेव की मीटिंग में जाने का इंतजार कर रहे थे। उनका चपरासी दो बार याद दिला चुका था कि वे हमारा इंतजार कर रहे हैं। मगर रायसाहब ने दोनों ही बार कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। करीब 10 मिनट बाद राहुल देव उनके कैबिन में आए। हम लोग उन्हें देखकर उठ खड़े हुए व रायसाहब ने मनोहर को बैठे रहने का इशारा करते हुए अपना डिक्टेशन जारी रखा। राहुलदेव का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। उन्होंने कहा कि रायसाहब मैं मीटिंग के लिए आप लोगों का इंतजार कर रहा था।

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और पीछे मुड़कर अपनी अलमारी खोली। नमकीन का डिब्बा बाहर निकाला और उसे खोलकर उनकी ओर आगे बढ़ाते हुए बोले आप इसे चखिए। लाल मुनि चौबे कहा करते थे कि इसमें कच्ची मूंगगफली के दाने मिलाकर खाने से दिमाग तेज होता है। फिर मनोहर की और मुड़कर बोले, मनोहरजी मैं क्या लिखवा रहा था। राहुलजी के लिए तो यह इंतहा थी वे दमदमाते हुए कमरे से बाहर निकले और हम सब लोग चना चबेने का आनंद लेने लगे।

मुझे यह सब लिखने की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि जब मोदी सरकार ने रायसाहब को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला का अध्यक्ष बनाया तो मुझे लगा कि बेहतर होता कि उन्हंे मास कम्यूनिकेशन संस्थान का प्रभारी बनाया जाता। क्योंकि किसी को आदेश देना या प्रशासन चलाना तो राय साहब की आदत में शुमार ही नहीं है। इसलिए जब नीलम गुप्ता ने बताया कि इला भट्ट की पुस्तक का उन्होंने जो अनुवाद किया है उसका विमोचन इसी संस्था में हो रहा है तो मैंने सोचा कि क्यों न वहां जाकर देखूं कि क्या रायसाहब में कोई बदलाव आया है। वे कैसे प्रशासन चला रहे हैं। जब अध्यक्ष मंच पर मौजूद हो व यह भवन एनडीएमसी इलाके में स्थित हो फिर भी कार्यक्रम के दौरान एयर कंडीशनर बंद हो जाए व पसीने में भीगते हुए भाषण सुनने पड़े तो हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर ओम थानवी इसके अध्यक्ष होते तो ऐसी गलती होने पर दो-चार की नौकरी ले लेते। मगर यहां सब चलता रहा।

पहले नीलम गुप्ता ने अपने भाषण में मोदी सरकार को निशाना बनाते हुए कहा कि स्मार्ट सिटी नहीं बल्कि लोग स्मार्ट होते हैं। और फिर रायसाहब ने तो अपनी आदत के मुताबिक उस सरकार को ही धो डाला जिसने उन्हें इस पद पर बैठाया था। उन्होंने कहा कि मैं एक किस्सा सुनाता हूं। चाहे इंदिरा गांधी सरीखी सम्राज्ञी रही हो या आज के सम्राट, इला भट्ट जब एक बार लंबी यात्रा के बाद इंदिरा गांधी से मिलने गई तो उन्होंने उनसे कहा कि मैं आपके लिए एक छोटी से भेंट लेकर आई हूं। इंदिराजी ने पूछा क्या है तो उन्होंने कहा कि यह एक आईना है। इसमें आप खुद को देखती रहिएगा। मौजूदा सम्राट को भी खुद के आइने में देखते रहना चाहिए। इन शब्दों में उन्होंने जो कटाक्ष किया वह कटाक्ष तो विपक्ष आलोचना के 10 संस्करण लिख करके भी नहीं कर सकता।

सच रायसाहब आपका जवाब नहीं।

लेखक विवेक सक्सेना दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा नया इंडिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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मुकेश अंबानी ने अपनी मैग्जीन ‘फोर्ब्स इंडिया’ के जरिए कह दिया- ”मोदी पर भारत की 73% जनता भरोसा करती है”

Dilip Mandal : देश के हर अख़बार और वेबसाइट ने छापा, हर चैनल ने दिखाया कि नरेंद्र मोदी पर भारत की 73% जनता भरोसा करती है। नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय राजनेता है। यह ‘खबर’ चूंकि हर जगह छपी और हर चैनल ने दिखाई, जिनमें मोदीभक्त और तथाकथित प्रगतिशील चैनल और साइट भी हैं, तो आपके लिए भी शक करने का कोई कारण नहीं रहा होगा. हर कोई बोल और दिखा रहा है, तो शक कौन करता है? अब आइए इस ख़बर का एक्सरे निकालते हैं।

सभी जगह यह ख़बर फ़ोर्ब्स इंडिया पत्रिका के हवाले से छपी है। फ़ोर्ब्स इंडिया पत्रिका की मालिक कंपनी का नाम नेटवर्क 18 है। नेटवर्क 18 का 100% स्वामित्व इंडियन मीडिया ट्रस्ट के पास है। इस ट्रस्ट का 100% स्वामित्व रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के पास है। जो कि आप जानते हैं कि मुकेश अंबानी की कंपनी है, जिनका नरेंद्र मोदी से याराना न मोदी छिपाते हैं, न अंबानी।

बहरहाल फ़ोर्ब्स इंडिया ने यह रिपोर्ट OECD यानी ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की 282 पेज की एक रिपोर्ट से उठाई है। रिपोर्ट का नाम है – गवर्नमेंट एट ए ग्लांस 2017.

इस रिपोर्ट के पेज 214 में लिखा गया है कि सरकार पर विश्वास का यह आँकड़ा कहाँ से आया है।

यह आँकड़ा गैलप वर्ल्ड पोल से आया है। इसी रिपोर्ट में लिखा है कि इसके लिए पोल कंपनी हर देश के 1,000 लोगों से बात करती है. य़ह एक देश में अधिकतम 2,000 लोगों से बात करती है. ऐसे देश चीन और रूस हैं. जहां टेलीफोन उपलब्ध है, वहां यह सर्वे टेलीफोन पर होता है. इस तरह के पोल में शामिल 1,000 लोग किन शहरो के कौन लोग होंगे यह आप समझ सकते हैं। तो आप अब समझ गए होंगे कि मोदी को सबसे विश्वसनीय बताने वाली ख़बर कैसे बनी।

नोट – ऐसी एक एनालिसिस के मैं 30,000 रुपए तक लेता हूँ। आप मुफ़्त में इसे पढ़ रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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हिंदू और यहूदी सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है!

Rajeev Mishra : प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा एक सरकारी दौरा नहीं है…एक राष्ट्र प्रमुख की दूसरे राष्ट्राध्यक्ष से मुलाक़ात भर नहीं है…यह दो प्राचीन सभ्यताओं का मिलन है… दो सभ्यताएं जिनमें बहुत कुछ कॉमन है…एक समय, इस्लाम की आपदा से पहले दोनों की सीमाएं मिलती थीं, पर दोनों में किसी तरह के टकराव की कहानी हमने नहीं सुनी. दोनों में से किसी को भी किसी और को अपने धर्म में शामिल करने की, अपने धर्म प्रचार की, मार्केटिंग की खुजली नहीं थी…

पर इतिहास में दोनों ने कुछ कॉमन गलतियाँ भी की हैं…सबसे बड़ी गलती की है; अपने काम से काम रखा है…हमने अपनी रोजी रोटी कमाने पर ध्यान दिया है…अपने बच्चे पाले हैं, अपने खेत जोते हैं, अपनी फसल काटी है, अपना सौदा बेचा खरीदा है. हिंदुओं और यहूदियों, दोनों सभ्यताओं ने विज्ञान, कला और संस्कृति को बहुमूल्य योगदान दिया है…पर दोनों में किसी को भी दुनिया जीतने का शौक कभी नहीं चढ़ा. दोनों के लिए धर्म का मतलब रहा, अपनी आत्मा का उत्थान…अपने बच्चों के संस्कार….

पर मानें या ना मानें, दोनों सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है. दोनों को अपने घर में घुसे आ रहे आक्रांताओं को झेलना पड़ा है. यहूदियों को डेढ़ हजार साल तक बिना घर के रहना पड़ा है. लेकिन दुनिया भर में फैले यहूदियों ने कभी कोई शिकायत नहीं की. जहाँ रहे, कुछ दिया ही है. कोई आतंकवादी नहीं बना…किसी ने बदला लेने की नहीं सोची…किसी ने कड़वाहट और घृणा नहीं बाँटी… लेकिन हमेशा सबकी घृणा का शिकार हुए.

कुछ ऐसे ही आज हिन्दू हैं, पूरी दुनिया में फैले हुए…अपने काम से काम रखने वाले, अपने बच्चों को स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी भेजने वाले, उन्हें डॉक्टर-इंजीनियर-अकाउंटेंट बनाने के फिक्रमंद…दुनिया से बेखबर…अपने हाथ से अपना देश निकलता जा रहा है…कोई बात नहीं, कहीं भी रोटी कमा लेंगे… पर एक दिन यहूदियों की नींद खुली, जब उन्होंने अपने आप को कंसंट्रेशन कैम्प्स में पाया…अपने बिस्तर पर सोये थे, गैस चैंबरों में जागे…लाखों जीवन गँवाने के बाद एक सबक सीखा…अपना एक देश बनाने के लिए लड़े, जीते, जिये…

आज हिन्दू अपने ऐतिहासिक गंतव्य पर यहूदियों से सिर्फ कुछ पीढ़ी पीछे-पीछे चल रहे हैं. जो खो रहा है उसकी समझ नहीं है. जो आने वाला है उसकी खबर नहीं है. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उलझे हैं. 70 साल बाद देश ने हिन्दू जनमत वाला एक नेतृत्व चुना है. उसे भी अपने इस ऐतिहासिक दायित्व का बोध है कि नहीं पता नहीं…सड़क, बिजली-पानी, नोट बदलने और टैक्स के गणित में उलझे हैं. पूरा देश, पूरी सभ्यता ही इसी गणित में उलझी है…

नानी पालकीवाला का एक लेख पढ़ा था इजराइल के बारे में. लिखते हैं…भारत और इजराइल को एक दूसरे से बहुत कुछ सीखना है….भारत को इजराइल से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे चलाना चाहिए…इजराइल को भारत से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे “नहीं” चलाना चाहिए…

मोदी जी इजराइल जाएंगे, यह एक ऐतिहासिक क्षण है. 70 सालों में किसी भी भारतीय नेता को यह नहीं सूझा…अब जब वो गए हैं तो सवाल उठता है कि वे वहाँ से क्या लेकर आएंगे. सिर्फ मेक इन इंडिया के एमओयू, रक्षा समझौते, नई तकनीक ले कर आएंगे…या वो सबक भी लेकर आएंगे जो यहूदियों ने औस्विज़ के गैस चैंबरों में सीखा था…

लंदन में मेडिकल फील्ड में कार्यरत राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का सवाल- कोई भारतीय प्रधानमंत्री इससे पहले इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाया?

नजदीक होकर भी दूर क्यों रहा इजरायल… दो बरस पहले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इजरायल के एयरपोर्ट पर उतरे जरुर लेकिन पहले फिलीस्तीन गए फिर इजरायल दौरे पर गये। पिछले बरस जनवरी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज फिर पहले फिलिस्तीन गईं उसके बाद इजरायल गईं। लेकिन पीएम मोदी तो तीन दिन इजरायल में ही गुजारेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री इजराइल को लेकर संबंधों की नयी इबारत लिखने जा रहे हैं और भारत के उस एतिहासिक रुख को हमेशा के लिए खत्म कर रहे हैं, जिसकी छांव में गांधी से लेकर नेहरु तक की सोच अलग रही। महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में कई यहूदियों को अपना दोस्त बताते हुए लिखा, “यहूदियों के लिए धर्म के आधार पर अलग देश की मांग मुझे ज्यादा अपील नहीं करती। फिलीस्तीन अरबों का है, जिस तरह इंग्लैंड ब्रिटिश का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का है और अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय है”।

इतना ही नहीं, 21 जुलाई 1946 को लिखे अपने एक और लेख में महात्मा गांधी ने लिखा, “दुनिया ने यहूदियों के साथ बहुत क्रूरता की है। अगर उनके साथ क्रूरता नहीं हुई होती तो उनके फिलिस्तीन जाने का सवाल ही नहीं उठता।” लेकिन महात्मा गांधी के विचार भारत की आजादी से पहले के थे। भारत की आजादी के बाद 29 नवंबर 1947 के बाद संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के मुद्दे पर वोटिंग होनी थी। उससे पहले भारत का समर्थन जुटाने के लिए इजराइल ने उस वक्त के सबसे बड़े यहूदी चेहरों में एक दुनिया के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन को मैदान में उतारा। आइंस्टाइन नेहरु के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे। नेहरु भी उनका बहुत सम्मान करते थे। 13 जून 1947 को अपने चार पेज के खत में आइंस्टान ने नेहरु को लिखा, “प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में हैं, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं। उन्हें न्याय और समानता चाहिए।”

इस खत में यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विस्तार से जिक्र था। इसके अलावा कई तर्क थे कि क्यों यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र चाहिए। नेहरु ने करीब एक महीने तक खत का जवाब नहीं दिया। फिर 11 जुलाई 1947 को जवाब देते हुए लिखा, “मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे यहूदियों के प्रति बहुत सहानूभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है। मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और उन्होंने वहां के लोगों का जीवनस्तर सुधारने में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है। आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद वो अरब का दिल जीतने में क्यों कामयाब नहीं हुए। वो अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ क्यों अपनी मांगे मानने के लिए विवश करना चाहते हैं।”

दरअसल गांधी नेहरु की सोच 1992 तक जारी रही। लेकिन 1991 में यूएसएसआर का ढहना, खाडी युद्ध और भारत के आर्थिक सुधार ने अमेरिका के साथ संबंधों के दरवाजे खोले और उसमें इजरायल से करीबी अमेरिकी संबंधों तले जरुरत बनी। 29 जनवरी 1992 को फिलिस्तीन राष्ट्रपति यासिर अराफात की सहमति के बाद भारत ने इजरायल के साथ डिप्लामेटिक संबंध को पूर्ण रुप से बहाल किया। लेकिन जिस दौर में इजरायल से संबंध नहीं भी थे तो उसका दूसरा चेहरा युद्ध के दौर में नजर आया। इतिहास के पन्ने बताते है कि 62, 71 और 99 के कारगिल युद्ध के वक्त इजरायल ने गुपचुप तरीके से भारत की मदद की थी और भारत ने बिना राजनयिक संबंधों के इजरायल से मदद मांगी भी थी।

1962 का युद्ध तो चीन का भारत की पीठ में छुरा भोंकने जैसा था। भारत युद्ध के मैदान में जा पहुंचा तब भारत की हालत ठीक नहीं थी। जिस नेहरु की अगुवाई में इजराइल गठन के विरोध में भारत ने 1950 में संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग की थी, उन्हीं नेहरु ने 1962 युद्ध के वक्त इजराइल से मदद मांगी। इजराइल फौरन तैयार हो गया। लेकिन नेहरु ने इजराइल के सामने एक शर्त रख दी। शर्त यह कि जिस शिप से हथियार भेजे जाएं, उस पर इजराइल का झंडा न हो और हथियारों पर इजराइल की मार्किंग न हो”। इजराइल के पीएम को बगैर झंडे वाली बात हजम नहीं हुई। उन्होंने हथियार देने से मना कर दिया। बाद में इजराइल के झंडे लगे जहाज को भारत ने मंजूर कर लिया तो इजराइली मदद भारत पहुंची। फिर 1971 के युद्ध में तो अमेरिका ने भारत के खिलाफ ही अपने सातवें बेड़े को भेज दिया लेकिन तब भी इजराइल ने भारत को गुपचुप तरीके से हथियार भेजे और उन्हें चलाने वाले लोग भी।

अमेरिकी पत्रकार गैरी बैस की किताब ‘द ब्लड टेलीग्राम’ में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पी एन हक्सर के दस्तावेजों के हवाले से कहा गया है कि “जुलाई 1971 में इस्राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने गुप्त तरीके से एक इस्राइली हथियार निर्माता से कहा कि वह भारत को कुछ मोर्टार और हथियार मुहैया कराए और साथ ही उन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने वाले कुछ लोग भी दे। जब हक्सर ने समर्थन के लिए इस्राइल पर जोर डाला तो गोल्डा मायर ने मदद जारी रखने का वादा किया।” जाहिर है इजराइल ने भारत से दोस्ती निभायी। 1999 में कारगिल युद्ध तो नयी पीढ़ी के जेहन में भी ताजा है। इस युद्ध से महज सात साल पहले ही भारत ने इजराइल के साथ पूर्ण रुप से राजनयिक रिश्ते के तार जोडे थे। लेकिन महज सात साल की औपचारिक दोस्ती को इजराइल ने युद्ध में ऐसे निभाया कि हेरॉन और सर्चर यूएवी दिए। जिनकी मदद से कारगिल की तस्वीरें ली गईं थीं वह इजरायल से आई। इजरायल ने भारत को मानवरहित विमान उपलब्‍ध कराए। सैटेलाइट से ली गई उन तस्वीरों को भी भारत से साझा किया, जिसमें दुश्मन के सैन्य ठिकाने दिख रहे थे। इतना ही नहीं, इजरायल ने बोफोर्स तोप के लिए गोला बारुद मुहैया कराया। भारतीय वायु सेना को मिराज 2000 एच युद्धक विमानों के लिए लेजर गाइडेड मिसाइल भी उपलब्‍ध कराए। यानी जिस दौर में इजरायल से कोई रक्षा समझौता भारत ने किया ही नहीं, उस दौर में इजरायल ने भारत को हथियार दिये।

अब इजरायल के साथ खुले तौर पर रक्षा संबंधों का दायरा इतना बडा हो चला है कि प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ही रक्षा क्षेत्र में एकमुश्त कई बड़े डील की तैयारी हो चुकी है और 17 हजार करोड़ की मिसाइल डील को भारत मंजूरी भी दे चुका है। तो आखिरी सवाल, इन सबके बावजूद इससे पहले कोई प्रधानमंत्री इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाए। सच यही है कि एक तरफ देश में वोट बैंक की राजनीति है जो मानती है कि मुस्लिमों के मन में इजरायल को लेकर कड़वाहट है तो इजरायल के साथ खडे कैसे हुआ जाये। दूसरी तरफ 80 लाख भारतीय श्रमिक अरब देशो में काम कर रहे हैं। कही 70 के दशक की तर्ज पर इजरायल का साथ देने वालों के खिलाफ अरब वर्ल्ड ना खड़ा हो जाये। ये जहन में रहता जरुर है। वजह भी यही रही कि कांग्रेस को हमेशा लगा कि इजरायल से संबंध बढ़ाने का मतलब अरब देशों को खफा करना होगा, और इजरायल से संबंध भारत में रह रहे मुसलमानों को भी पार्टी से दूर करेगा। यानी राजनयिक संबंधों की डोर का एक सिरा भी घरेलू राजनीति के वोट बैंक से जुड़ गया। तो दूसरी तरफ बीजेपी के लिये मुस्लिम वोट बैक कोई मायने नही रखता है ये भी दूसरा सच है । क्योकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को महज 44 लोकसभा सीट मिली तब भी पार्टी को 37.60 मुस्लिम वोट मिला। वहीं बीजेपी को 282 सीटों पर जीत मिली लेकिन बीजेपी को 8.4 फीसदी मुस्लिम वोट मिला। तो सवाल कई है। लेकिन संबंधों की नई लकीर अगर पुरानी लकीर को मिटा रही है तो इंतजार करना होगा। रास्ता आगे का ही निकलना चाहिये।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी आजतक न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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नोटबंदी, कैसलेश जैसी तमाम नादानियों के बाद भी नरेंद्र मोदी लोगों के दुलारे क्यों बने हुए हैं?

जिस दौर में राजनीति और राजनेताओं के प्रति अनास्था अपने चरम पर हो, उसमें नरेंद्र मोदी का उदय हमें आश्वस्त करता है। नोटबंदी, कैसलेश जैसी तमाम नादानियों के बाद भी नरेंद्र मोदी लोगों के दुलारे बने हुए हैं, तो यह मामला गंभीर हो जाता है। आखिर वे क्या कारण हैं जिसके चलते नरेंद्र मोदी अपनी सत्ता के तीन साल पूरे करने के बाद भी लोकप्रियता के चरम पर हैं। उनका जादू चुनाव दर चुनाव जारी है और वे हैं कि देश-विदेश को मथे जा रहे हैं। इस मंथन से कितना विष और कितना अमृत निकलेगा यह तो वक्त बताएगा, पर यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए वे उम्मीदों को जगाने वाले नेता साबित हुए हैं।

नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए चार बातें सामने आती हैं- एक तो उनकी प्रामाणिकता अंसदिग्ध है, यानी उनकी नीयत पर आम जनता का भरोसा कायम है। दूसरा उन-सा अथक परिश्रम और पूर्णकालिक राजनेता अभी राष्ट्रीय परिदृश्य पर कोई और नहीं है। तीसरा ताबड़तोड़ और बड़े फैसले लेकर उन्होंने सबको यह बता दिया है कि सरकार क्या सकती है। इसमें लालबत्ती हटाने, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, कैशलेस अभियान और जीएसटी को जोड़ सकते हैं। चौथी सबसे बड़ी बात उन्होंने एक सोए हुए और अवसादग्रस्त देश में उम्मीदों का ज्वार खड़ा कर दिया है। आकांक्षाओं को जगाने वाले राजनेता होने के नाते उनसे लोग जुड़ते ही जा रहे हैं।

‘अच्छे दिन’ भले ही एक जुमले के रूप में याद किया जाए पर मोदी हैं कि देश के युवाओं के लिए अभी भी उम्मीदों का चेहरा है। यह सब इसके बाद भी कि लोग महंगाई से बेहाल हैं, बैंक अपनी दादागिरी पर आमादा हैं। हर ट्रांजिक्शन आप पर भारी पड़ रहा है। यानी आम लोग मुसीबतें सहकर, कष्ट में रहकर भी मोदी-मोदी कर रहे हैं तो इस जादू को समझना जरूरी है। अगर राजनीति ही निर्णायक है और चुनावी परिणाम ही सब कुछ कहते हैं तो मोदी पर सवाल उठाने में हमें जल्दी नहीं करनी चाहिए। नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश एक अग्निपरीक्षा सरीखा था, जिसमें नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है। ऐसे में आखिर क्या है जो मोदी को खास बनाता है। अपने कष्टों को भूल कर, बलिदानों को भूलकर भी हमें मोदी ही उम्मीद का चेहरा दिख रहे हैं।

आप देखें तो आर्थिक मोर्चे पर हालात बदतर हैं। चीजों के दाम आसमान पर हैं। भरोसा न हो तो किसी भी शहर में सिर्फ टमाटर के दाम पूछ लीजिए। काश्मीर के मोर्चे पर हम लगातार पिट रहे हैं। सीमा पर भी अशांति है। पाक सीमा के साथ अब चीन सीमा पर भी हालात बुरे हैं। सरकार के मानवसंसाधन मंत्रालय का हाल बुरा है। तीन साल से नई शिक्षा नीति लाते-लाते अब उन्होंने कस्तूरीरंगन जी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई है। जाहिर है हीलाहवाली और कामों की प्राथमिकता में इस सरकार का अन्य सरकारों जैसा बुरा है। दूसरा नौकरशाही पर अतिशय निर्भरता और अपने काडर और राजनीतिक तंत्र पर अविश्वास इस सरकार की दूसरी विशेषता है।

लोगों को बेईमान मानकर बनाई जा रही नीतियां आर्थिक क्षेत्र में साफ दिखती हैं। जिसका परिणाम छोटे व्यापारियों और आम आदमी पर पड़ रहा है। बैंक और छोटी जमा पर घटती ब्याज दरें इसका उदाहरण हैं। यहां तक कि सुकन्या समृद्धि और किसान बचत पत्र भी इस सरकार की आंख में चुभ रहे हैं। आम आदमी के भरोसे और विश्वास पर चढ़कर आई सरकार की नीतियां आश्चर्य चकित करती हैं। विश्व की मंदी के दौर में भी हमारे सामान्य जनों की बचत ने इस देश की अर्थव्यवस्था को बचाए रखा, आज हालात यह हैं कि हमारी बचत की आदतों को हतोत्साहित करने और एक उपभोक्तावादी समाज बनाने के रास्ते पर सरकार की आर्थिक नीतियां हैं। आखिर छोटी बचत को हतोत्साहित कर, बैकों को सामान्य सेवाओं के लिए भी उपभोक्ताओ से पैसे लेने की बढ़ती प्रवृत्ति खतरनाक ही कही जाएगी। आज हालात यह हैं कि लोगों को अपने बैंक में जमा पैसे पर भी भरोसा नहीं रहा। इस बढ़ते अविश्वास के लिए निश्चित ही सरकार ही जिम्मेदार है।

अब सवाल यह उठता है कि इतना सारा  कुछ जनविरोधी तंत्र होने के बाद भी मोदी की जय-जयकार क्यों लग रही है। इसके लिए हमें इतिहास की वीथिकाओं में जाना होगा जहां लोग अपने ताकतवर नेता पर भरोसा करते हैं और उससे जुड़ना चाहते हैं। आज अगर नरेंद्र मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से हो रही है तो कुछ गलत नहीं है। क्योंकि उनकी तुलना मनमोहन सिंह से नहीं हो सकती। किंतु मनमोहन सिंह के दस साल को गफलत और गलतियों भरे समय ने ही नरेंद्र मोदी को यह अवसर दिया है। मनमोहन सिंह ने देश को यह अहसास कराया कि देश को एक ताकतवर नेता की जरूरत है जो कड़े और त्वरित फैसले ले सके। उस समय अपने व्यापक संगठन आधार और गुजरात की सरकार के कार्यकाल के  आधार पर नरेंद्र मोदी ही सर्वोच्च विकल्प थे। यह मनमोहन मार्का राजनीति  से ऊब थी जिसने मोदी को एक बड़ा आकाश दिया। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी अब प्रशासनिक स्तर पर जो भी कर रहे हों पर राजनीतिक फैसले बहुत सोच-समझ कर ले रहे हैं। उप्र में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी से लेकर राष्ट्रपति चयन तक उनकी दूरदर्शिता और राजनीति केंद्रित निर्णय सबके सामने हैं।

जाहिर तौर पर मोदी इस समय की राजनीति का प्रश्न और उत्तर दोनों हैं। वे संकटकाल से उपजे नेता हैं और उन्हें समाधान कारक नेता होना चाहिए। जैसे बेरोजगारी के विकराल प्रश्न पर, सरकार की बेबसी साफ दिखती है। प्रचार, इवेंट्स और नारों से अलग इस सरकार के रिपोर्ट कार्ड का आकलन जब भी होगा, उससे वे सारे सवाल पूछे जाएंगें, जो बाकी सत्ताधीशों से पूछे गए। भावनात्मक भाषणों, राष्ट्रवादी विचारों से आगे एक लंबी जिंदगी भी है जो हमेशा अपने लिए सुखों, सुविधाओं और सुरक्षा की मांग करती है। आक्रामक गौरक्षक, काश्मीर घाटी के पत्थरबाज, नक्सली आतंकी एक सवाल की तरह हमारे सामने हैं। आकांक्षाएं जगाने के साथ आकांक्षाओं को संबोधित करना भी जरूरी है।

नरेंद्र मोदी के लिए आने वाला समय इस अर्थ में सरल है कि विपक्ष उनके लिए कोई चुनौती पेश नहीं कर पा रहा है, पर इस अर्थ में उनकी चुनौती बहुत कठिन है कि वे उम्मीदों को जगाने वाले नेता हैं और उम्मीदें तोड़ नहीं सकते। अब नरेंद्र मोदी की जंग दरअसल खुद नरेंद्र मोदी से है। वे ही स्वयं के प्रतिद्वंद्वी हैं। 2014 के चुनाव अभियान में गूंजती उनकी आवाज “मैं देश नहीं झुकने दूंगा”, लोगों के कानों में गूंज रही है। आज के प्रधानमंत्री के लिए ये आवाजें एक चुनौती की तरह हैं, क्योंकि उसने देशवासियों से अच्छे दिन लाने के वादे पर वोट लिए थे। लोग भी आपको वोट करते रहेगें जब उन्हें भरोसा ना हो जाए कि 2014 का आपका सारा चुनाव अभियान और उसके नारे एक ‘जुमले’ की तरह थे। ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के लिए देश ने आपको वोट नहीं दिए थे। कांग्रेस की सरकार से ज्यादा मानवीय, ज्यादा जनधर्मी, ज्यादा संवेदनशील शासन के लिए लोगों ने आपको चुना था, ‘साहेब’ भी शायद इस भावना को समझ रहे होगें।

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लेषक हैं. वे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क  09893598888 के जरिए किया जा सकता है.

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नरेंद्र मोदी कहीं भाजपा के बहादुर शाह जफर यानी अंतिम प्रधानमंत्री तो नहीं साबित होने जा रहे हैं!

Ashwini Kumar Srivastava : देश के तकरीबन हर हिस्से से आ रहीं अराजकता की खबरें अब लोगों के जेहन में यह सवाल उठाने लग गई हैं कि नरेंद्र मोदी कहीं भाजपा के बहादुर शाह जफर यानी अंतिम प्रधानमंत्री तो नहीं साबित होने वाले हैं… जिन्हें इतिहास का ज्ञान होगा, वह जानते होंगे कि साढ़े तीन सौ बरस तक समूचे हिंदुस्तान पर हुकूमत करने वाले मुगल साम्राज्य के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर के समय में पूरा देश तो बहुत दूर की बात थी, दिल्ली और उसके आसपास ही मुगलिया कानून को मानने वाले नहीं रह गए थे…

लिहाजा, बेबस जफर अपने महल में बैठे शायरी कर रहे थे और दिल्ली और उसके आसपास भीड़ अराजक हो चुकी थी …जाहिर है, ऐसे में मुगलिया सल्तनत पूरे देश में भला कैसे टिकी रहती, जब दिल्ली और सम्राट के किले में ही उसने दम तोड़ दिया था। कुछ-कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हुकूमत का भी है, जिसका राज तो इस समय दिल्ली समेत सारे देश पर है…लेकिन इनसे न तो कश्मीर संभल पा रहा है और न ही दिल्ली और उसके आसपास का इलाका…

अब देखिये, कल ही कश्मीर में धर्मांध भीड़ ने अपने ही धर्म के डीएसपी को मस्जिद के बाहर ही पीट-पीट कर मार डाला। इसे पढ़कर हम सभी देशवासियों को न सिर्फ गुस्सा आया बल्कि हैरत भी हुई कि आखिर किस कदर अराजकता फैली हुई है कश्मीर में…फिर अचानक देश की राजधानी दिल्ली के बेहद नजदीक बल्लभगढ़ में वैसी ही भयावह घटना होने का समाचार आ गया….

तो क्या अब हमारे देश में कानून का राज खत्म हो चुका है और हमारा देश भी अब पाकिस्तान, सीरिया, अफगानिस्तान जैसे अराजक मुल्कों में बदलने लगा है? जहां कश्मीर से लेकर दिल्ली तक, गुजरात से लेकर बंगाल-झारखंड तक या फिर समूचे देश में ही हत्यारी भीड़ के हाथों सड़कों पर ‘त्वरित न्याय’ होता है…तो क्या अब इस देश का संविधान, कानून, अदालत, पुलिस खुद यहां के लोग ही मानने को तैयार ही नहीं है?

कश्मीर में भीड़ का अराजक होना बेहद चिंताजनक है क्योंकि हम कश्मीर खोना नहीं चाहते… और वहां हम हर कीमत पर भारत के संविधान, कानून, अदालत, पुलिस का राज ही देखना चाहते हैं, लेकिन दिल्ली के नजदीक ही भीड़ का अराजक होना तो उससे भी ज्यादा चिंताजनक है…क्योंकि जब हम दिल्ली और उसके आसपास ही कानून का राज कायम नहीं रख पाएंगे तो कश्मीर तो दिल्ली से वैसे भी बहुत दूर है…

Vikram Singh Chauhan : एक 16 साल के एक मुसलमान लड़के को लोकल ट्रेन में भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला। अब लोग बोल रहे हैं इसे साम्प्रदायिक रंग नहीं दिया जाये। लेकिन भीड़ का शिकार सिर्फ बेगुनाह मुसलमान क्यों हो रहे हैं? अख़लाक़ के बाद से हत्या का दौर जारी है। दरअसल इस भीड़ का नेतृत्व सत्ता में बैठे लोग कर रहे हैं ,उनके मुसलमानों को लेकर दिए जा रहे बयान कर रहे हैं ,टीवी न्यूज़ चैनल कर रहे हैं,उनके बड़बोले नेता मंत्री कर रहे हैं, कथित योगी, गुरु और बाबा कर रहे हैं। इन सबने मिलकर बहुसंख्य हिन्दू को मुसलमानों के खिलाफ उकसाया है और उकसा रहे हैं। इस मासूम की मौत के लिए ये सब जिम्मेदार हैं।

Sheetal P Singh : अजब वक़्त है. कुछ लोग कश्मीर में डिप्टी एस पी को पीट पीट कर मार डालने पर लिखते हैं. और, कुछ दूसरे लोग बल्लभगढ़ में सोलह बरस के बच्चे को पीट पीट कर मार डालने पर लिखते हैं. बहुत कम हैं जिन्हें दोनों घटनाएँ रुला पाती हैं. पता नहीं कैसे इन निर्दोष बेबस मौतों में फ़र्क़ कर लेते हैं लोग? अपनी पसंद का दुख चुन लेते हैं लोग? ओखला से बल्लभगढ़ तक तीन मुस्लिम बच्चों की अकारण सिर्फ मज़हबी आधार पर जानलेवा पिटाई करने वाली भीड़ का जो मानस है वही मोदी जी के बहुमत पाने का आधार है, “विकास”नहीं! और यह विनाश है, विकास नहीं! जिन्हे पसंद है वे देश को गृहयुद्ध में झोंकने की तैयारी ( नाइजीरिया जैसा बनाने) के गुनहगार हैं! दुर्भाग्य से एक तिहाई के करीब भारतीय इस रक्तरंजित मूढ़ता के पक्षकार हैं!

पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव, विक्रम सिंह चौहान और शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखने की मोदी की दोगली नीति पर भाजपाई चुप क्यों हैं?

Yashwant Singh : ये तो सरासर मोदी की दोगली नीती है. देश को एक कर ढांचे में लाने की वकालत करने वाले मोदी आखिर पेट्रोल डीजल को जीएसटी से क्यों बाहर रखे हुए हैं. ये तर्क बेमानी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से भारी टैक्स से काफी पैसा पाती हैं, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं.

भाजपा की केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें अगर अपना अपना हिस्सा खत्म करते हुए पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में ले आएं तो जनता को भारी राहत मिलती. पर ऐसा नहीं करेंगे ये लोग क्योंकि थोक में फायदा तो ये बड़े लोगों को देते हैं. माल्य से लेकर अडानी तक. अंबानी से लेकर टाटा-बिड़ला तक. पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से इनका दाम आधा हो जाता. यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे तो जीएसटी से बाहर रखे हुए है ताकि इससे भारी मात्रा में जनता से पैसा वसूला जाता रहे और बाकी सामान को जीएसटी में लाकर महंगाई बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं.

नारा दे रहे हैं एक देश और एक कर का. लेकिन ये नारा बेकार साबित हो जाता है पेट्रो प्रोडक्ट्स को जीएसटी से बार रखने के फैसले से. आजकल ह्वाट्सअप पर ये वाला मैसेज खूब भेजा जा रहा है, आप भी पढिए-

Why petrol and diesel prices are not brought under GST. Now for petrol and diesel the central exise duty is 23% and state VAT is 34%. Total tax is 57%. If these essential products are brought under GST , the maximum tax will be only 28%, which means the prices of petrol and diesel can come down by almost 50%. The public at large will be benefited.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं–

Harshendra Singh Verdhan : Dada, It’s somehow difficult in Fertiliser sector too..18% for processed complex on raw materials & 12% on Imported. So; nothing for homemade indigenous Fertilisers. An easy way to Chinese poor quality fertilisers.

Care Naman : यदि जीएसटी सब पर तो पेट्रोल और दारु दोनों पर भी लागू करें… ये तो वही हुआ कड़ुआ कड़ुआ थू थू… मीठा मीठा गप गप…

Vijayshankar Chaturvedi : Larger public interest will not be bothering to them until 2019.

Divakar Singh : State governments opposed centre’s move to bring petroleum under gst. As you mentioned, state govts earn huge money from it, so they don’t want to bring it under gst. Centre wants to bring everything under gst. So we should ask respective state govts.

Yashwant Singh : जो बुरा है, वो दूसरों का है। जो अच्छा है, वो सब मेरा है। 🙂

Divakar Singh : बुरा भी अपना हो सकता है, पर इस केस में नही है। बेचारे जेटली जी बहस करते रह गए पर कोई राज्य तैयार नही हुआ पेट्रो उत्पादों के लिए gst लागू करने के लिए। ऐसे में केंद्र सरकार को दोषी बताना तथ्यात्मक नही है। देखें इस लिंक को : Petroleum products to be under GST if states agree: Minister

Yashwant Singh सेंटर को अपना हिस्सा छोड़ देना चाहिए था ताकि मोदी जी की नीयत तो साफ सही दिखती. साथ ही जिन स्टेट्स में बीजेपी है, वहां भी हटवा सकती थी. इसके बाद बीजेपी के लोग गैर बीजेपी राज्यों की सरकारों को एक्सपोज कर सकते थे. पर ऐसा नहीं, क्योंकि पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा सस्ता हो जाने से गरीबों को फायदा होता, महंगाई कम होती. बड़े उद्यमी घरानों को लाभ पहुंचाने वाले मोदी भला बल्क में यानि थोक में गरीबों को राहत कैसे दे सकते थे.

Rajeev Verma : पेट्रोल डीजल यदि gst के दायरे में कर देते तो input credit देने में सरकार का धुंआ निकल जाता. चीजें आश्चर्य जनक रूप से सस्ती हो जातीं.

Rajeev Pandey : Modi dhongi pakhandi hai uske maalik Ambani ki kamayi kam ho jayega jo Modiya kabhi nahi chahta.

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उप्र के दलित नेता को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर मोदी ने सबको चौंकाया

शायद यही राजनीति की नरेंद्र मोदी शैली है। राष्ट्रपति पद के लिए अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले श्री रामनाथ कोविंद का चयन कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर बता दिया है कि जहां के कयास लगाने भी मुश्किल हों, वे वहां से भी उम्मीदवार खोज लाते हैं। बिहार के राज्यपाल और अरसे से भाजपा-संघ की राजनीति में सक्रिय रामनाथ कोविंद पार्टी के उन कार्यकर्ताओं में हैं, जिन्होंने खामोशी से काम किया है। यानि जड़ों से जुड़ा एक ऐसा नेता जिसके आसपास चमक-दमक नहीं है, पर पार्टी के अंतरंग में वे सम्मानित व्यक्ति हैं। यहीं नरेंद्र मोदी एक कार्यकर्ता का सम्मान सुरक्षित करते हुए दिखते हैं।

बिहार के राज्यपाल कोविंद का नाम वैसे तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच बहुत चर्चा में नहीं था। किंतु उनके चयन ने सबको चौंका दिया है। एक अक्टूबर,1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में जन्मे कोविंद मूलतः वकील रहे और केंद्र सरकार की स्टैंडिंग कौसिल में भी काम कर चुके हैं। आप 12 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे। भाजपा नेतृत्व में दलित समुदाय की वैसे भी कम रही है। सूरजभान, बंगारू लक्ष्मण, संघ प्रिय गौतम, संजय पासवान, थावरचंद गेहलोत जैसे कुछ नेता ही अखिलभारतीय पहचान बना पाए। रामनाथ कोविंद ने पार्टी के आंतरिक प्रबंधन, वैचारिक प्रबंधन से जुड़े तमाम काम किए, जिन्हें बहुत लोग नहीं जानते। अपनी शालीनता, सातत्य, लगन और वैचारिक निष्ठा के चलते वे पार्टी के लिए अनिवार्य नाम बन गए। इसलिए जब उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया तो लोगों को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। अब जबकि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं तो उनपर उनके दल और संघ परिवार का कितना भरोसा है , कहने की जरूरत नहीं है। रामनाथ कोविंद की उपस्थिति दरअसल एक ऐसा राजनेता की मौजूदगी है जो अपनी सरलता, सहजता, उपलब्धता और सृजनात्मकता के लिए जाने जाते हैं। उनके हिस्से बड़ी राजनीतिक सफलताएं न होने के बाद भी उनमें दलीय निष्ठा, परंपरा का सार्थक संयोग है।

कायम है यूपी का रूतबा

उत्तर प्रदेश के लोग इस बात से जरूर खुश हो सकते हैं कि जबकि कोविंद जी का चुना जाना लगभग तय है,तब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों पदों पर इस राज्य के प्रतिनिधि ही होगें। उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी जिस तरह सिमट रही है और विधानसभा चुनाव में उसे लगभग भाजपा ने हाशिए लगा दिया है, ऐसे में राष्ट्रपति पद पर उत्तर प्रदेश से एक दलित नेता को नामित किए जाने के अपने राजनीतिक अर्थ हैं। जबकि दलित नेताओं में केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत भी एक अहम नाम थे, किंतु मध्यप्रदेश से आने के नाते उनके चयन के सीमित लाभ थे। इस फैसले से पता चलता है कि आज भी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री की नजर में उत्तर प्रदेश का बहुत महत्व है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक विजय ने उनके संबल को बनाने का काम किया है। यह विजययात्रा जारी रहे, इसके लिए कोविंद के नाम का चयन एक शुभंकर हो सकता है। दूसरी ओर बिहार का राज्यपाल होने के नाते कोविंद से एक भावनात्मक लगाव बिहार के लोग भी महसूस कर रहे हैं कि उनके राज्यपाल को इस योग्य पाया गया। जाहिर तौर पर दो हिंदी ह्दय प्रदेश भारतीय राजनीति में एक खास महत्व रखते ही हैं।

विचारधारा से समझौता नहीं

रामनाथ कोविंद के बहाने भाजपा ने एक ऐसा नायक का चयन किया है जिसकी वैचारिक आस्था पर कोई सवाल नहीं है। वे सही मायने में राजनीति के मैदान में एक ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिसने मैदानी राजनीतिक कम और दल के वैचारिक प्रबंधन में ज्यादा समय दिया है। वे दलितों को पार्टी से जोड़ने के काम में लंबे समय से लगे हैं। मैदानी सफलताएं भले उन्हें न मिली हों, किंतु विचारयात्रा के वे सजग सिपाही हैं। संघ परिवार सामाजिक समरसता के लिए काम करने वाला संगठन है। कोविंद के बहाने उसकी विचारयात्रा को  सामाजिक स्वीकृति भी मिलती हुयी दिखती है। बाबा साहेब अंबेडकर को लेकर भाजपा और संघ परिवार में जिस तरह के विमर्श हो रहे हैं, उससे पता चलता है कि पार्टी किस तरह अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने के लिए बेचैन है। राष्ट्रपति के चुनाव के बहाने भाजपा का लक्ष्यसंधान दरअसल यही है कि वह व्यापक हिंदू समाज की एकता के लिए नए सूत्र तलाश सके। वनवासी-दलित और अंत्यज जातियां उसके लक्ष्यपथ का बड़ा आधार हैं। जिसका सामाजिक प्रयोग अमित शाह ने उप्र और असम जैसे राज्यों में किया है। निश्चित रूप से राष्ट्रपति चुनाव भाजपा के हाथ में एक ऐसा अवसर था जिसके वह बड़े संदेश देना चाहती थी। विपक्ष को भी उसने एक ऐसा नेता उतारकर धर्मसंकट में ला खड़ा किया है, एक पढ़ा-लिखा दलित चेहरा है। जिन पर कोई आरोप नहीं हैं और उसने समूची जिंदगी शुचिता के साथ गुजारी है।

राष्ट्रपति चुनाव की रस्साकसी

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने एकत्रित हो रहे विपक्ष की एकता में भी एनडीए ने इस दलित नेता के बहाने फूट डाल दी है। अब विपक्ष के सामने विचार का संकट है। एक सामान्य दलित परिवार से आने वाले इस राजनेता के विरूद्ध कहने के लिए बातें कहां हैं। ऐसे में वे एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिसे उसके साधारण होने ने ही खास बना दिया है। मोदी ने इस चयन के बहाने राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ दिया है। अब विपक्ष को तय करना है कि वह मोदी के इस चयन के विरूद्घ क्या रणनीति अपनाता है।

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लषेक हैं)

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रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया!

Abhinav Shankar : आज जब मोदी सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं तो इन तीन सालों में हुए बदलावों पर स्वाभाविक रूप से पूरे देश में चर्चाओं का एक दौर चला है। जाहिर है कई विषयों पर चर्चा होगी। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, रणनीतिक। मैं आज इन विषयों पर बात नहीं करना चाहता। इसके कई कारण हैं। पहला तो ये कि मैं अक्सर इन क्षेत्रों में हो रहे बदलावों पर ब्लॉग वगैरह पर लिखता रहा हूँ। दूसरा, आज इन चीजों पर पहले ही टनों स्याही बहाई जा चुकी होगी और तीसरा जिस विषय पर में बात करना चाहता हूं वो आज शर्तिया नहीं हुई होगी या हुई भी होगी तो उस परिप्रेक्ष्य में नहीं हुई होंगी जिस परिपेक्ष्य में होनी चाहिए।

मोदी सरकार में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वो मीडिया में आया है। रजत शर्माओं, अरनबों, सरदानाओं, सुधीर चौधरियों, गौरव सावन्तों और मारूफ रजाओं का आविर्भाव भारतीय मीडिया के course of evolution का एक महत्वपूर्ण devlopmemt है। लोकतंत्र में आदर्श स्थिति ये होती है कि मीडिया निष्पक्ष रहे। भारत मे पत्रकारिता लगभग शुरू से वैचारिक स्तर पर एक खास ओर झुकी रही पर पिछले लगभग 12 सालों से जबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया ये ‘वैचारिक झुकाव’ शनै शनै ‘दलीय पक्षधरता’ में बदलता चला गया। और जब संघवियों, बरखाओं, सरदेसाईओं और रविशों जैसे पत्रकारिता के सबसे बड़े नाम एक साथ एक समूह के तौर पर एक पक्ष में जा मिलें तो ये स्वाभाविक हो गया था कि एक institution के तौर पर पत्रकारिता में इस ‘पक्षधरता’ के मुकाबिल एक ‘विपक्ष’ भी उभरे।

लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये जरूरी है कि लोकतंत्र में संस्थाएं (जिसमे press भी आता है-लोकतंत्र का चौथा स्तंभ) या तो निष्पक्ष हों या बहुपक्षीय। लोकतंत्र में एकपक्षीय संस्था से घातक कुछ नहीं होता। प्रेस कुछ दिनों से पूरी तरह से एकपक्षीय हो गया था। रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया। मोदी सरकार के इन तीन सालों का ये सबसे बड़ा बदलाव है और एक शुभ बदलाव है। ये स्थिति भले निष्पक्ष मीडिया के utopian अवधारणा जैसी आदर्श नही है पर ‘एकपक्षीय’ मीडिया के त्रासदी से लाखों गुणा बेहतर है।

बल्कि एक दृष्टि से बहुपक्षीय मीडिया ‘निष्पक्ष मीडिया’ के अवधारणा के काफी पास है। उदाहरण के तौर पर- जब पाकिस्तान के संदर्भ में अर्णब आक्रामक तौर-तरीको की पैरवी करते हुए उसके लाभों को गिनाते हैं और बरखा pacifist appeal करते हुए युद्ध की कीमत याद दिलाती हैं; तो भले व्येक्तिक-स्तर पर वो दो विरोधी पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर मीडिया के ‘collective-conscious’ के व्यापक परिदृश्य पर वो दोनों संयुक्त तौर पर एक संतुलित और ‘निष्पक्ष तस्वीर’ ही सामने रखते हैं। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ये उस स्थिति से भी कहीं ज्यादा बेहतर है जब इस मामले में बरखा के अकेले show में वो आदतन pacifist appeal करते हुए देश को युद्ध की कीमत याद दिलाती रहती थी। और जिसके बरबक्स पाकिस्तान के establishment को ये तर्जुमा होता था कि there is no cost of spreading terrorism in India and India will not retaliate back as they fear for cost of a war with us.

दरअसल निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया की संकल्पना तक पहुँचने का व्यवाहारिक रास्ता है। हमें रजत शर्माओं, अर्णबों, सरदनाओं और सुधीर चौधरियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने जाने-अनजाने वैचारिक पूर्वाग्रह के बोझ से एकपक्षीय होती देश की मीडिया को बहु-पक्षीय और तदसमात निष्पक्ष बनाया। मोदी सरकार के तीन सालों में आया ये परिवर्तन एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जो अपने साथ दूरगामी प्रभाव लिए आया है।

कई कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे अभिनव शंकर की एफबी वॉल से.

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मौकापरस्त शायर मुनव्वर राणा मिल आए प्रधानमंत्री मोदी से!

Nadeem : तो हारो न खुद को तुम… आज एक नामचीन शायर ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की। प्रधानमंत्री से मुलाक़ात में कोई बुराई नहीं, बस उनकी मुलाकात इस लिये थोड़ा खटकी कि बिहार चुनाव के मौके पर उन्हें सबने टीवी के पर्दे पर देश में बढ़ती अहिष्णुता पर फूट फूट कर रोते देखा था। वह जेब में अपना पुरस्कार और पुरस्कार की राशि लेकर आये थे और उसे टीवी चैनल के जरिये वापस कर गए थे। सुना आज जब वो मोदी जी से मिले तो उनके कंधे पर सर रख कर खूब फफक फफक के रोये गोया बचपन के बिछड़े भाई मिले हों।

नाराजगी होना और उसके दूर हो जाने में भी किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता, मुझे भी नहीं है लेकिन यह मुलाकात ऐसे वक्त पर हुई है जब यूपी में उर्दू अकादमी, हज कमेटी, अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्थाओं के चेयरमैन बनने हैं, ऐसे में उस नामचीन शायर को लेकर कयास का दौर शुरू हो गया है। सवाल लाजिमी भी है यह मुलाकात तभी कयूं जब यूपी में बीजेपी की सरकार बन गयी, मोदी जी तो 2014 से प्रधानमंत्री हैं, उससे पहले मुलाकात कयूं नही हुई?

अचानक यह लिखने का मन इसलिये कर गया कि अंदर नाराजगी खौलने लगी थी। वो इस वजह से जो लोग समाज को रास्ता दिखाने वाले होते हैं अगर वो ही रीढ़ विहीन दिखने लगे तो फिर गुस्सा स्वाभाविक हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए निदा फाज़ली का यह शेर और बात खत्म:

दुनिया न जीत पाओ, तो हारो न खुद को तुम।
थोड़ी बहुत तो नाराजगी जेहन में रहनी चाहिए।।

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मुनव्वर राना साहब ने कभी सोनिया गांधी की तरफ से सोनिया गांधी के लिए बहुत लंबी रचना रची थी। सवाल उठा था किसी राजनितिक शख्सियत पर एक नामचीन शायर का इस तरह कलम तोड़ लिखने की वजह क्या हो सकती है? कुछ लोगों ने कहा वो राज्यसभा जाना चाहते है। खैर वजह जो भी रही हो, अब बड़ा सवाल यह कि कितनी जल्दी वह मोदी जी पर लिखते है?खैर जब तक नहीं लिखते तब तक आप लोग सोनिया गांधी पर लिखी उनकी यह रचना पढ़ते रहिये:

मैं सोनिया गांधी
————

मैं तो भारत में मोहब्बत के लिए आयी थी,

कौन कहता है हुकूमत के लिए आयी थी.

नफ़रतों ने मेरे चेहरे का उजाला छीना,

जो मेरे पास था वो चाहने वाला छीना.

सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना,

मैं वो बेवा हूं जो इटली भी नहीं जा सकती.

आग नफ़रत की भला मुझको जलाने से रही,

छोड़कर सबको मुसीबत में तो जाने से रही,

ये सियासत मुझे इस घर से भगाने से रही.

उठके इस मिट्टी से, ये मिट्टी भी तो जाने से रही.

सब मेरे बाग के बुलबुल की तरह लगते हैं,

सारे बच्चे मुझे राहुल की तरह लगते हैं.

अपने घर में ये बहुत देर कहां रहती है,

घर वही होता है औरत जहां रहती है.

कब किसी घर में सियासत की दुकान रहती है,

मेरे दरवाज़े पर लिख दो यहां मां रहती है.

हीरे-मोती के मकानों में नहीं जाती है,

मां कभी छोड़कर बच्चों को कहां जाती है?

हर दुःखी दिल से मुहब्बत है बहू का जिम्मा,

हर बड़े-बूढ़े से मोहब्बत है बहू का जिम्मा

अपने मंदिर में इबादत है बहू का जिम्मा.

मैं जिस देश आयी थी वही याद रहा,

हो के बेवा भी मुझे अपना पति याद रहा.

मेरे चेहरे की शराफ़त में यहां की मिट्टी,

मेरे आंखों की लज़ाजत में यहां की मिट्टी.

टूटी-फूटी सी इक औरत में यहां की मिट्टी.

कोख में रखके ये मिट्टी इसे धनवान किया,

मैंन प्रियंका और राहुल को भी इंसान किया.

सिख हैं, हिन्दू हैं मुलसमान हैं, ईसाई भी हैं,

ये पड़ोसी भी हमारे हैं, यही भाई भी हैं.

भाई-बहनों से किसी को कभी डर लगता है,

सच बताओ कभी अपनों से भी डर लगता है.

हर इक बहन मुझे अपनी बहन समझती है,

मैं आबरु हूं तुम्हारी, तुम ऐतबार करो,

मुझे बहू नहीं बेटी समझ के प्यार करो।।

नवभारत टाइम्स दिल्ली के पोलिटिकल एडिटर नदीम की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Jyotiswaroop Pandey अवार्ड वापसी से .. वापसी तक

Anuj Mishra सर आज आपकी बात पढ़ी। इस पर मुन्नवर राना साहब का ही एक शेर है
बुलंदी देर तक भला किस शख्स के हिस्से में रहती है।
बड़ी ऊँची ईमारत हर घड़ी खतरे में रहती है।।

Mohd Nadeem Siddiqui यह वही हैं जो छाती पीट कर कहते थे कि बस इतनी सी बात पर हमें बलवाई लिखा है , हमारे घर के बर्तनों पर आईएसआई लिखा है।

Sultan Khan ये कैसी सियासत!
बशीर बद्र याद आते है —
दुश्मनी लाख सही खत्म ना करिये रिश्ता
दिल मिले ना मिले हाथ मिलाये रखिये!!

Ghanshyam Dubey शायरी मोदी जी के चरणों मे झुक गयी । आदमी और उसकी फितरतों के पाखण्ड का एक नायाब नमूना!!

Durga Sharan Verma मतलबी चापलूस

Anand K. Bajpai सबसे बड़ा कमीना इन्सान

Abhinya Singh कविता ने फोटो के मायने स्पष्ट कर दिए। …. बेहतरीन जोड़ी।

Mohan Rajput आखिर शायर का भी तो व्यकिगत जीवन होता है। मेरा मानना है कि उसके रचना-कर्म व व्यक्तिगत जीवन को एक ही चश्मे से देखना उचित नहीं है। अभी किसी संपादक, आईएएस या आईपीएस की ऐसी फोटो पोस्ट होती तो बधाइयों का तांता लग गया होता…। क्षमा याचना के साथ!!!

Rohit Ramwapuri दरबारों की मेहरबानियां जड़ भी चतुर सुजान हो गए।
जुगनी भी रुदवालियां गाकर साहित्यिक दिनमान हो गए।

Pravesh Yadav रायबरेली के है न सर तो थोड़ा बहुत लगाव रहा होगा। लेकिन वहां से सेटिंग नहीं बन पाई होगी क्‍योंकि परिवार में एक भाईसाहेब सपा की तो एक भाईसाहेब बसपा की राजनीति करते हैं। आग लगाने वालों की कमी थोड़ी न है। जब आप कांग्रेस का झंडा नहीं उठावोंगे तो कैसे आपको राज्‍यसभा तक जाने देंगे कांग्रेसी। वह भी रायबरेली के कांग्रेसी जो कि बिना दाम के फोन तक नहीं करते हैं।

Ashutosh Dwivedi मेरे और उनके ताल्लुकात जब मैं जागरण lko में था तब से थे। मैं और मेरा परिवार उनको धरती के देवता की तरह मानता था। मगर पुरस्कार वाली घटना के बाद से मन खट्टा होने लगा था। उनका विरोध नही होना चाहिए था मगर सियासी इवेंट के इस तरीके के जरिये नहीं।

Humayun Choudhary मौक़ा परस्ती कमज़रफी की पहचान ।

Ankur K Singh नया वर्जन : मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
मोदी से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ :p

Pravin Rai वह सत्ता के साथ रहना पंसद करते है।

Kishor Jha मोदी का विरोध और असहिष्णुता पर विलाप करने वाले कई लोग वस्तुतः मौकापरस्त हैं। पहले भाजपा विरोधी मजबूत थे और सत्ता में रहकर मलाई चटाने में सक्षम थे, तो धर्मनिरपेक्षता के समर्थन और हिंदू कट्टरता के खिलाफ झंडा उठाए चलते थे। अब भाजपा की अजेय सी स्थिति देखकर वही लोग भगवा ध्वज के वाहक बनकर फिर मलाई चाटने की कोशिश में हैं। ऐसे बेशर्म लोगों का कभी किसी धर्म, ईमान, सिद्धांत से न पहले कोई लेना-देना था, न अब है और न आगे रहेगा।

Sandeep Dwivedi  आप जो लिखते हैं उसमे इतना दम रहता है की बस यही कहना पड़ता है की…. की अब इसके आगे क्या कहें.. आपके लेख़न को देख कर कई बार यही लगता है की ये जो साहित्य की संस्था का नाम आपने लिया अगर आप उसके अधक्ष्य बन जायें तो मुझे लगता है की ऊर्दू के क्षेत्र में एक नये युग का सुत्रपात हो जाये और रही बात अल्प संख्यकों की तो उसे जो प्रगती के सोपान की ज़रूरत है वो आपसे बेहतर मुझे लगता है वो क्या समझेंगे ज़िन्हे बस मौके की नजाकत पर बस राजनीती करनी ही आती है. आप के लेख पर आपको सत सत नमन… और माँझी की भाषा में शानदार, जबर्दस्त, ज़िंदाबाद…

Amrish Shukla बिलकुल सटीक बात सर। ऐसे लोग मौकापरस्त होते हैं। उनका हर स्टेप अपने स्वार्थ में उठता है। सही अवसर को चुनना सबका हक़ है लेकिन यहाँ ध्यान यह भी रहना चाहिए कि आपके उस कदम से समाज को नुकसान न हो। मुझे याद है किस तरह से मोदी जी को लेकर अल्पसंख्यकों में यही लोग भय भर रहे थे। लेकिन आखिर कबतक?? सच्चाई कबतक छिपाई जा सकती है।

Kr Ashok S Rajput मौकापरस्त नामचीन शायर

Ashish Misra हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

Alok Pathak क्या बात कही है आशीष भाई .. ये हर कुत्ते के आगे शाही टूकडा डाल देती है . वाह

Amit Pandey बहुत बारीक नजर सर। छीला भी महीन से। गजब।

Rajeev Awasthi यही लोकतत्र के असली बहुरूपिये हैं

Shailendra Shukla खरी खरी बात बधाई के पात्र हैं आप।

लखन मिश्र राय साहब नमस्कार , हमारे नदीम भाई नहीं लिखना चाहते हैं उनका नाम पर मैं लिख देता हूँ जिनके शहर की नालियों में राजनीति बहती है वो हैं प्रख्यात शायर मुन्नवर राणा !

Nadeem लखन जी, राय साहब को नाम मालूम न हो, यह मुमकिन ही नही। सब पर नज़र रखते हैं राय साहब। मुलाकात के साथ ही सरकारी , गैर सरकारी एजेंसीज से फोटो जारी हो गया था।।।

लखन मिश्र नदीम भाई नमस्कार , हम भी राय साहब से परिचित हैं बहुत खुशमिजाज भी हैं हमने भी बस आपके व्यंग में कुछ रंग भर दिए हैं

Rishi Mishra राणा साहब का एक शेर, दूसरों की पकाई नहीं खाते हम आम के मौसम में मिठाई नहीं खाते

Deepak KS गुरूजी , क्यों बेआबरू कर रहे हैं उन्हें ।

Umair Hashmi सर गॉड गिफ्ट जिसको बोलते है उस अतुल्य चीज़ नवाज़ा है आपको. आपकी लेखनी का जवाब नहीं.

Pawan Upadhyay समाज असलियत में इसी लिए पंगु है कि ओज के माइक तोड़ते कवि दम कब और कहाँ तोड़ दें देखते ही बनता है ।।

Nadeem Khan मौका परसत लोग किसी को भी मां बाप कह कर अपना काम निकाल लेते हैं।।।।नो टेंशन ।।।।

Brijendra Kumar Singh बहुत सुन्दर नदीम भैया मुनव्वर राना बहुत बडा़ नाम है अब देश मे बहुत कुछ टूट छूट औऱ बदल रहा है ऐसे में क्या क्या औऱ कौन कौन बदल जायेगा बस हम आप जैसे लोग की सोच अगर बची रहे तो

Shamik Sharma क्या इसे ह्रदय परिवर्तन नहीं कह सकते।हम नकारात्मक ही क्यों सोचें। अच्छा है अगर ऐसे ही बहुतेरों के ह्रदय परिवर्तन होते रहें तो वोट बैंक की राजनीति ही समाप्त हो जायेगी।फिर वास्तविक मुद्दे सामने आएंगे।

Abhishek Sharma इब्ने मरियम हुआ करे कोई। उस शायर की दवा करे कोई। 😉

Sanjeev Pathak आदत हो चुकी है शायरों, कलाकारों और पत्रकारिता से जुड़े लोगों को सत्ता सुख लेने की नदीम भाई।राज्यसभा, निगम, अकादमी और आयोगों के लिये ये सब काम करने पड़ते हैं

Onkar Tiwari समय का फेर है सर … बेचारे जाते भी तो कहां

Ram Krishna Shukla वो जो हमको जीने का सलीका बताते थे, ईमान आज वो अपना कौड़ियों के भाव बेच आएं है…

Kalyan Kumar यही सच्चाई है नदीम भाई… मेरे भी कई साथी कतार में खड़े हो चुके है़ं..

A R Ushmani Journalist हम आपकी इस अदा के कायल हैं भाई

Nirankar Singh Chauhan Nirankar एक प्रगतिवादी लेखक ही शालीनता के साथ स्नेहपूर्ण कटाक्ष कर सकता है। Sir we have always great respect for you.

Sushil Singh सर जी अगर कोई काम सिर्फ प्रसिद्धि पाने की चाहत के लिये किया जाये तो फिर स्तरहीनता दिखाई ही दे जाती है

Ajai Kumar जब जब बहै बयार पीठ तब तैसी कीजै।

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किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

ये किसान चाहते हैं कि उन्हें सूखे में खराब हुई फसलों का मुआवजा मिले। साथ ही उनके कर्जे माफ़ कर दिए जाएं। और बुजुर्गों के लिए सरकार पेंशन की व्यवस्था करे। पीएम आवास की तरफ मार्च कर रहे इन किसानों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। और फिर इन्हें जंतर-मंतर पर लाकर पटक दिया। इनका कहना है कि अब ये लौटकर जाने से रहे। क्योंकि इनके पास वहां खाने के लिए कुछ नहीं बचा है। भले उन्हें यहां भीख ही क्यों न मांगनी पड़े ये यहीं रहेंगे।

देश के लोगों का पेट भरने वाले किसान के हाथ में अगर भीख का कटोरा आ गया है। तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि हालात किस कदर बदतर हो गए हैं। ऊपर से अपनी बदहाली दिखाने के लिए अगर उसे अपने परिजनों की कब्रें खोदकर उनकी खोपड़ियां हाथ में लेनी पड़े तो समझिए सरकारी संवेदना पाताल के किस हिस्से में पहुंच गई है। कहां तो हम दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहे हैं। लेकिन सामाने की हकीकत है कि उसे देखना ही नहीं चाहते। या फिर देखकर भी अनदेखा कर देना चाहते हैं।

महेंद्र मिश्रा सहारा समय, न्यूज एक्सप्रेस समेत कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.


Satyendra PS : ये​ हरियाणा के किसान हैं,खेतों के लिए पानी मांग रहे थे। नहर का काम पूरा कराए जाने का वादा था वही पूरा कराना चाहते थे ! इस चेहरे में अपना चेहरा देखें, पिता, चाचा, भाई का चेहरा देखें। उन सबका चेहरा देखें जो सरकार से कुछ उम्मीद करते हैं, जो सरकार से कुछ छोटी मोटी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। लोकतंत्र लहूलुहान है। अपने रक्त में नहाया यह देश का किसान है!

सत्येंद्र प्रताप सिंह बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी अखबार के दिल्ली एडिशन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.


उपरोक्त तस्वीरों पर कुछ टिप्पणियां…

Anil Mishra पानी मांग रहे थे तो सिर्फ लाठी खाये। अगर सरकार इनकी जमीन मांगती तो गोली खाते। इसमें कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा का कोई लेना देना नहीं। यही परम्परा है। लोकतंत्र धोखा है। असल लड़ाई पूँजीवाद वर्सेस सर्वहारा है। गरीब को मार ही खाना है। सरकार किसी की भी हो।

Mahendra K. Singh लोग इस समय “राष्ट्रवाद” की अफीम खाकर मस्त हैं, वे इस तस्वीर में अपने पिता, चाचा, भाई का चेहरा तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक उन के चाचा, पिता, भाई खुद इस जुल्म का शिकार न हो जाएँ। वैसे राष्ट्रभक्तों का यह मानना है कि खेती बारी आम लोगों के बस की बात नहीं है, इन लोगों को अपने खेत “राष्ट्रभक्त कॉर्पोरेट” जैसे अम्बानी और अडानियों को सौंप देने चाहिए, वे सेठ लोग फिर इन्ही गरीब लोगों को अपना मज़दूर बना कर उन्ही के खेतों में खेती करवाएंगे, फिर नफे-नुक्सान की कोई चिंता नहीं रह जायेगी, इन सब लोगों को एक निश्चित तनख्वाहें मिलेंगी और फिर सब खुश। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यही किया, छोटे-छोटे किसानों के खेत खरीद लिए अब उन पर बड़े पैमाने पर खेती करवाते हैं – जैसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां लाखों एकड़ बड़े खेतों में आलू के खेती, ब्रेड बनाने वाली कंपनियां ऐसे ही मीलों तक फैले खेतों में गेहूं की खेती। वही मॉडल भारत में लाकर मोदी जी देश का विकास करना चाहते हैं और इस किसान जैसे कुछ “राष्ट्रद्रोही” मोदी की योजना पर पानी फेरना चाहते हैं – कपार तो फूटना ही चाहिए ऐसे “राष्ट्रद्रोहियों” का।

Shaukat Ali Chechi मैं तहे दिल से लानत भेजता हूं ऐसी सरकारों पर अगर इस देश में ईमानदार है खून पसीने की खाता है गरीब है 70 परसेंट देश को चला रहा है देश की सरहदों की रक्षा करने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जिनको सरकार के मंत्री कायर कहते हैं वह है किसान हमारे पूर्वजों ने नारा दिया था जय जवान जय किसान आज उनकी यह हालत उनकी दुर्गति उनका अपमान जो देश का भी पेट भरता है पशु पक्षियों का भी पेट भरता है उसके पैदा करे हुए माल से देश की पहचान व तरक्की है आखिर इनका कौन सा गुनाह है कोई देशवासी तो बताएं

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